विदेह ४४८
विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम्
सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर।
[विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X Videha e-Journal (since 2000) at www.videha.co.in ]
ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। कॉपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादन अथवा संचारन-प्रसारण नै कएल जा सकैत अछि।
(c) २०००- २०२६. सर्वाधिकार सुरक्षित। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर)।
ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ ’विदेह’ पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि।
Videha eJournal (link www.videha.co.in) is a multidisciplinary online journal dedicated to the promotion and preservation of the Maithili language, literature and culture. It is a platform for scholars, researchers and writers to publish their works and share their knowledge about Maithili language, literature, and culture. The journal is published online to promote and preserve Maithili language and culture. The journal publishes articles, research papers, book reviews, prose and verse in Maithili and English languages. It also features translations of literary works from other languages into Maithili and from Maithili into English. It is a peer-reviewed journal, which means that articles and papers are reviewed by experts in the field before they are accepted for publication.
(c)२०००- २०२६. विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA. सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. In respect of materials e-published in Videha, the Editor, Videha holds the right to create the web archives/ theme-based web archives, right to translate/ transliterate those archives and create translated/ transliterated web-archives; and the right to e-publish/ print-publish all these archives. रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना/ संग्रह (संपूर्ण उत्तरदायित्व रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता मध्य) editorial.staff.videha@zohomail.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ पठा सकैत छथि, संगमे ओ अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो सेहो पठाबथि। एतऽ प्रकाशित रचना/ संग्रह सभक कॉपीराइट रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि आ जतऽ रचनाकार/ संग्रहकर्त्ताक नाम नै अछि ततऽ ई संपादकाधीन अछि। सम्पादक: विदेह ई-प्रकाशित रचनाक वेब-आर्काइव/ थीम-आधारित वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार, ऐ सभ आर्काइवक अनुवाद आ लिप्यंतरण आ तकरो वेब-आर्काइवक निर्माणक अधिकार; आ ऐ सभ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। ऐ सभ लेल कोनो रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै, से रॉयल्टी/ पारिश्रमिकक इच्छुक रचनाकार/ संग्रहकर्त्ता विदेहसँ नै जुड़थु। विदेह ई पत्रिकाक मासमे दू टा अंक निकलैत अछि जे मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ www.videha.co.in पर ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
Font/ Keyboard Source: https://fonts.google.com/ , https://github.com/virtualvinodh/aksharamukha-fonts , https://keyman.com/
These are print-on-demand books, send your queries to editorial.staff.videha@zohomail.in. The eBooks of some of these are available for sale on Google Play [(c) Preeti Thakur, sales.videha@gmail.com], send your queries to sales.videha@gmail.com. The contents and documents e-published by Videha (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA are periodically being checked for accessibility issues. People with disabilities should not have difficulty accessing these contents/ documents.
© Preeti Thakur (sales.videha@gmail.com) Cover design: AUM GAJENDRA THAKUR
VIDEHA:448
समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र विदेह सम्मानसँ सम्मानित श्री पनकलाल मण्डल द्वारा।
for the writers, readers, and listeners of Mithilā,
who have kept the lamp of Maithilī burning
through a thousand years of storms
…………………………..
"The Parallel is not the marginal
but the truthful, in long delay."
Mānuṣīm iha saṃskṛtām
मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत्। हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्।
मिथिलाक ओइ लेखक,
पाठक आ श्रोता लोकनि लेल,
जे सहस्र वर्षक झंझावात मे सेहो
मैथिलीक दीप प्रज्वलित रखने छथि।
समानांतर कात-करोट मे हएब नै अछि,
वरन् ई अछि असल सत्य, जे अपन समय लेलक अछि।
अनुक्रम
विदेह अंक ४४८ [१५ अगस्त २०२६]
वर्ष १९ मास २२४ ISSN 2229-547X
ऐ अंकमे अछि:-
रमानन्द झा ’रमण’ विशेषांक
०.०.विदेहक रमानन्द झा ’रमण’ विशेषांक पर पाठकीय टिप्पणी (पृष्ठ ३-४)
१.१. सम्पादकीय (केन्द्रीय मैथिली बोली) (पृष्ठ ५-१८)
१.२. सम्पादकीय (ठेठी-अंगिका मैथिली) (पृष्ठ १९-३०)
१.३. सम्पादकीय (बज्जिका मैथिली) (पृष्ठ ३१-४८)
२.१. रमानन्द झा ’रमण’ विशेषांकक संदर्भमे (पृष्ठ ४९-७८)
२.२. रमानन्द झा रमण केर संक्षिप्त परिचय (पृष्ठ ७९-८३)
२.३. कल्पना झा- साक्षात्कार (पृष्ठ ८४-८५)
२.४. कल्पना झा- मैथिली कथाक वैविध्य आ गाम्भीर्य केँ रेखांकित करबाक सफल प्रयास (पृष्ठ ८६-९३)
२.५. आभा झा- नान्य पन्था विद्यते अनयाय (पृष्ठ ९४-१०१)
२.६. आभा झा- विवर्त्त (पृष्ठ १०२-१०५)
२.७. कल्पना झा- सुच्चा संपादक, रमानन्द झा रमण (पृष्ठ १०६-११३)
२.८. प्रियंका मिश्र- डा. रमानन्द झा रमण साहित्य-साधनाक विविध आयाम (पृष्ठ ११४-१२०)
२.९. कुमार राहुल- अनुसंधान आ संरक्षण लेल अपस्यांत डॉ रमानंद झा रमण (पृष्ठ १२१-१२५)
२.१०. अशोक- डा. रमानंद झा रमण केर महत्व (पृष्ठ १२६-१३०)
२.११. अजित कुमार झा- मैथिली साहित्यक सूक्ष्मद्रष्टा डा० रमानन्द झा (पृष्ठ १३१-१३६)
२.१२. कीर्तिनाथ झा- विवर्त (पृष्ठ १३७-१४६)
२.१३. नबोनारायण मिश्र- हमर संस्मरण रमणजीक संग (पृष्ठ १४७-१५०)
२.१४. हितनाथ झा- अनुसन्धान-प्रतिमान (पृष्ठ १५१-१५४)
२.१५.हितनाथ झा- डा.रमानन्द झा रमण जीक बीज-भाषण (पृष्ठ १५५-१६२)
२.१६.प्रदीप बिहारी- सम पर बजैत सुर (पृष्ठ १६३-१६८)
२.१७. प्रवीण कुमार झा- विद्वता, योगदान आ मैथिली लेल प्रयासक परिणाम (पृष्ठ १६९-१७३)
२.१८. सुजीत कुमार झा- ओ शब्द, जे एखन धरि संग अछि (पृष्ठ १७४-१७७)
२.१९. डॉ कैलाश कुमार मिश्र-रमानन्द झा “रमण” मैथिली साहित्य आ मिथिला संस्कृति केर अनुपम अभिलेखपाल (पृष्ठ १७८-१८२)
२.२०. लालदेव कामत- डा. रमानन्द झा रमण जीक रचना संसार (पृष्ठ १८३-१८४)
२.२१. गजेन्द्र ठाकुर- अखियासल (केन्द्रीय मैथिली बोली) (पृष्ठ १८५-२३१)
२.२२. गजेन्द्र ठाकुर- अखियासल (ठेठी-अंगिका मैथिली) (पृष्ठ २३२-२७७)
२.२३. गजेन्द्र ठाकुर- अखियासल (बज्जिका मैथिली) (पृष्ठ २७८-३२४)
२.२४. गजेन्द्र ठाकुर- हिआओल (केन्द्रीय मैथिली बोली) (पृष्ठ ३२५-३६१)
२.२५. गजेन्द्र ठाकुर- हिआओल (ठेठी-अंगिका मैथिली) (पृष्ठ ३६२-३९८)
२.२६. गजेन्द्र ठाकुर- हिआओल (बज्जिका मैथिली) (पृष्ठ ३९९-४३५)
२.२७.डा धनाकर ठाकुर- चेतना समिति क द्रोणाचार्य रमणजी (पृष्ठ ४३६-४३६)
२.२८. आचार्य रामानंद मंडल डॉ रमानंद झा रमण: व्यक्तित्व आ कृतित्व (पृष्ठ ४३७-४४०)
२.२९. आशीष अनचिन्हार- पोथी संग्रहकर्ता इतिहासकार होथि से जरूरी नहि (पृष्ठ ४४१-४४५)
I.A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] BY GAJENDRA THAKUR
APPENDIX: METHODOLOGICAL NOTE
The Nepal Bikram Samvat years cited have been converted to approximate CE years using the standard offset of BS minus 56–57 years. Web sources consulted include the Videha digital archive (videha.co.in). All URLs were last accessed April 2026. This research was prepared using primary texts, and standard academic resources. All quoted material is from the cited sources. For the most current scholarship, consult the Videha Parallel History series at www.videha.co.in/gajenthakur.htm.
……………………………………………….
A PARALLEL HISTORY OF MAITHILI LITERATURE: INTRODUCTION
DALIT LITERARY CRITICISM: TELUGU, GUJARATI, AND ODIA DALIT LITERATURE IN MAITHILI TRANSLATION
GANGESA UPADHYAYA: LIFE, LOGIC, AND LEGACY IN THE NAVYA-NYAYA TRADITION [NAVYA-NYAYA’S HIERARCHICAL USE OF LIMITORS IS COMPATIBLE WITH MODERN ARTIFICIAL INTELLIGENCE AND NATURAL LANGUAGE PROCESSING (NLP)]
MITHILA & MAITHILI: CRITICAL ANALYSIS OF INSTITUTIONS
THE MAITHILI GHAZAL
VIDEHA (ISSUE 1-350) SADEHA SERIES (1-37)
VIDEHA ISSUES 351-438
VIDEHA MAITHILI PARALLEL DRAMA THEATRE
VIDEHA PARALLEL AUDIO VIDEO ARCHIVE
VIDEHA PARALLEL CHILDREN'S LITERATURE
Abdur Razzak, Abha Jha, Abhilash Thakur, Achhe Lal Shastri, Ajit Kumar Jha, Amit Mishra, Amod Kumar Jha, Amrendra Yadav, Anamika Raj, Anand Kumar Jha, Anil Mallik, Anjani Kumar Verma, Anmol Jha, Arvind Thakur, Ashish Anchinhar, Ashok (kathakar Ashok), Ashraf Rain, Dr. Bacheshwar Jha, Badri Nath Roy 'Amatya', Pt. Bal Govind 'Arya', Bechan Thakur, Pandit Bhavnath Jha, Bibhuti Anand, Bijayendra Jha, Binay Bhushan, Bindeshwar Thakur, Chandan Kumar Jha, Dinesh Kumar Mishra, Durganand Mandal, Gajendra Thakur, Ghanashyam Ghanero, Gopalji Jha 'Gopesh', Gyanvardhan Kanth, Harimohan Jha, Hitendra Gupta, Hitnath Jha, Hriday Narayan Jha, Ilarani Singh, Jagdanand Jha 'Manu', Jagdish Chandra Thakur 'Anil', Jagdish Prasad Mandal, Jhauli Paswan, Jitendra Kumar Jha 'Jeetu', Dr. Kailash Kumar Mishra, Kalikant Jha 'Buch', Kalpana Jha, Kalpana Jha, Bokaro, Kalpana Jha, Delhi, Kalpana Jha, Patna, Kameshwar Choudhary, Kameshwar Jha 'Kamal', Dr. Kamini Kamayini, Kamla Chaudhary, Kapileshwar Raut, Kedar Nath Chaudhary, Dr. Kirtinath Jha, Dr. Kishan Karigar, Krishna Kumar Kashyap, Kumar Manoj Kashyap, Kumar Pawan, Kundan Kumar Karn, Kusum Thakur, Lal Dev Kamat, Lalita Jha, Lallan Prasad Thakur, Laxman Jha 'Sagar', Mala Jha, Manmohan Jha, Meena Jha, Mithilesh Kumar Jha, Munnaji, Munnaji, Munni Kamat, Nabo Narayan Mishra, Nagendra Kumar, Nand Kumar Mishra 'Nand', Nand Vilas Roy, Nanda Vilas Ray, Narayan Yadav, Narayanji Chaudhary, Narendra Jha, Navendu Kumar Jha, Neerja Renu, OM Prakash Jha, Panna Jha, Phanishwar Nath Renu, Prabhat Rai Bhatt, Pradeep Bihari, Pradeep Pushpa, Pranav Jha, Prayas Premi Maithil, Preeti Thakur, Premlata Mishra 'Prem', Premshankar Singh, Rabindra Narayan Mishra, Rajdeo Mandal, Rajeev Ranjan Mishra, Rajnandan Lal Das, Ram Bharos Kapari 'Bhramar', Ram Chandra Roy, Ram Sogarth Yadav, Ram Vilas Sahu, Acharya Ramanand Mandal, Prof. Dr. Ramawatar Yadav, Ramdeo Prasad Mandal 'Jharudar', Ramesh, Ramesh Narayan, Rameshwar Prasad Mandal, Pandit Ramji Chaudhary, Ramji Prasad Mandal, Acharya Ramlochan Sharan, Ramlochan Thakur, Ravi Mishra Bhardwaj, Ravibhushan Pathak, Ravindra Nath Thakur, S.C. Suman, Sandeep Kumar Safi, Sanju Das, Santosh Kumar Mishra, Santosh Kumar Roy 'Batohi', Satyanand Pathak, Shail Jha 'Sagar', Dr. Shambhu Kumar Singh, Shanti Lakshmi Chaudhary, Shardindu Chaudhary, Shashi Bala, Shashidhar Kumar 'Videh', Shiv Kumar Jha 'Tillu', Dr. Shiv Kumar Prasad, Shivshankar Singh Thakur, Shivshankar Sriniwas, Dr. Shubh Kumar Barnwal, Shyam Darihare, Siyaram Jha 'Saras', Srijan Shekhar 'Ajneya', Subhash Chandra Yadav, Subhash Kumar Kamat, Subodh Jha, Subodh Kumar Thakur, Sujit Kumar Jha, Sushil, Sweta Jha Chaudhary, Taranand Viyogi, Prof. Udaya Narayana Singh Nachiketa, Umesh Mandal, Umesh Paswan, Veena Thakur, Vibha Rani, Vibhuti Anand, Vijaynath Jha, Vineet Utpal, Yoganand Jha, Prof. Dr. Yogendra P. Yadava, Yogendra Pathak Viyogi
A Parallel History of Mithila & Maithili Literature, Original Poem in Maithili, Translated into English, Children's Literature Theory, Children's Picture-Story Literature, Contemporary Mithila Artists, Contemporary Mithila Artists, Dalit and Subaltern Literature, Dalit Literary Criticism, Dalit Literary Criticism — Gujarati Dalit Literature in Maithili Translation, Dalit Literary Criticism — Odia Dalit Literature in Maithili Translation, Dalit Literary Criticism — Telugu Dalit Literature in Maithili Translation, Digital Maithili Children's Literature, Digital Maithili Literature, The Epistemology of Parallelism — Videha Sadeha Series and the Maithili Digital Renaissance, Gangeśa Upādhyāya / Navya-Nyāya, Gangesa Upadhyaya — Life, Logic, and Legacy in the Navya-Nyaya Tradition, Institution Critical Analysis, Language Transmission, Laprek vs Bīhani Kathā, Maithili Bīhani Kathā — The Seed Story Tradition in Maithili Literature, The Maithili Ghazal — History, Theory, Revival, and the Anchinhar Era, Maithili Micronarrative, Mithila & Maithili — Critical Analysis of Institutions, Awards and Recognition Frameworks, Mithila & Maithili Institution Critical Analysis, Parallel Literature Movement, Seed Story Tradition, Tirhuta / Mithilakshar, Videha 351–438 Critic, Videha Children Literature Expanded, Videha Children Literature Expanded — Parallel Children Literature in Maithili, Videha eJournal, Videha Issues 1–350, Videha Issues 351–438, Videha Issues 351–438 — Epistemological and Canonical Transformations, The Videha Maithili Parallel Drama Theatre, Videha Maithili Parallel Drama Theatre, The Videha Maithili Parallel Drama Theatre — Critical Historiography and Epistemological Analysis, The Videha Parallel Audio Video Archive, Videha Parallel Audio Video Archive, The Videha Parallel Audio Video Archive — Digital Remediation and Subaltern Historiography, Videha Parallel Audio Video Critic, Videha Parallel Children Literature, Videha Parallel Drama Critic, Videha Parallel History Framework, Videha Sadeha 1–37 / Issues 1–350 Critic, Videha Sadeha, Videha Sadeha Series 1–37, Vidyapati, the Primal Poet of Maithili (Pre-Jyotirishvara), Women’s Writing, Young Readers in Maithili
… AND MORE TO COME IN TOME 5.
A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] BY GAJENDRA THAKUR
[ISBN NUMBER: 978-93-5812-486-6]
GOOGLE PLAY BOOK [TOME 1-4; VOLUMES 1-100]
https://play.google.com/store/books/details?id=uvjREQAAQBAJ
GOOGLE PLAY AUDIOBOOK [TOME 1-4; VOLUMES 1-100]
https://play.google.com/store/audiobooks/details?id=AQAAAEBas1rzEM
AMAZON KINDLE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100]
https://www.amazon.in/dp/B0GX2XRKM7
POTHI.COM HARDBACKS
POTHI TOME 1 [VOLUMES 01-25]
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-literature/
POTHI TOME 2 [VOLUMES 26-50]
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-tome-2/
POTHI TOME 3 [VOLUMES 51-75]
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-literature-volume-1-100-tome-3-volume-51-75-b/
POTHI TOME 4 [VOLUMES 76-100]
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-parallel-history-mithila-maithili-literature-volume-1-100-tome-4-volume-76-100-/
HISTORY OF MITHILA, VAJJI & ANGA IN INDIA & NEPAL: FROM PREHISTORY TO THE CONTEMPORARY PERIOD [A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE] VOLUME I
POTHI.COM HARDBACK
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-history-of-mithila-vajji-anga-india-nepal/
Google Playbook
https://play.google.com/store/books/details?id=xisIEgAAQBAJ
Google Play Audiobook
https://play.google.com/store/audiobooks/details?id=AQAAAEAG7l6uSM
AMAZON KINDLE
https://www.amazon.in/dp/B0HHJ27ZG4
HISTORY OF MITHILA, VAJJI & ANGA: SOCIO-CULTURAL-ECONOMIC HISTORY OF MITHILA, VAJJI & ANGA IN INDIA & NEPAL FROM PREHISTORY TO THE CONTEMPORARY PERIOD [A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE] VOLUME II
POTHI.COM HARDBACK
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-history-of-mithila-vajji-anga-in-india-nepal-volume-ii-part-1/
Google Playbook
https://play.google.com/store/books/details?id=qKEJEgAAQBAJ
Google Play Audiobook
https://play.google.com/store/audiobooks/details?id=AQAAAEAGGTJZJM
Amazon Kindle
https://www.amazon.in/dp/B0HHYHNXZ7
II. DECODING PANJI: VOLUME I-VI
Decoding the Panji of Mithila Volume I-VI
POTHI.COM HARDBACK:
Decoding the Panji of Mithila : Surprising Insights from India and Nepal's Oldest Social Network [Volume I]
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila/
Decoding the Panji of Mithila Volume II: Genealogical Mapping, Mūla, Dūṣaṇ, and the Videha Panji Search System [Based on Prachin Panji]
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila-volume-ii/
Decoding the Panji of Mithila Volume III: A Complete Index-wise Decoding of Genome Mapping Volume I - Khand 2 Based on Uptip Panji
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila-volume-iii/
Decoding the Panji of Mithila Volume IV: Based on the Nagram Panji
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila-volume-iv/
Decoding the Panji of Mithila Volume V: Based on Volume II Panji: Genealogical Mapping of Mithila, 450 AD-2009 AD
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila-volume-v/
Decoding the Panji of Mithila Volume VI: Based on Dushan Panji
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-decoding-panji-mithila-0/
KINDLE EDITIONS:
Decoding the Panji of Mithila : Surprising Insights from India and Nepal's Oldest Social Network Volume I
https://www.amazon.in/dp/B0H463RVT8
Decoding the Panji of Mithila Volume II: Genealogical Mapping, Mūla, Dūṣaṇ, and the Videha Panji Search System
https://www.amazon.in/dp/B0H6NPRTYB
Decoding the Panji of Mithila Volume III: A Complete Index-wise Decoding of Genome Mapping Volume I - Khand 2 Based on Uptip Panji
https://www.amazon.in/dp/B0H6R4BBFB
Decoding the Panji of Mithila Volume IV: Based on the Nagram Panji
https://www.amazon.in/dp/B0H6R6VSBF
Decoding the Panji of Mithila Volume V: Based on Volume II Panji: Genealogical Mapping of Mithila, 450 AD-2009 AD
https://www.amazon.in/dp/B0H6R4BBFD
Decoding the Panji of Mithila Volume VI: Based on Dushan Panji
https://www.amazon.in/dp/B0H6R2YCFP
Google Playbooks:
Decoding Panji: Volume I
https://play.google.com/store/books/details?id=rrniEQAAQBAJ
Decoding Panji: Volume II
https://play.google.com/store/books/details?id=5RrxEQAAQBAJ
Decoding Panji: Volume III
https://play.google.com/store/books/details?id=-XD2EQAAQBAJ
Decoding Panji: Volume IV
https://play.google.com/store/books/details?id=bfn2EQAAQBAJ
Decoding Panji: Volume V
play.google.com/store/books/details?id=hGH4EQAAQBAJ
Decoding Panji: Volume VI
https://play.google.com/store/books/details?id=pcH6EQAAQBAJ
Google Play Audiobooks:
Decoding Panji: Volume I
https://play.google.com/store/audiobooks/details?id=AQAAAEB64VahPM
Decoding Panji: Volume II
https://play.google.com/store/audiobooks/details?id=AQAAAEB6wVeBPM
Decoding Panji: Volume III
https://play.google.com/store/audiobooks/details?id=AQAAAED6hDjE0M
Decoding Panji: Volume IV
https://play.google.com/store/audiobooks/details?id=AQAAAED6jFbMvM
Decoding Panji: Volume V
https://play.google.com/store/audiobooks/details?id=AQAAAED6Ui4SxM
Decoding Panji: Volume VI
https://play.google.com/store/audiobooks/details?id=AQAAAED61jGW2M
III. गद्य पद्य भारती खण्ड १ आ २ (विदेह सदेह २८ & विदेह सदेह ३७)
[विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-१) & (खण्ड-२) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ)]
[खण्ड १ ISBN No: 978-93-341-0402-8; खण्ड २ ISBN No: 978-93-5890-150-4]
१
विदेह सदेह २८
GADYA PADYA BHARTI 1
विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-१) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ)
https://store.pothi.com/book/editor-gajendra-thakur-gadya-padya-bharti-1/
२
विदेह सदेह ३७
GADYA PADYA BHARTI 2
विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-२) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ)
https://store.pothi.com/book/translator-gajendra-thakur-gadya-padya-bharti-2/
IV: SELF LEARNING SERIES
ए.आइ. सँ वीडियो बनाउ
POTHI.COM HARDBACK
https://store.pothi.com/book/%E0%A4%97%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A4%B0-%E0%A4%A0%E0%A4%95%E0%A4%B0-%E0%A4%8F%E0%A4%86%E0%A4%87-%E0%A4%B8-%E0%A4%B5%E0%A4%A1%E0%A4%AF-%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%89/
Google Playbook
https://play.google.com/store/books/details?id=PgcDEgAAQBAJ
मैथिली रेडियो नाटक: स्वयं सीखू मार्गदर्शिका
POTHI PAPERBACK
https://store.pothi.com/book/%E0%A4%97%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A4%B0-%E0%A4%A0%E0%A4%95%E0%A4%B0-maithili-radio-natak/
Google Playbook
https://play.google.com/store/books/details?id=bwcDEgAAQBAJ
V: गोहि सभक बीच जलसमाधि- गजेन्द्र ठाकुर (मैथिलीक आइ धरिक सभसँ पैघ उपन्यास)
POTHI.COM HARDBACK
Khand 0:
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-gohi-sabhak-beech-jalsamadhi-part-0/
Khand 1:
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-gohi-sabhak-beech-jalsamadhi-part-1/
Khand 2:
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-gohi-sabhak-beech-jalsamadhi-part-2/
Google Playbook
https://play.google.com/store/books/details?id=pKX4EQAAQBAJ
WATER-BURIAL AMONG THE CROCODILES [ENGLISH TRANSLATION BY THE AUTHOR GAJENDRA THAKUR HIMSELF]
POTHI.COM HARDBACK
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-water-burial-among-the-crocodiles-volume-0/
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-water-burial-among-the-crocodiles-volume-1/
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-water-burial-among-the-crocodiles-volume-2/
Kindle Edition
https://www.amazon.in/dp/B0HG3NTT13
Google Playbook
https://play.google.com/store/books/details?id=dmoEEgAAQBAJ
Google Play Audiobook
https://play.google.com/store/audiobooks/details?id=AQAAAEAGpHjkbM
TEACHING SERIES
Gohi Sabhak Beech Jalsamadhi Teaching Course
www.archive.org/download/videha-petar-2/Gohi_Jalsamadhi_Teaching_merge.pdf
Water-Burial Among the Crocodiles Teaching Course
https://archive.org/download/videha-petar-2/Videha_Teaching_Gohi_Jalsamadhi_Batch1-87.pdf
VI. स्वप्नमे मिज्झर होइत WHEN DREAMS MERGE
Google Playbook
https://play.google.com/store/books/details?id=qAwKEgAAQBAJ
Google Playbook
https://play.google.com/store/books/details?id=us0JEgAAQBAJ&pli=1
Google Play Audiobook
https://play.google.com/store/audiobooks/details?id=AQAAAEAGOT55KM
AMAZON KINDLE
https://www.amazon.in/dp/B0HJ1KXLZR
VII: मैथिलीक एकटा समानान्तर व्याकरण, रचना आ भाषा विज्ञान (ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाकेँ संग लऽ कऽ)- गजेन्द्र ठाकुर
साहित्य अकादेमीक संकीर्ण मैथिली भाषा विभागसँ विदेह (मैथिली साहित्यक समानान्तर मंच) ऐ अर्थमे सेहो फराक अछि जे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिका सन सहभाषाकेँ संग लऽ कऽ मिथिलाक बोली-वैविध्यक समग्र चित्र देल जाइत अछि। विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक भाषा विज्ञान, रचना आ व्याकरण मैथिलीक संग देल गेल अछि मैथिलीक एकटा समानान्तर व्याकरण, रचना आ भाषा विज्ञान (ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाकेँ संग लऽ कऽ)- गजेन्द्र ठाकुर, संगे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक साहित्य ई-प्रकाशित आ समीक्षित सेहो होइत अछि।– गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक, विदेह ISSN 2229-547X
POTHI.COM HARDBACK
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-maithili_thethi_angika_bajjika/
Google Playbook
https://play.google.com/store/books/details?id=pKX4EQAAQBAJ
VIII: भामती (वाचस्पति)/ आत्मतत्त्वविवेक (उदयन)/ न्यायकुसुमाञ्जलि (उदयन)/तत्त्वचिन्तामणि (गंगेश) [मूल संस्कृत सँ मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर]
भामती (वाचस्पति) [मूल संस्कृत सँ मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर]
POTHI.COM HARDBACK
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-bhamti/
Google Playbook
https://play.google.com/store/books/details?id=PWcAEgAAQBAJ
आत्मतत्त्वविवेक (उदयन) [मूल संस्कृत सँ मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर]
POTHI.COM HARDBACK
https://store.pothi.com/book/%E0%A4%AE%E0%A5%82%E0%A4%B2-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4-%E0%A4%89%E0%A4%A6%E0%A4%AF%E0%A4%A8-atmatattvaviveka/
Google Playbook
https://play.google.com/store/books/details?id=I2cAEgAAQBAJ
न्यायकुसुमाञ्जलि (उदयन) [मूल संस्कृत सँ मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर]
POTHI.COM HARDBACK
https://store.pothi.com/book/%E0%A4%AE%E0%A5%82%E0%A4%B2-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4-%E0%A4%89%E0%A4%A6%E0%A4%AF%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E2%80%A2-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%B8%E0%A4%81-%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%A5%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%80-%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6-%E0%A4%97%E0%A4%9C%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%A0%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B0-nyayakusumanjali/
Google Playbook
https://play.google.com/store/books/details?id=APECEgAAQBAJ
तत्त्वचिन्तामणि (गंगेश) [मूल संस्कृत सँ मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर]
POTHI.COM HARDBACK
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-tattvachintamani/
Google Playbook
https://play.google.com/store/books/details?id=FLP3EQAAQBAJ
IX.[अभिज्ञानशाकुन्तलम् (महाकवि कालिदास); आगमडम्बरम् -जयन्त भट्ट; भगवदज्जुकम् -बोधायन; कवि भल्लट- भल्लट-शतक (भल्लटक शत अन्योक्ति), महाकवि क्षेमेन्द्र- छल-कौशलक विलास (कलाविलास), कवि नीलकण्ठ- कलियुग-विडम्बना (व्यंग्य); चतुर्भाण- श्री शूद्रक केर मूल संस्कृत- पद्मप्राभृतकम् (कमलक भेंट), ईश्वरदत्तक मूल संस्कृत- धूर्तविटसंवादः (धूर्त आ दलालक विचार-विमर्श), वररुचिक मूल - उभयाभिसारिका (परस्पर प्रेम-पलायन) आ महाकवि श्यामिलक केर मूल संस्कृत- पादताडितकम् (लात); दामक प्रहसनम् (सम्भवतः भास रचित); हास्यक सागर / हास्यार्णवप्रहसनम् (मूल संस्कृत प्रहसन श्री जगदीश्वर भट्टाचार्य्य); कादम्बरी (वाणभट्ट आ भूषणभट्ट); माटिक खेलौना-गाड़ी / मृच्छकटिकम् (शूद्रक रचित संस्कृत नाटक); मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश श्री महेन्द्रविक्रम वर्मा प्रथम केर मूल संस्कृत प्रहसन); मंत्री राक्षसक राजसी मोहर / मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त रचित संस्कृत नाटक); पालाण्डुमण्डन प्रहसनम् (हरिजीवन मिश्रक संस्कृत प्रहसन); उत्तररामचरितम् (महाकवि भवभूति)]- संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर
POTHI.COM HARDBACK
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-sanskrit-sahitya-13-books/
Google Playbook
https://play.google.com/store/books/details?id=8ZkFEgAAQBAJ
X. ३७ टा मैथिली बाल उपन्यास गजेन्द्र ठाकुर
३७टा मैथिली बाल उपन्यास गजेन्द्र ठाकुर
POTHI.COM HARDBACKS
खण्ड १ (१-१० बाल उपन्यास)
https://store.pothi.com/book/%E0%A4%97%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A4%B0-%E0%A4%A0%E0%A4%95%E0%A4%B0-%E0%A5%A9%E0%A5%AD-%E0%A4%9F-%E0%A4%AE%E0%A4%A5%E0%A4%B2-%E0%A4%AC%E0%A4%B2-%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%AF%E0%A4%B8-%E0%A4%96%E0%A4%A3%E0%A4%A1-%E0%A5%A7/
खण्ड २ (११-२० बाल उपन्यास)
https://store.pothi.com/book/%E0%A4%97%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A4%B0-%E0%A4%A0%E0%A4%95%E0%A4%B0-%E0%A5%A9%E0%A5%AD-%E0%A4%9F-%E0%A4%AE%E0%A4%A5%E0%A4%B2-%E0%A4%AC%E0%A4%B2-%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%AF%E0%A4%B8-%E0%A4%96%E0%A4%A3%E0%A4%A1-%E0%A5%A8/
खण्ड ३ (२१-३० बाल उपन्यास)
https://store.pothi.com/book/%E0%A4%97%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A4%B0-%E0%A4%A0%E0%A4%95%E0%A4%B0-%E0%A5%A9%E0%A5%AD-%E0%A4%9F-%E0%A4%AE%E0%A4%A5%E0%A4%B2-%E0%A4%AC%E0%A4%B2-%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%AF%E0%A4%B8-%E0%A4%96%E0%A4%A3%E0%A4%A1-%E0%A5%A9/
खण्ड ४ (३१-३७ बाल उपन्यास)
https://store.pothi.com/book/%E0%A4%97%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A4%B0-%E0%A4%A0%E0%A4%95%E0%A4%B0-%E0%A5%A9%E0%A5%AD-%E0%A4%9F-%E0%A4%AE%E0%A4%A5%E0%A4%B2-%E0%A4%AC%E0%A4%B2-%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%AF%E0%A4%B8-%E0%A4%96%E0%A4%A3%E0%A4%A1-%E0%A5%AA/
Google Playbook
https://play.google.com/store/books/details?id=gdIFEgAAQBAJ
37 MAITHILI CHILDREN NOVELS IN ENGLISH TRANSLATION
POTHI.COM HARDBACK
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-37-maithili-children-novels-in-english-translation-part-1/
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-37-maithili-children-novels-in-english-translation-part-2/
Google Playbook
https://play.google.com/store/books/details?id=QtUFEgAAQBAJ
Google Playbook Audiobook
https://play.google.com/store/audiobooks/details?id=AQAAAEAG8l-ySM
XI.प्रबन्ध · निबन्ध · समालोचना सिद्धान्त आ अनुप्रयुक्त अध्ययन- गजेन्द्र ठाकुर
POTHI.COM HARDBACK
खण्ड-१
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%A7-%E0%A4%A8%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%A7-%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%B2%E0%A4%9A%E0%A4%A8-%E0%A4%96%E0%A4%A3%E0%A4%A1-%E0%A5%A7-%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%A7%E0%A4%A8%E0%A4%A4/
खण्ड-२
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%A7-%E0%A4%A8%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%A7-%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%B2%E0%A4%9A%E0%A4%A8-%E0%A4%96%E0%A4%A3%E0%A4%A1-%E0%A5%A8-%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A4%A4-%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A4%AF%E0%A4%AF%E0%A4%A8/
Google Playbook
https://play.google.com/store/books/details?id=B84GEgAAQBAJ
XII. रंग-संगम: रंग-संगम नओटा मैथिली नाटक आ तकर अंग्रेजी रंगमंचीय रूपान्तर- गजेन्द्र ठाकुर
POTHI.COM HARDBACK
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-%E0%A4%B0%E0%A4%97-%E0%A4%B8%E0%A4%97%E0%A4%AE/
Google Playbook
https://play.google.com/store/books/details?id=Ae4GEgAAQBAJ
XIII.विदेह शोध-लेख (अंक १ सँ ४४७ धरि)
POTHI.COM HARDBACK
https://store.pothi.com/book/%E0%A4%97%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A4%B0-%E0%A4%A0%E0%A4%95%E0%A4%B0-%E0%A4%B5%E0%A4%A6%E0%A4%B9-%E0%A4%B6%E0%A4%A7-%E0%A4%B2%E0%A4%96-%E0%A4%85%E0%A4%95-%E0%A5%A7-%E0%A4%B8-%E0%A5%AA%E0%A5%AA%E0%A5%AD-%E0%A4%A7%E0%A4%B0/
Google Playbook
https://play.google.com/store/books/details?id=k14HEgAAQBAJ
XII.गजेन्द्र ठाकुरक समानान्तर दर्शन
VOLUME I
POTHI.COM HARDBACK
https://store.pothi.com/book/gajendra-thakur-gajendra-thakurs-parallel-philosophy/
Google Playbook
https://play.google.com/store/books/details?id=PQ8IEgAAQBAJ
VOLUME II
POTHI.COM HARDBACK
https://store.pothi.com/book/%E0%A4%97%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A4%B0-%E0%A4%A0%E0%A4%95%E0%A4%B0-%E0%A4%97%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A4%B0-%E0%A4%A0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%95-%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A4%A8%E0%A4%A4%E0%A4%B0-%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A4%B6%E0%A4%A8-%E0%A4%96%E0%A4%A3%E0%A4%A1-%E0%A5%A8/
Google Playbook
https://play.google.com/store/books/details?id=78kJEgAAQBAJ
विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका WWW.VIDEHA.CO.IN
VIDEHA 23 LANGUAGE TRANSLITERATOR https://www.videha.co.in/new_page_101.htm
विदेह लिपि परिवर्तक IPA · IAST · Tirhuta · Braille https://www.videha.co.in/script-converter.html
विदेह आ सदेह सम्पूर्ण इंडेक्स https://www.videha.co.in/script-converter.html
विदेह पेटार VIDEHA ARCHIVE https://www.videha.co.in/archive.htm
विदेह मैथिली थेसॉरस — मैथिली-अंग्रेजी / अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश https://www.videha.co.in/maithili-thesaurus.html
विदेह मैथिली ↔ अंग्रेजी अनुवादक · Videha Maithili ↔ English Translator https://www.videha.co.in/maithili-translator.html
विदेह पञ्जी प्रबन्ध — मैथिल ब्राह्मण वंशावली इंडेक्स https://www.videha.co.in/panji-mool-index.html
विदेह गद्य https://www.videha.co.in/prose.htm
विदेह पद्य https://www.videha.co.in/verse.htm
विदेह स्त्री कोना https://www.videha.co.in/femcorner.htm
A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE https://www.videha.co.in/gajenthakur.htm
विदेह मिथिला रत्न https://www.videha.co.in/ratna.htm
विदेह मिथिलाक खोज https://www.videha.co.in/discovery.htm
विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण https://www.videha.co.in/investigation.htm
विदेह पुरान अंक https://www.videha.co.in/videha.htm
विदेह पोथी https://www.videha.co.in/pothi.htm
विदेह दृश्य-श्रव्य नाट्य उत्सव https://www.videha.co.in/Audio_Video.htm
विदेह शिशु, बाल आ किशोर उत्सव https://www.videha.co.in/kids.htm
विदेह ई-लर्निङ्ग/ विदेह ई-लर्निङ्ग क्विज https://www.videha.co.in/videha-elearning.htm [विदेह ई-लर्निङ्ग क्विज UPSC / BPSC / UGC-NET / NTA हेतु मैथिली भाषा, साहित्य आ मिथिला इतिहास पर निःशुल्क प्रश्नोत्तरी — क्विज खोलबा लेल कार्ड पर क्लिक करू। शब्दकोश मिथिलाक इतिहास साहित्यक इतिहास UPSC / UGC-NET समानान्तर इतिहास मिथिला पञ्जी मैथिली गजल वेब पत्रकारिता विदेह चित्रकला · कला · संगीत विदेह दृश्य-श्रव्य विदेह विशेषांक/ सम्मान विदेह प्रश्नोत्तरी विदेह नाट्य उत्सव विदेह शिशु उत्सव विदेह स्त्री कोना]
Videha Converters- Thesaurus, Panji, Script Converters, Transliterators, Translators, eLearning Quizzes, Maithili Language Search and other Technical Tools https://www.videha.co.in/videha-converters.htm
विदेह आ सदेह दुनू https://archive.org/details/VidehaAndSadeha
Videha Github: https://github.com/videha-ejournal/
TWITTER/ X https://x.com/videha
FACEBOOK https://www.facebook.com/groups/videha/
Videha Googlegroups https://groups.google.com/g/videha
Videha Mithila, Vajji & Anga: https://videha-ejournal.github.io/mithila-vajji-anga/
Videha Scholar Research: https://videha-ejournal.github.io/videha/research/
Videha Research Alphabetical/ Subjectwise: https://videha-ejournal.github.io/videha/research/videha-scholar-research-book.html
A PARALLEL HISTORY OF MAITHILI LITERATURE [INCLUDING THETHI, ANGIKA & BAJJIKA]
https://youtu.be/6h-nDjYHlME?si=ZVoaTnb13v8mnIaS
PARALLEL PHILOSOPHY VOLUME I
https://www.youtube.com/playlist?list=PLAzN1jZn-iOU
PARALLEL PHILOSOPHY VOLUME II
https://www.youtube.com/playlist?list=PLEeNFEaEfYd0
PARALLEL HISTORY VOLUME I
https://www.youtube.com/playlist?list=PLcQhodF4PphE
PARALLEL HISTORY VOLUME II
https://www.youtube.com/playlist?list=PLGfQDv03IFio
V.L.F. Videha Literature Festival: https://videha-ejournal.github.io/videha-literature-festival/
VIDEHA विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.co.in आ https://videha-ejournal.github.io/videha/ दुनू लिंक पर उपलब्ध अछि।
रमानन्द झा ’रमण’ विशेषांक
०.०.विदेहक रमानन्द झा ’रमण’ विशेषांक पर पाठकीय टिप्पणी
१.१. सम्पादकीय (केन्द्रीय मैथिली बोली)
१.२. सम्पादकीय (ठेठी-अंगिका मैथिली)
१.३. सम्पादकीय (बज्जिका मैथिली)
२.१. रमानन्द झा ’रमण’ विशेषांकक संदर्भमे
२.२. रमानन्द झा रमण केर संक्षिप्त परिचय
२.३. कल्पना झा- साक्षात्कार
२.४. कल्पना झा- मैथिली कथाक वैविध्य आ गाम्भीर्य केँ रेखांकित करबाक सफल प्रयास
२.५. आभा झा- नान्य पन्था विद्यते अनयाय
२.६. आभा झा- विवर्त्त
२.७. कल्पना झा- सुच्चा संपादक, रमानन्द झा रमण
२.८. प्रियंका मिश्र- डा. रमानन्द झा रमण साहित्य-साधनाक विविध आयाम
२.९. कुमार राहुल- अनुसंधान आ संरक्षण लेल अपस्यांत डॉ रमानंद झा रमण
२.१०. अशोक- डा. रमानंद झा रमण केर महत्व
२.११. अजित कुमार झा- मैथिली साहित्यक सूक्ष्मद्रष्टा डा० रमानन्द झा
२.१२. कीर्तिनाथ झा- विवर्त
२.१३. नबोनारायण मिश्र- हमर संस्मरण रमणजीक संग
२.१४. हितनाथ झा- अनुसन्धान-प्रतिमान
२.१५.हितनाथ झा- डा.रमानन्द झा रमण जीक बीज-भाषण
२.१६.प्रदीप बिहारी- सम पर बजैत सुर
२.१७. प्रवीण कुमार झा- विद्वता, योगदान आ मैथिली लेल प्रयासक परिणाम
२.१८. सुजीत कुमार झा- ओ शब्द, जे एखन धरि संग अछि
२.१९. डॉ कैलाश कुमार मिश्र-रमानन्द झा “रमण” मैथिली साहित्य आ मिथिला संस्कृति केर अनुपम अभिलेखपाल
२.२०. लालदेव कामत- डा. रमानन्द झा रमण जीक रचना संसार
२.२१. गजेन्द्र ठाकुर- अखियासल (केन्द्रीय मैथिली बोली)
२.२२. गजेन्द्र ठाकुर- अखियासल (ठेठी-अंगिका मैथिली)
२.२३. गजेन्द्र ठाकुर- अखियासल (बज्जिका मैथिली)
२.२४. गजेन्द्र ठाकुर- हिआओल (केन्द्रीय मैथिली बोली)
२.२५. गजेन्द्र ठाकुर- हिआओल (ठेठी-अंगिका मैथिली)
२.२६. गजेन्द्र ठाकुर- हिआओल (बज्जिका मैथिली)
२.२७.डा धनाकर ठाकुर- चेतना समिति क द्रोणाचार्य रमणजी
२.२८. आचार्य रामानंद मंडल डॉ रमानंद झा रमण: व्यक्तित्व आ कृतित्व
२.२९. आशीष अनचिन्हार- पोथी संग्रहकर्ता इतिहासकार होथि से जरूरी नहि
०.०.विदेहक रमानन्द झा ’रमण’ विशेषांक पर पाठकीय टिप्पणी
प्रणव झा, नई दिल्ली
विदेह अंक 448 (डॉ. रमानन्द झा ’रमण’ विशेषांक) एकटा आरो मैथिली सेवी विद्वान के विषय मे जानबाक आ प्रेरणा लेबाक अवसर दै अछि। ई अंक मैथिली साहित्य आ संस्कृति मे हुनक योगदानक नीक तरीकासँ चर्चा करैत अछि। डॉ. रमणक मैथिली भाषा साहित्य के योगदान ऐ अंक मे छपल लेखक विविधता आ संख्या सँ अंदाजा लागैत अछि। विदेहक संपादकीय में डॉ. रमानन्द झा रमणक साहित्यिक योगदानक संग-संग हुनक आलोचनापद्धतिक सीमा सभक सटीक विवेचन कएल गेल अछि। संपादक रमण जीक समीक्षाक सबल आ निर्बल पक्ष, विशेष कए मूल पाठक अनुपलब्धता आ मूल्य-मानदण्डक अंतर्विरोधकेँ इमानदारीसँ उजागर कएलनि अछि। संपादक जी जे ठेठी आ अंगिका मे संपादकीय लिखलाह अछि, से मजेदार लागल। साक्षात्कारकर्ता के रूप मे कल्पना झा नीक क्वेश्चन सेट केने छथि मुदा ओकर उत्तर नै भेटनाइ विशेषांक मे एकटा शून्य पैदा केने अछि। प्रवीण झा योगदान बनाम परिणामक नीक प्रश्न ठाढ़ केलाह अछि।
नरेन्द्र झा, रांची।
अहाँ काज गजेन्द्र ठाकुर जी झमटगर करैत छी आ लागि कऽ,रमि कऽ करैत छी।डा.रमानन्द झा रमण जीक आलोचनात्मक गवेषणात्मक -समीक्षात्मक व्यक्तित्व पर ई काज नीक कयल गेल हेतनि से विसवास अछि। मैथिली थेसॉरस पर अहाँक काज अछि नैं जानि कोशक जे नियम छैक -ढंग छैक तकर अनुपालन करैत कयल गेल अछि वा नहि! अहाँ बहुत जमि कऽ आ रमि कऽ अनुराग सहित अपनाकेँ मैथिलीक प्रति समर्पित कयने छी ताहि लेल अहाँ सहित अहाँक समस्त मंडली केँ हृदयतल सँ असीम एवं अनवरत बधाइ आ मंगलकामना।
चन्द्रमणि झा, दरभंगा।
बहुत प्रसन्नताक बात। हमरा ततेक रचना भेटि गेल जे ओकरा पूरा पढ़ियों नहि सकलहुँ, लिखितहुँ की? रमणजी बहुत काज कयने छथि। हार्दिक शुभकामना।
योगेन्द्र यादब, नेपाल।
आदरणीय श्री गजेन्द्र ठाकुर जी,
सर्वप्रथम मैथिलीक एतिहासिक पत्रिकाक नियमित प्रकाशनक लेल अहाँ आर अहाँक टीमकेँ हमर हार्दिक धन्यवाद । हम ई पत्रिका नियमित रूपसँ पाबि रहल छी। 'किछु नव सुधार' अन्तर्गत बुँदा २ मे उल्लेखित अहाँक जानकारी सम्बन्धमे हम नेपालक परिपेक्ष्यमे ई जानकारी देब चाहैत छी जे नेपालमे सम्पन्न २०११ आर २०२१क जनगणनामे अंगिका आर बज्जिका मैथिली भाषासँ भिन्न स्वतन्त्र भाषाकै रूपमे enumerated कएल गेल अछि। एहिसँ सम्बन्धित Mark Turin and Yogendra P.Yadava (हम) क लेख "Languages Shared by India and Nepal" (PLSI vol.39) शीघ्र प्रकाशित होम जा रहल अछि। अहाँक लिखल मैथिली, ठंठी, अंगिका आर बज्जिकाक तुलनात्मक व्याकरण उपलब्ध करा देबाक लेल विनम्र आग्रह अछि।
शुभकामनासहित।
१.१. सम्पादकीय (केन्द्रीय मैथिली बोली)
रमानन्द झा 'रमण' : कृतित्व आ ओकर सीमा-रेखा — एक संपादकीय पुनरवलोकन (केन्द्रीय मैथिली बोली)
जे व्यक्ति एहि ग्रन्थक गुण बुझबाक योग्य नहि, ओकर प्रशंसासँ हम प्रसन्न नहि होयब। अन्हरा सभक झुंड जँ कोनो चित्रक प्रशंसा करए, तँ चित्रकारक गौरव कोना बढ़त? लोक एहि ग्रन्थक दोष देखबैत मात्र एकर आलोचना करथि। ज्ञानी लोक अनजानमे कएल अपन तथ्यगत भूल दिस ध्यान आकृष्ट कएल जाएबासँ निश्चय प्रसन्न होइत छथि।- [ आत्मतत्त्वविवेक ग्रन्थक आलोचनासम्बन्धी अन्तिम वचन- उदयनाचार्य]
एहि विशेषांकक लेल आएल रचना— परिचयात्मक आलेखसँ लऽ कऽ दूटा दीर्घ पुस्तक-समीक्षा (अखियासल आ हिआओल पर), साक्षात्कार, संस्मरण, आ मूल्यांकनपरक निबन्ध धरि — एकठाम राखि पढ़ला उत्तर एकटा बात स्पष्ट होइत अछि : रमण जीक मैथिली साहित्यमे जे स्थान अछि, से निर्विवाद अछि, मुदा एहि विशेषांकक सार्थकता तखनहि पूर्ण होएत जखन प्रशंसाक संग-संग ओ सीमा सेहो चिह्नित होअए जे स्वयं योगदानकर्ता सभ, आ रमण जीक अपने आलोचना-पद्धतिक भीतरहि सँ, बेर-बेर रेखांकित होइत रहल अछि। नीचाँ ओहि सभटा सीमाकेँ चारि खण्डमे बाँटि एकठाम राखि रहल छी — पहिल, समालोचना-पद्धतिक सीमा (मुख्यतः 'अखियासल' पर समीक्षासँ); दोसर, 'हिआओल' पर अध्यायवार समीक्षासँ; तेसर, व्यक्तित्व-कृतित्व आ संस्थागत मूल्यांकनसँ जुड़ल सीमा; आ चारिम, संपादकीय-शैलीगत आ पाठकीय असहमतिसँ जुड़ल बिन्दु।
पहिल खण्ड : 'अखियासल' आ समालोचना-पद्धतिक मौलिक सीमा
'अखियासल' (1995) पर आएल विस्तृत समीक्षा एहि सतरहोमेसँ सभसँ बेसी संरचित आ निर्मम अछि। एहि समीक्षाक उत्तरार्ध पूर्णतः 'अखियासल'क सीमा, दुर्बलता आ पद्धतिगत संकटकेँ समर्पित अछि, आ ओतय आठ गोट "सीमा" क्रमबद्ध रूपसँ गनल गेल अछि।
(क) पाठ बिना समीक्षा
सभसँ गम्भीर सीमा ई जे लगभग प्रत्येक प्रारम्भिक निबन्धमे समीक्षक स्वयं मूल रचनाक 'अनुपलब्धता'केँ स्वीकार करैत छथि। 'चन्द्रप्रभा'क प्रसंगमे स्वयं लिखल गेल अछि — "चन्द्रप्रभाक अध्ययन-विश्लेषण नीक जकाँ नहि कएल जा सकल अछि, एकर प्रमुख कारण थिक अनुपलब्धता"; त्रिलोचन झाक प्रसंगमे — "बड़ कम सामग्री उपलब्ध अछि"; यदुवरक प्रसंगमे — "यदुवरक प्रसंग अद्यावधि बड़ कम अनुसन्धान भेल अछि"; बिसरल जनार्दन झाक प्रसंगमे — "पत्र-पत्रिकोमे जे रचना प्रकाशित भेल होएत, आब सर्वसुलभ नहि अछि।" एतय एक गहन विरोधाभास उत्पन्न होइत अछि — जँ मूल कृति समीक्षककेँ स्वयं उपलब्ध नहि छल, तँ ओकर सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्याङ्कन कोन आधारपर सम्भव भेल? बहुत ठाम समीक्षा वस्तुतः द्वितीयक स्रोतपर — जयकान्त मिश्रक मैथिली साहित्येतिहास, करुणाकान्त झाक शोध-प्रबन्ध, अन्य समीक्षकक उद्धरणपर — आश्रित भऽ जाइत अछि। पाठ-केन्द्रित समीक्षाक दृष्टिसँ ई एक मौलिक दुर्बलता थिक — पाठ बिना समीक्षा।
(ख) मूल्य-मानदण्डक अस्थिरता आ आन्तरिक अन्तर्विरोध
रमानन्द झा एक निबन्धमे जाहि गुणकेँ सर्वोच्च मानैत छथि, दोसरमे ओकरे विपरीतकेँ प्रशंसित करैत छथि। गंगानन्द सिंह, 'चन्द्रग्रहण'क नारी-पात्र, ललित आ धीरेन्द्रक विवेचनमे समसामयिक यथार्थ-संवेदना, परिवेश-सम्पृक्ति आ युग-जीवनक प्रतिबिम्बनकेँ सर्वोच्च मूल्य मानल गेल अछि; किन्तु व्यासक कथाकेँ ठीक एहि कारणें प्रशंसित कएल गेल जे ओ समसामयिक जीवनसँ विशेष प्रभावित नहि होइत अछि आ परिवर्तित युग-जीवनक विकृतिसँ अप्रभावित रहैत अछि। ई प्रत्यक्ष आत्मविरोध थिक — यथार्थ-सम्पृक्ति कखनहु गुण, कखनहु ओकर अभाव गुण। तहिना, हरिमोहन झाक हास्यकेँ "विचारक उन्मेष नहि करब"क कारणें न्यून मूल्य देल गेल, किन्तु मधुपक गीतकेँ "तत्काल हृदय-प्रभाव" आ आनन्दक कारणें उच्च मूल्य देल गेल — जखन कि गीत सेहो प्रायः वैचारिक मन्थन नहि, अपितु भाव-तात्कालिकतापर आश्रित होइत अछि। 'कोबर-गीत' सन आत्म-विरोधी, प्रयोजन-प्रेरित रचनाकेँ "व्यक्तिसँ पैघ समाज"क तर्कसँ उचित ठहराओल गेल, किन्तु क्षेमेन्द्रक औचित्य-विचारक दृष्टिसँ आत्माक प्रतिकूल रचना भाव-औचित्यक मूल-भङ्ग थिक — समीक्षक एतय सैद्धान्तिक स्पष्टता प्रदान नहि कऽ पबैत छथि। ई अस्थिरता एहि कारणें अछि जे रमानन्द झा कोनो एक घोषित सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता नहि अपनबैत छथि — ओ प्रसंगानुसार कखनहु प्रभाववादी, कखनहु समाजशास्त्रीय, कखनहु जीवनीमूलक, कखनहु रूपवादी दृष्टि अपनबैत छथि। ई पद्धतिगत सारसंग्रहवाद एक दिस लचीलापन दैत अछि, तँ दोसर दिस मूल्याङ्कनकेँ अप्रत्याशित आ असंगत बना दैत अछि।
(ग) सैद्धान्तिक शब्दावलीक अनुपस्थिति
यद्यपि रमानन्द झाक समीक्षामे रस, ध्वनि, व्यञ्जना, औचित्य आदि भारतीय काव्यशास्त्रीय अवधारणा अन्तर्निहित रूपेँ विद्यमान अछि, तथापि ओ एहि शास्त्रीय प्रतिमानकेँ कतहु सुस्पष्ट सैद्धान्तिक उपकरणक रूपमे प्रयोग नहि करैत छथि। "व्यञ्जित", "सम्प्रेषण", "भावाश्रित" सन शब्द तँ अबैत अछि, मुदा आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, कुन्तक, क्षेमेन्द्र, भट्टनायक आदि आचार्यक नाम आ हुनक सिद्धान्तक व्यवस्थित अनुप्रयोग अनुपस्थित अछि। पाश्चात्य सिद्धान्तक सेहो कतहु नामोल्लेख अथवा सुविचारित प्रयोग नहि भेटैत अछि। एहिसँ एक द्वैध स्थिति उत्पन्न होइत अछि — एक दिस ई सैद्धान्तिक लाघव समीक्षाकेँ सुपाठ्य आ पत्रकारीय-सुलभ बनबैत अछि, मुदा दोसर दिस अकादमिक गहनताक अभाव उत्पन्न करैत अछि। समीक्षा विवरणात्मक आ मूल्याङ्कनात्मक तँ अछि, मुदा सैद्धान्तिक-विश्लेषणात्मक कम अछि।
(घ) परिप्रेक्ष्यक संकीर्णता — पुरुष-केन्द्रिकता आ वर्ण-केन्द्रिकता
पचीस निबन्धमे चौबीस पुरुष-रचनाकारकेँ समर्पित अछि; मात्र एक — हरिलता — स्त्री-रचनाकारकेँ। ओहूमे हरिलताक विवेचन मुख्यतः वैष्णव भक्ति धरि सीमित रहि जाइत अछि, ओकर सामाजिक-आलोचनात्मक सम्भावना — बाल-विवाह, वैधव्य आ स्त्री-शिक्षाक निषेधक विरुद्ध चोरा कऽ अक्षर सीखबाक संघर्ष — अनदेखा भऽ जाइत अछि। स्त्री अधिकतर पात्र अथवा प्रेरणाक रूपमे उपस्थित छथि, स्वतन्त्र लेखिका, सम्पादिका आ आलोचकक रूपमे कम। ओहिना विवेचित प्रायः समस्त रचनाकार एक विशिष्ट सामाजिक स्तरसँ अबैत छथि — मिथिलाक दलित, अतिपिछड़ा, अल्पसंख्यक आ लोक-परम्पराक अनाम रचयिता एहि समान्तर इतिहाससँ प्रायः अनुपस्थित रहि जाइत छथि।
(ङ) संकलनात्मक असंगति आ पाठ-प्रामाणिकताक प्रश्न
ई पचीस निबन्ध सन् 1972 सँ 1989 धरि विभिन्न पत्र-पत्रिकामे विभिन्न अवसरपर, विभिन्न पाठक-वर्गकेँ ध्यानमे राखि, स्वतन्त्र रूपेँ लिखल गेल छल। एकरा एकठाम राखि 'ग्रन्थ' बना देलासँ एक अन्तर्निहित असंगति उत्पन्न होइत अछि — कतहु व्यक्तित्व-प्रधान, कतहु कृति-प्रधान, कतहु विधा-प्रधान, कतहु प्रवृत्ति-प्रधान समीक्षा। कोनो एकसमान सैद्धान्तिक ढाँचा समस्त निबन्धकेँ नहि बान्हैत अछि, आ एक सुनियोजित ग्रन्थमे जे भूमिका, पद्धति-कथन आ उपसंहार अपेक्षित होइत अछि, से एहिमे अनुपस्थित अछि। संगहि, कृतिमे उद्धृत पद्यांश आ गद्यांशक पाठ-प्रामाणिकता सेहो सन्दिग्ध रहि जाइत अछि, किएक तँ स्वयं समीक्षक स्वीकार करैत छथि जे बहुतो रचना पत्र-पत्रिकामे छिड़िआएल आ अनुपलब्ध अछि, तेँ उद्धृत अंशक मूल पाठसँ तुलना-सत्यापन प्रायः असम्भव छल। "प्रथम" आ "मौलिक" सन पद लेल जे कठोर पाठालोचन, पाण्डुलिपि-अध्ययन आ प्रकाशन-इतिहास आवश्यक अछि, से एहि आरम्भिक कृतिमे अविकसित रहि जाइत अछि।
(च) समान्तर इतिहास-प्रतिमानक अपूर्ण सैद्धान्तिकीकरण
अन्ततः, सर्वाधिक मौलिक सीमा ई जे रमानन्द झा समान्तर इतिहासक अवधारणाकेँ व्यवहारमे तँ जीबैत छथि, मुदा ओकरा सिद्धान्तक रूपमे स्पष्टतः प्रतिपादित नहि करैत छथि। "दू कोटिक साहित्यकार"क सिद्धान्त एकर सर्वाधिक निकट थिक, मुदा ओ मुख्यधाराक कैननक — जयकान्त मिश्रक इतिहासक — विकल्प अथवा विरोध नहि, अपितु ओकर पूरक बनि रहि जाइत अछि। समीक्षक बेर-बेर जयकान्त मिश्रकेँ प्रामाणिक आधार मानि हुनकहि सूचनापर आश्रित रहैत छथि, जखन कि समान्तर इतिहासक असली दायित्व मुख्यधाराक कैननक आधार-मान्यताकेँ स्वयं प्रश्नाङ्कित करब थिक।
दोसर खण्ड : 'हिआओल' पर आएल अध्यायवार समीक्षासँ उठल सीमा
'हिआओल' (2012) पर आएल समीक्षा एहि विशेषांकक सभसँ दीर्घ आ पद्धतिगत रचना अछि, जाहिमे भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त आ विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि — तीनू कसौटीपर सत्रहो अध्यायकेँ अलग-अलग परखल गेल अछि। एतय सेहो प्रत्येक अध्यायक उपलब्धिक संग-संग ओकर सीमा गनाओल गेल अछि, जकर किछु मुख्य बिन्दु एतय राखल जाइत अछि।
मैथिली भाषाक अध्ययनसँ जुड़ल सीमा
उद्घाटक अध्याय मुख्यतः पश्चिमी विद्वान् — कोलब्रुक, बीम्स, हार्नले, ग्रियर्सन — क साक्ष्यपर ठाढ़ अछि; दीनबन्धु झासँ पूर्वक देशी वैयाकरण-चेतना प्रायः अस्पर्शित रहि गेल। फलतः जाहि औपनिवेशिक ज्ञान-मीमांसाक आलोचना निबन्ध करैत अछि, तकरहि स्रोत-सामग्रीपर ओ स्वयं आश्रित भऽ जाइत अछि — ई उत्तर-औपनिवेशिक विमर्शक चिर-परिचित आत्म-विरोध थिक। मानक मैथिलीक निर्धारणमे अन्य उपभाषा-रूपक सामाजिक अधिकारक प्रश्न — मानक कोन शक्ति-संरचनासँ बनैत अछि — अनुत्तरित रहि जाइत अछि।
रमानाथ झा आ किरणजी सम्बन्धी अध्यायक सीमा
संग्रहक सभसँ दीर्घ अध्याय (रमानाथ झा आ मिथिला भाषा) संरचनाक दृष्टिएँ शिथिल अछि — प्रत्यालोचना, जीवनी, भाषा-प्राचीनता, लिपि-विमर्श, मानकीकरण आ भाषा-प्रबन्धन, छह स्वतन्त्र निबन्धक सामग्री एकहि छत्रमे अटकाओल गेल अछि। सन्तुलनक घोषित प्रतिज्ञाक बादो स्वर कतोक स्थानपर आलोचनात्मक जीवन-विवेचनसँ अधिक प्रतिरक्षात्मक श्रद्धाञ्जलि बनि जाइत अछि — किरणजीक मत-खण्डनकेँ "आवेगात्मक" कहल गेल, मुदा विरोधी पक्ष लेल प्रयुक्त लेखकक अपन शब्दावली सेहो आवेगसँ सर्वथा मुक्त नहि। 'प्रत्यालोचक किरणजी' अध्यायमे सेहो विरोधाभास-प्रदर्शनमे उद्धरण-चयन एकतरफा अछि — किरणजीक जाहि स्थल सभमे आत्म-संशोधन वा मत-परिमार्जन भेल हो, से खोजल नहि गेल; चालीस वर्षक लेखनमे मत-भिन्नता विकास सेहो भऽ सकैत अछि, केवल विरोधाभास नहि।
'कन्यादान'-पाठ आ यात्री-भाषा सम्बन्धी अध्यायक सीमा
'उपेक्षितक आँखिसँ कन्यादान पढ़ल जाए' — जे नारीवादी पुनर्पाठक दृष्टिसँ संग्रहक सभसँ चुनौतीपूर्ण अध्याय मानल गेल — ओहूमे प्रश्न-शृंखलाक अनुत्तरता एक सीमा थिक। "एकर उत्तरदायी के?" बेर-बेर पूछल गेल, मुदा लेखक अपन निर्णय सप्रमाण नहि देलनि — उपेक्षिताक आँखिसँ पढ़बाक जे प्रतिज्ञा छल, से अन्ततः प्रश्नवाचक मुद्रामे स्थगित भऽ गेल। कन्यादानक हास्य-रसक पक्ष — जे कृतिक लोकप्रियताक मूलाधार थिक — क रस-शास्त्रीय परीक्षा नहि भेल, आ कतोक स्थानपर पुनर्पाठ अभियोग-पत्र बनि जाइत अछि। तहिना, यात्रीक भाषासम्बन्धी अध्यायमे चारू शैलीविज्ञानिक उपकरण पश्चिमी स्रोतसँ आनल गेल अछि, आ भारतीय काव्यशास्त्रसँ संगति-स्थापन संकेत-मात्र रहि गेल — कुन्तकक छह वक्रता-भेदसँ चयन-विचलनक व्यवस्थित मिलान भेल रहितैक तँ पूर्व-पश्चिम-सेतु पूर्ण बनितैक, से अवसर छूटि गेल।
अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह आ मनमोहन झा सम्बन्धी सीमा
लक्ष्मीपति सिंह पर लिखल अध्यायमे लेखक स्वयं स्वीकारैत छथि जे छिड़िआएल कवितामेसँ "किछु मात्रे झोड़ि" सकलाह — ई ईमानदार स्वीकारोक्ति प्रशंसनीय अछि, मुदा एकर परिणाम ई जे निष्कर्ष सभ सीमित नमूनापर ठाढ़ अछि आ सामान्यीकरणक वैधता संदिग्ध रहैत अछि। कतोक प्राकृतिक प्रतीककेँ प्रत्यक्ष राजनीतिक रूपक मानल गेल अछि, मुदा प्रतीकक ई अर्थ कविताक आन्तरिक संरचना आ अन्य कविताक साक्ष्यसँ सभठाम पुष्ट नहि। मनमोहन झा सम्बन्धी अध्याय संग्रहक लघुतम अध्याय थिक, आ एकर लघुते एकर मुख्य सीमा थिक — "अनालोचित पक्ष"क घोषणा भेल, मुदा विश्लेषण कथा-सारक स्तरपर रहि गेल; निधनक दसम दिन लिखल गेलाक कारण श्रद्धांजलिक आर्द्र स्वर आलोचनाक तटस्थतापर भारी अछि।
समग्रतामे, 'हिआओल'क समीक्षक स्वयं अन्तमे लिखैत छथि — "समानान्तर धाराक पूर्ण पद्धति ओतऽ पहुँचैत अछि जतऽ हाशियाक स्वर अपने बाजए — 'हिआओल'मे हाशिया लेल बाजल गेल अछि, हाशियाकेँ बजाओल कम गेल अछि।" ई एकटा वाक्य समस्त संग्रहक सीमाकेँ संक्षेपमे समेटि दैत अछि।
तेसर खण्ड : व्यक्तित्व-कृतित्व आ संस्थागत मूल्यांकनसँ जुड़ल सीमा
समर्पण आ परिणामक बीचक खाधि
प्रवीण कुमार झाक आलेख एहि विशेषांकक सभसँ बेबाक स्वर अछि। दीर्घ प्रशंसाक बाद "मुदा मुदा मुदा!" कहि ओ स्पष्ट लिखैत छथि — "एक होइत अछि योगदान आ दोसर होइत अछि वृहद योगदान।" चेतना समिति आ मैथिली लेखक संघ जेहन संस्थामे एतेक दिन धरि महत्त्वपूर्ण पदपर, व्यापक बौद्धिक क्षमताक संग रहितहुँ, मैथिलीकेँ संविधानक अष्टम अनुसूचीमे राखबाक संघर्षमे रमण जीक कोनो निर्णायक भूमिका स्पष्ट रूपेँ सोझाँ नहि अबैत अछि; चेतना समिति सन संगठनमे रहितहुँ मैथिली-शिक्षाक क्षेत्रमे सेहो कोनो एहन पैघ परिणाम सोझाँ नहि अबैत अछि, जकरा हुनकर नेतृत्वक प्रत्यक्ष परिणाम कहल जा सकय। लेखक स्पष्ट करैत छथि जे प्रश्न समर्पणपर नहि, अपितु ओहि समर्पणक परिणामपर अछि — केओ कतेक समय देलनि आ कतेक मेहनत कएलनि, ई एकटा पक्ष अछि, मुदा ओहि मेहनतसँ भाषा, शिक्षा, साहित्यकार आ समाजकेँ की ठोस उपलब्धि भेटल, ई दोसर आ बेसी महत्त्वपूर्ण पक्ष अछि। एहि आलेखमे चेतना समितिक संग रहैत पुस्तक-साहित्यक संवर्धन आ संस्थागत गतिविधिकेँ लऽ कऽ रमण जीक कार्यकालसँ संबंधित किछु विवाद-आरोप, आ सरकार-सत्ताप्रतिष्ठानक संग संघर्षक बदला कूटनीतिक संवादकेँ बेसी महत्त्व देबाक आलोचना सेहो चर्चामे रहलाक उल्लेख अछि — यद्यपि लेखक स्वयं ई सेहो जोड़ैत छथि जे एहि आरोपकेँ अंतिम सत्य मानबासँ पहिने स्वतंत्र जाँच आवश्यक अछि।
मौनताक व्यंग्य
डा. धनाकर ठाकुरक आलेख शैलीमे व्यंग्य-प्रधान अछि, मुदा ओकर भीतर एकटा तीक्ष्ण संकेत छिपल अछि। रमण जीकेँ चेतना समितिक "गुरु द्रोणाचार्य" कहि, लेखक मिथिला राज्यक प्रश्नपर चेतना समितिक — आ तेँ रमण जीक — मौनताकेँ द्रोणाचार्यक ओहि प्रसंगसँ तुलित करैत छथि जतय गुरु आँखि मुनने रहि गेला। "मिथिला राज्यक बात त चेतना समिति लेल सांढ़क लाल कपड़ा" — ई पंक्ति स्पष्ट कहैत अछि जे संस्था आ ओकर प्रमुख साहित्यिक स्तम्भ राजनीतिक रूपेँ संवेदनशील प्रश्नपर मौन रहबाकेँ प्राथमिकता दैत छथि।
निष्पक्षताक प्रश्न आ पंजीकरणक अपूर्णता
डॉ. कैलाश कुमार मिश्रक आलेख मे उद्धृत राजलीन ठाकुरक मन्तव्य स्पष्ट अछि — "रमण जी हुनक प्रिय लोक आ नीक समीक्षक दुनू, मुदा एकटा दोष जे ओ आन लोकक अपेक्षा सीमित समाजक कार्यकेँ बेसी उजागर करैत छथि, ताहि ठाम ओ निरपेक्ष नहि रहि पबैत छथि।" नबोनारायण मिश्रक संस्मरणपरक आलेख मे सेहो साहित्यकार-पंजीकरणक जे सूची देल गेल अछि, ओहिमे बाबूसाहेब चौधरी सन आन्दोलनकारी-नाटककारक नाम सम्मिलित नहि होएबाक ओर संकेत अछि, जे रमण जीक पंजीकरण-कार्यक चयनात्मकतापर एकटा मौन प्रश्नचिह्न थिक।
चारिम खण्ड : संपादकीय-शैलीगत सीमा आ पाठकीय असहमति
पद्धतिगत अनुशासनहीनताक स्वीकृति
कुमार राहुलक आलेख एहि दिशामे सभसँ प्रत्यक्ष अछि। "हम हुनकर सीमाकें तं रेखांकित कए सकैत छी" कहि ओ स्पष्ट लिखैत छथि जे रमण जी समालोचनामे विद्वान आलोचक कोनो बान्हल-छेकल नियमक पालन करैत नहि देखाइत छथि, बल्कि कोनो एके टा तत्त्वसँ प्रभावित भऽ अपन निर्णय दऽ दैत छथि। किछु ठाम टिपाउट जेकाँ रमण जी कोनो रचना अथवा रचनाकारपर कम शब्दमे काज चला लेल करैत छथि आ अपन बात बेसी लिखैत छथि। हडसनक ओ मत उद्धृत करैत — जे आलोचनाक काज मात्र कृतिक उचित-अनुचित देखब नहि, बल्कि निश्चित मानदंड स्थापित करब थिक — लेखक ई स्वीकार करैत छथि जे रमण जीक कतोक आलेख एहि सैद्धान्तिक कसौटीपर पूर्ण नहि उतरैत अछि।
सम्पादकीय कार्यक असमानता
प्रदीप बिहारीक आलेख एक ठाम स्पष्ट कहैत अछि जे 'घर-बाहर' पत्रिकाक सम्पादनमे ओ कौशल नहि झलकैत अछि, जे रमण जीक विवेचनात्मक-अनुसंधानात्मक पोथीमे देखाइत अछि। भूमिका आ संपादकीय लेखनमे "कोनो लेखककेँ एहि दुनूक लेखनमे कतेक बेराएल होमक चाही, से रमण जी बेसी ठाम देखाइत छथि, सभ ठाम नहि। किछु ठाम एकभगाह भेलाह अछि।" एहि संग एहू बातक उल्लेख अछि जे हिनक साहित्यिक सेवा लेल हिनका प्रशंसा जतेक होइत छनि, आलोचना आ खिधांस सेहो होइत छनि, मुदा एहिपर ओ कतेक गंभीरतापूर्वक विचार करैत छथि, से हिनका चेहराक भावसँ बुझल नहि जा सकैछ।
तथ्यगत आ व्याख्यागत असहमति
कीर्तिनाथ झाक 'विवर्त'-समीक्षा मे एक ठाम स्पष्ट असहमति दर्ज अछि — जखन रमण जी मैथिली पत्र-पत्रिकाकेँ स्वाधीनता-आन्दोलनक प्रति "पूर्ण संवेदनशील आ उत्तरदायित्वपूर्ण" कहैत छथि, तखन समीक्षक टिप्पणी करैत छथि — "मुदा, ई विचार एहि विषयपर सर्वसम्मत थिक वा नहि, कहब कठिन।" अजित कुमार झाक आलेख मे 'कन्यादान' पर रमण जीक पुनर्पाठसँ आरो स्पष्ट असहमति व्यक्त अछि — समीक्षकक तर्क एकाङ्गी बुझबैत, आ रमण जी द्वारा हरिमोहन झाक पाठकक जे तीन श्रेणी कएल गेल, ओहिमे एक चतुर्थ वर्गक (जे रमण जीक अपन साहित्यकेँ मिथिला-संस्कृतिपर आघात बुझैत छथि) चर्चा नहि भेल — "रमण जी अपन आलेखमे चारिम श्रेणीक चर्चा नहि केलनि अछि।" हितनाथ झाक आलेख मे सेहो एक स्पष्ट असहमति अछि — रमण जी अपन बीज-भाषण संग्रहक प्रस्तावनामे साहित्यिक राजनीतिपर जे चोट कएने छथि, तकरा लेल समीक्षक लिखैत छथि — "ई मंच छल आ ई जाहि तरहक पोथी अछि, ओहि लेल हमरा जनैत उपयुक्त नहि... प्रहारसँ पहिने सुधारक सेहो गुंजाइस होयबाक चाही।"
आशीष अनचिन्हारक दृष्टिमे रमानन्द झा ‘रमण’ केर आलोचनात्मक-इतिहासलेखनक कमीसँ
आशीष अनचिन्हारक आलेखक मूल आग्रह ई अछि जे साहित्यक इतिहास लिखब केवल पोथी जमा करब, नाम गिनब वा बादमे प्रकाशित पुस्तककेँ आरम्भ-बिन्दु मानि लेब नहि थिक। हुनका अनुसार इतिहासकारक पहिल शर्त “इतिहासबोध” अछि—अर्थात् घटना, प्रकाशन, प्रभाव, पूर्ववर्ती प्रयोग, स्रोत आ श्रेयक क्रमकेँ निष्पक्ष ढङ्गसँ बुझब। एहि कसौटीपर ओ खास कऽ रमानन्द झा ‘रमण’ द्वारा धर्मेन्द्र विह्वलक पोथी “व्योमक ओहिपार” लेल लिखल भूमिकामे कतेको कमी देखैत छथि।
1. इतिहासबोधक अभाव
अनचिन्हारक सभसँ पैघ आपत्ति ई अछि जे रमण जी एहि प्रसंगमे “इतिहासबोध” बिसरि गेल छथि। अनचिन्हारक मते इतिहासकार वा भूमिका-लेखककेँ ई देखबाक चाही जे कोनो विधाक पहिल प्रकाशन, प्रारम्भिक प्रयोग, नियम-विवेचन आ बादक पुस्तकाकार विस्तार—ई सभ अलग-अलग चरण अछि। बादमे आयल एकटा पोथीकेँ आधार बनाकऽ पूर्वक चरणकेँ ओझरायल इतिहासक क्रमकेँ बिगाड़ैत अछि।
2. विधाक आरम्भ तय करबाक मापदण्डमे असंगति
अनचिन्हार स्पष्ट करैत छथि जे कोनो साहित्यिक विधाक आरम्भ ओहि समयसँ मानल जेबाक चाही जखन ओकर पहिल प्रमाणित प्रकाशन भेल—पत्रिकामे हो वा पुस्तक रूपमे। हुनकर आपत्ति ई अछि जे जँ एक लेखक लेल “पहिल पुस्तक” मानदण्ड बनाओल जाए आ आन लेखक लेल “पहिल प्रकाशन”, तँ इतिहासलेखनमे दूहरा मापदण्ड आबि जाइत अछि। रमण जीक भूमिका एहि भेदकेँ पर्याप्त स्पष्ट नहि करैत अछि—एहने अनचिन्हारक आरोप अछि।
3. पूर्ववर्ती प्रकाशन आ प्रयोगक उपेक्षा
अनचिन्हार 2009 मे प्रकाशित गजेन्द्र ठाकुरक “कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक” पोथीक “मैथिली हाइकू हैकू क्षणिका” आलेखक उल्लेख करैत छथि, जतय टंका, शेनर्यू, हैबून, हैगा, वाका आदि जापानी विधापर चर्चा भेल बताओल अछि। ओ विदेहक फेसबुक समूह पर लगभग 2012 धरि एहि विधासभक प्रशिक्षण आ अनेक रचनाकारक भागीदारीक सेहो उल्लेख करैत छथि। अनचिन्हारक दृष्टिमे रमण जीक भूमिकामे एहि पूर्ववर्ती सार्वजनिक इतिहासक समुचित उल्लेख नहि भेनाइ एक महत्त्वपूर्ण कमी अछि।
4. स्रोत-सन्दर्भक अभाव
अनचिन्हारक आरोप अछि जे रमण जी टंका आदि विधाक नियम बतबैत छथि, मुदा ओहि नियमक मैथिलीमे पूर्व प्रस्तुति वा उपलब्ध स्रोतक संदर्भ नहि दैत छथि। साहित्येतिहास अथवा आलोचनात्मक भूमिकामे तथ्य मात्र कहब पर्याप्त नहि; ओकर स्रोत, पूर्वप्रयोग आ प्रमाण सेहो देब आवश्यक होइत अछि। अनचिन्हार एहि संदर्भहीनताकेँ विद्वतापूर्ण लेखनक कमजोरी मानैत छथि।
5. श्रेय-निर्धारणमे गड़बड़ी
अनचिन्हारक पठन अनुसार “व्योमक ओहिपार” केर भूमिका एहन प्रभाव दैत अछि मानो धर्मेन्द्र विह्वल टंका, शेनर्यू, हैबून, हैगा, वाका आदि विधाकेँ मैथिलीमे अनने होथि। अनचिन्हार एहि प्रभावकेँ ऐतिहासिक रूपेँ भ्रामक मानैत छथि, कारण हुनका अनुसार ई विधासभक चर्चा, नियम आ रचना-प्रयोग पहिने भऽ चुकल छल। तैँ भूमिका-लेखनमे “के पहिने परिचय देलनि”, “के पहिल एकछाहा संग्रह देलनि”, “के विधाकेँ लोकप्रिय बनौलनि”—ई अलग-अलग श्रेय स्पष्ट करब आवश्यक छल।
6. “पहिल पुस्तक” आ “विधाक पहिल उपस्थिति”क भेद अस्पष्ट
आलेखक परिशिष्टमे देल फेसबुक संवादकेँ अनचिन्हार अपन तर्कक समर्थनमे प्रस्तुत करैत छथि। ओहि संवादक आशय ई अछि जे धर्मेन्द्र विह्वल अपन पोथीकेँ एहि विधाक पहिल पुस्तकाकार/एकछाहा कृति कहबाक दाबी करैत छथि, मुदा विधा मैथिलीमे हुनकासँ पहिने नहि छल—एहन दाबी नहि करैत छथि। अनचिन्हारक मते रमण जीक भूमिका एहि अत्यन्त जरूरी भेदकेँ स्पष्ट रूपेँ स्थापित नहि कऽ सकल।
7. व्यक्तिगत वा वैचारिक असहमतिक प्रभावक आरोप
अनचिन्हारक आलोचना केवल तथ्यात्मक भूल धरि सीमित नहि अछि। ओ आरोप लगबैत छथि जे गजेन्द्र ठाकुरसँ वैचारिक असहमति वा “तामस”क कारण नाम आ योगदानकेँ नजरअन्दाज कएल गेल। ई एक गम्भीर आरोप अछि; अनचिन्हारक दृष्टिमे इतिहासकारक काज व्यक्तिगत पसन्द-अनपसन्दसँ ऊपर उठि श्रेयक निष्पक्ष निर्धारण करब थिक।
8. विरोधी प्रमाणक सामना नहि करब
अनचिन्हार चुनौती दैत छथि जे जँ गजेन्द्र ठाकुरसँ पहिने मैथिलीमे टंका, शेनर्यू, हैबून, हैगा, वाका आदि उपलब्ध छल आ ओकर नियमपर चर्चा भेल छल, तँ ओकर प्रमाण सामने आनल जाए। अर्थात् केवल मौन वा नाम-लोप पर्याप्त नहि; इतिहासलेखनमे वैकल्पिक दावाक दस्तावेजी प्रमाण देबाक चाही। अनचिन्हारक अनुसार रमण जीक भूमिकामे एहि स्तरक प्रमाण-विवेचन अनुपस्थित अछि।
9. भूमिका-लेखकक स्रोत-जाँचक जिम्मेदारी पूरा नहि भेनाइ
कोनो पोथीक भूमिका केवल प्रशस्ति नहि, खास कऽ जखन ओ विधाक इतिहास आ नियमक दावा करैत हो। अनचिन्हारक दृष्टिमे रमण जीकेँ पूर्व प्रकाशन, कालक्रम, रचनाकारक सूची, सार्वजनिक पोस्ट, पुस्तक आ उपलब्ध प्रमाण सभक जाँच कऽ कतेक सावधानीसँ निष्कर्ष देबाक चाही छल। एहि स्रोत-जाँचक अभाव भूमिकाकेँ आलोचनात्मक दस्तावेजक अपेक्षा कमजोर बनबैत अछि।
10. इतिहासशुद्धिक आवश्यकता
अनचिन्हार अन्ततः सुधारक रास्ता सेहो सुझबैत छथि: जँ पूर्वक तथ्य गलत अछि तँ नब प्रमाण आनू; जँ पूर्ववर्ती योगदान अछि तँ ओकर नाम आ श्रेय पुनर्स्थापित करू। तैँ हुनकर दृष्टिमे रमण जीक उक्त लेखनक मूल कमी केवल “भूल” नहि, बल्कि सुधार योग्य ऐतिहासिक असंतुलन अछि।
निष्कर्ष: आशीष अनचिन्हारक आलोचनाक केन्द्र रमानन्द झा ‘रमण’ केर भाषा, शैली वा समग्र साहित्यिक कृतित्व नहि, बल्कि एहि विशिष्ट भूमिकामे इतिहासबोध, स्रोत-सन्दर्भ, कालक्रम, श्रेय-निर्धारण आ निष्पक्षताक प्रश्न अछि। हुनकर आरोपक सार ई अछि जे मैथिलीमे जापानी काव्य-विधासभक पूर्व इतिहासकेँ समुचित स्थान नहि देल गेल आ “पहिल पुस्तक” तथा “विधाक पहिल आगमन”क अन्तर धुँधला भेल। एही कारण ओ एहि लेखनकेँ इतिहासलेखनक दृष्टिसँ अपूर्ण आ पक्षपात-प्रभावित मानैत छथि।
उपसंहार
एहि सभटा सीमाकेँ एकठाम राखला उत्तर एकटा साझा सूत्र स्पष्ट होइत अछि। रमण जीक कार्य मात्रात्मक रूपेँ विपुल, अभिलेखीय दृष्टिसँ अमूल्य, आ मातृभाषा-प्रेमसँ प्रेरित अछि — एहिपर विशेषांकक कोनो योगदानकर्ता प्रश्न नहि उठबैत छथि। मुदा जखन ओहि कार्यकेँ सैद्धान्तिक अनुशासन, स्रोत-प्रामाणिकता, पूर्ण निष्पक्षता आ संस्थागत परिणामक कठोर कसौटीपर कसल जाइत अछि, तखन ओ पर्याप्त गुंजाइश छोड़ि दैत अछि — पाठ बिना समीक्षाक जोखिम, मूल्य-मानदण्डक अस्थिरता, आत्मीयता-जनित प्रशंसाक अतिरेक, हाशियाक अल्प उपस्थिति, संस्थागत मौनता, आ चयनात्मक निष्पक्षता — ई सभटा बिन्दु आगामी अनुसन्धानक निमन्त्रण थिक, दण्ड नहि। 'हिआओल'क समीक्षक स्वयं जे कहलनि, से एहि समस्त विशेषांकपर सेहो लागू होइत अछि — "एकर श्रेष्ठता ओतए अछि जतए लेखक अभिलेख खोजैत छथि, प्रचलित भूल सुधारैत छथि, विस्मृत लेखककेँ पुनः उपस्थित करैत छथि... एकर सीमा ओतए अछि जतए अनुमान प्रमाणक स्थान लैत अछि, जीवनी कृतिक विश्लेषणपर भारी पड़ैत अछि।" रमण जीक अपने शब्दमे कही तँ — "वादे वादे जायते तत्त्वबोधः" — एहि विवाद आ प्रतिवादसँ होइत तत्त्व-बोधे एहि विशेषांकक असली उपलब्धि थिक।
रमानन्द झा 'रमण' : कृतित्वक सीमा-रेखा पर एक संपादकीय दृष्टि
रमण जीक मैथिली साहित्यमे जे स्थान अछि, से एहि सतरहो रचनासँ निर्विवाद बूझि पड़ैत अछि — मुदा एहि विशेषांकक सार्थकता तखनहि पूर्ण होएत जखन प्रशंसाक संग-संग ओ सीमा सेहो चिह्नित होअए जे स्वयं योगदानकर्ता सभ (आ रमण जीक अपन आलोचना-पद्धति) रेखांकित करैत अछि।
१. आलोचना-पद्धतिक सबसँ मौलिक सीमा — पाठ बिना समीक्षा
'अखियासल' पर आएल विस्तृत समीक्षामे ई तथ्य साफ उजागर भेल अछि जे रमण जी प्रायः जाहि रचनाकेँ आलोचित करैत छथि, ओकर मूल पाठ हुनका लग उपलब्धे नहि रहैत छनि — 'चन्द्रप्रभा', त्रिलोचन झा, यदुवर, बिसरल जनार्दन झा — सभठाम समीक्षक स्वयं 'अनुपलब्धता' स्वीकारैत छथि। जखन मूल कृतिए समीक्षककेँ भेटले नहि, तँ ओकर सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्याङ्कन कोन आधार पर सम्भव, ई प्रश्न अनुत्तरित रहि जाइत अछि। बहुतो ठाम समीक्षा जयकान्त मिश्रक इतिहास वा अन्य द्वितीयक स्रोत पर आश्रित भऽ जाइत अछि।
२. मूल्य-मानदण्डक अस्थिरता
एहि दुनू पोथीक समीक्षामे बेर-बेर देखाओल गेल अछि जे रमण जी एक निबन्धमे जाहि गुणकेँ सर्वोच्च मानैत छथि, दोसरमे ओकरे विपरीतकेँ प्रशंसित करैत छथि — जेना गंगानन्द सिंह, चन्द्रग्रहण आदिमे समसामयिक यथार्थ-सम्पृक्तिकेँ गुण मानब, मुदा व्यासक कथाकेँ ठीक ओही कारणें प्रशंसा करब जे ओ समसामयिक यथार्थसँ अप्रभावित रहल। एहि तरहक आत्मविरोध ई देखबैत अछि जे कोनो एकटा घोषित सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता नहि अछि — समीक्षा कखनहु प्रभाववादी, कखनहु समाजशास्त्रीय, कखनहु जीवनीमूलक भऽ जाइत अछि।
३. आत्मीयता आ आलोचनात्मक दूरीक अभाव
लक्ष्मीपति सिंह, मोहन, राजेश्वर झा सन अध्यायमे व्यक्तिगत स्नेह समीक्षाकेँ संस्मरणात्मक श्रद्धांजलिक रूप दऽ दैत अछि, जाहिसँ वस्तुनिष्ठता प्रभावित होइत अछि। एकर ठीक उलट हरिमोहन झा पर जे आलोचनात्मक साहस देखाओल गेल, से समस्त संग्रहमे समान रूपेँ नहि अछि।
४. सैद्धान्तिक शब्दावलीक अनुपस्थिति
रस, ध्वनि, व्यञ्जना आदि भारतीय काव्यशास्त्रीय तत्त्व अन्तर्निहित रूपेँ तँ अछि, मुदा आनन्दवर्धन, कुन्तक, क्षेमेन्द्र आदिक व्यवस्थित सैद्धान्तिक प्रयोग नहि भेटैत अछि। पाश्चात्य सिद्धान्तक सेहो सुविचारित प्रयोग नहि। ई समीक्षाकेँ सुपाठ्य तँ बनबैत अछि, मुदा अकादमिक गहनताक अभाव उत्पन्न करैत अछि।
५. परिप्रेक्ष्यक संकीर्णता — स्त्री आ हाशियाक अल्प उपस्थिति
'अखियासल'क पचीसमे चौबीस पुरुष-रचनाकार, मात्र एक स्त्री (हरिलता) — ओहूमे विवेचन वैष्णव भक्ति धरि सीमित। मिथिलाक दलित, अतिपिछड़ा आ मौखिक-परम्पराक अनाम रचयिता एहि समान्तर इतिहाससँ प्रायः अनुपस्थित रहि जाइत छथि। कुमार राहुलक आलेख मे सेहो ई कहल गेल जे रमण जी कोनो बान्हल सैद्धान्तिक नियमक पालन करैत नहि देखाइत छथि, बल्कि एकहि तत्त्वसँ प्रभावित भऽ अपन निर्णय दऽ दैत छथि, आ किछु ठाम टिपाउट जेकाँ कम शब्दमे रचनाकारक काज चला लैत छथि आ अपन बात बेसी लीखि दैत छथि।
६. संकलनात्मक असंगति
पचीसो निबन्ध विभिन्न कालमे, विभिन्न पत्रिकाक लेल स्वतंत्र रूपेँ लिखल गेल छल — एकठाम राखि 'ग्रन्थ' बना देलासँ कोनो एकसमान सैद्धान्तिक ढाँचा नहि बचल। भूमिका, पद्धति-कथन आ उपसंहारक अभाव एहि जोड़ा-जाड़ी प्रकृतिकेँ उघारि दैत अछि — ई बात 'हिआओल' पर सेहो लागू होइत अछि, जतय एक-एक अध्यायक विस्तार, पद्धति आ गहराइ असमान अछि।
७. व्यक्तिगत समर्पण आ संस्थागत परिणामक बीचक खाधि
प्रवीण कुमार झाक आलेख एहि विशेषांकक सभसँ बेबाक स्वर अछि। "मुदा मुदा मुदा!" कहि ओ स्पष्ट लिखैत छथि जे चेतना समिति आ मैथिली लेखक संघ जेहन संस्थामे एतेक दिन धरि महत्त्वपूर्ण पदपर रहितहुँ मैथिलीकेँ संविधानक अष्टम अनुसूचीमे राखबाक संघर्षमे, मैथिली-शिक्षाक क्षेत्रमे रमण जीक कोनो निर्णायक, ठोस परिणाम स्पष्ट रूपेँ सोझाँ नहि अबैत अछि — समर्पण पर प्रश्न नहि, परिणाम पर प्रश्न। एहि आलेखमे चेतना समितिक कार्यकालसँ जुड़ल किछु विवाद-आरोप आ सत्ता-प्रतिष्ठानक संग कूटनीतिक सम्बन्धकेँ प्राथमिकता देबाक आलोचना सेहो चर्चामे रहलाक उल्लेख अछि। डा. धनाकर ठाकुरक व्यंग्य-प्रधान आलेख एहि दिशाकेँ आरो तीक्ष्ण करैत मिथिला राज्यक प्रश्न पर रमण जी आ चेतना समितिक मौनताकेँ द्रोणाचार्यक 'आँखि मुनने रहब' सँ तुलना करैत अछि।
८. निष्पक्षताक प्रश्न
डॉ. कैलाश कुमार मिश्रक आलेख मे उद्धृत राजलीन ठाकुरक मन्तव्य स्पष्ट अछि — "रमण जी हुनक प्रिय लोक आ नीक समीक्षक दुनू, मुदा एकटा दोष जे ओ आन लोकक अपेक्षा सीमित समाजक कार्यकेँ बेसी उजागर करैत छथि, ताहि ठाम ओ निरपेक्ष नहि रहि पबैत छथि।" नबोनारायण मिश्रक आलेख मे सेहो साहित्यकार-पंजीकरणक सूचीसँ बाबूसाहेब चौधरी सन आन्दोलनकारी-नाटककारक अनुपस्थितिक ओर संकेत अछि।
९. संपादकीय काजक असमानता
प्रदीप बिहारीक आलेख एक ठाम स्पष्ट कहैत अछि जे 'घर-बाहर' पत्रिकाक सम्पादनमे ओ कौशल नहि झलकैत जे विवेचनात्मक-अनुसंधानात्मक पोथीमे देखाइत अछि — भूमिका आ संपादकीय लेखनमे जतेक वैचारिक त्वरा चाही, से सभठाम समान नहि। कीर्तिनाथ झाक 'विवर्त'-समीक्षा मे सेहो एक ठाम असहमति दर्ज अछि — "ई विचार सर्वसम्मत थिक वा नहि, कहब कठिन" — जखन रमण जी मैथिली पत्र-पत्रिकाकेँ स्वाधीनता-आन्दोलनक प्रति "पूर्ण संवेदनशील आ उत्तरदायित्वपूर्ण" कहैत छथि।
१०. पाठकीय असहमति
अजित कुमार झाक आलेख मे 'कन्यादान' पर रमण जीक पुनर्पाठसँ स्पष्ट असहमति व्यक्त अछि — समीक्षकक तर्क एकाङ्गी बुझबैत, आ रमण जी द्वारा हरिमोहन झाक पाठकक जे तीन श्रेणी कएल गेल, ओहिमे एक चतुर्थ वर्गक (जे रमण जीक अपन साहित्यकेँ मिथिला-संस्कृति पर आघात बुझैत छथि) चर्चा नहि भेल।
संगति — ई सभटा सीमा एक साझा सूत्रसँ बान्हल अछि : रमण जीक कार्य मात्रात्मक रूपेँ विपुल, अभिलेखीय दृष्टिसँ अमूल्य, आ मातृभाषा-प्रेमसँ प्रेरित अछि, मुदा सैद्धान्तिक अनुशासन, स्रोत-प्रामाणिकता, पूर्ण निष्पक्षता आ संस्थागत परिणामक स्तर पर ओ आगू बढ़बाक गुंजाइश छोड़ि दैत अछि — जकरा स्वयं हुनकहि शब्दमे कही तँ "वादे वादे जायते तत्त्वबोधः"।
१.२. सम्पादकीय (ठेठी-अंगिका मैथिली)
सम्पादकीय- गजेन्द्र ठाकुर
रमानन्द झा 'रमण' : कृतित्व आरो ओकर सीमा-रेखा — एगो संपादकीय पुनरवलोकन (ठेठी-अंगिका मैथिली)
जे आदमी एहि ग्रन्थ के गुन बुझै लायक नै छै, ओकर प्रशंसा सें हम खुश नै होब। अन्हरा सिनी के झुंड जों कोय चित्र के प्रशंसा करै, तें चित्रकार के गौरव कइसे बढ़तै? लोग एहि ग्रन्थ के दोष देखाबै भर आलोचना करै। ज्ञानी लोग अनजान में कैलों अपन तथ्यगत भूल दिसाय ध्यान खींचलों जाए सें निस्चय खुश होय छै। — [आत्मतत्त्वविवेक ग्रन्थ के आलोचना सम्बन्धी अन्तिम वचन — उदयनाचार्य]
एहि विशेषांक लेली आएल सतरहो रचना — परिचय वाला आलेख सें लैकें दू गो लम्बा पुस्तक-समीक्षा ('अखियासल' आरो 'हिआओल' पर), साक्षात्कार, संस्मरण आरो मूल्यांकन वाला निबन्ध तक — एक ठाम राखी कें पढ़ला के बाद एगो बात साफ होय छै : रमण जी के मैथिली साहित्य में जे स्थान छै, से बिन-विवाद छै; मतरकि एहि विशेषांक के सार्थकता तबेंही पूरा होतै जबें प्रशंसा के संग-संग ऊ सीमा भी चिन्हलों जाय, जे योगदानकर्ता सिनी अपने, आरो रमण जी के अपन आलोचना-पद्धति के भीतरे सें, बार-बार रेखांकित करैछै। नीचे वहै सब्भे सीमा के चार खण्ड में एक ठाम रखलों जाय छै — पहिलों, समालोचना-पद्धति के सीमा (मुख्य रूप सें 'अखियासल' पर आएल समीक्षा सें); दोसरका, 'हिआओल' पर आएल अध्यायवार समीक्षा सें; तेसरका, व्यक्तित्व-कृतित्व आरो संस्थागत मूल्यांकन सें जुड़लों सीमा; आरो चौथका, संपादकीय-शैली आरो पाठक के असहमति सें जुड़लों बिन्दु।
पहिलों खण्ड : 'अखियासल' आरो समालोचना-पद्धति के मौलिक सीमा
'अखियासल' (1995) पर आएल विस्तृत समीक्षा (रचना ४) एहि सतरहो में सबसें बेसी सुघरल ढाँचा वाला आरो कड़ा समीक्षा छै। एहि समीक्षा के पछिलका हिस्सा पूरा तौर पर 'अखियासल' के सीमा, कमजोरी आरो पद्धति-संकट के समर्पित छै, आरो ओहिजा आठ गो "सीमा" सिलसिलेवार गिनलों गेलै छै।
(क) पाठ बिना समीक्षा
सबसें गंभीर सीमा ई छै कि लगभग हरेक सुरुआती निबन्ध में समीक्षक अपने मूल रचना के 'अनुपलब्धता' मानी लैछै। 'चन्द्रप्रभा' के परसंग में अपने लिखलों गेलै छै — "चन्द्रप्रभा के अध्ययन-विश्लेषण बढ़िया ढंग सें नै होय सकलै, एकर मुख्य कारण छै अनुपलब्धता"; त्रिलोचन झा के परसंग में — "बहुत कम सामग्री उपलब्ध छै"; यदुवर के परसंग में — "यदुवर के परसंग में अखनी तक बहुत कम सोध भेलै छै"; बिसरल जनार्दन झा के परसंग में — "पत्र-पत्रिका में जे रचना छपलों होतै, अब सबके लेली सहज उपलब्ध नै छै।" एहिजा एगो गहरा विरोधाभास उभरैछै — जों मूल कृति समीक्षक के अपने नै मिललों छेलै, तें ओकर सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्यांकन कोन आधार पर सम्भव भेलै? बहुतो ठाम समीक्षा असल में दोसरका स्रोत पर — जयकान्त मिश्र के मैथिली साहित्य-इतिहास, करुणाकान्त झा के सोध-प्रबन्ध, दोसरका समीक्षक के उद्धरण पर — टिक जाय छै। पाठ-केन्द्रित समीक्षा के नजर सें ई एगो मौलिक कमजोरी छै — पाठ बिना समीक्षा।
(ख) मूल्य-मानदण्ड के अस्थिरता आरो भीतरी अन्तर्विरोध
रमानन्द झा एगो निबन्ध में जे गुन के सबसें ऊँचा मानैछै, दोसरका में ओकरे उलटा बात के प्रशंसा करैछै। गंगानन्द सिंह, 'चन्द्रग्रहण' के नारी-पात्र, ललित आरो धीरेन्द्र के विवेचन में समसामयिक यथार्थ-बोध, परिवेश सें जुड़ाव आरो युग-जीवन के झलक के सबसें ऊँचा मूल्य मानलों गेलै छै; मतरकि व्यास के कथा के ठीक एहि कारणें प्रशंसित कैलों गेलै कि ऊ समसामयिक जिनगी सें खास प्रभावित नै होय छै आरो बदललों युग-जीवन के बिगाड़ सें अप्रभावित रहैछै। ई सोझा आत्मविरोध छै — यथार्थ सें जुड़ाव कभी गुन, कभी ओकर अभाव गुन। ओइसने, हरिमोहन झा के हास्य के "विचार के उन्मेष नै करब" के कारणें कम मूल्य देलों गेलै, मतरकि मधुप के गीत के "तुरते हृदय-प्रभाव" आरो आनन्द के कारणें ऊँचा मूल्य देलों गेलै — जबकि गीत भी अकसर वैचारिक मन्थन पर नै, बल्कि भाव के तुरत असर पर टिकैछै। 'कोबर-गीत' जइसन अपने-सें-विरोधी, प्रयोजन सें प्रेरित रचना के "व्यक्ति सें बड़का समाज" के तर्क सें ठीक ठहरायलों गेलै, मतरकि क्षेमेन्द्र के औचित्य-विचार के नजर सें आत्मा के प्रतिकूल रचना भाव-औचित्य के मूल भंग छै — समीक्षक एहिजा सैद्धान्तिक साफगोई नै दै पाबैछै। ई अस्थिरता एहि कारणें छै कि रमानन्द झा कोय एगो घोषित सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता नै अपनाबैछै — ऊ परसंग के हिसाब सें कभी प्रभाववादी, कभी समाजशास्त्रीय, कभी जीवनीमूलक, कभी रूपवादी नजर अपनाबैछै। ई पद्धति वाला सार-संग्रहवाद एक ओर लचक दैछै, तें दोसर ओर मूल्यांकन के अनुमान सें बाहर आरो बेमेल बना दैछै।
(ग) सैद्धान्तिक सबदावली के अनुपस्थिति
हालाँकि रमानन्द झा के समीक्षा में रस, ध्वनि, व्यञ्जना, औचित्य आदि भारतीय काव्यशास्त्र के धारणा भीतर छिपलों रूप सें मौजूद छै, तइयो ऊ एहि शास्त्रीय प्रतिमान के कहीं साफ सैद्धान्तिक औजार के रूप में परयोग नै करैछै। "व्यञ्जित", "सम्प्रेषण", "भावाश्रित" जइसन सबद तें आबैछै, मतरकि आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, कुन्तक, क्षेमेन्द्र, भट्टनायक आदि आचार्य के नाम आरो हुनकर सिद्धान्त के सिलसिलेवार परयोग नै मिलैछै। पाश्चात्य सिद्धान्त के भी कहीं नामोल्लेख चाहे सोची-विचारी के परयोग नै मिलैछै। एहिसें एगो दुहरा हालत उभरैछै — एक ओर ई सैद्धान्तिक हलकापन समीक्षा के सहज पढ़ै लायक आरो पत्रकारीय-सुलभ बनाबैछै, मतरकि दोसर ओर अकादमिक गहराई के कमी पैदा करैछै। समीक्षा वर्णन वाला आरो मूल्यांकन वाला तें छै, मतरकि सैद्धान्तिक-विश्लेषण वाला कम छै।
(घ) नजरिया के संकीर्णता — पुरुष-केन्द्रिकता आरो वर्ण-केन्द्रिकता
पचीस निबन्ध में चौबीस पुरुष-रचनाकार पर छै; खाली एगो — हरिलता — स्त्री-रचनाकार पर। ओकरा में भी हरिलता के विवेचन मुख्य रूप सें वैष्णव भक्ति तक सीमित रही जाय छै, ओकर समाजी-आलोचनात्मक सम्भावना — बाल-विवाह, विधवापन आरो स्त्री-शिक्षा के मनाही के खिलाफ चोरी-छिपे अक्षर सीखै के संघर्ष — अनदेखा रही जाय छै। स्त्री अकसर पात्र चाहे प्रेरणा के रूप में मौजूद छै, अलग लेखिका, सम्पादिका आरो आलोचक के रूप में कम। ओइसने विवेचित लगभग सब रचनाकार एगो खास सामाजिक स्तर सें आबैछै — मिथिला के दलित, अति-पिछड़ा, अल्पसंख्यक आरो लोक-परम्परा के बेनाम रचनहार एहि समान्तर इतिहास सें अकसर गायब रही जाय छै।
(ङ) संकलन के असंगति आरो पाठ-परमाणिकता के सवाल
ई पचीस निबन्ध सन् 1972 सें 1989 तक अलग-अलग पत्र-पत्रिका में, अलग-अलग मौका पर, अलग-अलग पाठक-वर्ग के ध्यान में राखी कें, स्वतंत्र रूप सें लिखलों गेलों छेलै। एकरा एक ठाम राखी कें 'ग्रन्थ' बना देला सें एगो भीतरी असंगति उभरैछै — कहीं व्यक्तित्व-प्रधान, कहीं कृति-प्रधान, कहीं विधा-प्रधान, कहीं प्रवृत्ति-प्रधान समीक्षा। कोय एके-जइसन सैद्धान्तिक ढाँचा सब निबन्ध के नै बान्हैछै, आरो एगो सिलसिलेवार बनलों ग्रन्थ में जे भूमिका, पद्धति-कथन आरो उपसंहार चाही, से एकरा में नै छै। संगही, कृति में उद्धृत पद्यांश आरो गद्यांश के पाठ-परमाणिकता भी संदेह वाला बनी जाय छै, कैलेकि समीक्षक अपने मानैछै कि बहुतो रचना पत्र-पत्रिका में छितराइलों आरो अनुपलब्ध छै; तें उद्धृत अंस के मूल पाठ सें तुलना-जाँच अकसर असम्भव छेलै। "प्रथम" आरो "मौलिक" जइसन पद लेली जे कड़ा पाठालोचन, पाण्डुलिपि-अध्ययन आरो प्रकाशन-इतिहास जरूरी छै, से एहि सुरुआती कृति में अधूरा रही जाय छै।
(च) समान्तर इतिहास-प्रतिमान के अधूरा सैद्धान्तिकीकरण
आखिर में, सबसें मौलिक सीमा ई छै कि रमानन्द झा समान्तर इतिहास के धारणा के व्यवहार में तें जीबैछै, मतरकि ओकरा सिद्धान्त के रूप में साफ-साफ नै रखैछै। "दू कोटि के साहित्यकार" के सिद्धान्त एकर सबसें नजदीक छै, मतरकि ऊ मुख्यधारा के कैनन — जयकान्त मिश्र के इतिहास — के विकल्प चाहे विरोध नै, बल्कि ओकर पूरक बनी कें रही जाय छै। समीक्षक बार-बार जयकान्त मिश्र के परमाणिक आधार मानी कें हुनकरे सूचना पर टिकैछै, जबकि समान्तर इतिहास के असली जिम्मेवारी मुख्यधारा के कैनन के आधार-मान्यता के अपने सवाल के घेरे में लाना छै।
दोसरका खण्ड : 'हिआओल' पर आएल अध्यायवार समीक्षा सें उठलों सीमा
'हिआओल' (2012) पर आएल समीक्षा (रचना १६) एहि विशेषांक के सबसें लम्बा आरो पद्धति वाला रचना छै, जेमें भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त आरो विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि — तीनू कसौटी पर सतरहो अध्याय के अलग-अलग परखलों गेलै छै। एहिजा भी हरेक अध्याय के उपलब्धि के संग-संग ओकर सीमा गिनायलों गेलै छै, जेकर कुछ मुख्य बिन्दु एहिजा रखलों जाय छै।
मैथिली भाषा के अध्ययन सें जुड़लों सीमा
सुरुआती अध्याय मुख्य रूप सें पच्छिमी विद्वान — कोलब्रुक, बीम्स, हार्नले, ग्रियर्सन — के सबूत पर ठाढ़ छै; दीनबन्धु झा सें पहिलका देसज व्याकरण-चेतना अकसर अनछुआ रही गेलै। नतीजा में जे औपनिवेशिक ज्ञानमीमांसा के आलोचना निबन्ध करैछै, ओकरे स्रोत-सामग्री पर ऊ अपने टिक जाय छै — ई उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श के पुरनका जानल-पहिचानल आत्म-विरोध छै। मानक मैथिली तय करै में दोसर उपभाषा-रूप के समाजी अधिकार के सवाल — मानक कोन शक्ति-संरचना सें बनैछै — बिन-जबाब रही जाय छै।
रमानाथ झा आरो किरणजी वाला अध्याय के सीमा
संग्रह के सबसें लम्बा अध्याय (रमानाथ झा आरो मिथिला भाषा) बनावट के नजर सें ढीला छै — प्रत्यालोचना, जीवनी, भाषा-प्राचीनता, लिपि-विमर्श, मानकीकरण आरो भाषा-प्रबन्धन — छह अलग निबन्ध के सामग्री एके छतरी में अटकायलों गेलै छै। संतुलन के घोषित परन के बादो सुर कइ ठाम आलोचनात्मक जीवन-विवेचन सें बेसी बचाव वाला श्रद्धांजलि बनी जाय छै — किरणजी के मत-खण्डन के "आवेगात्मक" कहल गेलै, मतरकि विरोधी पक्ष लेली लेखक के अपन सबदावली भी आवेग सें बिलकुल मुक्त नै छै। 'प्रत्यालोचक किरणजी' अध्याय में भी विरोधाभास देखाबै में उद्धरण के चुनाव एकतरफा छै — किरणजी के जे ठाम अपने-सुधार चाहे मत-सुधार भेलों हो, से खोजलों नै गेलै; चालीस बरिस के लेखन में मत के फरक विकास भी होय सकैछै, खाली विरोधाभास नै।
'कन्यादान'-पाठ आरो यात्री-भाषा वाला अध्याय के सीमा
'उपेक्षित के आँखि सें कन्यादान पढ़लों जाय' — जे नारीवादी पुनर्पाठ के नजर सें संग्रह के सबसें चुनौती वाला अध्याय मानलों गेलै — ओकरा में भी सवाल के सिलसिला के बिन-जबाबी एगो सीमा छै। "एकर जिम्मेवार के?" बार-बार पूछलों गेलै, मतरकि लेखक अपन फैसला सबूत के संग नै देलकै — उपेक्षित के आँखि सें पढ़ै के जे परन छेलै, से आखिर में सवालिया मुद्रा में रुकी गेलै। 'कन्यादान' के हास्य-रस वाला पक्ष — जे कृति के लोकप्रियता के मूल आधार छै — के रस-शास्त्र वाला जाँच नै भेलै, आरो कइ ठाम पुनर्पाठ इलजाम-पत्र बनी जाय छै। ओइसने, यात्री के भाषा वाला अध्याय में चारू शैली-विज्ञान के औजार पच्छिमी स्रोत सें आनलों गेलै छै, आरो भारतीय काव्यशास्त्र सें मेल बैठाबै खाली संकेत तक रही गेलै — कुन्तक के छह वक्रता-भेद सें चयन-विचलन के सिलसिलेवार मिलान भेलों रहितै तें पूरब-पच्छिम के सेतु पूरा बनितै; ई मौका छूटी गेलै।
अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह आरो मनमोहन झा वाला सीमा
लक्ष्मीपति सिंह पर लिखलों अध्याय में लेखक अपने मानैछै कि छितराइलों कविता में सें "कुछे झोड़ी" सकलै — ई इमानदार मान्यता सराहै लायक छै, मतरकि एकर नतीजा ई छै कि निष्कर्ष सिनी सीमित नमूना पर ठाढ़ छै आरो सामान्यीकरण के वैधता संदेह वाला रहैछै। कुछ परकृति-परतीक के सोझा राजनीतिक रूपक मानलों गेलै छै, मतरकि परतीक के ई अरथ कविता के भीतरी बनावट आरो दोसर कविता के सबूत सें सब ठाम पक्का नै। मनमोहन झा वाला अध्याय संग्रह के सबसें छोटका अध्याय छै, आरो ओकर छोटकाइये ओकर मुख्य सीमा छै — "अनालोचित पक्ष" के घोषणा भेलै, मतरकि विश्लेषण कथा-सार के दरजा पर रही गेलै; निधन के दसम दिन लिखलों होय के कारणें श्रद्धांजलि के भावुक सुर आलोचना के तटस्थता पर भारी छै।
कुल मिला कें, 'हिआओल' के समीक्षक अपने आखिर में लिखैछै — "समान्तर धारा के पूरा पद्धति ओहिजा पहुँचैछै जहाँ हाशिया के सुर अपने बोलै — 'हिआओल' में हाशिया लेली बोललों गेलै छै, हाशिया के बोलाबै कम गेलै छै।" ई एगो वाक्य पूरा संग्रह के सीमा के संछेप में समेटी दैछै।
तेसरका खण्ड : व्यक्तित्व-कृतित्व आरो संस्थागत मूल्यांकन सें जुड़लों सीमा
समर्पण आरो परिणाम के बीच के खाधि
प्रवीण कुमार झा के आलेख (रचना १५) एहि विशेषांक के सबसें बेबाक सुर छै। लम्बा प्रशंसा के बाद "मतरकि मतरकि मतरकि!" कही कें ऊ साफ लिखैछै — "एगो होय छै योगदान आरो दोसरका होय छै बड़का योगदान।" चेतना समिति आरो मैथिली लेखक संघ जइसन संस्था में एतना दिन तक जरूरी पद पर, बड़ा बौद्धिक क्षमता के संग रहते भी, मैथिली के संविधान के अष्टम अनुसूची में रखै के संघर्ष में रमण जी के कोय निर्णायक भूमिका सोझे साफ नै दिखैछै; चेतना समिति जइसन संगठन में रहते भी मैथिली-शिक्षा के क्षेत्र में कोय एहन बड़का परिणाम सोझे नै दिखैछै, जेकरा हुनकर नेतृत्व के सीधा नतीजा कहल जा सकै। लेखक साफ करैछै कि सवाल समर्पण पर नै, बल्कि वहै समर्पण के नतीजा पर छै — कोय कतेक समय देलकै आरो कतेक मेहनत कैलकै, ई एगो पक्ष छै; मतरकि वहै मेहनत सें भाषा, शिक्षा, साहित्यकार आरो समाज के की ठोस उपलब्धि मिललै, ई दोसरका आरो बेसी जरूरी पक्ष छै। एहि आलेख में चेतना समिति के संग रहते पुस्तक-साहित्य के बढ़ावा आरो संस्थागत गतिविधि के लैकें रमण जी के कार्यकाल सें जुड़लों कुछ विवाद-इलजाम, आरो सरकार-सत्ता-प्रतिष्ठान के संग संघर्ष के बदला कूटनीतिक बातचीत के बेसी महत्त्व दै के आलोचना भी चर्चा में रहै के उल्लेख छै — हालाँकि लेखक अपने ई भी जोड़ैछै कि एहि इलजाम के आखिरी सच मानै सें पहिले अलग जाँच जरूरी छै।
मौनता के व्यंग्य
डा. धनाकर ठाकुर के आलेख (रचना ११) शैली में व्यंग्य-परधान छै, मतरकि ओकर भीतर एगो तेज संकेत छिपलों छै। रमण जी के चेतना समिति के "गुरु द्रोणाचार्य" कही कें लेखक मिथिला राज्य के सवाल पर चेतना समिति — आरो तें रमण जी — के मौनता के द्रोणाचार्य के वहै परसंग सें तुलना करैछै, जहाँ गुरु आँखी मूनी के रही गेलै। "मिथिला राज्य के बात तें चेतना समिति लेली साँढ़ के लाल कपड़ा" — ई पाँति साफ कहैछै कि संस्था आरो ओकर मुख्य साहित्यिक खम्भा राजनीतिक रूप सें संवेदनशील सवाल पर चुप रहै के पहिलौती दैछै।
निष्पक्षता के सवाल आरो पंजीकरण के अधूरापन
डॉ. कैलाश कुमार मिश्र के आलेख (रचना १२) में उद्धृत राजलीन ठाकुर के मत साफ छै — "रमण जी हुनकर प्रिय आदमी आरो बढ़िया समीक्षक दुन्नु, मतरकि एगो दोष ई कि ऊ आन लोग के तुलना में सीमित समाज के काम के बेसी उघार करैछै, ओहिजा ऊ निष्पक्ष नै रही पाबैछै।" नबोनारायण मिश्र के संस्मरण वाला आलेख (रचना १३) में भी साहित्यकार-पंजीकरण के जे सूची देलों गेलै, ओकरा में बाबूसाहेब चौधरी जइसन आन्दोलनकारी-नाटककार के नाम सामिल नै होय के दिसाय संकेत छै, जे रमण जी के पंजीकरण-काम के चयनात्मकता पर एगो मौन सवाल-चिन्ह छै।
चौथका खण्ड : संपादकीय-शैली के सीमा आरो पाठक के असहमति
पद्धति के अनुशासनहीनता के स्वीकृति
कुमार राहुल के आलेख (रचना ६) एहि दिसाय सबसें सोझा छै। "हम हुनकर सीमा तें रेखांकित करी सकै छी" कही कें ऊ साफ लिखैछै कि रमण जी के समालोचना में विद्वान आलोचक कोय बान्हलों-छेकलों नियम के पालन करै नै दिखैछै, बल्कि कोय एके तत्त्व सें परभावित होय कें अपन फैसला दै दैछै। कुछ ठाम टिपाउट जइसन रमण जी कोय रचना चाहे रचनाकार पर कम सबद में काम चला लैछै आरो अपन बात बेसी लिखैछै। हडसन के ऊ मत उद्धृत करै — कि आलोचना के काम खाली कृति के ठीक-बेठीक देखब नै, बल्कि तय मानदंड स्थापित करब छै — लेखक ई मानी लैछै कि रमण जी के कइ गो आलेख एहि सैद्धान्तिक कसौटी पर पूरा नै उतरैछै।
सम्पादकीय काम के असमानता
प्रदीप बिहारी के आलेख (रचना १४) एक ठाम साफ कहैछै कि 'घर-बाहर' पत्रिका के सम्पादन में ऊ हुनर नै झलकैछै, जे रमण जी के विवेचनात्मक-सोध वाला पोथी में दिखैछै। भूमिका आरो संपादकीय लेखन में — "कोय लेखक के एहि दुन्नु लेखन में कतेक निखरल होय के चाही, से रमण जी बेसी ठाम दिखैछै, सब ठाम नै। कुछ ठाम एकभगहा भेलै छै।" एहि संग ई बात के भी उल्लेख छै कि हुनकर साहित्यिक सेवा लेली हुनका प्रशंसा जेतना होय छै, आलोचना आरो खिधांस भी ओतने होय छै; मतरकि एहिपर ऊ कतेक गंभीरता सें विचार करैछै, से हुनकर चेहरा के भाव सें बुझलों नै जा सकैछै।
तथ्यगत आरो व्याख्या वाला असहमति
कीर्तिनाथ झा के 'विवर्त'-समीक्षा (रचना १०) में एक ठाम साफ असहमति दर्ज छै — जबें रमण जी मैथिली पत्र-पत्रिका के आजादी-आन्दोलन के प्रति "पूरा संवेदनशील आरो जिम्मेवार" कहैछै, तबें समीक्षक टिप्पणी करैछै — "मतरकि, ई विचार एहि विषय पर सबके मानलों छै कि नै, कहब कठिन।" अजित कुमार झा के आलेख (रचना ५) में 'कन्यादान' पर रमण जी के पुनर्पाठ सें आरो साफ असहमति व्यक्त छै — समीक्षक के तर्क एकतरफा बुझाबैछै, आरो रमण जी के हाथें हरिमोहन झा के पाठक के जे तीन सरेनी कैलों गेलै, ओकरा में एगो चौथका वर्ग (जे रमण जी के अपन साहित्य के मिथिला-संस्कृति पर चोट बुझैछै) के चर्चा नै भेलै — "रमण जी अपन आलेख में चौथका सरेनी के चर्चा नै कैलकै छै।" हितनाथ झा के आलेख (रचना १७) में भी एगो साफ असहमति छै — रमण जी अपन बीज-भाषण संग्रह के प्रस्तावना में साहित्यिक राजनीति पर जे चोट कैलों छै, ओकरा लेली समीक्षक लिखैछै — "ई मंच छेलै आरो ई जइसन किसिम के पोथी छै, ओकरा लेली हमरा बुझै में ठीक नै... परहार सें पहिले सुधार के भी गुंजाइस होय के चाही।"
आशीष अनचिन्हार के नजर मँ रमानन्द झा ‘रमण’ के आलोचना-इतिहास लेखन के कमी सभ
आशीष अनचिन्हार के लेख के मूल बात ई छै कि साहित्य के इतिहास लिखना खाली पोथी जमा करना, नाम गिनना आरो बाद मँ छपल किताब के शुरुआत मान लेना नै छै। इतिहास लिखै वाला के लगे “इतिहासबोध” रहना चाही—माने घटना, पहिल प्रकाशन, पहिल प्रयोग, असर, स्रोत आरो श्रेय के क्रम ठीक ढंग सँ बुझना। एही कसौटी पर ऊ खास करि धर्मेन्द्र विह्वल के “व्योमक ओहिपार” पर रमानन्द झा ‘रमण’ के लिखल भूमिका मँ कई कमी देखै छै।
1. इतिहासबोध के कमी
अनचिन्हार के सबसँ पैघ आपत्ति ई छै कि रमण जी एहि प्रसंग मँ इतिहासबोध बिसरी गेलै। कोनो विधा के पहिल छपना, ओकर शुरुआती प्रयोग, नियम के चर्चा आरो बाद मँ एकछाहा किताब बनना—ई सभ अलग-अलग पड़ाव छै। बाद के किताब के आधार बना के पहिलका पड़ाव के ओझरा देना इतिहास के क्रम बिगाड़ै छै।
2. शुरुआत तय करै के मापदण्ड एक जइसन नै
अनचिन्हार कहै छै कि कोनो विधा के शुरुआत ओकरे पहिल प्रमाणित प्रकाशन सँ मानल जाय—पत्रिका मँ छपल होय कि पोथी मँ। जँ एक लेखक लेली “पहिल किताब” नियम होय आरो दोसर लेली “पहिल प्रकाशन”, तें दूहरा मापदण्ड होय छै। रमण जी के भूमिका ई फर्क साफ-साफ नै खोलै छै—अनचिन्हार के शिकायत ईयै।
3. पहिलका प्रकाशन आरो प्रयोग के अनदेखी
अनचिन्हार 2009 के गजेन्द्र ठाकुर के “कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक” किताब मँ “मैथिली हाइकू हैकू क्षणिका” आलेख के जिक्र करै छै, जइ मँ टंका, शेनर्यू, हैबून, हैगा, वाका आदि पर चर्चा बतावल गेल छै। ऊ विदेह के फेसबुक समूह मँ लगभग 2012 तक ई विधा सभ सिखावल जाय के आरो कई रचनाकार जुड़ै के बातो रखै छै। ओकर नजर मँ रमण जी के भूमिका मँ ई पहिलका सार्वजनिक इतिहास के सही जगह नै मिलल।
4. स्रोत आरो रेफरेंस के कमी
अनचिन्हार के आरोप छै कि रमण जी टंका आदि के नियम बतावै छै, लेकिन पहिलका मैथिली स्रोत के रेफरेंस नै दै छै। इतिहास या आलोचना मँ खाली तथ्य कहि देना काफी नै; तथ्य कहाँ सँ आयल, पहिने के लिखने छलै, केतना पुरान प्रमाण छै—ई सभ बताना चाही। एहि जगह पर स्रोत-जाँच कम पड़ै छै।
5. श्रेय बाँटै मँ गड़बड़ी
अनचिन्हार के पढ़ाई मँ भूमिका सँ एहन भाव निकलै छै जइसे धर्मेन्द्र विह्वल ई जापानी विधा सभ मैथिली मँ आनलै। अनचिन्हार एकरा गलत इतिहासबोध मानै छै, काहे कि ओकर अनुसार ई सभ विधा पर पहिने चर्चा आरो रचना-प्रयोग होय चुकल छलै। “के पहिने परिचय देलकै”, “के पहिल एकछाहा पोथी देलकै”, “के लोकप्रिय बनैलकै”—ई तीनू बात अलग करके लिखना चाही छलै।
6. “पहिल किताब” आरो “पहिल उपस्थिति” के फर्क साफ नै
आलेख के परिशिष्ट मँ देल फेसबुक बातचीत के अनचिन्हार सहायक प्रमाण जइसन रखै छै। ओकर आशय ई छै कि धर्मेन्द्र विह्वल अपन पोथी के एहि विधा के पहिल पुस्तकाकार/एकछाहा कृति कहै छै, लेकिन ई नै कहै छै कि मैथिली मँ ई विधा ओकरा सँ पहिने नै छलै। अनचिन्हार के नजर मँ रमण जी के भूमिका ई जरूरी फर्क ठीक सँ नै बैठाबै छै।
7. निजी या वैचारिक असहमति के असर के आरोप
अनचिन्हार ईहो आरोप करै छै कि गजेन्द्र ठाकुर सँ असहमति या तामस के चलते हुनकर नाम आरो योगदान के छोड़ी देल गेल। ई आरोप गंभीर छै, मुदा अनचिन्हार के तर्क ई छै कि इतिहास लिखै मँ निजी पसन्द-नापसन्द के जगह नै होना चाही; जेकर श्रेय छै, ओकर नाम तथ्य के आधार पर आना चाही।
8. विरोधी प्रमाण के सामना नै
अनचिन्हार खुला चुनौती दै छै कि जँ गजेन्द्र ठाकुर सँ पहिने मैथिली मँ टंका, शेनर्यू, हैबून, हैगा, वाका रहलै आरो नियम पर चर्चा भेलै, तें ओकर प्रमाण सामने आनल जाय। माने, इतिहास मँ नाम छोड़ी देना से काम नै चलै; विरोधी दाबी के दस्तावेज से जाँचै के चाही।
9. भूमिका लिखै वाला के जाँच-पड़ताल अधूरा
जखन भूमिका मँ विधा के इतिहास आरो नियम पर बात होय छै, तखन लेखक के पुरान प्रकाशन, तारीख, रचनाकार, सार्वजनिक पोस्ट आरो किताब सभ देखै के जिम्मेदारी बढ़ि जाय छै। अनचिन्हार के नजर मँ रमण जी एहि स्रोत-जाँच मँ पूरा सावधानी नै रखलै, से भूमिका के इतिहासिक भरोसा कमजोर होय छै।
10. इतिहास-सुधार के जरूरत
अनचिन्हार के आखिर बात ई छै—जँ गजेन्द्र ठाकुर सँ पहिने के प्रमाण छै तें सामने आनू; नै तें जेकर योगदान छै ओकर नाम आरो श्रेय ठीक जगह पर दी। ओकरा हिसाब से समस्या के समाधान इतिहास-सुधार, सही स्रोत आरो साफ श्रेय-बँटवारा छै।
निचोड़: अनचिन्हार रमानन्द झा ‘रमण’ के पूरा साहित्य के नकारै नै छै। ओकर आलोचना खास एहि भूमिका के इतिहासिक दाबी पर छै। मुख्य कमी—इतिहासबोध के कमी, पहिल प्रकाशन के अनदेखी, स्रोत-रेफरेंस के अभाव, श्रेय के उलझाव, “पहिल किताब” आरो “पहिल विधा-प्रयोग” के फर्क नै करना, आरो निजी असहमति के असर के आरोप। एही आधार पर ऊ एहि लेखन के अधूरा आरो सुधार योग्य इतिहास मानै छै।
उपसंहार
एहि सब्भे सीमा के एक ठाम राखै के बाद एगो साझा सूत्र साफ होय छै। रमण जी के काम मात्रा के हिसाब सें बहुत बड़का, अभिलेख के नजर सें अनमोल, आरो मातृभाषा-परेम सें प्रेरित छै — एहिपर विशेषांक के कोय योगदानकर्ता सवाल नै उठाबैछै। मतरकि जबें वहै काम के सैद्धान्तिक अनुशासन, स्रोत-परमाणिकता, पूरा निष्पक्षता आरो संस्थागत नतीजा के कड़ा कसौटी पर कसलों जाय छै, तबें ऊ बहुत गुंजाइस छोड़ी दैछै — पाठ बिना समीक्षा के जोखिम, मूल्य-मानदण्ड के अस्थिरता, आत्मीयता सें उपजल प्रशंसा के अधिकता, हाशिया के कम मौजूदगी, संस्थागत चुप्पी, आरो चुनिंदा निष्पक्षता — ई सब्भे बिन्दु आगू के सोध के नेवता छै, सजा नै। 'हिआओल' के समीक्षक अपने जे कहलकै, से पूरा विशेषांक पर भी लागू होय छै — "एकर खूबी ओहिजा छै जहाँ लेखक अभिलेख खोजैछै, चलन वाला भूल सुधारैछै, बिसरल लेखक के फेर हाजिर करैछै... एकर सीमा ओहिजा छै जहाँ अनुमान परमाण के जगह लैछै, जीवनी कृति के विश्लेषण पर भारी पड़ैछै।" रमण जी के अपने सबद में कही तें — "वादे वादे जायते तत्त्वबोधः" — एहि विवाद आरो परतिवाद सें उपजैवाला तत्त्व-बोधे एहि विशेषांक के असल उपलब्धि छै।
रमानन्द झा 'रमण' : कृतित्व के सीमा-रेखा पर एगो संपादकीय नजर
रमण जी के मैथिली साहित्य में जे स्थान छै, से एहि सतरहो रचना सें बिन-विवाद बुझाय पड़ैछै — मतरकि एहि विशेषांक के सार्थकता तबेंही पूरा होतै जबें प्रशंसा के संग-संग ऊ सीमा भी चिन्हलों जाय, जे योगदानकर्ता सिनी (आरो रमण जी के अपन आलोचना-पद्धति) रेखांकित करैछै।
१. आलोचना-पद्धति के सबसें मौलिक सीमा — पाठ बिना समीक्षा
'अखियासल' पर आएल विस्तृत समीक्षा में (रचना ४) ई तथ्य साफ उघरल छै कि रमण जी अकसर जे रचना के आलोचित करैछै, ओकर मूल पाठ हुनका लग उपलब्धे नै रहैछै — 'चन्द्रप्रभा', त्रिलोचन झा, यदुवर, बिसरल जनार्दन झा — सब ठाम समीक्षक अपने 'अनुपलब्धता' मानी लैछै। जबें मूल कृतिए समीक्षक के मिललै नै, तें ओकर सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्यांकन कोन आधार पर सम्भव, ई सवाल बिन-जबाब रही जाय छै। बहुतो ठाम समीक्षा जयकान्त मिश्र के इतिहास चाहे दोसरका द्वितीयक स्रोत पर टिक जाय छै।
२. मूल्य-मानदण्ड के अस्थिरता
एहि दुन्नु पोथी के समीक्षा में (रचना ४ आरो १६) बार-बार देखायलों गेलै छै कि रमण जी एगो निबन्ध में जे गुन के सबसें ऊँचा मानैछै, दोसरका में ओकरे उलटा बात के प्रशंसा करैछै — जइसन गंगानन्द सिंह, 'चन्द्रग्रहण' आदि में समसामयिक यथार्थ सें जुड़ाव के गुन मानब, मतरकि व्यास के कथा के ठीक ओही कारणें प्रशंसा करब कि ऊ समसामयिक यथार्थ सें अप्रभावित रहलों। एहि तरह के आत्मविरोध देखाबैछै कि कोय एगो घोषित सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता नै छै — समीक्षा कभी प्रभाववादी, कभी समाजशास्त्रीय, कभी जीवनीमूलक होय जाय छै।
३. आत्मीयता आरो आलोचनात्मक दूरी के अभाव
लक्ष्मीपति सिंह, मोहन, राजेश्वर झा जइसन अध्याय में व्यक्तिगत स्नेह समीक्षा के संस्मरणात्मक श्रद्धांजलि के रूप दै दैछै, जेसें वस्तुनिष्ठता पर असर पड़ैछै। एकर ठीक उलटा हरिमोहन झा पर जे आलोचनात्मक साहस देखायलों गेलै, से पूरा संग्रह में एके जइसन नै छै।
४. सैद्धान्तिक सबदावली के अनुपस्थिति
रस, ध्वनि, व्यञ्जना आदि भारतीय काव्यशास्त्रीय तत्त्व भीतर छिपलों रूप सें तें छै, मतरकि आनन्दवर्धन, कुन्तक, क्षेमेन्द्र आदि के सिलसिलेवार सैद्धान्तिक परयोग नै मिलैछै। पाश्चात्य सिद्धान्त के भी सोची-विचारी के परयोग नै छै। ई समीक्षा के सहज पढ़ै लायक तें बनाबैछै, मतरकि अकादमिक गहराई के कमी पैदा करैछै।
५. नजरिया के संकीर्णता — स्त्री आरो हाशिया के कम उपस्थिति
'अखियासल' के पचीस में चौबीस पुरुष-रचनाकार, खाली एगो स्त्री (हरिलता) — ओकरा में भी विवेचन वैष्णव भक्ति तक सीमित। मिथिला के दलित, अति-पिछड़ा आरो मौखिक-परम्परा के बेनाम रचनहार एहि समान्तर इतिहास सें अकसर गायब रही जाय छै। कुमार राहुल के आलेख (रचना ६) में भी ई कहल गेलै कि रमण जी कोय बान्हलों सैद्धान्तिक नियम के पालन करै नै दिखैछै, बल्कि एके तत्त्व सें परभावित होय कें अपन फैसला दै दैछै, आरो कुछ ठाम टिपाउट जइसन कम सबद में रचनाकार के काम चला लैछै आरो अपन बात बेसी लिखैछै।
६. संकलन के असंगति
पचीसो निबन्ध अलग-अलग समय में, अलग-अलग पत्रिका लेली स्वतंत्र रूप सें लिखलों गेलों छेलै — एक ठाम राखी कें 'ग्रन्थ' बना देला सें कोय एके-जइसन सैद्धान्तिक ढाँचा नै बचल। भूमिका, पद्धति-कथन आरो उपसंहार के अभाव एहि जोड़ा-जाड़ी परकृति के उघारी दैछै — ई बात 'हिआओल' पर भी लागू होय छै, जहाँ एक-एक अध्याय के विस्तार, पद्धति आरो गहराई असमान छै।
७. व्यक्तिगत समर्पण आरो संस्थागत परिणाम के बीच के खाधि
प्रवीण कुमार झा के आलेख (रचना १५) एहि विशेषांक के सबसें बेबाक सुर छै। "मतरकि मतरकि मतरकि!" कही कें ऊ साफ लिखैछै कि चेतना समिति आरो मैथिली लेखक संघ जइसन संस्था में एतना दिन तक जरूरी पद पर रहते भी, मैथिली के संविधान के अष्टम अनुसूची में रखै के संघर्ष में आरो मैथिली-शिक्षा के क्षेत्र में रमण जी के कोय निर्णायक, ठोस नतीजा साफ-साफ सोझे नै दिखैछै — सवाल समर्पण पर नै, नतीजा पर छै। एहि आलेख में चेतना समिति के कार्यकाल सें जुड़लों कुछ विवाद-इलजाम आरो सत्ता-प्रतिष्ठान के संग कूटनीतिक सम्बन्ध के पहिलौती दै के आलोचना भी चर्चा में रहै के उल्लेख छै। डा. धनाकर ठाकुर के व्यंग्य-परधान आलेख (रचना ११) एहि दिसाय के आरो तेज करै, मिथिला राज्य के सवाल पर रमण जी आरो चेतना समिति के मौनता के द्रोणाचार्य के 'आँखी मूनी के रहब' सें तुलना करैछै।
८. निष्पक्षता के सवाल
डॉ. कैलाश कुमार मिश्र के आलेख (रचना १२) में उद्धृत राजलीन ठाकुर के मत साफ छै — "रमण जी हुनकर प्रिय आदमी आरो बढ़िया समीक्षक दुन्नु, मतरकि एगो दोष ई कि ऊ आन लोग के तुलना में सीमित समाज के काम के बेसी उघार करैछै, ओहिजा ऊ निष्पक्ष नै रही पाबैछै।" नबोनारायण मिश्र के आलेख (रचना १३) में भी साहित्यकार-पंजीकरण के सूची सें बाबूसाहेब चौधरी जइसन आन्दोलनकारी-नाटककार के अनुपस्थिति दिसाय संकेत छै।
९. संपादकीय काम के असमानता
प्रदीप बिहारी के आलेख (रचना १४) एक ठाम साफ कहैछै कि 'घर-बाहर' पत्रिका के सम्पादन में ऊ हुनर नै झलकैछै, जे विवेचनात्मक-सोध वाला पोथी में दिखैछै — भूमिका आरो संपादकीय लेखन में जेतना वैचारिक तेजी चाही, से सब ठाम एके जइसन नै। कीर्तिनाथ झा के 'विवर्त'-समीक्षा (रचना १०) में भी एक ठाम असहमति दर्ज छै — "ई विचार सबके मानलों छै कि नै, कहब कठिन" — जबें रमण जी मैथिली पत्र-पत्रिका के आजादी-आन्दोलन के प्रति "पूरा संवेदनशील आरो जिम्मेवार" कहैछै।
१०. पाठक के असहमति
अजित कुमार झा के आलेख (रचना ५) में 'कन्यादान' पर रमण जी के पुनर्पाठ सें साफ असहमति व्यक्त छै — समीक्षक के तर्क एकतरफा बुझाबैछै, आरो रमण जी के हाथें हरिमोहन झा के पाठक के जे तीन सरेनी कैलों गेलै, ओकरा में एगो चौथका वर्ग (जे रमण जी के अपन साहित्य के मिथिला-संस्कृति पर चोट बुझैछै) के चर्चा नै भेलै।
संगति — ई सब्भे सीमा एगो साझा सूत्र सें बान्हलों छै : रमण जी के काम मात्रा के हिसाब सें बहुत बड़का, अभिलेख के नजर सें अनमोल, आरो मातृभाषा-परेम सें प्रेरित छै; मतरकि सैद्धान्तिक अनुशासन, स्रोत-परमाणिकता, पूरा निष्पक्षता आरो संस्थागत नतीजा के स्तर पर ऊ आगू बढ़ै के गुंजाइस छोड़ी दैछै — जेकरा हुनकरे सबद में कही तें "वादे वादे जायते तत्त्वबोधः"।
१.३. सम्पादकीय (बज्जिका मैथिली)
सम्पादकीय- गजेन्द्र ठाकुर
रमानन्द झा 'रमण' : कृतित्व आ ओकर सीमा-रेखा — एकगो संपादकीय पुनरवलोकन (बज्जिका मैथिली)
जे व्यक्ति ई ग्रन्थ के गुण समझे के लायक न हय, ओकर प्रशंसा से हम प्रसन्न न होयब। अन्हरा सब के झुंड अगर कोनो चित्र के प्रशंसा करय, त चित्रकार के गौरव कोना बढ़त? लोक ई ग्रन्थ के दोष देखाबै मात्र एकर आलोचना करथिन। ज्ञानी लोक अनजान में कैल अपन तथ्यगत भूल ओर ध्यान आकृष्ट कैल जाए से निश्चिते प्रसन्न होय हथिन। - [आत्मतत्त्वविवेक ग्रन्थ के आलोचना सम्बन्धी अन्तिम वचन - उदयनाचार्य]
ई विशेषांक खातिर आएल सतरहो रचना — परिचयात्मक आलेख से लेके दूगो दीर्घ पुस्तक-समीक्षा ('अखियासल' आ 'हिआओल' पर), साक्षात्कार, संस्मरण आ मूल्यांकनपरक निबन्ध तक — एकठाम रखके पढ़ला बाद एकगो बात साफ होय हय : रमण जी के मैथिली साहित्य में जे स्थान हय, ओ निर्विवाद हय, मुदा ई विशेषांक के सार्थकता तबे पूरा होयत जब प्रशंसा के संगे-संग ओ सीमा भी चिन्हित होय जे खुद योगदानकर्ता सब, आ रमण जी के अपन आलोचना-पद्धति के भीतरे से, बेर-बेर रेखांकित करत रहल हथिन। नीचे ओ सब सीमा के चार खण्ड में बाँटके एकठाम रखल जा रहल हय — पहिल, समालोचना-पद्धति के सीमा (मुख्यतः 'अखियासल' पर आएल समीक्षा से); दोसर, 'हिआओल' पर आएल अध्यायवार समीक्षा से; तेसर, व्यक्तित्व-कृतित्व आ संस्थागत मूल्यांकन से जुड़ल सीमा; आ चारिम, संपादकीय-शैलीगत आ पाठकीय असहमति से जुड़ल बिन्दु।
पहिल खण्ड : 'अखियासल' आ समालोचना-पद्धति के मौलिक सीमा
'अखियासल' (1995) पर आएल विस्तृत समीक्षा (रचना ४) ई सतरहो में सबसे बेसी संरचित आ निर्मम हय। ई समीक्षा के उत्तरार्ध पूरा तरह से 'अखियासल' के सीमा, दुर्बलता आ पद्धतिगत संकट के समर्पित हय, आ उहाँ आठगो "सीमा" क्रमबद्ध रूप से गिनल गेल हय।
(क) पाठ बिना समीक्षा
सबसे गम्भीर सीमा ई हय कि लगभग हरेक प्रारम्भिक निबन्ध में समीक्षक खुद मूल रचना के 'अनुपलब्धता' स्वीकार करै हथिन। 'चन्द्रप्रभा' के प्रसंग में खुद लिखल गेल हय — "चन्द्रप्रभा के अध्ययन-विश्लेषण नीक से न कैल जा सकल हय, एकर प्रमुख कारण हय अनुपलब्धता"; त्रिलोचन झा के प्रसंग में — "बड़ कम सामग्री उपलब्ध हय"; यदुवर के प्रसंग में — "यदुवर के प्रसंग में अद्यावधि बड़ कम अनुसन्धान भेल हय"; बिसरल जनार्दन झा के प्रसंग में — "पत्र-पत्रिका में जे रचना प्रकाशित भेल होयत, अब सर्वसुलभ न हय।" इहाँ एकगो गहन विरोधाभास पैदा होय हय — अगर मूल कृति समीक्षक के खुद उपलब्ध न हल, त ओकर सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्याङ्कन कोन आधार पर सम्भव भेल? बहुत ठाम समीक्षा असल में द्वितीयक स्रोत पर — जयकान्त मिश्र के मैथिली साहित्येतिहास, करुणाकान्त झा के शोध-प्रबन्ध, आन समीक्षक के उद्धरण पर — आश्रित हो जाय हय। पाठ-केन्द्रित समीक्षा के दृष्टि से ई एकगो मौलिक दुर्बलता हय — पाठ बिना समीक्षा।
(ख) मूल्य-मानदण्ड के अस्थिरता आ आन्तरिक अन्तर्विरोध
रमानन्द झा एक निबन्ध में जे गुण के सर्वोच्च मानै हथिन, दोसर में ओकरे विपरीत के प्रशंसित करै हथिन। गंगानन्द सिंह, 'चन्द्रग्रहण' के नारी-पात्र, ललित आ धीरेन्द्र के विवेचन में समसामयिक यथार्थ-संवेदना, परिवेश-सम्पृक्ति आ युग-जीवन के प्रतिबिम्बन के सर्वोच्च मूल्य मानल गेल हय; मुदा व्यास के कथा के ठीक एही कारण से प्रशंसित कैल गेल कि ओ समसामयिक जीवन से विशेष प्रभावित न होय हय आ बदलल युग-जीवन के विकृति से अप्रभावित रहै हय। ई प्रत्यक्ष आत्मविरोध हय — यथार्थ-सम्पृक्ति कखनियो गुण, कखनियो ओकर अभाव गुण। तहिने, हरिमोहन झा के हास्य के "विचार के उन्मेष न करब" के कारण कम मूल्य देल गेल, मुदा मधुप के गीत के "तत्काल हृदय-प्रभाव" आ आनन्द के कारण ऊँच मूल्य देल गेल — जबकि गीत भी प्रायः वैचारिक मन्थन न, बल्कि भाव-तात्कालिकता पर आश्रित होय हय। 'कोबर-गीत' जइसन आत्म-विरोधी, प्रयोजन-प्रेरित रचना के "व्यक्ति से बड़ समाज" के तर्क से उचित ठहरावल गेल, मुदा क्षेमेन्द्र के औचित्य-विचार के दृष्टि से आत्मा के प्रतिकूल रचना भाव-औचित्य के मूल-भङ्ग हय — समीक्षक इहाँ सैद्धान्तिक स्पष्टता दे न पावै हथिन। ई अस्थिरता एही कारण से हय कि रमानन्द झा कोनो एक घोषित सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता न अपनावै हथिन — ओ प्रसंग अनुसार कखनियो प्रभाववादी, कखनियो समाजशास्त्रीय, कखनियो जीवनीमूलक, कखनियो रूपवादी दृष्टि अपनावै हथिन। ई पद्धतिगत सारसंग्रहवाद एक ओर लचीलापन दे हय, त दोसर ओर मूल्याङ्कन के अप्रत्याशित आ असंगत बना दे हय।
(ग) सैद्धान्तिक शब्दावली के अनुपस्थिति
यद्यपि रमानन्द झा के समीक्षा में रस, ध्वनि, व्यञ्जना, औचित्य आदि भारतीय काव्यशास्त्रीय अवधारणा अन्तर्निहित रूप में मौजूद हय, तबो ओ ई शास्त्रीय प्रतिमान के कहीं सुस्पष्ट सैद्धान्तिक उपकरण के रूप में प्रयोग न करै हथिन। "व्यञ्जित", "सम्प्रेषण", "भावाश्रित" जइसन शब्द त आवै हय, मुदा आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, कुन्तक, क्षेमेन्द्र, भट्टनायक आदि आचार्य के नाम आ हुनकर सिद्धान्त के व्यवस्थित अनुप्रयोग अनुपस्थित हय। पाश्चात्य सिद्धान्त के भी कहीं नामोल्लेख अथवा सुविचारित प्रयोग न भेटै हय। एही से एकगो द्वैध स्थिति पैदा होय हय — एक ओर ई सैद्धान्तिक लाघव समीक्षा के सुपाठ्य आ पत्रकारीय-सुलभ बनावै हय, मुदा दोसर ओर अकादमिक गहनता के अभाव पैदा करै हय। समीक्षा विवरणात्मक आ मूल्याङ्कनात्मक त हय, मुदा सैद्धान्तिक-विश्लेषणात्मक कम हय।
(घ) परिप्रेक्ष्य के संकीर्णता — पुरुष-केन्द्रिकता आ वर्ण-केन्द्रिकता
पचीस निबन्ध में चौबीस पुरुष-रचनाकार के समर्पित हय; मात्र एक — हरिलता — स्त्री-रचनाकार के। ओहू में हरिलता के विवेचन मुख्यतः वैष्णव भक्ति तक सीमित रह जाय हय, ओकर सामाजिक-आलोचनात्मक सम्भावना — बाल-विवाह, वैधव्य आ स्त्री-शिक्षा के निषेध के विरुद्ध चोरा के अक्षर सीखे के संघर्ष — अनदेखा हो जाय हय। स्त्री अधिकतर पात्र अथवा प्रेरणा के रूप में उपस्थित हय, स्वतन्त्र लेखिका, सम्पादिका आ आलोचक के रूप में कम। ओहिने विवेचित प्रायः समस्त रचनाकार एक विशिष्ट सामाजिक स्तर से आवै हथिन — मिथिला के दलित, अतिपिछड़ा, अल्पसंख्यक आ लोक-परम्परा के अनाम रचयिता ई समान्तर इतिहास से प्रायः अनुपस्थित रह जाय हथिन।
(ङ) संकलनात्मक असंगति आ पाठ-प्रामाणिकता के प्रश्न
ई पचीस निबन्ध सन् 1972 से 1989 तक अलग-अलग पत्र-पत्रिका में, अलग-अलग अवसर पर, अलग-अलग पाठक-वर्ग के ध्यान में रखके, स्वतन्त्र रूप में लिखल गेल हल। एकरा एकठाम रखके 'ग्रन्थ' बना देला से एकगो अन्तर्निहित असंगति पैदा होय हय — कहीं व्यक्तित्व-प्रधान, कहीं कृति-प्रधान, कहीं विधा-प्रधान, कहीं प्रवृत्ति-प्रधान समीक्षा। कोनो एकसमान सैद्धान्तिक ढाँचा समस्त निबन्ध के न बाँधै हय, आ एक सुनियोजित ग्रन्थ में जे भूमिका, पद्धति-कथन आ उपसंहार अपेक्षित होय हय, ओ ई में अनुपस्थित हय। साथे, कृति में उद्धृत पद्यांश आ गद्यांश के पाठ-प्रामाणिकता भी सन्दिग्ध रह जाय हय, काहे कि खुद समीक्षक स्वीकार करै हथिन कि बहुतो रचना पत्र-पत्रिका में छितरायल आ अनुपलब्ध हय, एही से उद्धृत अंश के मूल पाठ से तुलना-सत्यापन प्रायः असम्भव हल। "प्रथम" आ "मौलिक" जइसन पद खातिर जे कठोर पाठालोचन, पाण्डुलिपि-अध्ययन आ प्रकाशन-इतिहास जरूरी हय, ओ ई आरम्भिक कृति में अविकसित रह जाय हय।
(च) समान्तर इतिहास-प्रतिमान के अपूर्ण सैद्धान्तिकीकरण
अन्ततः, सबसे मौलिक सीमा ई हय कि रमानन्द झा समान्तर इतिहास के अवधारणा के व्यवहार में त जीयै हथिन, मुदा ओकरा सिद्धान्त के रूप में साफ-साफ प्रतिपादित न करै हथिन। "दू कोटि के साहित्यकार" के सिद्धान्त एकर सबसे नजदीक हय, मुदा ओ मुख्यधारा के कैनन — जयकान्त मिश्र के इतिहास — के विकल्प अथवा विरोध न, बल्कि ओकर पूरक बनके रह जाय हय। समीक्षक बेर-बेर जयकान्त मिश्र के प्रामाणिक आधार मानके हुनकरे सूचना पर आश्रित रहै हथिन, जबकि समान्तर इतिहास के असली दायित्व मुख्यधारा के कैनन के आधार-मान्यता के खुद प्रश्नाङ्कित करब हय।
दोसर खण्ड : 'हिआओल' पर आएल अध्यायवार समीक्षा से उठल सीमा
'हिआओल' (2012) पर आएल समीक्षा (रचना १६) ई विशेषांक के सबसे दीर्घ आ पद्धतिगत रचना हय, जे में भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त आ विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि — तीनो कसौटी पर सत्रहो अध्याय के अलग-अलग परखल गेल हय। इहाँ भी हरेक अध्याय के उपलब्धि के संगे-संग ओकर सीमा गिनावल गेल हय, जेकर किछु मुख्य बिन्दु इहाँ रखल जाय हय।
मैथिली भाषा के अध्ययन से जुड़ल सीमा
उद्घाटक अध्याय मुख्यतः पश्चिमी विद्वान् — कोलब्रुक, बीम्स, हार्नले, ग्रियर्सन — के साक्ष्य पर ठाढ़ हय; दीनबन्धु झा से पहिने के देशी वैयाकरण-चेतना प्रायः अस्पर्शित रह गेल। फलतः जे औपनिवेशिक ज्ञान-मीमांसा के आलोचना निबन्ध करै हय, ओकरे स्रोत-सामग्री पर ओ खुद आश्रित हो जाय हय — ई उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श के चिर-परिचित आत्म-विरोध हय। मानक मैथिली के निर्धारण में आन उपभाषा-रूप के सामाजिक अधिकार के प्रश्न — मानक कोन शक्ति-संरचना से बनै हय — अनुत्तरित रह जाय हय।
रमानाथ झा आ किरणजी सम्बन्धी अध्याय के सीमा
संग्रह के सबसे दीर्घ अध्याय (रमानाथ झा आ मिथिला भाषा) संरचना के दृष्टि से शिथिल हय — प्रत्यालोचना, जीवनी, भाषा-प्राचीनता, लिपि-विमर्श, मानकीकरण आ भाषा-प्रबन्धन, छह स्वतन्त्र निबन्ध के सामग्री एके छत्र में अटकावल गेल हय। सन्तुलन के घोषित प्रतिज्ञा के बादो स्वर कतोक ठाम आलोचनात्मक जीवन-विवेचन से जादे प्रतिरक्षात्मक श्रद्धाञ्जलि बन जाय हय — किरणजी के मत-खण्डन के "आवेगात्मक" कहल गेल, मुदा विरोधी पक्ष खातिर प्रयुक्त लेखक के अपन शब्दावली भी आवेग से पूरा मुक्त न हय। 'प्रत्यालोचक किरणजी' अध्याय में भी विरोधाभास-प्रदर्शन में उद्धरण-चयन एकतरफा हय — किरणजी के जे ठाम सब में आत्म-संशोधन वा मत-परिमार्जन भेल हो, ओ खोजल न गेल; चालीस बरिस के लेखन में मत-भिन्नता विकास भी हो सकै हय, खाली विरोधाभास न।
'कन्यादान'-पाठ आ यात्री-भाषा सम्बन्धी अध्याय के सीमा
'उपेक्षित के आँखि से कन्यादान पढ़ल जाय' — जे नारीवादी पुनर्पाठ के दृष्टि से संग्रह के सबसे चुनौतीपूर्ण अध्याय मानल गेल — ओहू में प्रश्न-शृंखला के अनुत्तरता एकगो सीमा हय। "एकर उत्तरदायी के?" बेर-बेर पूछल गेल, मुदा लेखक अपन निर्णय सप्रमाण न देलथिन — उपेक्षित के आँखि से पढ़े के जे प्रतिज्ञा हल, ओ अन्त में प्रश्नवाचक मुद्रा में स्थगित हो गेल। कन्यादान के हास्य-रस के पक्ष — जे कृति के लोकप्रियता के मूलाधार हय — के रस-शास्त्रीय परीक्षा न भेल, आ कतोक ठाम पुनर्पाठ अभियोग-पत्र बन जाय हय। तहिने, यात्री के भाषा सम्बन्धी अध्याय में चारो शैलीविज्ञानिक उपकरण पश्चिमी स्रोत से आनल गेल हय, आ भारतीय काव्यशास्त्र से संगति-स्थापन संकेत-मात्र रह गेल — कुन्तक के छह वक्रता-भेद से चयन-विचलन के व्यवस्थित मिलान भेल रहितय त पूर्व-पश्चिम-सेतु पूरा बनितय, ओ अवसर छूट गेल।
अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह आ मनमोहन झा सम्बन्धी सीमा
लक्ष्मीपति सिंह पर लिखल अध्याय में लेखक खुद स्वीकार करै हथिन कि छितरायल कविता में से "किछु मात्रे झोड़ि" सकलथिन — ई ईमानदार स्वीकारोक्ति प्रशंसनीय हय, मुदा एकर परिणाम ई हय कि निष्कर्ष सब सीमित नमूना पर ठाढ़ हय आ सामान्यीकरण के वैधता संदिग्ध रहै हय। कतोक प्राकृतिक प्रतीक के प्रत्यक्ष राजनीतिक रूपक मानल गेल हय, मुदा प्रतीक के ई अर्थ कविता के आन्तरिक संरचना आ आन कविता के साक्ष्य से सब ठाम पुष्ट न हय। मनमोहन झा सम्बन्धी अध्याय संग्रह के लघुतम अध्याय हय, आ एकर लघुते एकर मुख्य सीमा हय — "अनालोचित पक्ष" के घोषणा भेल, मुदा विश्लेषण कथा-सार के स्तर पर रह गेल; निधन के दसम दिन लिखल जाए के कारण श्रद्धांजलि के आर्द्र स्वर आलोचना के तटस्थता पर भारी हय।
समग्र रूप में, 'हिआओल' के समीक्षक खुद अन्त में लिखै हथिन — "समानान्तर धारा के पूर्ण पद्धति उहाँ पहुँचै हय जहाँ हाशिया के स्वर अपने बाजय — 'हिआओल' में हाशिया खातिर बाजल गेल हय, हाशिया के बजावल कम गेल हय।" ई एकगो वाक्य समस्त संग्रह के सीमा के संक्षेप में समेट दे हय।
तेसर खण्ड : व्यक्तित्व-कृतित्व आ संस्थागत मूल्यांकन से जुड़ल सीमा
समर्पण आ परिणाम के बीच के खाधि
प्रवीण कुमार झा के आलेख (रचना १५) ई विशेषांक के सबसे बेबाक स्वर हय। दीर्घ प्रशंसा के बाद "मुदा मुदा मुदा!" कहके ओ साफ लिखै हथिन — "एक होय हय योगदान आ दोसर होय हय वृहद योगदान।" चेतना समिति आ मैथिली लेखक संघ जइसन संस्था में एतना दिन तक महत्त्वपूर्ण पद पर, व्यापक बौद्धिक क्षमता के संग रहितो, मैथिली के संविधान के अष्टम अनुसूची में रखे के संघर्ष में रमण जी के कोनो निर्णायक भूमिका साफ रूप में सोझा न आवै हय; चेतना समिति जइसन संगठन में रहितो मैथिली-शिक्षा के क्षेत्र में भी कोनो एहन बड़ परिणाम सोझा न आवै हय, जेकरा हुनकर नेतृत्व के प्रत्यक्ष परिणाम कहल जा सकय। लेखक साफ करै हथिन कि प्रश्न समर्पण पर न, बल्कि ओ समर्पण के परिणाम पर हय — केओ केतना समय देलथिन आ केतना मेहनत कैलथिन, ई एकगो पक्ष हय, मुदा ओ मेहनत से भाषा, शिक्षा, साहित्यकार आ समाज के की ठोस उपलब्धि भेटल, ई दोसर आ बेसी महत्त्वपूर्ण पक्ष हय। ई आलेख में चेतना समिति के संग रहके पुस्तक-साहित्य के संवर्धन आ संस्थागत गतिविधि के लेके रमण जी के कार्यकाल से सम्बन्धित किछु विवाद-आरोप, आ सरकार-सत्ताप्रतिष्ठान के संग संघर्ष के बदला कूटनीतिक संवाद के बेसी महत्त्व देवे के आलोचना भी चर्चा में रहल हय — यद्यपि लेखक खुद ई भी जोड़ै हथिन कि ई आरोप के अन्तिम सत्य माने से पहिने स्वतंत्र जाँच जरूरी हय।
मौनता के व्यंग्य
डा. धनाकर ठाकुर के आलेख (रचना ११) शैली में व्यंग्य-प्रधान हय, मुदा ओकर भीतर एकगो तीक्ष्ण संकेत छिपल हय। रमण जी के चेतना समिति के "गुरु द्रोणाचार्य" कहके, लेखक मिथिला राज्य के प्रश्न पर चेतना समिति — आ एही से रमण जी — के मौनता के द्रोणाचार्य के ओ प्रसंग से तुलना करै हथिन जहाँ गुरु आँखि मुनके रह गेलथिन। "मिथिला राज्य के बात त चेतना समिति खातिर सांढ़ के लाल कपड़ा" — ई पंक्ति साफ कहै हय कि संस्था आ ओकर प्रमुख साहित्यिक स्तम्भ राजनीतिक रूप से संवेदनशील प्रश्न पर मौन रहे के प्राथमिकता दे हथिन।
निष्पक्षता के प्रश्न आ पंजीकरण के अपूर्णता
डॉ. कैलाश कुमार मिश्र के आलेख (रचना १२) में उद्धृत राजलीन ठाकुर के मन्तव्य साफ हय — "रमण जी हुनकर प्रिय लोक आ नीक समीक्षक दुनो, मुदा एकगो दोष कि ओ आन लोक के अपेक्षा सीमित समाज के कार्य के बेसी उजागर करै हथिन, ओ ठाम ओ निरपेक्ष न रहि पावै हथिन।" नबोनारायण मिश्र के संस्मरणपरक आलेख (रचना १३) में भी साहित्यकार-पंजीकरण के जे सूची देल गेल हय, ओ में बाबूसाहेब चौधरी जइसन आन्दोलनकारी-नाटककार के नाम शामिल न होए के ओर संकेत हय, जे रमण जी के पंजीकरण-कार्य के चयनात्मकता पर एकगो मौन प्रश्नचिह्न हय।
चारिम खण्ड : संपादकीय-शैलीगत सीमा आ पाठकीय असहमति
पद्धतिगत अनुशासनहीनता के स्वीकृति
कुमार राहुल के आलेख (रचना ६) ई दिशा में सबसे प्रत्यक्ष हय। "हम हुनकर सीमा के त रेखांकित कर सकै हिअइ" कहके ओ साफ लिखै हथिन कि रमण जी समालोचना में विद्वान आलोचक के कोनो बान्हल-छेकल नियम के पालन करै न देखाय हथिन, बल्कि कोनो एकेगो तत्त्व से प्रभावित होके अपन निर्णय दे दे हथिन। किछु ठाम टिपाउट जइसन रमण जी कोनो रचना अथवा रचनाकार पर कम शब्द में काज चला ले हथिन आ अपन बात बेसी लिखै हथिन। हडसन के ओ मत उद्धृत करै — कि आलोचना के काज मात्र कृति के उचित-अनुचित देखब न, बल्कि निश्चित मानदंड स्थापित करब हय — लेखक ई स्वीकार करै हथिन कि रमण जी के कतोक आलेख ई सैद्धान्तिक कसौटी पर पूरा न उतरै हय।
सम्पादकीय कार्य के असमानता
प्रदीप बिहारी के आलेख (रचना १४) एक ठाम साफ कहै हय कि 'घर-बाहर' पत्रिका के सम्पादन में ओ कौशल न झलकै हय, जे रमण जी के विवेचनात्मक-अनुसंधानात्मक पोथी में देखाय हय। भूमिका आ संपादकीय लेखन में "कोनो लेखक के ई दुनो लेखन में केतना बेरायल होमक चाही, ओ रमण जी बेसी ठाम देखाय हथिन, सब ठाम न। किछु ठाम एकभगाह भेल हथिन।" संगे एहो बात के उल्लेख हय कि हुनकर साहित्यिक सेवा खातिर हुनका प्रशंसा जेतना होय हय, आलोचना आ खिधांस भी होय हय, मुदा ई पर ओ केतना गंभीरतापूर्वक विचार करै हथिन, ओ हुनकर चेहरा के भाव से बुझल न जा सकै हय।
तथ्यगत आ व्याख्यागत असहमति
कीर्तिनाथ झा के 'विवर्त'-समीक्षा (रचना १०) में एक ठाम साफ असहमति दर्ज हय — जब रमण जी मैथिली पत्र-पत्रिका के स्वाधीनता-आन्दोलन के प्रति "पूर्ण संवेदनशील आ उत्तरदायित्वपूर्ण" कहै हथिन, तब समीक्षक टिप्पणी करै हथिन — "मुदा, ई विचार ई विषय पर सर्वसम्मत हय वा न, कहब कठिन।" अजित कुमार झा के आलेख (रचना ५) में 'कन्यादान' पर रमण जी के पुनर्पाठ से आओर साफ असहमति व्यक्त हय — समीक्षक के तर्क एकाङ्गी बुझाबै हय, आ रमण जी द्वारा हरिमोहन झा के पाठक के जे तीन श्रेणी कैल गेल, ओ में एक चतुर्थ वर्ग (जे रमण जी के अपन साहित्य के मिथिला-संस्कृति पर आघात बुझै हथिन) के चर्चा न भेल — "रमण जी अपन आलेख में चारिम श्रेणी के चर्चा न कैलथिन हय।" हितनाथ झा के आलेख (रचना १७) में भी एक साफ असहमति हय — रमण जी अपन बीज-भाषण संग्रह के प्रस्तावना में साहित्यिक राजनीति पर जे चोट कैल हथिन, ओकरा खातिर समीक्षक लिखै हथिन — "ई मंच हल आ ई जे तरह के पोथी हय, ओ खातिर हमरा जनैत उपयुक्त न... प्रहार से पहिने सुधार के भी गुंजाइस होवे के चाही।"
आशीष अनचिन्हार के नजर में रमानन्द झा ‘रमण’ के आलोचनात्मक इतिहास-लेखन के कमी सभ
आशीष अनचिन्हार के आलेख के मूल बात ई हय कि साहित्य के इतिहास लिखब खाली पोथी जमा करब, नाम गिनब आ बाद में छपल किताब के शुरुआत मान लेब नै हय। इतिहासकार के लगे “इतिहासबोध” होए के चाही—घटना, पहिल प्रकाशन, पहिल प्रयोग, असर, स्रोत आ श्रेय के क्रम ठीक ढंग से बुझल जाय। एही कसौटी पर ऊ खास करके धर्मेन्द्र विह्वल के “व्योमक ओहिपार” पर रमानन्द झा ‘रमण’ के लिखल भूमिका में कई कमी देख रहल हय।
1. इतिहासबोध के कमी
अनचिन्हार के सबसँ बड़ा आपत्ति ई हय कि रमण जी ई प्रसंग में इतिहासबोध बिसर गेलन। कोनो विधा के पहिल प्रकाशन, शुरुआती प्रयोग, नियम के चर्चा आ बाद में एकछाहा किताब बनब—ई सभ अलग-अलग पड़ाव हय। बाद के किताब के आधार बना के पहिलका पड़ाव के ओझरा देब इतिहास के क्रम बिगाड़े वाला बात हय।
2. विधा के शुरुआत तय करे के मापदण्ड में असंगति
अनचिन्हार कहैत हय कि कोनो विधा के शुरुआत ओकर पहिल प्रमाणित प्रकाशन से मानल जाय—पत्रिका में हो चाहे पोथी में। जदि एक लेखक लेल “पहिल किताब” नियम बनल आ दोसर लेल “पहिल प्रकाशन”, त इतिहास में दू तरह के कसौटी भऽ गेल। रमण जी के भूमिका ई फर्क के साफ नै कर पावत हय—अनचिन्हार के आपत्ति ई हय।
3. पहिलका प्रकाशन आ प्रयोग के अनदेखी
अनचिन्हार 2009 में प्रकाशित गजेन्द्र ठाकुर के “कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक” पोथी के “मैथिली हाइकू हैकू क्षणिका” आलेख के जिक्र करैत हय, जेमे टंका, शेनर्यू, हैबून, हैगा, वाका आदि पर चर्चा भेल बताओल गेल हय। ऊ विदेह के फेसबुक समूह पर लगभग 2012 तक ई विधा सभ सिखाओल जाय आ कई रचनाकार जुड़ल रहय—ई बातो रखैत हय। ओकर नजर में रमण जी के भूमिका में ई पहिलका सार्वजनिक इतिहास के उचित जगह नै मिलल।
4. स्रोत-सन्दर्भ के अभाव
अनचिन्हार के आरोप हय कि रमण जी टंका आदि के नियम बतबैत हय, लेकिन पहिलका मैथिली स्रोत के रेफरेंस नै देत हय। आलोचना वा इतिहास में खाली बात कह देब काफी नै हय; स्रोत, तारीख, पहिल प्रयोग आ प्रमाण देब जरूरी हय। ई जगह पर भूमिका के विद्वतापूर्ण आधार कमजोर देखल जाय हय।
5. श्रेय-निर्धारण में गड़बड़ी
अनचिन्हार के पढ़ाई में भूमिका से एहन असर बनत हय जइसे धर्मेन्द्र विह्वल टंका, शेनर्यू, हैबून, हैगा, वाका आदि मैथिली में अनलन। अनचिन्हार एकरा ऐतिहासिक रूप से गलत प्रभाव मानैत हय, काहे कि ओकर अनुसार ई विधा सभ पर चर्चा आ रचना-प्रयोग पहिने भऽ चुकल रहल। “के पहिने परिचय देलक”, “के पहिल एकछाहा पोथी देलक”, “के लोकप्रिय बनैलक”—ई सभ श्रेय अलग-अलग लिखल जाय के चाही।
6. “पहिल किताब” आ “विधा के पहिल उपस्थिति” के भेद साफ नै
आलेख के परिशिष्ट में देल फेसबुक बातचीत के अनचिन्हार अपन तर्क के सहायक सामग्री बनबैत हय। ओकर आशय ई हय कि धर्मेन्द्र विह्वल अपन पोथी के एहि विधा के पहिल पुस्तकाकार/एकछाहा कृति कहैत हय, मुदा ई नै कहैत हय कि मैथिली में ई विधा हुनका से पहिने नै रहल। अनचिन्हार के नजर में रमण जी के भूमिका ई जरूरी भेद के साफ रूप से स्थापित नै कर सकल।
7. निजी वा वैचारिक असहमति के असर के आरोप
अनचिन्हार ई आरोपो लगबैत हय कि गजेन्द्र ठाकुर से वैचारिक असहमति वा तामस के कारण हुनकर नाम आ योगदान के छोड़ी देल गेल। ई गम्भीर आरोप हय; अनचिन्हार के हिसाब से इतिहासकार के निजी पसन्द-नापसन्द से ऊपर उठके जेकर श्रेय हय ओकरा प्रमाण के आधार पर जगह देब जरूरी हय।
8. विरोधी प्रमाण के सामना नै करब
अनचिन्हार कहैत हय कि जदि गजेन्द्र ठाकुर से पहिने मैथिली में टंका, शेनर्यू, हैबून, हैगा, वाका रहल आ ओकर नियम पर चर्चा भेल, त ओकर प्रमाण सामने आनल जाय। माने, इतिहास में केवल नाम छोड़ देब से बात सिद्ध नै होइत हय; वैकल्पिक दाबी के दस्तावेजी प्रमाण से जाँचल जाय के चाही।
9. भूमिका-लेखक के स्रोत-जाँच अधूरा
जखन कोनो भूमिका में विधा के इतिहास आ नियम पर दावा कैल जाय, त लेखक के पुरान प्रकाशन, तारीख, रचनाकार, सार्वजनिक पोस्ट आ उपलब्ध पोथी सभ देखे के जिम्मेदारी बढ़ जाइत हय। अनचिन्हार के नजर में रमण जी ई जाँच में पूरा सावधानी नै बरतलन, एह से भूमिका के ऐतिहासिक विश्वसनीयता कमजोर होइत हय।
10. इतिहास-सुधार के जरूरत
अनचिन्हार के अन्तिम आग्रह ई हय कि जदि पहिलका प्रमाण उपलब्ध हय त ओकरा सामने लाओल जाय, आ जदि पूर्ववर्ती योगदान सिद्ध हय त ओकर नाम आ श्रेय ठीक जगह पर पुनः रखल जाय। ओकरा हिसाब से समाधान सही स्रोत, साफ कालक्रम आ निष्पक्ष श्रेय-बँटवारा में हय।
निष्कर्ष: अनचिन्हार रमानन्द झा ‘रमण’ के समूचा साहित्य के आलोचना नै कर रहल हय। ओकर आपत्ति खास करके एहि भूमिका में इतिहासबोध, स्रोत-सन्दर्भ, कालक्रम आ श्रेय-निर्धारण पर हय। ओकर आरोप के सार ई हय कि मैथिली में जापानी काव्य-विधा सभ के पहिलका इतिहास के पूरा जगह नै मिलल आ “पहिल पुस्तक” आ “विधा के पहिल आगमन” के फर्क धुँधला भऽ गेल। एही कारण ऊ एहि लेखन के इतिहासिक रूप से अधूरा आ सुधार योग्य मानैत हय।
उपसंहार
ई सब सीमा के एकठाम रखला बाद एकगो साझा सूत्र साफ होय हय। रमण जी के कार्य मात्रात्मक रूप से विपुल, अभिलेखीय दृष्टि से अमूल्य, आ मातृभाषा-प्रेम से प्रेरित हय — ई पर विशेषांक के कोनो योगदानकर्ता प्रश्न न उठावै हथिन। मुदा जब ओ कार्य के सैद्धान्तिक अनुशासन, स्रोत-प्रामाणिकता, पूर्ण निष्पक्षता आ संस्थागत परिणाम के कठोर कसौटी पर कसल जाय हय, तब ओ पर्याप्त गुंजाइस छोड़ दे हय — पाठ बिना समीक्षा के जोखिम, मूल्य-मानदण्ड के अस्थिरता, आत्मीयता-जनित प्रशंसा के अतिरेक, हाशिया के अल्प उपस्थिति, संस्थागत मौनता आ चयनात्मक निष्पक्षता — ई सब बिन्दु आगामी अनुसन्धान के निमन्त्रण हय, दण्ड न। 'हिआओल' के समीक्षक खुद जे कहलथिन, ओ ई समस्त विशेषांक पर भी लागू होय हय — "एकर श्रेष्ठता उहाँ हय जहाँ लेखक अभिलेख खोजै हथिन, प्रचलित भूल सुधारै हथिन, विस्मृत लेखक के फेर उपस्थित करै हथिन... एकर सीमा उहाँ हय जहाँ अनुमान प्रमाण के स्थान ले हय, जीवनी कृति के विश्लेषण पर भारी पड़ै हय।" रमण जी के अपने शब्द में कही त — "वादे वादे जायते तत्त्वबोधः" — ई विवाद आ प्रतिवाद से होए वाला तत्त्व-बोधे ई विशेषांक के असली उपलब्धि हय।
रमानन्द झा 'रमण' : कृतित्व के सीमा-रेखा पर एकगो संपादकीय दृष्टि
रमण जी के मैथिली साहित्य में जे स्थान हय, ओ ई सतरहो रचना से निर्विवाद बुझाय हय — मुदा ई विशेषांक के सार्थकता तबे पूरा होयत जब प्रशंसा के संगे-संग ओ सीमा भी चिन्हित होय जे खुद योगदानकर्ता सब (आ रमण जी के अपन आलोचना-पद्धति) रेखांकित करै हथिन।
१. आलोचना-पद्धति के सबसे मौलिक सीमा — पाठ बिना समीक्षा
'अखियासल' पर आएल विस्तृत समीक्षा में (रचना ४) ई तथ्य साफ उजागर भेल हय कि रमण जी प्रायः जे रचना के आलोचित करै हथिन, ओकर मूल पाठ हुनका लग उपलब्धे न रहै हय — 'चन्द्रप्रभा', त्रिलोचन झा, यदुवर, बिसरल जनार्दन झा — सब ठाम समीक्षक खुद 'अनुपलब्धता' स्वीकार करै हथिन। जब मूल कृतिए समीक्षक के भेटले न, त ओकर सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्याङ्कन कोन आधार पर सम्भव, ई प्रश्न अनुत्तरित रह जाय हय। बहुतो ठाम समीक्षा जयकान्त मिश्र के इतिहास वा आन द्वितीयक स्रोत पर आश्रित हो जाय हय।
२. मूल्य-मानदण्ड के अस्थिरता
ई दुनो पोथी के समीक्षा में (रचना ४ आ १६) बेर-बेर देखावल गेल हय कि रमण जी एक निबन्ध में जे गुण के सर्वोच्च मानै हथिन, दोसर में ओकरे विपरीत के प्रशंसित करै हथिन — जइसन गंगानन्द सिंह, चन्द्रग्रहण आदि में समसामयिक यथार्थ-सम्पृक्ति के गुण मानब, मुदा व्यास के कथा के ठीक ओही कारण से प्रशंसा करब कि ओ समसामयिक यथार्थ से अप्रभावित रहल। ई तरह के आत्मविरोध देखाबै हय कि कोनो एकगो घोषित सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता न हय — समीक्षा कखनियो प्रभाववादी, कखनियो समाजशास्त्रीय, कखनियो जीवनीमूलक हो जाय हय।
३. आत्मीयता आ आलोचनात्मक दूरी के अभाव
लक्ष्मीपति सिंह, मोहन, राजेश्वर झा जइसन अध्याय में व्यक्तिगत स्नेह समीक्षा के संस्मरणात्मक श्रद्धांजलि के रूप दे दे हय, जे से वस्तुनिष्ठता प्रभावित होय हय। एकर ठीक उलट हरिमोहन झा पर जे आलोचनात्मक साहस देखावल गेल, ओ समस्त संग्रह में समान रूप से न हय।
४. सैद्धान्तिक शब्दावली के अनुपस्थिति
रस, ध्वनि, व्यञ्जना आदि भारतीय काव्यशास्त्रीय तत्त्व अन्तर्निहित रूप में त हय, मुदा आनन्दवर्धन, कुन्तक, क्षेमेन्द्र आदि के व्यवस्थित सैद्धान्तिक प्रयोग न भेटै हय। पाश्चात्य सिद्धान्त के भी सुविचारित प्रयोग न हय। ई समीक्षा के सुपाठ्य त बनावै हय, मुदा अकादमिक गहनता के अभाव पैदा करै हय।
५. परिप्रेक्ष्य के संकीर्णता — स्त्री आ हाशिया के अल्प उपस्थिति
'अखियासल' के पचीस में चौबीस पुरुष-रचनाकार, मात्र एक स्त्री (हरिलता) — ओहू में विवेचन वैष्णव भक्ति तक सीमित। मिथिला के दलित, अतिपिछड़ा आ मौखिक-परम्परा के अनाम रचयिता ई समान्तर इतिहास से प्रायः अनुपस्थित रह जाय हथिन। कुमार राहुल के आलेख (रचना ६) में भी ई कहल गेल कि रमण जी कोनो बान्हल सैद्धान्तिक नियम के पालन करै न देखाय हथिन, बल्कि एके तत्त्व से प्रभावित होके अपन निर्णय दे दे हथिन, आ किछु ठाम टिपाउट जइसन कम शब्द में रचनाकार के काज चला ले हथिन आ अपन बात बेसी लिख दे हथिन।
६. संकलनात्मक असंगति
पचीसो निबन्ध अलग-अलग काल में, अलग-अलग पत्रिका खातिर स्वतंत्र रूप में लिखल गेल हल — एकठाम रखके 'ग्रन्थ' बना देला से कोनो एकसमान सैद्धान्तिक ढाँचा न बचल। भूमिका, पद्धति-कथन आ उपसंहार के अभाव ई जोड़ा-जाड़ी प्रकृति के उघार दे हय — ई बात 'हिआओल' पर भी लागू होय हय, जहाँ एक-एक अध्याय के विस्तार, पद्धति आ गहराई असमान हय।
७. व्यक्तिगत समर्पण आ संस्थागत परिणाम के बीच के खाधि
प्रवीण कुमार झा के आलेख (रचना १५) ई विशेषांक के सबसे बेबाक स्वर हय। "मुदा मुदा मुदा!" कहके ओ साफ लिखै हथिन कि चेतना समिति आ मैथिली लेखक संघ जइसन संस्था में एतना दिन तक महत्त्वपूर्ण पद पर रहितो मैथिली के संविधान के अष्टम अनुसूची में रखे के संघर्ष में, मैथिली-शिक्षा के क्षेत्र में रमण जी के कोनो निर्णायक, ठोस परिणाम साफ रूप में सोझा न आवै हय — समर्पण पर प्रश्न न, परिणाम पर प्रश्न। ई आलेख में चेतना समिति के कार्यकाल से जुड़ल किछु विवाद-आरोप आ सत्ता-प्रतिष्ठान के संग कूटनीतिक सम्बन्ध के प्राथमिकता देवे के आलोचना भी चर्चा में रहल हय। डा. धनाकर ठाकुर के व्यंग्य-प्रधान आलेख (रचना ११) ई दिशा के आओर तीक्ष्ण करै मिथिला राज्य के प्रश्न पर रमण जी आ चेतना समिति के मौनता के द्रोणाचार्य के 'आँखि मुनके रहब' से तुलना करै हय।
८. निष्पक्षता के प्रश्न
डॉ. कैलाश कुमार मिश्र के आलेख (रचना १२) में उद्धृत राजलीन ठाकुर के मन्तव्य साफ हय — "रमण जी हुनकर प्रिय लोक आ नीक समीक्षक दुनो, मुदा एकगो दोष कि ओ आन लोक के अपेक्षा सीमित समाज के कार्य के बेसी उजागर करै हथिन, ओ ठाम ओ निरपेक्ष न रहि पावै हथिन।" नबोनारायण मिश्र के आलेख (रचना १३) में भी साहित्यकार-पंजीकरण के सूची से बाबूसाहेब चौधरी जइसन आन्दोलनकारी-नाटककार के अनुपस्थिति के ओर संकेत हय।
९. संपादकीय काज के असमानता
प्रदीप बिहारी के आलेख (रचना १४) एक ठाम साफ कहै हय कि 'घर-बाहर' पत्रिका के सम्पादन में ओ कौशल न झलकै हय जे विवेचनात्मक-अनुसंधानात्मक पोथी में देखाय हय — भूमिका आ संपादकीय लेखन में जेतना वैचारिक त्वरा चाही, ओ सब ठाम समान न। कीर्तिनाथ झा के 'विवर्त'-समीक्षा (रचना १०) में भी एक ठाम असहमति दर्ज हय — "ई विचार सर्वसम्मत हय वा न, कहब कठिन" — जब रमण जी मैथिली पत्र-पत्रिका के स्वाधीनता-आन्दोलन के प्रति "पूर्ण संवेदनशील आ उत्तरदायित्वपूर्ण" कहै हथिन।
१०. पाठकीय असहमति
अजित कुमार झा के आलेख (रचना ५) में 'कन्यादान' पर रमण जी के पुनर्पाठ से साफ असहमति व्यक्त हय — समीक्षक के तर्क एकाङ्गी बुझाबै हय, आ रमण जी द्वारा हरिमोहन झा के पाठक के जे तीन श्रेणी कैल गेल, ओ में एक चतुर्थ वर्ग (जे रमण जी के अपन साहित्य के मिथिला-संस्कृति पर आघात बुझै हथिन) के चर्चा न भेल।
संगति — ई सब सीमा एकगो साझा सूत्र से बान्हल हय : रमण जी के कार्य मात्रात्मक रूप से विपुल, अभिलेखीय दृष्टि से अमूल्य, आ मातृभाषा-प्रेम से प्रेरित हय, मुदा सैद्धान्तिक अनुशासन, स्रोत-प्रामाणिकता, पूर्ण निष्पक्षता आ संस्थागत परिणाम के स्तर पर ओ आगू बढ़े के गुंजाइस छोड़ दे हय — जेकरा खुद हुनकरे शब्द में कही त "वादे वादे जायते तत्त्वबोधः"।
२.१. रमानन्द झा ’रमण’ विशेषांकक संदर्भमे
रमानन्द झा ’रमण’ विशेषांकक संदर्भमे
एहि ठाम विदेह विशेषांक केर इतिहास, चयन प्रक्रिया, वर्तमान विशेषांक केर प्रारूप, प्रकाशित विशेषांक केर सूची, ओ घोषणा जकरा हम सभ पूरा नहि कऽ सकलहुँ तकर सूची, विदेहक विशेषांक, सामान्य अंक अथवा विदेहसँ संबंधित कोनो PDF पढ़बाक सही तरीका संगे विशेषांक एवं घोषणासँ जुड़ल छोट-छोट सूचना पाठक लग दैत छी।
1
2008 सँ एखन धरि विदेह http://videha.co.in/ द्वारा जे विशेषांक सभ आएल अछि तकरा तीन चरणमे बाँटि सकैत छी।
पहिल चरण 2008सँ जनवरी 2015 धरि जाहिमे विषय आधारित विशेषांक सभ प्रकाशित भेल आ मधुपजीपर सेहो विशेषांक प्रकाशित भेल। एकदम प्रारंभिक विशेषांक सभमे "विशेषांक" नाम नहि लीखल गेल छै मुदा ओहिमे ओहन रचनाक बेसी स्थान देल गेल छै सायास रूपें (क्रम-1 सँ 12 केर अधिकांश)।
दोसर चरण भेल फरवरी 2015 सँ लऽ कऽ एखन धरि जाहिमे मात्र जीवित लेखकपर विशेषांक प्रकाशित करबाक निर्णय लेल गेल आ इम्हर पछिला बर्ख एहिमे संस्था आ पत्र-पत्रिकापर विशेषांक प्रकाशित करबाक सेहो निर्णय लेल गेल (क्रम-13, 14 एवं 20 सँ लऽ एखन धरिक 38म प्रस्तुत विशेषांक)। जीवैत लेखकपर विशेषांक विभिन्न नामसँ होइत आब "विदेहक जीवित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकपर विशेषांक शृंखला" नामसँ जानल जाइत अछि। मैथिलकर्मीसँ हमर सभहक आशय जिनकर काज मिथिला-मैथिली-मैथिली लेल कोनो माध्यमसँ भेल हो। ओ संगठनकर्ता सेहो भऽ सकै छथि, आन भाषाक लेखक सेहो। तहिना संगीतकर्मी मने गीत-संगीतसँ जुड़ल लोक।
तेसर चरण भेल विदेहक संपादक द्वारा "नित नवल सिरीज" प्रकाशित करबाक (विवरण आगू देल गेल अछि)।
विदेह विशेषांकमे औसत दसे टा (10 टा) आलोचना-समीक्षा मानि लेल जाए तऽ 38 टा विशेषांकमे 380 आलोचना-समीक्षा भेल। संगहि एकै टा (1 टा) आलोचना-समीक्षा केर औसत विदेहक सामान्य अंकमे प्रकाशित मानि लेल जाए एवं दूनूकेँ जोड़ि देल जाए तऽ एखन धरि लगभग 750 आलोचना-समीक्षा प्रकाशित भेलै (वास्तविक संख्या एहिसँ बेसी हेतै)। मिथिला मिहिरक बाद अहाँ सभहक नजरिमे आर कोन एहन पत्रिका अछि जे आन विधाक रचनाक अतिरिक्त 750 टा आलोचना-समीक्षा प्रकाशित केने हो? संगहि जे पाठक ओ शोधार्थी लेल बिना कोनो मूल्य, बिना कोनो बाधाकेँ सार्वजनिक रूपे 24x7x365 आधारपर उपल्बध हो?
पाठक लेल विदेहक हरेक विशेषांक वा नित नवल सिरीज पाँच स्तर, पाँच स्वाद रखने अछि (पाँचम स्वाद सभसँ विरल अछि)- 1) पत्रिका विशेषांक केर स्वाद, 2) आलोचनात्मक पोथीक स्वाद, 3) शोध ग्रंथक स्वाद, 4) साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित मोनोग्राफ केर स्वाद, 5) जँ विदेहक विशेषांकमे कोनो एहन रचनाकार चयनित होइत छथि जिनकर पति वा पत्नी सेहो रचनाकार छथिन तँ विदेह अपन विशेषांकमे दूनूकेँ मूल्यांकन करैत अछि। उदाहरण लेल विदेहक लक्ष्मण झा 'सागर' विशेषांक , नरेन्द्र झा विशेषांक आ शिवशंकर श्रीनिवास विशेषांक देखल जा सकैए। विदेह अपन अंक लेल सागरजी, नरेन्द्र झा एवं शिवशंकर श्रीनिवासक चयन केने छल मुदा सागरजीक पत्नी शैल झा 'सागर' सेहो रचनाकार छथिन तँ लक्ष्मण जी बला विशेषांकमे शैलजीक रचनाकर्मपर सेहो विचार भेल, नरेन्द्र झाजीक पत्नी पन्ना झा कथाकार से नरेन्द्र झा विशेषांकमे पन्नाजीक रचनाकर्मपर सेहो विचार भेल आ तेनाहिते श्रीनिवासजीक पत्नी मीनू मधु सेहो रचनाकार छथिन तँइ हुनको रचनाकर्मपर विचार भेलै। ई विचार वा घटना संपूर्ण मैथिली साहित्यमे नहि भेल छल हमरा जनैत, से मात्र विदेह द्वारा संभव भेल। जँ हम गलत होइ तऽ सूचित करी हम अपन ज्ञानकेँ सुधारि लेब। साहित्य अकादमीक कथित मोनोग्राफ तँ आइ धरि बहुतो लेखकपर प्रकाशित नहि भऽ सकल अछि। एहन परिस्थितिमे विदेह एकटा नव बाट बना कऽ मैथिली लगमे राखि देने अछि। पाठक चाहथि तँ एहि विशेषांक सभमेसँ आनो स्वाद ताकि सकै छथि।
मैथिलीमे जे लोक सभ विश्वविद्यालयसँ जुड़ल छथि आ कि ओहनो लोक जे सभ प्रोफेसर सभहक संगतिमे छथि ताहिमे किछु लोकक मूँहे ईहो सुनबा लेल भेटल जे जिनका-जिनकापर विदेह विशेषांक प्रकाशित भऽ चुकल अछि ताहिमेसँ अधिकांशपर विश्वविद्यालय सभमे शोध हेबाक लेल पंजीयन भऽ रहल छै। हमरा लेल ई समाद बहुत पहिनेसँ सूनल मानू। वास्तविकता ई छै जे विदेह विशेषांकमे जते सूचना रहैत छै ततेमे ओही एक लेखकपर एकै समयमे कमसँ कम 15-20 दृष्टिकोणसँ शोध भऽ सकैत छै। खएर मैथिलीमे विश्विद्यालयक शोध जेहन होइत छै, जेहन प्रोफेसर आ शोधार्थी सभ होइत छै ताहिमे हम सभ मानि बैसल छी जे विदेह विशेषांक एहिना सार्वजनिक होइत रहत आ शोधार्थी सभ बिना अनुमति, बिना क्रेडिट देने चोरा कऽ कथित शोध करैत रहता।
जँ अहाँ अइ विशेषांक केर PDF पढ़ि रहल छी तँ कोनो शब्द वा पाँति अंडरलाइनमे वा बिना अंडरलाइनकेँ नीला वा कोनो रंगक (कारी रंग छोड़ि) देखाए तँ बुझि लिअ जे ओहिमे लिंक देल गेल छै रेफरेंस लेल आ तकरा क्लिक करबै तँ ओ लिंक खुजि जाएत। कोनो-कोनो फोटोमे सेहो लिंक देल गेल छै। पाठक एहि माध्यमसँ कम समयमे रेफरेंस सभहक अध्य्यन कऽ सकै छथि। मुदा प्रिंटमे प्रकाशित पोथीमे ई सुविधा नै रहत। अइ कारणसँ भऽ सकैए जे पाठककेँ एहि पोथीक किछु पाँति प्रचलित नै बुझेतनि। जाहि ठाम लिंक देल गेल छै ताहि ठामक पाँतिक किछु शब्दक बीच बेसी स्थान छूटल छै। ओकरा एक पाँति बना पढ़ी से आग्रह। हम चाहितहुँ तँ सभ लिंक वा चित्रकेँ एकठाम दऽ सकै छलहुँ मुदा हमर सोच अछि जे पाठककेँ एकै ठाम तर्क आ सबूत भेटनि। एकटा आर बात ई जरूरी नहि छै जे एक लेखक लेल हम एकैटा लिंक प्रयोग करी। ओहन लेखक जिनका बारेमे बहुत रास लिंक छै गूगलपर हुनकर नाम जखन एक बेरसँ बेसी अबैत अछि तँ हमर प्रयास रहैए जे हुनकर नाम सभमे अलग-अलग लिंक लगा दी। तँइ पाठक जखन एकै नामक बहुत रास लिंक देखथि तँ ई मानि लेथि जे हुनका लग रेफरेंसक भंडार पहुँचल छनि।
विदेहक विशेषांक सभ लेल हम ओहनो लोक सभ लग आलेख लेल जाइत छी, हुनका सूचना दैत छी जे कि हमर (आशीष अनचिन्हार), विदेह या गजेन्द्र ठाकुरक धुर विरोधी छथि। दू-चारि लोक कहि सकै छथि जे हमरा सूचना नहि भेटल, तऽ हुनकासँ हमर आग्रह जे कमसँ कम ओ अपन ह्वाटसएप आ फेसबुक केर मैसेज बॅाक्स (इनबॅाक्स) देखथि। हमर एहि प्रयासक प्रतिफल विदेहक आन विशेषांक संगे एहूमे देखाइ पड़त से उम्मेद अछि।
16 अगस्त 2025 केँ विदेह रमानंद झा 'रमण' जीक ऊपर एकटा विशेषांक प्रकाशित करबाक सार्वजनिक घोषणा केलक। एहि सूचनाकेँ एहि लिंकपर देखि सकैत छी-घोषणा।
विविध विषयपर विशेषांकक बाद 2015 मे विदेहक संपादक लग आशीष अनचिन्हार द्वारा जीवित लेखकपर विशेषांक निकालबाक प्रस्ताव राखल गेल आ संपादकक सहमतिक बाद ई एखन धरि एकटा नमहर रस्ता बना चुकल अछि।
ई विचार ओहि समयमे एकटा नवाचार छल। नवाचार किएक से एना बूझू।
मैथिलीमे एखनो धरि अधिकांश पत्रिका द्वारा कोनो लेखक वा आन कोनो लोकक विशेषांक हुनक मृत्युक बादे प्रकाशित करैत अछि। ओना एक-दू पत्रिका द्वारा विदेहसँ पहिनेहे जीवित लेखक ऊपर विशेषांक प्रकाशित कएल गेल अछि मुदा जिनकापर ओ विशेषांक प्रकाशित भेलै, जे प्रकाशित केलाह तिनकर सभहक संबंध देखबनि तऽ साफे लागत जे ओ सभ एक गुटक छलाह तँइ एहन काज संभव भेलै, एक गुट द्वारा दोसर गुटक लेखकक ऊपर विशेषांक ओ सभ कहियो प्रकाशित नै कऽ सकलाह।
तँइ 2015मे जखन विदेह एहन काज केलक तऽ एकरा नवाचार मानल गेलै। अहाँ सभ विदेह द्वारा एखन धरि प्रकाशित विशेषांक केर सूची देखि लिअ ई नवाचार साफ-स्पष्ट रूपे दृष्टिगोचर हएत। नवाचार माने ईहो जे मात्र साहित्यिके लोक एहि हदमे नहि छथि, विदेह भाषाविद्, पर्यावरणविद्, पांडुलिपिविद् , संगीतकला सहित चित्रकला सभपर विशेषांक सेहो प्रकाशित केलक जे सामान्यतः मैथिली पत्रिकामे उपेक्षित रहैत छल।
मुदा आशीष अनचिन्हार एवं विदेहक ई नवाचार अतबेपर नहि बंद भेल, बहुत रास नव-नव दृष्टिकोणक संग विदेह विशेषांकक परिकल्पना कएल गेल आ बहुत हद धरि ओकरा साकार सेहो कएल गेल। नीचाक सूची देखल जाए-
1) 2022 मे आशीषे अनचिन्हार द्वारा विदेह लग संस्थाक ऊपर विशेषांक प्रकाशित करबाक प्रस्ताव राखल गेल। 2) 2023 मे आशीष अनचिन्हार द्वारा विदेह लग दू टा विचार राखल गेल 1) लेखक-प्रकाशकसँ इतर आन जे लोक पोथी-पत्रिका केर बिक्री कऽ अपन जीवय-यापनक संग मैथिली पोथीक प्रचारमे सहायक छथि तिनको ऊपर विशेषांक प्रकाशित, एवं 2) मैथिलीक कोनो पत्रिकाक उपर विदेह विशेषांक प्रकाशित हो। 3) दिसंबर 2024 मे "विदेह लिटरेचर फेस्टीभल” केर घोषणा भेल। 4) जनवरी 2025 मे विदेह द्वारा "मिथिलाक वर्तमान उद्योग, उद्योगपति एवं एकर भविष्य" विशेषांक प्रकाशित करबाक घोषणा भेल। 5) 2025 मे "स्व-निंदा विशेषांक" केर सेहो घोषणा भेल अछि जाहि लेल पहिल चयन अशीषे अनचिन्हारक भेल अछि। 6) अक्टूबर 2025 मे "विदेहक रील / शार्ट भीडियो विशेषांक" उर्फ "मैथिली भाषाक विकासमे रील / शार्ट भीडियो केर भूमिका" केर घोषणा भेल।
ऊपर घोषणाक सूची देखने हेबै तऽ साफे पता लागल हएत जे विदेह मात्र लेखक वा साहित्यकारे केर गुट नहि तोड़लकै, विषय केर गुट सेहो तोड़लकै आ एहन विषय सभ चुनलक जे आन पत्रिका सभ लेल वर्जित छल।
विशेषांक एवं अन्य सामान्य अंक समेत विदेह एकटा नमहर यात्रा कऽ चुकल अछि आ एहिठाम आब हम कहि सकैत छी जे ई एकटा चुनौतीपूर्ण काज छै। अनेक संकट केर सामना करए पड़ैत अछि लेख एकट्ठा करएमे। मुदा संगहि ईहो हम कहब जे संकटसँ बेसी हमरा लग समर्थन अछि। हँ, ई मानएमे हमरा कोनो दिक्कत नहि जे जतेक लेख केर उम्मेद केने रहैत छी हम ततेक नै आबैए, जतेक लोक लिखबाक लेल गछैत छथि से सभ अंत-अंत धरि आबि चुप्प भऽ जाइत छथि। आ एकर कारणो छै, किनको ई लागै छनि जे आनपर लिखब से हम अपने रचना किए ने लीखि लेब, किनको लग पोथिए नै रहै छनि, जखन कि हम सभ यथासंभव पाठककेँ विकल्प रूपमे पोथीक पी.डी.एफ फाइल सेहो देबाक लेल तैयार रहैत छी। कियो विदेहक समावेशी रूपसँ दुखी छथि, तँ किनको मित्रकेँ विदेहसँ दिक्कत छनि तँइ ओ अपन मित्रक ईगो के रक्षा लेल रचना / आलेख नहि देता। एकरो हम संकटे बुझै छियै जे सभ फेसबुकपर लंबा-लंबा लेख वा कमेंट टाइप कऽ लै छथि सेहो सभ विदेह लेल हाथसँ लिखल पठाबैत छथि। जे सभ कहियो काल फेसबुकपर टाइप कऽ लीखै छथि तिनकर आलेख हम सभ टाइप करिते छी। खएर पहिने कहलहुँ जे संकटसँ बेसी समर्थन अछि तँइ आइ पहिलसँ लऽ कऽ एहि प्रस्तुत विशेषांक धरि पहुँचलहुँ हम। निश्चिते समर्थन बेसी भेटल हमरा। जखन कि विदेहक एहि विशेषांक सभहक अलावे आन अंक हरेक पंद्रह दिनपर (मासमे दू बेर) लगातार प्रकाशित भइए रहल अछि। एकर अतिरिक्त ईहो बात संतोषदायक अछि जे विदेहक हरेक व्यक्तिपरक विशेषांक अभिनंदनग्रंथ हेबासँ बाँचि गेल अछि। मुख्यधारा जकाँ विदेहकेँ अभिनंदनग्रंथ नहि चाही। अभिनंदनग्रंथ अहू दुआरे नै चाही जे ओहिसँ लेखक वा जिनकापर निकालल गेल छनि तिनकामे सुधारक गुंजाइश खत्म भऽ जाइत छै। तँइ विदेहक विशेषांकमे आलोचना-प्रसंशा सभ भेटत।
विदेह विशेषांकमे प्रकाशित आलेख सभ जखन अहाँ सभ पढ़ैत चलि जेबै तऽ अनुभव हएत जे या तऽ अहाँ सीढ़ीपर चढ़ि रहल छी या उतरि रहल छी। माने एक समान ऊर्जासँ अहाँ पढ़ैत चलि जेबै। बिना कोनो रुकावट बिना कोनो धुकचुकाहटकेँ। आ ई संभव होइत छै आएल लेख सभह प्रस्तुतिकरणक कारणे। अही प्रस्तुतिकरणक कारणे कम्मो आलेख रहैत विदेह विशेषांकमे सूचना भरल रहैत छै। विदेह विशेषांकमे प्रकाशित आलेख कोन ठाम राखल जाए (माने कोन लेखक केर लेख ऊपर हो वा कि नीचा हो) से निर्णय चयनित लेखकक काज एवं हुनकापर आलेख केर प्रवृतिकेँ धेआनमे राखि कएल जाइत अछि। मुदा बहुत बेर ई संभव नहि भऽ पाबैत छै कारण आलेख सभ एकदम अंतिम समयमे अबैत छै आ तखन ओकरा ऊपर-नीचा करब संभव नहि रहैत छै। तथापि हमर सभहक प्रयास रहहैए जे प्रस्तुतिकरण एकदम सही हो। दुर्भाग्यवश मैथिलीमे किछु एहनो लेखक सभ छथि जिनका अपन लिखल आलेखपर कम भरोसा रहैत छनि आ ओ चाहैत छथि जे हमर आलेख सभसँ ऊपर राखल जाए। पछिला एक विशेषांकमे सद्य अनुभव भेल हमरा। मुदा एहि प्रवृतिकेँ हम सभ नकारि देने छी आ जे आलेख जाहि ठाम सही बुझाइए तही ठाम राखैत छी बिना कोनो समझौताकेँ।
पहिने विदेहक सभ अंक नागरी, तिरहुता आ ब्रेल लिपिमे प्रकाशित होइत छल। एकर अतिरिक्त विदेहक किछु अंक कैथी, नेवाड़ी, आइ.पी.ए. लिपि, रंजना (नेवारी केर एक आर रूप), ब्राह्मी, खरोष्ठी, उर्दू, तिब्बती एवं तिब्बती-उमे लिपिमे सेहो छपल अछि। कुल मिला कऽ देखी तँ विदेह 11-12 लिपि अपना लेल रखने अछि।
2
पाठक जखन एहि विशेषांक वा विदेहक नियमित अंक (सामान्य अंक)केँ पढ़ताह तँ हुनका वर्तनी ओ मानकताक अभाव लगतनि। विदेह मूलतः शब्दमे विभक्ति सटा कऽ लिखैत अछि संगहि मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम लेल “भाषापाक” नामक अपन दिशानिर्देश सेहो रखने अछि मुदा विदेहमे छपए बला लेखक लेल स्वतंत्रता छै जे ओ कोन रूपमे लिखै छथि, माने जे विदेह शुरुएसँ हरेक वर्तनी बला लेखककेँ स्वीकार करैत एलैए। तँइ मानकता अभाव स्वाभाविक। विदेह सभ वर्तनी आ स्वरूपक सम्मान करैत अछि। तथापि वर्तनीक गलती जे थिक से सोझे-सोझ हमर सभहक गलती थिक जे हम सभ संशोधन नै कऽ सकलहुँ। मैथिलीमे किछुए एहन पत्रिका अछि जकर वर्तनी एक रंगक रहैत अछि आ ई हुनक खूबी छनि मुदा जखन ओहो सभ कोनो विशेषांक निकालै छथि तखन वर्तनी तँ ठीक रहैत छनि मुदा सामग्री अधिकांशतः बसिये रहैत छनि। ऐतिहासिकताक दृष्टिसँ कोनो पुरान सामग्रीक उपयोग वर्जित नै छै। हमहूँ सभ करैत छियै, मुदा सोचियौ जे 72-80 पन्नाक कोनो प्रिंट पत्रिका होइत छै ताहिमे लगभग आधा सामग्री साभार रहैत छै (माने दू भाग पुरने सामग्री), तेसर भागमे लेखक केर किछु रचना रहैत छै आ चारिम भागमे किछु नव सामग्री। हमरा लोकनि नव सामग्रीपर बेसी जोर दैत छियै। एकर मतलब ई नहि जे वर्तनीमे गलती होइत रहै। हमर कहबाक मतलब ई जे संपादक-संयोजककेँ कोनो ने कोनो स्तरपर समझौता करहे पड़ैत छै से चाहे वर्तनीक हो कि, मुद्राक हो कि विचारधारक हो कि सामग्रीक हो। हमरा लोकनि वर्तनीक स्तरपर समझौता कऽ रहल छी मुदा कारण सहित। प्रिंट पत्रिका एक बेर प्रकाशित भऽ गेलाक बाद दोबारा नै भऽ सकैए (भऽ तँ सकैए मुदा फेर पाइ लागि जेतै) तँइ ओकर वर्तनी यथाशक्ति सही रहैत छै। इंटरनेटपर सुविधा छै जे बीचमे (इंटरनेटसँ प्रिंट हेबाक अवधि) ओकरा सही कऽ सकैत छी मुदा सामग्रिए बसिया रहत तँ सही वर्तनी रहितो नव अध्याय नै खुजि सकत तँइ हमरा लोकनि वर्तनी बला मुद्दापर समझौता केलहुँ। हमरा लोकनि कएलनि, कयलनि ओ केलनि तीनू शुद्ध मानैत छी, एतेक शुद्ध मानैत छी एकै रचनामे तीनू रूप भेटि जाएत। आन शब्दक लेल एहने बूझू। उम्मेद अछि जे पाठक विदेहक आने विशेषांक जकाँ एकरा पढ़ताह आ पढ़ि एकर नीक-बेजाएपर अपन सुझाव देताह। विदेहक हरेक अंक विदेह वेबसाइटपर भेटत आ एकर अलावे गूगल बुक्स Google Books आ आर्कइभ.कॅम archive.org पर सेहो भेटत। तँइ स्वाभाविक रूपसँ विशेषांक सेहो तीनू प्लेटफार्मपर भेटत। मुदा तीनू प्लेटफार्मपर अंक सभकेँ अलग ढंगसँ सजाएल गेल छै जकरा हम पाठक लग राखि रहल छी। पाठक निच्चा बला पैराग्राफपर ध्यान देताह तऽ हुनका कम्मे समयमे नीक रिजल्ट भेटतनि।
विदेहक अपन साइट आ आर्कइभ.कॅम archive.org पर विदेहक हरेक अंक क्रमबद्ध तरीकासँ भेटत। आर्कइभ.कॅम archive.org पर विदेहक हरेक अंक पढ़बाक लेल पाठक Gajendra Thakur सर्च करथि आ https://archive.org/details/@videha_editorial_staff पर जाथि जाहिठाम क्रमबद्ध तरीकासँ सभ भेटतनि। संगे ईहो लिंक सहायक हेतनि https://archive.org/details/videha_pdf_202305 मुदा गूगल बुक्स Google Books पर विदेहक अंक सभकेँ सर्च करबाक हिसाबसँ राखल गेल अछि। माने जे पाठक गूगल बुक्स Google Books पर जँ कोनो शब्दकेँ वा लेखककेँ वा किताबक नामकेँ वा आन कोनो की वर्ड (Key Word)सँ तकताह आ जँ ओ शब्द, लेखक, किताब वा ओ सर्च वर्ड विदेहमे प्रकाशित भेल छै तऽ पाठक लग विदेहक ओ सभ अंक देखाबऽ लगतै जाहिमे पाठक द्वारा शब्द, लेखक, किताब वा ओ सर्च वर्ड देल गेल छै। एकर माने ई भेल जे विदेहमे प्रकाशित हरेक शब्द, लेखक, किताब वा ओ सर्च वर्ड (Search Word) पाठकक मुट्ठीमे आबि गेल आ अन्य माध्यमक अपेक्षा बेसी दिन धरि पाठक केर पहुँचमे रहत। आ संगहि जँ ओ शब्द, लेखक, किताब वा ओ सर्च वर्ड विदेहसँ इतर आन कोनो पोथीमे छै तँ ओहो पाठकक सामने आबि जेतनि माने पाठक लेल दुन्ना फायदा।
पाठक गूगल बुक्स Google Books पर विदेहक Videha eLearning पर जा कऽ विदेहक अंक पढ़ि सकै छथि ओत्तहि संपादक गजेन्द्र ठाकुर Gajendra Thakur पर क्लिक कऽ बहुत रास पोथी पढ़ि सकै छथि। तहिना पाठक जा कऽ गजेन्द्र ठाकुर Gajendra Thakur सर्च करथि हुनका विदेहक अंक सहित ओ सभ पोथी भेटि जेतनि जे विदेहपर देल गेल छै। एकर माने ई भेल जे मात्र विदेहक अंके नै आनो-आनो पोथी सभ भविष्यमे बाँचल रहि जेतै। संगहि विशेषांक सभहक प्रिंट रूप किनबाक लेल ओकर पोथी रूपक लिंक पोथी.कॅम Pothi.com पर देल गेल छै। पाठक पोथी.कॅम Pothi.com पर जा कऽ गजेन्द्र ठाकुर Gajendra Thakur सर्च करथि हुनका विदेहक विशेषांक सहित बहुत रास पोथी भेटि जेतनि किनबाक लेल। पाठक देवनागरीमे गजेन्द्र ठाकुर आ रोमन केर Gajendra Thakur दूनू सर्च करथि से हमर आग्रह रहत। कारण देवनागरी आ रोमन दूनूमे संपादक अपन एकाउंट बनेने छथि आ अपन सुविधासँ दूनू एकाउंटसँ विदेहक अंक आ पोथी अपलोड केने छथि। एहिठाम हम पहिने विदेहक लिंक देब आ ठीक ताही संगे एहि विशेषांकक पोथी.कॅम Pothi.com केर प्रिंट आॉन डिमांड बला लिंक देने छी जाहि ठाम पाठक एकरा आॉनलाइन कीनि सकै छथि। विदेहक द्वारा जीवैत लेखक ओ संस्थाक विशेषांक शृखंलामे प्रकाशित भेल संगहि आन विशेषांक सभहक लिस्ट एना अछि (एहिठाम जे अंकक लिस्ट देल गेल अछि ताहि अंकपर क्लिक करबै तँ ओ अंक खुजि जाएत)-
1) हाइकू विशेषांक 12 म अंक, 15 जून 2008 2) गजल विशेषांक 21 म अंक, 1 नवम्बर 2008 3) विहनि कथा विशेषांक 67 म अंक, 1 अक्टूबर 2010 4) बाल साहित्य विशेषांक 70 म अंक, 15 नवम्बर 2010 5) नाटक विशेषांक 72 म अंक 15 दिसम्बर 2010 6) समीक्षा विशेषांक 74म अंक 15 जनवरी 2011 7) नारी विशेषांक 77म अंक 01 मार्च 2011 8 अनुवाद विशेषांक (गद्य-पद्य भारती) 97म अंक 1 जनवरी 2012 9) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक 111 म अंक, 1 अगस्त 2012 10) भक्ति गजल विशेषांक 126 म अंक, 15 मार्च 2013 11) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक 142 म, अंक 15 नवम्बर 2013 12) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक 169 म अंक 1 जनवरी 2015 13) अरविन्द ठाकुर विशेषांक 01 नवम्बर 2015 अंक 189, विदेहक अरविन्द ठाकुर विशेषांक केर पोथी रूप "स्वतंत्रचेता- अरविन्द ठाकुर: व्यक्तित्व-कृतित्व" केर नामसँ प्रकाशित भेल। 14) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक 01 दिसम्बर 2015 अंक 191, पोथी.कॅम pothi.com 15) विदेह सम्मान विशेषाक- 200म, भाग-1, 15 अप्रैल 2016 16) विदेह सम्मान विशेषाक- 205म, भाग-2, 1 जुलाई 2016 17) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- 217 म अंक 01 जनवरी 2017 18) मैथिली वेब पत्रकारिता विशेषांक-313म अंक 1 जनवरी 2021 19) मैथिली बीहनि कथा विशेषांक-2, 317 म अंक 1 मार्च 2021 20) रामलोचन ठाकुर विशेषांक 01 अप्रैल 2021 अंक 319, पोथी.कॅम pothi.com 21) राजनन्दन लाल दास विशेषांक 01 नवम्बर 2021 अंक 333, पोथी.कॅम pothi.com 22) रवीन्द्र नाथ ठाकुर विशेषांक 15 जून 2022 अंक 348, पोथी.कॅम pothi.com 23) केदारनाथ चौधरी विशेषांक 15 अगस्त 2022 अंक 352, पोथी.कॅम pothi.com 24) प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' विशेषांक 01 नवम्बर 2022 अंक 357, पोथी.कॅम pothi.com 25) शरदिन्दु चौधरी विशेषांक 15 नवम्बर 2022 अंक 358, पोथी.कॅम pothi.com 26) “कला-विमर्श विशेषांक (सन्दर्भ- संजू दास, कृष्ण कुमार कश्यप, शशिबाला, एस.सी.सुमन आ श्वेता झा चौधरी)” 15 अप्रैल 2023 अंक 368, पोथी.कॅम pothi.com 27) अशोक विशेषांक 1 मइ 2023 अंक 369, पोथी.कॅम pothi.com 28) रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर' विशेषांक 15 मइ 2023 अंक 370, पोथी.कॅम pothi.com 29) मिथिला स्टूडेंट यूनियन (MSU) विशेषांक 1 जून 2023 अंक 371, पोथी.कॅम pothi.com 30) लक्ष्मण झा सागर विशेषांक (15 नवम्बर 2023 अंक 382), पोथी.कॅम pothi.com 31) नरेन्द्र झा विशेषांक (1 जून 2024 अंक 395), पोथी.कॅम pothi.com 32) भाषाविद् रामावतार यादव विशेषांक 1 जून 2024 अंक 395, पोथी.कॅम pothi.com 33) अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद् विशेषांक 15 अगस्त 2024 अंक 400, पोथी.कॅम pothi.com 34) हितनाथ झा विशेषांक 1 नवम्बर 2024 अंक 405, पोथी.कॅम pothi.com 35) मिथिला विकास परिषद् विशेषांक 15 दिसंबर 2024 अंक 408, पोथी.कॅम pothi.com 36) नारायणजी चौधरी विशेषांक 1 जून 2025 अंक 419, पोथी.कॅम pothi.com 37) शिवशंकर श्रीनिवास विशेषांक 15 अगस्त 2025 अंक 424, पोथी.कॅम pothi.com
38) भवनाथ झा विशेषांक 15 अक्टूबर 2025 अंक 428, पोथी.कॅम pothi.com
एहि लिस्टमे 1, 2, 4, 5, 6, 7, 8, 15 एवं 16 विदेहक स्वतः संख्याक हिसाब बला विशेषांक अछि। ओतहि 2 आ 19 क्रम संख्याक विशेषांक मुन्नाजीक संयोजनमे प्रकाशित भेल अछि। शेष सभ बाँचल विशेषांकक परिकल्पना एवं संयोजन आशीष अनचिन्हार द्वारा भेल अछि।
अरविन्द ठाकुर, जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल', केदारनाथ चौधरी, प्रेमलता मिश्र 'प्रेम', शरदिन्दु चौधरी, अशोक, रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर', लक्ष्मण झा 'सागर', नरेन्द्र झा, रामावतार यादव, हितनाथ झा, नारायणजी चौधरी, शिवशंकर श्रीनिवास ई सभ एहन लेखक / सामाजिक कार्यकर्ता छथि जे सभ अपना ऊपर प्रकाशित विशेषांक अपन आँखिए पूरा होशो-हवाशमे पढ़ि सकलाह, देखि सकलाह, ई हमर सभहक सौभाग्य। रामलोचन ठाकुर, राजनन्दन लाल दास आ रवीन्द्र नाथ ठाकुर केर विषयमे हम सभ हतभाग्य रहलहुँ जे घोषणा तऽ भेलै हुनका सभहक जीवैत मुदा एकरा प्रकाशित हेबासँ पहिने ओ सभ एहि संसारसँ विदा भऽ गेलाह।
संस्था बलामे मिथिला स्टूडेंट यूनियन (MSU) केर अधिकांश सदस्य, अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद् केर अधिकांश सदस्य आ मिथिला विकास परिषद् केर अधिकांश सदस्य सभ संस्थाक ऊपर प्रकाशित विशेषांक पढ़ने छथि। नित नवल सिरीज बलामे सभ लेखक (राजदेव मंडल, सुभाष चंद्र यादव, सुशील) अपने एकरा पढ़ने छथि। ईहो हमर सभहक सौभाग्य। किछु फोटो आ सूचना जे हमरा भेटि सकल जाहिमे विशेषांकसँ संबंधित लेखक-व्यक्तित्व-संस्था अपने पढ़ि सकलाह तकर फोटो हम निच्चा दऽ रहल छी।
आशीष अनचिन्हार द्वारा संपादित पोथी 'प्रीति कारण सेतु बान्हल' जे कि मिथिला ओ मैथिलीक संवर्धनमे गजेन्द्र ठाकुर एवं प्रीति ठाकुरक योगदानक आलोचनात्मक ग्रंथ अछि ताहिमे संकलित शिवशंकर श्रीनिवास जीक एक शोध आलेख मैथिली पत्रिकामे व्यक्तिपरक विशेषांकक इतिहास अछि आ ओहि इतिहासमे विदेह विशेषांक कोन ठाम अछि तकर मूल्याकंन भेटत संगहि ओही आलेखमे श्रीनिवास जीक मोताबिक जीवितेमे अपन मूल्याकंन पढ़ि लेब कोनो लेखक लेल कोनो सम्मानसँ बेसी महत्वपूर्ण अछि। मैथिलीक बहुत रास पाठक विदेहक जीवित लेखक विशेषांककेँ मूल्यवान मानै छथि ('प्रीति कारण सेतु बान्हल’ मे कीर्तिनाथ झा, कल्पना झा, प्रणव कुमार झा, धनाकर ठाकुर आदिक आलेख), ओतहि किछु पाठक विदेह विशेषांककेँ साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ बेसी महत्वपूर्ण मानै छथि ('प्रीति कारण सेतु बान्हल’ मे लक्ष्मण झा 'सागर'जीक आलेख) यद्पि विदेह साहित्य अकादमी पुरस्कारक आलोचना करैत अछि मुदा अकादमी द्वारा पुरस्कार छोड़ि जे प्रकाशन एवं आन काज छै तकर प्रसंशा सहो करैत अछि। तथापि जँ किछुओ पाठक विदेह विशेषांककेँ कोनो सम्मान-पुरस्कार वा कि साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ बेसी महत्वपूर्ण मानै छथि तँ ई विदेह लेल निश्चिते प्रेरणादायी बात छै।
3
विदेहक जीवित विशेषांक शृंखलामे किनकर चयन हो ताहि लेल मोटा-मोटी निच्चाक किछु बिंदुक पालन कएल जाइत अछि- 1) लगभग पाँच-छह मास पहिनेसँ विदेह अपन पाठककेँ सुझाव देबा लेल लेल सूचना दैत अछि। 2) आएल सुझावमेसँ विदेह मात्र जीवित लेखककेँ चयन करैत अछि। संस्था सेहो वर्तामनमे जीवंत हेबाक चाही। 3) सभ जीवित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकक बीचमे हुनकर लेखन/ काज एवं आचरणक साम्यता देखल जाइत अछि। जाहि लेखकक लेखन/ काज ओ आचरणमे बेसी साम्यता (कम फाँक) भेटैए तेहन छह टा नाम चयनित होइत अछि। 4) छह नाम एलापर ई तुलना कएल जाइत छै जे ई छहो मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशक अथवा संस्थाकेँ रचना लिखबाक वा समाजिक काज केलाक एवजमे समाजसँ की भेटलनि। 5) जिनका सभसँ कम भेटल बुझाइत अछि ताहि तीन मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशक, संस्थाकेँ अगिला चरण लेल राखि लैत छी। 6) एहि तीन चयनित जीबित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकक वा संस्थाक रचना, काज, हुनक उद्येश्य आदिक बीचमे परस्पर तुलना कएल जाइत अछि आ, 7) अंतिम रूपसँ विदेह द्वारा नाम चुनि सालक अंतमे घोषणा कएल जाइत अछि आ नियत समयपर ई विशेषांक निकालबाक प्रयास करैत छी। एकर मतलब ई भेल जे पाठककेँ सुझाव देबाक सूचना हरेक बर्खक अप्रैल-मइ धरिमे चलि जाइत छनि।
प्रश्न उठि सकैए जे कि उपरक नियम एहन छै जाहिमे अंतिम रूपसँ सभ सुयोग्य जीवित लेखक केर चयन समयपर भ़ऽ जेतनि? तऽ एकर उत्तर छै- नै। विदेहक अपन सीमा छै आ विदेहक पाठक लग सेहो अपन सीमा छनि। मुदा अही सीमाक संगे हमरा सभकेँ अपन यथासाध्य श्रेष्ठ देबाक छै आ मैथिली लेल एकटा एहन रस्ता बना देबाक छै जाहिसँ आबए बला 500-600 बर्खक साहित्य विदेहक लीकसँ प्रेरणा पाबए। अही विचारक संग विदेह ओहन जीवित लेखकपर अपन धेआन सेहो केंद्रित कऽ रहल अछि जे कि सुयोग्य छथि मुदा जिनकापर विदेहक विशेषांक कोनो कारणवश नहि प्रकाशित भऽ सकल। एकर नाम भेल विदेहक "नित नवल सिरीज"। एहि नव विचारक मुख्य बिंदु एना अछि-
1) विदेहक संपादक गजेन्द्र ठाकुर एकटा कोनो जीवित लेखक वा कलाकारपर एकाग्र आलोचना करता मने ओहि लेखक केर उपलब्ध सभ साहित्यपर। एहि पोथीक भाषा मैथिली अथवा अंग्रेजी कोनो एक भाषामे रहत। एहि पोथीक पहिल रूप ई-बुक केर रूपमे आएत आ प्रयास रहत जे एकर प्रिंट सेहो आबए जे कि परिस्थितिपर निर्भर करतै। 2) लेखक वा कलाकार केर चुनाव संपादक अपन रुचि वा विदेह टीमक रुचि केर हिसाबें करता। 3) एहिमे ओहने लेखक वा कलाकार केर चयन संभव हएत जिनकर उपलब्ध हरेक पोथीक PDF रूपमे विदेहक माध्यमसँ सार्वजनिक भेल छनि। कलाकार लेल यूट्यूब एवं आन साइट सेहो मान्य हेतै। 4) एहि परियोजनाक लेल चयनित लेखक वा कलाकारपर काज संपादक केर समय केर अनुसारे हेतै। तँइ एकर समय सीमा कहब संभव नहि।
नित नवल सिरीजमे एखन धरि प्रकाशित पोथीक सूची एना अछि (पहिनेक विशेषांक सभमे ई क्रम नहि छल, एहिठाम संशोधित आ पूर्ण सूची अछि)- 1. Rajdeo Mandal- Maithili Writer (2022) 2. JAGDISH PRASAD MANDAL- Maithili Writer (2023) 3) नित नवल सुभाष चन्द्र यादव (2023) पोथी.कॅम pothi.com 4) नित नवल सुशील (2023, संशोधित 2024) पोथी.कॅम pothi.com
एकर अतिरिक्त विदेहक वर्तमान अंक सभमे धारावाहिक रूपें "नित नवल दिनेश मिश्र" सेहो प्रकाशित भऽ रहल अछि जकर पोथी रूप जल्दिये आएत।
एहिठाम ईहो स्पष्ट कऽ दी जे विदेह विशेषांक वा नित नवल सिरीज केर चयन लेखकक शुरूसँ लऽ चयन हेबाक समय धरिक आकलन अछि। मानि लिअ विदेह विशेषांक वा नित नवल सिरीजमे चयनित भेलाक बाद, विशेषांक वा पोथी प्रकाशित भऽ गेलक बाद जँ चयनित लेखकमे नैतिक स्तरपर कोनो विचलन अबैत छनि तँ आन लोकक संगे विदेहो हुनकर विरोध करत। फेरो स्पष्ट कऽ दी जे हमरा लोकनि मात्र नैतिक स्तर केर बात केलहुँ अछि, विचारधारा वा आन कोनो स्तरक नहि। विदेह लेल उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम, आकाश-पाताल सभ विचारधारा अपने छै बशर्ते कि ओ मिथिला, मैथिली आ मैथिलक हितमे हो।
आब बात करी विदेह लिटरेचर फेस्टीभल केर। विदेह अपन आन कार्यक्रम संगे "विदेह लिटरेचर फेस्टीभल" केर शुरुआत कऽ रहल अछि। एकर परिभाषा हम ई रखने छी जे एक बर्खमे एक लेखक द्वारा एक विधामे जे रचना विदेहमे प्रकाशित हएत तकरा हम सभ पोथीक रूपमे दऽ ओहि संबंधित लेखक लग ओकर लिंक पठा देबनि। जँ लेखकक सहमति रहतनि तऽ एकै पोथीमे विभिन्न विधाकेँ सेहो समेटल जा सकैए। एहिमे भाग लेबाक निम्नलिखित प्रक्रिया रहत- 1) विदेहक बर्खमे कुल 24 अंक प्रकाशित होइत छै सामान्यतः हरेक मासक 1 आ 15 तारीखकेँ। ई फेस्टीभल हरेक बर्ख 1 जनवरीसँ लऽ कऽ 15 दिसम्बर बला अंकमे प्रकाशित रचनापर लागू हएत। रचना टाइप कएल रहबाक चाही। रचना पठेबाक लेल मेल अछि- editorial.staff.videha@gmail.com विदेह ऑनलाइन पत्रिका छै (मैथिलीक पहिल) तँइ लेखकीय प्रति मात्र PDF रूपमे देल जाइत छै। 2) विदेह लेल रचना दू भागमे अछि, गद्य एवं पद्य। गद्य एवं पद्य केर सभ विधा लेल ई मान्य अछि (मुदा छंदमुक्त कविता लेल संपादक अपन विवेकक प्रयोग करताह जे ई रचना पोथी लेल उपयुक्त हेतै वा कि नहि, एहन नहि जे छंदमुक्तमे नीक रचना नहि भऽ सकैए मुदा मैथिलीमे छंदमुक्तकेँ गलत मतलब निकालि कविता विधाकेँ सत्यानाश कऽ देल गेलै) विदेहक कुल 24 अंकमे जँ कोनो रचनाकारक गद्य (जेना आलेख, आलोचना, समीक्षा, कथा, कथेतर गद्य, यात्रा,संस्मरण आदि) केर 15-20 टा रचना हेबाक चाही। बीहनि कथा एवं लघुकथा कमसँ कम 200 हेबाक चाही। उपन्यास, नाटक आदि जँ 24 अंकमे पूरा भऽ गेल अथवा जाहि अंकमे पूरा भऽ जेतै तकर बाद ओहिपर काज शुरू कऽ देल जेतै। छंदोबद्ध पद्य वा गजल 100 टा हेबाक चाही। छोट-छोट छंदोबद्ध रचना जेना दोहा, सवैया आदि लेल कमसँ कम 500 रचना हेबाक चाही। छंदोबद्ध पद्य एवं गजलक निच्चा ओकर विधान एवं नाम सेहो देनाइ अनिवार्य रहत। छंदोबद्ध पद्य वा गजल पूर्णतः मानक हेबाक चाही, वर्तनी सही हेबाक चाही, अन्यथा 100 संख्या भेलाक बादो विदेह ओहिपर विचार नै करत। लेख लेल सेहो एहने बात मानि कऽ चलू। गोल-मटोल भाषा बला समीक्षा-आलोचना मान्य नहि हएत। तहिना जाहि संस्मरणमे आनसँ बेसी अपनापर लीखल गेल हो सेहो मान्य नहि हएत। 3) जेना उपन्यास वा नाटक धारावाहिक रूपमे प्रकाशित होइए तेनाहिते कोनो एक विषयपर आलेख, आलोचना सेहो धारावाहिक रूपमे मान्य हएत। लेखक अपना हिसाबें विषय केर चयन कऽ सकैत छथि। मुदा एहि बर्ख हम मात्र उदाहरण लेल एकटा विषय एक रचनाकार लेल प्रस्तावित कऽ रहल छी जाहिसँ आरो स्पष्ट हएत। जेना कि एहि बेर लेल हम विषय बनेलहुँ "मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान" आ एहि लेल हम कल्पना झाजीकेँ नामित कऽ रहल छियनि। आब कल्पना जी सुविधानुसार एहि विषयपर जेना-जेना खंड लिखैत चलि जेतीह आ विदेहमे प्रकाशित होइत रहत आ अंतमे पोथीक रूपमे आबि जाएत। 4) जनवरी 2026 आ तकर बाद हरेक सालक जनवरीमे ओहन लेखक सभकेँ सूचना देल जेतनि जे एहि क्राइटेरियाकेँ पूरा केलाह, आ हुनकासँ ओहि रचना सभहक संशोधित रूप माँगल जेतनि। जे लेखक जाहि समयमे संशोधित रूप देताह तकरा ओहि समयक हिसाबें आ हुनकर लिखित सहमतिक संग ओहि रचना सभकेँ समेटि ओकरा पोथी रूप देल जाएत, ओकरा ISBN सेहो देल जाएत आ ओकर लिंक संबंधित लेखककेँ दऽ देल जेतनि। लिंक देलाक बाद लेखक-पाठक अपन मूल्य लगा ओकरा कीनि सकै छथि। विदेह क्रय-विक्रय केर काज नहि करैत अछि तँइ एहिसँ संबंधित कोनो समस्या लेल विदेह उत्तरदायी नहि हएत। हँ, स्वविवेकक उपयोग करैत विदेह टीम लेखकक समस्याक समाधान करबाक लेल प्रयास कऽ सकै छथि।
5) एहि योजनाक अंतर्गत आएल पोथीमे विदेहक नाम, लोगो, ओकर उद्येश्य, आन सूचना सहित ईहो लिखल रहत जे ई पोथी "विदेह लिटरेचर फेस्टीभल बर्ख...." योजना द्वारा चुनल गेल अछि।
6) रचना विदेह लेल अप्रकाशित हो माने ओकर प्रकाशन आन कतहुँ नै भेल हो। जँ पोथी रूपमे एलाक बाद पता चलल जे ओहि केर रचना आन ठाम छपल छै तऽ ओकर लिंक नष्ट कऽ देल जेतै। 7) रचनाक गुणवत्ता एवं ओकर मौलिकता लेल लेखक अपने उत्तरदायी हेता। मौलिकता संबंधी कोनो विवाद भेलापर ओहि पोथीक लिंक नष्ट कऽ देल जाएत आ ओहि लेखकक रचनाकेँ पुनः विदेहमे नै छापल जाएत। 8) विदेह दिससँ कोनो प्रकारक वित्तीय सहायता लेखककेँ नै भेटतनि कारण, विदेह किनकोसँ लैतो नै छै। विदेह मात्र रचनाकेँ समेटि, ओकर डिजाइन आ ISBN लेल प्रयास करत। 9) एहिमे साझी संकलन आदि मान्य नै हएत। 10) विदेहमे प्रकाशित रचना लेल जे नियम पहिनेसँ अछि से यथावत रहत आ एहि फेस्टीभेलक रचनापर सेहो लागू हएत। पाठक-लेखक चाहथि तऽ विदेहपर जा कऽ पूरा ब्यौरा देखि सकै छथि।
नोट- विदेह लिटरेचर फेस्टीभल केर घोषणाक मात्र किछुए दिन बाद 1 जनवरी 2025 सँ "मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान" केर आलेख शुरू भऽ गेल। पाठक एहि लेल विदेहक 1 जनवरी 2025, अंक 409 पढ़ि सकै छथि। बादमे "मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान" केर घोषणा सेहो भेल जकरा लिखबा लेल हितनाथ झा जीसँ अनुरोध कएल गेल।
4
ऊपर भेल जे काज हम सभ कऽ सकलहुँ तकर विवरण मुदा किछु एहनो घोषणा छै जे कि हम सभ नै कऽ सकलहुँ जेना 2016 मे हम सभ परमेश्वर कापड़ि, कमला चौधरी आ वीरेन्द्र मल्लिक विशेषांक केर घोषणा कइयो कऽ नहि प्रकाशित कऽ सकलहुँ। पाठक एहि घोषणाकेँ एहि लिंकपर देखि सकै छथि- सूचना बादमे विदेहक "वीरेन्द्र मल्लिक विशेषांक" (जे कि प्रकाशित नै भऽ सकल) लेल वीरेन्द्र मल्लिक जीक साक्षात्कार जे नबोनारायण मिश्रजी से विदेहक 337म अंकमे प्रकाशित भेल पाठक एकरा एहि लिंकपर पढ़ि सकै छथि- 1 जनवरी 2022 अंक 337
2017 मे विदेह "नेपालक वर्तमान मैथिली साहित्य" विषयक विशेषांक निकालबाक नेयार केने छल जे एखन धरि पूरा नहि भऽ सकल अछि।
तेनाहिते विदेहक "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" हमरा लोकनि एखन धरि नै प्रकाशित कऽ सकलहुँ अछि। एकर घोषणा हम 2019 मे केने रही। एहि घोषणाक फेसबुक लिंक देखू।
हमरा लोकनि पं. गोविन्द झाजीपर कोनो काज नहि कऽ सकलहुँ से दुख आजीवन रहत। एहन नहि छै जे हमरा लोकनि प्रयास नहि केलहुँ मुदा कोनो ठामसँ उत्साह नहि भेटल। 10 अक्टूबर 2020 फेसबुकपर हम सभसँ आग्रहो केने रहियनि मुदा...। एहि घोषणाक फेसबुक लिंक देखू।
परिशिष्ट-1
परिशिष्ट-2
परिशिष्ट-3
विदेह अपन कोनो अंकमे "साहित्यिक भ्रष्टाचार विशेषांक" निकालत (लिंक कमेंटमे) ताहि लेल अपने सभसँ निम्नलिखित विषयपर आलेख आदि चाही।
1.साहित्य, कला एवं सरकारी अकादमीः-
(क) पुरस्कारक राजनीति
(ख) सरकारी अकादेमीमे पैसबाक गैर-लोकतांत्रिक विधान
(ग) सत्तागुट आ अकादमी केर काजक तौर-तरीका
घ) सरकारी सत्ताक छद्म विरोधमे उपजल तात्कालिक समानांतर सत्ताक कार्यपद्धति (1985सँ एखन धरि)
ङ) अकादेमी पुरस्कारमे पाइ फैक्टरः मिथक वा यथार्थ
2.व्यक्तिगत साहित्य संस्थान आ पुरस्कारक राजनीति
3.प्रकाशन जगतमे पसरल भ्रष्टाचार आ लेखक
4. मैथिलीक छद्म लेखक संगठन आ ओकर पदाधिकारी सभहँक आचरण
5.मैथिली विभागमे पसरल साहित्यिक भ्रष्टाचारक विविध रूपः-
(क) पाठ्यक्रम
(ख) अध्ययन-अध्यापन
(ग) नियुक्ति
6. साहित्यिक पत्रकारिता, रिव्यू, मंच, माला, माइक आ लोकार्पणक खेल-तमाशा
7.लेखक सभहँक जन्म-मरण शताब्दी केर चुनाव, कैलेंडरवाद आ तकरा पाछूक राजनीति
8.दलित एवं लेखिका सभहँक संगे भेद-भाव आ ओकर शोषणक विविध तरीका
उपरक विषयक अतिरिक्त जँ कियो साहित्यिक भ्रष्टाचारक कोनो नव विषयपर लिखए चाहथि तँ ओकरो स्वागत रहत।
परिशिष्ट-4
विशेषांकसँ संबंधित फोटो जे सभ ऊपर भऽ सकल से एना अछि-
अरविन्द ठाकुर अपना ऊपरक विशेषांक केर चर्च करैत, एहि फेसबुक पोस्टक लिंक- अरविन्द ठाकुर
जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' अपना ऊपरक विशेषांक केर चर्च करैत, एहि फेसबुक पोस्टक लिंक- जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल'
शरदिन्दु चौधरी अपना ऊपरक विशेषांक केर चर्च करैत, एहि फेसबुक पोस्टक लिंक- शरदिन्दु चौधरी
लक्ष्मण झा 'सागार' अपना ऊपरक विशेषांक केर चर्च करैत, एहि फेसबुक पोस्टक लिंक- लक्ष्मण झा 'सागार'
नरेन्द्र झा विशेषांककेँ प्रिंट करबा कऽ कुणालजी हुनका लग पहुँचा देलखिन, एहि फेसबुक पोस्टक लिंक- नरेन्द्र झा
रामावतार यादवजीकेँ हम अपन मेलसँ हुनका ऊपर प्रकाशित विशेषांकक पी.डी.एफ पठेलियनि, तकर उत्तर
हितनाथ झा अपना ऊपरक विशेषांक केर चर्च करैत, एहि फेसबुक पोस्टक लिंक- हितनाथ झा
सुशील जी अपन हाथमे पोथी "नित नवल सुशील" रखने (फोटो सौजन्य-नबोनारायण मिश्र, कोलकाता)
MSU केर सदस्य प्रियंका मिश्रा द्वारा कएल गेल कमेंट। फेसबुक लिंक- MSU
मिथिला विकास परिषद् विशेषांकक लेख संस्थाक अध्यक्ष श्री अशोक झा द्वारा शेयर कएल गेल पोस्ट।
भवनाथ झा द्वारा शेयर कएल गेल पोस्ट
"विदेहक रील / शार्ट भीडियो विशेषांक" उर्फ "मैथिली भाषाक विकासमे रील / शार्ट भीडियो केर भूमिका" हम अपन पोथी "मैथिली वेब पत्रकारिताक इतिहास" मे रील माने शार्ट भीडियोसँ मैथिली भाषाकेँ कतेक फायदा भेलै तकर संक्षिप्त सूचना देने रही संगहि ओही ठाम हम भाषाशास्त्री सभसँ आग्रह केने रही जे ओ सभ एहि विधाकेँ भाषा-विज्ञानक चश्मासँ देखथि। ई अलग बात छै जे रील बनबऽ बलाकेँ एक सीमा आ लोकप्रियता पार केलाक बाद प्रचुर कमाइ सेहो होइत छै। मुदा मैथिलीमे सामान्य साहित्यकारसँ लऽ कऽ भाषाशास्त्री धरि अपनाकेँ अकादमी, प्रायोजित संस्था, पाइ देनिहारक कार्यक्रम धरि समेटि लेने छथि। एहन स्थितिमे एक बेर फेर विदेह एहि विषयपर अपनाकेँ आगू कऽ रहल अछि आ "विदेहक रील / शार्ट भीडियो विशेषांक" उर्फ "मैथिली भाषाक विकासमे रील / शार्ट भीडियो केर भूमिका" एक अंक केंद्रित करबाक विचार कऽ रहल अछि। एहि विशेषांकमे मैथिलीक ओहन क्रियेटर सभहक चैनलपर लिखल जेबाक चाही जिनकर चैनलपर अधिकांश रील मैथिलीक छनि, आन भाषाक रील बला चैनलपर लीखल लेख एहि अंक लेल मान्य नहि हएत। एहि अंककेँ प्रकाशित हेबाक एखन समय-सीमा नहि अछि, जहिया आलेख सभ आबि जाएत तहिया हम सभ एकर तारीख तय करब। आलेख विदेहक मेल आइडी- editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाओल जाए। एहि विशेषांक लेल किछु तथ्य दऽ रहल छी जाहिसँ अहाँ सभकेँ सुविधा रहत- 1) रील बनेबाक लेल प्रमुख ठेकाना। 2) रील कोना बनाओल जाए, मोनेटाइज कोना कएल जाए, कथा-पटकथा केहन हेबाक चाही। 3) मैथिलीक प्रमुख रील चैनल केर नाम, लिंक, ओकर प्रयोगकर्ता एवं ओकर संगी कलाकार। 4) मैथिलीक किछु अतिलोकप्रिय रील आ ओकर भाषिक विवेचना। 5) मैथिलीक रील उद्योग आ आर्थिक लाभ। अहाँ सभ लग जँ आरो कोनो विषय हो एहिसँ संबंधित तऽ लीखि सकैत छी। संगहि जे लीखि सकै छथि तिनको लग सूचना देल जाए। पोस्टक संग लागल रील प्रतीकात्मक अछि आ ई सरिता कुमारी चैनल केर अछि।
नोट- विदेह विशेषांक जाहि खंडमे अहाँ सभ ई सूचना पढ़ि रहल छी तकर नाम छै "प्रस्तुत विशेषांकक संदर्भमे" मुदा हरेक विशेषांकक एहि खंडमे किछु ने किछु भिन्नता भेटत जकर कारण अछि जे भूतकालमे जे-जे हम सभ काज केने छी तकरा सभकेँ फेसबुक वा आन लिंककेँ ताकब समयसाध्य काज छै तँइ हमर आग्रह रहतनि पाठक वर्गसँ जे नवीनतम आ संशोधित सूचना लेल ओ जाहि समयमे तकता ताहि समयक अंतिम विदेह विशेषांकक ई खंड देखथि (ई विशेषांक कोनो कैटेगरीक भऽ सकैए)। हुनकर समस्याक समाधान भऽ जेतनि। संगहि एहि विशेषांकमे जँ किछु छूटत से से हम सभ भविष्यमे आबऽ बला विशेषांकमे संशोधित कऽ परसबै। इएह क्रम छै आ लगैए जे लगभग आगामी एक-दू बर्खमे हम एहि पन्नाक अंतिम स्वरूप पाबि लेब।
२.२. रमानन्द झा रमण केर संक्षिप्त परिचय
एहिठाम प्रस्तुत अछि रमानन्द झा 'रमण'जी केर संक्षिप्त परिचय। हिनक मुख्य रुचि छनि- मैथिली साहित्य ।
एहि परिचयमे देल गेल सूची पुरान मानकपर अछि मने पुरान सूचनासँ शुरू भऽ ओकर अंतमे नव-नव सूचना जोड़ैत जाएब। जखन कि शोधपत्र, शोध आलेख सभमे अंतर्राष्ट्रिय मानक देल जाइत छै मने एकदम नव सूचनासँ शुरू भऽ कऽ अंतमे पुरान सूचना। मुदा विदेह अपन पाठककेँ ध्यानमे रखैत पुरान मानकक प्रयोग करैत अछि। विदेहक पाठक सामान्य वर्गक रहैत अछि, शोधक फार्मेटसँ बेसी हुनका सूचनाक ताक रहैत छनि। हमरा जनैत पुरना मानकक एकटा ईहो फायदा छै जे सूची देखबामे कम्म समय लागत कारण ओकर प्रयोग बहुत दिनसँ होइत रहल छै आ ई मानव-मस्तिष्कमे रचल-बसल छै। तँइ सुविधाजनक छै।
चित्र- 1 नाम: रमानन्द झा 'रमण' जन्म तिथि: 02 जनवरी, 1949 पिता: स्व. परमानन्द झा जन्म स्थान: ग्राम- ग्राम-लालगंज, पो. लोहना, भाया-सरिसब-पाही, मधुबनी, पिन - 847424
वर्तमान निवास: फ्लैट नं. 24, झेलम अपार्टमेंट, पाटलिपुत्र पथ, राजेन्द्र नगर, पटना, बिहार - 800016 शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी), पीएच.डी. (मैथिली) - "मैथिली नऽव कविताक विश्लेषणात्मक अध्ययन", पटना विश्वविद्यालय, 1982
वृत्ति: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) में अधिकारी (जनवरी 2009 में सेवानिवृत्त)
सेमिनार एवं कार्यशाला:
• साहित्य अकादेमी (New Delhi) द्वारा आयोजित साहित्यिक अनुवादक राष्ट्रीय कार्यशाला (1991-92)
• Bonds Beyond the Borders (भारत-नेपाल नागरिक समाज संवाद, 2006)
• Resource Person: मैथिली गहन पाठ्यक्रम (CIIL, भुवनेश्वर)
• मैथिली भाषा विशेषज्ञ (National Translation Mission, Mysore)
• छठम अंतर्राष्ट्रीय मैथिली नाट्य महोत्सव (विराटनगर, नेपाल, 1992) मे जूरी सदस्य
प्रकाशित पोथी:
A. प्रकाशन (Publications)- मौलिक लेखन (आलोचना/Criticism) 1. नवीन मैथिली कविता (1982) 2. मैथिली नऽव कविता (1993) 3. मैथिली साहित्य ओ राजनीति (1994) 4. अखियासल (1995) 5. बेसाहल (2003) 6. भजारल (2005) 7. हिआओल (2012) 8. लक्ष्मीपति सिंह (विनिबन्ध, 2012) 9. चितिर-बितिर (2014) 10. बेराएल (2018) 11. अनुसन्धान-प्रतिमान (2018) 12. मार्कण्डेय प्रवासी (विनिबन्ध, 2022) 13. बीज-भाषण (2022) 14. विवर्त (2023) 15. नगेन्द्र कुमार (विनिबन्ध, 2025) B. प्रकाशन (Publications)- व्यावसायिक (हिन्दी): 1. "निर्यात कैसे शुरू करें? (How to Start Export)", भारतीय रिजर्व बैंक (1999) C. प्रकाशन (Publications)- सम्पादित कृति (Edited Works) 1. मैथिलीक आरम्भिक कथा (1978) 2. श्यामानन्द रचनावली (1982) 3. निर्दयी सासु (1914) एवं पुनर्विवाह (1925) (1984) 4. चेतनाथ झाकृत श्रीजगन्नाथपुरी यात्रा (1910) (1994) 5. तेजनाथ झाकृत सुरराज विजयनाटक (1994) 6. रासबिहारी लाल दासकृत सुमति (1918) (1996) 7. जीबछ मिश्रकृत रामेश्वर (1916) (1996) 8. पण्डित गोविन्द झा अर्चा ओ चर्चा (Felicitation Volume, 1997) 9. भेंटघांट (1998) 10. रूचय तँ सत्य ने तँ फूसि (Sarcasm, 1998) 11. मणिपद्मक कनकी (2003) 12. पुण्यानन्द झाकृत मिथिला दर्पण (1925) (2001) 13. उग्रानन्दकृत शिवगंगा (कथासंग्रह, 2002) 14. यदुवर (1888-1935) रचनावली (2003) 15. मैथिली उपन्यासमे चित्रित समाज (2003) 16. विद्यापति विवरण (A Facsimile Edition of Shriballabh Jha, 2005) 17. कवीश्वर चेतना (2008) 18. मैथिलीक आरम्भिक यात्रा-साहित्य (2009) 19. ग्रिअर्सनकृत गीत दीनाभद्री ओ गीत नेबारक (अनुवाद पं. श्रीगोविन्द झा, 2010) 20. ग्रिअर्सनकृत मैथिली व्याकरण (अनुवाद पं. श्रीगोविन्द झा, 2011) 21. लक्ष्मीपति सिंह रचना संचयन (साहित्य अकादेमी, 2012) 22. चन्द्रग्रहण (काञ्चीनाथ झा 'किरण', 2012) 23. मिथिलाक विदुषी महिला (अरुन्धती देवी, 2013) 24. अगिलेसुआ (कथा संग्रह, 2014) 25. मणिपद्म-चेतना (2013) 26. मैथिली लोकसाहित्य एवं लोक संस्कृति (2014) 27. मैथिली कथा नेपाल (कथा संग्रह, 2014) 28. लिली रेक रंगीन परदा (2014) 29. लिली रेक लाली गुराँस (2014) 30. लिली रेक विशाखन (2015) 31. लिली रेक नीक लोक (2015) 32. लिली रेक पटाक्षेप (2015) 33. लिली रेक उपसंहार एवं एकटा बड्ड पुरान गप्प (2015) 34. लिली रेक 'समयकें धडैत' (आत्मकथा, 2015) 35. जीबछ मिश्र रचनावली (2016) 36. आब की कविता करब हम? - महावीर झा 'वीर' (2016) 37. मैथिली कथा भाषा एवं शिल्प (2016) 38. तेजनाथ रचनावली (2017) 39. विद्यापति-चेतना (2017) 40. महाकवि लालदास: समय ओ रचना (2017) 41. मधुप-चेतना (2018) 42. लक्ष्मीपति सिंहकृत हिन्दी-मैथिली शिक्षक (2018) 43. हरिश्चन्द्रनृत्यं (1651, मल्लकालीन मैथिली नाटक, 2019) 44. आधुनिक मैथिली नाटक संचयन (साहित्य अकादेमी, 2019) 45. महाकवि लालदास रचनावली, गद्यखण्ड (2019) 46. मैथिली कथाक धाप (2020) 47. लिली रेक प्रतिनिधि कथा (2021) 48. लिली रे: व्यक्ति ओ रचना (2023) 49. राजा टंकनाथ चौधुरी श्रद्धांजलि (2024) 50. महाकवि लालदास रचनावली, खण्ड-2 (2024) 51. सरोज रचनावली (प्रेसमे) D. प्रकाशन (Publications)- अनुवाद (Translation) 1. मौलियरक दू नाटक (साहित्य अकादेमी, 1991) 2. छओ बिगहा आठ कट्ठा (फकीर मोहन सेनापति, साहित्य अकादेमी, 1999) 3. सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा (Universal Declaration of Human Rights - Unicode) 4. टाकाक गाछ (भारतीय रिजर्व बैंक) 5. लखपति जी लुटेलाह (भारतीय रिजर्व बैंक) 6. BE(A)WARE: वित्तीय ठकपनीक तरीकापर एक पुस्तिका (RBI, 2023)
पत्र-पत्रिका सम्पादन
1. कोषाक्षर (1982): भारतीय रिजर्व बैंक कर्मीक हिन्दी त्रैमासिक
2. प्रयोजन (1993-94): मैथिली मासिक
3. कथा-दिशा: मैथिली कथा मासिक (सम्पादक मंडल सदस्य)
4. घर-बाहर: मैथिली त्रैमासिक, चेतना समिति (सम्पादक)
सम्मान ओ पुरस्कार– रमानन्द झा 'रमण'केँ निम्नलिखित संस्था द्वारा सम्मानित कएल गेल अछि:
पुरस्कार एवं सम्मान
1. जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन पुरस्कार (1994-95): 'मैथिली नऽव कविता' पुस्तक लेल (राजभाषा विभाग, बिहार सरकार)
2. भाषा-भारती सम्मान (2004-05): 'छओ बिगहा आठ कट्ठा' लेल (CIIL, Mysore)
3. किरण पुरस्कार (2011): रहिका समाज, मधुबनी
4. साहित्यिकी सम्मान: सरिसब-पाही, मधुबनी
5. यात्री चेतना पुरस्कार (2024): चेतना समिति, पटना
२.३. कल्पना झा- साक्षात्कार
कल्पना झा
विदेहक डा. रमानंद झा 'रमण' विशेषांक लेल हमरा रमणजीक साक्षात्कार लेबाक भार भेटल। हम बारह गोट प्रश्नक प्रश्नावली दिनांक 26/05/2026 कऽ व्हाट्सएप्प पठा देने छलियनि। संगहि फोन एवं साक्षात् भेंट मे सेहो एहि लेल मोन पाड़ैत रहलियनि। रमणजी मैथिली साहित्य सँ जुड़ल नव-पुरान लोक केँ उचित दिशा-निर्देश देबाक पात्रता राखैत छथि। इएह बात सभ ध्यान मे राखि एहि साक्षात्कार लेल प्रश्न तैयार कएल गेल अछि। मतलब एकटा वरिष्ठ साहित्यकार रूप मे ओ समाज लेल की-कोना-कतेक किछु कएलनि, ताहि सभ सन्दर्भक प्रश्न सभ पूछल गेल अछि। पूछल गेल हमर प्रश्न सभ हुनकर साहित्यिक अवदान सँ संबंधित नहि अछि। एहि साक्षात्कारक माध्यम सँ एकटा स्थापित साहित्यकारक व्यक्तित्व केँ लोक जानि सकथि आ लाभान्वित होइथ; तेहन प्रश्न सभ अछि सभटा।
मुदा कोनो कारणवश हमरा रमणजीक उत्तर नहि भेटि सकल। तैं उक्त प्रश्नावली जस-के-तस प्रकाशित कएल जा रहल अछि। कम-सँ-कम पाठक लग ई प्रश्न पहुँचनि। ओना एकर उत्तर कोनो-ने-कोनो समय मे भेटत अवश्य; से आशा रखैत छी।
1) मैथिलीमे कोन विधा आवश्यकतासँ बेसी भऽ गेल छै, आ कोन विधाक एखन जरूरति छै?
2) संपादन माने की भेलै? मैथिलीमे जसकेँ तस कोनो सामग्रीकेँ एक भूमिका लीखि सेहो अपन नाम संपादकक तौरपर लिखा लैत अछि। एहिपर अपनेक की विचार अछि।
3) मैथिलीमे अधिकांशतः कोनो विधाक रचना पहिने छपैत छै बादमे ओकर पोथी। तऽ कोनो विधाक इतिहास कोन ठामसँ मानल जेबाक चाही, पत्रिका बला रचनासँ वा कि पोथी बला रचनासँ?
4) एक पत्रिकाक संपादक हिसाबें मैथिली पत्रिकाक भविष्यकेँ कोना देखैत छियै?
5) मैथिली साहित्यमे अहाँक प्रवेश आकस्मिक भेल वा कि पारिवारिक-सामाजिक पृष्ठिभूमिसँ सहायता भेटल?
6) जेनरेशन गैप जेना युवा के सामंजस्य बूढ़ संग नै होइत छै से मानल गेलैए। तहिना कोनो बूढ़ लेखक संगे दोसर बूढ़ लेखक के सामंजस्यपर अपनेक की विचार अछि?
7) मैथिली आलोचना-समीक्षा-समालोचनामे एकटा वाक्य अतिप्रसिद्ध अछि जे "ई रचना वा पोथी अपना सन पहिल अछि"। एकर माने की भेलै आ ई कतेक धरि उचित छै?
8) मैथिलीमे दू उदाहरण बहुत देल जाइत छै एक जे मैथिली भाषा बहुत पुरान छै आ दोसर जे मैथिलीमे ई काज पहिल बेर हमहीं कलेहुँ। ई दूनू उदाहरण एक दोसरक उन्टा छै एहिपर अपनेक की कहब अछि? की सभ काज एखने पहिल बेर भेलैए?
9) कोनो भाषा, साहित्य, संस्कृति लेल संस्था कतेक जरूरी छै? की एक समयक बाद संस्था अप्रसांगिक भऽ जाइत छै? वर्तमानमे संस्था सभ निराश करैत अछि वा कि भरोस दैत अछि?
10) मैथिली साहित्य मे 'गुटबाजी' सभदिन सँ चर्चाक विषय रहल अछि। मुदा किछु गोटेक मुहेँ एहनो सुनबा लेल भेटल अछि हमरा, "आब कोनो गुटबाजी नहि छै। सभ घालमेल बुझू।" अपनेक की कहब अछि, एहि सन्दर्भ मे?
11) मैथिली साहित्य मे केओ ककरो द्वारा कएल नीक काजक सराहना नहि करैत देखाइत छथि। विशेष रूप सँ वरिष्ठ साहित्यकार लोकनिक कोनो उत्साहवर्धक टिप्पणी नहि अभरैत अछि, जखन कि बहुत रास नऽब आ नीक काज भऽ रहल अछि। मैथिली साहित्य सँ जुड़ल लोकक एहि बेमारीक की कारण भऽ सकैत अछि?
12) एकटा वरिष्ठ साहित्यकारक रूप मे अपने स्थापित छियै। अपने साहित्य मे रुचि रखनिहार कतेक नवागन्तुक के आगाँ बढ़बा मे सहयोग केलियनि? यथा मनोबल बढाएब, मार्गदर्शन करब।
२.४. कल्पना झा- मैथिली कथाक वैविध्य आ गाम्भीर्य केँ रेखांकित करबाक सफल प्रयास
कल्पना झा
मैथिली कथाक वैविध्य आ गाम्भीर्य केँ रेखांकित करबाक सफल प्रयास
रमानन्द झा 'रमण' जीक रचना संसार बेस नमहर छनि। हुनकर रचना-संसारक नमहर लिस्ट मे सँ मात्र एकटा पोथी "मैथिली कथाक धाप" हम किनने छी। पढ़ने छी। सम्पादकक लिखल पचास पन्नाक भूमिका एहि पोथी केँ 'विशेष' बना देलक अछि। 'महत्वपूर्ण' बना देलक अछि। एहि पोथीक प्रकाशन मे सम्पादकक जे समय आ श्रम लागल छनि, से स्पष्ट देखा पड़तनि पाठक केँ। एहि पोथीक अतिरिक्त रमानन्द झा 'रमण'क लिखल नमहर-नमहर आलेख सभ निरन्तर पढ़ैत रहल छी हम पछिला पाँच-छओ बरख सँ। फेसबुक पर। बहुत लोक पढ़ैत होएब। गहन अध्येता छथि, से बुझबा मे तँ ककरो भाङ्गठ नहिए होएत। हुनकर लिखल कइअक टा शोधपरक आलेख सभ पढ़ि अजगुत मे पड़ि जाइत छलहुँ/छी, ई सोचि जे कोना एतेक समय निकालैत छथि पढ़बा-लिखबा लेल। ओएह चौबीस घंटाक दिन-राति सभ लेल होइत छै ने...ओही चौबीस घंटा मे नित्य प्रतिक क्रिया-कलाप रहैत छै, सुतबाको रहैत छै लोक केँ आ तखन पारिवारिक, सामाजिक जिम्मेदारी निभाबैत साहित्य लेल एतेक समय निकालब वास्तव मे प्रशंसनीय अछि। अनुकरणीय सेहो।
तँ सएह जतबा-जे पढ़ल अछि हमर, ताहि पर अपन सीमित ज्ञान-बुद्धिक अनुरूप किछु प्रतिक्रिया टीपि रहल छी विदेहक डॉ. रमानन्द झा 'रमण' विशेषांक लेल।
मैथिलीक हेराएल-भोतिआएल, अनुपलब्ध कथा सभ केँ सङ्कलित-सम्पादित कऽ एहि वृहत् संग्रह 'मैथिली कथाक धाप'क प्रकाशन महत्वपूर्ण काज छनि रमानन्द झा 'रमण'क। ई काज एहन छलए जे प्रायः हिनकहि बुत्ताक बात छलए (हमर अनुमान)। आर ककरो बुतेँ किन्साइते पार लगितनि। कारण विभिन्न पत्र-पत्रिकाक दोग-दाग आ झोंझ मे पड़ल, कुहरैत मैथिली कथा-साहित्यक एहन अमूल्य धरोहरि केँ ताकि-हेरि इकट्ठा करब श्रमसाध्य काज छलए। एहि काज लेल श्रमक संग समय सेहो पर्याप्त मात्रा मे खर्च कएलनि अछि रमानन्द झा 'रमण'। पूरे पचास साल। हिनकर ई महत्वपूर्ण काज भाषा-साहित्यक अध्ययन-विवेचन कएनिहारक लेल निस्सन्देह सहयोगी सिद्ध हेतनि।
"मैथिली कथाक धाप" पोथीक विषय-वस्तु केँ दू खण्ड मे विभक्त कएल गेल अछि। पहिल खण्ड मे कुल छब्बीस गोट कथाकारक पूर्ण/अपूर्ण कथा सभ संलग्न कएल गेल अछि। किछु अपूर्ण कथा सेहो संकलित करबाक पाछाँ सम्पादकक ध्येय ई छलनि जे भविष्यक अनुसन्धानकर्ताक समक्ष एतबो तँ रहतनि। उपलब्ध अंशहु सँ कथा आ कथाकारक अभीष्टक बोध अव्यक्त नहिए रहतनि अनुसन्धानकर्ता लोकनि केँ, सएह सोचि अपूर्णहु कथा केँ स्थान देल गेल अछि पोथी मे। एहि छब्बीस गोट कथाकारक कथा सभ मे सँ एक-दू टा छोड़ि सभटा कथाक प्रकाशन अवधि 1940 ई. अभ्यन्तर कहलनि अछि सम्पादक महोदय। संगहि इहो कहलनि अछि, एहन बात नहि जे एहि पोथी मे जतेक कथा संकलित अछि, ततबे ओहि अवधि मे लिखाएल आ छपल। सम्पादक स्वीकार कएलनि अछि जे ई हमर अक्षमता आ संसाधनहीनता थिक जे हम एतबे लोढ़ि सकलहुँ। एहि तरहक कैक टा संग्रह तैयार कएल जा सकैत अछि एखन, से कहब छनि सम्पादकक।
एहि पोथीक दोसर खण्ड (पृष्ठ संख्या 495 सँ 560) मे संकलित अछि किछु आख्यायिका, आख्यान एवं उपाख्यान, जे समय-समय पर पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित भेल छल। जाहि सात गोट लेखकक महत्वपूर्ण आख्यान, उपाख्यान केँ एहि पोथी मे संलग्न कएल गेल अछि ताहि मे छथि लालदास, म.म.परमेश्वर झा, पं. हरिनारायण झा, म.म.मुरलीधर झा, पं. मनमोहन मिश्र, पं. त्रिलोचन झा आ पं. मुकुन्द झा। ई आख्यान, उपाख्यान सभ पोथी मे संकलित करबाक उद्देश्य संरक्षणक संग अध्ययन-विवेचन लेल सुलभ करब छनि। एहन कहब छनि सम्पादकक। मैथिली साहित्यक इतिहास मे एहि सभ काजक उल्लेख अवश्य भेटत मुदा पाठ लेल उपलब्धता दुर्लभ छलए। सएह दुर्लभ बस्तु सभक संकलन कऽ कऽ बड़का उपकार कएलनि अछि सम्पादक रमानन्द झा 'रमण'क। प्रायः पहिल बेर आख्यायिका, आख्यान एवं उपाख्यानक आस्वादनक अवसर सुधी पाठक केँ भेटि रहल छनि, एहन दावा कऽ रहल छथि सम्पादक अपन लिखल भूमिका मे।
मिथिला मे तीन कोटिक कथाक प्रचलन अदौ काल सँ रहल अछि। पहिल, शिष्टवर्ग द्वारा कहल, संकलित वा लिखित कथा। दोसर कोटिक कथा ख्यात भेल 'लोककथा'क नाम सँ, जे एक कण्ठ सँ दोसर कण्ठ धरि जाइत संक्रमित भेल। आ तेसर कोटि मे आबैत अछि व्रत एवं पाबनि-तिहारक कथा। जेना-मधुश्रावणी कथा, वटसावित्री व्रत कथा, सपता-विपताक कथा। मिथिलाक स्त्री-पुरुष दुनू, आइ सँ नहि अदौ काल सँ कथा-कौशल मे दक्ष रहैत आएल छथि। तैं ने मिथिलाक लोक 'गप्पी' कहबैत अछि। 'गप्प' हाँकब सेहो एक तरहक कथे कहब ने कहल जाएत। आ तैं मैथिली कथाक धाप ठेकनाबैत-ठेकनाबैत सम्पादक रमानन्द झा 'रमण' केँ वर्तमान सँ बहुते पाछाँ जाए बहुत किछु ताकए-हेरए पड़लनि। कठिन श्रमक उपरान्तहि मैथिली कथाक विकासक कारणक चर्चा करैत मैथिली कथाक विकासक चरण धरि स्पष्ट कऽ देलनि अछि। मैथिलीक आद्यकथा पर पसरल 'भ्रम'क चर्चा, संगहि भ्रम-निवारणक प्रसंग, सभ किछु फड़िछा कऽ पाठकक सोझाँ रखबा मे सफल भेलाह अछि सम्पादक। मैथिली कथाक प्रस्थान बिन्दु 'पुरुष-परीक्षा' नहि अछि, सेहो स्पष्ट कएल गेल अछि सम्पादक द्वारा। आ मैथिली कथाक प्रस्थान बिन्दु 'पुरुष-परीक्षा' केँ किएक मानल जा रहल छलए, तकर कारण सेहो स्पष्ट कएल गेल अछि। सन्दर्भ-ग्रन्थ, सन्दर्भ पत्रिकाक प्रकाशन-वर्ष पर्यन्तक उल्लेख करैत अपन बात रखलनि अछि सम्पादक।
मैथिली कथाक विकासक कारण पर प्रकाश दैत सम्पादकक कहब छनि जे जहिना अन्य-अन्य क्षेत्र मे विकास होइत गेल छैक, तहिना कथाक विकास सेहो विभिन्न कारण सँ भेल अछि। डॉ. जयकान्त मिश्र मैथिली कथाक विकासक तीन कारण मानलनि अछि -
1. संस्कृत कथा-साहित्यक अनुवाद एवं ओहिपर आधारित कथा
2. संस्कृत कथा-साहित्यक विषय-वस्तुक आधार पर लिखित कथा, एवं
3. संस्कृत आख्यान-उपाख्यान आदि शैली मे स्वतंत्र विषय-वस्तुक आधार पर लिखित कथा।
सम्पादकक कहब छनि जे जखन ज्योतिरीश्वरक समय मे मैथिल समाज मे कथा-वाचनक प्रचलन छलैक एवं चौंसठि कला मे कथा-कौशल परिगणित छल, तखन संस्कृत कथा-साहित्यक अनुवाद एवं ओहिपर आधारित कथा वा अन्ये शेष दू कारणेँ मैथिली कथाक विकास भेल अछि, से मानब कतेक ऐतिहासिक एवं औचित्यपूर्ण अछि ? की ज्योतिरीश्वरक बाद लोकानुरञ्जनक कथा-कौशल साधन समाप्त भऽ गेलैक ? मैथिलक जीवन मे लोकानुरञ्जनक हेतु प्रयुक्त हास्य-व्यंग्यक महत्व नहि रहल ?
डॉ. रमानन्द झा 'रमण'क कहब छनि जे कथा-वाचनक मुख्य प्रयोजन छल लोकानुरञ्जन। अर्थात् लोकानुरञ्जनकता कथाक प्रमुख विशेषता भेल। साहित्यक अनेक प्रयोजन मे 'शिवेतर क्षतये' सेहो एक प्रयोजन अछि। अर्थात् लोकक मंगल-कामना हेतु 'अ'शिवक क्षति कऽ, शिवक प्रतिस्थापन करब। कथाक माध्यम सँ विघटनकारी तत्व पर प्रहार एवं तकर निराकरण सहज एवं सुलभ होइत अछि। मनोरञ्जक एवं लोक-मंगलकारी तत्वक सम्मिलन सँ पाठक/श्रोता पर स्थायी प्रभाव सुगमतापूर्वक पड़ैत छैक। श्रोता वर्गक मानसिक धरातल एक समान नहि रहैत छल, तैं विषय-वस्तुक विविधताक संगहि ओ अनेक दिशा मे होइत गेल।
मिथिलाक जन-जीवन मे व्रतकथा एवं हास्य-व्यंग्य कथाक महत्व कने बेसीए रहल अछि। विशेष रूप सँ व्रतकथा सभ कमोबेश सम्पूर्ण मिथिलाक गाम-घर मे, घर-घर मे समान रूप सँ कहल-सुनल जाए लागल। के कहैत छथि आ ककरा सम्बोधित अछि, तकर संकेत वाचकक कथन-भंगिमा सँ बूझल जा सकैछ। एहि व्रतकथा सभक लक्ष्य आदर्श जीवन-मूल्यक अनुसरण करबा लेल प्रेरित करब थिक। मैथिल समाज मे लोकानुरञ्जनक हेतु हास्य-व्यंग्यक प्रयोगक सुदीर्घ परम्पराक पुष्टि 'वर्णरत्नाकर' मे 'कुटिनी-वर्णन' सँ सेहो होइत अछि।
तहिना 'धूर्तसमागम' मे जाहि प्रकारेँ ज्योतिरीश्वर पात्रक निर्माण कऽ, सामाजिक विकृति पर व्यंग्य कएने छथि अथवा कवि कोकिल विद्यापतिक 'पुरुष-परीक्षा'क विभिन्न कथा मे हास्य-व्यंग्य अछि, से मैथिल जीवन मे हास्य-व्यंग्यक महत्वक सुदीर्घ परम्पराक परिचायक थिक। प्रोफेसर जयकान्त मिश्रक ई निष्पति तथ्याधारित अछि जे हमरा लोकनिक साहित्य मे जखन मिथिलाक चर्च होइत अछि, एहिठामक निवासीक समृद्धि एवं विनोदी प्रवृत्तिक वर्णन सेहो होइत अछि।
मैथिलीक कतेको बहुमूल्य साहित्य एवं सांस्कृतिक सम्पदा कालक्रमेँ विनष्ट होइत गेल, जकर अस्तित्व मे होएबाक सूचना आन-आन स्रोत सभ सँ भेटैत छैक। स्पष्टत: कहल जा सकैछ जे मिथिला मे कथा-वाचनक सुदीर्घ परम्परा रहल अछि। हँऽ...समय एवं समाजक प्रयोजनक अनुरूप ओकर विषय-वस्तु, भाषा-शैली एवं कथन-भंगिमा मे परिवर्तन अवश्य होइत रहल। आ जखन आधुनिक काल मे साहित्यक एहि लोकानुरञ्जक विधा केँ शास्त्रीय मान्यता प्राप्त भेलैक, तँ शास्त्रीय दृष्टि सँ साहित्यिक रचना पर विचारक लेल सभ सँ पहिने लिखित सामग्रीक आवश्यकता होइछ, कण्ठगत रहब पर्याप्त नहि रहैछ।
मैथिलीक आद्यकथा 'चन्द्रप्रभा'क प्रसंग अनेक भ्रम पसरल छल, ओहि भ्रम-निवारण आ 'चन्द्रप्रभा'क विषय-वस्तु आदि पर सम्पादक महोदय लगभग चारि पन्ना खर्च कएने छथि। से उचिते खर्च कएने छथि। सम्पादकक कहब छनि, "1880क धऽक मे वा ओहि सँ पहिने लिखित 'चन्द्रप्रभा' एक एहन कथाकृत थिक, जतए सँ मैथिली मे मौलिक कथा-लेखनक प्रस्थान-बिन्दु मानब सर्वथा तथ्यसंगत आ ऐतिहासिक होएत। 'चन्द्रप्रभा' कोनो पौराणिक कथा, आख्यान वा उपाख्यानक आधार पर लिखित नहि अछि, अपितु पञ्चतन्त्रक शैली मे एवं प्रतीकात्मक माध्यम सँ अपन समय आ परिवेश केँ अभिव्यक्त करैत अछि।
"मैथिली कथाक विकासक चरण" पर चर्चा करबाक क्रम मे दू टा विद्वानक मत सोझाँ आएल अछि। पहिल प्रोफेसर भक्तिनाथ सिंह ठाकुरक, जे मैथिली कथाक विकासक तीन चरण मानलनि अछि -
1. प्राचीन काल, अर्थात् प्राचीन काल सँ 1920 वा 1925 ई. धरि
2. मध्यकाल, अर्थात् 1920 वा 1925 ई. सँ 1935 ई. धरि, तथा
3. आधुनिक काल, अर्थात् 1930 वा 1935 ई. सँ अद्यपर्यन्त
आ दोसर डॉ. जयधारी सिंहक मतक उल्लेख कएल गेल अछि। डॉ . सिंहक अनुसार मैथिली कथाक विकासक छओ टा चरण अछि -
1. प्रथम उत्थान - 1920 सँ 1938 ई. धरि
2. द्वितीय उत्थान - 1938 सँ 1945 ई. धरि
3. तृतीय उत्थान - 1945 सँ 1950ई. धरि
4. चतुर्थ उत्थान - 1950 सँ 1956 ई. धरि
5. पञ्चम उत्थान - 1960 सँ 1970 ई. धरि
6. छट्ठम उत्थान - 1971 सँ (भारती मण्डन भाषणमाला, 1973 ई.) अद्यपर्यन्त
हालांकि सम्पादक दुनू विद्वानक मत केँ अव्याप्तिदोष सँ युक्त कहलनि अछि। आ एकर पाछाँक मूल कारण विभिन्न पत्र-पत्रिका मे छिड़िआएल कथा सभक अनुपलब्धता केँ मानि रहल छथि सम्पादक। सम्पादक स्पष्ट कहलनि अछि जे मैथिलीक छिड़िआएल कथा सभ केँ ताकबाक प्रयास नहि कएल गेल, ओकरा प्रति उदासीन रहि, संकलन-प्रकाशन-संरक्षण केँ महत्व नहि देल गेल। एहि उदासीनताक प्रतिकूल प्रभाव मैथिलीक कथा-साहित्य मात्रे पर नहि, सम्पूर्ण मैथिली भाषा-साहित्य पर पड़ल।
आगाँ अपन लिखल भूमिका मे सम्पादक महोदय "कथाक प्रवृत्ति" आ "कथाक भाषा एवं शिल्प"क चर्चा सेहो कएलनि अछि। विस्तारपूर्वक चर्चा कएलनि अछि।
परतन्त्र भारत मे राष्ट्रीय क्षितिज पर घटैत घटना, सामाजिक सुधारवादी आन्दोलनक प्रभाव एवं ओहि प्रसंग विभिन्न विद्वानक मतक विवेचनक उपरान्त समीक्ष्य अवधिक कथाक प्रवृत्ति दू वृहत्तर कोटि मे विभाजित कऽ अध्ययन कएल जा सकैछ -
1. राष्ट्रीय चेतनामूलक कथा, एवं
2. सामाजिक सुधारवादी कथा।
सम्पादकक कहब छनि जे राष्ट्रीय चेतनामूलक कथाक संख्या अपेक्षाकृत कम अछि। अभावक मूल कारण थिकैक गुण-ग्राह्यक अभाव आ मैथिलक हास्य-व्यंग्यप्रियता। अनकर खसब आ अनकर टेटर देखि हँसबाक प्रवृत्ति। राजनीतिक-प्रशासनिक कारणेँ पत्र-पत्रिकाक सम्पादकक नीति झाँपले रहैत छलैक। तथापि जे किछु लिखल गेल आ उपलब्ध अछि, सएह प्रमाणित करैत अछि राष्ट्रीय चेतनामूलक कथाक धारा प्रवहमान छल, किन्तु सामाजिक सुधारवादी कथाक धारा जकाँ ओकर पाट चाकर नहि छलैक। एकर अनेक ऐतिहासिक, राजनीतिक आ सामाजिक कारण छलैक।
अपन लिखल पचास पन्नाक भूमिका मे सम्पादक राष्ट्रीय चेतनामूलक मैथिलीक आरम्भिक कथाक प्रवृत्तिक विवेचन किछु मुख्य बिन्दु केँ हाइलाइट करैत कएलनि अछि, जे एहि तरहेँ अछि -
1. राजनीतिक जागरण
2. न्याय-व्यवस्था पर प्रहार
3. पाश्चात्य शिक्षा-प्रणालीक सांस्कृतिक दुष्प्रभाव
4. मिथिला मे पदस्थापित बहरिआ अमला-अधिकारी द्वारा मैथिलक उपेक्षा-अपमान
5. धर्म-स्थान सँ महिलाक अपहरण
6. स्थानीय रोजगारक अभाव, पड़ैनी
तहिना सामाजिक सुधारवादी कथाक कथानक कोन तरहक समस्या सभ पर आधारित रहैत छल, तकरहु विवरण क्रमवार तरीका सँ कएल गेल अछि सम्पादक द्वारा। किछु समस्या सभ तँ एखनहुँ जस-के-तस विद्यमाने अछि मैथिल समाज मे, भले ओकर रूप परिवर्तित भऽ गेल हो। निम्नलिखित बिन्दु पर सामाजिक सुधारवादी कथाक प्रवृत्तिक विवेचन कएल गेल अछि -
1. वैवाहिक समस्या (बहु-विवाह मतलब एकटा पुरुषक एक सँ अधिक कन्याक संग विवाह करब, बेमेल विवाह, शर्त-पूर्तिक लेल टाकाक व्यवस्था सँ उत्पन्न समस्या)
2. अशिक्षा-निवारण
3. महिला-उत्पीड़न, घरेलू हिंसा
4. प्रतिवाद/विरोधक स्वर
5. प्रेम-समर्पण-मिलन-वियोग
6. अन्धविश्वासक खण्डन
7. माल-जालक चिन्ता
8. समय सँ आगाँक धाप
9. कथाक समाज आ लोक
मिथिलाक आरम्भिक कथाक माध्यम सँ मैथिल समाज केँ देखला पर समाजक जे चित्र समक्ष आबैत अछि, भयावह अछि। निराशाजनक अछि। मिथिला मूल समस्या भूख, अभाव, रोग-शोक, रौदी-दाही, बेरोजगारी, पड़ैनी, सभदिनाँ रहल अछि। मैथिली कथाक विकासक आरम्भिक दौर मे विदेशी शासकक शोषण एवं अत्याचार सँ मुक्तिक स्वर सेहो प्रखर छलैक। समस्त मिथिला शोषण एवं अत्याचार सँ आक्रान्त छल। मैथिलीक बेसी कथा एही समस्या सभ पर केन्द्रित भेटत। मुदा मैथिली साहित्यकार लोकनि अपन रचना सभ मे जाति-धर्म निरपेक्षताक भाव जीवन्त रखलनि। मात्र समस्या पर फोकस रहलनि साहित्यकार लोकनिक।
'भाषा-चिन्ता' पर मनन कएने बिना मैथिली कथाक धाप पर चर्चा अपूर्णे रहि जाइत, से स्मरण छलनि सम्पादक डॉ. रमण केँ। समाजक आवश्यक अंग थिक भाषा। इएह सम्पर्कक माध्यम थिक। मैथिलीक अनेक कथा सभ मे सेहो मैथिली भाषाक लेल चिन्ता पात्रक माध्यम सँ भेल अछि। चाहे ओ कटाक्ष रूप मे हो, सामान्य कथोपकथन मे सहज रूप मे चर्चा भेल हो।
'प्रवृत्तिक विकास'क क्रम पर सेहो लिखलनि अछि सम्पादक। समयक संग साहित्यक प्रवृत्ति सेहो बदलैत छै। एकर प्रमाण उक्त पोथी मे संकलित कथा सभ मे पर्याप्त मात्रा मे देखबा लेल भेटल। जेना तारा (ताराक वैधव्य) किछु नहि बजैत अछि। सभ किछु चुपचाप सहने जाइछ। मुदा कमला (कमला) बजैत अछि। अपन हृदयक बात सखि संग बतिआइत अछि। विषपानक उपरान्त अपन पिता आ विवाहक लेल आएल बूढ़ वर केँ सेहो कहि दैत अछि। गौरी (गौरी) चुपचाप सहि लैत अछि मुदा रेवा आत्मरक्षा लेल छूरी उठा लैत अछि। प्रेम मे असफल मानसी (अटूट प्रेम) प्रेमीक संग डूबि मरैत अछि मुदा सरोजनी अन्ततः एक भए गेलीह, 'महिलारत्न' कहएलीह। एहि सभ सँ बढ़ि 'विवाह' एवं 'चतुर्थी'क नवविवाहिता अपन माता-पिताक आर्थिक स्थितिक वर्णन पतिक समक्ष करैत अछि आ व्यवस्थाक टाका वापस भऽ जाइत छैक।
कथाक प्रवृत्तिक उपरान्त चर्चा अछि कथाक 'भाषा एवं शिल्प'क। मैथिली कथाक भाषा पर तीन प्रकारेँ विचार कएल जेबाक चाही -
1. भाषावैज्ञानिक दृष्टि सँ
2. साहित्यिक दृष्टि सँ
3. मैथिलक दृष्टि सँ।
एकर अतिरिक्त कथाक भाषाक विवेचनक प्रसंग मे लेखकीय भाषा आ पात्रक भाषाक प्रश्न सेहो आबैत अछि। लेखकीय भाषा व्याकरणिक दृष्टि सँ एक सीमा धरि शुद्ध आ मर्यादित/अनुशासित होएब आवश्यक रहैछ। पात्रक भाषाक लेल शुद्धता, मर्यादित आ अनुशासित होएब आवश्यक नहि। पात्रक भाषा ओ भेल जे पात्र बजैत अछि। पात्रक अतिरिक्त प्रयुक्त भाषा लेखकक भाषा मानल जाइत अछि। पहिने लेखक आ कथाक पात्र सामान्यतः एक्कहि पृष्ठभूमिक होइत छल। मुदा कालक्रमेँ आक्रान्ता एवं उपनिवेशवादी शक्तिक, भाषा एवं संस्कृति पर व्यापक प्रभाव पड़ल। विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्रक लोक सँ लोकक सम्पर्क बढ़ल। एहि सँ भाषा एवं संस्कृति प्रभावित भेल। एहि सँ कथाक विषय-वस्तु आ कथाक भाषा मे परिवर्तन आ विस्तार आएल।
'भाषा एवं शिल्प'क तहत कथाक आरम्भक प्रकार पर सेहो चर्चा कएल गेल अछि। कथा प्रारम्भ करबाक अपन-अपन तरीका होइत छै, सभ लेखकक। जेना - कथाक निष्कर्षात्मक आरम्भ, कथाक प्रश्नात्मक आरम्भ, कथोपकथन सँ कथाक आरम्भ, वातावरण निर्माण सँ कथाक आरम्भ, इत्यादि। कथा मे गीतक प्रयोगक परम्परा सेहो रहल अछि। कथा मे गीतक प्रयोग सँ कथाक रागात्मकता बढ़ि जाइत छै।
"मैथिली कथाक धाप" पोथी मे संकलित कथाक लेखन-शैली मे वैविध्य अछि, मतलब जे कथा जेना लिखल गेल छलए (ओहि समयक प्रचलित भाषा-शैलीक अनुरूप) तहिना प्रकाशित कएल गेल अछि। एकरूपता आनबाक लेल मूल रचनाक संग कोनो तरहक छेड़-छाड़ नहि कएल गेल अछि सम्पादक द्वारा। कोनो पोथीक चर्चा करैत डॉ रमण कहलनि अछि जे एकटा संग्रह देखल अछि, जाहि मे लेखन-शैली बदलि सम्प्रति प्रचलित लेखन-शैलीक अनुरूप कऽ देल गेल छलए, ओहि पोथीक सम्पादक आ हुनक सहयोगी द्वारा। मुदा "मैथिली कथाक धाप"क सम्पादक एहि तरहक कोनो प्रयोग करबाक प्रयास नहि कएलनि अछि। मैथिली कथाक वैविध्य आ गाम्भीर्य केँ रेखांकित करबाक एहि सफल प्रयासक सराहना कएल जेबाक चाही।
२.५. आभा झा- नान्य पन्था विद्यते अनयाय
डॉ. आभा झा (संस्कृतक शिक्षिका, विद्वान एवं समीक्षक)
’नान्य: पन्था: विद्यते अनयाय’
मनुष्यक रुचि-प्रवृत्तिक अनुसार जीवनयापनक साधन सुलभ हो, ई जरूरी नहि। खास क’ भारतमे बेरोजगारी आ अर्धबेरोजगारीक जे स्थिति आजादीक 79 बरखक बादो विद्यमान अछि ओहिमे त’ एकटा सामान्यो नोकरी पायब किंवा व्यक्तिगत आ पारिवारिक जिम्मेदारी पूरा करबा लेल अर्थोपार्जनक साधन जुटा लेब भगीरथ- प्रयत्नक अपेक्षा रखैछ। तेँ आजीविका लेल अभिरुचिक क्षेत्र तकबाक श्रममे हमरा लोकनि अपसियाँतो नहि होइ छी। अध्ययन-समाप्तिक उपरान्त जीविकोपार्जन लेल एकटा सम्मानजनक साधन भेटि जाय, ई मात्र ध्येय रहैत छैक मध्यमवर्गीय परिवारक। जॅं पलखति भेटय त’ काते-कात अपन प्रवृत्तिक अनुरूप हौबी ताकि मनस्तोष पबैत अछि सामान्य लोक। एहि क्रममे परिस्थितिवश कतोक बेर मनुष्य अपन समयक बहुलांश नोकरी मात्र लेल व्यतीत करैत अछि आ बाकी सभ सौख- मनोरथ मनक कोनमे उपेक्षित पड़ल रहि जाइत छैक। अस्तु, एहि स्थिति पर ध्यान देबाक किंवा किछु लिखबाक प्रयोजन एहि हेतु पड़ल जे एहि बीच श्री रमानन्द झा रमण केर पोथी सभक अध्ययन करैत ई प्रतीत भेल जे बैंक सन नीरस संस्थानमे काज करैत जे व्यक्ति साहित्यिक क्षेत्रमे एतेक रुचि रखैत छथि, उपलब्ध साहित्यक आलोचन-मूल्याङ्कनकेँ मैथिली साहित्यक भविष्य लेल हितकर बुझैत छथि, विलुप्तिक कछेर पर जाइत साहित्यिक संपदाक संरक्षणकेँ अपन चरम- परम कर्त्तव्य मानैत छथि आ उपलब्ध साहित्यक औचित्य-अनौचित्य, सार्थकता-निरर्थकता, सामाजिक प्रभावशालिता अथवा केवल वाग्विलासपरकताक निरपेक्ष निरीक्षण-परीक्षण करबाक साहसिक डेग उठबैत छथि, ओहि व्यक्तिकेँ जॅं अपन संपूर्ण समय साहित्यिक क्षेत्रमे यापित करबाक अवसर भेटितनि त’ ओ कतेक आओर उपादेय लेखादिक अवदान पाठककेँ द’ सकैत छलथि? अस्तु, ई सभ प्रश्न एक दिशि आ दोसर दिशि अछि बैंकिंग सेवामे कार्यरत (एखन सेवानिवृत्त) श्री रमानन्द झा रमण केर मैथिली साहित्यमे कएल विपुल समीक्षात्मक, आलोचनात्मक आ गवेषणात्मक काज! ई संख्यात्मक आ गुणात्मक दृष्टिमे एतबा जरूर अछि जे पढ़ि अनेक नव पाठक आ लेखक मैथिली साहित्यक परिचय एक झलकमे (At a glance) पाबि सकथि, जकरा आधार बना कए आलोचनात्मक काजक अगिला पड़ाव पर पहुँचि सकथि आ साधार सहमति वा असहमतिक अभिव्यक्तिक बल पाबि सकथि।
आइ जखन श्री रमण सरक पोथी विषयक किछु गप कए रहल छी त’ ईहो प्रतीत भेल जे मनुष्यक जन्मजात प्रकृतिक संग वृत्ति सेहो ओकर कार्यप्रणालीकेँ निर्देशित प्रभावित करैत छैक। एकटा बैंककर्मी लेल जहिना दस्तावेजी प्रमाण, सटीकता आ परिशुद्धता, तटस्थता आ अनुशासन ओकर कर्त्तव्य होइत छैक तहिना कोनो समीक्षक साहित्यकार सेहो अपन शोध आ लेखनमे व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनयबा लेल प्रतिबद्ध होइत अछि, अपन कथ्यक पुष्टीकरण लेल आवश्यक साहित्यिक प्रमाण सोझाँ रखैत अछि आ ओकर विवेचनक क्रममे पूर्वाग्रह मुक्त दृष्टिकोण रखबाक नैतिकताक पालन करैछ। संक्षेपमे, दुहू पेशामे गंभीरता, प्रामाणिकता आ सटीकताक आवश्यकता होइत छैक।
ई प्रायः हम सभ जनैत छी जे मैथिलीभाषामे आलोचना-विधाक प्रतिष्ठामे गंभीरता, संतुलन आ बौद्धिकताक समावेश होइ ,एहिमे श्री रमानंद झा रमण केर योगदान अत्यन्त महत्वपूर्ण अछि। हुनक पोथी सभक अध्ययनसॅं ई स्पष्ट होइत अछि जे लेखक मैथिली साहित्यक उपलब्ध कृतिक विवेचनाक माध्यमसॅं ओकर उपादेयतासॅं पाठककेँ अवगत त’ करबिते छथि,संगहि अनुपलब्ध साहित्यक खोज करैत छथि,ओकरा उपरयबाक श्रम करैत छथि, विभिन्न प्रकाशकक सहयोगसॅं ओकरा पुनः छपा पाठकक उपकार करैत छथि आ पूर्वज लेखकक कृतिकेँ नष्ट होयबासॅं यथाशक्ति बचा ऋषिऋणक शोधन सेहो करैत छथि। एहि तरहेँ ओ मात्र साहित्यक मूल्यांकनकर्ता नहि, अपितु एकटा दूरदर्शी चिंतकक भूमिका सेहो निमाहैत छथि।
साहित्यमे मात्र कथा आ कवित्तक रूपमे भावनाक कल्पनामय सुंदर अभिव्यक्ति नहि, अपितु संतुलित विचार,भाषिक संरचना, सामाजिक तथ्यात्मकता आदि विषयक समन्वित अध्ययन आवश्यक अछि। काव्यशास्त्रीय भाषामे कारयित्री ओ भावयित्री प्रतिभाक रूपमे एकर सम्मानजनक स्वीकृति प्राचीनकालहिसॅं अछि। भावयित्री प्रतिभाक धनी रमानंद झा रमण केर आलोचनाक महत्वपूर्ण विशेषता ओकर वस्तुनिष्ठता अछि। हुनक प्रयास रहलनि अछि निष्पक्षताक संग साहित्यक मूल्यांकन हो आ एहि क्रममे जतय आवश्यक बुझेलनि, ओतय स्पष्ट रूपसॅं अपन असहमति सेहो प्रकट कएलनि अछि। एकटा लेखमे ओ जीवित साहित्यकारक पोथीक आलोचनाक उपरान्त सोझाँ आयल अप्रिय स्थितिक चर्चा सेहो करैत छथि, जखन कि कोनो रचनाक आलोचना रचनाकारक आलोचना नहि होइत छैक। कोनहु साहित्यिक कृतिक मूल्यांकन ओकर कथ्य, शिल्प, भाषा, शैली आ सामाजिक संदर्भक आधार पर कएल जयबाक स्वस्थ परम्परा आगामी लेखक लेल एकटा आदर्श व्यवस्थित मानदण्डक निरूपण सेहो करैत अछि। एहि सभ तथ्यक यथाशक्ति ध्यान रखैत लेखक सरल, स्पष्ट आ प्रभावशाली भाषामे अपन कथ्य सटीक रूपमे प्रस्तुत करैत छथि। लेखकक शैली विश्लेषणात्मक छनि, कथन सप्रमाण आ कथ्य स्पष्ट, जाहिसॅं पाठक आ लेखक दुहू उपकृत होइत अछि आ साहित्यक प्रति गंभीर दृष्टिकोण रखबा लेल प्रेरित होइत अछि। हिनका द्वारा लिखित, संपादित ओ अनूदित पोथी सभ शोधार्थी, साहित्यकार आ सामान्य पाठको लेल अत्यन्त उपयोगी अछि। एतय हम संक्षेपमे लेखकक किछु पोथी आ तकर वर्ण्य-विषयक संक्षिप्त परिचय देबाक प्रयास कए रहल छी, जाहिसॅं जिज्ञासु छात्र ओहि पोथीकेँ ताकि-हेरि पढ़बाक उपक्रम कए सकथि।
लेखकक पहिल आलोचनाक पोथी अयलनि 1981-82 मे ‘नवीन मैथिली कविता’। ई पोथी दू खण्डमे विभाजित अछि। पहिल खण्डमे दस गोट लेख अछि जे मैथिली साहित्यमे नवकविताक प्रवेशक पड़ताल करैत अछि, ओकर रूपविधान पर दृष्टि दैत अछि, प्रतिक्रिया आ विद्रोहक तरमे बौद्धिकता आ जीवन-मूल्यक अन्वेषण करैत अछि आ ओहिमे पाठकीय संकटक स्थितिक वास्तविकता आ तकर कारण धरि पहुँचबाक प्रयास करैत अछि। ताहि समयमे अन्य भारतीय भाषामे नवकविताक चलनिसारक देखा-देखी मैथिलीमे सेहो प्रयोगात्मक कविता लिखय जाय लागल छल, परम्परावादी कवि द्वारा एहि नवविधाक विरोध स्वाभाविके छल, मुदा एहि विधाक पक्षधर अपन प्रबल तर्कसॅं विरोधी मतावलम्बीकेँ पेटकुनियाँ दिअयबा लेल उताहुल छल। एहि परिस्थितिमे एकटा जागरूक लेखक अपन कर्त्तव्य निर्धारित करैत छथि कविताक प्रवृत्ति, शैली, वर्ण्य-विषय आ विद्रोही तेवरसॅं साक्षात्कार करबाक आ करैबाक। लेखक शीर्षक स्वयं विवेचित विषयक घोषणा करैत अछि तेँ एतय मात्र लेखादिक नाम मात्र सोझाँ राखि रहल छी -
नव लेखन, नव कवितामे अनास्था, अविश्वास आ असंतोष, नव कवितामे विद्रोह, काव्य-मिथक आ मैथिली नव कविता, नव कवितामे आत्मनिर्वासन, मैथिली नव कवितामे जीवनमूल्य, स्वतंत्र्योत्तर मैथिली कवितामे जीवनमूल्य, नव कविता आ रूपविधान, नव कविता आ पाठकीय संकट आ कवि किसुनक स्वर- परिवेश। लेखक सभ लेखमे सोदाहरण प्रतिपाद्य विषयक उपस्थापन करैत छथि, स्वतंत्रताप्राप्तिसॅं पहिने आ बादमे कविताक प्रतिपाद्य विषयमे परिवर्तन, जीवन-मूल्यक अन्वेषण आ परिस्थितिजन्य आक्रोश, हताशा, चिंताक स्पष्ट अभिव्यक्ति आदिकेँ अकानैत तकर विश्लेषण करैत छथि।
एतदतिरिक्त द्वितीय खण्डमे चारि गोट लेख अछि जे नव कविता सॅं इतर शैलीक काव्यक वर्ण्य-विषयक पड़ताल करैत ओकर वर्णन करैत अछि। पहिल लेख अछि ‘सौंदर्य चेतना आ राधा विरह’, दोसर ‘मोदवतीक गीति चेतना’, तेसर यदुवरक काव्यमे राष्ट्रीय चेतना आ चारिम अछि ‘मैथिली कवितामे उद्बोधन’।
नवकवितायुगक संपूर्ण स्थापनाक बादो ओहि प्रसंग गप औखन होइत अछि त’ अस्सी-नब्बेक दशकमे कतेक होइत होयत, कतेक वैचारिक घमर्थन आ पक्ष-विपक्षमे मतक प्रकटीकरण होइत होयत, तकर प्रमाण अछि एगारह बरखक बाद पुनः 1993 ईस्वीमे लेखक ‘मैथिली नव कविता’ शीर्षकसॅं आलोचनात्मक निबन्धक संग्रह अनैत छथि जाहिमे विस्तारसॅं नवकविताक पृष्ठभूमि, उन्मेष आ प्रवृत्तिक संग किछु प्रसिद्ध कवि आ हुनक कविताक उदाहरण दैत नव कविताक उत्कर्षक अन्वेषण करैत छथि। एत्तहु मात्र लेखादिक नामोल्लेख करैत आगू बढ़ैत छी। एहिमे छ: टा लेख अछि।
पहिल लेख ‘नव कविताक पृष्ठभूमि’ शीर्षकसॅं अछि जाहिमे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक आ साहित्यिक पृष्ठभूमि ताकल गेल अछि। दोसर लेख ‘नव कविताक उन्मेष’ शीर्षकसॅं अछि जाहिमे नव कविता की थिक, एकर नामकरणक औचित्य की, कोन काल-सीमामे एकरा बान्हल जा सकैछ आ एकर उद्भवक राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक आ साहित्यिक स्रोतक पड़ताल कयल गेल अछि। तेसर लेख अछि ‘नव कविताक प्रवृत्ति’। एहिमे प्रगतिशील मूल्यमे आस्था, अखिल मानवताक भावना, सौंदर्यक क्षेत्र- विस्तार, आभिजात्यक स्थान पर साधारणक प्रतिष्ठा, कटु यथार्थक अभिव्यक्ति, क्षणक महत्त्व, राजनीतिक विसंगतिक उद्घाटन, संत्रास, कुण्ठा, धर्ममे अविश्वास, अनास्था आ असंतोष, विद्रोह तथा जिजीविषा आदि प्रवृत्तिक व्याख्या अछि। चारिम लेखमे नव कविताक शिल्पक वर्णन अछि जाहिमे प्रतीक विधान, बिम्ब विधान, छन्द आ भाषा आदिक अन्वेषणपरक चर्चा अछि। 1982 मे लेखककेँ नव कविताक सोझाँ जे पाठकीय संकट देखायल छलनि से 1993 धरि ओहिना विद्यमान छल।तेँ अहू पोथीमे पाठकीय संकटक चर्चापरक लेख सन्निहित अछि। छठम लेखमे लेखक किछु प्रमुख कवि आ हुनक कवितांशक चर्चा करैत छथि जाहिमे कवि यात्री, राजकमल, रामकृष्ण झा किसुन, डॉक्टर धीरेन्द्र, मायानन्द मिश्र, हंसराज, सोमदेव, रमानन्द रेणु, कीर्ति नारायण मिश्र, गंगेश गुंजन, जीवकान्त आ महाप्रकाश छथि।
ई पोथी पढ़ि पाठक नवकवितालेखनक तौर-तरीका, ओकर अनुशासन, शिल्प आ वैशिष्ट्यक परिचय प्राप्त करबाक संग संग पुरान कवि आ हुनक काव्य सौष्ठवसॅं सेहो परिचित होइत अछि आ हुनक पोथी पढ़बाक हेतु उत्सुक सेहो। 1994 मे प्रकाशित ‘मैथिली साहित्य ओ राजनीति’ मे 14 गोट आलोचनात्मक लेख संग्रहीत अछि-
अस्वीकृतिमूलक आलोचना, जनसाधारण लेल साहित्यक उपयोगिता, रास बिहारी लाल दास आ सुमति, नेपालमे मैथिली कथाक विकास ओ प्रवृत्ति, समकालीन मैथिली उपन्यासमे विश्वदृष्टि, आपातकालमे मैथिली कविताक स्थिति, समकालीन कविताक परिवेश, मैथिली कवितामे अतिवाद, मैथिलीक दीर्घ कविता, मैथिलीक नवगीत, मैथिलीक यात्रा साहित्य, मैथिलीक भेंट वार्ता साहित्य, सांस्कृतिक संकट ओ रचना धर्मिता आ मैथिली साहित्य ओ राजनीति। साहित्यक विभिन्न विधामे मैथिली साहित्यमे कतेक लिखल गेल, कथा, कविता वा उपन्यासक भावभूमि की मिथिलाक भौगोलिक परिधिक चारू भरि घुमैत अछि अथवा विश्वदृष्टि संग कदमताल करबाक सामर्थ्य छैक आ बदलैत सामाजिक राजनीतिक परिस्थिति साहित्यमे कतेक स्थान पौने अछि, आदि आदि विषयक बोध लेल पाठक ई पोथी पढ़ि लाभान्वित भए सकैछ।
1995 मे प्रकाशित अखियासल में 25 लेख अछि - मैथिलीक पहिल कथाकार पंडित श्री कृष्ण ठाकुर आ चंद्रप्रभा, मैथिलीक पहिल उपन्यासकार पंडित जीवछ मिश्र आ रामेश्वर, रासबिहारी लाल दास आ उपन्यास सुमति, जनार्दन झा जनसीदन आ निर्दयी सासु, पंडित जनार्दन झा: एक बिसरल साहित्य सेवी, पंडित त्रिलोचन झा बिसरल मातृभाषानुरागी, राष्ट्रीय चेतनाक पुरोधा कवि यदुनाथ झा यदुवर, कवि सेनानी छेदी झा द्विजवर,कुमार गंगानन्द सिंहक कथा संवेदना, कवीश्वरी हरिलताक वैष्णवता, कविवर श्यामानंद झाक काव्य वस्तु, बाबू लक्ष्मीपति सिंह आ मैथिली पत्रकारिता, कवि चूड़ामणि मधुपक गीति साहित्य, भट्टिकाव्यक परंपरा आ मधुपजी, कांचीनाथ झा किरणक कथा जगत्, मैथिली उपन्यासक आलोकमे चंद्रग्रहणक नारी पात्र, प्रोफेसर हरिमोहन झा आ हुनक चर्चरी, कविवर यात्रीक स्तंभलेखन, कविवर आरसी, उपेंद्र ठाकुर मोहन आ हुनक कविता, शुद्धतावादी कथाकार उपेंद्रनाथ झा व्यास, राजेश्वर झाक व्यक्तित्व आ कृतित्व, ललितक कथामे परिवेशक संक्रांत जीवन, धीरेंद्रक कथाक सामाजिक संदर्भ, प्रभासक कथायात्रा ।
एक संग एतेक रास लेखक आ हुनका द्वारा प्रणीत पुस्तकक विशिष्ट अन्वेषणपरक परिचय प्राप्त करबा लेल एहि पोथीक विशेष महत्त्व छैक। जिज्ञासु शोधार्थी एहिसॅं लाभ लैत छथि आ लैत रहताह।
2012 मे प्रकाशित आलोचनात्मक निबंध संकलन हिआओलमे सत्रह टा लेख संग्रहीत अछि, जकर नामोल्लेख मात्र एहिमे वर्णित विषयक परिचय दैत अछि -
ग्रियर्सन एवं मिथिला भाषा अध्ययन, रमानाथ झा आ मिथिला भाषा, प्रत्यालोचक किरण जी, अपेक्षितारय छोड़ि उपेक्षितक आंखिसॅं कन्यादान पढ़ल जाय, अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह, यात्रीक भाषा : शब्द चयन एवं शब्द निर्माण, मनमोहन झाक कथाक अनालोचित पक्ष, मैथिली पत्रकारिताक विकासमे प्रवासीक योगदान, मैथिली लोक गाथामे दीना भद्री, मैथिली कथाक विकास : किछु नव तथ्य, मैथिली कवितामे मिथिलाक भूकंप, कथी ले लगेलियै हे कोसी माय, मैथिली महाकाव्यमे युगसन्दर्भ, नवगीतमे समाज चेतना, मैथिली कविताक वर्तमान धारा, मैथिली लोकगीत : अवस्था एवं संरक्षण आ उपनिवेशवादक नव चालि।
2014 मे प्रकाशित तितिर बितिरक प्रसंग ई कहब आवश्यक जे एकर शीर्षके एहिमे अन्तर्निहित विविध विषयक लेखक परिचय दैत अछि। भाषा आ संस्कृतिक संरक्षणक नाम पर होइत बाह्योपचारक निरर्थकताक चिंता, साहित्य सर्जनामे सांस्कृतिक चेतनाक समावेशक प्रेरणा आ तत्कालीन विभिन्न लेखकक रचनाक संक्षिप्त परिचयात्मक व्याख्यात्मक लेखादि एहि संग्रहमे अछि। एहिमे बत्तीस गोट महत्त्वपूर्ण लेख अछि -
विद्यापति पर्व : मिथिलाक सांस्कृतिक संपदाक संरक्षण,
संस्कृति : भूमासॅं सीमा नहि, सीमासॅं भूमा, सांस्कृतिक चेतना ओ साहित्य सर्जना, सांस्कृतिक संकट आ रचना धर्मिता, समाज आ रचनाकारक सामाजिकता, साहित्यक बजारवादी प्रवृत्ति ,मैथिली लेखन : आस्थाक संकट, मैथिली कवितामे प्रयोगधर्मिता, मैथिल संस्कृति पर संचार माध्यमक प्रभाव, मिथिलाक भाषा- संस्कृतिक विकास : अवरोध एवं निराकरण, राजा टंक नाथ चौधरी : कोलकाता विश्वविद्यालयमे मैथिली, सांस्कृतिक राष्ट्रीय चेतनाक कवि सुमन, डॉक्टर जयकांत मिश्र : मैथिली साहित्यक ग्रिअर्सन,मैथिली साहित्य- प्रबंधन एवं कृष्णकांत मिश्र, नाक धरि गड़ल,अङ्ग सभ सड़ल, पाठकक मौन भंग करैत कथा, आठम दशकक मैथिली कथाक पृष्ठभूमि, आठम दशकक स्वर- परिवेश : विनोद बिहारी लाल, कोमल भावक कथाकार अशोक, विभूति आनंदक धाप, उषा किरण खानक कथाक भूमि, सरंगियाक उग्रास, सात्विक विरोधक मुखर स्वर, विभा रानी: नारी विवशताक कथा मिथिला भाषाक सरलीकरण एवं आधुनिकीकरण : कतेक सरल कतेक कठिन ,संवादक भाषा एवं विकल्प चयन, शब्द- विभक्ति संवाद ,बालकथाक प्रयोजन की, मैथिली साहित्यमे समीक्षाक स्थिति, मैथिली अनुवाद साहित्य : पृष्ठभूमि एवं उत्कर्ष, मिथिला लोक चित्रकला, नेपाल में भाषाक राजनीति एवं मैथिली।
एतय ग्रियर्सन ओ डा. जयकांत मिश्रक मैथिली लेल कएल गेल काजमे समानताक संग टंकनाथ चौधरीक अवदानक चर्चा अछि, किछु भाषा ओ व्याकरण संबंधी लेख अछि, बालकथा, समीक्षा, अनुवाद, चित्रकला आदिक चर्चा अछि आ किछु कवि लेखकक कृतिक प्रसंगे हुनक लेखकीय प्रभावक चर्चा अछि।
2018 में ‘अनुसंधान प्रतिमान’ शीर्षकसॅं नव पोथी आयल। अहूमे एगारह टा विस्तृत लेख अछि। एगारह टा लेखक आ हुनक कृतिक अनुसंधानात्मक विवेचन पोथीक प्रतिपाद्य अछि। एतय मैथिली लोक गाथामे दीनाभद्री, मैथिली उपन्यासकार पंडित जीबछ मिश्र, तेजनाथ कवि भान, रासबिहारी लाल दास आ सुमति, पुण्यानन्द झाक मिथिला दर्पण, मैथिली कवितामे राष्ट्रीय चेतनाक विकास, महावीर झा वीरक कविताक व्याप्ति , श्री वल्लभ झाक अवदान- सर्वेक्षण, श्री श्यामानन्द झा : व्यक्तित्व ओ कृतित्व, हरिनंदन ठाकुर सरोजक कथा आ मिथिलामे स्त्री शिक्षा एवं सामाजिक सुधार।
एकर अतिरिक्त विभिन्न अवसर पर साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित कार्यक्रम सभमे प्रस्तुत बीज भाषणक पोथी रूपमे संग्रह, बेसाहल, भजारल, विवर्त आदि पोथीक अतिरिक्त विभिन्न अवसर पर लिखल आ प्रस्तुत लेख आ भाषण आदिक अध्ययन-मनन प्रत्येक गंभीर अध्येताकेँ आलोक दैत छैक। लेखकक अनुवादित आ संपादित पोथीक संख्या हिनक निरंतर गंभीर अध्ययन आ लेखनक तीव्रगतिक परिचय दैत अछि। ’यावज्जीवमधीते विप्र:’ ई मूलमंत्र संभवतः रमण सरकेँ आत्मसात् भेल छनि। मैथिली साहित्यक विषयमे गंभीरतापूर्वक बुझबाक आग्रही लोककेँ रमानन्द झा रमणक पोथी दिशि दृष्टि देबाक, ओकर गहराइमे पैसबाक आ ओहिसॅं मोती बहार करबाक चाही। ऊपर ऊपर हेलि समुद्रक गहराइ नपबाक दम्भ पोसनिहारसॅं ने साहित्यक वर्तमान समृद्ध होइत छैक आ ने भविष्य लेल किछु बहुमूल्य सुरक्षित रहैत छैक। तेँ जरूरी छैक बहुविध अध्ययन, जे प्रामाणिकताक संग गप कहि सकबाक सामर्थ्य दैत छैक, जरूरी छैक अधीत विषयक मनन जे ओहिमे निहित विषय-वस्तुक पक्ष आ विपक्षमे मति स्थिर करैत छैक आ ग्राह्य- त्याज्यक विवेकक संग ओकरा लोकक सोझाँ तार्किक ढंगसॅं रखबाक ऊहि दैत छैक, संगहि आवश्यक छैक निदिध्यासन जे अध्ययन आ मननक बाद प्राप्त ज्ञानकेँ अनुभवमे बदलबाक, आत्मज्ञान लेल गहन ध्यानक प्रक्रिया रूपमे तेसर चरण थिकै। एतय विषय तात्विक रूपसॅं आत्मसात् होइत छैक। अवश्य एहि शब्दक प्रयोग आत्मा आ ब्रह्मक एकताक प्रसंगमे भेल छैक, मुदा सामान्य विषयक ज्ञान लेल, ओहिमे अवस्थित नवनीतक अन्वेषण लेल, ओहि ज्ञानसॅं तादात्म्य वा खण्डन लेल, उपादेयता-अनुपादेयताक स्थापना लेल आ दोसरक सोझाँ उपस्थापित विषयसॅं पूर्व स्वयं अपन मनक दृढ़ीकरण लेल अध्ययनक अतिरिक्त आन कोनो बाट नहि छैक। श्री रमानन्द झा रमणक लेखन स्वयं हुनक निरंतर गंभीर अध्ययन-मननक सत्यापन करैत छनि। हमहूँ सभ जॅं वरिष्ठ लेखकगणसॅं किछुओ अंशमे स्वाध्यायक गुण ल’ सकी त’ नि:संदेह भविष्य लेल किछु साधार, सार्थक साहित्यिक धरोहरि छोड़ि सकबै। एकर अतिरिक्त आन कोनो उपाय नहि-’नान्य: पन्था: विद्यते अनयाय’।
२.६. आभा झा- विवर्त्त
डॉ. आभा झा (संस्कृतक शिक्षिका, विद्वान एवं समीक्षक)
विवर्त्त
‘वि’ उपसर्ग पूर्वक ‘वृत्’ धातुसॅं ‘घञ्’ प्रत्यय केला उत्तर बनैत छैक विवर्त्त जकर अर्थ होइत छैक घूर्णन अथवा विस्तारण। एकरा परिवर्तनक स्वत: स्फूर्त क्रिया अर्थात् evolution सेहो मानल जा सकैत अछि। विवर्त्त कत्तहु भए सकैछ, चिन्तनमे, प्रकृतिमे अथवा सम्पूर्ण चराचर जगतमे। ‘वाक्यपदीयम्’ केर पहिल कारिकामे कहल गेल छैक -
अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम्
विवर्ततेsर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यत:।
अर्थात् शब्द रूपी ब्रह्म अनादि, विनाश रहित आ अक्षर (जकर नाश नहि होइछ) अछि आ ओकर विवर्त्त प्रक्रियासॅं ई जगत भासित होइत अछि। आलोचना, समीक्षा, चिन्तन परक आलेख आदिकेँ एहि विवर्त्त प्रक्रियाक अंग मानल जयबामे कोनो तरहक विमति नहि होयबाक चाही। मैथिली आलोचना- संसारमे शीर्ष पर अवस्थित, अपन समयक अधिकांश भाग मैथिलीक साहित्यक अन्वेषण, लेखन, प्रमाणीकरण, प्रमापीकरण आ तदर्थ अनुसंधान लेल प्रवृत्त श्री रमानन्द झा रमण जीक ‘विवर्त्त’ शीर्षक पोथी निस्संदेह एहन नहि जकरा ऊपरे- ऊपर पढ़ल जाय,पढ़बा -बुझबा लेल उतर’ पड़ै छै गहीर जलमे, तखन भेटैत छै प्रभावपूर्ण तथ्यात्मक साक्ष्य आ विश्वसनीय स्रोत।
एहि पोथीक लेख सभ उत्कृष्ट शोध-पत्रक रूपमे लिखल अछि, जकर स्रोत प्रत्येक लेखक अंतमे देल अछि। कोनो कल्पना नहि, कोनो वाद नहि, अपन मतक उपस्थापन आ आरोपणक कोनो प्रयास नहि! ‘मनुस्मृति’ मे कहल गेल छैक -
अलब्धं चैव लिप्सेत् लब्धं रक्षेत् यत्नतः
रक्षितं वर्धयेच्चैव वृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत्। 99
अर्थात् जे नहि अछि, तकरा प्राप्त करबाक इच्छा राखी, जे भेटि गेल, तकर यत्नपूर्वक रक्षा करी आ रक्षित धनकेँ बढ़यबाक कोशिश करी आ जे फाजिल अछि तकरा सत्पात्रकेँ दान करी। ई श्लोक विद्या आ धन दुहू पर समानरूपसॅं आइयो लागू अछि। ‘यावज्जीवमधीते विप्र:’ एहि भावक सम्मान करैत आजन्म विद्या-प्राप्तिक प्रयास करबाक चाही, जे किछु शोध अथवा प्रयोगक माध्यमसॅं ज्ञात भेल, ओकर संरक्षण करबाक चाही आ जतेक प्राप्त ज्ञान अछि ओकरा पोथी रूपमे अथवा प्रवचन रूपमे अगिला पीढ़ी लेल सुरक्षित रखबाक चाही। विद्या दान ओहिनो सर्वोत्तम दान मानल जाइत छैक, जाहिसॅं एक त’ ज्ञानक परम्परा अविच्छिन्न रहैत छैक आ देनिहारक क्षमता सेहो बढ़ैत छैक। ई समाजक अपना ऊपर एक तरहक ऋण सेहो अछि।
एहि ऋषि-ऋणक अदायगीकेँ अपन कर्त्तव्य बूझि आदरणीय रमानंद झा रमण कतोक विलुप्तप्राय लेखादिक संग्रह, तत्सम्बद्ध साहित्यक अन्वेषण ,सम्पादन आ सृजनक माध्यमसॅं संरक्षणक काज करैत मातृभाषा अनुरागी लोकनिक सम्मानक पात्र बनल छथि। हिनका विषयमे पं गोविंद झा कहैत छथिन-
'डा. जयकान्त मिश्र, आचार्य रमानाथ झा आदि किछु विद्वान जे अनुसन्धान, संग्रह आ समीक्षाक परम्परा चलाओल ताहि बाटकेँ सम्प्रति प्रायः एकसरे रमणजी धएने छथि। अनुसन्धान रसिक पण्डित श्रीरमानन्द झा 'रमण' नब-नब वस्तुक अन्वेषण करैत छथि आलोचक रमणजी ओकर सारगर्भ समीक्षा सेहो करैत छथि।’
प्रो. आनन्द मिश्र हिनका एकटा गुटनिरपेक्ष आलोचक मानैत छथिन जे अपन आलेख तथ्यानुसार आगाँ बढ़बैत छथि।’
एखन विवेच्य पोथी विवर्त सेहो अही प्रवृत्तिक अद्यतन कड़ी थिक। पहिल लेखमे 1947 सॅं पूर्व प्रकाशित (1905 मैथिली हित साधन) पत्रिकाक विवरण आ ओहिमे संगृहीत सामग्रीक माध्यमसॅं स्वाधीनता- आन्दोलन पर ओकर प्रभाव पर विशद चर्चा अछि। सत्रह पृष्ठक एहि लेखक तथ्यात्मकता ओकर आठ पृष्ठक 36 बिन्दुक सन्दर्भसॅं जानल जा सकैत अछि।
दोसर लेख सेहो राष्ट्रीय चेतनाक जागृति लेल प्रवासी मैथिल द्वारा ‘मिथिला मोद’ नामक पत्रिकाक प्रकाशन आ ताहि माध्यमसॅं देशक सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक उन्नतिक उद्देश्यकेँ रेखांकित करब लेखककेँ अभीष्ट छनि। एकटा लेखमे मैथिलीक आद्य उपन्यासकार पं जीबछ मिश्रक समय, समाज आ सामाजिक दृष्टिक अन्वेषण करैत लेखकक ई पंक्ति द्रष्टव्य अछि -
‘जीबछ मिश्रक 'रामेश्वर' सर्वदेशीय अछि, जाति-धर्म - क्षेत्र निरपेक्ष। 'रामेश्वर'क सार्वदेशिकता रामेश्वरक एहि कथनमे निहित छैक जे 'पेटक ज्वालासँ कातर मनुष्यसँ किछु असाध्य नहि होइत छैक।' भ्रष्टाचार एवं स्वार्थलिप्साक जालमे छटपटाइत रामेश्वर तँ एक प्रतीक मात्र थिक।’ आ 'रामेश्वर' सॅं आरम्भ भेल मैथिली उपन्यासक यात्रामे विश्वदृष्टिक अन्वेषण लेखककेँ अभिप्रेत छनि। एहि प्रसंगमे ओ निर्दयी सासु, सुमति, चन्द्रग्रहण, कन्यादान, माधवी माधव, कुमार, भलमानुस, पारो, पृथ्वी पुत्र, नैका बनिजारा, बिहाड़ि पानि आ पाथर आदि उपन्यासक प्रसंगमे समकालीन दृष्टिक खोज करैत कहैत छथि -
‘समकालीन विश्वदृष्टि मानवक मुक्ति-संघर्षक एहि अभियानमे प्राण-प्रणसँ सहयोगी अछि। आ ओही युग-दृष्टिक अनुरूप समकालीन मैथिली उपन्यास शोषण, अत्याचार, राजनीतिक पराधीनता, आर्थिक विषमता, धार्मिक असहिष्णुता एवं कट्टरता आ सामाजिक अन्यायक विरुद्ध डेग रोपबाक साहसकें स्वर दैत अछि। सुविधा भोगीवर्गक अत्याचार, धर्म आ जातिक नामपर, सम्प्रदाय, क्षेत्र आ भाषाक नामपर होइत विभेद आ शोषणक विरोधमे जनमानसकेँ जगबैत अछि। शोषित, भूखल, अभावग्रस्तक प्रति सहानुभूति व्यक्त करैत ओहन समाजक कल्पना करैत अछि जे सभ प्रकारक शोषण आ अत्याचारसँ मुक्त होअए, समाजक सभ केओ समान सुविधा आ अवसर पाबय, मानव सभ्यता आ संस्कृतिक विकासमे समरूप सहयोगी बनि सकए।’
तदनन्तर ‘मैथिली कथामे बहुसांस्कृतिकता’ आ ‘महाभारत कथा आधारित मैथिली-साहित्य’ शीर्षकसॅं दूटा महत्त्वपूर्ण लेख अछि। 'राजाजी'क रूपमे सलहेसकें सामाजिक मान्यताक आधार आ 'गीत दीनाभद्री' : गाथाक विकास एवं महत्त्व नामक लेखमे पूर्वापरप्रसंग, डॉ जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन आ विभिन्न विद्वानक मान्यताक आधार पर लेखक अपन मतक उपस्थापन कएने छथि।
कथा, उपन्यास,गाथा आदिक उपरांत साहित्यक महत्त्वपूर्ण पक्ष समालोचनाक अंतर्गत जयधारी सिंहक समालोचना-कर्म पर विचार कएलनि अछि। अलगसॅं लिली रे, शेफालिका वर्मा, कांचीनाथ झा किरण सदृश लेखकक रचना संसार पर लेखक द्वारा दृष्टि देल गेल अछि। अनुवादक व्यावहारिक आ साहित्यिक प्रयोजन आ ओहिमे अम्बिका नाथ मिश्र महोदयक योगदान पर विशद चर्चा अछि। मैथिली साहित्यमे विधा एवं छन्दक वैविध्यक बादो विदेशी काव्यशैलीक ग्रहण आ ओहिमे निहित सौंदर्य आ संरचनाक बोध करबैत धर्मेन्द्र विह्वलक कवितामे जापानी टांकाक सोदाहरण प्रस्तुति लेखक रोचकता बना कए रखने अछि। अंतिम लेख मैथिलीमे शोक-काव्य आ ओहि परम्परामे ललितनारायण मिश्रक योगदान पर चर्चा अछि।
संक्षेपमे कहल जा सकैछ सिद्धिरस्तु प्रकाशनसॅं छपल 242 पृष्ठक ई पोथी विचार- सघन, दृष्टान्त-समृद्ध, गाम्भीर्य- समन्वित, बहु आयामी आ विविधवर्णी अछि। जे कि ई आलोचनात्मक निबन्धक पोथी अछि त’ स्वाभाविक अछि जे तथ्यात्मकता आ विचार-मन्थन प्रमुख तत्त्व अछि आ तैं पढ़बा काल सर्वतोभावेन मानसिक सन्नद्धता जरूरी। संपूर्ण पोथीमे एक एक कथनक समर्थनमे देल गेल सन्दर्भ एहि पोथीक अतिरिक्त विशेषता अछि। टंकण अशुद्धि नगण्य- प्राय अछि। पोथीक आवरण पृष्ठ अत्यंत सुंदर आ छपाइ एकदम साफ अछि। मैथिली भाषा आ साहित्यक गम्भीर जिज्ञासु पाठक ई पोथी पढ़लासॅं अवश्य लाभान्वित होयताह ।लेखककेँ सादर अभिवादन आ पोथी उपलब्ध करयबा लेल युवा मैथिली सेवी श्री उज्ज्वल कुमार झाकेँ धन्यवाद।
२.७. कल्पना झा- सुच्चा संपादक, रमानन्द झा रमण
कल्पना झा, दिल्ली
"सुच्चा संपादक, रमानन्द झा रमण"
संपादक शब्द हमरा बड़ प्रिय लगैत रहल सभ दिन।
जहिया सँ नेनपन छोड़ि बोधगरक पाँति दिश ठाढ़ हेबाक उपक्रम मे लगलहुँ तहिये सँ किछु शब्द बड़ आकर्षित करैत आबि रहल अछि। जाहि मे संपादक पहिल पायदान पर रहल। तकर कारण यएह जे लिखब किंवा लिखबाक उपक्रम मे नेना सभकेँ बहुत तरहक अनुभव होइत छैक। जेना नेनपन मे सभसँ पहिने अपन पाठ्यक्रमक प्रश्नोत्तरे लिखब, कोनो कविता कंठस्थ कए लिखब। चाहे जे किछु लिखब, त्रूटि निश्चित हेतैक। आ जँ त्रुटि भेलैक त' सभसँ पहिने अभिभावक लोकनिक डाँट-फटकार आ उनका-ठुनका ओकरा बाद कक्षा मे मास्टर साहेबक छड़ी! बापरे बाप अखनो मोन पड़ैत अछि त' हे भगवान!
हमरा जतबा जनतब छल ओहि अनुरूपे एकमात्र संपादके टा एहन देवतुल्य महानायक छथि जिनका हाथमे जादूक छड़ी होइत छैन्ह। ओहि छड़ीमे बड़-बड़ गुण होइत छैक। ओ जादूक छड़ी बिना कोनो तरहक लक्षणा-व्यंजना किंवा अहाँक मनोभावक लतखुर्दन केने अहाँक प्रत्येक रचना केँ संशोधित क' ओकरा पढ़वा आ छपबा योग्य बना दैत छथि। आ एतबा भान होइते हमर रुचि लेखन दिश अग्रसर भेल। परंच सभसँ पैघ समस्या जे ई संपादक नामक भगवान भेटताह कतय? सरिपहुँ आजुक समय मे नीक संपादक भेटब भगवानेक साक्षात्कार त' छियैक!
हमरा नजरिये रमानन्द रमणजी मे आनो बहुतरास गुण छैन्ह परंच संपादनक काज सभसँ उत्कृष्ट करैत छथि। हमरा मोन अछि सन 2015 मे हम स्त्रीविमर्श पर किछु काज करैत रही, बहुत तरहक समस्या सभ पर मंथन करैत रही। किछु आस-पड़ोस, किछु दूर-दराज किछु सखा-वन्धु-वान्धवक आ सभसँ बेसी स्वयं केर अनुभव पर बेसी गहींर दृष्टि रहैत छल कारण स्त्री विमर्श जँ लिखि रहलहुँ अछि त'ओ पूर्ण रूपेण कसौटी पर कसल हेबाक चाही नहि कि काल्पनिक। तखने कोनो सामाजिक सरोकार संबंधित काज भ' पाओत। हम एकगोट आलेख लिखने रही " स्त्रीक मोनमे असुरक्षाक भावना कियेक?" हमर हार्दिक इच्छा छल जे ओ आलेख कोनो नीक संस्थाक स्मारिका मे छपय परंच नहि जानि कियेक हम जाहि संस्थाक स्मारिका हेतु पठौलहुँ ओ तथाकथित संपादक लोकनि हमरा आलेख केँ अस्वीकृत क' देलैन्ह। तखन हम ओकरा घर-बाहर मैथिली पत्रिका हेतु पठौलहुँ। जतय ओ छपबो कएल आ एकगोट उत्कृष्ट सीख सेहो प्राप्त भेल ओ ई जे समुचित संपादन की थिकै? बड़ आनन्दित भेल रही ई देखि जे जतय आलेख लिखबाक क्रम मे शब्द संचय केर प्रक्रिया पर लोक बेसी ध्यान नहि दैत छैक ताहि क्रममे एक पैराग्राफक गप मात्र एक वाक्य मे कोना समेटल जा सकैछ? आ' से सिखौलन्हि रमणजी "औंटि रहल छलाह"। हँ यएह थिकै ओ वाक्य। सुच्चा मैथिलीक एहन अनमोल वाक्य रहरहाँ नहि भेटैत छैक, ओ त' कोनो पोथीक बोनमे रहनिहार पढ़ुएबाबू टाक मूँहें सुनबा - पढ़वा लेल भेटत!
सुच्चा संपादक केर मूल कार्य त' यएह भेलैक किने?
सरिपहुँ रमणजी सर मे हमरा नजरिये एकगोट सुच्चा संपादकक सभटा गुण विद्यमान छैन्ह। हमरा हिनकामे सुच्चा संपादकक गुण कोना नजरि आएल ओ अहूँ लोकनि क्रमवार देखल जाउ - सभसँ पहिने त' ओ जतबा महत्वपूर्ण स्थापित लेखक केँ मानैत छथि ततबे नवोदित लेखक केँ सेहो मानैत छथि।ओ संपादक रूपें लेखक केँ सिखेबा आ जगेबाक कार्य करैत छथि। ओ कोनो रचना केँ मात्र प्रशंसा लेल नहि छापैत छथि, ओकर गुण- दोष दुनू परखैत छथि। आजुक स्वार्थी युगमे जतय लोक सिर्फ अपना हेतु जीबैत अछि, साहित्यिक गतिविधि मे भिन्न - भिन्न भाँतिये गोधियाँगिरी मे लागल रहैत अछि। ताहि समयकाल मे कतोक कटुवचन सुनैत अपन कर्तव्यपथ पर अडिग ठाढ़ भेटैत छथि रमणजी ।
जतबाक सम्मान दिवंगत साहित्यकार केँ अवतरण दिवसक श्रद्धांजलि दैत मोन पारैत छथिन्ह ततबे प्रत्येक नव-पुरान साहित्यकार सभक लेल, सभक जन्मदिनकेँ अनमोल, अविस्मरणीय बनबैत - जुग-जुग जीबाक आशीष नेने सदैव उत्साहवर्धन करैत, निरंतर श्रृजनशील रहबाक नव बाट देखबैत छथिन्ह । सरिपहुँ यएह सभ गुण हुनका विशेष बनबैत छैन्ह। आब चर्चा करैत छी हुनक अनमोल थाती केर -
मोन पड़ैत अछि रमण सर केर "अर्काइव" हँ ठीक सुनलियैक! हुनका घ'रमे एकगोट पूर्ण समृद्ध अर्काइव सेहो छैन्ह।जे देखबाक लोभ त' हृदयमध्य अछिये।
हम अखन तक दू बेर चेतना समितिक कार्यालय गेलहुँ अछि। ओहिठामक विद्वजनक दर्शनार्थ! आ से भेलो मुदा मोनक एकगोट कोनमे इहो जिज्ञासा छल जे आदरणीय रमणजी सर सँ भेंट होइत आ गपशपक क्रममे हुनक सुच्चा मैथिलीक शब्द सभ साक्षात हुनकहि मूँहें सुनबाक अवसर भेटैत, परंच कोनो एहन परिस्थिति उपस्थित नहि भ' सकल आ दर्शनक लिलसा लागले रहल अछि अखन धरि। कतोक गोटेक मुँहें हुनका घ'र स्थित अर्काइवक प्रसंशा सुनने छी। हुनक लिखल कृति सभसँ स्वतः स्पषट होइत अछि जे कोनो व्यक्तिक कृति आ साहित्यिक आनो-आन रचना केर तथ्यात्मक स्पष्टता ओकर गूढ़ता निश्चित रूप सँ हुनका हुनक एहि अर्काइव नामक थातियेक माध्यम सँ हेतैन्ह। आब अबैत छी हुनक कृतित्व दिस। लेखन आ संपादनक एतेक वृहत्तर कार्य केयो सहजहि कहाँ क'सकैछ ।ओहि लेल पूर्ण निष्ठा, लगन आ धैर्यक संग-संग साधन सेहो अनिवार्य रहैत छैक। जे साधन एकगोट अर्काइवक रूपमे हुनकहि प्रयत्ने हुनका उपलब्ध छैन्ह। जकर सभसँ सुखद परिणाम एसकर हुनकहि लेल शुभ फलदायी नहि अपितु समस्त मैथिली साहित्य आ' साहित्य प्रेमी लेल छैक। मैथिली साहित्यक कतोक पुरना पोथी सभ जे हमरा लोकनिकेँ पूर्वजक आशीषक रूपमे प्राप्त भेल अछि से हिनके कर्मठताक प्रसाद थिक।
पहिने गप करैत छी हुनक संपादित पोथीक - आदरणीय रमण जी अखन तक लगभग 54 गोट पोथीक संपादन केलैन्ह अछि परंच सभसँ महत्वपूर्ण जे किछु लेखकक पोथीकेँ पुनर्जन्म देलैन्ह अछि। अर्थात हुनक अनुपलब्ध दुर्लभ पोथीक संपादन क' मैथिली साहित्यिक भंडार भरैत वर्तमान आ' आगत पीढ़ीक लेल हेराएल, भोथियाएल साहित्य सुलभ करौलन्हि अछि। एकरा अलाबो साहित्य संवर्धन हेतु बहुत रास काज केलैन्ह अछि।
हिनक लेखन कार्य कहिया प्रारंभ भेलैन्ह ताहि समय केर कोनो निस्तुकी जनतब हमरा नहि अछि परंच हिनक संपादनमे पहिल पोथी सन 1978 मे "मैथिलीक आरंभिक कथा" नाम सँ अधीत प्रकाशन रानीघाट पटना सँ प्रकाशित छैन्ह। एहिसँ स्पष्ट होइछजे एहिसँ पूर्वहि सँ हिनक लेखन कार्य प्रारंभ भ' चुकल छलैन्ह। पुनः अध्ययन कालक दौड़ान सन 1982 मे मूल लेखनक पहिल पोथी "नवीन मैथिली कविता" आ' सन 1993 मे "मैथिली नव कविता" नामक दोसर पोथी प्रकाशित होइत छैन्ह।जे मूलतः शोधपत्र छैन्ह । ओकरा बादक गप की कहू! हिनक मूल आ' सम्पादित जतबा पोथी आदरणीय धाराप्रवाह लिखि देलन्हि ततबा नामो लिखबामे हमरा अशोकर्ये भ' रहल अछि।हम सिर्फ एतबाक कहब जे हुनक ई निरंतरता संप्रति मूल, संपादित, अनुवाद, बीजभाषण, विभिन्न कार्यशाला आदिक रूपें अविराम जारी छैन्ह।
आहिरौ बा! हुनक कृतित्व पर हम लुक्खियो प्रयास कोना करब? हम एतेक लापरवाह प्राणी छी जे जनिकर संपादनक मुरीद छी तनिकर कोनो कृति अखन धरि पढ़बे नहि केलहुँ। ओ कहैत छैक ने एकगोट कहबी - प्रात होयत त' गुदरी सियाएब। आ प्रात भेने केदनि..............।
हमरो किछु एहने चालि-ढालि अछि। भोजक बेर कुम्हर रोपबाक कार्य करैत छी। ओ त' हृदय सँ आभार दैत छियैन्ह उर्जावान स्तुत्य कृत्य केनिहार कमासुत गजेन्द्र ठाकुरजीकेँ आ हुनक निरमाओल विदेहा पेटार केँ, जे कार्यकाले समुत्तपन्ने भानुमतिक पेटारक कार्य करैत छैक। अंततोगत्वा ओहि पेटार सँ हमरा आदरणीय रमानन्द झा रमणजीक बहुमूल्य पोथीक दू गोट पी डी एफ प्राप्त भेल। आनलाइन पोथी पढ़ब हमरा कहियो नहि जुगताइत अछि तथापि कने-मने प्रयास जतबा क' सकलहुँ ताहि आधार पर जे किछु हमरा बुझना गेल -
कोनो कृतिक समीक्षा किंवा आलोचना सहज नहि छैक।अपना मोनक स्वतः उपजल भावकेँ गीत, कथा, कविता आदिक रूपमे कागत पर उतारब ओतेक कठिनाह नहि छैक। परंच दोसराक भावभूमि पर उपजल भाँति-भाँतिक फसीलक मूल्यांकन हेतु प्रथमतः ओकर गूढ़ अध्ययन, चिंतन-मनन आवश्यक रहैत छैक। जाहि तरहें एहि वसुन्धराक प्रकृतिप्रदत्त समस्त वानस्पतिक संपदाकेँ चिन्हलाक बादे ओकरा उपयोगानुसार ओकर संरक्षण, संवर्धन कएल जाइत छैक तहिना भेल आलोचना।रमणजी एहि मूलमंत्रकेँ बिटियाक' धेने छथि।संभवतः तें अपन एहि आलोचनात्मक पोथीक नामकरण केलैन्ह अछि "हिआओल"। एहि पोथीक विषयवस्तु देखि एकटा बात स्पष्ट भ' गेल जे रमणजी इच्चा उखाड़बामे सिद्धहस्त छथि। आ एहने इच्चा उखाड़ब मैथिली साहित्यक हेतु मीलक पाथर थिक, जकरा पढ़ैत - गुणैत समकक्ष आ नवपीढ़ीक रचनाकार लोकनि अपन गन्तव्य तय करथु। तहिना "अखियासल" पोथीक माध्यमे एक सोरहि रचनाकारक आ हुनक कृतिकेँ वृहद् रूपेण अखियासलन्हि अछि।
जेनाकि हम पहिनहिं स्पष्ट केलहुँ अछि जे रमणजी सदति सभठाम सुच्चा मैथिलीक प्रयोग करैत छथि। त' ई सोचनिहारि हम पहिल व्यक्ति नहि थिकहुँ। हँ ई अलग गप छैक जे हमरा सन अल्पबुद्धिक नजरि आब फरीछ भेल अछि। हमरा सँ पहिनहिं महाविद्वान लोकनि एहि विषयमे बहुत किछु लिखि चुकलाह अछि। देखल जाउ - हिआओल पोथीक अपन दू शब्दक उद्गारमे सन 02/06/2009 मे फूलचन्द्र मिश्र' रमण' की लिखैत छथि - "डा० रमणकेँ मैथिलीक मूल शब्दसँ अतिशय प्रेम छनि।हिनक लेखनमे मैथिलीक अपन शब्द संपदाक अधिकाधिक प्रयोगक अनुरक्ति स्पष्ट अनुभव होएत।पोथीक नामो धरि ओही शब्द प्रेमक वशीभूत भेल - अखियासल, बेसाहल, भजारल, हियाओल आदि रखलनि अछि।हिनक भाषाप्रेम आ' साहित्य सेवा प्रशंसनीय अछि।"
रमणजी नीक लोक छथि, नीक-नीक काज करैत छथि, उदारमना छथि, समदर्शी छथि,भूत, भविष्य आ वर्तमान सभकेँ संग ल' क' चलैत छथि, मैथिली साहित्य प्रेमी छथि, लीक सँ अलग हटिक' उत्तमोत्तम कृत्य करैत रहैत छथि। निश्चितरूपसँ उपरोक्त सभटा गुण सँ परिपूर्ण छथि। त' स्पष्ट छैक जे एतेक नीक - नीक कृत्य केनिहार लोकक चर्च त' हेबे करतैक ने। आ संगहि प्रबुद्धजनक आशीर्वचन सेहो उत्साहवर्धन हेतु अवश्ये भेटैत रहतैक। देखियौ आदरणीय पंडित गोविन्द झा हिनका विषयमे की कहैत छथिन्ह -
"डा० जयकान्त मिश्र, आचार्य रमानाथ झा आदि किछु विद्वान जे अनुसंधान संग्रह आ' समीक्षाक परंपरा चलाओल ताहि बाटकेँ संप्रति प्रायः एकसरे रमणजी धएने छथि। अनुसंधान रसिक पंडित श्री रमानन्द झा 'रमण' नब-नब वस्तुक अन्वेषण करैत छथि तँ आलोचक रमणजी ओकर सारगर्भ समीक्षा सेहो करैत छथि। संग्रहकार्यमे हिनक आचार्यगुरु छलाह प्रो०आनन्द मिश्र। प्रायः रमणजी मानैत छथि जे साहित्यिक सृजनहुँ सँ अधिक आवश्यक अछि संरक्षण आ मूल्यांकन। ई एहि दुनू काजकेँ पूर्वजक पूजा बूझि परम भक्तिभाव सँ करैत रहलाह अछि। ओना मैथिली जगतमे आओरो नामी आलोचक छथि, किन्तु हुनका सभकेँ पूर्वजक साहित्य आ' परंपरामे सड़ाइन गंध लगैत छनि आ' साहित्यमे परंपरा भंजन आ' सामाजिक न्यायक निनादटा सोहाइत छनि। एकर विपरित रमणजीकेँ पुरान चाउरक भात टटका दहीक संग बड़ प्रिय छनि।"
सरिपहुँ रमणजी बड़ भाग्यशाली छथि। सामर्थ्यवान छथि। तें ने नीक काज केला उत्तर प्रबुद्धजनक एतेक रास स्नेह पाबि सदति उर्जावान बनल रहैत छथि। अन्यथा कतोक लोककेँ नीक करितो उपहासक पात्र बनल रहय पड़ैत छैक किंवा अवडेर देल जाइत छैक। जे व्यक्तिविशेष लेल त' अधलाह छैहे, मैथिली साहित्य लेल त' निश्चिते विनाशकारी छैक। वर्तमान स्थिति - परिस्थिति किछु एहने जा रहल अछि। मंच, माला, गोधियाँगिरी त' अपन प्रभाव देखाइये रहल अछि ताहू सँ भीषण विनाशकारी भ' रहल अछि उत्तम प्रकाशनक समुचित व्यवस्थाक अभाव।हमरा जनतबे आब प्रकाशन व्यवसाय नहिं रहलैक मात्र मुद्रण व्यवसाय फलि-फूलि रहलैक अछि, जकर लागतो चुकायब किछु गोटेक ओकातिसँ फाजिल भ' गेल छैक।ओत्तहि बहुतोक लेल ई खर्च मात्र एकजुम खैनी भरि थिकैक! फलस्वरूप स्तरीय लेखन कम भेल जा रहलैक अछि। ई चिंतनक विषय बनि गेलैक अछि। प्रबुद्धजन केँ संज्ञान लेबाक बेगरता आबि तुलायल अछि। आब नहि त' कहिया?
संस्थागत प्रबुद्धजन जँ चाहथि त' बहुत किछु सम्हारल जा सकैछ। वर्तमानमे सभ केयो एड़ी-चोटी लगौने छी जे प्राथमिक शिक्षामे मैथिली हो। उच्चशिक्षामे सेहो मैथिली माध्यम रहए। परंच बिनु स्तरीय पोथीक कोना आ' की पढ़ाओल जेतैक? खैर एहन तरहक विमर्श हमरा त' सरपास क' जाइत अछि तें जानथि प्रबुद्धजन आ जानथि जानकी!
उपरोक्त गप हम ओहिना नहि लिखबाक ढीठता कएल अछि, देखल जाउ हियाओल निबंध संग्रहक लेखकीयमे रमणजी स्वयं लिखैत छथि -
"जेना पर्यावरणक प्रदूषणसँ कतेको जीव-जंतु आलोपित भए गेल, ओहिना समाजमे आत्मकेन्द्रित लोकक चलतीसँ प्रो० आनन्द मिश्र एवं डा० जयकान्त मिश्र सन उदारमना साहित्यकारक प्रजाति मैथिली जगतसँ आलोपितभ' रहल अछि।विकट समस्या अछि, कतय लोक अपन शंका राखत आ' के उदारता देखौताह? तथापि हम अपनाकेँ परम सौभाग्यशाली मानैत छी जे पंडित श्री गोविन्द झा सन सहृदय शास्त्रविज्ञक स्नेह हमरा प्राप्त अछि।"
रमणजीक कथन शतप्रतिशत सत्य छैन्ह। तथापि हिनक किछु गपसँ हम सहमत नहि छी।देखल जाउ आदरणीय केर लिखल एहि वाक्यांश केँ -
"एखन अखियासल, बेसाहल एवं भजारलक बाद अपने सन प्रबुद्ध पाठकवर्गक समक्ष हियाओल लए उपस्थित छी। प्रबुद्ध पाठकवर्ग एहि हेतु जे जाहि विषय सभपर कलम भैंजबाक हिआओ हम कएलहुँ अछि, मनोरंजक साहित्यक कोटिमे नहि अबैत अछि।हमहुँ अपन पंडिताइ छँटबाक लेल अरबेधि-अरबेधि एहन-एहन विषयक चयन कए लेलहुँ जाहि हेतु विषयमे गंभीर प्रवेश अपेक्षित छैक।तकर ने हमरा ऊहि अछि आ' ने लूरि, तखन मात्र लिलसासँ कतेक पाहि काटब। जँ बहुविधावादी वा संस्थाजीवी रहितहुँ त' गोधिञा एवं चेला-चपाटीक बल रहैत। आ' ने हम सदक्षिण लेखन-कला-कुशले छी, तखन के, कतय, कखन, कोना हमरा पर भुभुआ उठैत जएताह, अनुमान नहि कए सकैत छी।"
अक्षरशः सत्य लिखलन्हि अछि रमणजी! आन साहित्यिक गतिविधि सँ हम अनभिज्ञे जेकाँ छी परंच मैथिली साहित्यक दशा सरिपहुँ यएह छैक। अहाँक लेखनमे, अहाँक रचनामे कखन किनका बिनु त्रूटियोक, महात्रूटि नजरि आबए लगतन्हि से कहब बड़ कठिन अछि। आ जँ कोनो त्रूटि नजरि एलनि त' हे भगवान! हँ एकगोट आओर गप, कमी त' छोड़ू जँ अहाँ किछु तथाकथित बुद्धिजीवी लोकनिक इशारा पर हाँजी - हाँजीक नारा नहि बुलंद केलहुँ त' भ' गेल बंटाधार!
आब साक्षात् आदरणीय रमनजी सँ हमर किछु निहोरा अछि - आदरणीय अपने सर्वव्यापी थिकहुँ। रचनाकारक सभटा कष्टक भान रहैत रहल अछि। तें अपने सँ बेहतर रचनाकारक मनोदशा के बूझि पाओत?
कोनो माता-पिता किंवा अभिभावक लोकनिक सदैव यएह कामना रहैत छैन्ह जे - जाहि कष्टक भुक्तभोगी ओ स्वयं छथि किंवा चारूभर जे कष्टमय आवोहवा गमलैन्ह तकर आँच हुनिकर नेना तक कथमपि नहि पहुँचि पाबए।अपनेसँ हमर करबद्ध निवेदन अछि जे अपने आब उदारता देखबियौ।अपन पाछू ठाढ़ सभटा सशंकित रचनाकारक हेतु आगू आबि ठाढ़ होउ। सभकेँ नव बाट देखेबाक हेतु नव किरण बनू।सभक शंका समाधानक हेतु अपने पूर्ण सक्षम छी। अपनेक एहि गपकेँ हम खारिज करैत छी जे अपने संस्थाजीवी नहिं छी किंवा चेला-चपाटीक अभाव अछि।
एकबेरि मैथिली साहित्य आ साहित्यकारक हितार्थ, पाछू तकियौ। आ देखियौ जे अपनेक पाछू आशा भरल नजरिये कतोक आँखि अहाँकेँ निहारि रहल अछि। सभकेँ समुचित मार्गदर्शकक बेगरता छैक। ताकि एहन तरहक सशंकित रचनाकार वर्तमानक गैसलाइटिंग सँ सुरक्षित रहि निर्भीकता सँ उत्तम लेखन कार्य क' सकथि। अपने विश्वप्रतिष्ठित संस्था चेतना समितिक छितनार गाछक छाहरिमे घर-बाहर पत्रिकाक सफल संपादक थिकहुँ।
अपने चेतना समितिक संयुक्त सचिव- प्रथमतः 1999-2001, तक रहलहुँ तत्पश्चात दोसर बेरि 2005-07, आ तेसर बेरि 2015-2017 एवं चारिमबेरि 2017-2022. कुल चारि टर्म रहि चुकल छी। ततबे नहि प्रचार सचिव सेहो 2013-2015 मे रहलहुँ अछि।चेतना समितिक भारती मंडन पुस्तकालयक स्थापना 2000 मे कए आइ धरि देखैत छी.अनेकहु बेर विचार-गोष्ठी संयोजन कएल जकर पोथी प्रकाशित अछि।
अपने प्रकाशन त' छोड़ू जँ संस्थाक सहमतिसँ संस्थेक हेतु समुचित मूल्यमे प्रत्येक रचनाकार आ' मैथिली साहित्यक हितार्थ मुद्रणोक कार्य प्रारंभ करी त' मैथिली साहित्यक दिशा आ दशा दूनू बदलि देबैक। समस्त साहित्यकारक लेल चेतना समिति एकगोट ब्रांड बनि जेतैक!
चेतना समिति केँ सेहो सामाजिक आ साहित्यिक गतिविधि देखवाक हेतु स्वयं केर आँखि-कानक प्रयोग करबाक बेगरता छैक, दोसराक आँखि कानक प्रयोग केने अवसरवादी लोकसभ मात्र स्वहितार्थक खोलसा पहिरओतन्हि । एहन तरहक संस्था जँ मैथिली साहित्यक हित संज्ञान नहि लेताह त' ककरा दिशि आशक आँखि उठतैक?
२.८. प्रियंका मिश्र- डा. रमानन्द झा रमण साहित्य-साधनाक विविध आयाम
प्रियंका मिश्र
डा. रमानन्द झा 'रमण': साहित्य-साधनाक विविध आयाम
मैथिली साहित्यक आधुनिक यात्रामे किछु एहन साधक छथि, जिनकर महत्त्व मात्र हुनक लिखल पोथीक संख्यासँ नहि, अपितु भाषा-साहित्यक समूचा बौद्धिक परिवेशकेँ समृद्ध करबाक हुनक निरन्तर प्रयाससँ निर्धारित होइत अछि। डा. रमानन्द झा ‘रमण’ एही श्रेणीक विशिष्ट साहित्यकार छथि। ओ मूलतः आलोचक आ समीक्षक रूपेँ प्रतिष्ठित छथि, मुदा हिनक साहित्य-साधना मात्र आलोचनाधरि सीमित नहि अछि। निबन्ध, अनुवाद, सम्पादन, दुर्लभ ग्रन्थक पुनर्प्रकाशन, पत्र-पत्रिकाक सम्पादन, साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थासँ सक्रिय सम्बद्धता आ नव पीढ़ीक लेल स्रोत-सामग्रीक संरक्षणई सभ हिनक बहुआयामी साहित्यिक व्यक्तित्वक परस्पर सम्बद्ध पक्ष छनि । मैथिलीक विस्मृत आ अनुपलब्ध साहित्यिक धरोहरिक उद्धार एवं संरक्षणक चिन्ता आ शोधपरक सम्पादन – दृष्टि केँ स्पष्ट करैतएहि सन्दर्भमे‘मैथिली कथाक धाप’क भूमिकामे ओ लिखैत छथि—“मैथिलीक हेराएल-भोतिआएल, अनुपलब्ध कथाक एक वृहत्संग्रह ‘मैथिली कथाक धाप’ सुधी पाठकक समक्ष प्रस्तुत करैत हम अपनाकेँ ओहि दोषसँ मुक्त अनुभव करैत छी जे मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकाक दोग-दाग आ झोंझमे पड़ल, कुहरैत मैथिली कथा-साहित्यक अमूल्य धरोहरिकेँ देखिओकेँ ओकर उद्धार आ संरक्षणक प्रयास नहि कएल, उदासीन रहि गेलहुँ।”
हिनक साहित्यिक कर्मक मूल प्रेरणा मैथिलीक सांस्कृतिक स्मृति, पाठकीय विवेक आ संस्थागत जीवनक बीच सृजनात्मक समन्वय स्थापित करब रहल अछि।आ तेँ,हिनक काजमे सर्जनशील संवेदना आ अनुसन्धानशील अनुशासनक विशिष्ट समन्वय देखबामे अबैत अछि। विभिन्न साहित्यकार, हुनक कृति तथा ताहिसँ सम्बद्ध प्रसंगक विपुल तथ्यक भंडार अपन स्मृतिमे सँजोगि केँ रखनिहार डा.रमानन्द झा ‘रमण’ आलोचना, सम्पादन आ अनुवादक क्षेत्रमे उल्लेखनीय अवदान द’ रहल छथि, हिनक सक्रियताक क्रम अनवरत चलि रहल अछि। जेना –‘सरोज रचनावली’ आ ‘उग्रानन्द समग्र’ सन महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ एखनहुँ प्रकाशनाधीन छनि। मैथिली भाषा-साहित्यक अतीत आ वर्तमानसँ सम्बद्ध तथ्य, प्रसंग आ दुर्लभ सूचनाक हुनक व्यापक ज्ञानकेँ दृष्टिगत रखैत जँहिनका मैथिली साहित्यक ‘जीवंत विकिपीडिया’ कहल जाए, तँ ई अतिशयोक्ति नहि होएत।
जीवन-संघर्षसँ साहित्य-साधना धरिक हिनक यात्रा केँ देखल जाए तँ रमानन्द झा ‘रमण’क जन्म 2 जनवरी, 1949 ई.मे मधुबनी जिलाक लालगंज, सरिसब-पाहीमे भेल। गामक संस्कृत-विद्या, सरिसब-पाहीक समृद्ध साहित्यिक परम्परा, राघोपुर डेउढ़ीक सांस्कृतिक वातावरण आ पटनाक साहित्यिक गोष्ठीसभ हिनक रचनात्मक संस्कारक निर्माणमे महत्त्वपूर्ण रहल। प्रारम्भिक आर्थिक अभाव आ अध्ययनक व्यवधानक अछैतो 1964 ई.मे प्रथम श्रेणीसँ मैट्रिक उत्तीर्ण भेलाह। बादमे जीविकाक संग अध्ययनरतरहैत 1977 ई.मे हिन्दी विषयमे एम.ए. आ 1982 ई.मे पटना विश्वविद्यालयसँ ‘मैथिली नऽव कविताक विश्लेषणात्मक अध्ययन’ विषयपर पी-एच.डी. उपाधि अर्जित कएलनि।
5 जनवरी, 1970 सँ भारतीय रिजर्व बैंक, पटनासँ जुड़ल हुनक सेवाजीवन जनवरी, 2009 धरि रहल। बैंकक अनुशासित कार्य-संस्कृति, राजभाषा-प्रयोग आ कार्यालयीन अनुवादक अनुभव हिनक भाषा-दृष्टिकेँ व्यावहारिक आधार प्रदान कएलक। किशोरावस्थामे ‘मिथिला मिहिर’क ‘बटुकक चटिसार’मे रचना प्रकाशित होएबहिनकालेल पहिल सार्वजनिक प्रेरणा छल। एहि यात्रामे पारिवारिक साहित्यिक परम्परा, सरिसब-पाहीक विद्वत् परिवेश, साहित्यकारसभक सान्निध्य आ पटनाक प्रकाशन-संस्कृति ईचारू प्रमुख प्रेरक तत्त्व बनलनि ।
डा.रमानन्द झा ‘रमण’क साहित्यिक व्यक्तित्वक केन्द्रीय आधार हुनक आलोचना-साधना अछि।ई साहित्यिक कृतिकेँ प्रशंसा वा दोष-दर्शनक विषय नहि मानैत छथि,हिनका लेल आलोचना इतिहास-बोध, पाठ-बोध, विचार-दृष्टि आ कलात्मक संरचनाक समन्वित परीक्षण अछि।डा.रमणजी ‘नवीन मैथिली कविता’ (1982) आ ‘मैथिली नऽव कविता’ (1993)मे नव कविताक अनास्था, असन्तोष, आत्मनिर्वासन, जीवन-मूल्य, व्यंग्य, रूप-विधान आ परिवेशक विश्लेषण कऽ मैथिली आधुनिकताक आलोचनात्मक आधार निर्मित कएने छथि ।तहिना ‘मैथिली साहित्य ओ राजनीति’ (1994) साहित्य आ सत्ता-संरचनाक सम्बन्धकेँ प्रश्नांकित करैत अछि। ‘अखियासल’ (1995), ‘बेसाहल’ (2003), ‘भजारल’ (2005), ‘हिआओल’ (2012), लक्ष्मीपति सिंह,विनिबन्ध(2012),‘चितिर-बितिर’ (2014), ‘बेराएल’ (2018), ‘अनुसन्धान-प्रतिमान’ (2018), ‘मार्कण्डेय प्रवासी-विनिबन्ध’ (2022), ‘बीज-भाषण’ (2022), ‘विवर्त’ (2023) आ ‘नगेन्द्र कुमार-विनिबन्ध’ (2025) हिनक आलोचनात्मक विस्तारक प्रमाण थिक। लक्ष्मीपति सिंहपर विनिबन्ध साहित्येतिहासक उपेक्षित कड़ीकेँ पुनः समक्ष अनबाक हिनक प्रवृत्तिकेँ रेखांकित करैत अछि।रमणजी मैथिली आलोचनाकेँ सुदृढ़ करबाक लेल साहित्यकार-केन्द्रित अध्ययन-विवेचनक परम्पराक पक्षधर छथि। आ तेँ, ओ मणिपद्म चेतनामे लिखैत छथि – “मैथिली आलोचना साहित्यक सम्यक विकासक लेल साहित्यकार केन्द्रित अध्ययन-विवेचनक परम्परा सुदृढ़ होएब आवश्यक अछि। एहिसँ नाम गनेबाक परम्पराक इतिश्री होएत, विशदता आओत तथा साहित्यकार विशेषक साहित्यक संरक्षणक प्रति चेतना जागत। आलोचनाक प्रवृत्तिक सम्बन्धमे सेहो विचार मनमे आएल। से छल मैथिली भाषा-साहित्यक अध्ययन एवं अनुसन्धानकेँ आन्तर-विषय आधारित बनाओल जाएब।सम्प्रति साहित्यक अध्ययन-विवेचन मात्र साहित्यशास्त्रक सिद्धान्तेक आधार पर नहि होइत अछि। साहित्य जँ समाजक दर्पण थिक तँ अध्येताक लेल इतिहास आ' समाजशास्त्रक ज्ञान एवं मनोविज्ञानक रहस्यक जनतब राखब सर्वथा अपेक्षित छनि। सङ्गहि, तुलनात्मक दृष्टिक आश्रय लेब सेहो आवश्यक अछि।”
हिनक आलोचनाक प्रमुख गुण छनि - तथ्यपरकता, पाठकक निकट पहुँचब, पूर्ववर्ती मतक खण्डन-मण्डन आ अपन निष्कर्षक तर्कसंगत स्थापना। परम्पराक प्रति सम्मान रहितो ओ आलोचनात्मक विवेककेँ स्थगित नहि करैत छथि। एहि कारण हिनक लेखन इतिहास आ आधुनिकता, संस्कार, प्रश्नाकुलता आ शास्त्री अनुशीलनक बीच संवाद स्थापित करैत अछि।
डा.‘रमण’क निबन्ध-विधा विषयगत विस्तारक कारण विशेष उल्लेखनीय अछि। हिनका लेल निबन्ध कोनो कठोर साँचनहि, अपितुगहन अध्ययन, अनुभव, मौलिकता आ भाषा-सौष्ठवक मुक्त रूप अछि। साहित्य, भाषा, समाज, राजनीति, संस्कृति, व्यक्तित्व, संस्मरण आ शोध-पद्धति एहि सभ पर हिनक निबन्ध भेटैत अछि। हिनक निबन्धमे विषयक व्यापक पृष्ठभूमि, प्रमाणक उपयोग, विचारक क्रमबद्ध विकास आ निष्कर्षक स्पष्टता रहैत अछि। डा. ‘रमण’ पाठककेँ तैयार निष्कर्ष थोपैत नहि छथि, सामग्री, मतान्तर आ प्रसंगक सहायतासँ विचार करबाक अवसर दैत छथि। एहि दृष्टिसँ हिनक निबन्ध आलोचना आ सर्जनात्मक गद्यक मध्य एकटा सेतु बनैत अछि।
डा. ‘रमण’क अनुवाद-साधना भाषा आ संस्कृतिक मध्य सृजनात्मक संवाद स्थापित करैत अछि, जाहिमे स्रोत-भाषा आ लक्ष्य-भाषाक संग-संग स्रोत-संस्कृति आ लक्ष्य-संस्कृतिक भाव, विचार आ संवेदनाक स्वाभाविक सम्प्रेषण होइत अछि। हिनक दृष्टिमे आधुनिक अनुवाद बहुआयामी आ अन्तर्विषयी सृजनात्मक अनुशासन अछि। कार्यालयीन हिन्दी अनुवादसँ आरम्भ भेल हिनक अनुभव क्रमशः साहित्यिक अनुवाद धरि विस्तृत भेल। साहित्य अकादमीक राष्ट्रीय अनुवाद कार्यशालामे चयनित भेलाक बाद ओ फकीर मोहन सेनापतिक ओड़िया उपन्यास ‘छ माण आठ गुंठ’क मैथिली रूपान्तर ‘छओ बिगहा आठ कट्ठा’ (1999) कएलनि।ई कृति भाषिक स्वाभाविकता, सामाजिक यथार्थक प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति आ सांस्कृतिक समतुल्यताक कारण अनूदित ई पोथी विशेष चर्चित भेल।
मौलियरक दू नाटकक अनुवाद (1999),‘सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा’, रिजर्व बैंकक ‘टाकाक गाछ’, ‘लखपतिजी लुटेलाह’ आवित्तीय ठकपनीकतरिकापर एक पुस्तिका(2023)(भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा प्रकाशित एक जन-जागरूकता पुस्तिका अछि) जे हिनक अनुवादक विविधता केँ देखबैत अछि। एहि काजसभमे साहित्यिक संवेदना आ लोक-उपयोगिता दुनू उपस्थित अछि।
डा. झाक सम्पादन-साधना विस्मृत साहित्यिक परम्पराक पुनरुद्धारक महत्त्वपूर्ण उपक्रम अछि, जकर माध्यमसँ ओ अनेक दुर्लभ आ अप्राप्य कृतिक संगहि अज्ञात-अल्पज्ञात साहित्यकारसभकेँ नव पाठक-वर्गक समक्ष अनलनि।हिनक सम्पादन-साधना सर्वाधिक व्यापक आ दीर्घजीवी अवदानमेसँ एक अछि। हिनक अद्यतन बावन सम्पादित ग्रन्थअछि, जे लगभग 1978-2024धरिक।यथा -‘मैथिलीक आरम्भिक कथा’ (1978) सँ आरम्भ ई यात्रा श्यामानन्द रचनावली(1982), निर्दयी सासु एवं पुनर्विवाह(1984), चैतनाथ झा कृत श्रीजगन्नाथपुरी यात्रा(1994), तेजनाथ झा कृत सुरराज विजयनाटक(1994), रासबिहारीलाल दास कृतसुमति(1996),जीवछ मिश्र कृत रामेश्वर(1996), पण्डित गोविन्दझा:अर्चा ओ चर्चा(1997),भेंटघाँट(1998),रूचय तँ सत्य ने तँ फूसि(1998),मणिपद्मक कनकी(2003),पुण्यानन्द झाकृत मिथिला दर्पण (2001), उग्रानन्दकृत शिवगंगा, कथासंग्रह(2002),यदुवर रचनावली(2003),मैथिली उपन्यासमे चित्रित समाज(2003),विद्यापति विवरण(2005),कवीश्वर चेतना(2008),मैथिलीक आरम्भिक यात्रा-साहित्य(2009),ग्रिअर्सनकृत गीत दीनाभद्री ओ गीत नेबारक (अनुवाद:पं. श्रीगोविन्द झा2010), ग्रिअर्सनकृत मैथिली व्याकरण (अनुवाद:पं. श्रीगोविन्द झा, 2011), लक्ष्मीपति सिंह रचना संचयन(2012),काश्चीनाथ झाक ‘चन्द्रग्रहण’(2012), मिथिलाक विदुषी महिला,’अरुंधती देवी’ (2013), अगिलेसुआ, कथासंग्रह, हरिनन्दन ठाकुर ‘सरोज’(2014),मणिपद्म-चेतना(2013),मैथिली लोकसाहित्य एवं लोक संस्कृति(2014),मैथिली कथा नेपाल, कथासंग्रह (2014)लिली रेक,‘रंगीन परदा’,’लाली गुराँस’(2014),‘विशाखन’, (2015),‘नीक लोक’(2015), ‘पटाक्षेप’(2015),उपसंहार एवं एकटा बड्ड पुरान गप्प, समयकेँ(2015), ‘प्रतिनिधि कथा’ (2021), ‘लिली रे:व्यक्ति ओ रचना’ (2023),जीबछ मिश्र रचनावली(2016),आब की कविता करब हम? महावीर झा ‘वीर’(2016), मैथिली कथा :भाषा एवं शिल्प(2016), तेजनाथ रचनावली(2017),विद्यापति-चेतना, (2017) महाकवि लालदास:समय ओ रचना(2017), मधुप-चेतना(2018),लक्ष्मीपति सिंहकृत हिन्दी-मैथिली शिक्षक(2018),हरिश्चन्द्रनृत्यं(2019),आधुनिक मैथिली नाटक संचयन (2019),महाकवि लालदास रचनावली(2019),मैथिली कथाक धाप(2020),राजा टंकनाथ चौधुरी (2024),महाकवि लालदास रचनावली, खण्ड-2(2024) ।
मणिपद्मक ‘कनकी’, पुण्यानन्द झाक ‘मिथिला दर्पण’, उग्रानन्दकृत ‘शिवगंगा’, यदुवर रचनावली, ‘मैथिली उपन्यासमे चित्रित समाज’, ‘विद्यापति विवरण’, ‘कवीश्वर चेतना’, ‘मैथिलीक आरम्भिक यात्रा-साहित्य’ आदि धरि विस्तृत अछि।ग्रियर्सनक ‘गीत दीनाभद्री आ गीत नेबारक’ तथा ‘मैथिली व्याकरण’क अनुवादित-पुनर्प्रस्तुति, लक्ष्मीपति सिंह रचना-संचयन,अरुंधती देवीक ‘मिथिलाक विदुषी महिला’, हरिनन्दन ठाकुर ‘सरोज’क कथा-संग्रह, ‘मैथिली लोकसाहित्य एवं लोक संस्कृति’, ‘मैथिली कथा : नेपाल’, लिली रेकक कथा, उपन्यास, आत्मकथा आ प्रतिनिधि-कथा सम्बन्धी अनेक पुस्तक, ‘आधुनिक मैथिली नाटक संचयन’, ‘महाकवि लालदास रचनावली’, ‘मैथिली कथाक धाप’, ‘लिली रे : व्यक्तित्व आ रचना’ तथा 2024 धरि प्रकाशित रचनावलीसभ एहि श्रमक विस्तार देखबैत अछि।
रमणजीक सम्पादन-कर्म मुख्यतः दू स्वरूपमे विभाजित देखाइत अछि। प्रथम, प्रत्यक्ष सम्पादन, जाहिमे ओ विभिन्न ग्रन्थ, संकलन आ पत्र-पत्रिकाक सम्पादन कएलनि, आ द्वितीय, अनुसंधानाधारित सम्पादन, जाहिमे गहन शोध, पाठ-समीक्षा, स्रोत-अनुसन्धान आ प्रामाणिक सामग्रीक संकलनक आधार पर विस्मृत अथवा दुर्लभ साहित्यिक कृतिक सम्पादन क’ साहित्य-जगत् समक्ष प्रस्तुत कएलनि।हिनक सम्पादनक वैशिष्ट्य मात्र सामग्री जुटाएब नहि, अपितु प्रामाणिक पाठक निर्धारण, आवश्यक भूमिका, लेखक-परिचय, सन्दर्भ-सूचना आ दुर्लभ सामग्रीक संरक्षण अछि। ओ अतीतकेँ संग्रहालयमे राखल निर्जीव वस्तु नहि बनबैत छथि; नव पाठक आ शोधार्थीक उपयोग योग्य बनबैत छथि। एही कारण हिनक सम्पादन मैथिली साहित्येतिहासक रिक्त स्थान भरबाक महत्त्वपूर्ण काज अछि।रमणजीक सम्पादकीय व्यक्तित्व पुस्तकधरि सीमित नहि अछि। भारतीय रिजर्व बैंकक हिन्दी त्रैमासिक ‘कोषाक्षर’ (1982), मैथिली मासिक ‘प्रयोजन’ (1993-94), ‘कथा-दिशा’क सम्पादक-मण्डल तथा चेतना समितिक मैथिली त्रैमासिक ‘घर-बाहर’सँ हुनक गम्भीर सम्बन्ध रहल। 2005 सँ ‘घर-बाहर’क सहायक सम्पादक आ जनवरी-मार्च 2017 सँ सम्पादक रूपेँ ई पत्रिकाक नियमितता, सामग्रीक स्तर आ वितरणक विस्तार निरन्तर क’ रहलाह अछि ।
हिनक साहित्यक अन्य क्षेत्र सेहो कम महत्त्वपूर्ण नहि अछि। भूमिका-लेखन, संस्मरण, भेंटवार्ता, रिपोर्ताज, साहित्यकारसभक साक्षात्कार आ ‘रुचय तऽ सत्य ने तऽ फूसि’ शीर्षक हास-परिहासपरक अभिव्यक्ति हुनक लेखनकेँ बहुरंगी बनबैत अछि। एहि विधासभमे ओ साहित्यिक इतिहासक औपचारिक दस्तावेजक संग मानवीय स्मृति, आत्मीयता आ समकालीन वातावरणकेँ सुरक्षित करैत छथि, जाहि हेतु डा.‘रमण’केँ साहित्यिक अवदानक मान्यतास्वरूप हिनका कतेको प्रतिष्ठित पुरस्कार आ सम्मान प्रदान कएल गेल छनि। ‘मैथिली नऽव कविता’ लेल बिहार सरकारक राजभाषा विभाग द्वारा 1994–95 मे जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन पुरस्कार आ ‘छओ बिगहा आठ कट्ठा’क मैथिली अनुवाद लेल भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर द्वारा 2004–05मे भाषा-भारती सम्मानसँ सम्मानित कएल गेलनि। एकर अतिरिक्त हुनका 2011 मे रहिका समाज, मधुबनीक किरण पुरस्कार, साहित्यिकी, सरिसब-पाहीक साहित्यिकी सम्मान, 2022मे विद्यापति सेवा संस्थान, दरभंगाक मिथिला विभूति सम्मान आ 2024मे चेतना समिति, पटनाक यात्री चेतना पुरस्कार आदि ।
अस्तु, समग्र रूपसँ कहल जाए तँडा. रमानन्द झा ‘रमण’क साहित्य-साधनाक विविध आयाम वास्तवमे एक-दोसरक पूरक अछि । आलोचक रूपमे ओ साहित्यक मूल्य निर्धारित करैत छथि; सम्पादक रूपमे मूल्यवान पाठ बचबैत छथि, अनुवादक रूपमे भाषा-संस्कृतिक सीमा लाँघैत छथि, निबन्धकार रूपमे विचारक क्षितिज विस्तृत करैत छथि, आ संस्थाकर्मी रूपमे साहित्यकेँ सामाजिक आधार प्रदान करैत छथि। हुनक लेखनक मूल स्वभाव अनुसन्धानपरक अछि, मुदा ई शुष्क अकादमिकता नहि। ओहि अनुसन्धानक पाछाँ भाषा-प्रेम, ऐतिहासिक जिम्मेदारी आ पाठकीय सरोकार सक्रिय अछि।डा. रमानन्द झा ‘रमण’ मैथिली साहित्यक एहन समन्वित व्यक्तित्व छथि, जिनकामे आलोचकक विवेक, सम्पादकक धैर्य, शोधकर्ताक जिज्ञासा, अनुवादकक भाषिक सजगता, निबन्धकारक मुक्त चिन्तन आ कार्यकर्ताक प्रतिबद्धता एकत्रित अछि। हिनक साहित्यक अध्ययनसँ आधुनिक मैथिलीक विकास-यात्रा, ओकर वैचारिक संघर्ष, ओकर विस्मृत धरोहरक परिचय भेटैत अछि। एहि अर्थमे हिनक साहित्य-साधना व्यक्तिगत उपलब्धिक कथा नहि, अपितु मैथिली भाषा-साहित्यक संरक्षण, पुनर्मूल्यांकन आ भविष्य-निर्माणक दीर्घ सांस्कृतिक अभियान अछि।
संदर्भ :
1. आलोचनात्मक इतिहास, डा दिनेश कुमार झा, मैथिली अकादमी, पटना, 1989
2. मैथिली कथाक धाप, डा. रमानन्द झा‘रमण’, प्रकाशन वर्ष-2020, पृ. 56
3. मणिपद्म चेतना, डा. रमानन्द झा ‘रमण’, प्रकाशन वर्ष -2013, पृ. 7
4. मैथिली नsव कविता, डा. रमानन्द झा ‘रमण’, प्रकाशन वर्ष -1993,
5. मैथिली साहित्यक इतिहास, डॉ जयकान्त मिश्र, प्रकाशन - 2009
6. मैथिली पत्रकारिताक इतिहास, पं. चंद्रनाथ मिश्र ‘अमर’,प्रकाशन- 1981
7. मैथिली कथाक समाज : भाषा एवं शिल्प, डा. रमानन्द झा ‘रमण’, प्रकाशन वर्ष –2016
२.९. कुमार राहुल- अनुसंधान आ संरक्षण लेल अपस्यांत डॉ रमानंद झा रमण
कुमार राहुल
अनुसंधान आ संरक्षण लेल अपस्यांत डॉ रमानंद झा रमण
प्रत्येक लेखक अपन दृष्टि आ रुचिक सीमामे काज करैत छथि। ई कोनो जरूरी नै जे हमरा जे पसिन्न ऐ, वैह दोसरो कें नीक लगै। एकर अतिरिक्त पारिवारिक पृष्ठभूमि, पढ़ाइ, चाकरी आ सबसं बेसी बेगरता पड़ला पर लेखन लेखककें लेखनक लीक बदलबाक लेल बाध्य करैत छै। ई बात मैथिलीमे तं सभसं बेसी आ सभ बात सं बेसी भरिगर ऐ। जं हम अपने मादे कही तं हमरा कविता-कथा-बीहनि कथा लीखब बेसी नीक लगैए, मुदा निबंध सेहो लिखि लेल करैत छी। कोनो पोथी पर टिप्पणी सेहो लिखा जाइत अछि। कहबाक तात्पर्य जे एक विधामे स्थिर रहि ओकरा पर काज केनिहारक अभाव भारतीय साहित्यक सभ भाषामे देखल जाइत छै आ मैथिली एहिसं अलग तं नहिएं ऐ। एहनामे रमानंद झा रमण समालोचना दिस अपना कें केंद्रित केना केलनि से हमरा ओतेक नै बूझल ऐ। हं, आलोचना करबाक निमित्त हुनक अपन तर्क छनि आ से हुनक मनक अनुकूल मानल जयबाक चाही। समालोचनाक क्रम मे जाहि तरहें रमानंद झा रमण साहित्यकार आ रचनाक गणना (पंजीकरण) आ पुरान पोथीक उत्खनन (शोधकर्ताक रूप मे) करैत रहलाह से मैथिली साहित्य लेल विरल कहल जयबाक चाही। पुरान पीढ़ीसं नव पीढ़ीक परिचय करेबाक गुरुत्तर भार जाहि तरहें रमण जी उठौलनि से हुनक सर्वोत्कृष्ट काज थिक।
हम हुनकर सीमाकें तं रेखांकित कए सकैत छी, मुदा हुनका सं ‘सभ काज’ करबाक अपेक्षा नै राखि सकैत छी। दोसर दिस एक आलोचकक रूपमे रमण जीक वैचारिकता कतए ऐ तेकर निर्धारण करब हमर काज नै एखन। हं, एतबा तं कहले जा सकैए जे ओ ने तं पश्चिमक अंधविरोधी छथि, ने अंधानुगामी। कोनो साहित्यकारक व्यक्तित्वमे कवि सन भावुकता, समीक्षक सन संतुलित सोच, शोधकर्ता सन मौलिक दृष्टि आ संपादक सन गंभीरता- ई सभ गुण कतेक नीक जकां संपृक्त भ' गेल छै, तेकर निर्धारण पाठक स्वयं करैत छै। ओना जं रमण जीक एकहिटा गुणकें परेखी तं हमरा हिसाबें हुनकर साहित्यिक व्यक्तित्व कें सार्थक बनेबामे समर्थ ऐ।
रमण जीक लेखन गुणात्मक तं अछिये, संख्यात्मक सेहो कम नहि। मैथिलीक हिसाबें देखी तं कतोक रचनाकारक पोथी प्रेसस्थे रहि गेल करैत छै अथवा पत्र-पत्रिकामे छिड़ियालये। जं रमण जीक काज कें देखी तं ओ जेना-जेना लिखैत गेलाह, तेना-तेना पोथीक रूप मे ओकरा पाठकक समक्ष रखैत गेलाह। नवीन मैथिली कविता, मैथिली नऽव कविता, मैथिली साहित्य ओ राजनीति, अखियासल, बेसाहल, भजारल आदि किछु पोथी एकर उदाहरण ऐ। ऐ पोथी सभमे आत्मप्रधान आलोचनाक प्रभाव अछि। (वैयक्तिक सेहो कहि सकैत छी।) किछु आलेख सैद्धांतिक आलोचनाक निकष पर सेहो सही उतरि सकैछ, मुदा तेकर संख्या हमरा कम देखायल। रमण जी उत्साहसं काज करैत छथि आ से ऐ आलोचना पद्धतिमे विद्वान आलोचक कोनो बान्हल-छेकल नियमक पालन करैत नै देखाइत छथि, बल्कि कोनो एके टा तत्त्व सं प्रभावित भ' अपन निर्णय द' दैत छथि। ई अलग बात जे किछु ठाम टिपाउट जेकां रमण जी कोनो रचना अथवा रचनाकार पर कम शब्दमे काज चला लेल करैत छथि आ अपन बात बेसी लिखैत छथि।
किछु विद्वानक मानब छनि जे व्यक्तिगत रुचि सं अलग भ' क' कोनो कृतिक समीक्षा संभव नहि। व्यक्तिगत विचार स्वातंत्र्यक भावना एहि तरहक आलोचना कें जन्म द' विकसित केलक-ऐ आ से ऐ विचारें देखी तं रमण जीक समीक्षा शैलीमे ई बात देखा गेल करैछ।
हडसनक कहब छथि जे आलोचनाक काज मात्र कृतिक उचित-अनुचित देखब नै, बल्कि किछु निश्चित मानदंड सेहो स्थापित करब थिक। उचित नियम अपना क' आलोचना करब आ सिद्धांतक आधार पर निर्णय देब सैद्धांतिक आलोचना कहबैत ऐ।
रमण जीक आलोचनाक किछु पोथी/आलेख (मैथिलीक आरम्भिक कथा, मैथिली उपन्यासमे चित्रित समाज) पढ़ला पर हमरा ई मानयमे संकोच नै ऐ जे एक्के तरहक बहुत रास कृतिकें आधार बना क' किछु सिद्धांत सन रमण जी निश्चित क' लैत छथि आ फेर ओही सिद्धांतक आधार पर आलोचना करैत चलि गेल करैत छथि। एहि तरहें देखी तं रमण जी सैद्धांतिक आलोचना दिस जाइत सेहो देखाइत छथि। हिआओलक भूमिकामे रमानंद झा रमण लिखैत छथि-
ईशिता पूछि देलनि– "ई पोथी सब की होएतैक?" से जे होएतैक, देखल जाएतैक! ।।।। मुदा, हम विश्वासपूर्वक कहि सकैत छी, ई सभ ने अपने केँ एकभगाह लागत आओर ने गोधिआँकेँ लपेट परसबाक सुनिश्चित चालिक आभास देत अर्थात रमण जी स्पष्ट रूपें कहैत छथि जे मैथिलीमे केहन आलोचनाक दौर चलि रहल छै आ केहन आलोचना हेबाक चाही। हुनक मानी तं आलोचना वैह ठीक भेल जे आ जेना ओ लिखलनि।
व्याख्या आलोचनाक प्रधान गुण थिक। एहि तरहें देखी तं किछु आलेखमे रमणजीक आलोचक सभ सिद्धांत कें छोड़ि क' रचनाकार वा लेखकक अंतरात्मामे प्रवेश करैत छथि आ सहानुभूतिपूर्वक हुनकर कृतिक व्याख्या करैत छथि। रमणजी सभसं पहिने अन्वेषक जकां काज करैत छथि। विषय निरूपणक पद्धति, कथनक ढंग, रचनाकारक आदर्श आ प्रेरणा आदि सभ तत्त्व पर बहुत सूक्ष्म दृष्टि राखि अपन बात रखैत छथि। एहन आलेख लगैत छै जेना कोनो सेमिनारक लेल निश्चिंत मनसं लिखल गेल हो। पुरान रचनाकारक पोथीक भूमिका सभमे गुण-दोष गनबा सं बेसी सोझ-सोझ व्याख्या करैत छथि। ओना किछु ठाम रमणजीक आलोचक ई नै कहैछ जे रचनाकार एना कहैत छथि, ओना कहैत छथि।।।एकर उलट रमण जी सीधे कहैत छथि जे हमरा ई कृति एहन लागल। एहि संदर्भें देखी तं ई मानि सकैत छी जे रमण जी व्यक्तिगत मानदंड अपनबैत छथि।
पुरखा सभकें मोन पारबाक अर्थ अछि हुनकर सभक कथा, भाषा आ मूल्य कें सम्हारि क' राखब। एहि संदर्भमे लेखिका टोनी मॉरिसन मानैत छलीह जे पुरखा सभ पाछू छूटल लोक नै छथि, अपितु ओ सभ हमरा सबहक वर्तमानकें बाट देखाबय वला आत्मा छथि। साहित्यकार शर्ली एबॉटक अनुसार, हमरा सभक पूर्वज सबहक मस्तिष्कक कोनमे आ देहक कोशिका सभमे ज्ञानक शृंखलाक रूपमे जीवित रहैत छथि। किछु अही तरहक विचारक संग रमानंद झा रमण मैथिलीमे ऐतिहासिक काज सभ केलनि।
हमरा रमणजीक खोजी रूप सं पहिल साक्षात्कार श्यामानन्द रचनावली, जनार्दन झा‘ जनसीदन कृत निर्दयी सासु आ पुनर्विवाह सन पोथी पढ़ि भेल। हमर किशोर आ युवा मनकें ओहि समय लागल छलैक जे आलोचकक काज यैह थिक। तकर बाद धीरे-धीरे रमणजीक अन्य आलेख सभ पढ़बाक सुयोग समय-समय पर लगैत रहल। चेतनाथ झा कृत श्रीजगन्नाथपुरी यात्रा, तेजनाथ झा कृत सुरराज विजय नाटक, रासबिहारी लाल दास कृत सुमति, जीबछ मिश्र कृत रामेश्वर, पुण्यानन्द झा कृत मिथिला दर्पण, यदुवर रचनावली, कृत विद्यापति विवरण, पंडित गोविंद झाः अर्चा ओ चर्चा आदि कतेको काज रमण जी कें अनकासं अलग केलकनि।
श्यामानंद रचनावली, जनार्दन झा जनसीदन कृत निर्दयीसासु आ पुनर्विवाह, राजा टंकनाथ सं संबंधित पोथीक संपादनक आदि काज निश्चये रमण जीक पहचानकें जगजियार केलक। तैं हम हिनका साहित्यक उत्खनन (अनुसंधान आ संरक्षण) लेल प्रयासरत एकटा उत्साही आलोचक मानैत छी। ई आलोचनाक ट्रैक बदलैत रहलाह आ बीच-बीचमे भाषाशास्त्र, संपादन आदि दिस अपना कें समर्पित करैत रहलाह।
जनार्दन झा ‘जनसीदन’क ‘निर्दयी सासु’क संदर्भ मे मिथिला मिहिरमे आयल आलेख (जे बाद मे अखियासल पोथी मे संग्रहित भेल) मे रमण जी लिखैत छथि-
'जनसीदनजीक सान्निध्य आ एहि प्रकारक रचना सभकेँ देखि स्पष्ट भए जाइछ जे जनसीदनजीक व्यक्तित्वमे ओ प्रखरता नहि छल जाहिसँ शासन-व्यवस्थाक विरोधमे ठाढ़ भए सकथि। आ तेँ जनसीदनजी अपन सम्पर्क एवं सान्निध्यकेँ ध्यानमे रखैत साहित्य सर्जना लेल सामाजिक क्षेत्रकेँ अपनाओल। ओहीपर कलम उठाओल। ई तँ देशक समसामयिक राष्ट्रीय चेतनाकेँ ध्यानमे राखि जनसीदन जीक व्यक्तित्वक मूल्यांकन भेल। जँ सामाजिक आ सुधारवादी चेतनाकेँ ध्यानमे राखि जनसीदनजीक उपलब्ध साहित्यक माध्यमसँ व्यक्तित्वक विश्लेषण करैत छी तँ व्यक्तित्व प्रखर भेटैत अछि। सामाजिक विकृतिकेँ दूर करबा लेल तत्पर छथि। जे सामाजिक व्यवस्था मिथिलाक समाजकेँ कोला-कोलामे बांटि शोषण करैत छल, तकर विरोधमे शंखनाद करैत पबैत छी। उपन्यासकारक प्रखर सामाजिक चेतनाक ई प्रतिफल थिक जे घोर मानसिक संघर्षक बाद ज्योतिषी चिन्तामणि झा ओहि परिपाटीक विरोधमे कन्यादान करैत छथि जे मिथिलाक सामाजिक जीवनमे विभेद उत्पन्न करबाक हेतु ठाढ़ कएल गेल छल'।
ई कहबामे असोकर्य नै जे रमणजी अपन पुरखाक (मैथिली साहित्यक शुरुआती पीढ़ीक) काज कें खाली उत्खनित करैत छथि, अपितु हुनक रचना संसारक विवेचन आलोचकीय दृष्टिकोणसं सेहो करैत छथि। ई संभव नै जे हुनक विचारसं सभ क्यो सहमते हुअय, मुदा अपन विचारसं पाठक कें परिचय तं करबैते छथि। हमरा जनतबे रमणजीक उत्खननक बादे निर्दयी सासु उपन्यासक नालंदा निवासी नारायण प्रसाद मगही अनुवाद केलनि आ अन्य इलाकाक लोक इ जनलक जे मैथिलीमे लगभग सौ साल पहिनेसं उपन्यास लिखल जा रहल छैक।
लीली रेक रचना संसार कें जखन मैथिली साहित्य बिसरय लागल छल, तखन हुनक एक-एकटा कथा, उपन्यास, दीर्घ कथा, संस्मरण आदि कें फेरसं पाठकक समक्ष रमण जी अनलनि। एकरा संगहिं ओ लीली रेक रचना पर स्वयं लिखलनि आ अन्य विद्वान लोकनिकें लिखबाक लेल प्रेरित सेहो केलनि। लीली रेक समग्र रचनासं नब पीढ़ी कें परिचय करेबाक निर्वहन रमण जी खूब नीक जकां केलनि। जं एना नै होइत तं रंगीन पर्दा आ मरीचिका सं नब पीढ़ी अनभिज्ञ रहि जा सकैत छल। हम कहि सकैत छी जे रमणजी कें मैथिली साहित्यक पाठक वर्ग किछु बात ल' कें निश्चये मोन पाड़तनि। जेना-
जखन फेसबुक पर जन्म दिवस आ पुण्यतिथि पर कोनो रचनाकरकें ओ मोन पाड़ैत छथि तं साहित्यिक पंजीकरणक बात सहसा हमरो मोन पड़ैत अछि। ओना रमणजीक किछु आलोचनात्मक आलेख सेहो पंजीकरण दिस जाइत देखाइत अछि। मैथिली कथा, मैथिली कविताक संग विनोद बिहारी लाल, अशोक, शैलेंद्र आनंद आदि रचनाकार पर हुनक आलेख साहित्यिक पंजीकरणक एकटा नीक उदाहरण थिक। ओहिना भेटघांट आ रूचय तं सत्य ने तं फूसि सेहो स्वयंमे मीलक पाथर थिक। राजा टंकनाथ चौधरीक बिसरल अवदान कें विभिन्न माध्यमे आ विभिन्न लोक सभक मार्फत जगजियार करब रमण जीक साहित्य आ भाषाक उत्खनन कार्यक बेजोड़ उदाहरण थिक। ओहिना लीली रेक समग्र रचना सभ कें एकत्रित करैत बेराबरी प्रकाशित करब, संपादित करब आ हुनक साहित्य पर सार्थक आलोचना करब सेहो रमण जीक विरल काज थिक।
२.१०. अशोक- डा. रमानंद झा रमण केर महत्व
अशोक (संपर्क-8986269001)
डा॰ रमानन्द झा ‘रमण’क महत्व
मैथिली साहित्यमे डा॰ रमानन्द झा ‘रमण’क योगदान बहुत व्यापक अछि। एहन योगदान समाज, साहित्य, संस्कृति के क्षेत्रमे विरल होइत अछि। खोज आ अनुसन्धान, आलोचना, सम्पादन के क्षेत्रमे जे काज सभ ओ केलनि से अध्येता लोकनिक हेतु, सामान्य पाठक सभ लेल बहुत उपयोगी अछि। हिनक पोथी ‘बेसाहल’ (2003) मे प्रो॰ आनन्द मिश्र लिखने छथि जे, ‘मैथिली साहित्यक अनेक रचना पत्र-पत्रिकाक ढेर मे भोतिआएल अछि। बहुत लेखकक नाम तँ पाठक सुनने छथि किन्तु रचनाक दर्शन नहि होइत छैन्हि। ओहन रचना के प्रकाशमे आनि महत्वक चर्चा कए पाठककेँ परिचित करबैत छथि।’
वस्तुतः विशेष कऽ मैथिलीक आरम्भिक कथा आ उपन्यास सभ के ताकि कऽ ओकर सम्पादन आ पोथी रूपमे प्रकाशन मैथिली साहित्यमे हुनक महत्वपूर्ण योगदान मानल जा सकैत अछि। जँ ताकि-हेरि कऽ रमणजी ओकरा सभ के प्रकाशमे नहि अनितथि तँ मैथिलीक पाठक ओकरा सुलभतया नहि पढ़ि सकैत छलथि, आ ने पाठक आ आलोचक ओकर आलोचनात्मक विश्लेषण कऽ सकैत छलाह।
ओ ‘मैथिलीक आरम्भिक कथा’ (1978) आ ‘मैथिली कथाक धाप’ (2020) के सम्पादन-प्रकाशन केलनि। ‘मैथिली कथाक धाप’ मे 1940 सँ पूर्वक मैथिली कथा संग्रहित कएल गेल अछि। ओ आरम्भिक उपन्यास ‘निर्दयी सासु’ आ ‘पुनर्विवाह (1984) के पोथी रूपमे प्रकाशमे अनलनि, जकर लेखक छथि जनार्दन झा ‘जनसीदन। ‘निर्दयी सासु’ (1914)क प्रकाशन धारावाहिक रूपसँ मिथिला-मिहिरमे अक्टूबर 1914 सँ 28 नवम्बर 1914 धरि भेल रहए। ‘पुनर्विवाह’क प्रकाशन 1926 मे भेल रहए। रमणजी जीबछ मिश्रक ‘रामेश्वर’ (1916) के सम्पादित कऽ 1996 मे प्रकाशित केलनि। तहिना रासबिहारी लाल दासक ‘सुमति’ (1918) के वर्ष 1996 मे प्रकाशित केलनि। आ पुण्यानन्द झाक ‘मिथिला दर्पण’ उपन्यास, जे 1925 ई. मे पूर्णिया सँ प्रकाशित भेल छल, तकरा वर्ष 2001 ई. मे पुनर्मुद्रित केलनि।
एहि प्रकारक पुनर्मुद्रण सभमे हुनक सम्पादकीय सेहो बहुत महत्वपूर्ण होइत अछि। ओहि सँ उपन्यासकार आ उपन्यासक विषय-वस्तु पर ऐतिहासिक-सामाजिक दृष्टि सँ प्रकाश पड़ैत अछि। ‘मिथिला दर्पण’क उपन्यासकार पुण्यानन्द झाक सम्बन्धमे रमणजी लिखलनि अछि जे, ‘हिनक आरम्भिक शिक्षा अररिया हाई स्कूलमे भेल। प्रयाग कायस्थ पाठशालासँ इन्ट्रेन्स एवं क्रिश्चियन कॉलेज सँ आइ॰ ए॰ पास केलनि।
पण्डित पुण्यानन्द झा. छेदी झा 'द्विजवर'हि जकाँ एक स्वतन्त्रता सेनानी छलाह। स्वदेशी आन्दोलनक सक्रिय कार्यकर्ता छलाह। मातृभाषाक प्रबल उन्नायक ओ सेवक छलाह। ओ एम॰एल॰ए॰ सेहो भेल छलाह। ओ पूर्णिया समाचार पत्रक संपादन कएल। ओ पूर्णिया जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलनक सभापति छलाह। ओहिठामक 'कला भवन'क निर्माणमे पूर्ण सक्रिय छलाह। भाषा एवं राजनीति हेतु ओ अपन सर्वस्व स्वाहा कए देल"
एहिना लक्ष्मीपति सिंहक 'चामुण्डा' उपन्यास मिथिला-मिहिरमे 1933-34 मे प्रकाशित भेल छल। ओहि उपन्यास के रमणजी साहित्य अकादेमी सँ प्रकाशित 'लक्ष्मीपति सिंह रचना संचयन’ (2012) मे संकलित केलनि अछि।
मैथिलीक आरम्भिक कथाकार सभमे हरिनन्दन ठाकुर ‘सरोज’क नाम प्रमुखता सँ अबैत अछि। सरोजजी 1930 ई. सँ लऽ कऽ 1945 ई. धरि प्रकाशित सैंतीस टा कथा लीखि सभसँ बेसी कथा लिखनिहार कथाकार छथि। हिनकर कथा सभक संग्रह डा॰ रमानन्द झा ‘रमण’क सम्पादनमे 2014 मे प्रकाशित भेल अछि। कथा-संग्रहक नाम छी 'अगिलेसुआ'। एहि मे हुनक पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित सैंतीसो टा कथा संग्रहीत भेल अछि। हरिनन्दन ठाकुर ‘सरोज’क देहावसान मात्र सैंतीस वर्षक अवस्थामे 1945 ई. मे भेलनि। रमणजी लिखलनि अछि जे, ‘सरोजजीक उपलब्ध साहित्यक अवलोकनसँ स्पष्ट अछि जे हिनक साहित्यिक अभिव्यक्तिक मूल विधा कथा, उपन्यास एवं आलोचना थिकनि। ओ ‘माधवी-माधव’ (1935 ई.) उपन्यास लिखल एवं अनेकशः कथा लिखल। 'विद्यापति' नाटक एवं एक प्रहसन लिखल। सीता नवमी (जनकपुर यात्रा वर्णन) लिखल। किछु निबन्ध सेहो प्रकाशित छनि, जेना 'दीपावली', 'भौजीक प्रति वर्ताव केहेन होबक चाही', 'कुप्रथाक बहिष्कार' अछि।
रमणजी जँ सरोजजीक साहित्य के ताकि-हेरि ओकरा अपन सम्पादनमे प्रकाशित नहि करितथि तँ वर्तमान आ भविष्यहुँमे सरोजक अवदानसँ, हुनक साहित्यसँ परिचय हमरालोकनिकेँ संभव नहि छल। एहन स्थितिमे जखन पुरना पत्र-पत्रिका सभ नष्ट भऽ गेल अछि आ नष्ट भऽ रहल अछि तखन अपन पूर्वक साहित्यकार सभक अवदानसँ परिचिति करयबा लेल रमणजीक योगदानक महत्व के बूझल जा सकैत अछि। ‘माधवी-माधव’ (1935) उपन्यासमे सर्वप्रथम कोनो नवयुवक-नवयुवतीक बीच प्रेम के संग वार्तालाप सेहो भेल अछि। एहि सँ पूर्व ‘मोहिनी-मोहन’(1907-08) मे खाली पत्र-व्यवहार भेल छल।
संगहि एहि उपन्यासमे सर्वप्रथम कोनो नवयुवक विवाह लेल तिलक स्वरूप व्यवस्था गना कऽ विवाह नहि करबाक बात सेहो कहलनि अछि। ओ नवयुवक मैथिल-महासभाक अवसरपर अपन सहपाठी सभ संग मीलि शपथपूर्वक प्रतिज्ञा-पत्रपर हस्ताक्षर केने रहथि जे तिलक स्वरूप व्यवस्था गना कऽ विवाह नहि करब। रमणजीक अतीतक खानिसँ बाहरक कऽ वर्तमानमे पाठक-अध्येता सभहक समक्ष मैथिलीक साहित्यकार सभकेँ प्रस्तुत करबाक महत्वपूर्ण योगदानपर टिप्पणी करैत पं. गोविन्द झा कहैत छथि "आजुक लोक वर्तमानमे ततेक ओझराएल अछि जे अतीतक खोज-खबरि लेनिहार बड़ दुर्लभ। वास्तवमे जीवनहिमे नहि, साहित्यहुमे इएह हाल अछि। अतीतक साहित्यकार दिस हुलकियो देनिहार बिरलके भेटताह। एहने बिरलैकमे एक छथि डा. रमानंद झा 'रमण'। ई एखन धरि अतीतक अन्हार खानिसँ बहुतो साहित्यकार ओ साहित्यकेँ इजोतमे आनि मैथिलीक प्रशंसनीय देवा कए रहल छथि।"
रमणजीक काज सभक प्रसंग मैथिलीक प्रसिद्ध लेखिका लिली रे केर कथा सभक, हुनक उपन्यास सभक, आत्मकथा, दीर्घकथाक संपादन-प्रकाशनकेँ सेहो देखल-परेखल जा सकैत अछि। 2014-15 ई. सँ पूर्व हुनक कथा सभक संग्रह नहि प्रकाशित भेल छल। मात्र मरीचिका उपन्यासक दूनू भाग 1981-82 मे प्रकाशित भेल रहय। उपसंहार वैदेही पत्रिका मे 1991 मे प्रकाशित रहए आ प्रख्यात लेखिका विभा हुनक कथा सभक अनुवाद हिन्दीमे 'विल टेलर की डायरी' नामसँ तथा 'पटाक्षेप' उपन्यासक अनुवाद प्रकाशित करौने रहथि।
2014-15 मे आबि कऽ रमण जी द्वारा हुनक ‘रंगीन परदा’ (2014), 'लाली गुरास' (2014), ‘विशाखन’ (2015) कथा-संग्रह, पटाक्षेप उपन्यास (2015), 'एकटा बड्ड पुरान गप्प' उपन्यास (2015), 'समय के धङैत' आत्मकथा (2015), 'नीक लोक' दीर्घकथा (2017) ई. मे सम्पादन-प्रकाशन सम्भव भेल। हँ, एक लघु उपन्यास ‘जिजीविषा' नाम सँ 2005 मे प्रकाशित भेल रहय। यदि रमणजी द्वारा एहि प्रख्यात लेखिकाक कथा, उपन्यास, आत्मकथा सभक योजनाबद्ध रूपें सम्पादन-प्रकाशन नहि कएल गेल रहैत तँ वर्तमानमे लिली रे क रचना सभक अध्य्यन-पठन ओ आलोचना व्यवस्थित रूपें संभव नहि भऽ सकैत छल।
रमणजी द्वारा सम्पादनक आरो कीर्तिमान सभ अछि जाहिमे पण्डित चेतनाथ झा कृत श्री जगन्नाथ पुरी यात्रा, पं तेजनाथ झा रचनावली, ‘सुरराजविजय नाटक’, रूचए तऽ सत्त ने तऽ फूसि, यदुवर रचनावली, ‘विद्यापति विवरण’ )श्री वल्लभ झा), ग्रिअर्सन कृत मैथिली व्याकरण आदि प्रमुख मानल जा सकैत अछि।
पूर्वमे पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित आ पोथीक रूपमे अप्रकाशित होइतो अनुलब्ध महत्वपूर्ण रचना सभ के ताकि-हेरि ओकर महत्तापर अपन सम्पादकीय लिखैत रमणजी बहुतो पोथीक प्रकाशन संभव केलनि। एकर अतिरिक्त विभिन्न विषय आ विधा पर हुनक आलोचनात्मक निबन्ध सभ अनेक पोथीमे प्रकाशित अछि। एहन पोथी सभमे ‘मैथिली साहित्य ओ राजनीति’, ‘अखियासल’, ‘बेसाहल’, ‘भजारल’, हिआओल, चितिर-बितिर, विवर्त आदि पोथीकेँ देखल आ पढ़ल जा सकैत अछि। मैथिली कथा आ उपन्यास पर काज करैत हमरा ई अनुभव भेल जे बिना रमणजीक सम्पादित पोथी ओ हुनक प्रासंगिक आलोचनात्मक निबन्ध के पढ़ने आ यथास्थान ओकर उल्लेख के बिना अहाँक बात-विचार, लेखन पूर्ण नहि भऽ सकैत अछि।
एही संग एहन अनेक विषय अछि जाहिपर व्यवस्थित रूपें मात्र रमणजी लिखने छथि। जेना 'मैथिली कथा साहित्यमे शिल्पक विकास'। ओ विभिन्न कथा सभ के उदाहरणस्वरूप उपास्थापन कऽ ओहि शिल्प सभक विस्तार सँ वर्णन केलनि अछि जेना- प्रलापाय शिल्प, आवर्तक शिल्प, सांकेतिक शिल्प, प्रतीकात्मक शिल्प, बिंबात्मक शिल्प आदि। एही संग ओ विभिन्न कथाकारक कथा सभपर सेहो आलोचनात्मक निबंध लिखने छथि। मैथिलीक लगभग सभ विधापर अपन आलोचनात्मक निबंध सभसँ मैथिली साहित्यकेँ समृद्ध केलनि अछि। ओ विभिन्न विधाक संग विभिन्न नव-नव विषयकेँ अपन निबंधक लेखनमे प्रयोग करैत छथि जेना- मैथिली कवितामे नेताक चरित्र, मैथिली साहित्यमे मिथिला सांस्कृतिक चेतना ओ साहित्य सर्जना, मैथिली संस्कृतिपर सञ्चार माध्यमक प्रभाव, मैथिली साहित्य प्रबंधन एवं कृष्णकांत मिश्र आदि अछि। एहन अनेक बेछप ओ विशिष्ट निबंध सभ लीखि एक आलोचक रूपमे रमणजी अपनाकेँ अनेक मान्य आलोचक सभसँ फराक सिद्ध करैत छथि। एहि सभकेँ अतिरिक्त हुनकर एक आर विशिष्ट अवदान अछि- मैथिलीः कथा नेपाल के संपादन ओ प्रकाशन। नेपालक विभिन्न कथाकारक कथाक प्रकाशन के अतिरिक्त ओकर संपादकीय बहुत विशिष्ट अछि। मैथिली" कथा नेपालमे मैथिली कथा शीर्षकसँ ओहिमे ओ नेपालमे मैथिलीसँ लऽ कऽ कथाक आरंभ, विकास ओ प्रवृति आदिपर विस्तारसँ प्रकाश देलनि अछि।
रमणजीक मैथिली साहित्यमे एक विशिष्ट योगदान ‘मैथिली नव कविता’ (1993 ई.) पोथी सेहो अछि। मैथिली नव कविता पर एहि तरहक व्यवस्थित पोथी दोसर नहि देखबामे आयल अछि। एहिमे नव कविताक पृष्ठिभूमि, उन्मेष, प्रवृत्ति, शिल्प, पाठकीय संकट आ किछु प्रमुख कवि सभ पर सुविचारित आलोचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत कएल गेल अछि। एहि पोथीक बाद मैथिली कविता पर समग्र रूपमे कोनो पोथी नहि आएल अछि। खास कऽ आठम दशक के आ ओकर बाद के मैथिलीक समकालीन कवितापर।
एहि प्रकारें डा॰ रमानन्द झा ‘रमण’क योगदान सँ मैथिली साहित्य समृद्ध भेल अछि, से कहल जा सकैत अछि।
२.११. अजित कुमार झा- मैथिली साहित्यक सूक्ष्मद्रष्टा डा० रमानन्द झा
अजित कुमार झा (संपर्क-9472834926)
मैथिली साहित्यक सूक्ष्मद्रष्टा : डा० रमानन्द झा "रमण"
"सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥"
मनुस्मृति केर ई श्लोक एकटा व्यावहारिक जीवन-मंत्र सेहो अछि। एकर अर्थ भेल सदैव सत्य बाजू मुदा से सबहक प्रिय होइक आ जौँ अप्रिय अछि अर्थात् जे किनको कटु लागि सकैत छन्हि तेहन सत्य नहि बजबाक चाही। एहन असत्य जे किनको प्रिय लागनि सेहो नहि बजबाक चाही। जरुरी नहि जे सत्य सदैव कटु होइत छैक। जाहि सत्य केँ सुनि लोग केँ कष्ट होइत छन्हि से नहि बाजय केर सुझाव देल गेल अछि। मुदा अहि बातक जौँ अक्षरशः पालन कैल जाय तखन केओ समालोचक त' नहिए बनि सकैत छथि। खैर समय एवं आवश्यकतानुसार बुद्धि एवं विवेक सँ निर्णय लेबाक चाही। समालोचक वैह बनि सकैत छथि जे मुँह देखि मुङबा नहि बाँटैत होइथ। जे स्वयं अनुशासित होइथ। जिनका विभिन्न विषय पर गहन अध्ययन होइन। जे भूत, वर्तमान एवं भविष्य केँ अकानि सकथि। जिनका ओहि परिवेशक इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र एवं मनोविज्ञान केर भरपूर ज्ञान होइन। जे बिना कोनो भेदभाव केँ सबके पढ़ैत होइथ आ सत्य केँ सत्य तथा झूठ केँ झूठ कहबाक जिनका साहस होइन। कोनो विषय वस्तु केँ अखियासि लेबाक जिनका हिआओ होइन वैह व्यक्ति अपन सार्थक समालोचना द्वारा रचनाकार सब केँ उपकृत कय सकैत छथि। ई कहबा मे कनिको दुविधा नहि भ' रहल अछि जे उपर्युक्त वर्णित समस्त गुण सँ परिपूर्ण छथि आदरणीय रमानन्द झा 'रमण' जी। आलोचक केँ सूक्ष्मद्रष्टा सेहो कहल जाइत अछि आ ताहि पैमाना पर रमण जी सिद्धहस्त छथि । पं० श्री गोविन्द झा केर कहब छनि जे डा० जयकान्त मिश्र, आचार्य रमानाथ झा आदि किछु विद्वान जे अनुसन्धान, संग्रह आ समीक्षाक परम्परा चलाओल ताहि बाट केँ सम्प्रति प्रायः एकसरे रमण जी धएने छथि।
हालहि मे हिनकर एक साक्षात्कारक वीडियो देखबाक सौभाग्य प्राप्त भेल। ओहि साक्षात्कार केँ सुनि हिनक व्यक्तित्वक एक झलक सेहो भेटल। श्रीमती दीपा मिश्र बड्ड नीँक प्रश्न सब केलखिन आ ई ओकर समुचित जवाब निधोख भ' क' देलखिन। हिनक गाम सरिसब-पाही आ प्रारम्भिक शिक्षा दीक्षा राघोपुर डेओढ़ी मे रहि क' भेल छनि। साहित्यिक एवं सांस्कृतिक रूप सँ दुनुए परिसर उर्वरा सम्पन्न रहल अछि । एक त' अपन पारिवारिक पृष्ठभूमि आ दोसर राघोपुर डेओढ़ीक साहित्यिक गोष्ठी दुनु मिलि हिनका स्वतः अहि क्षेत्र मे बढ़बा लेल प्रेरित केलकनि। भारतीय रिजर्व बैंक मे नौकरी करैत निरन्तर साहित्यिक गतिविधि सँ जुड़ल रहलथि। हिनक प्रतिभा केँ देखैत विभागो हिनका सँ अहि तरहक काज करबाक अवसर देलकनि। Export Promotion Council लेल पोथी लिखलनि - निर्यात कोना शुरू करी। वित्तीय शिक्षा योजना केँ तहत बैंक खाता खोलबाक लाभ विषय पर लिखलनि-टाकाक गाछ। सेवा निवृत्ति केर लगभग दस वर्षक बाद Non banking Finance द्वारा होइत धोखाधड़ी पर लिखलनि - लखपतिजी लुटेरा। ट्रेड युनियन सँ सेहो जुड़ल छलथि। चेतना समितिक पत्रिका घर बाहर सँ लगभग 15 वर्ष सँ जुड़ल छथि। एकर संपादक केर रूप मे काफी चर्चित भेलाह। अपन साक्षात्कार मे रमण जी कहैत छथि जे साहित्य समाजक संपत्ति होइत अछि आ संपादन भेल अहि संपत्तिक रक्षा।
आलोचना केँ विषय मे रमण जी कहैत छथि जे साहित्य लेल आलोचना नितान्त आवश्यक अछि। अहि सँ पाठक एवं साहित्यकार दुनु केँ लाभ होइत छनि मुदा बहुत दुःख केँ साथ इहो कहैत छथि जे 10-15 वर्ष मे रचनाकार सब केँ अपन आलोचना सहबाक शक्ति खत्म भ' गेल छनि। संदेश दैत रमण जी कहैत छथि जे लोग अपने लिखय मे व्यस्त छथि मुदा संवेदनशीलता केर साथ दोसर केँ पढ़ि नहि रहल छथि। बहुत आवश्यक अछि संवेदनशील ढ़ंग सँ दोसर केँ पढ़बाक। आगू कहैत छथि जे सहनशीलताक अभाव स्पष्ट रूप सँ जखन तखन देखार भ' जाइत अछि। विभिन्न पत्र-पत्रिका मे हिनका पढ़बाक यथेष्ट अवसर भेटल अछि। चेतना समितिक " घर बाहर" सेहो कतेको अंक पढ़ने छी मुदा सब छिटपुट ढ़ंग सँ।
आदरणीय रमण जी मैथिली भाषा जगत केँ सिद्धहस्त आलोचकक श्रेणी मे अबैत छथि ताहि मे कोनो संदेह नहि मुदा हिनको खूब आलोचना होइत छनि। अपना सब मे एकटा कहबी छैक - हे ननदो, तोरो ननदो। यदा कदा हिनका पर जातिवादी आरोप लगाओल जाइत छनि मुदा हुनकर कहब स्पष्ट छनि जे निरर्थक आरोप केँ ओ महत्व नहि दैत छथि। निःसंदेह नितान्त आवश्यकता अछि आलोचनाक, मुदा से सार्थक होइक तखने नीँक लगैत छैक। तखन एकटा बात साफ छैक जे उकटा पैँचीक त' कोनो अंत नहि।
लगभग आधा दर्जन आलोचनात्मक निबन्धक पोथी, एक दर्जन सम्पादित आ दुइ गोट अनूदित पोथी प्रकाशित छनि। हिनक किछु आलोचनात्मक पोथी केर नाम भेल - "अखियासल, बेसाहल, भजारल एवं हिआओल"। पोथी केर नामे पढ़ि पाठक पोथीक विषय मे अनुमान लगा सकैत छथि । विदेहक पेटार सँ डाउनलोड कय 'अखियासल' एवं 'हिआओल' पढ़लहुँ। दुनु पोथी जिज्ञासु प्रवृत्ति केर व्यक्ति एवं विशेष रूप सँ विद्यार्थी ( शोधार्थी ) सबहक लेल निःसंदेह ज्ञानवर्द्धक अछि।
सरिसब-पाही, मधुबनीक अखियासल प्रकाशन सँ सन् 2012 मे प्रकाशित भेल छनि आलोचनात्मक पोथी "हिआओल"। पहिल अध्याय केर शीर्षक अछि - ग्रिअर्सन एवं मिथिला भाषाक अध्ययन । अपन आलेख मे बड्ड सुंदर ढ़ंग सँ मिथिलाक भाषा मैथिली केर चर्चा केने छथि। मैथिली साहित्य त' प्रचुर मात्रा मे लिखल जाइत रहल छल मुदा एक स्वतंत्र भाषा केँ रूप मे ई स्थापित नहि छल। एक स्वतंत्र भाषाक रूप मे सर्वप्रथम एकरा स्थापित करबाक श्रेय नि:संदेह जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन केँ जाइत छनि। ओ मैथिलीक गहन अध्ययन कैलनि आ सन् 1881 मे पहिल बेर मैथिलीक व्याकरण लओना हली झा केर चर्चा सेहो अहि सन्दर्भ मे भेल अछि। मिथिला एवं मैथिलीक विरोधी सबहक कोनो कमी नहि अछि। अहि आलेख मे अहि बात केँ सेहो उजागर कयलनि अछि रमण जी। उदाहरणस्वरूप बिहार विभाजनक समय पटना विश्वविद्यालय केर पूर्व उपकुलपति डा० सच्चिदानन्द सिन्हा सन लोकक मैथिली भाषा-संस्कृति विरोधी मानसिकता केँ सेहो उजागर केलनि अछि। दोसर अध्याय - रमानाथ झा आ मिथिला भाषा मे मैथिली भाषाक क्षेत्र मे रमानाथ झाक अवदान केँ तोपि देबाक प्रयास निरन्तर कोना कएल गेल अछि तकरा खोँइछा छोड़ा क' स्पष्ट कयलनि अछि अहि आलेख मे। ओना हरेक काल खण्ड मे एहन कहानी दोहराओल जाइत रहल अछि। हँ समय केर अनुरूप पात्र अलग रहैत अछि। मिथिला भाषाक प्राचीनता पर प्रकाश देबय लेल वाल्मीकि रामायण केर प्रसंग उद्धृत कयलनि अछि। महर्षि वाल्मीकि अहि मे लिखने छथि जे अशोक वाटिका मे अपहृत कए राखल सीताक संग भाषाविद् हनुमानक वार्तालाप मानुषी भाषा मे भेल छल। निःसंदेह विद्वान सबहक अहि विषय मे मतान्तर अछि मुदा ओ मानुसी भाषा मैथिली छल सेहो अनेक विद्वानक मत छनि। विभिन्न कालखंडक जेना कि बुद्ध, महावीर आ डाकवचन केर उल्लेख करैत मैथिली भाषाक प्राचीनता केँ सिद्ध करबाक सार्थक प्रयास कएल गेल अछि। तेसर अध्याय - प्रत्यालोचक किरण जी मे लोहना रोड स्टेशनक समीप केर एक घटना केर चर्चा करैत रमण जी लिखने छथि जे आलोचना वा प्रत्यालोचना अभिनन्दन पत्र नहि थिक, आवश्यक नहि जे ओ प्रीतिकरे हो। रमानाथ झा जी केर अनुसार साहित्यक क्षेत्र मे पक्षपात हेय बूझल जाइत अछि। अपन मित्रक कृति केँ आकाश चढ़ाए देब, अपन विरोधीक कृति केँ गर्हित देखाएब साहित्यिक महा पाप थिक। अहि आलेख मे मैथिली भाषा साहित्यक क्षेत्र मे किरण जी केर महत्वपूर्ण अवदान पर प्रकाश दैत लिखने छथि - प्रत्यालोचक किरण जी अपन बात-विचार सँ, अपन लेखन सँ, अपन व्यवहार सँ आ समाजक परिप्रेक्ष्य मे साहित्यक मूल्यांकनक बाट प्रशस्त करबा मे सफल भेलाह अछि। एहि सँ साहित्यालोचनक एक नवदृष्टि विकसित भेल अछि।
चारिम अध्याय अछि अपेक्षितारय छोड़ि, उपेक्षितक आँखि सँ कन्यादान पढ़ल जाय। हरिमोहन झा कृत कन्यादान उपन्यास पर अपन बेबाक विचार रखने छथि रमण जी। एकटा आलोचक केर रूप मे हुनक प्रशंसा होएबाक चाही जे अतेक संवेदनशील विषय पर ओ अपन बात केँ स्पष्टता सँ रखने छथि। हरिमोहन झाक साहित्यक तीनटा श्रेणी मे विभाजन केने छथि। प्रथम श्रेणी मे ओ अबैत छथि जिनक एकमात्र उद्देश्य मनोरंजन छनि। दोसर श्रेणी मे ओ सब अबैत छथि जिनका हुनक सान्निध्य प्राप्त छलनि आ हुनक अपेक्षित व्यक्ति छथि। तेसर श्रेणी मे ओ पाठक सब अबैत छथि जे हरिमोहन झा साहित्य केँ समाज कथा बूझि पढ़ैत छथि आ ओ हिनक साहित्य केँ हनुमान चालीसा बूझि पाठ करैत छथि। अहि श्रेणी मे उच्च स्थान पर मोहन भारद्वाज जी केँ राखल गेल छनि मुदा हमरा बूझि पड़ैत अछि जे सब सँ बेसी संख्या अही श्रेणी केर पाठक वर्ग केर अछि। रमण जी केर कहब लगभग शत प्रतिशत सही छनि जे - "मैथिली मे प्रतिकूल विचार लोक केँ अरघैत नहि छनि। हम जे कहैत छी, हम जे जनैत छी, सएह टा तर्कसंगत, सएह टा यथार्थ अछि।"
हम हिनकर यथार्थ पर तर्क करबाक दक्षता नहि रखैत छी तखन हिनकर आलेख सँ सहमत सेहो नहि छी। लेखक अगर बुच्ची दाई सन पात्र पर लिखने छथि त' ग्रैजुएट पुतोहु आ ग्राम सेविका सन पात्र पर सेहो लिखने छथि। अलग अलग कथानक मे अलग अलग पात्र मे भिन्नता होएब त' हमरा स्वाभाविके बुझाइत अछि। बेमेल विवाह एकटा विकट समस्या छल। अहि लेल समाज दोषी अछि, कथाकार नहि जे एहन पात्रक चयन किएक केलनि। सी सी मिश्रा केँ मैथिली बाजय नहि अबैत छनि से कोनो अजूबा त' नहि भेल। ओहि जमाना मे अंग्रेजिया बाबू सबहक अभाव थोड़बे रहल हेतैक। खैर वर्तमान मे त' सी सी मिश्रा सबहक कोनो कमी नहि अछि। शहर त' शहर गाम मे रहय वाला सेहो सी सी मिश्रा जँका हिन्दीए बजैत छथि, मैथिली नहि। रमण जी अपन आलेख मे चारिम श्रेणी केर चर्चा नहि केलनि अछि। अहि श्रेणी मे आबय वाला लोक हिनकर साहित्य केँ मिथिलाक संस्कृति पर अनर्गल आघात बुझैत छथि आ तैँ हिनका विरुद्ध तामसे घोर रहैत छथि । भ' सकैत छैक जे ओहि वर्गक लोक केँ ओ हिनकर पाठक नहि एकभगाह आलोचक बूझैत होइथ। हम जखन मिथिला सँ लगभग दू हजार किलोमीटर दूर हिनकर कोनो कथा अथवा उपन्यास पढ़ैत छलहुँ त' बूझि पड़ैत छल जेना हमरा समक्ष चलचित्र जँका ओ घटना चलि रहल हो। ई हमर अपन मोनक व्यक्तिगत अनुभूति अछि तैँ हम लिखल। हँ भ' सकैत छैक जे तेसर श्रेणी केर पाठक वर्ग मे हम सेहो आबैत छी। हमर मानब अछि जे मिथिला मे कहियो विदुषीक अभाव नहि रहल तखन अहि बात केँ एकदम सँ खारिज नहि कैल जा सकैत अछि जे बुच्ची दाई सन पात्र सेहो छलीह। हँ हम वर्तमानक बात नहि क' रहल छी। पाँचम अध्याय- अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह पर हिनक आलेख हिनका विषय मे बहुत रास जानकारी सँ परिपूर्ण अछि। हिनकर कोनो प्रकाशित पोथी नहि छनि तैँ हिनका विषय मे अतेक जानकारी साझा करब सहज काज नहि छल। हिन्दी आ अंग्रेजी मे त' खूब लिखबे केलनि मुदा बाद मे जखन मैथिली दिस घुरलाह त' बुझू जे अही मे रमि गेलाह। पढ़बा योग्य बड्ड नीँक आलेख अछि। छठम अध्याय मे यात्रीक भाषा : शब्द चयन एवं शब्द निर्माण पर नीँक आलेख पढ़बा लेल भेटल। सातम अध्याय मे मनमोहन झाक कथाक अनालोचित पक्ष पर लिखने छथि। अपन कथा मे कारुण्यधाराक लेल विख्यात मनमोहन झा केर कथा मे राष्ट्रीयता ( भारत ) एवं उपराष्ट्रीयता ( मिथिला ) सेहो प्रमुखता सँ झलकैत अछि। हिनकर अहि पक्ष पर संभवतः पहिल बेर चर्चा भेल अछि।
आठम अध्याय अछि मैथिली पत्रकारिताक विकास मे प्रवासीक योगदान। अहि विषय पर विस्तृत आलेख भ' सकैत छल मुदा जतबे लिखलनि पढ़बा योग्य अछि। नवम अध्याय मे अछि मैथिली लोकगाथा मे दीना भद्री। दीना भद्री, दुलरा दयाल, नइका बनिजारा, बिहुला, रुइया रणपाल, लवहरि कुशहरि, लोरिक, विजय मल्ल एवं सलहेस केर विषय मे नीँक जानकारी सँ पाठक केँ अवगत करौलनि अछि अहि आलेख केर माध्यम सँ। लोकगाथा लिखित रूप सँ नहि बल्कि एक पीढ़ी सँ दोसर पीढ़ी तक मौखिक रूप मे अपन यात्रा क' रहल अछि। तैँ समय आ स्थान केर सापेक्ष कथा मे किछु अन्तर भेनाइ स्वाभाविक अछि। । सर्वप्रथम जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन अहि लोकगाथा केँ संकलित केलनि।
मैथिली कथाक विकास : किछु नव तथ्य, मैथिली कविता मे मिथिलाक भूकम्प, कथि ले लगेलिऐ, हे कोसी माई ( बाढ़िक विभीषिका ), मैथिली महाकाव्य मे युग-सन्दर्भ, न'ब गीत मे समाज चेतना, मैथिली कविता मे वर्तमान धारा, मैथिली लोकगीत : अवस्था एवं संरक्षण तथा उपनिवेशवादक न'ब चालि पर भी नीँक आलेख अहि पोथी मे समाहित अछि। अहि पोथीक भूमिका मे डा० फूल चन्द्र मिश्र ' रमण ' हिनका विषय मे लिखने छथि जे अपन निबन्धक विषय वस्तु ( थाहल, अन्दाजल ) हिआओल छनि।
अहि पोथीक लेखकीय मे आदरणीय डा० रमानन्द झा 'रमण' पोथीक विषय मे लिखने छथि - " केहन भेल अछि, मोनेमोन गुनि, मोने मे नहि राखि लेब, पलखति होअए त' किछु हमरो फोनिया दी, से विनम्र अनुरोध ।" व्यक्तिगत रूप सँ नहि फोनिया हम विदेहक माध्यम सँ अपन मोनक बात सबहक समक्ष राखि रहल छी।
२.१२. कीर्तिनाथ झा- विवर्त
कीर्तिनाथ झा
विवर्त1 (अनुसन्धानमूलक आलोचनात्मक लेख केर संकलन)
२०२३मे प्रकाशित डा। रमानन्द झा ‘रमण’क ‘विवर्त’ अनुसन्धानमूलक आलोचनात्मक लेखक संकलन थिक। एहि पुस्तकमे संकलित आलेखक पसार पैघ अछि; एहिमे पत्र-पत्रिका (मिथिला मोद एवं अन्य), उपन्यास(जिजीविषा: लिली रे; चन्द्रग्रहण: किरण), साहित्यकार (जीबछ मिश्र, जयधारी सिंह, शेफालिका वर्मा), लोकनायक आ लोकगाथा (राजा सलहेस, दीनाभद्री), शोक-काव्यमे राजनेता (ललितनारायण मिश्र) एवं मैथिली कथा-कविता-उपन्यासक विधाक किछु पक्ष धरि पर लेख संकलित अछि। किछु लेख विशेष अवसर पर देल बीज-भाषण लेल लिखल गेल अछि, बाँकी स्वतंत्र अनुसन्धान, एवं पोथीक भूमिका थिक।
मुदा समीक्षासँ पहिने लेखकीय वक्तव्यक चर्चा, जाहिसँ पोथीक पृष्ठभूमि, एवं लेखकक भावना आ समालोचना दृष्टिक पाछाँक निहित दर्शन फड़िच्छ होइछ। पछाति, ‘विवर्त’मे संकलित प्रत्येक लेख पर वस्तुनिष्ठ विचार प्रस्तुत करब हमर अभीष्ट अछि।
मैथिलीमे आलोचनाक स्थितिपर चिंता व्यक्त करैत,वक्तव्यमे लेखक कहैत छथि, ‘बिना साक्ष्य आ बिना तर्कक पूर्व पीढ़ीक साहित्यकारक अवदानकेँ मूल्यहीन, वर्णवादी, गोत्रवादी प्रचारित करबाक प्रवृत्ति एमहर सघन आ प्रबल भेल अछि’,।।। ‘ई नहि बिसरबाक थिक जे मैथिलीक सभ लेखक अपन साहित्यिक-सांस्कृतिक परम्पराक अग्रिम कड़ी थिकहुँ’। आगाँ, पुरान पीढ़ीक साहित्यकारक सीमित साधन दिस संकेत करैत, ओ हुनकालोनिक योगदानक महत्वकेँ रेखांकित तँ करिते छथि, ओ ‘पूर्ववर्ती साहित्यकार द्वारा बनाओल भाषा साहित्यक विकासक ओही सोपान पर छओ’ मारबाक प्रवृत्तिक दुखद परिणामक दिस सेहो सचेत करैत कहैत छथि: ‘कोन ठेकान जे एहन लेखक(समालोचकक) स्थिति कालान्तरमे ओहने होनि, जेहन(दुर्गति) रूसमे लेनिनक शवक संग’ परवर्ती पीढ़ी’ केलक। तेँ, आजुक साधन-संपन्न पीढ़ीकेँ ओ ‘पूर्ववर्ती साहित्यकारलोकनिक छूटल काजकेँ उत्कर्ष धरि पहुँचाय अपन पताका फहरयबाक’ प्रेरणा दैत छथिन।’
1।‘विवर्त’ नामकरण:
पुल्लिंग संस्कृत शब्द ‘विवर्त’क व्युत्पत्ति, ‘वि’ उपसर्ग, ‘वृत्’ धातु एवं ‘घञ्’ प्रत्यय थिक। ‘संस्कृत शब्दकल्पद्रुम्’ एकर अर्थ समुदायः, अपवर्त्तनम्, नृत्यम् इति विश्वः (प्रतिपक्षः; यथा, नैषेधे । ३। ६४।) क संग किछु उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि। यथा;
“ईशाणिमैश्वर्य्यविवर्त्तमध्ये
लोकेशलोकेशयोलोकमध्ये।”
समवायाधिकरणविसदृश् कार्योत्पत्तिः । यथा, “एकस्य सतो विवर्त्तः कार्य्यजातं नतु वस्तु सत् ।”- सांख्यकौमुदी।
अर्थात् विवर्त, आभास, वा परिवर्तनक अछैतो वस्तुक यथावत् , किन्तु, भिन्न स्वरुप थिक। अर्थात्, समालोचक आलोच्य विषयकेँ यथावत् राखि ओहि पर आलोचना प्रस्तुत कयने छथि। हमरा ‘विवर्त’ शब्दक इएह अर्थ बोध भेल।
आब समीक्षाक आरंभ ‘मैथिलीक तत्कालीन पत्र-पत्रिका आ स्वाधीनता आन्दोलन’ नामक लेखसँ करी।
एहि लेखमे ‘तत्कालीन पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित स्वाधीनता आन्दोलन सम्बन्धी गतिविधि, समाचार एवं ओहिसँ प्रेरित-प्रभावित विविध विधामे सृजित मैथिली साहित्य आ भारतक स्वाधीनता आन्दोलनमे तकर सकारात्मक प्रभावक’ विवेचना अछि।
सर्वविदित अछि, 1947ई। सँ पूर्व मैथिली पत्र-पत्रिकाक संख्या आंगुर पर गनबा योग्य छल। लेखक सेहो कुल नौ गोट पत्रिकाक चर्चा कयने छथि, जाहि मे मुख्य दुइए टा – मिथिला मोद आ मिथिला मिहिर –दीर्घजीवी भेल, आ बीच-बीचमे प्रकाशन बन्न होइतो अनेक स्वरुपमे पाठकक सोझाँ अबैत रहल।
आलेखक अनुसार तहियाक पत्र-पत्रिका सभक संपादकीय नीति स्पष्ट रहैक। कोनो पत्रिका (मैथिल हित साधन) विभिन्न (दार्शनिक, वैज्ञानिक, ऐतिहासिक, सामाजिक तथा अन्यान्य आवश्यक) विषयक संग मनोरंजक विषयक सामग्रीक प्रकाशनक नीति रखने छल, तँ कोनो( मिथिला मिहिर) स्पष्ट रूपें ‘राजनीतिक लेख नहि छ्पबाक’ संकल्प केने छल। ‘मिथिला मोद’ सेहो ‘राजनियम-विरुद्ध’ लेखकेँ अस्पृश्य घोषित कयने रहय2। लेखक कहैत छथि, जाहि पत्रिका(मिथिला-मित्र)मे प्रकाशन नियमावलीक बंधन नहिओ रहैक ओहूमे राजनीति वा स्वतंत्रता आन्दोलन पर केन्द्रित कोनो लेख नहि छपल छल। अर्थात् मोटामोटी सभ पत्र-पत्रिका स्वेच्छासँ सरकारक विरोध आ स्वतंत्रता आन्दोलनक समाचारसँ दूरे रहैत छल। तथापि, लेखकक विचारेँ ‘बिना अनुसन्धान एवं तत्कालीन पारिस्थितिक’ ज्ञानक बिना ई धारणा बनाएब जे ‘मैथिली पत्रिकाक प्रकाशक आ सम्पादक देशक स्वाधीनता आन्दोलनक प्रति संवेदनशील नहि छलाह, अंग्रेज सरकारक अंधभक्त भए शासन-सत्ताक विरोधमे ने किछु बाजि सकैत छलाह आ ने किछु लिखि सकैत छलाह’ अनैतिहासिक धारणा थिक। हुनक विचारेँ, ‘एहन लेख जाहिसँ लोक चेतना विकास हो, जाहिमे विलुप्त गौरव आ उत्कर्षक जनतब हो, तथा तत्कालीन शासन-व्यवस्थाक प्रति घृणा होइक’ सेहो राष्ट्रीय स्वतंत्रतामे योगदान थिक, स्वतंत्रता आन्दोलनक समर्थन थिक’।
हमरा जनैत एहि विषय पर मतभेद संभव। हँ, घरेलू उत्पादनक समर्थन अवश्य असहयोगक समर्थन भेल। 1929मे ‘मिथिला नामक पत्रमे ‘हम दरिद्र किएक भेलहुँ’ नाम आलेख मे भारतक दरिद्रताक ऐतिहासिक कारणक निर्भीक विश्लेषण अवश्य अप्रत्यक्ष रूपें भारतीय स्वतंत्रताक पक्षधर मानल जायत। एहि प्रकारें आन पत्र सबमे सेहो स्वदेशी उद्योग आ उत्पादनक समर्थनमे लेख; महगाईक चर्चा, स्वराज्यक प्राप्तिक हेतु प्रेरणा, अंग्रेजी पढ़बाक लाभ, एवं दरभंगा महाराजसँ परोक्ष रूपें मिथिलामे उच्च शिक्षा संस्थानक स्थापनाक आग्रह इत्यादि विषयक लेख छपबाक चर्चा अछि।
‘मैथिली पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित रचनामे स्वाधीनता आन्दोलनक अनुगूंज’ एहि अनुसन्धानक दोसर विन्दु थिक। ‘ई प्रभाव विभिन्न विधाक रचनामे प्रचुर मात्रामे अछि’ कहैत लेखक एकर पर्याप्त उदाहरण दैत छथि।
सारांशमे अनुसन्धानक सार-स्वरुप लेखक कहैत छथि: ‘स्वाधीनता आन्दोलनमे सक्रिय सहभागिताक लेल सामान्य मैथिलमे जाहि प्रकारक मानसिकता अपेक्षित छलैक, तकर निर्माणक लेल मैथिली पत्र-पत्रिका पूर्ण संवेदनशील आ उत्तरदायित्वपूर्ण छल।’ मुदा, ई विचार एहि विषय पर सर्वसम्मत थिक वा नहि, कहब कठिन।
ततबे नहि, अति सीमित संख्या, अल्पजीवी स्वभाव, आ थोड़ पहुँचक कारण, ई पत्र-पत्रिका सब स्वतंत्रता आन्दोलनक प्रति जनमानसकेँ प्रभावित करबामे कतेक प्रभावी आ सफल भेल छल, से स्वतंत्र अनुसन्धानक विषय थिक। एक गप आओर: मैथिली पत्रिकाक स्वर हिन्दी एवं बांग्ला पत्रक तुलनामे केहन छल, तकर चर्चा एहि लेखमे नहि अछि, ई एहि लेखक विषयो नहि थिक।
मैथिली पत्र-पत्रिकाक विकासमे ‘मिथिला-मोद’ एहि संकलनक दोसर आलेख थिक। ‘मिथिला-मोद’ बीसम शताब्दीक पूर्वार्द्धमे मैथिलीक प्रतिष्ठित पत्र छल। तेँ, एहि विषयक ऐतिहासिक महत्व अछि; कारण, एकर चर्चाक बिना मैथिली पत्रिकाक विकासक चर्चा असंभव।
लेखक कहैत छथि: ‘मिथिला-मोद’ अपन सामजिक दायित्वक प्रति पूर्णतः साकांक्ष छल, से स्पष्ट अछि।’।। (ई) मानैत छल जे देश वर्ग वा वर्ण विशेषक नहि थिक’ आ मिथिलाक समस्त निवासीकेँ मैथिल मानि देशोन्नतिक अपन अवधारणा सुदृढ़ कयने छल; संस्कृत शिक्षाक स्थान पर आधुनिक शिक्षा-प्रणालीकेँ बेसी लाभकारी मानैत छल, एवं साधनसँ बेसी खर्च आ अपव्ययकेँ देशोन्नतिक मार्गमे प्रबल बाधक मानैत छल। तर्कक पक्षमे पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत कयल गेल अछि।
एहि आलेखक आलोकमे ‘मिथिला-मोद’ संकीर्णता एवं बाल-विवाह, बहु-विवाह, कन्याक बेच-बिकिन-सन कुरीति, एवं मादक द्रव्यक सेवनक विरोधी छल। एहि पत्रमे समुद्र-यात्राक पक्षमे आलेख प्रकाशित भेले छल ई पत्र ‘सामाजिक एवं राजनीतिक स्तर पर घटैत घटनाक संवाहक (सेहो) छल।’ यद्यपि, एहि पोथीक पहिल आलेखमे संकलित साक्ष्यसँ2, ‘मिथिला-मोद सामाजिक एवं राजनीतिक स्तर पर घटैत घटनाक संवाहक छल’ उक्तिक पूर्ण समर्थन नहि होइछ।
लेख आगू कहैत अछि, ‘मोद’ हिन्दीक विरोधमे ठाढ़ होबयवला पहिल पत्र छल; मैथिलीमे बाल-शिक्षाक पक्षधर छल। मिथिलाक्षरक ह्राससँ ई चिंतित छल तँ छले, ई मैथिलीमे विभिन्न विधाक मूल लेखन, एवं अनुवादकेँ प्रोत्साहित करैत शोधपरक निबन्ध एवं साहित्यक धारावाहिक प्रकाशन सेहो करैत छल।
एहि विषयमे किरणजीक उक्ति: ‘स्व। बंकिम बाबू लोकनि जाहि दृष्टिसँ बंग साहित्यकेँ समृद्ध करब आरंभ कयल- ओएह दृष्टि पकड़ि लेने छल मिथिला-मोद’3, लेखकक उक्तिक समर्थन थिक। दुर्भाग्यवश, ‘मिथिला-मोद’क अधिकतर संस्करण अनुपलब्ध अछि। अतः ‘मिथिला-मोद’ एवं अन्य पत्रक digital platform पर संग्रहक सामूहिक प्रयास हेबाक चाही।
आद्यउपन्यासकार पं। जीबछ मिश्रक समय, समाज आ साहित्य एहि संकलनक तेसर लेख थिक। जीबछ मिश्रक ‘पारिवारिक परिचय’, ‘सम्पर्क आ प्रेरणा’, ‘पं। जीबछ मिश्रक समय’, ‘पं। जीबछ मिश्रक साहित्य’, ‘विचारक, समसामयिक विषय पर टिप्पणीकार पं। जीबछ मिश्र’, एवं ‘पं। जीबछ मिश्रक समीक्षात्मक दृष्टि’ एहि लेखक मुख्य विन्दु थिक। प्रत्येक विन्दुपर लेख विस्तारसँ चर्चा कयने छथि। ज्ञातव्य थिक, आन अनेक अप्राप्य एवं अनुपलब्ध पोथीक संकलन सम्पादनक बीच डाक्टर रमण जी ‘जीबछ मिश्र रचनावली’क सम्पादन सेहो कयने छथि।
प्रसंगवश एतय ‘पं। जीबछ मिश्रक समय’मे 19म शताब्दीमे मिथिलाक राजनीतिक एवं समाजिक स्थिति, ओहि समयमे विदेशी शासकक शिक्षा नीति एवं दरभंगा राजक प्रशासनमे हिन्दी एवं देवनागरीक जानकारक बहुलता पर सेहो चर्चा अछि। एतहि इहो चर्चा भेल अछि जे ‘महाराज महेश्वर सिंह 1857क पहिल स्वतंत्रता संग्रामक अप्रत्यक्ष समर्थक छलाह’। ओना, Eighteen Fifty Seven नामक पुस्तक कहैत अछि जे ‘बिहारक जमींदार लोकनि निरंतर ब्रिटिशक पीठ पर
2।।मिथिला मोद ,उद्गार -63, वर्ष-६ पौष ,शाके 1833 ,सन 1319 साल।
3। झा काञ्चीनाथ। मैथिली साहित्यमे आधुनिकताक आरंभ। किरण समग्र खण्ड 1 कि।सा।शोध संस्थान, 2007 pp 128
ठाढ़ रहथि।(यद्यपि) एक समयमे दरभंगा, डुमरांओ एवं हथुआक निष्ठा पर संदेह (व्यक्त)भेल छल, मुदा ओलोकनि एवं अन्य जमींदार-बंधु जन-धनसँ (कम्पनी) सरकारक सहायता केलनि।4 तथापि, एहि प्रकरणक दोसरो विवरण छैक,।5
संयोगवश, इएह समय पं। जीबछ मिश्रक उपन्यास ‘रामेश्वर’क रचनाकाल छल। एहि लेखमे ‘रामेश्वर’ उपन्यासहु पर संक्षिप्त, किन्तु, सम्पूर्णतामे चर्चा भेल अछि। अस्तु, एतय पं। जीबछ मिश्र पर संतुलित एवं संक्षेपमे संपूर्ण सामग्री भेटत।
अगिला लेख, ‘समकालीन मैथिली उपन्यासमे विश्वदृष्टि’मे लेखक पहिने समकालीनताक अवधारणा पर चिंतन प्रस्तुत करैत, ‘जीवनक मूल्यबोध’केँ समकालीनताक पर्यायक हेतु ‘विशेष समीचीन एवं ग्राह्य मानि’ अपन विचार प्रस्तुत कयने छथि। यद्यपि, ओ स्वयं मानैत छथि जे, ‘जीवन-मूल्यक सर्वसम्मत स्वरुप निर्धारित करब कबैई(माछ)केँ तराजू पर जोखब-जकाँ (कठिन) अछि।’ तैओ, ओ मैथिली उपन्यासकेँ मानव-मुक्तिक अभियानक समकालीन युग-दृष्टिक अनुकूल, एवं समाजकेँ विभिन्न चुनौतीक सोझाँ डेग रोपबाक साहसकेँ स्वर दैत पबैत छथि।’
ई एहन विषय थिक जाहि सम्पूर्ण उपन्यास-साहित्यपर एक संग विचार देब कनेक कठिन।
‘मिथिला भाषाक नापी: अमीनक खगता’नामक लेख, ‘Language Mapping: Beyond the Boundaries’ विषय पर एक अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे देल भाषण थिक। एहि लेखमे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली भाषाक भौगोलिक क्षेत्र, ‘भौगोलिक आ भाषिक स्तर पर ‘मिथिला भाषा’क छटपटाइत आरि’, भाषा पर आन पड़ोसी भाषाक अवघात एवं ‘मिथिला भाषा’क नापीक बाटमे बाधा-व्यवधान एवं निराकरणक विन्दु तथा मैथिली भाषाक वर्तनीक स्वरुप पर एकमतक अभाव पर सोदाहरण विचार करैत, लेखक भाषाशास्त्रक ज्ञानक अभावहुमे, आ राजनीतिसँ प्रेरित भावनासँ भाषाक स्वरुपमे हस्तक्षेप पर क्षोभ व्यक्त कयने छथि।
‘मैथिली कथामे बहुसांस्कृतिकता’ नामक लेखमे भारतक सांस्कृतिक समन्वयक इतिहास एवं मिथिलामे बहुसांस्कृतिकताक प्रवेश एवं प्रसारक परिप्रेक्ष्यमे विषयक प्रतिपादन भेल अछि। मैथिलीक पहिल कथा ‘चन्द्रप्रभा’सँ आरंभ होइत एहि ई विवेचना लिली रे एवं किछु साहित्य अकादेमी-पुरस्कृत अन्य कथाकारक कथा धरि आबि समाप्त भए जाइछ। वस्तुतः, विगत पचीस वर्षमे प्रवासी मैथिलक संख्यामे असाधारण वृद्धि भेले। मातृभाषाक प्रति आकर्षण एवं रचनाक संख्या दुनू बढ़ल अछि। फलतः, समाजक अनेक क्षेत्रसँ नव-नव स्वर एवं अनुभव सोझाँ आयल अछि। एहि सबकेँ सेहो विचारक परिधिमे अनने मैथिली कथाक बहुसांस्कृतिताक यथार्थ स्वरुप सोझाँ अबैत।
‘राजाजी’क रूपमे सलहेसकेँ सामाजिक मान्यताक आधार’मे सलहेसक मूलतः वर्णित चरित्रक प्रतिकूल सलहेसकेँ राजाजीक रूपमे अभिहित करबकेँ साक्ष्यक विपरीत मानल गेल अछि। एहिसँ असहमत हेबाक कोनो ठोस आधारो नहि। तथापि, सामजिक एकजुटताक हेतु राजा सलहेस-सन लोकनायकक उपादेयताकेँ लेखक उचिते स्वीकार करैत छथि। वस्तुतः, राजा सलहेस-सन लोकनायक सम्मानसँ समाजक मुख्यधारासँ अद्यावधि वंचित एक पैघ वर्गकेँ आत्मसम्मानक बोध होइत छनि। ई कि वृहत् समाजक लेल कोनो छोट उपलब्धि भेल।
4 Sen Surendra Nath । Eighteen fifty-seven। The Publication Division। Govt of India, May 1957। Pp 265-66।
5 Dutta KK। History of the Freedom Movement in Bihar। Vol।1, 1957। The Govt of Bihar। Pp 69
अस्तु, एहि आलेखमे विभिन्न लेखक-कवि द्वारा लोकगाथाक स्वरुपमे कयल गेल परिवर्तनक, एवं मिथिलाक सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्यमे लोकनायक सलहेसमे राजत्व एवं ईश्वरत्व आरोपित करबाक तार्किक विश्लेषण भेल अछि।
‘गीत दीनाभद्री: गाथाक विकास एवं महत्व’क नामक आलेखक आधार एहि विषय पर जर्मन भाषामे जॉर्ज ग्रियर्सनक ‘गीत दीनाभद्री ओ गीत नेवारक’ नामक पुरान लेख, जे वर्ष २०१०मे डा। रमानन्द झा ‘रमण’ द्वारा संपादित एवं पुनः प्रकाशित भेल तकर संग भारत एवं नेपालमे दीनाभद्रीक गाथाक अन्य संकलन विवेचना करैत लेखक एक दिस जँ पाठ-भेद एवं कथा-भेदक विषयमे लोकतंत्रमे तुष्टिकरणक राजनीतिक दिस लक्ष्य करैत छथि, तँ, दोसर दिस ओ अत्याचारक एवं शोषणक विरुद्ध निर्धन श्रमिकक प्रतिकार एवं समान लक्ष्यक प्राप्तिक हेतु सामाजिक सहयोगकेँ एहि गाथाक कालजयी तत्व मानैत एहि गाथामे निहित लोकसाहित्यक अनेक तत्वकेँ सेहो उजागर करैत छथि।
सारांशमे ई आलेख एहि विषय संतुलित एवं उपयोगी आलेख थिक।
‘महाभारत कथा आधारित मैथिली साहित्य’, एहि विषयक सर्वेक्षण, एवं संक्षिप्त परिचयात्मक आलेख थिक। सर्वविदित अछि, महाभारत-सन ग्रन्थ कथाक विशाल भंडार एवं नव-नव साहित्यक सृजनक अक्षय श्रोत थिक। तेँ, ई विषय भविष्यहुमे अध्ययनक हेतु खुजले रहत। हालहिमे, बहुत दिन पूर्व लिखल पं। काशीनाथ झाक ‘धृतराष्ट्र विलाप’6 नामक दीर्घ कविता प्रकाशमे आयल-ए। एकरो श्रोत सेहो महाभारते थिक।
‘जयधारी सिंहक समालोचना-कर्म’मे मैथिली, अंग्रेजी एवं तंत्र-साहित्यक एहि विद्वानक कुल-परिचय एवं कृतिक संग, समालोचनाक प्रकृति एवं लक्ष्य पर जयधारी सिंहक विचार, तथा हुनक समालोचना-वृत्तिक समीक्षा भेल अछि।
लिली रेक ‘जिजीविषा’ नोर-झोर नहि, नामक आलेखक शीर्षकक पृष्ठभूमि थिक, जीवकांतक उक्ति: ‘लिली रेक उपन्यास ‘पटाक्षेप’ नोर-झोर नहि थिक’। वस्तुतः, आजुक युगमे नारि लेखनकेँ ‘नोर-झोर’ कहि कतिआएब पूर्वाग्रहपूर्ण एवं पुरुषक अहंकारे बूझल जाइत। मुदा, नारि लेखनक प्रति तहियाक उपेक्षापूर्ण उक्ति आइओ शीर्षक बनि आयल, से रोचक थिक। विचारणीय थिक, की नारि वेदना-नोर-झोर- हास्यास्पद थिक? वा संपूर्ण नारि लेखन नोरे-झोर थिक? वा गंभीरता आ नारि-लेखन परस्पर विरोधी थिक। मुदा, तकर उत्तर जीवकांतक लेखनमे प्रायः भेटय।
मुदा,‘जिजीविषा’ उपन्यासक एहि समीक्षाक मूल कथ्य ई जे, जीवकान्तक धारणा- नारि साहित्यकार लोकनिक केवल अपन नारीत्व, ओकर समर्पण भावनाक निरादर आ खण्डनक चित्र (प्रस्तुत करबाक) - क विपरीत लिली रेक साहित्यकेँ ‘बन्न आङनसँ बाहर’क समस्याकेँ नेबो-जकाँ गारि प्रस्तुत करबाक क्षमता छनि। ओना ई तथ्य लिली रेक कथा ‘रंगीन पर्दा’ १९५६हि मे प्रमाणित कय चुकल छल। तथापि, साहित्यमे लिंगभेदक मानसकिताकेँ परास्त करब आइओ कठिन।7
हम ‘सरल शेफालिका छी’ डाक्टर जगदीश मिश्रक अभिनन्दन ग्रन्थक लेल शेफालिका वर्मा पर लिखल आलेख थिक। एहिमे मैथिली-हिन्दीक सुपरिचित लेखिका शेफालिका वर्माक व्यक्तित्व एवं साहित्य पर संक्षेपमे विचारक संग
श्री मती शेफालिका वर्माक आत्मकथा ‘क़िस्त क़िस्त जीवन’ पर विस्तारसँ चर्चा भेल अछि, जाहिमे हुनक जीवनक किछु
6 झा पं। काशीनाथ। काशीनाथ झा रचना संचयन। संकलन-सम्पादन कीर्तिनाथ झा, साहित्य अकादेमी दिल्ली,2025
7 झा कीर्तिनाथ। मैथिली साहित्यक विरल विभूति : लिली रे https://kirtinath।blogspot।com/2022/01/blog-post_24।html accessed 02 जुलाई 2026। मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल 2021 क फेस्टिवल बुक ‘ अरिपन’ में प्रकाशित।
रोचक घटनाक वर्णन सेहो अछि।
‘चन्द्रग्रहण:खण्डग्रास-सर्वग्रास-उग्रास’ मैथिलीक बड्ड पुरान उपन्यास, चन्द्रग्रहण, पर छोट आलेख अछि। एहिमे पोथीक रचना पाछूक प्रेरणा- समाज सुधार-, तथा एहि विषयमे पाठक लोकनिक अटकरक चर्चाक अतिरिक्त ‘भारती’ पत्रिकामे प्रकाशित भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’क चन्द्रग्रहण’क समीक्षाक चर्चा सेहो भेल अछि।
मैथिली अनुवाद-साहित्यक संदर्भमे ‘एक भारतीय यात्री’ नामक लेख पं। अम्बिकानाथ मिश्र द्वारा सुभाषचन्द्र बोसक आत्मकथा ‘An Indian Pilgrim: An Unfinished Autobiography’क मैथिली अनुवादक समीक्षा थिक। एहि समीक्षामे एहि अनुवादक पाछाँक प्रेरणा एवं अनुवादक इतिहासक संग, साहित्यमे अनुवादक व्यवहारिक एवं साहित्यिक प्रयोजन, अनुवादमे श्रोत, लक्ष्य भाषा एवं संस्कृतिसँ परिचयक महत्व, मैथिली अनुवाद साहित्यक विकास, तथा मैथिलीमे आत्मकथा-साहित्यक अनुवादक इतिहासक चर्चा सेहो भेल अछि, जाहिमे ओलिवर गोल्डस्मिथक दू अंग्रेजी उपन्यासक ‘मैथिली साहित्य-पत्र’मे प्रकाशन चर्चा अछि। ज्ञातव्य थिक, एहि संदर्भमे ‘मिथिला-मोद’क योगदान सेहो नहि बिसरल जा सकैछ: पं। काशीनाथ झा ‘काव्यतीर्थ’ द्वारा लेखक रमेशचन्द्र दत्तक उपन्यास ‘राजपूत जीवन संध्या’ क मैथिली अनुवादक किछु अंश 1923हि ई।मे ‘मिथिला-मोद’मे प्रकाशित भेल छल।8 ईहो ऐतिहासिक थिक।
आलेखमे ग्रन्थक (मूल)श्रोतभाषाक अतिरिक्त तेसर भाषासँ मैथिलीमे अनुवाद एवं पुरस्कार प्राप्त करबाक प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त भेल अछि। अंतमे पं।अम्बिकानाथ मिश्रक ‘एक भारतीय यात्री’क समीक्षाक संग एहि पोथीकेँ ‘मैथिली अनुवाद साहित्यमे महत्वपूर्ण गुणात्मक’ योगदान मानल गेल अछि।
‘धर्मेन्द्र विह्वलक जापानी पञ्चपदी:टांका’ जापानी काव्यशैलीमे लिखित धर्मेन्द्र विह्वलक मैथिली कविता संग्रह ‘व्योमक ओहिपार’ क भूमिका थिक। एहि लेखमे विदेशी काव्य-शैलीक आयातक कारण पर एक संक्षिप्त दृष्टिपात करैत, लेखक जापानी काव्यशैली आ ताहूमे ‘टांका’ पर एक संक्षिप्त परिचयात्मक दृष्टि प्रस्तुत केने छथि। संगहि, एहि भूमिकामे ‘व्योमक ओहिपार’सँ ‘टांका’ प्रकारक कविताक उदाहरण सेहो उद्धृत् भेल अछि। उद्धृत् कविता हमरा क्षणिका-सन प्रतीत भेल।
समीक्षाक सार-संक्षेपक रूपमे लेखक कहैत छथि,’व्योमक ओहिपार’मे समसामयिक जीवनक एहन कोनो समस्या आ विषय-वस्तु नहि छैक, (जे) लघु आकारक टांकामे संघनित नहि भेल हो।।।।।(एहि) शैलीमे काव्यक सर्जना कए धर्मेन्द्र विह्वलक बड़का काज कएल अछि।’ एहि समीक्षासँ हमरा ‘व्योमक ओहिपार’ पढ़बाक इच्छा अवश्य भेल।
‘मैथिली शोक-काव्यक परम्परामे ललितनारायण मिश्र’मे ‘धूर्तसमागम’क शोक-काव्य आ नेपालक ‘गीतपञ्चक’सँ ल’ कए मैथिलीक अनेक शोक-काव्यक चर्चाक पछाति, अन्ततः राजनेता ललितनारायण मिश्रपर केन्द्रित विपुल शोक-काव्यक अतिरिक्त, ललित स्मृति ग्रन्थ, १९७७क चर्चा सेहो भेल अछि। एहि समस्त काव्यकेँ रमणजी ‘एक व्यक्तिक शोकोद्गार नहि, समाजक शोकोद्गार, भारतीय राष्ट्रक शोकोद्गार’ मानैत छथि।
सारांशमे ‘विवर्त’ अनेक मौलिक विषयपर, विशेषतः जाहि पर मौलिक सामग्रीक अभाव छैक, गंभीर अध्ययनक संकलन थिक। ज्ञातव्य थिक, तथ्य अनुसन्धानक बल थिकैक। ठोस तथ्यक आधार पर स्वतंत्र निष्कर्ष संभव छैक।
8 झा काञ्चीनाथ। महाकवि प्रो। तन्त्रनाथ झा मैथिली आ हम। उद्यान किरण, अंक 7, 2019 पृष्ठ 10
ताहि दृष्टिएँ ‘विवर्त’मे संकलित प्रत्येक अनुसन्धान तथ्यक तराजू एवं समालोचनाक मापदण्ड पर संतुलित अछि। अस्तु,’विवर्त’ मैथिली समालोचना साहित्यमे महत्वपूर्ण योगदान थिक। एहि पोथीक स्वागत हेबाक चाही; ई पोथी पढ़ल जेबाक चाही।
विवर्त
(अनुसन्धान मूलक आलोचनात्मक लेख)
लेखक: डा। रमानन्द झा ‘रमण’
सिद्धिरस्तु, दिल्ली। प्रथम संस्करण 2023
मूल्य: रु। 400/- पृष्ठ संख्या 242
२.१३. नबोनारायण मिश्र- हमर संस्मरण रमणजीक संग
नबोनारायण मिश्र
हमर संस्मरण: रमणजीक संग
हम १९६९ ई॰ सँ मैथिली साप्ताहिक पत्रिका “मिथिला-मिहिर”क नियमित पाठक छलहुँ। “मिथिला मिहिर” मे अन्यान्य लेखकक संग डॉ॰ रमानन्द झा “रमण”क आलेख यदा-कदा प्रकाशित होइत छल। हम मात्र हुनक नाम सँ परिचित छलहुँ। ओ नीक लेखक आ रिजर्व बैंक, पटनाक उच्च आधिकारी छथि से सुनल छल।
१९९० ई॰ क पश्चात कोकिल मंच कलकत्ताक वार्षिक आयोजन (नाट्य-मंचन) मे हुनका सम्मिलित होबाक लेल पत्राचार नियमित रूपे करैत छलहुँ। हुनक प्रथम दर्शनक सौभाग्य कहिया भेल से स्मरण, नहि अछि मुदा ओ जहिया कलकत्ता आबथि ताहिसँ पूर्व पत्र द्वारा अवश्य सूचित करैत छलाह। एहन अवसर कतेको बेर आएल जाहि मे हमरा हुनका सँ भेंट भेल। किन्तु विशेष अवसर पर हुनिका सँ भेंट भेल तकर चर्चा हम करए चाहब जे हमरा लेल चिरस्मरणीय भेल।
(१) “सगर राति दीप जरए” कथा-गोष्ठी मे हुनक भूमिका महत्वपूर्ण रहैत छल। ओहि कथा गोष्ठी मे हम बलाइन, बोकारो, राँची आ कलकत्ता मे सहभागी छलहुँ। एतए उल्लेखनीय जे “कर्ण-गोष्ठी” कलकत्ता द्वारा “सगर राति दीप जरए" के कथा अमृतक ४६म आयोजन दि॰ २१ जनवरी २००३ मे भेल जकर अध्यक्षता रमानन्द झा “रमण” कएलनि। उक्त अवसर पर डॉ॰ गोविन्द झा लिखित पोथी “आत्मालाप” क लोकार्पण रमानन्द रेणु कएने छलाह आ कथा-पाठ मे हम अपन कथा प्रस्तुत कएने रही।
(२) ३० अगस्त २००६
भारतीय भाषा संस्थान (Central Institute of Indian Languages)क कार्यक्रम मे सम्मिलित होबाक लेल शताब्दी एक्सप्रेस सँ हावड़ा आयल छलाह सर्वश्री पंडित गोविन्द झा, डॉ॰ बासुकीनाथ झा, डॉ॰ गोकुलनाथ झा, डॉ॰ सुभाषचन्द्र यादव आ डॉ॰ रमानन्द झा “रमण”। ओहि दिन सब गोटे यात्री-निवास मे रुकल छलाह।
पूर्व सूचना अनुसार रामलोचन ठाकुर जी के निर्देश पर हम, विनय भूषणजी, मिथिलेशजी, अनमोलजी, अमरनाथ “भारती” आ अरुण कुमार सिंह के सूचित कएने रहियन्हि।
ओहि अवधि मे नवीन चौधरी नर्सिंग होम मे भर्ती छलाह आ लक्ष्मण झा “सागर” जी औफिसक कार्यसँ कलकत्ता सँ बाहर गेल छलाह। सुखद संयोग जे एक दिन पहिने सागरजी कलकत्ता पहुँचि गेलाह आ हमरा सँ फोन पर बात भेलनि तद्नुसार दोसर दिन सागरजीक ऑफिस सँ संग करैत हावड़ा पहुँचि गेल छलहुँ। हमरा सँ पहिने डॉ॰ वीरेन्द्र मल्लिक आ रामलोचन ठाकुर पहुँचल छलाह। पुनः अरुण सिंह सेहो आबि गेलाह।
रमानन्द झा “रमण” जी हमरा सभ लोकनिकेँ सभ अक्षर-पुरुष सँ परिचय करौलनि। तत्पश्चात ओ साँझ चिरस्मरणीय साहित्यिक गोष्ठी मे परिणत भऽ गेल। डॉ॰ वीरेन्द्र मल्लिक जी कालिदासक “मेघदूत”क सांगोपांग वर्णन करय लगलाह आ हम सभ मंत्रमुग्ध भऽ ओकर रसास्वादन करैत रहलहुँ। गोष्ठीक समापन होइत राति ९ बाजि गेल छल आ आगन्तुक अतिथि लोकनि राति दस बजे भुवनेश्वर हेतु प्रस्थान कएलनि।
चेतना समिति, पटना प्रत्येक वर्ष विद्यापति-पर्वक अवसर पर अपन मनीषीकेँ मिथिला-विभूति सम्मान सँ सम्मानित करैत रहल अछि। ताहि क्रम मे डॉ॰ श्रीमती अणिमा सिंहकेँ निमंत्रण-पत्र पठाओल गेल मुदा प्रो॰ प्रबोध बाबूक अस्वस्थताक कारणें ओ पटना नञि पहुँचि सकल छलीह। अस्तु चेतना समितिक प्रतिनिधि डॉ॰ रमानन्द झा “रमण” मान-पत्र आ शाल लऽ डॉ॰ श्रीमती अणिमा सिंह के सम्मानित करबाक हेतु कलकत्ता आयल छलाह। एहि सारस्वत अभियानक साक्षी बनबाक सौभाग्य हमरो प्राप्त भेल जाहि मे “रमण” जी, हम, राजनन्दन लाल दास आ रामलोचन ठाकुर समेत चारू गोटे प्रबोध बाबूक निवास-स्थान लेक गार्डेन्स पहुँचल रही। एहन अविस्मरणीय सुखद क्षण जीवन मे बड़ थोड़ भेटैत छैक।
हमरा दृष्टि सँ रमानन्द झा “रमण” मैथिली साहित्यक प्रमुख साहित्यकार, आलोचक, शोधकर्मी आ संपादक रूप मे बहुचर्चित छथि। सृजनात्मक लेखनक अतिरिक्त मैथिली भाषा, साहित्य आ संस्कृति पर गंभीर अध्ययन संगहि आलोचनाक क्षेत्रमे वैज्ञानिक शोधपरक दृष्टि प्रदान कएलनि अछि। हिनक आलेख समसामयिक विचारोत्तेजक संग आत्म-मंथन लेल निश्चय बाध्य करैत अछि। आलोचनाक क्षेत्र मे आचार्य रमानाथ झा, मोहन भारद्वाज आ रमानन्द झा “रमण” के नाम श्रद्धापूर्वक लेल जाइत अछि से हुनक महत्वपूर्ण कार्य रचना-संसार देखलापर स्पष्ट होइत अछि। एहि ठाम हुनक पोथीक विशद् सूची दऽ पन्ना भरब हमर अभीष्ट नहि अछि। तँइ हुनक किछु एहन काजक वर्णन करी जे मैथिली लेल आन कियो नै करैत अछि।
मैथिली भाषा-साहित्य ओ संस्कृतिसँ जुड़ल लोकक फोटो केर एहन विशाल भंडार हुनका लग छनि जे आन किनको लग नै छनि। ई भंडार एकटा परंपराकेँ जीवित बचा लेबाक कला छै।
अन्यान्य उपलब्धिक अतिरिक्त मैथिली साहित्यकार आ समाजसेवी लोकनिक अवदानकेँ सहेजि कऽ रखने छथि जे आन कोनो लोक नञि कएने छथि। जिनकर अवसान भऽ चुकल छनि तिनका नामे हुनक पुण्य-तिथि पर “मोन पड़ैत अछि” शीर्षक सँ आ जीवित लोकक जन्म-दिवस पर “युग युग जीबथि” शीर्षक सँ चेतना समिति, पटनाक मुखपत्र त्रैमासिक पत्रिका “घर-बाहर” मे नियमितरूप सँ प्रकाशित करैत छथि जकर ओ स्वयं संपादक सेहो छथि। सोशल मीडिया (फेसबुक) पर सेहो साहित्यकारक नियमित रूप सँ उल्लेख करैत छथि मुदा एहिठाम हुनका पर दोषारोपण छनि जे “बाबू साहेब चौधरी” सन महान मैथिली आन्दोलनी आ नाटककार के नाम ओहि सूची मे सम्मिलित नञि करैत छथि।
ओना साहित्यकारक प्रति हुनक दायित्व-बोध सर्वविदित अछि आ तकरे परिणाम जे पंडित गोविन्द झा आ प्रो॰ आनन्द मिश्रक सान्निध्य हिनका दीर्घ अवधि धरि भेटलनि। “रमण” जी के विषय मे दू गोट विशिष्ट साहित्यकार सँ हमरा बात भेल ताहिमे हुनक मन्तव्य अछि, तकर बानगी निम्नलिखित अछि-
(१) रामलोचन ठाकुर के मन्तव्य :-
“रमण” जी हमर प्रिय लोक आ नीक समीक्षक छथि मुदा एकटा दोष जे ओ अन्य लोकक अपेक्षा श्रोत्रिय समाजक कार्य के बेसी उजागर करैत छथि ताहि ठाम ओ निरपेक्ष नञि रहि पबैत छथि।
(२) राजनन्दन लाल दासक मन्तव्य :-
“रमण” जी हमर बहुत घनिष्ट आ सहयोगी लोक छथि। हम हुनका मैथिली साहित्यक पंजीकार मानैत छी। मैथिली साहित्यक दुर्लभ वस्तु जे कतहुँ उपलब्ध नञि रहत से खोजि कऽ लोकक सोंझा आनि देताह। हमरा जे जखन प्रयोजन भेल से खोजि कऽ पठा दैत छथि।
वस्तुतः रमानंद झा "रमण" खोजी प्रवृत्तिक लोक छथि, हुनकर काज हुनका अन्य साहित्यकार सँ अलग बनबैत अछि।।
२.१४. हितनाथ झा- अनुसन्धान-प्रतिमान
हितनाथ झा
(मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070)
अनुसन्धान - प्रतिमान
डॉक्टर रमानन्द झा "रमण" केंद्रीय बैंक (रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया)मे कार्यरत रहथि । केन्द्रीय बैंकक मुख्य कार्य होइत अछि ,भारतक समस्त बैंकक नीति-निर्धारण ,दिशा निर्देशनसँ लय निरीक्षण-परीक्षण आ नजरि राखब । ई हिनक वृत्ति छलनि ,जकर निर्वहन करीब34 -35 वर्ष तँ कयनहिं हेताह । वृत्तिक कारण भय सकैछ ,रुचियो ओहने भय गेलनि आ साहित्यमे पदार्पण ई कोनो आन विधासँ नहिँ , अनुसंधान ,आलोचनेसँ कयलनि आ से जे ई धयलनि से पकड़ने रहि गेलाह ,विचलित नहिँ भेलाह ,रास्ता नहिँ बदललाह ,अपितु रास्ता देखबैत गेलाह आ से निरंतरताक संग । तकरे परिणाम थिकनि आजुक मैथिली साहित्यमे एक मात्र इएह छथि जे आलोचकमे सेहो सभ दिन केंद्रमे रहलाह आ से बेछप । हिनकर जोड़ ताकब कठिन ,कारण ई जोड़-तोड़मे कहियो नहिँ रहलाह , दृढताक सङ्ग अपन कार्यमे जुटल रहलाह जहिना ,तहिना अपन मतकेँ प्रमाण मानि ओहिमे डटल रहब सेहो हिनक अपन एक विशेषता छनि आ इएह विशेषताक कारणसँ ई अपन क्षेत्रमे मैथिली साहित्यक एक मजबूत स्तम्भक रूपमे जानल-मानल -आँकल जाइत छथि ।
हिनक अनेको प्रकाशित पुस्तक छनि मौलिक ,संपादित अनुवादक । सम्प्रति चेतना समितिसँ प्रकाशित "घर-बाहर"क प्रधान संपादक छथि ।श्री रमणजीक नवीनतम पोथी छनि "अनुसन्धान-प्रतिमान" जे एखन हमरालग अछि आ पढलहुँ अछि। भय सकैछ ,एकर बादो कोनो नवीन पुस्तक आबि गेल होइन ,हमरा नहिँ जनतब अछि ,कारण जाहि लेखकक परिचयमे 40 -45 पुस्तकक बाद आदि-आदि लिखल हो ,तकर पुस्तक कखनो -कहियो आबि सकैत अछि , ओना हिनकर मौलिक पुस्तकक संख्या एगारह छनि ।
*अनुसन्धान-प्रतिमान*पर दू शब्द पाठकीय लिखबाक लौल करबासँ पहिने हम श्री तारानंद वियोगीक बात राखय चाहब जे हिनकर विषयमे "जखन-तखन"क चौदहम अंक *मैथिली आलोचना :स्थिति आ अपेक्षा *मे लिखलनि अछि –
""रमानंद झा 'रमण' एखनुक समयमे एकमात्र पूर्णकालिक सक्रिय आलोचक छथि ।हुनकर विषय -विस्तार बहुत व्यापक छनि ।प्रमुख क्षेत्र मुदा अतीते छियनि ।जेना रमानाथ बाबू मध्यकालक अनेक अज्ञात ,अचचर्चित कवि सभक उद्धार केलनि ,रमण जी सेहो अनेक आधुनिक अचर्चित ,अल्पचर्चित रचनाकार सभक कृति आम पाठक धरि सुलभ केलनि आ एहि तरहेँ हुनक उद्धार केलनि । हुनकर काजमे निरंतरता सेहो रहल अछि जे हुनकर अवदानकेँ पैघ बनबैत अछि । अतीतोन्मुखताक बन्हनकेँ तोड़ि कs ओ युगीन रचनाशीलताकेँ विश्लेषित करबाक प्रयास सेहो केलनि अछि जकरा हुनकर दर्जनों निबन्धमे देखल जा सकैत अछि ।""
श्री रमानंद झा रमणक आलोचना आ निबन्धमे सामग्री प्रचुर मात्रामे भेटत ,कारण हिनकर व्यग्तिगत पुस्तकालयमे पुरानसँ नव सभ तरहक करीब-करीब अधिकांश मैथिली पुस्तक ,पत्रिका छनि आ से पढ़ल छनि ,पढ़ले टा नहिँ , माथामे रचल-बसल छनि आ से एकर उपयोग करबामे महारत हासिल छनि । तै हिनकर अनुसन्धानसँ लय वर्तमानतकक लेख सरल ,सहज ,बोधगम्य भाषामे पाठकक सम्मुख परसल भेटत ,बुझबामे कतौ कोनो भाँगठ नहिँ ।
जेना पूर्वमे कहल गेल अछि ,हिनकर सोच स्पष्ट छनि आ पूर्ण रूपेण साहित्यक सेवामे लागल विलुप्त होइत अनेको रचनाकेँ , अनेको रचनाकारकेँ ,कठिन परिश्रमसँ अनुसंधान कय ओकर महत्वक निरूपण करैत ओहि समयक साहित्यकेँ वर्तमान आ भविष्यक लेल सुरक्षित करब ,हिनक अमूल्य अवदानमे गनल जायत ।
अनुसंधानक प्रयोजनसँ हमरालोकनि सभ गोटे अवगत छीहे ,मुदा सभहक अवगति नहिँ जे एहि दुःसाध्य काजमे पड़ब मानकक सङ्ग । एहि प्रसङ्ग श्री रमण जी स्वयं कहैत छथि एहि पुस्तकक भूमिकामे "अनुसंधानक प्रयोजन की ?"
**हमरा अचर्चित ,अल्पचर्चित ,वा समयक प्रवाहमे सायास वा अनायास विसरल-विसराएल रचनाकार कृति पहिने आकर्षित करैत छथि । हुनक अप्रकाशित रचनाकेँ ताकि संकलित करबामे आनन्द होइत अछि । दोसर चरणमे ओहि रचनाकारक प्रसङ्ग कतए आ की लिखल गेल छैक ,तकर बेसीसँ बेसी संकलनक प्रयास करैत छी । ओहिमे जँ कोनो नव सूचना रहैत छैक ,तकरो उपरेबाक कोनो प्रयास छोड़ैत नहिँ छी । पारिवारिक परिचय संकलित करैत छी ।हुनक रचनाक प्रसङ्ग व्यक्त मतक प्रति सहमति-असहमति ,खंडन-मंडनक संग अपन मत ,तथ्य आ तर्क संग रखैत छी । समकालीन संग तुलनाकेँ महत्व दैत छियैक । हुनक साहित्यक विश्लेषण ,हुनक रचनाकालकेँ ध्यानमे राखि करैत छी जाहिसँ ओहिमे निहित समयक प्रतिध्वनिकेँ आजुक पाठक नीक जकाँ अकानि सकथि आ रचनाक सन्दर्भ बनल रहैक ।**
श्री रमणजीक उपर्युक्त प्रतिमानकेँ ध्यानमे राखि हुनक चर्चित पोथीकेँ पढ़ि मूल्यांकन करबाक सामर्थ्य तँ हमरामे नहिँ अछि ,एहि लेल ज्ञानक संग अध्ययनक आवश्यकता होइत छैक ,तत्कालीन समयक समाज आ साहित्यसँ पूर्ण अवगतक संग लिखबाक अवगति होयब जरूरी होइत छैक ,किन्तु एतवा तँ जरूर जे एहि तरहक पोथी पूरा पढ़ि लेनाइ सेहो सभक वशक बात नहिँ , जखन कि मैथिलीमे कथो -उपन्यासकक पाठक ताकब आसान नहिँ । बात भले हमरालोकनि जतेक बनाबी ! हिनकर पोथी तँ उच्च प्रतिमानक उच्च वर्गक लेल ,विश्वविद्यालय /महाविद्यालयक शिक्षक आ छात्रलोकनिक लेल अछि , ज्ञानोपार्जनक kit अछि ,भले सिलेबसमे रहौ वा नहिँ । एहि प्रसङ्ग सेहो चर्चा नहिँ करब ।
कने विषयान्तर भय कहैत छी , आब पी जीमे सेहो अधिकांश विश्वविद्यालयमे text book सँ नहिँ पढाओल जाइत छैक , मैथिलियेमे नहिँ ,कोनो विषयमे नहिँ । कल्पना करू ,विद्यापतिक मूल पद नहिँ पढ़ि ,परीक्षाक तैयारी नोट द्वारा कैल जाय आ यदि हुनका पढबय पड़नि ,से पढिबैते हेताह ,तँ फेर कल्पना कय लिय '। हमरा एक एहन शोधार्थी भेटल छथि ,जनिका ओ मूल पुस्तक देखल नहिं छलनि ,जाहिपर हुनकर रिसर्चक बाद आगूमे या पाछूमे जे कही ,डॉक्टर लागल छलनि ।
एहन स्थितिमे करीब-करीब अर्धशतक पोथीक कवरपर लेखक ,संपादक ,अनुवादक आदि रहब मैथिली पाठकक लेल आश्वस्त करैत अछि आ एहि पोथी सभक महत्व वर्तमानमे तँ सहजहिं भविष्यक लेल मार्गदर्शनक सङ्ग धरोहरकेँ सुरक्षित करब भेल।
प्रस्तुत पुस्तकमे 11 टा आलेख अछि , सभ शोधपरक ,श्रोतक संग । मैथिली लोकगाथामे दीनाभद्री ,मैथिली उपन्यासकार पंडित जीबछ मिश्र ,तेजनाथ कवि भान , रास बिहारी लाल दास आ सुमति ,पुण्यानंद झाक मिथिला दर्पण ,यदुवर आ मैथिली कवितामे राष्ट्रीय चेतनाक विकास ,महाबीर झा वीरक कविताक व्याप्ति ,श्री वल्लभ झाक अवदान सर्वेक्षण , श्यामानंद झा: व्यक्तित्व एवम कृतित्व ,हरिनंदन ठाकुर सरोजक कथा आओर मिथिलामे स्त्री - शिक्षा एवं सामाजिक सुधार ।
हम पूरा किताब पढ़ि मात्र हम एतवा कहबाक साहस कय रहल छी जे ई जाहि आधार सोचि ई संकलन प्रस्तुत कयलनि अछि आ ऊपरमे जे कठोर मापदंड रखलनि अछि ओहिमे नीक जकाँ सफल भेलाह अछि । हमरा बहुतोक विषयमे किछु नहिँ बुझल छल ,हँ ,नाम धरि सुनल छल से रुचिपूर्वक पढलाक बाद बहुतो नवीन बात सभ बुझलहुँ । बहुतो साहित्यकारक व्यक्तित्व आ कृतित्वसँ अवगत भेलहुँ ,अपन धरोहरक विषयमे बुझलहुँ किछु भ्रम छल से दूर केलहुँ । जेना सरोज उपनाम बुझैत छलियैक ,से नहिँ ई एक उपाधि थिक ,जेना विद्यालंकार ,मैथिली वाचस्पति ,मैथिली सरोज वा सरोज । म म उमापति उपाध्ययकेँ सुमति उपाधि भेटल छलनि,से तँ बुझल छल । एहिना ई किताब पढ़लाक बाद बहुत तथ्यात्मक साहित्यक परम्परासँ परिचित भेलहुँ । वैदिक कालसँ मिथिलामे नारीक दुर्दशा ,अशिक्षा आ क्रमिक विकासक सामाजिक आ साहित्यिक उल्लेखक संग सविस्तर आलेखसँ सेहो नीक जकाँ परिचित भेलहुँ ।
ई किताब पढ़लाक बाद ई तँ जरूर भान भेल जे जाहि रूचिक सँग नव -नव वस्तु पढ़इत छी,ओतबे रुचि लय अपन साहित्यिक इतिहास सङ्ग मूल वस्तु सेहो पढ़ी ।
(साभार : 'लेख-रेख')
२.१५.हितनाथ झा- डा.रमानन्द झा रमण जीक बीज-भाषण
हितनाथ झा
(मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070)
डा. रमानन्द झा 'रमण'क 'बीज-भाषण'
साहित्य मात्र सर्जनात्मक प्रतिफल नहि, जीवनक गतिकेँ संवेदनाक संग आत्मसात करबाक संस्कार थिक। मानव प्राणीमे एहि संस्कारक बीजारोपण गर्भहिमे भs जाइछ। जेना-जेना ज्ञानक वृद्धि होइत अछि, तेना-तेना ओकर भीतर प्रवेश करैत अछि आ ओ संस्कार आ मेहनतक बलपर ओहि बीजकेँ पनयबामे प्राणपनसँ लागि जाइत अछि आ कियो खूब झमटगर अनेक डारि-पातक संग विशाल वटवृक्ष जकाँ अपन सर्जनात्मक साधनाक दीप्तिसँ साहित्य जगतकेँ आलोकित करैत अछि, तँ कियो नारिकेरक गाछ जकाँ बिना डारिक सोझ बढ़ैत जाइत अछि आ अन्तमे मेघडम्बर जकाँ रौद आ पानिसँ बचबैत विलक्षण सुस्वाद जंल आ पौष्टिक फल जकाँ साहित्यानुरागीक मनकेँ तृप्त करैत अछि। कियो बाधक हरियर कंचन झुमैत धान-गहूम आदि फसिलक मनमोहक वातावरण जकाँ साहित्यकेँ पुष्पित-फलित कs समाजक वातावरणकेँ साहित्यमय बनयबामे अपन योगदान दैत अछि, कियो साहित्यकारक अवदानक विस्तृत मीमांसा कs समाजक मध्य सहज आ सुगम रूपसँ परिचय करयबामे सहायक सिद्ध होइत छथि, तँ कियो आलोचना-समालोचना क' ओहि कृतिकेँ गुणावगुणक आधारपर शिक्षार्थी-शोधार्थीकक लेल ज्ञानक प्रकाश प्रदान करैत छथि। किनकोमे संगठनात्मक क्षमता भरल-पुरल रहैत छनि जे साहित्यिक विकासमे प्रतिनिधिक निधिक रूपमे कार्य करैत छथि।
साहित्यकारक काज साहित्य सृजन छनि आ ओहि साहित्यकेँ आगाँक पीढ़ी तक पहुँचयबाक काज व्यक्ति, संस्था आ संस्थानक होइत अछि। एही माध्यमसँ कालजयी साहित्य ओहि भाषा-साहित्यक प्राणवायु होइत अछि आ साहित्यकार अमर। एकर अनेक माध्यम भ' सकैत अछि आ अछियो, गैर-सरकारी आ सरकारी दुनू।
मैथिली साहित्यमे ज्योतिरीश्वरसँ लs वर्तमान धरि अनेक साहित्यिक कृति अछि आ कृतिकार छथि, जनिक रचना संसार एतेक समृद्ध विविध आयामक संग छनि, जे एक व्यक्ति द्वारा विश्लेषण करब ओतेक सरल नहि, तेँ समय-समयपर ओहेन कृति आ कृतिकारक विषयमे जनबाक लेल विशिष्ट विद्वानलोकनिकेँ आमन्त्रित कैल जाइत छनि, जेना पूर्वमे कहलहुँ व्यक्ति, संस्था अथवा संस्थानक द्वारा आ एक दिना-दूदिना...कोनो व्यक्ति विशेष विद्वान/साहित्यमूर्तिक हुनक अवदानक विभिन्न आयामकेँ समेटैत चर्चा-परिचर्चा जे होइछ ओहिमे कोनो एक विद्वान द्वारा विषय निरूपण 'बीज-भाषण'क रूपमे, जेकरा बीज-वक्तव्य सेहो कहल जाइत अछि जे मुख्य प्रारम्भिक उद्बोधन अछि जे सम्पूर्ण आयोजनक वैचारिक दिशा, मूल विषय आओर दृष्टिकेँ फरिछा, पूरा कार्यक्रमक रूपरेखाक विषय प्रवेश, दिशा-निर्देशन आ बौद्धिक प्रेरणा दैत अछि, जँ एकरा दोसर शब्दमे जँ कही तँ 'सिनॉप्सिस' रूपमे प्रस्तुत करैत अछि।
डा. रमानन्द झा 'रमण' मैथिलीक आलोचना विधाक पूर्ण परिचित आ चर्चित नाम अछि। अनुसन्धानक प्रतिमानक रूपमे सेहो ख्यात छथि। गड़ल वस्तुकेँ उखारि प्रकाशमे आनब, ओहिमे सेहो सिद्धहस्त छथि। हिनक सम्पादनमे अनेक पोथी प्रकाशित अछि। निबन्ध आ आलोचनाक मूल पोथी एक दर्जनसँ अधिक अछि। इतिहासमे तँ सहजहि, वर्तमानमे सेहो मैथिली साहित्यक पूर्ण गतिविधिपर नजरि रखनिहार छथि। समग्रतामे जँ कही तँ पुरानसँ लs अद्यतन साहित्यक अध्येता छथि।
साहित्य अकादेमी कोनो संस्थाक संग संयुक्त रूपसँ साहित्यकारलोकनिक जन्मशतवार्षिकी अथवा आनो कोनो अवसरपर हुनक व्यक्तित्व आ कृतित्वपर संगोष्ठी आयोजित करैत अछि, जाहिमे बीज-भाषण कर्ताक प्रयोजन पड़ैत छैक आ स्वाभाविक अछि ओहिमे डा.रमानन्द झा 'रमण'क नाम कतिआएल नहि जा सकैछ। 2009सँ अद्यावधि अनेक साहित्यकार नाम आयोजित संगोष्ठीमे बीज-भाषण देबाक लेल बजाओल गेल छथि। ओहिमे पठित आलेख संस्थान तँ प्रकाशित करिते अछि, मुदा डा.रमानन्द झा 'रमण' पाठकक सुविधाक लेल एक ठाम संकलित कs 2022मे 'बीज-भाषण'क नामसँ अखियासल प्रकाशन, लालगंजसँ पोथी प्रकाशित कयलनि अछि आ एकर अतिरिक्त "राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर एवं महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह कॉलेज सरिसब-पाही द्वारा आयोजित 'ज्ञानाधारित पाठक अनुवादक पुनश्चर्या, एक संगोष्ठीमे पठित 'ज्ञानाधारित पाठक मैथिलीमे अनुवादक इतिहास' आ साहित्य अकादेमी एवं मैथिली साहित्य सम्मेलनक संयुक्त तत्त्वावधानमे द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी पुपरीमे पठित 'मैथिली साहित्यमे सीता' विषयपर आलेख अछि। साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित जे 2022क बादक अछि ओहिमे हमरा लग तीन गोष्ठीक आलेख अछि, एक प्रो.मुक्तिनाथ झा, दोसर डा. जयमन्त मिश्र एवं तेसर 'मैथिली साहित्यमे सीता'। अद्यावधि पोथीक अतिरिक्त कुल तीन बीज-भाषण छनि, जेकर 'पी.डी.एफ' आधारपर एहि आलेखमे सम्मिलित क' रहल छी।
'बीज-भाषण'मे जाहि साहित्यकारक विषयमे पुस्तकमे संकलित अछि, ओ छथि भुवनेश्वर सिंह ' भुवन', लक्ष्मीपति सिंह, ईशनाथ झा, तन्त्रनाथ झा, सुभद्र झा, जीबछ मिश्र, राघवाचार्य, बाबू कृष्णनन्दन सिंह, गोविन्द झा आ जे नहि संकलित अछि ओ छथि मुक्तिनाथ झा एवं जयमन्त मिश्र। कुल व्यक्तिपरक आलेख अछि एगारह साहित्यकारक एवं तीन विषय आधारित।
भुवनेश्वर सिंह 'भुवन' अल्पायु भेलाह, मात्र सैंतीस वर्षक जिनगी रहलनि, मुदा राजपरिवारक रहितो साहित्यमे विद्रोही तेवर शोषित-प्रताड़ित, भूखल-नाङट, वर्गक पीड़ाकेँ अनुभव कयलनि आ अपन सृजनात्मक क्षमतासँ सभक ध्यान अपना दिस आकृष्ट कयलनि। "'रमण' जी लिखैत छथि- रमानाथ झा युग- स्रष्टा कहल। यात्रीजीक अनुसारेँ जखन प्राचीन परिपाटीक शब्द-शिल्प नवीन भावनाक अभिव्यक्ति करबाक समय नङराय लागल तँ भुवनजी शिल्प-विधानक तत्त्व चिन्तन- दुनू दृष्टिसँ मैथिली कवितामे नवीनता आनल।" गद्य-पद्य-अनुवाद तीनू विधामे हिनक कलम चललनि आ मैथिली साहित्यक भण्डार भरलनि।
लक्ष्मीपति सिंहक बाल्यपन अत्यन्त दुखद रहलनि, बाल्यावस्थहिमे हिनक पिताक निधन भेल रहनि, आर्थिंक परेशानी भेलनि, जीवनयापनमे जखन कष्ट भेलनि तँ दरभंगा महाराजक प्रेस "न्यूज़ पेपर्स एंड पब्लिकेशन्स प्रा. लि., पटनामे कार्यरत भेलाह आ ओतहिसँ सेवानिवृत्त भेलाह। हिनक अवदान साहित्यिक एवं सामाजिक दुनू क्षेत्रमे अछि। सामाजिक क्षेत्रमे " स्थानीय सरकारी चिकित्सालयक वाइस चेयरमैन, प्राथमिक शिक्षक संघक सभापति, थाना प्रान्तीय निरक्षरता निवारण समितिक सभापति, एंग्लो संस्कृत विद्यालयक संचालक एवं प्रधानाचार्य आदि"।" (पृष्ठ-17) साहित्यिक क्षेत्रमे प्रकाशित सम्पादनक अतिरिक्त उपन्यास-चामुण्डा(1933-34), पंचवटी(1978) , संस्मरण-अतीतक स्मृति पटल,।" (पृष्ठ-17) हिनक असंकलित आलेखक सेहो चर्च छनि, सूचना छनि।
"संगीत शास्त्रक ज्ञाता ईशनाथ झाक शब्द-शब्द संगीतमय छनि।"(पृष्ठ-19) रमणजी लिखैत छथि -"ईशनाथ झा जेना वास्तविक जीवनमे भाग्यवान छलाह, ओहिना साहित्यक संकलन, प्रकाशन एवं संरक्षणक क्षेत्रमे सेहो भाग्यवान छथि।" (पृष्ठ-19) कवि, नाटककार, अनुवादकक रूपमे ख्यात छथि। हिनक प्रकाशित कृतिक विषयमे छनि।
तीनू एकतुरिया छलाह आ संयोगसँ एक्कहि सङ्ग एक्कहि संगोष्ठीमे तीनू साहित्यकारक विषयमे हिनकहि बीज-भाषण देबाक छलनि, तेँ तीनूक तुलनात्मक अध्ययन( व्यक्ति एवं कृति) बहुत विस्तारसँ छनि आ सूचनात्मक छनि। प्रस्तावनामे लिखने छथि -" एक टा विद्वान श्रोता टीपलनि, बीज नहि, गाछ भाषण छल" (पृष्ठ-7)
तन्त्रनाथ झा आ डा. सुभद्र झाक विचारधारा भिन्न रहितो दुनू एक-दोसरक पूरक कोना छलाह, दुनूक साहित्यमे अवदान आ विश्वविद्यालयमे मैथिलीक मान्यताक लेल कतेक कोन-कोन यत्न केलनि आ हुनक प्रयत्नसँ कोना सफलता भेटलनि, बीज-भाषणमे सभक संक्षिप्त indication अछि। ओकर विस्तारमे हम नहि जा मित्रता आ स्वभावक जे रमणजी लिखलनि अछि, डा. सुभद्र झाक निम्नलिखित पाँती ' हम आगि आ हमरा प्रज्वलित कएनिहार तंत्रनाथ बसात"केँ स्मरण करैत -"से केहेन सुखद संयोग अछि जे मैथिली भाषा-साहित्यक 'आगि' एवं 'बसात'क जे एक दोसराक पूरक थिक, जन्मशतवार्षिकी एकहि दिन एवं एकहि ठाम अनुष्ठित अछि। सुभद्र झा आ तन्त्रनाथ झाक पारिवारिक पृष्ठभूमि भिन्न छल, अध्ययनक विषय भिन्न छल, स्वभावो भिन्न छलनि तथापि आगिक दाहकता बसातक गति पाबि तेहन ने ताप उत्पन्न कएलक जे पटना विश्वविद्यालय मे मैथिलीक स्वीकृतिक बाटक कतेको टेढ़ जरि सुड्डाह भए गेल।" (पृष्ठ-22) दुनू व्यक्तित्व आ कृतित्वक संक्षिप्तमे कहि आगाँक वक्ताक लेल नीक बाट देखौलनि अछि।
प. जीबछ मिश्र(1863-1922) मैथिलीक आद्य उपन्यासकारक व्यक्तित्वमे विश्वासपात्रताक उदाहरणसँ प्रारम्भ करैत साहित्यमे आधुनिकताक
परिप्रेक्ष्य आ जीबछ मिश्र जे गोष्ठीक विषय छल ओहिपर हुनक हिन्दी आ मैथिलीक अवदानक विषयमे जनतब देलनि अछि। मैथिलीमे पहिल उपन्यास 1916मे ' रामेश्वर' प्रकाशित भेल छलनि, जकर तीन संस्करण प्रकाशित छनि।"जीबछ मिश्रक उपन्यासमे पहिल बेर समाजमे व्याप्त भूख, अभाव, भ्रष्टाचार, निर्दोषकेँ प्रलोभन दए दोषी ठहरेबाक पुलिसक कुत्सित प्रयास आ तकरा अपन बहादुरी मनबाए प्रोन्नति पाएब अछि।"(पृष्ठ-48) हिनक उपन्यासमे आधुनिक विचार, समसामयिक टिप्पणीक प्रभाव आ समीक्षात्मक दृष्टिसँ परिचित करबैत कहैत छथि -" प. जीबछ मिश्र मैथिलीक प्रथम उपन्यासकारे टा नहि, प्रतिरोध आ वैमत्यक स्वर मुखरित केनिहार मैथिलीक पहिल रचनाकार सेहो छथि।"
राघवाचार्य(1918-1981) काशी, गुरुकुल, कांगड़ी एवं हरिद्वारमे पढ़लनि, वेदाचार्य भेलाह। अलंकारक परीक्षा पास कयलनि। घुमक्कड़ प्रवृत्तिक व्यक्ति रहथि, विक्षिप्त सेहो भ' गेल छलाह आ निधन सेहो एही अवस्थामे गामसँ बहुत दूर धमदाहामे भ' गेलनि। अपरिचित लाशक संस्कार पुलिस द्वारा भेल। बीर रसक कवि छलाह। राष्ट्रीय चेतनाक कविताक लेल ई मैथिली साहित्यमे सभदिन जानल जयताह। वनकुसुम, ज्वालामुखी, मधुकण एवं क्रान्तिगीत हिनक प्रकाशित कृति छनि।
बाबू कृष्णनन्दन सिंह(1918-2001) सिंहक अवदान समाज-सेवा आ साहित्य सेवा दुनू क्षेत्रमे छनि। " गंभीर अध्ययन मण्डित मुखमण्डल। बाबू श्री कृष्णनन्दन सिंह इंग्लैंडक ड्यूक जकाँ श्रीमन्त होइतो कला, साहित्य ओ सांस्कृतिक अनन्य साधक छथि।"~ (मणिपद्म ) रमण जी लिखैत छथि -" पितृकुल एवं मातृकुलमे प्रवाहित पाण्डित्य , भाषा साहित्य एवं कला-संस्कृतिक प्रति अनुरागक धार बाबू कृष्णनन्दन सिंहमे एक भए आर वेगवती भए प्रवाहित होइत रहल।" हरिनन्दन सिंह स्मारक निधि"सँ अनेक पोथी छपल अछि, जाहिमे मधुपजीक ' राधाविरह' सेहो अछि। हिनक दुनू तरहक सेवाक उल्लेखक विवरण महत्वपूर्ण आ ज्ञानवर्द्धक अछि।
प. गोविन्द झाक प्रसंग बीज-भाषणक शीर्षक देलनि अछि -" माटिसँ माटिपर लेखनसँ लैपटॉप धरि अर्थात पण्डित श्री गोविन्द झा"। साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित जन्मशतवार्षिकीक अवसरपर स्वयं गोविन्द झा स्वयं उपस्थित छलाह, एहिसँ हर्ष आर की भ' सकैछ। मैथिलीक दू रचनाकारक एक दिनमे आयोजित जाहिमे एक प्रो. अमरनाथ झा छलाह, ओहो उपस्थित छलाह। ई सौभाग्य प्रायः भारतक साहित्यिक इतिहासमे सर्वप्रथमे होयत। मैथिलक लेल तँ आह्लादक विषय छलहे। हिनक अवदानक एक-एक वस्तुक स्पर्श केलनि अछि , जे आगाँक अनुसन्धान लेल मार्गदर्शन थिक।
विषयपरक तीनू आलेखमे किछु ने किछु नवीनता अछिए।ई रमण जीक अनुसंधानक प्रवृत्तिक प्रतिफल अछि आ सूचनासँ भरल-पुरल अछि।
प्रो. मुक्तिनाथ झा(1926-2009) अंग्रेजीक प्राध्यापक छलाह। मैथिलीक विशिष्ट कवि, लेखक, अनुवादक भेलाह। हिनक लेखनीक प्रारम्भ छात्रावस्थहिसँ प्रारम्भ भेलनि। मौलिकमे हिनक कृति पहिल जे प्रकाशित भेलनि ओ थिक -बुद्धायन आ अनुसाहित्यिकी।सावित्री-स्वयंबर, स्वर्गच्यूति आ पुनरपि लभते स्वर्गम, छाया-गीतांजलि आ किछु अप्रकाशित कृति सेहो छनि। हिनक मूल आ अनुवादपर विस्तारसँ विवरण दैत आगाँक वक्ताक लेल बीजक काज केलनि अछि। ओहन बीज जाहिपर नीके गाछ हेतैक आ हृष्ट-पुष्ट गाछक छायामे के नहि बैसय चाहत। रमणजी कहैत छथि -" मैथिली गद्य-साहित्य, मैथिली महाकाव्य आ मैथिली अनुवाद साहित्यक क्षेत्रमे महती योगदान लेल प्रो. मुक्तिनाथ झा युग-युग धरि स्मरण कएल जएताह।
डा. जयमन्त मिश्र(1925-2010) संस्कृतक विद्वान छलाह, संस्कृत भाषा साहित्यक क्षेत्रमे महत्वपूर्ण अवदान छलनि आ मैथिलीमे एक पोथी 'कविता-कुसुमांजलि' प्रकाशित भेलनि आ पहिले पोथीपर साहित्य अकादेमी पुरस्कार भेटलनि, मैथिली साहित्यकारक एहि पुरस्कारपर बहुत विरोध भेलैक, से सविस्तारमे हिनक साहित्यिक अवदानकेँ देखबैत ओहि निर्णय आ विरोधक लेखा-जोखा कयलनि अछि अपन बीज-भाषणमे, जकर शीर्षक देलनि अछि- " ज्ञानी-गृहस्थ डा. जयमन्त मिश्रक मैथिली सेवा"। हम प्रारम्भहिमे कहलहुँ हिनका मैथिलीक गतिविधिपर नजरि गरल रहैत छनि से एहि बातसँ स्पष्ट भइए जैत जे साहित्य अकादेमीक एक ज्यूरीसँ जबर्दस्ती हस्ताक्षर कराओल गेल। यद्यपि ओ गोपनीय होइत अछि, मुदा बाहर तँ गंनगनाइये जाइत अछि, अनेक प्रकरण अछि एहि प्रसंग।
जाहि स्रोतक आधारपर मैथिली साहित्यमे सीताक वर्णन अछि ओ थिक :-
व्यावहारिक एवं भक्तिपरक गीतमे सीता
मैथिली लोक साहित्यमे सीता
मैथिली शिष्ट साहित्यमे सीता
सीताक निर्वासन आ पुत्रजन्मक प्रसंगमे एक प्रसंग लिखलनि अछि, किएक मिथिलामे विवाह पंचमी दिन मिथिलाक लोक अपन बेटीक विवाहक दिन अशुभ मानैत अछि, जखन कि ओहि तिथिकेँ जनकपुरमे भव्य आयोजन होइत छैक।
मिथिलाक बेटीक रूपमे सीताक मान-सम्मान छनि आ मिथिलाकेँ विश्वमे सीताक कारणसँ जानल जाइत अछि- " एही हेतु मिथिलाक परिचय दैत कहल गेल अछि -' जाता यत्र सीता' अर्थात जाहि ठाम सीता जनमल छथि, सैह थिक मिथिला।"
समग्रतामे कही तँ रमणजी जतेक बीजक गाछक विषयमे कहलनि ओ सभ हृष्ट-पुष्ट, हरियर-कंचन, लतरल-चतरल, पुष्पित-फलित गाछ अछि ,जे कहियो सुखा नहि सकैछ आ ओहि छायामे साहित्यानुरागी पीढ़ी दर पीढ़ी अपन पुर्वजक प्रति सम्मानक संग साहित्यकेँ आगाँ बढ़बैत रहत।
प्रस्तावनामें साहित्यिक राजनीतिपर चोट कयलनि अछि। राजनीतिपर चोट करब कोनो बेजाय नहि,निश्चित होयबाक चाही, तखने ने सुधार हेतैक मुदा ई जे मंच छल आ ई जाहि तरहक पोथी अछि ओहि लेल हमरा जनैत उपयुक्त नहि ओना बदरंग राजनीतिसँ साहित्य कहियो अछूत नहि रहल अछि आ आगाँ दूर-दूर तक सुधारक कोनो उपाय नहि देखना जाइछ। प्रहारसँ पहिने सुधारक सेहो गुंजाइस होयबाक चाही। अन्तमे ठीके लिखलनि अछि-" साहित्यकारक लेल गोलसँ बेसी आवश्यक अछि, व्यक्तिगत साहित्यिक पूँजीक निर्माण।पूँजी रहत तँ जे सामान्यतः अहाँकेँ नहि देखय चाहैत छथि, हुनको लेल अहाँ आवश्यक भए जएबनि। गोल आ साहित्यिक राजनीतिक धूरा-माटि बैसिते लोक ताकय लागत।"
२.१६.प्रदीप बिहारी- सम पर बजैत सुर
प्रदीप बिहारी
सम पर बजैत सुर
डा रमानन्द झा 'रमण'सं पहिल बेर कहिया परिचय भेल, से ठीक-ठीक मोन नहि अछि। प्रयासक बादो मोन नहि पड़ैए। ओना इहो मोनमे अबैए जे मोन किएक पड़य? कोनो व्यक्ति वा लेखकसं कहिया पहिल बेर भेट भेल, से मोन पाड़ब किएक जरूरी? जरूरी तं ई जे हुनका कोन तरहें जनैत छियनि, ओ अहांक लेल कतेक महत्वपूर्ण छथि, हुनका कोना बुझैत आबि रहल छियनि!
से रमण जीकें हम पहिल बेर सुनि क' चिन्हलियनि। ई सहजहिं होइत छैक जे कोनो नव लेखक अपन अग्रज पीढ़ीक लेखक मादे पहिने सुनैत अछि, तखन हुनका पढ़ैत अछि, गुनैत अछि आ हुनक प्रशंसक होइत अछि, आलोचको भ' जाइत अछि। मुदा, हम हुनक आलोचक नहि भेलहुं। कहियो ने। आलोचक होयबाक अवगति हमरा नहि अछि।
जखन पढ़ब आरम्भ कयलहुं, तं 'मिथिला मिहिर' हुनक लेखनसं परिचय कराब' लागल। मैथिलीमे हिनक लेखनक मूल विधा, माने आलोचना-समालोचना, विरल विधा अछि। विरल एहि दुआरें जे मैथिली साहित्यक हरेक कालखण्डमे एहि विधामे लिखनिहार बहुत थोड़ भेलाह अछि। एखनो थोड़ छथि। कारण एहि विधामे कलम भंजनिहार जोखिम उठबैत छथि। जहिया रमणजी एहि विधाकें उठौने होयताह, तहिया कने कमो रहल होनि, आजुक समयमे बेसी भ' गेल छैक। आब तं ई विधा अधिकांशक स्वभावमे आबि गेलैए, कंठमे आबि गेलैए, ठोर पर आबि गेलैए, कलममे भने नहि होइक। आ, से जोखिम आदरणीय भाइ रमानन्द झा 'रमण' एखनहुं उठा रहल छथि। शान्त भावसं उठा रहल छथि, बिनु कोनो हो-हल्लाकें उठा रहल छथि, बिनु आलोचकीय अदंक पसारने उठा रहल छथि।
राजनन्दन लाल कहने रहथि जे साहित्यक जे वस्तु कतहु नहि भेटय, से रमण जी लग भेटत। ओ संयोगी लोक छथि। संयोगि क' रखैत छथि सभ कथू। आ अंतमे कहलनि जे ओ स्वयंमे मैथिलीक 'डेटा सेन्टर' छथि, 'इनसाइक्लोपीडिया' छथि। एखनि-एखनि मोन पड़ैए जे जं एखनुक पीढ़ी उपरोक्त दुनू 'टर्म' हिनका लेल प्रयोग नहि करत। ओ कहतनि- मैथिलीक गूगल बाबा।
हम अपन लेखनक आरंभिक कालमे पटनाक यात्राक्रममे लेखक सभसं भेट करबाक बानि पोसने रही, से एखनो अछि। समानधर्मासं भेटक बाद हम उर्जस्वित होइत छी। ताहू समय एही भावें आ अग्रज लेखकक व्यक्तित्वकें बुझबाक आ हुनकासं सिखबाक बहन्ने लेखक-मिलन नीक लागय। एही क्रममे प्राय: दू-तीन बेर रमण जी सं हिनक कार्यक्षेत्र माने रिजर्व बैंक मे भेट भेल अछि, से ताहि दिनक बात भेल। नहूं-नहूं हिनक आर-आर लेखकीय स्वरूप सभसं परिचय होइत गेल।
अपन मूल विधाक अतिरिक्त मैथिलीक कतोक मोर्चाकें सम्हारने छथि। रमण जी नीक सम्पादक छथि, अनुवादक छथि आ गहनतम खोजी लेखक छथि। पहिने रेडियोक विविध भारतीसं (प्राय:) एकटा कार्यक्रम होइक- 'भूले-बिसरे गीत'। कार्यक्रमक उद्देश्य बुझबा लेल ई नामे काफी छैक जे एहिमे पुरान-पुरान गीत सुनाओल जाइत छल। रमण जी सेहो मैथिली साहित्यक एहने 'बिसरल' वस्तुक सभक प्रस्तोता छथि। मैथिलीक कतोक अमूल्य धरोहर ई प्रकाशमे अनलनि अछि, से एकर प्रमाण थिक। एहि काजमे एखनो ओहिना शान्त भावें तल्लीन रहैत छथि। ताकाहेरीक ई प्रकृति आ प्रवृति हिनका बेरा क' रखने छथि।
रमण जी पंजीकार छथि। मैथिली साहित्यकार लोकनिक जन्म तिथि आ पुण्य तिथिक डेटाक अद्भुत संग्रह अछि हिनका लग, जे 'घर-बाहर' आ आब फेसबुकमे 'जुग-जुग जीबथि' आ 'मोन पड़ैत छथि' स्तंभसं अबैत रहैछ। एखनि फेसबुकक फेसबुकक चलती छैक। एहि समयमे जन्मदिन, विवाहोत्सव सन-सन उत्सव मनयबाक चलनसारि सभ आयु-वर्गक लोक सभकें सकपंज कयने छैक। एहना स्थितिमे जिनक जन्मदिन रहैत छनि, तिनकहुं आ आनो लेखक-फेसबुकिया पाठक सभकें रमण जीक पोस्ट 'जुग-जुग जीबथि'क प्रतीक्षा रहैत छनि। मान्यता भेल जा रहल छैक जे रमण जी पोस्ट देताह, तखने अहां लेखक भेलहुं। कारण, हुनके पोस्ट पर फेसबुकक एतेक टा समाज अहांकें लेखकक रूपमे चिन्हैए। देखबा-पढ़बामे तं इहो आयल अछि जे रमण जी कें एहि लेल उलहन सेहो अयलनि। किछु लेखक सोझे आरोप लगबैत छथि जे रमण जी जानि-बूझि क' हुनक जन्मदिन पर पोस्ट नहि दैत छथि। एकर माने हुनका लेखक नहि बुझैत छथि। वा, कहियोक कोनो 'कानि' असुलि रहल छथि। जे, से...ऊपरमे हम जाहि जोखिमक गप कयल, ताहिसं हिनक भेट-घांट फेसबुको पर होइत रहैत छनि।
रमण जी पेशागत बैंकर रहलाह अछि। भारतीय रिजर्व बैंकक अधिकारी रहलाह अछि। एक टा बैंकरक लेल 'बुक कीपिंग' बड़ आवश्यक काज होइत छैक। ओ मैथिली साहित्यक 'बुक कीपिंग'मे लागल रहलाह अछि। तकर एक टा उदाहरण एहिठाम देब' चाहैत छी।
मैथिली कथा-लेखनक अविस्मरणीय आन्दोलन 'सगर राति दीप जरय'क हाल धरिक विभिन्न प्रकारक डेटा रमण जी परसैत रहलाह अछि। एकरा ओ कथा-लेखनक 'शांत क्रान्ति'क नाम देलनि अछि। एहि शान्त क्रान्तिमे दूगोला होम'सं पहिने धरिक सभ प्रकारक सांख्यिकी रमण जीक कम्प्यूटर मे छनि। ई हिनक बड़ी टा इतिहास-लेखन छनि। नव लोककें किनसाइत नहि बुझल होनि, तें कहैत छी जे प्रत्येक गोष्ठीमे पछिला गोष्ठी धरिक क्रिया-कलापक डेटाक 'बुकलेट' छापि क' बंटैत रहलाह। एक टा आर बात। कथा-गोष्ठीमे लेखक कथा पढ़बाक लोभें जाइत रहलाह अछि, जे स्वाभाविको छैक, तथापि कोनो एक लेखक सभ गोष्ठीमे उपस्थित नहि भ' सकलाह, जे संभवो नहि छल। मुदा, रमण जी एहि असंभवकें संभव बनौलनि। जहिया धरि गेलाह, कोनो गोष्ठी नहि छुटलनि, खाहे ओ गोष्ठी निछच्छ देहातमे होउक, शहरमे होउक वा महानगरमे होउक। से, ओहू समय जखन रिटायर नहि भेल रहथि। बैंकक चाकरी करैत साहित्य करब कतेक कठिनाह छैक, से हमहूं भोगल अछि, तें मैथिलीक प्रति रमण जीक अनुराग आ दायित्वकें रेखांकित करैत गौरव होइत अछि हमरा। सकल समाजकें होमक चाही।
एतेक डेटा आ फोटो कोना मेंटेन करैत छथि ओ? ई जिज्ञासा हमरा मोनमे छल। हम एकबेर पुछनहुं रहियनि जे एतेक डेटा आ फोटो कोना करैत छियै, तं अपन सहज मुस्कीक संग अति संक्षिप्त उतारा देलनि जे भ' जाइत छैक। हमर मोनमे उपजल जे कोना भ' जाइत छैक? तखने बैंकिंग मोन पड़ल। पहिने बैंक मे एक टा रजिस्टर तैयार होइ, जकरा 'डेली लिस्ट' कहल जाइक। प्रत्येक दिन अगिला बरखक ओही दिन कोन-कोन जरूरी काज होयतैक, तकर सूची लिख' पड़ैक। जेना- फिक्स्ड डिपोजिट पर सूदि देब, कोनो असूली आदि आदि...सम्बन्धित कर्मचारी/अधिकारीकें प्रत्येक दिन आफिसमे सभसं पहिने एहि रजिस्टरकें देखब जरूरी होइत छलैक, कारण ग्राहकक काज निर्वाध यथासमय होइत रहैक। ई काज बैंक मे आब कम्प्यूटर करैत छैक। हमरा भेल जे रमण जी सेहो साहित्यक 'डेली लिस्ट' रखैत होयताह, रखैत छथि। जं रखैत छथि, तं बड़ी टा बात छैक। ई साहित्यक प्रति दायित्व बोध देखबैत अछि। माने ई भोरे आंखि फोलतहिं साहित्यक काज देखैत छथि। हिनक ई समर्पण विरल अछि।
बैंक प्रबंधनकें जं कोनो लेखक वा भाषाविद् कर्मचारी/अधिकारी भेटि जाइत छैक तं किछु काज फाओमे सेहो भ' जाइत छैक। मुदा, एहि 'फाओ'क बदलामे बैंक अतिरिक्त मान-सम्मान दैत छैक। ई हमर व्यक्तिगत अनुभव अछि। रमण जी अपन नोकरीक कार्यकाल मे रिजर्व बैंक लेल बहुत रास अनुवादक काज सेहो कयलनि अछि। समय-समय पर अपन विभागीय अनुवादक बानगी सस्नेह हमरा भेंट करैत रहलाह अछि।
रमण जी अनुवादक छथि। ओ दुनू प्रकारक अनुवाद कयलनि अछि। साहित्यक आ प्रशासकीय, दुनू। माने साहित्यक आ तकनीकी अनुवाद। आ दुनूमे हिनक दक्षता छनि। से हिनका द्वारा अनूदित पोथी 'मौलियरक दू नाटक' आ फकीर मोहन सेनापतिक 'छओ बिगहा आठ कट्ठा' कें पढ़ने बूझल जा सकैछ। हम तकनीकी अनुवादकें अनुवादक विज्ञान मानैत छी आ साहित्यिक अनुवादकें अनुवादक कला। चूँकि हिनक दुनू प्रकारक अनुवाद हम देखने छी, तें विश्वस्त छी जे अनुवादक कला आ विज्ञान, दुनूमे हिनक मास्टरी छनि।
रमण जी भारत आ नेपाल, दुनू देशमे समादृत छथि। नेपालोक प्रमुख साहित्यिक आयोजनमे हिनक उपस्थिति अनिवार्य बनल रहैछ। हिनका प्रति ओहिठामक लेखके नहि, प्रबुद्ध श्रोतो सभक सम्मान हमर देखल अछि।
रमण जी सम्पादक छथि। समालोचनाक अतिरिक्त कतोक पोथीक सम्पादन कयलनि अछि आ एखनो क' रहल छथि। 'मैथिलीक विदुषी महिला', मैथिली कथाक धाप', लिली रेक कथा-उपन्यास सभक संकलन आ सम्पादन सन बहुत एहन काज अछि जे अविस्मरणीय अछि।
रमण जी भूमिका-लेखक सेहो छथि। अपनो आ आनो लेखक सभक पोथी सभक भूमिका लिखलनि अछि आ लिखियो रहल छथि। भूमिका-लेखन सेहो चुनौतीपूर्ण काज होइत छैक। अपन पोथीक भूमिका लिखबाकाल तटस्थताक चुनौती होइत छैक। कलम कनियो कोम्हरो बहकल, तं...? दोसराक पोथीक भूमिका लिखैत छी, तं कोनो तेहन बातक अपेक्षा लेखक नहि करताह जे उचित भले होउक, मुदा हुनक पोथी आ लेखनक विरुद्ध होउक। एहना स्थितिमे भूमिका-लेखकक इमानदारी पर प्रश्न ठाढ़ होइत छैक। किछु मामिलामे इहो देखल जाइछ जे भूमिका-लेखक भैयारी, गोतियारी आ दोस्तियारीक निर्वाह करबासं बाज नहि अबैत छथि।
रमण जी भूमिका आ सम्पादकीय, दुनू लिखलनि अछि, लिखैत छथि। दुनू लेखनमे मूलभूत अन्तर छैक। संक्षेपमे कही तं भूमिका-लेखनमे एहि बातक प्रमुखता होइत छैक (आ रहबाको चाही) जे प्रयोज्य पोथी वा संकलनकें कोन दृष्टिसं पढ़ल जाय। ई किएक आ कोना प्रकाशित भ' रहल अछि? एकर दृष्टिकोण परिचयात्मक आ व्याख्यात्मक होइत छैक।
जखनि कि सम्पादकीयमे प्रयोज्य पत्रिका/पत्रक/प्रकाशनक मुद्दा आ संवादक प्रमुखता होइत छैक। एकर दृष्टिकोण विचारपरक, विश्लेषणात्मक आ कखनो क' आलोचनात्मक सेहो होइत छैक। दुनूमे मूल अंतर यैह जे भूमिकाक केन्द्रमे विषय होइत छैक आ सम्पादकीयक केन्द्रमे विचार वा मुद्दा आ पाठकसं संवाद।
रमण जी अपन भूमिका आ सम्पादकीय लेखनमे सतर्क देखाइत छथि। कोनो लेखककें एहि दुनूक लेखनमे कतेक बेराएल होमक चाही, से रमण जी बेसी ठाम देखाइत छथि, सभ ठाम नहि। किछु ठाम एकभगाह भेलाह अछि। किछु-किछु सम्पादकीय मे सेहो अपेक्षित वैचारिक त्वराक खगता देखाइत अछि। ओना निकती पर नब्बे डिग्री पर ठाढ़ होयब ककरो लेल संभव नहि छैक। किछु ल'त-उनार भइए जाइत छैक। चेतना समितिक त्रैमासिक पत्रिका 'घर-बाहर'क कतोक बर्खसं सम्पादन क' रहल छथि। नियमित रखने छथि।
हिनक सम्पादन कौशल घर-बाहरमे ओहन नहि देखाइत अछि, जेहन विवेचनात्मक आ अनुसंधानात्मक पोथी सभमे परिलक्षित होइत अछि। तकर कारण भ' सकैत अछि आ होइतो अछि। दुनूक (पत्रिका आ पोथी) सम्पादनक आयाम फराक-फराक होइत छैक। पत्रिकाक सम्पादनमे लेखकपर निर्भरता बेसी रहैत छैक। पत्रिकाक लेल मनोनुकूल रचना उपलब्ध कराएब कोनो सम्पादकक लेल बड़ कठिनाह काज होइत छैक, ताहूमे मैथिली मे। चालनिमे पानि भर' सन। सम्पादक पाठकक रुचिक अनुसार पत्रिकाक अंक लेल विषय तय क' सकैत अछि, ओकर प्रस्तुति पर सोचि सकैत अछि, आ आर-आर बहुत बात छैक ताहि पर सोचि सकैत अछि। मुदा ई सभ तं तखन संभव, जखन पत्रिकाक लेल मूल वस्तु विषयानुकूल आ यथा समय भेटैक। पत्रिकाक प्रबंधक फराक टीम होइक। मुदा, मैथिली मे से सभ कहां?
चेतना समिति, पटनाक भारती मंडन पुस्तकालयमे रमण जी घर-बाहरक सांगह करैत भेटि सकैत छथि। सांगह माने पत्रिकाक वितरणक चिन्ता लेने मग्न देखि सकैत छियनि हिनका।
चेतना समिति, पटनाक साहित्यिक पक्षक खाम्ह छथि रमण जी। सभ प्रकारक साहित्यक काजक कार्यान्वयन हिनके पर रहैत छनि। समिति निर्णय लैत अछि। हिनक सलाह सेहो लैत अछि। से, बहुत पहिनेसं। से, कोनो समूहक कमिटी होअय, रमण जी ओहिठाम साहित्यिक काज हेतु अनिवार्य छथि। ओना इहो बात छैक जे अपन एहि सेवा लेल रमण जीक प्रशंसा होइत छनि, आलोचना होइत छनि आ खिधांस सेहो होइत छनि। आ, से एहन नहि छैक जे हिनका धरि नहि पहुंचै छनि। पहुंचै छनि। मुदा, एहि सभपर ओ कतेक गंभीरतापूर्वक विचार करैत छथि, से हिनका चेहराक भाव देखि बूझल नहि जा सकैछ। जं हिनका भीतर कोनो आक्रोशो होइत हेतनि, तं जेना कोशी नदीक जलक मादे कहल जाइत छैक जे ऊपर सं जलक सतह शांत रहैत छैक, तेहने शांत रमण जी सेहो देखाइ पड़ैत छथि।
जे काज कर' लोक होइए, जकर उद्देश्य भाषा-साहित्य आ साहित्यक सेवा होइत छैक, ओ अपन लक्ष्य दिस बढ़ैत रहैए। बाटक नीक-बेजाय ओकरा प्रभावित नहि करैत छैक। ओकरा अपन लक्ष्य आ दायित्व देखाइत रहैत छैक। हमरा रमण जीकें सेहो सैह देखाइत रहैत छनि।
नेना रही तं गाममे रसनचौकीक बजैत देखियै तं एक टा जिज्ञासा बरोबरि मोनमे होअय। रसनचौकीमे एक टा कलाकार एक्के सुरमे पिपही बजबैत रहैए। शेष गीतक अपन पिपहीमे गीतक विभिन्न भास बजबैए। एक्के सुरमे बजौनिहारक औचित्य हमरा नहि लागय। बादमे बुझना गेल जे शेष कलाकार सभक भास ओहि लगातार बजैत पिपहीक सुर, जकरा 'सम'पर बजाएब कहल जाइत छैक, केर संग मिलि क' सम्पूर्ण संगीत बनैत छैक, जे हमरा सभक कानक बाटें मस्तिष्क धरि अबैए। तें ओ कलाकार सम पर बजबैत रहैए।
डा रमानन्द झा 'रमण' मैथिली साहित्यमे 'सम' पर सुर बहार करैत कलाकार छथि। ओ दीर्घायु, स्वस्थ आ सक्रिय रहथि, से कामना।
२.१७. प्रवीण कुमार झा- विद्वता, योगदान आ मैथिली लेल प्रयासक परिणाम
प्रवीण कुमार झा
विद्वता, योगदान आ मैथिली लेल प्रयासक परिणाम
डा. रमानंद झा ‘रमण’ कोनों परिचय के मोहताज नहि. ओ आधुनिक मैथिली साहित्यक प्रमुख साहित्यकार, आलोचक, शोधकर्ता आ संपादकक रूपमे जानल जाइत छथि। हुनकर योगदान केवल साहित्य-रचना धरि सीमित नहि अछि अपितुओ मैथिली भाषा, साहित्य, साहित्यकारक विरासत, भाषाक मानकीकरणसँ संबंधित बहस आ मैथिली समाजक सांस्कृतिक विमर्शमे सेहो सक्रिय रहल छथि।
रमण जीक विशेष पहचान मैथिली साहित्यक आलोचक आ अध्येताक रूपमे छनि. हुनका द्वारा मैथिलीकेँ महत्वपूर्ण साहित्यकार आ साहित्यिक धारापर काज तS कएल गेल अछिये, साहित्यिक सामग्रीक संकलन-संपादनमे सेहो हुनक महत्वपूर्ण भूमिका रहल छनि. हुनकर संपादित ‘आधुनिक मैथिली नाट्य संचयन’ सन कृति मैथिलीक आधुनिक नाट्य-साहित्यकेँ एक ठाम प्रस्तुत करबाक महत्वपूर्ण प्रयास रहल अछि. संगही रमण जी विभिन्न साहित्यिक गोष्ठी आ राष्ट्रीय स्तरक कार्यक्रममे मैथिली भाषा एवं साहित्यक प्रतिनिधित्व करैत रहल छथि। साहित्य अकादेमीक कार्यक्रमसभमे हुनका प्रमुख मैथिली साहित्यकारक रूपमे स्थान भेटल अछि. अहि क्रम में साहित्य अकादेमीक ‘Makers of Indian Literature’ श्रृंखलामे सेहो ओ मैथिलीक महत्वपूर्ण साहित्यकारसभपर काज कएने छथि। मार्कण्डेय प्रवासीपर हुनकर पुस्तक एकर उदाहरण अछि। साहित्य अकादेमीसँ जुड़ल एक कार्यक्रममे ओ मराठी आ तेलुगु जेकाँ भाषामे वर्तनी-निर्धारणक उदाहरण दैत मैथिलीक लेल सेहो सर्वमान्य वर्तनीक आवश्यकता पर विचार रखने छलाह।2024 मे भारतीय भाषा उत्सवक अंतर्गत ओ “Maithili Language and Literature” विषयपर व्याख्यान देने छलाह।
समकालीन योगदान के बात करी तs मैथिलीक मानक वर्तनीकेँ लऽ कऽ चलि रहल विमर्शमे हुनकर बनल सहभागिता अछि। मैथिली साहित्यकार सह विद्वतजन लेल ई विषय एहि लेल महत्वपूर्ण अछि कियेक तs हुनक ई मानब जे कोनो भाषाकेँ शिक्षा, प्रकाशन आ संस्थागत कार्यमे मजबूत करबाक लेल मानक लेखन-पद्धतिक होयब अत्यंत उपयोगी होइत अछि।
रमण जीक एकगोट पैघ योगदान ओहि साहित्यकारसभपर काज करब अछि जिनका साहित्यिक विरासतकेँ नव पीढ़ी धरि पहुँचेनाइ आवश्यक अछि। उदाहरणक लेल, ओ मार्कण्डेय प्रवासी सन महत्वपूर्ण साहित्यकारपर अध्ययन कएने छथि। एहि तरहेँ विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रमसभमे ओ मैथिलीक पुरान आ आधुनिक रचनाकारसभक योगदानकेँ रेखांकित करैत रहल छथि।
2017 मे चेतना समिति, जे मैथिली भाषा-भाषी लोकसभक प्रतिनिधि संस्था केर रूपमे काज करैत अछि, तकर महाधिवेशनमे रमानंद झा ‘रमण’ केँ संयुक्त सचिव चुनल गेल छल। चेतना समिति केवल साहित्यिक संस्था नहि, बल्कि मैथिली भाषा आ मैथिल समाजसँ जुड़ल प्रश्नसभकेँ उठाबयवाली संस्था रहल अछि।
मैथिलीक पारंपरिक तिरहुता अथवा मिथिलाक्षर लिपिक संरक्षण आ अध्ययनसँ जुड़ल विद्वानसभक संग सेहो हुनकर संपर्क रहल अछि। एहि क्षेत्रमे हुनकर महत्व एक एहन विद्वानक अछि जिनकर विशेषज्ञताक उपयोग मैथिलीक भाषा-सांस्कृतिक विरासतकेँ बुझबाक लेल कएल गेल अछि। संगही सीता, विद्यापति आ मैथिली साहित्यक परंपरा जेकाँ विषयपर हुनकर दृष्टिकोण मैथिलीक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचानकेँ सामने अनैत अछि। साहित्य अकादेमीक सीता-केंद्रित कार्यक्रममे ओ सीताक धैर्य, विनम्रता आ साहसकेँ रेखांकित कएने छलाह।
एखन धरि उपलब्ध विश्वसनीय प्रमाणमे हुनका भेटल दू गोट प्रमुख सम्मान स्पष्ट रूपसँ सामने अबैत अछि। 2022 मे मिथिला विभूति पर्वक स्वर्ण जयंती समारोहक अवसरपर रमानंद झा ‘रमण’ जीकेँ मिथिला विभूति सम्मान लेल चयनित कएल गेल छल। 2024 केर महाकवि पंडित लाल दास साहित्य गौरव सम्मान सेहो हुनका देबाक घोषणा कएल गेल छल।
जँ मैथिली आंदोलनकेँ तीन स्तरमे बाँटि कऽ देखी तँ पहिल राजनीतिक आंदोलन अछि, जाहिमे मैथिलीकेँ संवैधानिक आ प्रशासनिक मान्यता दिआयबाक संघर्ष अबैत अछि। दोसर सामाजिक आंदोलन अछि, जाहिमे मैथिल समाजकेँ भाषा आ सांस्कृतिक पहिचान लेल संगठित करब शामिल अछि। तेसर साहित्यिक-बौद्धिक आंदोलन अछि, जाहिमे भाषाक साहित्य विकसित करब, साहित्यकारसभकेँ स्थापित करब, इतिहास आ परंपराकेँ दस्तावेजीकृत करब तथा भाषाकेँ अकादमिक रूपसँ मजबूत करब शामिल अछि।
उपलब्ध प्रमाणक आधारपर रमानंद झा ‘रमण’ केर सभसँ प्रमुख योगदान तेसर क्षेत्रमे अछि, जखनकि चेतना समिति जेकाँ संगठनसँ जुड़ावक कारण हुनकर योगदान सामाजिक-संगठनात्मक स्तरपर सेहो रहल अछि।
चेतना समितिक संगही श्री रमण जी मैथिली साहित्यकार लोकनीक महत्वपूर्ण संगठन मैथिली लेखक संघ सौं सेहो जुडल रहला. अहि संघ के प्रमुख जिम्मेवारी बहुत व्यापक रहल अछि. मैथिली लेखक संघक मुख्य उद्देश्य मैथिली लेखक आ पत्रकारसभकेँ एकजुट करब, हुनका सामाजिक, आर्थिक आ संस्थागत सुरक्षा प्रदान करब तथा मैथिली साहित्यक विकास लेल अनुकूल वातावरण तैयार करब अछि।संघ सरकारी योजनासभकेँ मैथिली लेखक-पत्रकार धरि पहुँचाबय, पेंशन आ आर्थिक सहायता उपलब्ध कराबय तथा निर्धन, असहाय आ गंभीर रूपसँ बीमार साहित्यकारसभकेँ सहयोग देबाक प्रयास करैत अछि। मैथिलीक प्रतिष्ठित साहित्यकारसभकेँ पद्म-अलंकरण आ अन्य उच्चस्तरीय सम्मान भेटय, एहि दिशामे सेहो प्रयास करब एकर उद्देश्य अछि।
एकर संग देश-विदेशक लेखक संघ, भाषा केन्द्र आ अकादमीसभसँ संपर्क बढ़ेनाइ, मैथिली साहित्यक प्रचार-प्रसार करब, पुस्तक प्रकाशन, लेखन कार्यशाला, कवि-गोष्ठी आ विचार-गोष्ठीकेँ प्रोत्साहित करब तथा नवोदित रचनाकारसभकेँ सम्मान आ प्रोत्साहन देब सेहो संघक प्रमुख कार्य अछि।मैथिली लेखकसभक बौद्धिक सम्पदाक संरक्षण, विपन्न आ प्रतिभाशाली लेखकसभक पुस्तक प्रकाशनमे सहायता, मैथिली पुस्तकक वृहत् पुस्तकालयक स्थापना तथा अनुवाद साहित्यकेँ प्रोत्साहन देब सेहो एकर महत्वपूर्ण उद्देश्य अछि।समग्र रूपमे, ई उद्देश्य मैथिली भाषा आ साहित्यक संरक्षण, संवर्धन आ विस्तारक संग मैथिली साहित्यकारसभक सामाजिक-सांस्कृतिक आ आर्थिक हितक रक्षा करबाक व्यापक प्रयासकेँ दर्शबैत अछि।
पंडित स्व. गोविन्द झा, राजमोहन झा, मंत्रेश्वर झा, उषाकिरण खान, गजेन्द्र ठाकुर, तारानन्द वियोगी, वैद्यनाथ मिश्र, शिव कुमार नीरव, विनोद कुमार ‘सरकार’ सन अनेकानेक विद्वान साहित्यकार सब अहि संघ सौं जुड़ल रहला अछि.
संक्षिप्त में कहल जाए तँ रमानंद झा ‘रमण’ मैथिली आंदोलनक एहन विद्वान छथि जे आंदोलनक राजनीतिक अग्रिम पंक्तिसँ बेसी ओकर साहित्यिक, बौद्धिक आ संस्थागत जमीनकेँ मजबूत करबाक काज कएने छथि।
मुदा मुदा मुदा !
एक होइत अछि योगदान आ दोसर होइत अछि वृहद योगदान. अर्थात् कोनो उद्देश्यकेँ अपन दीर्घ समय देब, अपन क्षमता आ कौशलकेँ ओहि उद्देश्य लेल पूर्ण रूपसँ समर्पित कऽ देब। एहि दुनू अर्थमे रमण जीक योगदानपर कोनो संदेह नहि कएल जा सकैत अछि। ओ मैथिली साहित्य आ साहित्यकारसभ लेल अपन ईमानदार शत-प्रतिशत देबाक प्रयास कएने छथि, एहि बातमे कोनो दू राय नहि अछि।मुदा जखन हम हुनकर योगदानक मूल्यांकन केवल हुनका द्वारा कएल गेल प्रयाससँ नहि, बल्कि ओहि प्रयाससँ निकलल परिणामक आधारपर करैत छी, तखन तस्वीर किछु अलग देखाइत अछि।
एतेक लम्बा समय धरि मैथिली साहित्य आ ताहिसँ जुड़ल संस्थासभमे सक्रिय रहबाक, महत्वपूर्ण पदपर बनल रहबाक आ संगही व्यापक बौद्धिक क्षमता रखबाक बावजूद मैथिली भाषाक हितमे हुनकर प्रयाससँ प्राप्त ठोस परिणामक सूची बहुत छोट देखाइत अछि। मैथिलीकेँ संविधानक अष्टम अनुसूचीमे स्थान दिआयबाक संघर्षमे हुनकर कोनो निर्णायक भूमिका स्पष्ट रूपसँ सामने नहि अबैत अछि। चेतना समिति सन महत्वपूर्ण संगठनमे पदपर रहैत मैथिली शिक्षाक क्षेत्रमे सेहो एहन कोनो पैघ परिणाम सामने नहि अबैत अछि, जेकरा हुनकर नेतृत्व अथवा प्रयासक प्रत्यक्ष परिणाम कहल जा सकय।
मैथिली लेखक संघक संग हुनकर सक्रियताकेँ देखी तँ ओतहु स्थिति बहुत अलग नहि देखाइत अछि। लेखक आ साहित्यकारसभक हित, साहित्यक संवर्धन आ संगठनात्मक गतिविधि लेल ओ निश्चित रूपसँ समय आ ऊर्जा देने छथि, मुदा एतेक महत्वपूर्ण पद आ एतेक दीर्घ साहित्यिक सक्रियताक बावजूद मैथिलीक व्यापक सामाजिक आ भाषायी हित लेल जे किछु प्राप्त कएल जा सकैत छल, तकर तुलनामे उपलब्धि अपेक्षाकृत कम देखाइत अछि।
एतय प्रश्न हुनकर समर्पणपर नहि, बल्कि ओहि समर्पणक परिणामपर अछि। कोनो व्यक्ति कतेक समय देलनि आ कतेक मेहनत कएलनि, ई एकटा पक्ष अछि,मुदा ओहि मेहनतसँ भाषा, शिक्षा, साहित्यकार आ समाजकेँ की ठोस उपलब्धि भेटल, ई दोसर आ बेसी महत्वपूर्ण पक्ष अछि।
एकर अतिरिक्त चेतना समितिक संग रहैत पुस्तक-साहित्यक संवर्धन आ संस्थागत गतिविधिकेँ लऽ कऽ हुनकर कार्यकालसँ संबंधित किछु विवाद आ आरोप सेहो चर्चामे रहल अछि। तहिना सरकार आ सत्ताप्रतिष्ठानक संग हुनकर संबंधकेँ लऽ कऽ सेहो ई आलोचना होइत रहल अछि जे मैथिलीक प्रश्नकेँ लऽ कऽ संघर्षपूर्ण ढंगसँ मांग रखबाक बदला ओ संबंध आ कूटनीतिक संवादकेँ बेसी महत्व दैत रहलाह। एहि आरोपसभकेँ अंतिम सत्य मानबाक पूर्व हुनकर प्रमाण आ संदर्भक स्वतंत्र जाँच आवश्यक अछि, मुदा कोनो गंभीर मूल्यांकनमे एहि चर्चासभक उपेक्षा सेहो नहि कएल जा सकैत अछि।
तेँ रमण जीक मूल्यांकन करैत समय दू अलग-अलग बातकेँ अलग राखब आवश्यक अछि - एक, मैथिली साहित्यक प्रति हुनकर व्यक्तिगत समर्पण, अध्ययन, लेखन आ दीर्घकालीन योगदान, आ दोसर, मैथिली भाषा आ समाजक व्यापक हितमे हुनकर पद आ प्रभावसँ उत्पन्न ठोस परिणाम।
पहिल पक्षमे हुनकर योगदान निश्चित रूपसँ पैघ अछि। मुदा दोसर पक्षमे, विशेष कऽ मैथिली शिक्षा, संवैधानिक अधिकार आ व्यापक भाषायी हितक संदर्भमे, हुनका सँ बेसी परिणामक अपेक्षा स्वाभाविक छल। ईएह ओ बिन्दु अछि जतय हुनकर योगदान आ हुनकर उपलब्धिक बीच एकटा महत्वपूर्ण अंतर देखाइत अछि।
रमण जी के स्वस्थ आ दीर्घायु रहबाक कामना!
२.१८. सुजीत कुमार झा- ओ शब्द, जे एखन धरि संग अछि
सुजीत कुमार झा
ओ शब्द, जे एखन धरि संग अछि
जनकपुरधाममे आयोजित १६म कथा गोष्ठी छल। जानकी मन्दिरक प्राङ्गणमे रहल भानस घरमे आयोजित एहि गोष्ठीमे हमहुँ कथा वाचन कएने रही। ओ हमर पहिल कथा छल। कथा पाठ कऽ जखन मञ्चसँ नीचाँ उतरि रहल रही, तखन नीचाँ बैसल एक गोटे कहलनि— ‘बहुत बढि़या कथा छल...निरन्तर लिखू। ओ कथा हमरा दऽ दिअ, हम सभक कथा संग्रह कऽ रहल छी।’
हुनक चेहरा तखन नीक जकाँ देखबामे नहि आएल। मुदा उत्साह बढ़ाबएवला हुनक ओ दू–चारि शब्द हमरा कतेक दिन धरि भीतरसँ प्रेरित करैत रहल, से कहब कठिन अछि। हुनक ओ वचन बेर–बेर हमर मस्तिष्कमे अबैत रहल। ओ छोट–सन प्रशंसा हमर नवजात लेखकीय आत्मविश्वास लेल पैघ संबल बनि गेल छल।
एक–दू सप्ताहक बाद कथा गोष्ठीक फोटोसभ साफ कराओल गेल तँ पता चलल जे हमर उत्साह बढ़ाबएवला व्यक्ति दोसर नहि, डा. रमानन्द झा ‘रमण’ छथि। कवि चन्द्रमोहन झा ‘पड़वा, जे सम्बन्धमे हमर पिसा लगैत छथि, हुनका विषयमे कहलनि—‘रमण बाबू मैथिलीक सभसँ बड़का समालोचक छथि।’
ओ कथा गोष्ठी ९ अक्टुबर १९९३ कऽ भेल छल। मुदा डा. रमणसँ हमर प्रत्यक्ष भेट ओकर करीब दू वर्ष बाद भेल। ओ समय धरि हम नियमित रूपसँ लिखए लागल रही आ मैथिलीक काजमे सेहो सक्रिय भऽ गेल रही।
२३ सितम्बर १९९५ कऽ काठमाण्डूमे आयोजित एकटा कथा गोष्ठीसँ घूरि कऽ डा. रमण जनकपुरधाम आबि रहल छलाह। ओहि समय हम मैथिली विकास परिषद्, जनकपुरधामक अध्यक्ष रही। हमरा सभकेँ नाटककार डा. अरविन्द अक्कुकेँ सम्मान करबाक छल। ओहि समय हुनक नाटक एहि क्षेत्रमे खूब मंचित होइत छल। हुनक लोकप्रिय गीत‘राम दुलारी कटियामे ताड़ी...’ सेहो प्रायः सभ मञ्चपर गायकसभ गबैत छलथि।
डा. अरविन्द अक्कु संग पण्डित गोविन्द झा आ डा. रमानन्द झा ‘रमण’ सेहो कार्यक्रममे पहुँचि गेलाह। हमरा दूटा आओर पाग आ दोपटा मंगबए पड़ल आ तीनू गोटेकेँ सम्मान कएल गेल। डा. रमण हमरा देखितए चिन्हि गेलाह। ओ कहलनि— ‘अहाँ कथा लिखू।’
मैथिलीक लेल काज करएवला संस्था आ नवोदित लेखकसभक गतिविधिसँ परिचित भऽ कऽ ओ विशेष प्रसन्न सेहो भेल छलाह। हुनक ओ अपनत्वपूर्ण व्यवहार हमरा लेल बहुत महत्वपूर्ण छल।
तकर बाद २४ जनवरी १९९६ कऽ नेपालक राजविराजमे कथा गोष्ठी भेल। ओतहुँ हुनकासँ भेंट भेल। एहि बेरक भेटमे लेखनपर विस्तारसँ चर्चा भेल। जनकपुरधामसँ कथा लऽ कऽ हम, अनिलकुमार कर्ण, उपेन्द्र भगत ‘नागवंशी’ आ अमितेश साह राजविराज पहुँचल छलहुँ। डा. रमण चारू गोटेसँ एक घण्टासँ बेसी समय धरि कथा लेखन आ साहित्यक विषयमे बातचित कएलन्हि।
लेखन कौशल सुधारबाक लेल हुनक सलाह हमरा एखनो शब्दशः स्मरण अछि। ओ कहलनि जे लेखनमे निखार अनबाक लेल नियमित अभ्यास, व्याकरणक समझ आ बेसीसँ बेसी पढ़ब आवश्यक अछि। प्रतिदिन लिखबाक आदत बनेबाक चाही, सरल आ स्वाभाविक शब्दक प्रयोग करबाक चाही आ लिखल सामग्रीकेँ फेरसँ पढि़ आवश्यक सुधार करबाक चाही। अलग–अलग प्रकारक किताब खोजि कऽ पढ़बाक सलाह सेहो ओ देलन्हि।
हुनक तर्क छल जे जखन कोनो लेखक अलग–अलग लेखकक किताब पढ़ैत अछि तँ ओकर लेखनक दायरा विस्तृत होइत अछि, नव–नव शब्दक जानकारी भेटैत अछि आ अलग–अलग शैलीसँ परिचय होइत अछि। परिणामतः कोनो विषय अथवा सन्दर्भपर लिखबाक समय ओकर अपन लेखन शैली सेहो अधिक प्रभावकारी बनैत अछि।
डा. रमणक ओ सलाह हमर लेखकीय यात्रामे एखनो संग–संग चलि रहल अछि।
एकर बाद भलहि डा. रमणक हमरासँ नियमित सम्पर्क नहि रहल, मुदा जखन–जखन ओ जनकपुरधाम अबैत छलाह, हमरा भेटबए करैत छलाह। बादमे हुनकासँ आत्मीय सम्बन्ध निरन्तर बनल रहल। दू बेर तँ हम पटना स्थित हुनक निवासपर सेहो गेलहुँ। एक बेर ओतए हुनकासंग भोजन करबाक अवसर सेहो भेटल। साहित्यक प्रति हुनक अनुराग आ आत्मीय व्यवहारक स्मृति ओहि भेटसभकेँ विशेष बना दैत अछि।
हमर बालकथा–संग्रह ‘कोइली घूरि आउ’ मे डा. रमण भूमिका सेहो लिखने छथि। ई हमर लेल विशेष महत्वक बात अछि। नेपालसँ प्रकाशित प्रायः सभ प्रमुख पत्र–पत्रिकामे हुनक रचना प्रकाशित होइत रहल अछि। कएटा पत्रिका हमरे सम्पादमे निकलल अछि जखने हुनका आग्रह कएलहुँ एकदिनक बाद ओ रचना पठा दैत छथि। नेपालक विभिन्न लेखकक प्रकाशित करीब आधा दर्जन पुस्तकक भूमिका सेहो ओ लिखने छथि। ‘आफन्त नेपाल’ द्वारा प्रकाशित ‘मैथिली ः कथा नेपाल’ क सम्पादन हुनक महत्वपूर्ण काजमे एक अछि। ‘पाकल आमक अमृत रस’ क संयुक्त सम्पादन डा. राजेन्द्र विमलक संग कएने छथि। ई पुस्तक ‘एजिङ नेपाल’ द्वारा प्रकाशित भेल अछि।
सन् १९९० क बाद जनकपुरधाममे आयोजित अधिकांश महत्वपूर्ण साहित्यिक तथा सांस्कृतिक समारोहमे डा. रमण आमन्त्रित आ उपस्थित होइत आएल छथि। नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठान आ बी.पी. कोइराला फाउन्डेशनक आयोजनमे भेल महत्वपूर्ण कार्यक्रमसभमे सेहो हुनक सक्रिय सहभागिता रहल अछि। जीवनक छः दशक पार कऽ चुकल छथि, मुदा उम्र हुनक लेखनीक धारकेँ तनिकहुँ मन्द नहि कए सकल अछि। वृद्धावस्थामे सेहो हुनक लेखनी ओतबे धुरझार चलैत अछि आ साहित्यिक गतिविधिमे हुनक सक्रियता ओतबे देखबामे अबैत अछि।
किछु दिन पहिने सेहो एकटा साहित्यिक समारोहमे सहभागी होबए लेल ओ जनकपुरधाम आएल छलाह। हुनका देखला पर बुझाइत अछि जे मैथिलीक काज हुनक लेल मात्र साहित्यिक गतिविधि नहि, जीवनक ऊर्जा अछि। मैथिलीक नामपर कोनो काज होइत अछि तँ हुनक शरीरमे नव फूर्ति आबि जाइत अछि—ई बात ओ स्वयं सेहो स्वीकार करैत छथि।
हुनक प्रायः पुस्तक हम पढ़ने छी आ विशेष रूपसँ हुनक समालोचना लेखनक तँ हम प्रशंसक छी। सामान्यतः हम समालोचनाक अर्थ रचनाक भीतर नुकाएल अर्थ आ शिल्पकेँ बुझब, कृतिक सार्थकता आ ओकर प्रभावक परख करब बुझैत छी। समालोचना मात्र रचनाक कमी निकालबाक नाम नहि अछि। ओकरा रचनाक खूबि आ कमजोरी दुनूकेँ निष्पक्ष रूपसँ पाठकक समक्ष राखबाक चाही।
डा. रमणक समालोचनामे ई संतुलन स्पष्ट देखबामे अबैत अछि। ओ रचनाकेँ मात्र दोषक आँखिसँ नहि देखैत छथि; ओकर सामथ्र्य, सौन्दर्य, सीमा आ सम्भावनाकेँ सेहो चिन्हित करैत छथि। हुनक समालोचना रचनाकारकेँ निरुत्साहित नहि करैत, अपितु ओकरा अपन रचनाक प्रति नव दृष्टि देबाक प्रयास करैत अछि। एहि गुणे हुनका दोसर समालोचकसँ अलग पहिचान दैत अछि।
हमर लेखकीय यात्राक आरम्भिक समयमे एकटा अनजान स्वरमे कहल ‘बहुत बढिया कथा छल’ सँ जे उत्साह भेटल छल, से स्वर बादमे डा. रमानन्द झा ‘रमण’क रूपमे हमरा सामने आयल। हुनक एकटा छोट–सन प्रशंसा, एकटा आत्मीय सुझाव आ साहित्यप्रति हुनक निरन्तर समर्पण हमर स्मृतिमे एखनो ओतबे ताजा अछि।
लेखनक बाटपर चलैत कतेको लोक भेटैत छथि—किछु लोक क्षणभर लेल संग होइत छथि आ आगाँ बढि़ जाइत छथि, मुदा किछु लोकक एकटा शब्दो जीवनक दीर्घ यात्रामे दीपक बनि रहि जाइत अछि। डा. रमानन्द झा ‘रमण’ हमर लेल ओही तरहक एकटा प्रेरणादायी व्यक्तित्व छथि।
२.१९. डॉ कैलाश कुमार मिश्र-रमानन्द झा “रमण” मैथिली साहित्य आ मिथिला संस्कृति केर अनुपम अभिलेखपाल
डॉ. कैलाश कुमार मिश्र
(मानवशास्त्री, भारतक विभिन्न अदिवासी समूहक विद्वान, शोधकर्ता। संपर्क-8076208498)
रमानन्द झा “रमण” मैथिली साहित्य आ मिथिला संस्कृति केर अनुपम अभिलेखपाल
रमानन्द झा “रमण” सुविज्ञ आ गंभीर लोक छथि। गभीर रहब आ विषय वस्तु संग तारतम्य स्थापित करब हिनक आवश्यक व्यक्तित्व केर लक्षण छनि। साहित्य केर केँ कहैत अछि समस्त मैथिली वाङ्मय सँ परिचित छथि। मैथिली साहित्यमे के की लिख रहल छथि, कोन तरहक गतिविधि चलि रहल छैक, मैथिली केर इतिहास, मिथिला केर इतिहास, सभ वर्ग आ समुदाय केर इतिहास, सभ किछु पर मैक्रो दृष्टि राखैत छथि। किछु समूह अथवा समुदाय पर अघोषित माइक्रो दृष्टि से राखैत छथि। अनेक साहित्यकार, विद्वान अथवा अति विशिष्ट मैथिल सभक रचना प्रकाशित करबामे, संपादित करबामे हिनक भूमिका अनुपम छनि। हिनके कृपा सँ हम लिली रे आ अनेक विद्वान लोकनि केर रचना पढ़ि चुकल छी। हमरा इच्छा भेल जे हम लिली रे केर समग्र रचना पढ़ब। भेल, कोना पढ़ब? कतऽ भेंटत सभ पोथी? एक व्यक्ति कहलनि: “रमण जी सँ संपर्क करू ओ व्यवस्था कऽ देताह।” हम रमण जी सँ दूरभाष पर गप्प केलहुँ तँ पता चलल जे अनेक ठाम सँ हुनक अर्थात् लिली रे केर रचना सभकेँ एकत्रित कऽ फेर ओकरा संपादित करैत रमण जी लिली रे केर समग्र रचना केँ प्रकाशित केने छथि। हम ओ रचना सभ मंगा पढ़ने रही आ पहिल बेर लिली रे केर रचना संसार सँ अवगत भेल रही। ई संभव भेल तकर जड़िमे छलाह रमानन्द झा रमण।
अतबे नहि रमण जी अनेक विधा केर नव-पुरान लोक आ विद्वान केँ मैथिली केर विभिन्न विधा पर लिखबा हेतु प्रोत्साहित करैत छथि। हिनक एहि नीक काजक प्रमाण हम स्वयं छी। हमर फेसबुक केर पोस्ट सभ देखि पढ़ि रमण जी हमरा अपन मोबाइल नंबर आ ईमेल पता पठा देलनि। फेर लिखबाक आग्रह केलाह। किछु दिनक बाद हम लिखनाइ प्रारंभ कएल। तकर भाषा आ वर्तनीमे सुधार करैत ई ओहि आलेख केँ चेतना समिति पटना केर पत्रिका “घर बाहर” मे छपलनि। हम नहुँ-नहुँ लिखनाइ शुरू केलहुँ। हमर जे मैथिली भाषा साहित्यमे लेखन केर यात्रा विदेह सँ शुरू भेल तकरा रमण जी ठोस रस्ता प्रशस्त केलाह।
रमण जी, जेना कहि चुकल छी मैथिली वांग्मय केर इनसाइक्लोपीडिया छथि। से अहि लेल छथि जे हिनका लग समग्रतामे सभ सामग्री व्यवस्थित रूप सँ उपलब्ध छनि। अपन सामग्री सँ ई वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक आ आत्मिक रूप सँ संलग्न छथि। एक- एक डाक्यूमेंट हिनका लग कैटलॉग केर फॉर्मेटमे उपलब्ध छनि। एक संस्मरण याद आबि रहल अछि। 2019 मे हम प्रोफेसर देवशंकर नवीन जी केर संग पटना गेल रही। पटनामे टाइम्स ऑफ इंडिया केर एक स्पोंसर्ड कार्यक्रममे हमरा नवीन जी संग साक्षात्कार करक छल। हमरा संग आराधना प्रधान से छलीह। कार्यक्रम सँ एक दिन पहिने हम आ नवीन जी पटना पहुँच गेल रही। साँझुका पहर रमण जी अशोक कथाकार संग भेंट करबाक हेतु एलाह। हमर जिज्ञासा ई जनबाक छल जे नवीन जी अपन साहित्य लेखन केर यात्रा मैथिलीमे गद्य सँ शुरू केने छथि अथवा पद्य सँ। तकर प्रमाण के देत? एक मोन भेल जे नवीन जी सँ जानकारी हासिल करी। फेर भेल, अगर ओ सही जानकारी नहि देलनि तखन की करब? हुनकर बात केर अवहेलना करबाक सामर्थ्य हमरामे कहियो नहि भेल। फेर की समाधान हो? भेल, “रमानन्द झा रमण हमर समस्या केर समाधान कऽ सकैत छथि।” यद्यपि हम पूर्ण आश्वस्त नहि रही। हम रमण जी आ अशोक जी केँ नवीन जी लग गप्प करैत छोड़ि बाहर आबि गेलहुँ आ डॉ. ऊषाकिरण खान सँ फोन पर गप्प कर लगलहुँ। हुनका सँ ज्ञात भेल जे प्रारंभिक जीवनमे नवीन जी कविता केर एक लघु संग्रह प्रकाशित केने छलाह मुदा संग्रह केर नाम आ पोथी केर उपलब्धता केर जानकारी उषाकिरण खान लग नहि छलनि। जखन हम कहलियनिछ “ रमण जी लग ई पोथी भेटबाक संभावना भऽ सकैत अछि की?”
ऊषाकिरण खान आत्मविश्वास सँ बाजि उठलिह: “अवश्य हेबाक चाही। आ अगर इ पोथी रमण जी लग उपलब्ध नहि छनि तँ कतहुँ नहि भेटत।”
हम आब आश्वस्त होइत अपन होटल केर कक्षमे आबि गेलहुँ। रमण जी आ अशोक जी नवीन जी संग नाना तरहक साहित्यिक आ पारिवारिक वार्तालापमे मग्न छलाह। हम आबिते देरी कॉफी केर आर्डर दैत बाहर जेबाक लेल क्षमा मांगि लेल। जखन ई सब अपन-अपन घर लेल प्रस्थान करऽ लगलाह तखन हम कात लऽ जाकऽ हिनका सँ निवेदन कएल: “अहा लग नवीन जी केर अपन साहित्यिक यात्रा केर ऊषाकालमे लिखल कोनो कविता संग्रह अछि की?”
कनेकाल सोचैत रमण जी उत्तर देलनि; “जखन नवीन जी डाल्टनगंज केर कॉलेजमे लेक्चरर छलाह ताहि समय एक कविता केर लघु पोथी प्रकाशित केने छलाह। हमर संग्रहमे ई पोथी उपलब्ध अछि। मुदा हमरा ताक पड़त।”
“हमरा हर हालत मे ई पोथी चाही। हम हुनकर प्रारंभिक रचना केर विषय, शब्द संधान, उपमा, शैली आ अलंकार आदि के देख चाहैत छी। हमर उद्येश्य नवीन जीमे एक साहित्यकार केना समय संग अलग-अलग पड़ाव, अलग-अलग विषय, विधा, मनोभाव, साहित्य चेतना संग आगा बढ़ेत छनि तकरा देखए आ बुझए चाहैत छी। ई बिना अहाँक सहयोग सँ संभव नहि अछि।”
हमर कथ्य केर अपन मौन स्वीकृति दैत रमण जी गंभीर भेल अपन गर्दनि हिला देलाह। आब हमरा लगभग 90 प्रतिशत विश्वास भऽ गेल जे रमण जी दोसर दिन ओ पोथी हेरि लेताह।
सएह भेलैक। दोसर दिन रमण जी कार्यक्रम केर प्रारंभ होब सँ डेढ़ घंटा पहिने आबि गेलाह आ पोथी जेना हम निवेदन केने छलियनि तहिना चुपचाप हमरा दऽ देलाह। एहि बातक जानकारी आई धरि हमरा, रमण जी आ ऊषा दीदी केर अलावे ककरो नहि छनि।
डेढ़ घंटा हमरा लेल पर्याप्त समय छल ओहि पोथी केर टेक्सचर बुझबाक लेल। जखन हम नवीन जी सँ पद्य रचना पर बात करब शुरू कएल तँ ओ अपन बात बहुत गंभीरता दिस लऽ जेबाक उद्यम कर लगलाह। तखने हम हुनक पोथी सँ तीन अथवा चारि कविता केर किछु अंश सुना देलयनि। हमरा लग नवीन जी केर प्रारंभिक रचना सेहो कविता संग्रह उपलब्ध अछि ई बात हुनक कल्पना तकमे नहि छलनि। नवीन जी नित्य शोध कर्म केर घोर साधक छथि। स्वीकार केलाह जे प्रारंभ भले किशोर मनक झंझावात केर वेगमे प्रेम सँ केने छलाह मुदा किछुए दिनक बाद ई अनुभव भेलनि जे हुनक सोच आ दिशा कतहुँ आन ठाम छनि।
हालहिमे हमरा प्रोफ़ेसर मुक्तिनाथ झा केर बारेमे किछु जनबाक प्रयोजन भेल। हुनका नाम सँ पुरस्कार इत्यादि जे देल जाइत छैक तकर चयन प्रक्रिया केर हम एक रेफरी रही। हम ओहिना रमण जी लग एकर चर्च केने रही। किछुए दिनक बाद रमण जी हमरा लग एक पीडीएफ फाइल प्रेषित केलनि जाहिमे स्वर्गीय प्रोफ़ेसर मुक्तिनाथ झा पर कोनो अवसर पर जे हुनक व्यक्तित्व आ हुनका पर जे हिनक व्यक्तिगत अवधारणा छलनि तकरा स्पष्ट केने छलाह। ओहि पीडीएफ फाइल बला कागत केर प्रिंट करा हम तीन-चारि बेर पढ़ने रही आ अपन अज्ञानता बहुत हद धरि दूर करबाक प्रयास केने रही।
हम बेर-बेर एहि बात केँ स्वीकार करैत छी जे हम मंदगति केर पाठक छी। साहित्य केर अनेक गुढ़ बात सभ नहुँ-नहुँ हमर माथामे घुसैत अछि। सत्य स्वीकार करबामे कहेनलाज! भले किछु लोक गैंग बना ककरो लेल अंट-शंट लिखैत छथि मुदा अपन समूह केर संस्कार नहि देखैत छथि, हमरा अपन सीमा रेखा बुझल अछि। ताहिं बहुत पोथी सभ पढ़मे बहुत अधिक समय लगैत अछि। ई बात लिखबाक उदेश्य अतबे जे रमण जी अपन दू पोथी हमरा पठेने छथि, मुदा हम एखन धरि ओकरा नहि पढ़ि सकल छी। आब ओकरो पढ़ब आ अपन ज्ञान आ सोचक मर्यादामे रहैत ओहि दुनू पोथी पर विस्तार सँ लिखबाक यत्न करब।
उपरोक्त प्रसंग अथवा उद्धरण त एक छोट प्रसंग अछि। अतेक अनेक प्रसंग हमरा लग अछि। हमर चर्चे की, अनेक साहित्यकार, पाठक, शोधार्थी, विद्यार्थी आ समालोचक रमण जी केर उत्कृष्ट संकलन आ हुनक सहयोग सँ लाभान्वित भेल हेताह। बहुत लोक एखनो भऽ रहल अछि। हमरा जखन कखनो कोनो गंभीर लेख आदि केर लेखन केर समय कोनो संदर्भ केर दरकार होइत अछि त हम आँखि मुनि रमण जी केँ फोन लगा लैत छी। अधिकांश समय रमण जी हमर जिज्ञासा केर समाधान प्रामाणिक संदर्भ सँ करैत छथि। हिनक सौम्य स्वभाव, उदारता, ज्ञानक प्रति अहर्निश संलग्नता हिनका भीड़ सँ अलग ठाढ करैत छनि। हमरा विश्वास अछि पाठक सभ पढ़ैत काल अपन-अपन अनुभव सँ हमर कथ्य केर प्रामाणिकता केर अनुभव करैत हेताह।
अतबे नहि, जाहि तरहे रमण जी मैथिली भाषा केर साहित्यकार, मिथिला केर विद्वान चाहे ओ कोनो विधा आ क्षेत्र केर होथि, अति प्राचीन सँ नव लेखक सभक जन्म दिवस, जे दिवंगत भऽ गेल छथि तिनकर अवसान दिवस, एक- एक आदमी केर रचना केर नाम, गाम आदि केर अतिरिक्त हुनका सँ संबंधित प्रसंग, हुनक छवि, पोथी केर छवि आदि अनेक चीज सब दृष्टांत लेल रखैत फेसबुक अथवा आन सामाजिक संजाल पर अपन पोस्ट केर मादे लोक केर मानस पटल पर साहित्यकार केँ जियोने रहैत छथि से अपना आपमे बहुत पैघ बात छैक। सामग्री, सामग्री केर छवि, सामग्री संग साहित्यकार केर प्रमाणिकता सभ किछु एक ठाम परोसऽ केर कला आ वैज्ञानिक दृष्टि छनि रमण जी केर।
अंतमे कहब जे रमण जी सन मैथिल साहित्यकार केँ पाबि चेतना समिति पटना अथवा कोनो संस्था गर्वक अनुभव कऽ सकैत अछि। हम सभ रमण जी केर कारण अनेक साहित्यकार आ मिथिला केर मनीषि लोकनि केँ नियमित स्मरण करैत छी, हुनका बारेमे, हुनक रचनाक बारेमे बुझैत छी।
हम तँ अपन कुलदेवी सँ बेर-बेर प्रार्थना करब जे रमण जी बहुत दिन धरि दैहिक, मानसिक स्तर पर स्वस्थ्य, प्रसन्न आ सदैव एक्टिव रहथि जाहि सँ साहित्य प्रेमी लोकनि केँ हिनक वैदुष्य आ संग्रह केर लाभ भेटैत रहनि।
२.२०. लालदेव कामत- डा. रमानन्द झा रमण जीक रचना संसार
लालदेव कामत
डा. रमानन्द झा 'रमण' जीक रचना संसार
मधुबनी जिलान्तर्गत प्रसिद्ध लालगंज गाममे प्रभावशाली व्यक्ति श्री परमानन्द झा जीके घर दि. २ जनवरी सन् १९४९ ई०केँ एक बालकक जन्म भेल रहय, जिनक नाम पड़ल रमानन्द झा। रमा नन्द झा जी वाणिज्यक मेधावी छात्र रहल छथि। ओ एम ए. पीएचडी करैत आजिविका लेल भारतीय रिजर्व बैंक -शाखा पटनामे कार्यरत रहथि। ओतय सँ सेवा निवृत्ति पाबि साहित्य क्षेत्रमे रुचि लेलनि। डाक्टर झा जी यशस्वी सदस्य, मैथिली लेखक संघ-पटना केर छथि। हिनक सूक्ष्म दृष्टि, धैर्य आ अथक परिश्रम विगत ५० साल सँ मैथिली साहित्यक' वसंत देखल गेल छैक। विभिन्न पत्र-पत्रिकामे छिड़ियाएल ओ हेराएल रचना सभक उत्खनन कय सुधी पाठक सोझा मूल्यांकन रूपें समीक्षा सँ मैथिली साहित्यिकीमे प्राण फुँकने छथि। ओना खूब मेहनत आ श्रमसाध्य सँ कियो लेखक अपन रचनाकेँ पोथी-पुस्तिका छपबाबैत अछि,से कतेको सिद्धहस्त कवि-कथाकारके मौलिक रचना प्रकाशित करयमे प्रकाशक बिनु आर्थिक सेवाके रूचि लैत छैक। आओर छपल पोथीकेँ विज्ञापन पाठक धरि पोथी चर्चा आ समीक्षा गुण प्रकाश भेला सन्ता बजार भाव भेटैत छैक। से नि:शुल्क आ बेन रूपेँ सेहो पोथी परसल जाइछ। बिनु किनने पढ़ल पोथीक संग समीक्षा हेबाक जगह प्रसंशा बेसीतर कयल जाइत रहल अछि। मुदा रमानन्द बाबू ताहिमे अपवाद हेबाक तगमा लेखकीय समाज सँ मौखिक रूपेँ प्राप्त कयने छथि। बहुआयामी व्यक्तित्वक डा. झा जी साहित्यिकीमे बेछप परिचय बना लेने छथि, जहन कि ओ साहित्यक विद्यार्थी नहिं रहल छथि। हिनका मादे विशेष जनतब सोशल मीडिया आ पत्र- पत्रिकामे एवं विडियो सुनि सहृदय पक्षके पाठक अपन ज्ञान बढ़ा सकैत अछि। हिनक शोध-पत्र,आलेख आ सेमिनार'क वक्तव्य सँ सेहो समय-समय पर पाठकके जिज्ञासा क्षुधाक पूर्ति होयत। प्रकाशनके क्षेत्रमे स्तरीय प्रकाशक हिनक विवेच्य पोथी छपने छैक। प्रकाशित पोथीक संक्षिप्त विवरण लघु आलेखमे द्रष्टव्य होयत -:
नवीन मैथिली कविता-१९८२ ई०, मैथिली नऽव कविता-१९९३ , मैथिली साहित्य ओ राजनीति-१९९४ , अखियासल-१९९५ , बेसाहल-२००३ , भजारल-२००३, निर्यात कैसे शुरू करे ? हिन्दी-रिजर्व बैंक पटनाक प्रकाशन सम्पादित, मैथिली'क आरम्भिक कथा -१९७८ समीक्षा, श्यामानंद रचनावली १९८१ , जनार्दन झा जनसीदन कृत निर्दयी सासु -१९१४ आ पुनर्विवाह-१९२६ प्रकाशित-१९८४ , चेतनाथ झा कृत श्री जगन्नाथपुरी यात्रा-१९१० ; १९९४ ई०, रास बिहारी लाल दास कृत सुमति -१९१८; १९९६ ई० , जीबछ मिश्र कृत रामेश्वर-१९१६; १९९६ ई०, तेजधार झा कृत सुरराज विजय नाटक -१९१९; १९९६ ई०, भेंटघांट (भेंटवार्ता)- १९९८, रूचय तं सत्य नै तँ फुसि -१९९८, पुण्यानंद झा कृत मिथिला दर्पण १९२५; २००३ ई०, यदुवीर रचनावली १८८८-१९३४; २००३ ई०, श्री बल्लभ झा १९०५-१९४९; कृत विद्यापति विवरण -२००५, मैथिली उपन्यासमे चित्रित समाज २००३ अनुवाद लेल भाषा-भारती सम्मान २००४-५ (सी आई आई एल) मैसुर छओ बिगहा आठ कठा-फकीर मोहन सेनापतिक उड़िया उपन्यासक मैथिली अनुवाद लेल प्राप्त भेल छन्हि। पत्रिका सम्पादन आ सभ सम्पादन -: प्रयोजन १९९३ मासीक, कोषाक्षर -हिन्दी १९८२, घर-बाहर त्रिमासिक-चेतना समिति पटना। आदि।
२.२१. गजेन्द्र ठाकुर- अखियासल (केन्द्रीय मैथिली बोली)
'अखियासल' : भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त आ विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ विस्तृत आलोचनात्मक आस्वाद
-गजेन्द्र ठाकुर
प्रस्तावना : कृति, कृतिकार आ समीक्षाक प्रस्थान-बिन्दु
डा॰ रमानन्द झा 'रमण'क 'अखियासल' मैथिली साहित्यक इतिहास, कथा-विकास, आरम्भिक उपन्यास, विस्मृत साहित्यसेवी, राष्ट्रीय चेतना, गीत-काव्य, पत्रकारिता, स्तम्भ-लेखन आ आधुनिक कथाक सामाजिक सरोकारक पुनर्मूल्याङ्कन करयवला आलोचनात्मक निबन्ध-संग्रह अछि। ई संग्रह भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर सँ सन् १९९५ ई॰ मे प्रकाशित भेल आ एहिमे पचीस टा स्वतन्त्र आलोचनात्मक निबन्ध संकलित अछि। एहि सभ निबन्धक मूल प्रकाशन-स्रोत 'मिथिला मिहिर', 'मिथिलामोद', 'भाखा', 'मैथिली अकादमी पत्रिका', 'बसात', 'हालचाल', 'मैथिली प्रकाश' सन पत्र-पत्रिका आ अखिल भारतीय मैथिली साहित्य सम्मेलनक स्मारिका थिक। तात्पर्य ई जे ई कोनो एकहि बेर योजनाबद्ध रूपेँ लिखल गेल ग्रन्थ नहि, अपितु सन् १९७२ सँ लऽ कऽ १९८९ धरिक लगभग दू दशकक पत्रकारीय-आलोचनात्मक श्रमक संचयन थिक। एहि संकलनात्मक स्वरूपकेँ ध्यानमे रखने बिना एकर समुचित मूल्याङ्कन सम्भव नहि।
पोथीक आरम्भ पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुर आ 'चन्द्रप्रभा'केँ मैथिलीक आरम्भिक कथाकारिता आ कथा-संग्रहक परम्परामे प्रतिष्ठित करबाक प्रयाससँ होइत अछि आ समापन आधुनिकतम कथाकार प्रभास कुमार चौधरीपर — अर्थात् मैथिलीक पहिल कथाकारसँ लऽ कऽ समकालीन कथाकार धरि, प्रायः दुइ शताब्दीक विस्तार एहि पचीस निबन्धमे समाहित अछि। एहि दीर्घ पटलक कारणेँ 'अखियासल' मात्र समीक्षा नहि, अपितु एक प्रकारक समान्तर साहित्येतिहासक आधारशिला-प्रस्तर बनि जाइत अछि — आ इएह ओकर सभसँ पैघ मौलिकता तथा सभसँ पैघ सीमा दुनूक स्रोत थिक।
ई पोथी साहित्यक स्थापित शिखर-पुरुष सभक प्रशस्ति मात्र नहि करैत अछि। एकर मूल प्रश्न अछि — मैथिली साहित्यक इतिहासमे के स्मरणीय बनाओल गेल, के विस्मृत भेल, कोन रचना 'प्रथम' कहल गेल, कोन पाण्डुलिपि पाठक धरि नहि पहुँचल, आ साहित्यिक मान्यता निर्माणमे संस्था, पत्रिका, सम्पादक, प्रकाशक, प्रवासी केन्द्र आ सामाजिक सत्ता केहन भूमिका निभबैत रहल। कृतिक केन्द्रीय अभिप्राय स्पष्ट अछि — मैथिली गद्य आ पद्यक ओहि प्रारम्भिक तथा उपेक्षित रचनाकार लोकनिकेँ प्रकाशमे अनब, जिनका मुख्यधाराक साहित्येतिहास बिसरि गेल अथवा जिनका सम्बन्धी सामग्री 'अनुपलब्ध' रहि गेल।
'अखियासल'क पचीस अध्याय एकरेखीय इतिहासक बदला अनेक समान्तर धाराक उद्घाटन करैत अछि —
मैथिलीक आरम्भिक कथा आ उपन्यासक खोज,
विस्मृत रचनाकारक पुनर्प्रतिष्ठा,
स्वतन्त्रता-सङ्ग्राम आ मातृभाषा-जागरण,
कथा, गीत, गप्प, स्तम्भ आ पत्रकारिताक विधागत विवेचन,
नारी, गरीब, किसान, बेरोजगार युवक आ शोषित वर्गक अनुभव,
स्वतन्त्रताक बादक राजनीतिक विडम्बना,
सामाजिक संक्रमण, अस्तित्व-संकट आ नैतिक अवमूल्यन।
एहि अर्थमे 'अखियासल' आलोचना मात्र नहि, मैथिली साहित्यक अभिलेखीय पुनरुद्धार आ समान्तर इतिहास-लेखनक महत्त्वपूर्ण उपक्रम अछि।
प्रस्तुत मूल्याङ्कनमे तीन दृष्टि-प्रतिमानक एकसाथ प्रयोग कएल गेल अछि — (क) भारतीय काव्यशास्त्रीय प्रतिमान (रस, ध्वनि, वक्रोक्ति, औचित्य, रीति, अलङ्कार, साधारणीकरण, लोकमङ्गल); (ख) पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त (ऐतिहासिकतावाद आ नव-ऐतिहासिकतावाद, मार्क्सवादी समाजशास्त्रीय समीक्षा, रूपवाद, नारीवादी विमर्श, उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श, अस्तित्ववादी-मनोविश्लेषणवादी दृष्टि, पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धान्त, विखण्डनवादक हाशिया-पुनरुद्धार आ कैननक राजनीति); आ (ग) विदेह समान्तर साहित्य-आन्दोलनक समान्तर इतिहास-प्रतिमान तथा गङ्गेश उपाध्याय-मूलक नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसा, जे मुख्यधाराक कैनन-निर्माणक विरुद्ध लुप्तप्राय, हाशियाकृत आ अभिलेखहीन रचनाकारक पुनःस्थापनाकेँ अपन घोषित लक्ष्य मानैत अछि, आ जे नव्य-न्यायक 'हेत्वाभास' आ 'शब्द-प्रमाण'क उपयोग कऽ साहित्यमे निहित वैचारिक छलकेँ अनावृत करैत अछि। एहि तेसर प्रतिमानक दृष्टिसँ 'अखियासल' एक अग्रगामी पूर्व-रूप (प्रोटो-पाठ) थिक — किएक तँ रमानन्द झा जे काज १९७० सँ ८० दशकमे व्यक्तिगत श्रमसँ केने छलाह, विदेह-आन्दोलन ओकरे संस्थागत, अभिलेखीय आ जनतान्त्रिक विस्तार दैत अछि।
एहि समीक्षाक संरचना दू भागमे विभक्त अछि। पूर्वार्धमे प्रत्येक अध्यायक विशिष्ट गुण, उपलब्धि आ सैद्धान्तिक महत्त्वक विवेचन अछि; उत्तरार्ध पूर्णतः सीमा, दुर्बलता आ पद्धतिगत संकटकेँ समर्पित अछि।
आलोचनात्मक प्रतिमान
भारतीय साहित्यशास्त्रीय दृष्टि
रस — पोथीक विभिन्न अध्यायमे करुण, वीर, हास्य, शृङ्गार, भक्ति आ रौद्र रसक विवेचन भेटैत अछि। 'रामेश्वर'क भूख आ पारिवारिक विघटन करुण रस उत्पन्न करैत अछि; द्विजवरक राष्ट्रीय कविता वीर आ रौद्र रस जगबैत अछि; हरिमोहन झाक गप्प हास्य-व्यङ्ग्यक भूमि रचैत अछि; हरिलताक भजन भक्ति आ मधुर रसक धारा बहबैत अछि; आरसी आ मोहनक गीत शृङ्गार, प्रकृति आ भावमाधुर्यक अनुभव दैत अछि।
ध्वनि — अनेक रचनाक प्रत्यक्ष कथा पाछाँ अप्रत्यक्ष सामाजिक अर्थ अछि। भूख केवल भोजनक अभाव नहि, आर्थिक संरचनाक अन्याय अछि। विवाह केवल घरेलू संस्कार नहि, स्त्रीक सामाजिक स्थिति आ जातिगत प्रतिष्ठाक क्षेत्र अछि। भाषा केवल सम्प्रेषणक साधन नहि, सांस्कृतिक स्वाधीनताक प्रतीक अछि।
वक्रोक्ति — यात्रीक स्तम्भ, हरिमोहन झाक गप्प, श्यामानन्द झाक व्यङ्ग्य, ललित आ धीरेन्द्रक कथा तथा आरसीक राजनीतिक कविता वक्र कथन, विडम्बना, व्यङ्ग्य आ प्रतीकक माध्यमसँ अपन अर्थ उत्पन्न करैत अछि।
औचित्य — रमणजी बेर-बेर ई प्रश्न उठबैत छथि जे रचनाक विषय, पात्र, भाषा, शैली, काल आ विधाक बीच औचित्य अछि कि नहि। कथाकेँ उपन्यास, गप्पकेँ कथा, अनुवादकेँ मौलिक कृति अथवा प्रभावकेँ अनुवाद कहब उचित अछि कि नहि — ई सभ औचित्यक प्रश्न अछि।
साधारणीकरण — एक व्यक्तिक भूख, बेरोजगारी, विवाह-दुःख अथवा सांस्कृतिक क्षोभ तखन साहित्यिक मूल्य ग्रहण करैत अछि जखन ओ सम्पूर्ण समुदाय अथवा युगक अनुभव बनि जाइत अछि। धीरेन्द्रक कथा-विवेचनमे लेखक स्पष्ट करैत छथि जे वैयक्तिक अनुभव सामाजिक मनक अभिव्यक्ति बनलापर साहित्य सामाजिक सन्दर्भ ग्रहण करैत अछि।
लोकमङ्गल — अखियासलक आलोचना साहित्यकेँ समाजसँ पृथक नहि मानैत अछि। मातृभाषा-सेवा, स्त्रीशिक्षा, जातिविरोध, श्रमक प्रतिष्ठा, गरीबक अधिकार आ राष्ट्रीय स्वाधीनता साहित्यिक मूल्याङ्कनक महत्त्वपूर्ण आधार बनैत अछि।
पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्तक आधार
रूपवादी दृष्टि — कथानक, चरित्र-निर्माण, संवाद, वातावरण, कथा-गति, प्रतीक, पुनरावृत्ति, गीतात्मकता आ विधागत संरचनाक परीक्षण रूपवादी दृष्टिसँ कएल जा सकैत अछि।
नव-इतिहासवादी दृष्टि — प्रत्येक रचनाकेँ ओकर समयक सत्ता, संस्था, भाषा-राजनीति, स्वतन्त्रता-आन्दोलन, सामाजिक सुधार, सामन्तवाद आ आर्थिक परिवर्तनसँ जोड़िकऽ पढ़ल गेल अछि।
मार्क्सवादी दृष्टि — भूख, निर्धनता, श्रम, सामन्ती शोषण, पुलिस-प्रशासन, पूँजी, चुनाव, बेरोजगारी आ वर्ग-विभाजन अनेक अध्यायक मूल प्रश्न अछि।
नारीवादी दृष्टि — 'निर्दयी सासु', 'सुमति', 'चन्द्रग्रहण', हरिलताक भजन, कुमार गंगानन्द सिंहक कथा आ ललितक कथा-विवेचन स्त्रीक शिक्षा, विवाह, देह, इच्छा, घरेलू श्रम, विधवापन आ सामाजिक नियन्त्रणक प्रश्न उठबैत अछि।
उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि — मैथिलीपर हिन्दी आ अङ्ग्रेजीक दबाव, मातृभाषाक उपेक्षा, देवनागरीक प्रसारक राजनीति, स्थानीय भाषा-साहित्यक अधिकार आ राष्ट्रीयताक भीतर भाषिक बहुलता — ई सभ उत्तर-औपनिवेशिक विमर्शक विषय अछि।
अस्तित्ववादी आ मनोविश्लेषणवादी दृष्टि — ललित आ धीरेन्द्रक कथा-विवेचनमे निरर्थकता, एकाकीपन, बेरोजगारी, दायित्वक असह्य भार, यौनिक इच्छा, आत्मपरायापन आ सामाजिक असंगतिक विश्लेषण भेटैत अछि।
पाठक-प्रतिक्रिया दृष्टि — हरिमोहन झाक गप्प आ यात्रीक स्तम्भ-लेखनक अध्याय पाठक-समुदाय, पत्रिकाक संवादात्मकता, हास्यक लोकप्रियता आ पाठकीय रुचिक निर्माणपर ध्यान दैत अछि।
विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि आ नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसा
विदेह समान्तर इतिहासक मूल धारणा अछि जे साहित्यिक इतिहास केवल राजकीय मान्यता, पुरस्कार, विश्वविद्यालय आ प्रसिद्ध लेखकक इतिहास नहि होइत अछि। ओहि इतिहासमे निम्न सभक समान अधिकार अछि —
दुर्लभ पाण्डुलिपि,
अप्रसारित पोथी,
स्थानीय पत्र-पत्रिका,
ग्रामीण रचनाकार,
मातृभाषा-सेवी,
विस्मृत सम्पादक,
आर्थिक अभावमे लिखैत कवि,
स्त्री-पात्रक मौन,
किसान आ मजदूरक पीड़ा,
भाषिक पराधीनता,
मिथिला आ प्रवासक सांस्कृतिक सम्बन्ध।
मैथिली साहित्यक इतिहास सदिखन एकटा वैचारिक संघर्षक क्षेत्र रहल अछि। एक दिस 'मुख्यधाराक परम्परा' अछि, जे शास्त्रीय सन्तुलन, संस्थागत मान्यता, ब्राह्मणवादी आभिजात्य आ अतीतकेँ परिमार्जित कऽ प्रस्तुत करबापर केन्द्रित रहल अछि, तँ दोसर दिस 'विदेह समान्तर परम्परा' अछि, जे जनमानसक धड़कैत हृदय, शोषित-वञ्चितक प्रतिरोध आ यथार्थवादी चित्रणसँ जुड़ल अछि। नव्य-न्यायक 'शब्द-प्रमाण' सिद्धान्तक अनुसार सत्य ओतय खण्डित होइछ जतय प्रमाणकेँ दबा देल जाइछ — जेना दूषण पञ्जीक छुपायब; आ 'हेत्वाभास'-विवेचनसँ साहित्यमे निहित तार्किक दोष आ वैचारिक छल अनावृत होइत अछि। 'अखियासल'क प्रधान उपलब्धि ई अछि जे ओ मैथिली साहित्यक मुख्य सड़कक बगलमे दबाओल अनेक पदचिह्नकेँ पुनः दृश्य बनबैत अछि।
पूर्वार्ध : अध्यायवार उपलब्धि आ आलोचनात्मक आस्वाद
१. मैथिलीक पहिल कथाकार पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुर आ 'चन्द्रप्रभा'
संग्रहक प्रथम निबन्ध एक प्रकारेँ समस्त कृतिक बीजाध्याय थिक। ई अध्याय मैथिली कथा-साहित्यक आरम्भ-बिन्दु सम्बन्धी प्रचलित धारणाकेँ संशोधित करैत अछि। रमानन्द झा एहिठाम 'प्रथम'क अन्वेषणकेँ आलोचनात्मक कर्मक रूपमे प्रतिष्ठित करैत छथि — "कथा विकासक मार्ग पर सर्वप्रथम कोन मैथिली सेवी अग्रसर भेलाह, तकर अनुसंधान।" ई घोषणा-वाक्य पूर्ण संग्रहक पद्धतिगत घोषणापत्र थिक।
पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुरक जन्म १७५० ई॰ मे खण्डवलाकुलमे भेल छल; ओ सर्वसीमा निवासी पं॰ महेश्वर ठाकुरक पुत्र छलाह आ हुनक निधन १८२२ ई॰ मे भेल। हुनक ग्रन्थसभमे 'मिथिला तीर्थप्रकाश', 'नारी धर्मप्रकाश', 'शूद्र विवाह पद्धति', 'वैतरणीदानम्', 'शुद्ध निर्णय' आ 'शिवपूजा प्रदीपिका' प्रमुख अछि। हुनका मैथिलीक पहिल कथाकार आ 'चन्द्रप्रभा'केँ पहिल कथाकृति सिद्ध करबाक हेतु समीक्षक वंशावली, तिथि, गुरु-शिष्य-परम्परा आ खण्डनात्मक प्रमाण — जयकान्त मिश्रक 'चन्द्रभागा' नामकरणक भ्रम-निवारण — सभक सहारा लैत छथि। 'चन्द्रभागा'क बदला 'चन्द्रप्रभा' नामक ई शुद्धिकरण आलोचनाक अभिलेखीय सावधानी देखबैत अछि।
लेखक 'चन्द्रप्रभा'केँ उन्नैसम शताब्दीक मैथिली गद्यक नमूना तथा आरम्भिक कथा-संग्रहक रूपमे स्थापित करैत छथि। पाण्डुलिपि जीर्ण छल, कृतिक किछुए अंश उपलब्ध रहल आ एकर प्रकाशन लेखकक निधनक बहुत वर्ष बाद सन् १९३९ मे भेल। 'चन्द्रप्रभा'क संरचना गुरु-शिष्य संवाद आ एक कथासँ दोसर कथा निकलबाक पद्धतिपर आधारित अछि; एहिमे गुरु-शिष्या संवादक माध्यमसँ नीतिवचनक समर्थन कएल गेल अछि, जाहिमे प्राचीन गद्य-शैलीक उत्कृष्ट निदर्शन भेटैछ। एहि दृष्टिसँ एकर सम्बन्ध पञ्चतन्त्र, विद्यापतिक 'पुरुष-परीक्षा' आ संस्कृतक आख्यान-उपाख्यान-परम्परासँ जुड़ैत अछि — ई शुद्ध शास्त्रीय परम्परा-अन्वितिक दृष्टि थिक। कथा सभ शिक्षाप्रद, घटनाप्रधान आ नैतिक निष्कर्षवाली अछि।
भारतीय औचित्य-दृष्टिसँ एकर महत्त्व कथानकक जटिलतामे नहि, आरम्भिक मैथिली गद्यक ऐतिहासिक भूमिकामे अछि। पाश्चात्य दृष्टिसँ ई उद्गम-अन्वेषण थिक, जे ऐतिहासिकतावादी समीक्षाक केन्द्रीय प्रवृत्ति छी। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ ई अध्याय सभसँ महत्त्वपूर्ण अछि — किएक तँ 'चन्द्रप्रभा'क "अनुपलब्धता"केँ समीक्षक स्वयं रेखाङ्कित करैत छथि, आ दुर्लभ पाण्डुलिपि, सम्पादक आ प्रकाशकक श्रमकेँ साहित्यिक इतिहासक अङ्ग बनबैत छथि। हाशियाकृत, अभिलेखहीन, लुप्त-पाठक पुनःस्थापना — इएह समान्तर इतिहासक मूल-मन्त्र थिक, आ रमानन्द झा एकर पहिल घोष एतय करैत छथि।
२. मैथिलीक प्रथम उपन्यासकार पं॰ जीवछ मिश्र आ 'रामेश्वर'
लेखक 'रामेश्वर'केँ सन् १९१६ मे मिथिला प्रिंटिंग वर्क्स, मधुबनी सँ प्रकाशित मैथिलीक प्रथम मौलिक उपन्यास मानैत छथि। पं॰ जीवछ मिश्रक जन्म १८६३ ई॰ मे भेल छल; पिताक असामयिक निधनक कारणेँ हुनक शिक्षा बाधित भेल, तथापि ओ संस्कृत, मैथिली, हिन्दी आ उर्दूक गहन अध्ययन कएलनि। हुनक जीवन, साहित्यिक प्रेरणा आ मातृभाषाक प्रति प्रतिबद्धताकेँ विस्तारसँ प्रस्तुत कएल गेल अछि — हिन्दी-विस्तारवादक विरुद्ध प्रतिरोध आ 'मैथिल महासभा'क वंशानुगत नेतृत्वक विरोध, ई सभटा वस्तुतः औपनिवेशिक-कालीन भाषिक अस्मिता-संघर्षक जीवन्त दस्तावेज थिक।
उपन्यासक केन्द्रमे भूख, श्राद्धक आडम्बर, ऋण, पुलिस-प्रशासनक अत्याचार, झूठ अभियोग, कारावास, पारिवारिक विघटन आ अपराधक सामाजिक उत्पत्ति अछि। रामेश्वर अपन पिताक श्राद्धक लेल कर्ज लैत अछि, घर-घराड़ी बेचयपर विवश होइत अछि, आ अन्ततः पुलिसक प्रताड़नासँ क्षुब्ध भऽ डकैत बनि जाइछ; ओकर पत्नी पार्वती कमलामे कूदि आत्महत्याक प्रयास करैत अछि। रामेश्वर जन्मजात अपराधी नहि; आर्थिक विवशता, सामन्ती सत्ता आ प्रशासनिक छल हुनका अपराधक बाटपर धकेलैत अछि। मार्क्सवादी दृष्टिसँ रामेश्वरक अपराध वास्तवमे वर्गीय शोषणक परिणाम अछि। करुण रसक निर्माण उपन्यासक आरम्भिक दृश्यसँ होइत अछि — श्राद्धक बाद फेकल भोजनपर कुकुर सभ टूटि पड़ैत अछि आ भूखल बालक दूरसँ देखैत रहैत अछि। लेखकक अनुसार संवाद सरल आ स्वाभाविक अछि तथा वातावरण-निर्माण प्रभावकारी।
मार्क्सवादी-नवऐतिहासिकतावादी दृष्टिसँ ई निबन्ध कृतिक सर्वश्रेष्ठ अध्याय-मध्ये एक थिक। समीक्षक 'रामेश्वर'केँ मात्र सौन्दर्यशास्त्रीय वस्तु नहि, अपितु सत्ता-संरचना — राज दरभंगा, मैथिल महासभा, हिन्दी साहित्य परिषद — क विरुद्ध ठाढ़ भेल प्रतिरोधी पाठक रूपमे व्याख्यायित करैत छथि। जीवछ मिश्रक निर्भीकता आ 'मठाधीशक षड्यन्त्रक भण्डाफोड़' — ई नव-ऐतिहासिकतावादक शक्ति-प्रवचन-विश्लेषणसँ अद्भुत रूपेँ मेल खाइत अछि। विदेह समान्तर इतिहासक दृष्टिसँ 'रामेश्वर' राजदरबारक नहि, भूखल ग्रामीण परिवारक इतिहास लिखैत अछि — यथार्थवादक ई विदारक प्रस्तुति मैथिली गद्यक स्वर्ण-शिखर थिक।
३. रासबिहारी लाल दास आ उपन्यास 'सुमति'
'सुमति' (१९१८ ई॰) मैथिलीमे आधुनिक उपन्यासक विधा स्थापित करबाक आरम्भिक प्रयास अछि। लेखक रासबिहारी लाल दासक साहित्यिक अभाव-बोध, 'मिथिला दर्पण'सँ सम्बन्ध आ मातृभाषामे उपन्यास देबाक संकल्पकेँ रेखाङ्कित करैत छथि। समाजमे व्याप्त अपव्यय, दहेज आ प्रदर्शनकारी प्रवृत्तिक कारणेँ परिवारक कोना पतन होइछ, आ एक सुशिक्षिता नारी सुमति कोना अपन बुद्धिसँ खसैत घरकेँ सम्हारैत अछि, ई एहि उपन्यासक मूल स्वर थिक। सहेलोला बाबू आ मनोरथ लाभक बीच सिद्धान्त-विवाहक प्रसङ्ग, कर्ज लऽ कऽ बरियातीक स्वागत, आ अन्ततः सम्पूर्ण सम्पत्तिक विनाशक जे सजीव चित्रण अछि, ओ सामाजिक यथार्थवादक प्रखर उदाहरण थिक। सुमति सासुर अबितहि अपन गहना बेचि परिवारकेँ ऋणमुक्त करैत अछि आ समाजक लेल एकटा आदर्श स्थापित करैत अछि।
अध्याय पूर्ववर्ती इतिहासकारक मतकेँ सेहो समाहित करैत अछि। जयकान्त मिश्र कथानक-विन्यास, चरित्र-निर्माण आ कथन-कौशलकेँ अपरिपक्व मानैत छथि, मुदा विषयकेँ मैथिली उपन्यास लेल उपयुक्त स्वीकारैत छथि; राधाकृष्ण चौधरी एकरा आधुनिक मैथिली उपन्यास-लेखनक पहिल सफल प्रयास कहैत छथि। एहि निबन्धक एकटा विशेष शक्ति अन्तर्पाठीयताक सूक्ष्म बोधमे अछि — 'सुमति'मे हिन्दी कविताक प्रयोगकेँ जीवछ मिश्र 'मैथिली भाषा आ कविक अक्षमताक द्योतक' मानने रहथि, आ रमानन्द झा एहि समकालीन आलोचनात्मक संवादकेँ उद्घाटित करैत छथि। इएह आलोचना-क-आलोचना एहि निबन्धकेँ सैद्धान्तिक गहराइ दैत अछि। भारतीय औचित्य-सिद्धान्तक दृष्टिसँ हिन्दी-पद्यक मैथिली-गद्यमे प्रयोग भाषा-औचित्य-भङ्ग थिक — रमानन्द झा एहि दोषकेँ 'शैलीजन्य शिथिलता' कहि स्वीकार करैत छथि, तथापि सामाजिक जागरणक युग-स्वरकेँ प्रधान मानि कृतिकेँ महत्त्वपूर्ण घोषित करैत छथि। ई मूल्याङ्कन-सन्तुलन — दोष-स्वीकृति संगहि ऐतिहासिक-सामाजिक महत्त्वक रक्षा — समीक्षकक परिपक्वताक परिचायक थिक।
औचित्य-दृष्टिसँ अध्याय ऐतिहासिक महत्त्व आ कलात्मक सिद्धि बीच भेद करैत अछि। कोनो कृति 'प्रथम' भऽ सकैत अछि, मुदा केवल प्रथम होयबाक कारण कलात्मक रूपसँ पूर्ण नहि बनि जाइत अछि। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ 'सुमति' विधागत संक्रमणक दस्तावेज अछि — नीति-आख्यानसँ आधुनिक सामाजिक उपन्यास धरि बढ़ैत मैथिली गद्यक अस्थिर, मुदा महत्त्वपूर्ण डेग।
४. जनार्दन झा 'जनसीदन' आ 'निर्दयी सासु'
ई अध्याय विवाह-व्यवस्था, घटक, कन्यापक्ष, सासु-पुतोहु सम्बन्ध आ घरेलू स्त्री-उत्पीड़नकेँ कथा-विवेचनक केन्द्रमे आनैत अछि। जनसीदन (१८७२–१९५१)क 'निर्दयी सासु' सन् १९१४ ई॰ मे 'मिथिला मिहिर'मे धारावाहिक रूपेँ प्रकाशित भेल; एकर कथावस्तु सामाजिक घटनापर आधारित अछि आ चित्रण एतेक स्वाभाविक अछि जे घटना पाठकक सोझाँ घटैत प्रतीत होइत अछि। एहिमे सासु अनूपरानी आ ननदिक अत्याचार सहैत मूक नारी शारदाक कारुणिक चित्रण भेल अछि, जे तत्कालीन समाजमे स्त्री-शिक्षाक विरोध आ पितृसत्तात्मक क्रूरताकेँ प्रमाणित करैत अछि। ज्योतिषी चिन्तामणि झा द्वारा शारदाकेँ शिक्षित करब आ परिपाटी-विरोधी कन्यादान, तथा अनूपरानी द्वारा ओकर विरोध — वस्तुतः प्राचीन आ नवीन जीवन-मूल्यक द्वन्द्व थिक, जकरा समीक्षक 'प्रखर सामाजिक चेतनाक प्रतिफल' कहैत छथि।
जनसीदनक 'शशिकला', 'कलियुगी संन्यासी' आदिक विवेचनमे समीक्षक विधा-विवादकेँ — हरिमोहन झा 'निर्दयी सासु'केँ 'प्रहसन' कहलनि, आन 'उपन्यास' — सुन्दर ढंगेँ प्रस्तुत करैत छथि। मुख्य उपलब्धि ई जे रमानन्द झा जनसीदनक व्यक्तित्वक प्रखरता-सम्बन्धी अपन प्रारम्भिक सन्देहकेँ उपलब्ध साहित्यक विश्लेषणसँ स्वयं संशोधित करैत छथि — सामाजिक-सुधारवादी चेतनाक आलोकमे व्यक्तित्व प्रखर भेटैत छनि। ई आत्म-संशोधनकारी आलोचना-पद्धति कृतिक बौद्धिक ईमानदारीक प्रमाण थिक।
नारीवादी दृष्टिसँ कथा घरेलू सत्ताक जटिल रूप उद्घाटित करैत अछि। स्त्री केवल पुरुषद्वारा नहि, पितृसत्तात्मक संस्कार ग्रहण कएने दोसर स्त्रीद्वारा सेहो प्रताड़ित होइत अछि; सासु स्वयं व्यवस्थाक उत्पाद होइतहुँ पुतोहुपर व्यवस्थाक प्रतिनिधि बनि जाइत छथि। करुण रसक स्रोत नवविवाहिताक असहायता अछि। ध्वनि-सिद्धान्तसँ देखलापर विवाहक उत्सवक पाछाँ कन्याक आर्थिक मूल्याङ्कन, परिवारक प्रतिष्ठा आ पितृसत्तात्मक नियन्त्रणक कठोर इतिहास सुनाइत अछि। मार्क्सवादी दृष्टिसँ 'मिथिलाक समाजकेँ कोला-कोलामे बाँटि शोषण करैत' व्यवस्थाक विरुद्ध शंखनादक रूपमे एकर पाठ वर्ग-चेतना आ सामाजिक अन्तर्विरोधक साहित्यिक अभिव्यक्तिक उत्तम उदाहरण थिक।
५. पं॰ जनार्दन झा — एक बिसरल साहित्यसेवी
एहि लघु किन्तु सैद्धान्तिक दृष्टिसँ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण निबन्धमे रमानन्द झा अपन समस्त आलोचनात्मक परियोजनाक सैद्धान्तिक आधार प्रस्तुत करैत छथि — 'दू कोटिक साहित्यकार'क सिद्धान्त। पहिल कोटिक (विद्यापति सन) रचनाकार ततेक व्यापक होइत छथि जे दोसर कोटिक रचनाकारकेँ आच्छादित कऽ दैत छथि, आ कालान्तरमे लोक हुनका बिसरि जाइत अछि। गङ्गा-कोशीक विशाल जल आ गाम-गामकेँ जोड़निहार छोट धारक स्थानीय महत्त्वक रूपक एहि सिद्धान्तकेँ अविस्मरणीय बनबैत अछि — इतिहासक वास्तविक नदीमे केवल विशाल प्रवाह नहि, छोट-छोट धार सेहो जल दैत अछि, आ पं॰ जनार्दन झा ओहि अदृश्य धाराक प्रतिनिधि छथि।
लेखकक तर्क अछि जे साहित्यक मुख्य धारा केवल प्रसिद्ध लेखकसँ नहि, अनेक स्थानीय आ 'दोसरा पाँति'क साहित्यसेवीक निरन्तर श्रमसँ बनैत अछि। पं॰ जनार्दन झाक रचना दुर्लभ भेला कारण हुनकर नाम इतिहाससँ लगभग लुप्त भऽ गेल। 'जानकी परिणय' सन खण्डकाव्यमे अकाल, जनकपुर, सीताजन्म, धनुषभङ्ग आ विवाह-संस्कारक चित्रण अछि; भाषिक सरलता, मौलिकता आ सांस्कृतिक विवरण एकरा साहित्येतिहासक उपयोगी सामग्री बनबैत अछि।
ई सिद्धान्त पाश्चात्य कैनन-निर्माण आ साहित्यिक-आर्थिकीक सिद्धान्तसँ आश्चर्यजनक रूपेँ साम्य रखैत अछि। रमानन्द झा जे कहैत छथि — प्रकाशनक अभाव, अनियतकालीन पत्रिका आ सर्वसुलभताक अभाव बहुतो रचनाकारकेँ प्रकाशसँ वञ्चित कऽ देलक — ई विदेह समान्तर इतिहास-प्रतिमानक केन्द्रीय अभिकल्पना थिक। सत्य कहल जाए तँ ई पूरा निबन्ध विदेह-आन्दोलनक पूर्व-घोषणापत्र थिक।
६. पं॰ त्रिलोचन झा, बेतिया — बिसरल मातृभाषानुरागी
त्रिलोचन झा (१८७८–१९३८ ई॰) अनुवादक, कवि, कथाकार-आख्यानलेखक, जीवनीकार, निबन्धकार, सामाजिक कार्यकर्ता आ संस्थापक व्यक्तित्वक रूपमे प्रस्तुत छथि। हुनकामे अपूर्व संगठन-शक्ति छल; 'सुबोधिनी सभा' आ मैथिली-आन्दोलनक संगठनात्मक इतिहासकेँ ई निबन्ध उद्घाटित करैत अछि। ओ मातृभूमि-वन्दना आ अतीत-गानक माध्यमसँ सुप्त मैथिल समाजकेँ जगाबय चाहलनि — "चण्डि तोहर मिथीला देश" जकाँ हुनक पङ्क्तिसभ जनमानसमे ऊर्जाक सञ्चार कएलक। ओ 'श्रीमद्भगवद्गीतादर्श' नामसँ गीताक मैथिली पद्यानुवाद सेहो कएलनि, जे हुनक प्रखर गवेषणात्मक दृष्टिक परिचायक अछि।
हुनकर लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकामे बिखरल रहने समग्र मूल्याङ्कन कठिन भेल — 'बड़ कम सामग्री उपलब्ध अछि', ई समीक्षक स्वयं बेर-बेर स्वीकार करैत छथि — मुदा उपलब्ध सामग्री मातृभाषा आ साहित्यक प्रति गाढ़ अनुराग प्रमाणित करैत अछि। हुनकर दृष्टिमे भाषा आ साहित्य समाजक प्रगतिक आधार छल। ओ मैथिल समाजक आलस्य, आत्मकेन्द्रितता आ सांस्कृतिक उदासीनताकेँ ललकारैत छलाह तथा मिथिलाक प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त करबाक सामूहिक दायित्वक बोध करबैत छलाह। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टिसँ मातृभाषा-सेवा राजनीतिक स्वाधीनताक विस्तार अछि — भाषा-विहीन स्वराज अधूरा स्वराज अछि। एहिठाम सामग्रीक अभावक स्वीकृतिमे समान्तर इतिहास-लेखनक मूल संकट — अभिलेख-दारिद्र्य — प्रत्यक्ष होइत अछि।
७. राष्ट्रीय चेतनाक पुरोधा कवि यदुनाथ झा 'यदुवर'
यदुवर (१८८८–१९३५ ई॰) 'मिथिला गीताञ्जलि' (१९२३)क माध्यमसँ राष्ट्रीय स्वाधीनता-संग्रामक चेतनाकेँ मैथिली काव्यमे स्थापित कएलनि। हुनकर कविता मिथिला, मैथिली आ भारतीय राष्ट्रीयताक संयुक्त स्वर अछि। ओ पुरान परम्पराकेँ तोड़ि राष्ट्रीय कार्यक सूत्रपात कएलनि आ संगीतक रागपाशसँ मैथिली कविताकेँ सर्वप्रथम मुक्त कएलनि। हुनक 'मैथिली साहित्य दिग्दर्शन' मैथिलीक प्रथम अनुसन्धानपरक निबन्ध मानल जाइछ, जाहिमे ओ साहित्यक समग्र लेखा-जोखा प्रस्तुत कएलनि अछि।
यदुवरकेँ 'राष्ट्रीय चेतनाक पुरोधा' घोषित करैत रमानन्द झा एक विशिष्ट स्थापना करैत छथि — 'कवीश्वर चन्दा झासँ चलल देश-कालसँ जुड़बाक प्रवृत्तिपरसँ धार्मिक लेप पोछि राष्ट्रीय आ देशोत्थान-विषयक रचनाक सुदृढ़ परिपाटी यदुवरक रचनासँ प्रारम्भ भेल।' 'धार्मिक लेप पोछब' — ई पदावली साहित्यिक प्रवृत्तिक धर्मनिरपेक्षीकरणक सूक्ष्म ऐतिहासिक बोधकेँ प्रकट करैत अछि आ नव-ऐतिहासिकतावादी प्रवृत्ति-रेखाङ्कनक उत्तम नमूना थिक।
ओ शिक्षित मैथिल समाजक मातृभाषा-विमुखता, आलस्य आ बाह्य भाषिक प्रभुत्वक विरुद्ध जागरणक आह्वान करैत छथि। हुनकर काव्यक वीर रस युद्धक्षेत्रक मात्र नहि, भाषिक-सांस्कृतिक संघर्षक वीर रस अछि। मातृभाषामे लिखब, साहित्य प्रकाशित करब आ मैथिल समाजकेँ जगायब हुनका लेल राष्ट्रसेवा छल। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टिसँ यदुवर भाषाक हीनताबोधकेँ औपनिवेशिक मानसिकताक परिणाम मानैत छथि। विदेह समान्तर इतिहासमे हुनकर कविता राजनीतिक आन्दोलनक समानान्तर चलैत भाषिक स्वाधीनता-आन्दोलनक दस्तावेज बनैत अछि।
८. कवि-सेनानी छेदी झा 'द्विजवर'
अध्याय — मैथिली साहित्यकार सभ राष्ट्रीय चेतनासँ पृथक छलाह — एहि सामान्य आरोपक खण्डन करैत अछि। द्विजवरक जन्म १८९३ ई॰ मे सहरसाक वनगाँवमे भेल छल। ओ केवल राष्ट्रीय कविता लिखनिहार नहि, गान्धीजीक आह्वानपर सरकारी सेवा छोड़ि स्वतन्त्रता-सङ्ग्राममे सक्रिय भाग लेनिहार कवि-सेनानी छलाह आ चारि बेर जेल गेलाह। यदुवर आ द्विजवरक तुलना करैत समीक्षक एक सूक्ष्म भेद स्थापित करैत छथि — यदुवर सरकारी सेवक रहबाक कारणेँ मात्र साहित्यिक स्तरपर सक्रिय, जखन कि द्विजवर सरकारी सेवाकेँ त्यागि राजनीति आ साहित्य दुनू स्तरपर सक्रिय। 'एकहि व्यक्तिमे सर्जनात्मक प्रतिभा आ आन्दोलनात्मक क्षमताक संगम'केँ 'बिरल घटना' कहब — ई मूल्याङ्कन साहित्य आ कर्मक अद्वैतकेँ प्रतिष्ठित करैत अछि, जे प्रतिबद्ध-साहित्यक अवधारणासँ मेल खाइत अछि।
स्वदेशी, चरखा, आर्थिक स्वतन्त्रता आ ग्रामजीवन हुनकर राष्ट्रीयताक आधार अछि — 'चरखा चौमासा' जकाँ कवितामे स्वदेशी आन्दोलनक गूँज स्पष्ट सुनल जा सकैछ। राष्ट्र हुनका लेल अमूर्त सत्ता नहि, गाम-घर, नदी, खेत, मनुष्य आ प्रकृतिक संयुक्त जीवन अछि। हुनक रचना 'छूतहर' समाजक अस्पृश्यता आ सामन्ती क्रूरताक विरुद्ध प्रहार थिक — "अस्पृश्य भेलहुँ कै कोन पाप? मृतिका एक एके कुम्हार" — ई पङ्क्ति सामाजिक विषमतापर प्रखर प्रहार करैत अछि आ हुनक कवितामे वञ्चित वर्गक स्वर स्पष्ट अछि। वीर रसक सङ्ग करुण आ रौद्र रसक मेल हुनकर कविताकेँ प्रचार-पदसँ ऊपर उठबैत अछि। विदेह समान्तर इतिहासमे द्विजवर साहित्य आ राजनीतिक कर्मक मध्यक कृत्रिम विभाजन तोड़ैत छथि।
९. कुमार गंगानन्द सिंहक कथा-संवेदना
कुमार गंगानन्द सिंहक कथा-यात्रा दीर्घ काल (१९२४–१९६५) धरि पसरल अछि। 'मनुष्यक मोल', 'विवाह', 'बिहाड़ि', 'पण्डितपुत्र', 'पञ्च परमेश्वर', 'आमक गाछी' आदि कथामे सामाजिक सुधार, विवाह-कुरीति, अस्पृश्यता, शिक्षा आ ग्रामजीवनक समस्या उठाओल गेल अछि। 'मनुष्यक मोल'मे एक बाल-विधवाक आत्महत्याक कारुणिक यथार्थ अछि; 'बिहाड़ि'मे अछूतोद्धारक चेतना अछि, जतय शोषित वर्ग बाबू-भैयाक बेगारी करबासँ मना कऽ हड़ताल करैत अछि। लेखक हुनकर कथा-विधिक महत्त्व एहि बातमे देखैत छथि जे ओ पुराण अथवा धर्मग्रन्थसँ कथावस्तु नहि लैत, अपन समकालीन समाजसँ लैत छथि — उपाख्यानक उपदेशात्मक परम्परासँ हटि समाजक जीवित विकृतिपर प्रहार करब हुनकर उपलब्धि अछि।
एहि निबन्धमे रमानन्द झा 'अनुभूति-अभिव्यक्ति-सत्य-सम्प्रेषण'क शृङ्खला स्थापित करैत छथि — 'अनुभूतिक अभिव्यक्तिमे सत्यक सम्प्रेषण रहैछ, सत्यक सम्प्रेषणमे जीवन आ परिवेशक यथार्थ व्यञ्जित रहैछ।' ई 'व्यञ्जना'-पद प्रत्यक्षतः आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धान्तक स्मरण करबैत अछि — साहित्यक सार्थकता वाच्यार्थमे नहि, व्यङ्ग्यार्थमे अछि। संगहि 'काल-प्रवाहमे प्रमाणित होएब'क कसौटी कालातीत-मूल्यक अवधारणासँ मेल खाइत अछि। 'मनुष्यक मोल' आ 'विवाह'क कर्तृत्व-विवाद (जयकान्त मिश्र आ श्रीश एकरा 'भोल'क रचना मानने रहथि)क समाधान करैत रमानन्द झा भाषा-प्रयोगक समाजशास्त्रीय पाठ प्रस्तुत करैत छथि — 'बिहाड़ि' कथामे रौदी-कामातिक हिन्दी-मिश्रित बोली 'अशिक्षितपर अन्य भाषाक प्रभाव'केँ व्यञ्जित करैत अछि। ई भाषिक-यथार्थवादक सूक्ष्म आलोचनात्मक बोध थिक।
स्त्री-पात्र, बालविवाह, विधवापन आ घरेलू उत्पीड़नक चित्रण करुण रस उत्पन्न करैत अछि। कथा-भाषा सरल, लोकानुकूल आ विनोदपूर्ण अछि। 'आमक गाछी' सन छोट कथामे अनावश्यक विस्तारक अभाव आ रहस्यपूर्ण अन्त आधुनिक कथाक निकट लैत अछि।
१०. कवीश्वरी हरिलताक वैष्णवता
एहि निबन्धक विशिष्टता ई जे रमानन्द झा एक स्त्री-रचनाकार — कवीश्वरी हरिलता (मोदवती, जन्म १९०३ ई॰) — क साहित्य-साधनाकेँ प्रकाशमे अनैत छथि, जे विदेह समान्तर इतिहासक लैङ्गिक पुनरुद्धारक अग्रगामी सङ्केत थिक। हरिलताक जीवन-वृत्त — मात्र चारि वर्षक अवस्थामे विवाह, अल्पवयमे वैधव्य आ पतिक विक्षिप्तता, 'स्त्रीगण लेल पढ़ब निषिद्ध छलैक' तथापि 'सासु आदिसँ चोरा कऽ अक्षर सिखब' — ई सभटा नारी-अस्मिताक संघर्ष-गाथा थिक।
हुनक 'भजनमालिका' (१९३७ ई॰) वैष्णव सगुण भक्तिक उत्कृष्ट निदर्शन अछि। भक्ति-काव्यशास्त्रीय दृष्टिसँ रमानन्द झा हरिलताक 'निराकारकेँ अप्राप्त मानि सगुण-आराधना'केँ वैष्णव-परम्पराक अनुरूप सिद्ध करैत छथि — पलनामे झूलैत, अँगनामे ठुमुकैत, वृन्दावनमे गाय चरबैत सगुण-कृष्णक चित्रण 'श्रुति-मधुरता आ रस-प्रचुरता'सँ युक्त। हुनक गीतमे भक्तिक छओ अङ्ग — आनुकूल्य-संकल्प, प्रातिकूल्य-वर्जन, रक्षण-विश्वास, गोप्तृत्व-वरण, आत्मनिक्षेप, कार्पण्य — आ माधुर्य रस प्रवाहित अछि। बाल-वैधव्यक असह्य पीड़ाकेँ ओ कृष्ण-भक्तिक मधुर रसमे रूपान्तरित कऽ देलीह। ई भक्ति-रस आ वात्सल्य-रसक शास्त्रीय विवेचन थिक।
११. कविवर श्यामानन्द झाक काव्य-वस्तु
लेखक श्यामानन्द झाक काव्यकेँ राष्ट्रीय, सामाजिक, सांस्कृतिक आ व्यावहारिक चारि वर्गमे पढ़ैत छथि आ 'युग-सचेत कवि'क अवधारणा प्रस्तुत करैत छथि। कविक आक्रोश व्यक्तिगत नहि, तत्कालीन राजनीतिक पराधीनता, आर्थिक असमानता, भाषिक अपमान आ सामाजिक उदासीनतासँ उत्पन्न अछि — 'जरि जाय जेँ जजाते करिते पटाय की हो' सन आक्रोशक पाछाँ तात्कालिक परिवेशक कारुणिक स्थिति अछि। गान्धी-युगीन राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक पतनक विरुद्ध सामन्ती वर्गक उदासीनता — 'कोउ नृप होहिं हमे का हानी' — क तीक्ष्ण व्यङ्ग्यात्मक चित्रण भेटैत अछि।
हुनकर कविता भारतीय स्वाधीनता, मैथिलीक रक्षा, आर्थिक समानता, सामाजिक जागरण आ सांस्कृतिक पुनरुत्थानक आह्वान करैत अछि। ओ अङ्ग्रेजी आ हिन्दीक अन्धभक्त उच्च वर्गपर व्यङ्ग्य करैत लिखैत छथि जे लोक अपन भूषण-वसनकेँ छोड़ि विद्यापतिक नामसँ कान छिपबैत अछि आ "टोप ओ नेकटाय"पर लोट-पोट रहैत अछि — ई सांस्कृतिक दासताक विरुद्ध उद्घोष थिक। 'देश सेवा हित छदामो बाहर होएब दुर्लभ ... सोम होथि छदाम लय' — ई विदग्ध व्यङ्ग्य कुन्तकक वक्रोक्ति-सिद्धान्तक वाक्य-वक्रताक प्रमाण थिक। रस-दृष्टिसँ एहिमे करुण आ वीरक सङ्ग सामन्ती वृत्तिक प्रति बीभत्स-भावक सामञ्जस्य अछि; मार्क्सवादी दृष्टिसँ ई पूँजी-केन्द्रीकरण आ वर्ग-विषमताक प्रत्यक्ष साहित्यिक आलोचना थिक। गरीबी, वस्त्र, भोजन, आवास आ पारिवारिक भारक वर्णन हुनकर सामाजिक दृष्टिक प्रमाण अछि।
हुनक 'मैथिल सन्देश' आ 'मैथिली गीत-चन्द्रिका'मे राष्ट्रप्रेम आ लोक-संस्कृतिक समन्वय अछि। व्यावहारिक गीतमे सोहर, नामकरण, उपनयन, विवाह, कोबर, समदाउन आ अन्य संस्कारक समावेश लोकजीवनक काव्यात्मक अभिलेख रचैत अछि। शृङ्गार, हास्य, भक्ति आ लोकरीतिक समन्वय हुनकर काव्य-वस्तुकेँ व्यापक बनबैत अछि।
१२. बाबू लक्ष्मीपति सिंह आ मैथिली पत्रकारिता
एहि निबन्धमे रमानन्द झा साहित्य-समीक्षाक सीमा लाँघि पत्रकारिता-इतिहासक क्षेत्रमे प्रवेश करैत छथि। लक्ष्मीपति सिंह (१९०७–१९७२)केँ लेखक साहित्यकार, सम्पादक, प्रकाशक, संस्कृतिकर्मी आ मैथिली पत्रकारिताक संस्थापक-पुरुषक रूपमे देखैत छथि — 'एक विधामे बान्हल नहि, एक भाषामे नहि'। पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुरक शिष्यत्वसँ प्राप्त साहित्य-सर्जनाक मन्त्रकेँ ओ जीवनभरि मातृभाषा-सेवामे लगौलनि आ प्रवासी-मैथिलकेँ मिथिलासँ जोड़बाक आजीवन प्रयास कएलनि।
हुनकर योगदान केवल अपन लेखन धरि सीमित नहि। दुर्लभ रचनाक सम्पादन, प्रकाशन, लेखकक प्रोत्साहन आ पत्रिकाक माध्यमसँ पाठक-समुदायक निर्माण मैथिली सार्वजनिक क्षेत्रक विकासक आधार बनल। ओ मैथिली पत्रकारिताकेँ राजनीतिक आ आर्थिक दासतासँ मुक्त कऽ आत्मनिर्भर बनेबाक वकालत कएलनि आ स्पष्ट कएलनि जे मैथिलीक पत्र-पत्रिका केवल साहित्यिक एकाधिकार नहि, अपितु समाचार आ जन-सरोकारक माध्यम होएबाक चाही। निबन्धक अन्तिम अंश मैथिली समाचार-पत्रक भविष्य-सम्बन्धी दूरदर्शी विश्लेषण थिक — विज्ञापन, संवाददाता-प्रतिनिधित्व, सम्पादकीय नीति आ पाठक-आधारक अभावमे मैथिलहुकेँ आन भाषाक पत्रपर निर्भर रहबाक विवशता। ई मीडिया-समाजशास्त्रीय अन्तर्दृष्टि अपन युगसँ आगाँ थिक।
पाठक-प्रतिक्रिया दृष्टिसँ पत्रकारिता लेखक आ पाठकक बीच जीवित संवाद स्थापित करैत अछि। विदेह समान्तर इतिहासमे सम्पादक साहित्यक पार्श्व-पात्र नहि, स्मृति आ पाठकत्वक निर्माता छथि।
१३. कविचूड़ामणि मधुपक गीत-साहित्य
काशीकान्त मिश्र 'मधुप'क गीति-साहित्यक विवेचन एहि संग्रहक सर्वाधिक रसशास्त्रीय निबन्ध थिक। 'गीत भावाश्रित होइछ, हृदयपर ओकर प्रभाव तत्काल पड़ैछ, रागात्मिका वृत्तिक तार झनझना उठैछ' — ई विवेचन प्रत्यक्षतः भरतमुनिक रस-निष्पत्ति आ अभिनवगुप्तक रस-चर्वणाक मैथिली पुनराख्यान थिक; 'नादब्रह्मकेँ जगबैत' गीत-साधनाक अवधारणा भारतीय संगीत-दर्शनक नादब्रह्म-सिद्धान्तसँ जुड़ैत अछि। मधुपकेँ 'घसल अठन्नी सोनाकेँ घसि कऽ हीरा' बनौनिहार आ 'विद्यापति ओ मीरा'क स्वरमे बजनिहार कहि (मणिपद्मक शब्दमे) रमानन्द झा गीति-परम्पराक शीर्ष-स्थान दैत छथि।
मधुपक गीत-संसारमे शृङ्गार, भक्ति, गृहस्थजीवन, नारी-आदर्श, सामाजिक शिक्षा आ सांस्कृतिक संस्कारक मेल अछि। गीत केवल पढ़बाक वस्तु नहि, कण्ठस्थ करबाक, गाबयबाक आ सामुदायिक रूपसँ अनुभव करबाक रचना अछि — 'लोक-जीवनमे गीतक अत्याज्यता' (आँगन, दलान, खेत, खरिहान, कोबर, सिमरिया-घाट)क ई मूल्याङ्कन भट्टनायकक साधारणीकरण-सिद्धान्तक उत्तम प्रयोग थिक। जखन मैथिल युवा वर्ग सिनेमाक गीतक धुनपर पागल छल, तखन मधुपजी मैथिली भाषाकेँ विलुप्त होएबासँ बचेबाक लेल सिनेमाक तर्जपर मैथिली गीत लिखलनि — विदेह समान्तर इतिहासक दृष्टिसँ ई जनभाषाकेँ जीवित रखबाक एकटा लोकतन्त्रवादी, जमीनी प्रयास छल। 'वट-सावित्री' जकाँ पावनिक कथाकेँ ओ गीतक रूप देलनि जाहिसँ नीरसता समाप्त भेल, स्त्री आ बालक धरि कथा पहुँचल आ लोक-कण्ठमे मैथिली स्थापित भेल — ई गीतक सामाजिक प्रयोगशीलता देखबैत अछि।
रस-दृष्टिसँ मधुपक गीतमे भक्ति, विप्रलम्भ शृङ्गार आ करुणाक समन्वय अछि। ध्वनि-दृष्टिसँ गृहस्थ आदर्शक भीतर स्त्रीक सामाजिक भूमिका, परिवारक नैतिक अनुशासन आ लोकपरम्पराक संरक्षण निहित अछि।
१४. भट्टीकाव्यक परम्परा आ मधुपजी
ई निबन्ध कृतिक सभसँ साहसी सैद्धान्तिक अध्याय थिक आ संस्कृतक शिक्षाप्रद काव्यपरम्परा तथा मैथिली काव्यक अन्तर्सम्बन्धक खोज करैत अछि। भट्टीकाव्यमे कथा केवल रसास्वाद लेल नहि, व्याकरण, अलङ्कार, छन्द आ भाषाज्ञानक शिक्षण लेल सेहो प्रयुक्त अछि; मधुपजीक काव्यमे एहि शिक्षणपरक परम्पराक आधुनिक मैथिली रूप देखल गेल अछि। भारतीय काव्यशास्त्रक दृष्टिसँ ज्ञान आ आनन्दक एकता एहि अध्यायक प्रमुख सूत्र अछि — काव्य नितान्त उपदेश होइत तँ रसहीन भऽ जाइत; नितान्त मनोरञ्जन होइत तँ शैक्षिक प्रयोजन लुप्त भऽ जाइत। मधुपक उपलब्धि एहि द्वन्द्वमे समन्वय स्थापित करब अछि।
'कोबर-गीत'क रचनाकेँ आधार बनाय रमानन्द झा एक निर्भीक प्रश्न उठबैत छथि — 'कविता कथी लेल लिखल जाइत अछि?' आ स्पष्ट उत्तर दैत छथि — 'यश' आ 'अर्थ'; कोनो कवि एहि दुनू शर्तक सीमासँ बाहर नहि। ई घोषणा साहित्यक शुद्धतावादी आदर्शवादकेँ चुनौती दैत ओकर भौतिक-आर्थिक आधारकेँ उद्घाटित करैत अछि — जे स्पष्टतः मार्क्सवादी साहित्य-समाजशास्त्रक अन्तर्दृष्टि थिक। प्रसङ्ग ई जे विद्यालयक अनुदान बचेबाक विवशतामे — कुमार गंगानन्द सिंह आ राजपण्डित बलदेव मिश्रक दबावमे — मधुपजीकेँ महाराज कामेश्वर सिंहक 'कोबर गीत' लिखय पड़लनि। 'कोबर-गीत'केँ 'युगीन विवशताक द्योतक' कहि रमानन्द झा एक जटिल नैतिक-सौन्दर्यशास्त्रीय प्रश्नक सामना करैत छथि — कवि अपन आत्माक प्रतिकूल किएक लिखैत छथि? ओ स्वीकार करैत छथि जे मधुपक 'कवित्व-शक्ति ततेक प्रखर छल जे अनिश्चित विषयोपर सेहो दिव्य-मार्मिकता आबि जाइत छलैक।' ई प्रयोजन आ प्रतिभाक द्वन्द्वक ईमानदार विवेचन थिक। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ ई अध्याय संस्कृत आ मैथिलीकेँ स्वामी-दास सम्बन्धमे नहि, संवादशील परम्परामे रखैत अछि।
१५. काञ्चीनाथ झा 'किरण'क कथा-जगत
किरण (१९०६–१९८९)केँ रमानन्द झा तृतीय दशकक संक्रान्ति-कालक प्रतिनिधि कथाकार मानैत छथि — विद्यापतीय कल्पनालोकसँ हटि 'देसिल वयना'क यथार्थ दिस उन्मुख। हुनक कथा-जगत ('चन्द्रग्रहण', 'धर्मरत्नाकर', 'समाजक चित्र') सामाजिक विषमता, जाति, श्रम, धर्मान्धता, सत्ता, स्त्री आ मनुष्यक नैतिक सङ्घर्षक कथा-जगत अछि। लेखक हुनकर रचनामे समाजक अँधार परतकेँ भेदयवला आलोचनात्मक प्रकाश देखैत छथि। 'चन्द्रग्रहण'मे प्राकृतिक घटनापर अन्धविश्वासक आड़मे होइत व्यभिचार आ ठगी उजागर अछि; 'धर्मरत्नाकर'मे राम किसन जकाँ शोषित रैयतक हाहाकार आ धर्मरत्नाकर बाबू साहेबक पाखण्ड बेनकाब कएल गेल अछि।
'जाड़क पालामे ठिठुरैत नाङट नेना', 'लाज झँपबा लेल व्याकुल तरुणी', 'स्कूलक फीस लेल दौड़ करैत देशक भविष्य' — ई सभ बिम्ब यथार्थवादी करुण-रसक तीव्र सम्प्रेषण थिक। पाठक-प्रतिक्रिया-सिद्धान्तक दृष्टिसँ किरणक कथाक विस्फोट-क्षण — 'कल्पनाक मचकीपर आस लगैत काल यथार्थसँ सरोकार छूटि जाएब' — केँ रमानन्द झा जाहि सूक्ष्मतासँ पकड़ैत छथि, ओ रूपवादी अपरिचितीकरणक बोधक परिचायक थिक।
मार्क्सवादी दृष्टिसँ किरण सुविधा-सम्पन्न वर्ग आ श्रमजीवी वर्गक अन्तर उजागर करैत छथि; दलित दृष्टिसँ सामाजिक प्रतिष्ठाक ब्राह्मणवादी निर्धारण प्रश्नाङ्कित होइत अछि; नारीवादी दृष्टिसँ स्त्रीक जीवन केवल गृहस्थ आदर्शक उदाहरण नहि, स्वतन्त्र सामाजिक अनुभवक क्षेत्र बनैत अछि। किरणक कथा लोकमङ्गलवादी अछि, मुदा उपदेश मात्र नहि — पात्रक अन्तर्विरोध, विडम्बना आ सामाजिक असंगति कथाकेँ जीवित बनबैत अछि। विदेह समान्तर इतिहासमे किरण मिथिलाक गौरवगानक बदला मिथिलाक भीतरक विषमता देखबैत छथि।
१६. मैथिली उपन्यासक आलोकमे 'चन्द्रग्रहण'क नारी-पात्र
ई निबन्ध कृतिक सर्वाधिक आधुनिक-आलोचनात्मक अध्याय थिक आ मैथिली उपन्यासमे स्त्री-पात्रक परिवर्तनशील रूपक अध्ययन करैत अछि। किरणक 'चन्द्रग्रहण' (१९३२)क रजनी आ सुषमासँ लऽ कऽ 'रूपा' (१९८८) धरिक नारी-पात्रक विकास-रेखाकेँ रमानन्द झा समाज-सुधार-आन्दोलनक ऐतिहासिक पृष्ठभूमिसँ जोड़ि विश्लेषित करैत छथि — 'जेना-जेना परिवेशमे सुधारात्मक-आन्दोलनात्मक चेतना प्रखर होइत गेल, उपन्यासक चरित्र-निर्माणमे तकर प्रभाव पड़ैत रहल।' ई साहित्य आ समाजक द्वन्द्वात्मक सम्बन्धक उत्कृष्ट नव-ऐतिहासिकतावादी पाठ थिक।
सामाजिक सुधार-आन्दोलन, शिक्षा आ आधुनिक चेतनाक प्रभावसँ 'चन्द्रग्रहण'क नारी-पात्र पारम्परिक मौनता छोड़ि नूतन व्यक्तित्व ग्रहण करैत अछि। नारीक अन्तःकामना, प्रेम, विरह, देहबोध, निर्णय आ सामाजिक दायित्व कथाक सक्रिय अङ्ग बनैत अछि; वातावरण आ नायिकाक अन्तःस्थितिक समान्तर विन्यास मनोवैज्ञानिक गहराई उत्पन्न करैत अछि। नारीवादी समीक्षाक दृष्टिसँ ई निबन्ध कृतिक सर्वाधिक अग्रगामी अछि — किएक तँ रमानन्द झा पण्डित-वर्गक ओहि पाखण्डकेँ उघारैत छथि जकर 'समस्त उपदेश अनके लेल' होइत छैक, आ जे मेला-ठेलामे अपहृत नारीकेँ सेहो शिक्षासँ वञ्चित रखैत अछि। 'रचनाकारक व्यक्तित्वक आक्रामकता'केँ चरित्र-निर्माणमे देखब — ई अभिव्यञ्जनावादी आलोचना थिक। स्त्रीकेँ केवल त्यागमूर्ति अथवा कुलरक्षिका नहि, इच्छाशील आ विचारशील मनुष्यक रूपमे देखबाक ई प्रयास महत्त्वपूर्ण अछि।
१७. प्रो॰ हरिमोहन झा एवं हुनक 'चर्चरी'
मैथिलीक सर्वाधिक लोकप्रिय हास्य-व्यङ्ग्यकार हरिमोहन झा (१९०८–१९८४)क 'चर्चरी' एक विधाक पोथी नहि — एहि संग्रहमे कथा, एकाङ्की, छायारूपक, पत्र, दलानक गप्प, पोखरिक गप्प, प्रहसन आ सांस्कृतिक निबन्ध सम्मिलित अछि। 'चर्चरी'क एहि विविध-विधात्मक स्वरूपकेँ व्यञ्जन-सम्मिलित 'चर्चरी' (भोज्य-पदार्थ)क रूपकसँ उद्घाटित करब — ई नामकरण-मूलक विश्लेषण चतुर अछि। लेखक एकरा पारम्परिक कथा अथवा निबन्ध नहि, स्वतन्त्र गप्प-विधाक रूपमे पहचानैत छथि — हुनक रचना-संसार ('चर्चरी', 'खट्टर ककाक तरंग', 'प्रणम्य देवता') मैथिलीमे गप्प-विधाक प्रवर्तन कएलक। हास्य-व्यङ्ग्य आ वक्रोक्तिक माध्यमसँ ओ थोथा पाण्डित्य, रूढ़िवाद आ सामाजिक पाखण्डपर प्रहार कएलनि। हुनक 'पाँच पत्र' जकाँ रचना रस-सिद्धान्तक दृष्टिसँ करुण रसक उत्कृष्ट निदर्शन थिक, जे पति-पत्नीक बदलैत रागात्मक सम्बन्ध आ युग-बोधकेँ मार्मिक रूपेँ प्रस्तुत करैत अछि; 'रेलक झगड़ा' जकाँ प्रहसनमे आधुनिक शिक्षाक वायुसँ सिहकल परिवारक हास्यपूर्ण चित्रण अछि।
हरिमोहन झाक सभसँ पैघ उपलब्धि मैथिलीमे विशाल पाठक-समुदायक निर्माण अछि। मैथिल समाजक हास्यप्रिय संस्कारकेँ ओ साहित्यिक रूप देलनि आ पाठककेँ साहित्य दिस आकर्षित कएलनि। भारतीय हास्यरस आ पाश्चात्य व्यङ्ग्य-दृष्टि एहि रचनामे एकत्र होइत अछि; गप्पक मिश्रित विधागत स्वरूप लोकक मौखिक कथन, शास्त्रीय विनोद आ आधुनिक मुद्रित साहित्यक बीच सेतु बनबैत अछि।
संगहि ई निबन्ध संग्रहक सर्वाधिक असहमति-प्रधान निबन्धमे एक थिक। रमानन्द झा हरिमोहन झा-सन कैननी लेखकक सीमाकेँ निर्भीकतासँ रेखाङ्कित करैत छथि — 'अधिकांश रचना पढ़लापर विचारक उन्मेष नहि होइछ, वैचारिक मन्थन नहि होइछ, मात्र गुदगुदी लगैछ, एक बेर हँसा गेलापर ओकर प्रभाव बिला जाइछ।' ई कैनन-केन्द्रित मूल्याङ्कनक विरुद्ध विदेह-प्रतिमानक पुनर्मूल्याङ्कन-साहसक अग्रदूत थिक — लोकप्रियताकेँ साहित्यिक श्रेष्ठताक पर्याय नहि मानब।
१८. कविवर यात्रीक स्तम्भ-लेखन
यात्री (नागार्जुन)क स्तम्भ-लेखनकेँ साहित्यिक विधाक रूपमे प्रतिष्ठित करैत रमानन्द झा मैथिली पत्रकारिता आ साहित्यक अन्तःसम्बन्धकेँ उद्घाटित करैत छथि। प्रारम्भिक पत्र-पत्रिकाक उद्देश्य मातृभाषा-सेवा आ सामाजिक कुरीतिक निदान छल; पाठकीय स्तम्भ लेखक, सम्पादक आ पाठकक बीच वैचारिक संवाद स्थापित करैत छल। 'यत्र तत्र सर्वत्र', 'यत्किंचित' आ 'चिन्तन-अनुचिन्तन' सन स्तम्भमे यात्री राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था, भाषा आ संस्कृतिपर तात्कालिक टिप्पणी करैत छथि; 'चोआ-काका' सन व्यङ्ग्य-पात्रक विकास धरिक विश्लेषण एहि निबन्धमे अछि। यात्रीक 'तेज दृष्टिक सीमा-रेखासँ छोटसँ छोट घटनाक बाहर नहि रहब' — ई व्यङ्ग्यकारक सर्वग्राही दृष्टिक स्वीकृति थिक।
यात्री अपन स्तम्भक माध्यमसँ शासक वर्गक वाक्जाल, मिथिलाञ्चलक आर्थिक उपेक्षा आ भाषा-साम्राज्यवादक तीक्ष्ण आलोचना कएलनि। ओ हिन्दीकेँ सम्पर्कभाषाक सम्मान दैतहुँ ओकर नामपर मैथिली आ अन्य भाषाक अधिकार छीनबाक विरोध करैत छथि। स्तम्भक भाषा तीक्ष्ण, व्यङ्ग्यपूर्ण, संवादात्मक आ पात्रप्रधान अछि। विधा-विस्तारक दृष्टिसँ ई निबन्ध साहित्येतिहासकेँ अखबारी गद्य दिस उन्मुख करैत अछि आ मैथिली गद्यमे राजनीतिक व्यङ्ग्य तथा सामाजिक चिन्तनक एकटा नव प्रतिमान रेखाङ्कित करैत अछि।
१९. कविवर आरसी
आरसी प्रसाद सिंह (जन्म १९११ ई॰) मैथिली आ हिन्दी दुनू भाषामे सर्जन करैत छलाह, मुदा मैथिलीमे हुनकर मुख्य परिचय गीतकारक अछि। 'शेफालिका', 'माटिक दीप', 'पूजाक फूल' आ 'सूर्यमुखी'क माध्यमसँ हुनकर काव्य-यात्रा राष्ट्रीयता, प्रकृति, प्रेम, सामाजिक चेतना आ जन-अधिकार धरि विस्तृत होइत अछि। हुनकर प्रारम्भिक गीतमे राष्ट्रीय एकता, स्वाधीनता, त्याग आ भारतीय समन्वित संस्कृतिक स्वर अछि — ओ नव युगक नव निर्माण आ कोटि-कोटि भारतवासीकेँ ऐक्य-सूत्रमे बान्हबाक आह्वान करैत छथि; बादक कवितामे मिथिलाक शोषण, भाषिक अधिकार, बाढ़, राजनीतिक भ्रष्टाचार आ जनाक्रोश मुखर होइत अछि।
रूपवादी दृष्टिसँ आरसीक विशेषता गीतात्मकता, बिम्ब, अनुप्रास, इन्द्रियबोध आ कोमल भावप्रवाह अछि। एहि निबन्धक विशेष शक्ति इन्द्रियबोध-विश्लेषणमे अछि — हरसिंगार आ सुमनमे रस-गन्ध, पवनमे स्पर्श, सुरभि-धारमे रस-गन्ध-नादक सम्मिश्रण — ई विभिन्न इन्द्रियबोधक सम्मिश्रण-विश्लेषण पाश्चात्य आधुनिक काव्य-समीक्षाक परिष्कृत उपकरण छी; भारतीय दृष्टिसँ ई गुण-रीति (माधुर्य-गुण) आ अलङ्कार-विवेचनक क्षेत्र थिक। 'शेफालिका'सँ 'सूर्यमुखी' धरिक यात्रा वैयक्तिक सौन्दर्यचेतनासँ सामाजिक चेतना दिस बढ़ैत कविक विकास अछि।
२०. उपेन्द्र ठाकुर 'मोहन' आ हुनक कविता
संग्रहक अत्यन्त विस्तृत निबन्धमे सँ ई एक 'आयल वसन्त'क अमर गीतकार मोहनकेँ समर्पित अछि। मोहनजीक कविता स्मृति, प्रकृति, वसन्त, गीतात्मकता आ जीवन-सङ्घर्षक सम्मिलित संसार अछि। 'आयल वसन्त' सन गीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी कण्ठस्थ रहल, जाहिसँ कविता पाठ्यपुस्तकक बाहर जीवित सामुदायिक स्मृति बनल। रमानन्द झा एतय आत्मकथात्मक शैली — छात्र-जीवनमे श्रीरामचन्द्र बाबूक कक्षामे गीत-श्रवण, 'मिहिर'-कार्यालयमे मोहनक अनवरत कर्मशीलताक स्मरण — अपनबैत छथि, जे समीक्षाकेँ संस्मरणात्मक आत्मीयता दैत अछि।
मोहनक मातृभाषा-प्रेम — 'घरक गोसाउनि झँखथि अन्हारेँ, मन्दिर बारब दीप?', 'गाम नोत नहि, नोत बेलाही' — क माध्यमसँ भाषिक अस्मिताक तीक्ष्ण चेतना उद्घाटित होइत अछि। 'जखन मैथिली सूपक भाँटा भेल संकटापन्न, की राष्ट्रीयता? देश-भक्ति की?' — ई पदावली भाषा आ राष्ट्रीयताक अन्तःसम्बन्धकेँ प्रश्नाङ्कित करैत अछि।
मोहनजीक जीवन आर्थिक अभाव, शिक्षाक संघर्ष, प्रवास, रोजगार-अभाव आ मुद्रणालयक श्रमसँ बनल। एहि कारण हुनकर कविता केवल प्रकृतिक माधुर्य नहि, श्रमशील जीवनक भीतर सौन्दर्य बचायबाक प्रयत्न अछि। विदेह समान्तर इतिहासक दृष्टिसँ मुद्रणालयक प्रूफ-संशोधक सेहो साहित्येतिहासक निर्माता छथि — ओ केवल दोसरक पोथी सुधारैत नहि, अपन समयक भाषिक रूप, वर्तनी आ साहित्यिक संस्कृतिक संरक्षक बनैत छथि।
२१. शुद्धतावादी कथाकार उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास'
उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास' (जन्म १९१७ ई॰) मैथिली भाषाक शुद्ध, देशज आ स्वाभाविक रूपक पक्षधर कथाकार छथि। 'विडम्बना' आ 'भजना भजले'क विवेचनमे रमानन्द झा मात्रा बनाम गुणवत्ताक सैद्धान्तिक प्रश्न उठबैत छथि — 'ढाकीक-ढाकी लिखेलेपर जँ कोनो जीवन-मूल्य स्वीकृत नहि भऽ सकल ... तँ जीवन-कालहिमे रचनाकार अप्रासङ्गिक घोषित भऽ जाइत अछि।' ई रूपवादी गुणवत्ता-केन्द्रित मूल्याङ्कन थिक; व्यासक कथाक 'बासितेवासि नहि, टटका बनल रहब' — कालातीत ताजगी — क कसौटी कालातीत-मूल्यक अवधारणासँ मेल खाइत अछि।
हुनकर कथा भाषा-प्रयोग, सामाजिक व्यङ्ग्य, नैतिक विडम्बना आ ग्रामजीवनक जीवित संवादक कारण विशिष्ट अछि। शुद्धतावाद हुनका लेल केवल शब्दक छनोट नहि, सांस्कृतिक प्रतिरोध अछि — बाहरी भाषिक प्रभावक बीच मैथिलीक अपन वाक्य-विन्यास, लोकोक्ति, उच्चारण आ भावभूमि बचायब मातृभाषाक अस्मिता बचायब छल। रूपवादी दृष्टिसँ हुनकर कथा-भाषा पात्रक सामाजिक स्तर आ मानसिकता निर्माण करैत अछि; उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टिसँ भाषिक शुद्धताक आग्रह स्वाभिमानक प्रतीक अछि।
२२. पं॰ राजेश्वर झा : व्यक्तित्व ओ कृतित्व
राजेश्वर झा (१९२२–१९७७) शोधकर्ता, नाटककार, कथाकार, सम्पादक, प्रकाशक आ संस्थापकक रूपमे अत्यन्त सक्रिय छलाह। हुनकर कृतिकेँ अनुसन्धानपरक, ऐतिहासिक-पौराणिक आ सर्जनात्मक तीन वर्गमे बाँटल गेल अछि — 'मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास', 'मैथिली साहित्यक आदिकाल', 'अवहट्टक उद्भव ओ विकास' आदि हुनकर शोधपरक कृति अछि। एहि विवेचनमे रमानन्द झा एक गम्भीर पद्धतिगत घोषणा करैत छथि — 'साहित्यकारक व्यक्तित्वकेँ बूझब सर्वप्रथम आवश्यक अछि, विना व्यक्तित्व बूझने कृतित्वक तहमे जाएब सम्भव नहि।' ई जीवनीमूलक समीक्षाक स्पष्ट प्रतिपादन थिक। राजेश्वर बाबूक आर्थिक विपन्नताक अछैत प्रतिवर्ष पोथी-प्रकाशन आ लोककेँ लिखबाक लेल प्रेरित करब — एहि प्रेरक भूमिकाकेँ रमानन्द झा कृतित्वसँ बेसी मूल्यवान् मानैत छथि ('तराजूक पलरापर व्यक्तित्व भरिगर भऽ जएतनि')। संस्था-निर्माताक ई मूल्याङ्कन विदेह-आन्दोलनक संस्था-केन्द्रित दृष्टिक पूर्वाभास थिक।
अध्यायक विशेषता ई अछि जे लेखक प्रशंसापर रुकैत नहि। राजेश्वर झाक साहित्येतिहासक काल-विभाजन, ईसापूर्व सहस्राब्दीसँ मैथिली साहित्यक आरम्भ आ अवहट्टसम्बन्धी अनेक निष्कर्षकेँ प्रमाणहीन कहैत छथि। औचित्य आ ऐतिहासिक पद्धतिक दृष्टिसँ ई अध्याय 'अखियासल'क सर्वाधिक सन्तुलित आलोचनामे सँ एक अछि — व्यक्तिक श्रमक सम्मान आ हुनकर निष्कर्षक कठोर परीक्षण एकसाथ सम्भव अछि।
२३. ललितक कथामे परिवेशक संक्रान्त जीवन
ललितक कथाकेँ रमानन्द झा स्वातन्त्र्योत्तर मोहभङ्गक साहित्यिक दस्तावेजक रूपमे व्याख्यायित करैत छथि — स्वतन्त्रतापूर्व आशा आ स्वतन्त्रतापरान्त मोहभङ्गक बीचक संक्रमण: 'आशाक किरण निराशामे बदलि गेलैक, लाबनि टूटि कऽ खसि पड़लैक।' प्रथम निर्वाचनमे धुरफन्दी, स्वार्थान्धता, धन, जाति आ जातिवादक नग्न-नाच, नकली नेता, गरीब मतदाता आ भ्रष्ट विकास-योजना — ई सभ सामाजिक परिवेशक यथार्थ बनैत अछि। ई मार्क्सवादी-यथार्थवादी समीक्षाक उत्कृष्ट प्रयोग थिक, जे साहित्यकेँ राष्ट्रीय-राजनीतिक यथार्थक संक्रमणशील प्रतिबिम्ब मानैत अछि।
मार्क्सवादी दृष्टिसँ 'प्रतिनिधि' सन कथा सुविधा-भोगी शासक वर्ग आ अधिकार-विहीन गरीबक द्वन्द्व उद्घाटित करैत अछि — श्रमकेँ हीन बुझनिहार शिक्षित युवक अन्ततः शारीरिक श्रमक महत्त्व स्वीकारैत अछि। 'लड़ाइ'-कथामे द्वैध-मानसिकता आ दू पीढ़ीक वैचारिक स्तर तथा दायित्वबोधक विश्लेषण अछि। 'रमजानी', 'मृत्युञ्जय', 'ओभरलोड', 'दू चित्र' आदि कथामे परम्परा-विघटन, रोजगार-संकट, धार्मिक पाखण्ड, देहगत आवश्यकता, अस्तित्वगत भार आ सामन्ती मानसिकताक अवशेष अछि।
२४. धीरेन्द्रक कथाक सामाजिक सन्दर्भ
अध्याय सामाजिक सन्दर्भक सैद्धान्तिक व्याख्यासँ आरम्भ होइत अछि आ एहिमे रमानन्द झा अपन सर्वाधिक परिष्कृत सैद्धान्तिक प्रतिपादन प्रस्तुत करैत छथि — 'सामाजिकता थिक समाजरूपी नेहाइपर पीटि तैयार रूपाकृति; नेहाइ थिक व्यक्ति-मन आ सामाजिक-मनक द्वन्द्व।' ई व्यक्ति-मन बनाम सामाजिक-मनक द्वन्द्वात्मक सिद्धान्त कृतिक बौद्धिक शिखर थिक — जे मार्क्सवादी द्वन्द्ववाद आ मनोविश्लेषणात्मक समीक्षाक संगमसँ निर्मित अछि। लेखकक वैयक्तिक अनुभव तखन सामाजिक बनैत अछि जखन पाठकक सुप्त अनुभवकेँ जागृत कऽ सामूहिक मनक प्रतिनिधित्व करए — रचनाकारक अनुभवक 'समाजक अनुभव भऽ पएब, समाजक दर्पण भऽ पएब' कलाक प्रतिबिम्ब-सिद्धान्तक सुस्पष्ट मैथिली अभिव्यक्ति थिक।
धीरेन्द्रक कथामे शिक्षित बेरोजगारी, सिफारिश, भ्रष्ट नियुक्ति, सत्यक अवमूल्यन, गरीबक श्रमक अपहरण आ वर्गीय शोषणक चित्र अछि। 'मनुख बिकाइत' आ 'गीध'क प्रतीक आधुनिक समाजमे मनुष्यक वस्तुकरण आ शक्तिशाली द्वारा निर्बलक भक्षण व्यक्त करैत अछि — मार्क्सवादी दृष्टिसँ 'गीध' पूँजी आ सत्ता द्वारा श्रमजीवी शरीरक उपभोगक रूपक अछि। साधारणीकरणक दृष्टिसँ बेरोजगार युवकक निजी वेदना देशक लाखों युवकक वेदना बनैत अछि। धीरेन्द्रक कथाक 'आँखिक डबडबाएब'केँ समान-तत्त्व आ शिल्पक रूपमे विवेचित करब सूक्ष्म रूपवादी अवलोकन थिक, यद्यपि एतय समीक्षक भावुकता आ शिल्पक भेद-रेखापर अपन असमंजस स्वयं स्वीकार करैत छथि।
२५. प्रभासक कथा-यात्रा
संग्रहक अन्तिम आ सर्वाधिक दीर्घ निबन्ध प्रभास कुमार चौधरी (जन्म १९४१ ई॰)केँ समर्पित अछि। रमानन्द झा एतय एक व्यापक प्रभाव-अध्ययन करैत छथि — मैथिली कथापर संस्कृत, अङ्ग्रेजी आ बङ्गला, तीन साहित्यक प्रभावक विश्लेषण। ई तुलनात्मक साहित्यक पद्धतिगत प्रयोग थिक, जे संग्रहकेँ ऐतिहासिक वर्णनसँ उठाय सैद्धान्तिक तुलनाक स्तरपर लऽ जाइत अछि।
प्रभासक दू दशकक कथा-यात्राकेँ क्रमिक यात्रा मानि लेखक हुनकर जीवन-दृष्टि, सामाजिक चेतना आ कथन-पद्धतिमे भेल परिवर्तनक परीक्षण करैत छथि — कथाकारक 'घरसँ चलि, गाममे घुमि, क्रमशः भावगत निर्लिप्तता आ निष्क्रियता-बोध धरि पहुँचब'क विकास-रेखा। आर्थिक विपन्नता, समाजक स्वार्थ, गरीबक उपेक्षा आ तथाकथित सम्भ्रान्त वर्गक अमानवीयता हुनकर कथाक मुख्य विषय बनैत अछि। प्रभासक कथा-यात्रा व्यक्ति-केन्द्रित अनुभवसँ व्यापक सामाजिक संरचना दिस बढ़ैत अछि — पात्र प्रारम्भमे परिस्थितिक शिकार बुझाइत अछि, मुदा धीरे-धीरे शोषणक संरचनाकेँ पहचानय लगैत अछि। ई लेखकीय चेतनाक विकासात्मक अध्ययन समीक्षकक परिपक्व दृष्टिक द्योतक थिक। संग्रहक समापन एहि आधुनिकतम कथाकारपर होएब 'प्रथम'सँ 'समकालीन' धरिक यात्राकेँ पूर्ण करैत अछि। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ प्रभासक कथा इतिहासक विजय-घोष नहि, उपेक्षित मनुष्यक दैनिक पराजय, संघर्ष आ आत्मरक्षाक इतिहास लिखैत अछि।
उत्तरार्ध : अध्यायवार सीमा, अन्तर्विरोध आ अपूर्णता
एहि मूल्याङ्कनक दोसर आधा भाग पूर्णतः 'अखियासल'क सीमा, दुर्बलता आ पद्धतिगत संकटकेँ समर्पित अछि। ई आलोचनात्मक कठोरता कोनो अवमूल्यन नहि, अपितु कृतिक ऐतिहासिक महत्त्वक गम्भीर स्वीकृतिक अनिवार्य अङ्ग थिक — एक अग्रगामी ग्रन्थक सीमाक निर्मम विवेचन उपरान्तहि ओकर उत्तराधिकारी प्रयास अपन दिशा निर्धारित कऽ सकैत अछि।
१. श्रीकृष्ण ठाकुर आ 'चन्द्रप्रभा' अध्यायक सीमा
'चन्द्रप्रभा'केँ प्रथम कथा-संग्रह मानबाक तर्क महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा उपलब्ध पाण्डुलिपि अपूर्ण अछि। सम्पूर्ण पाठ, रचनाकाल, पाठान्तर आ लेखकक अन्तिम रूपक अभावमे 'प्रथम' पद सावधानीसँ देल जाएबाक चाही। अध्याय ऐतिहासिक महत्त्वपर अधिक केन्द्रित अछि; कथा सभक पृथक कथानक, चरित्र, कथावाचक, समय-विन्यास आ भाषिक संरचनाक निकट परीक्षण कम अछि। संस्कृत नीति-कथा परम्परासँ समानता देखाओल गेल अछि, मुदा समानता, प्रभाव, रूपान्तरण आ मौलिकताक स्पष्ट भेद सर्वत्र नहि राखल गेल। संगहि, विदेह-दृष्टिसँ ई सेहो कहल जा सकैछ जे 'चन्द्रप्रभा'क कथा-संसार मुख्यतः संस्कृत ग्रन्थक छायामे पलल-बढ़ल अछि; एहिमे जमीनी लोक-जीवन आ वञ्चित वर्गक यथार्थवादी चित्रणक अभाव अछि, आ नीति-उपदेशक प्राधान्य रस-निष्पत्तिमे बाधक बनैत अछि। आरम्भिक होयबाक गौरव कृतिक कलात्मक सीमाकेँ ओझल नहि करबाक चाही।
२. जीवछ मिश्र आ 'रामेश्वर' अध्यायक सीमा
अध्याय 'रामेश्वर'केँ प्रथम मौलिक उपन्यास सिद्ध करबाक दिशामे प्रबल अछि, मुदा 'प्रथम'क प्रमाण लेल समकालीन प्रकाशन-सूची, विज्ञापन, पाण्डुलिपि आ अन्य सम्भावित उपन्यासक व्यवस्थित तुलना अपेक्षित छल। रामेश्वरक अपराधकेँ सामाजिक विवशतासँ व्याख्यायित करब युक्तिसंगत अछि, मुदा पत्नीपर अविश्वास, हिंसक प्रवृत्ति आ डकैतीमे सक्रिय सहभागिताक नैतिक उत्तरदायित्व कम प्रश्नाङ्कित भेल अछि। अन्तमे पुत्रसँ पुनर्मिलन आ चरित्र-परिवर्तन अत्यन्त आकस्मिक अछि — मनोवैज्ञानिक रूपान्तरणक क्रमिक प्रक्रिया अनुपस्थित रहने समाधान अतिनाटकीय बुझाइत अछि। मार्क्सवादी निकषपर सेहो ई कहल जा सकैछ जे अन्ततः उपन्यासकार रामेश्वरक हृदय-परिवर्तन करा कऽ वर्ग-संघर्षकेँ एकटा नैतिक आदर्शवादमे बदलि दैत छथि — क्रान्तिक सम्भावनाकेँ सुधारवादक पानिसँ निझा देल जाइछ। स्त्री-पात्र पार्वतीक पीड़ा अछि, मुदा हुनकर स्वाधीन दृष्टि सीमित अछि।
३. 'सुमति' अध्यायक सीमा
अध्याय पूर्ववर्ती आलोचकक मतक सङ्ग संवाद करैत अछि, मुदा 'सुमति'क सम्पूर्ण कथानक, पात्र-संरचना, दृष्टिबिन्दु आ भाषा-विन्यासक पर्याप्त प्रत्यक्ष विश्लेषण नहि करैत अछि। ऐतिहासिक महत्त्व आ 'सफल आधुनिक उपन्यास' होयबाक दावा बीच तनाव अछि — जखन कथानक असंगठित, चरित्र अस्पष्ट आ प्रस्तुति अपरिपक्व अछि, तखन 'सफलता'क कसौटी स्पष्ट होयबाक चाही। नारीवादी दृष्टिसँ एकटा गम्भीर प्रश्न ई जे सुमतिक शिक्षाक एकमात्र उद्देश्य देखाओल गेल अछि — खसैत सासुरकेँ सम्हारब आ परिवारकेँ कर्जसँ मुक्त करब; एतय नारीक अपन कोनो स्वतन्त्र सत्ता वा आकाङ्क्षा नहि अछि, ओ पितृसत्तात्मक परिवारक उद्धारकक भूमिका धरि सीमित अछि। 'उचित वक्ता' रूपेँ कथावाचकक बेर-बेर हस्तक्षेप उपन्यासक संरचनात्मक स्वायत्ततेकेँ खण्डित करैत अछि, जकरा जयकान्त मिश्र 'अपरिपक्व शिल्प' कहने छथि; भाषा निबन्धात्मक अछि, जाहिमे तुलसीदासक चौपाइक भरमार अछि — ई काव्य-दोष थिक। सामाजिक सुधारक विषय अपनहि कलात्मक श्रेष्ठताक प्रमाण नहि — कथा-वस्तु महत्त्वपूर्ण होइतहुँ ओकर प्रस्तुति, चरित्रगत जटिलता आ आन्तरिक अनिवार्यता समान रूपसँ आवश्यक अछि।
४. 'निर्दयी सासु' अध्यायक सीमा
कथा स्त्री-उत्पीड़नक प्रश्न उठबैत अछि, मुदा सासुकेँ 'निर्दयी' खलपात्र बनाओलापर पितृसत्ताक व्यापक संरचना व्यक्तिगत क्रूरतामे सीमित भऽ सकैत अछि। सासु स्वयं कोन सामाजिक दबाव, आर्थिक भय, विवाह-व्यवस्था आ प्रतिष्ठा-बोधक उत्पाद छथि — एहि प्रश्नक पर्याप्त विवेचन नहि अछि। पुतोहुक चरित्र करुणाक पात्र बनैत अछि, मुदा ओकर प्रतिरोध, इच्छाशक्ति, स्त्री-समुदायक सहयोग आ वैकल्पिक जीवन-सम्भावना कम विकसित अछि — नायिका शारदा सम्पूर्ण कथामे प्रायः मूक अछि, आ वञ्चित-विमर्शक यक्ष प्रश्न — की उपाश्रित बाजि सकैत अछि? — एतय पूर्णतः प्रासङ्गिक अछि। एकाङ्गी आ सपाट चरित्र-निर्माण संरचनावादी दृष्टिसँ सेहो सीमा थिक। नारीवादी दृष्टिसँ स्त्रीकेँ केवल पीड़िता बनायब सेहो प्रतिनिधित्वक सीमा अछि।
५. बिसरल साहित्यसेवी जनार्दन झासम्बन्धी सीमा
अध्यायक अभिलेखीय उद्देश्य प्रशंसनीय अछि, मुदा सीमित सामग्रीपर आधारित जीवन-विवेचन कतेको स्थानपर अनुमानपर निर्भर अछि। 'जानकी परिणय'क सांस्कृतिक विवरणक चर्चा अछि, मुदा काव्यक छन्द, भाषा, अलङ्कार, कथन-गति आ पात्र-निर्माणक विस्तार कम अछि। विस्मृत लेखककेँ पुनः प्रतिष्ठित करबाक उत्साहमे कृतिक वास्तविक कलात्मक सीमा कहियो-कहियो गौण भऽ जाइत अछि — इतिहासमे स्थान देब आ उच्च साहित्यिक मूल्य देब एके बात नहि।
६. त्रिलोचन झासम्बन्धी अध्यायक सीमा
लेखक स्वयं स्वीकार करैत छथि जे त्रिलोचन झाक सामग्री बिखरल आ अल्प उपलब्ध अछि। एहि कारण अध्याय जीवनीपरक पुनर्निर्माण अधिक, कृति-आधारित आलोचना कम बनि जाइत अछि। मातृभाषा-प्रेम, संगठन आ समाजसेवाक प्रशंसा पर्याप्त अछि, मुदा हुनकर विशिष्ट साहित्यिक शैली, भाषिक प्रयोग, विधागत क्षमता आ विचारक अन्तर्विरोध कम स्पष्ट अछि। मिथिलाक गौरव पुनः प्राप्त करबाक आह्वान कहियो-कहियो रोमानी अतीतवाद दिस जा सकैत अछि — समाजक वर्ग-भेद आ जाति-भेदकेँ ओझराय केवल भावनात्मक एकताक आह्वान अव्यावहारिक बनि सकैछ। प्राचीन गौरवक सङ्ग जातिगत विषमता, स्त्री-बहिष्कार आ सामाजिक रूढ़िक आलोचना सेहो समान रूपसँ आवश्यक छल।
७. यदुवरसम्बन्धी अध्यायक सीमा
यदुवरक राष्ट्रीय आ भाषिक चेतनापर अधिक बल देल गेल अछि; काव्यक रूप, छन्द, ध्वनि, बिम्ब, वक्रोक्ति आ वैयक्तिक स्वरक विश्लेषण अपेक्षाकृत कम अछि। मातृभाषा-जागरणक कविता कतेको स्थानपर घोषणात्मक आ उपदेशात्मक भऽ सकैत अछि — 'जय जय जयति मैथिल जाति' सन पङ्क्तिमे अभिधाक प्राधान्य अछि, ध्वन्यार्थ कम — आ अध्याय प्रचारात्मकता आ काव्यात्मकताक अन्तर स्पष्ट नहि करैत अछि। 'मैथिल' समुदायकेँ एकरूप मानल गेल अछि; जाति, वर्ग, लिङ्ग आ क्षेत्रानुसार मैथिल अनुभवक भिन्नतापर विचार कम अछि। भाषिक अस्मिता सभ मैथिल लेल एके रूपेँ अनुभवित होइत अछि — ई मान्यता प्रश्नास्पद अछि। आदर्शवादक अतिरेकमे मिथिलाक सामन्ती व्यवस्थाक ठोस आलोचनाक अभाव सेहो एकटा सीमा थिक।
८. द्विजवरसम्बन्धी अध्यायक सीमा
कवि-सेनानीक सक्रिय जीवन निश्चय महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा जीवनीक वीरता काव्यक स्वतन्त्र आलोचनापर भारी पड़ैत अछि। राजनीतिक सक्रियता अपनहि उत्कृष्ट काव्यक प्रमाण नहि — कविता सभक भाषा, छन्द, प्रतीक, वैचारिक जटिलता आ कलात्मक स्थायित्वक अधिक निकट विश्लेषण आवश्यक छल। राष्ट्रीयताकेँ निर्विवाद लोकमङ्गलक मूल्य मानि लेल गेल अछि; राष्ट्रवादक भीतर वर्ग, जाति, धर्म आ लैङ्गिक असमानता सेहो रहि सकैत अछि। स्वदेशी आ चरखाक सामाजिक अर्थ अछि, मुदा आधुनिक आर्थिक संरचनासँ ओकर सम्बन्ध आलोचनात्मक रूपसँ नहि खोलल गेल। 'छूतहर'मे शोषितक बात अछि, मुदा ई क्रान्तिकारी चेतनाक बदला गान्धीवादी सुधारवादी परिधि धरि सीमित रहि जाइछ आ छन्द-बद्धता कतहु-कतहु यथार्थकेँ कुण्ठित करैत अछि।
९. कुमार गंगानन्द सिंहसम्बन्धी सीमा
लेखक स्वयं देखबैत छथि जे कथाकारक कतेको कथा लक्ष्य-प्रधान अछि — पहिने नैतिक निष्कर्ष स्थिर होइत अछि, तकर बाद पात्र आ घटना जोड़ल जाइत अछि। एहि कारण कथा जीवनक स्वाभाविक जटिलताक बदला उदाहरण बनि जाइत अछि। अनेक कथामे दीर्घ कालखण्ड, अनावश्यक मोड़, घटनाक विस्तार आ अन्तमे सम्पूर्ण समाधान कथा-प्रभावकेँ कमजोर करैत अछि — लेखक सेहो 'विवाह' आ 'बिहाड़ि'क तन्तुवाय फलकि जाएब स्वीकारैत छथि। सामाजिक सुधारक आग्रह रहितहुँ जाति-उन्मूलन आधा बाटपर रुकि जाइत अछि — अस्पृश्यताविरोधी कथा दलित पात्रकेँ पूर्ण सामाजिक समानता धरि नहि लऽ जाइत अछि आ 'बिहाड़ि'क सुधार अन्ततः उच्च वर्गक अनुकम्पापर निर्भर रहैत अछि। नव्य-न्यायक दृष्टिसँ 'पञ्च परमेश्वर'मे विरुद्ध हेत्वाभासक स्थिति अछि — एक दिस सुधारक बात आ दोसर दिस ग्राम-पञ्चायतकेँ ई उपदेश जे "सामन्त आ जमीन्दारक आमोद-प्रमोदमे व्याघात नहि करबाक चाही" — सुधारक गप्प करैत शोषक वर्गक सुख-शान्तिक वकालत। स्त्री-पात्रक संख्या सेहो कम अछि।
१०. हरिलतासम्बन्धी अध्यायक सीमा
एहि निबन्धक सीमा ई जे समीक्षक हरिलताक वैधव्य-जनित वेदनाकेँ मात्र 'ईश्वरोन्मुखता'क कारण मानि लैत छथि, ओकर सामाजिक-आलोचनात्मक सम्भावनाकेँ अनदेखा कऽ दैत छथि। एक सशक्त नारीवादी पाठ एतय सम्भव छल — बाल-विवाह, वैधव्य, स्त्री-शिक्षाक निषेधक विरुद्ध चोरा कऽ अक्षर सीखबाक संघर्ष — मुदा विवेचन मुख्यतः वैष्णव भक्ति धरि सीमित रहि गेल। मनोविश्लेषणक दृष्टिसँ ई प्रश्न सेहो उठैत अछि जे भक्ति एतय सामाजिक यथार्थसँ पलायनक साधन तँ नहि बनल — भौतिक यन्त्रणाकेँ आध्यात्मिक रहस्यवादमे रूपान्तरित कऽ सामाजिक अधिकारक प्रश्नकेँ स्थगित कऽ देब। ई दुनू सम्भावित पाठ — भक्ति-रसक शास्त्रीय आस्वाद आ सामाजिक प्रतिरोधक अपठित सम्भावना — क बीचक तनावकेँ निबन्ध नहि खोलैत अछि।
११. श्यामानन्द झासम्बन्धी अध्यायक सीमा
अध्यायक शीर्षक 'काव्य-वस्तु' अछि आ लेखक स्पष्ट करैत छथि जे ओ कला-पक्षक बदला वस्तु-पक्षक अध्ययन करैत छथि। एहि कारण छन्द, बिम्ब, ध्वनि, वाक्य-विन्यास, अलङ्कार आ शैलीक समुचित मूल्याङ्कन छूटि जाइत अछि। सांस्कृतिक पुनरुत्थानक विचारमे 'आर्य संस्कृति'क आदर्शीकरण अछि; एहि संस्कृतिक भीतर जाति, स्त्री-अधिकार आ सामाजिक बहिष्कारक प्रश्न कम उठैत अछि। विदेशी प्रभाव अथवा देवनागरीक प्रयोगकेँ कतेको स्थानपर षड्यन्त्रक रूपमे देखल गेल अछि — भाषिक परिवर्तनक जटिल सामाजिक, मुद्रणगत आ शैक्षिक कारण सेहो विचारणीय छल। व्यङ्ग्य कतहु-कतहु व्यक्तिगत आक्रोश आ नारामे बदलि जाइछ, जाहिसँ ध्वनि क्षीण भऽ जाइछ।
१२. लक्ष्मीपति सिंह आ पत्रकारितासम्बन्धी सीमा
अध्याय व्यक्तित्वक स्नेहपूर्ण स्मरण अधिक अछि, पत्रकारिताक संस्थागत इतिहास कम। पत्रिकाक प्रसार-सङ्ख्या, आर्थिक आधार, ग्राहक-वर्ग, वितरण-क्षेत्र, सम्पादकीय नीति आ पाठकीय प्रतिक्रिया सम्बन्धी तथ्य सीमित अछि। महिला पाठिका, ग्रामीण ग्राहक, मुद्रक, वितरक आ सहयोगी लेखकक भूमिका स्पष्ट नहि होइत अछि। पत्रकारिता आ साहित्यिक सम्पादनक सीमा सेहो अधिक स्पष्ट होयबाक चाही — समाचार, विचार, साहित्य, संस्था-सूचना आ सामाजिक अभियानक पृथक कार्यप्रणालीक विश्लेषण कएल जा सकैत छल। संगहि, मैथिली पत्रकारिताक 'वैसाखी'पर ठाढ़ रहबाक जे स्वीकृति अछि, ओकर विश्लेषणमे आर्थिक संकटपर जतेक जोर अछि, वैचारिक शून्यता आ सत्तासँ प्रश्न करबाक साहसक अभावपर ओतेक नहि।
१३. मधुपक गीत-साहित्यक सीमा
अध्याय मधुपक गीतक सामाजिक आ सांस्कृतिक उपयोगितापर बल दैत अछि, मुदा धुन, मात्रा, ताल, गायन-परम्परा आ प्रदर्शन-सन्दर्भक विस्तृत विश्लेषण कम अछि। सावित्री, पतिव्रता आ गृहस्थ आदर्शक स्त्री-छवि पितृसत्तात्मक आदर्शकेँ पुष्ट करि सकैत अछि — स्त्रीक शिक्षा आ नैतिक सामर्थ्यक प्रशंसा अछि, मुदा ओकर आत्मनिर्णय, इच्छा आ वैकल्पिक जीवनक प्रश्न सीमित अछि। गीतक लोकप्रियता आ साहित्यिक स्थायित्व अलग-अलग कसौटी अछि — कण्ठस्थता काव्य-मूल्यक महत्त्वपूर्ण सङ्केत अछि, मुदा एकमात्र प्रमाण नहि।
१४. भट्टीकाव्य परम्परासम्बन्धी सीमा
संस्कृत भट्टीकाव्य आ मधुपक काव्यक बीच सम्बन्ध रोचक अछि, मुदा प्रत्यक्ष पाठगत समानता, अनुकरण, रूपान्तरण आ स्वतन्त्र विकासक स्पष्ट प्रमाण अधिक चाही। शिक्षणपरक काव्यकेँ परम्परागत निरन्तरताक रूपमे देखब कतेको भिन्न काल, भाषा आ पाठक-समुदायकेँ एकरूप बना सकैत अछि। व्याकरण अथवा अलङ्कार सिखयबाक प्रयोजन कहियो काव्यक रसात्मक स्वतन्त्रताकेँ सीमित करैत अछि — अध्याय एहि तनावकेँ पर्याप्त कठोरतासँ नहि परखैत अछि। सभसँ गम्भीर प्रश्न औचित्य-सिद्धान्तक — 'आत्माक प्रतिकूल' रचनाकेँ 'व्यक्तिसँ पैघ समाज'क तर्कसँ उचित ठहराएब भाव-औचित्यक मूल-भङ्गक प्रश्न अनुत्तरित छोड़ि दैत अछि; प्रयोजन-प्रेरित रचनाक सौन्दर्यशास्त्रीय स्थिति की हएत, ताहिपर सैद्धान्तिक स्पष्टता नहि भेटैत अछि। विदेह ज्ञानमीमांसाक कठोरतम निकषपर तँ राज्याश्रयमे लिखल 'कोबर गीत' दरबारी विवशताक द्योतक थिक — जनभाषाक गीतकार जखन राजस्तुति लिखय लेल बाध्य कएल जाइत छथि, तखन ज्ञानमीमांसीय साहस आ शब्द-प्रमाण दुनू आहत होइत अछि — यद्यपि रमानन्द झाक 'युगीन विवशता'क सहानुभूतिपूर्ण व्याख्या एहि प्रकरणक ऐतिहासिक जटिलताकेँ सेहो रेखाङ्कित करैत अछि।
१५. किरणक कथा-जगतसम्बन्धी सीमा
किरणक सामाजिक प्रगतिशीलताक प्रशंसा कतेको स्थानपर कथाक औपचारिक विश्लेषणकेँ पाछाँ छोड़ि दैत अछि। कथानक, कथावाचक, दृष्टिबिन्दु, समय, मौन आ प्रतीकक विस्तार अपेक्षित अछि। मार्क्सवादी अथवा सुधारवादी निष्कर्ष सभ कथापर समान रूपसँ लागू कएलापर रचनाक अन्तर्विरोध, अस्पष्टता आ बहुअर्थकता घटि सकैत अछि। किरणक 'मैथिल दृष्टि' कोन सामाजिक स्थानसँ बनैत अछि — ब्राह्मण, दलित, स्त्री, किसान अथवा नगरवासी सभक दृष्टि एक होइत अछि कि नहि — ई प्रश्न कम उठैत अछि। नव्य-न्यायक दृष्टिसँ 'चन्द्रग्रहण'क तर्क-पद्धतिमे सव्यभिचार हेत्वाभासक स्थिति देखल जा सकैछ — अन्धविश्वासक खण्डन लेल 'विधर्मी द्वारा अपहरण' सन अतिनाटकीय आ साम्प्रदायिक रङ्गवला तर्कक सहारा — जँ अपहरण नहि होइत, तँ की गङ्गा-स्नान-सम्बन्धी अन्धविश्वास उचित छल? तर्कक ई शिथिलता कथाक प्रगतिशील अभिप्रायकेँ कमजोर करैत अछि।
१६. 'चन्द्रग्रहण'क नारी-पात्रसम्बन्धी सीमा
स्त्री-पात्रक नूतनता पहचानल गेल अछि, मुदा स्त्रीक मूल्याङ्कन कतेको स्थानपर त्याग, शील, प्रेम आ पारिवारिक दायित्वक परम्परागत कसौटीसँ होइत अछि। नायिकाक कामना आ देहबोधक चर्चा अछि, मुदा स्त्रीक आर्थिक स्वतन्त्रता, सम्पत्ति-अधिकार, शिक्षा, श्रम आ सार्वजनिक जीवनमे सहभागिताक प्रश्न सीमित अछि। कथा-वाचकक पुरुष-दृष्टि आ पात्रक अपन स्वरमे स्पष्ट अन्तर करब आवश्यक छल — लेखकद्वारा स्त्रीकेँ बजाओल जाएब आ स्त्रीक स्वतन्त्र आत्मकथन समान नहि।
१७. 'चर्चरी' अध्यायक सीमा
गप्पकेँ स्वतन्त्र विधा मानबाक तर्क सर्जनात्मक अछि, मुदा विधाक अनिवार्य लक्षण, सीमा, संरचना आ कथा-निबन्ध-प्रहसनसँ भेद व्यवस्थित रूपसँ निर्धारित नहि अछि। हरिमोहन झाक हास्य कहियो सामाजिक विद्रूपताक सूक्ष्म परीक्षणक बदला पात्रक उपहास बनि जाइत अछि — हास्यक लक्ष्य प्रायः कमजोर, ग्रामीण, स्त्री अथवा रूढ़िवादी पात्र बनलापर सत्ता-विरोधी व्यङ्ग्यक धार मन्द भऽ सकैत अछि। मार्क्सवादी दृष्टिसँ ई सेहो कहल गेल अछि जे हरिमोहन झा समाजक ऊपरी सतहपर चोट करैत छथि — कर्मकाण्ड आ पण्डिताइपर — मुदा सामन्ती आर्थिक आधारपर प्रहार नहि करैत छथि; केवल हँसी-ठट्ठासँ समाजक गम्भीर घाउक चिकित्सा असम्भव। लेखक स्वयं पूर्ववर्ती आलोचकक — प्रो॰ जयदेव मिश्र आ डा॰ जयकान्त मिश्रक — ई मत उद्धृत करैत छथि जे हरिमोहन बाबू पुरान मूल्यकेँ तँ तोड़ि देलनि, मुदा कोनो नव आ रचनात्मक जीवन-मूल्य स्थापित नहि कऽ सकलाह — ई वैचारिक शून्यताक प्रश्न उठबैत अछि, आ ई सेहो जे दोष खोजबाक अत्यधिक आग्रह उदात्त सांस्कृतिक मूल्यकेँ क्षति पहुँचबैत अछि आ विकल्प प्रस्तुत नहि करैत।
१८. यात्रीक स्तम्भ-लेखनक सीमा
स्तम्भ तात्कालिक घटनापर लिखल जाइत अछि, तेँ ओकर अनेक सन्दर्भ समय बीतलापर अस्पष्ट भऽ जाइत अछि; सम्पूर्ण पत्रिका, समाचार आ पाठकीय प्रतिक्रिया बिना टिप्पणीक आशय अधूरा रहि सकैत अछि। यात्रीक प्रथम पुरुषक तीक्ष्ण स्वर स्तम्भकेँ जीवन्त बनबैत अछि, मुदा कतेको स्थानपर व्यक्तिगत निर्णय, व्यङ्ग्य अथवा आक्रोश विश्लेषणपर भारी पड़ि सकैत अछि। स्तम्भ-लेखनक विधागत सीमा सेहो अछि — तात्कालिक प्रतिक्रियासँ आगाँ बढ़ि ई कोनो दीर्घकालीन सैद्धान्तिक विकल्प नहि दऽ पबैत अछि। तीनू स्तम्भ कम अवधिक लेल चलल; एहि कारण यात्रीक स्तम्भ-चिन्तनक दीर्घकालीन विकासक्रम निर्धारित करब कठिन अछि। उपलब्ध सामग्रीक आलोचनात्मक सम्पादन आ कालानुक्रमिक प्रकाशन आवश्यक अछि।
१९. आरसीसम्बन्धी अध्यायक सीमा
आरसीक विशाल काव्ययात्राकेँ राष्ट्रीयता, मिथिला-प्रेम, सामाजिकता आ गीतात्मकताक प्रमुख सूत्रमे समेटल गेल अछि, मुदा चरणानुसार वैचारिक परिवर्तनक अधिक सूक्ष्म विश्लेषण सम्भव छल। प्रारम्भिक राष्ट्रीय कविता कहियो घोषणात्मक अछि — प्रखर राष्ट्रवादक शोरमे कतहु-कतहु मिथिलाक आन्तरिक वर्ग-संघर्ष आ सीमान्तकृत समाजक सूक्ष्म यथार्थ दबा जाइत अछि आ कविता प्रचार दिस झुकि जाइत अछि। मिथिलाक प्राकृतिक सौन्दर्यक वर्णन आदर्शीकृत अछि, जखन यथार्थमे बाढ़, गरीबी आ पलायन सेहो समान रूपसँ वर्तमान छल। छायावाद आ रहस्यवादक प्रभाव उल्लेखित अछि, मुदा आरसी एहि प्रभावकेँ कोना मैथिली अनुभवमे रूपान्तरित करैत छथि, तकर तुलनात्मक परीक्षण कम अछि।
२०. मोहनजीसम्बन्धी अध्यायक सीमा
अध्याय संस्मरणात्मक आत्मीयतासँ भरल अछि। एहि आत्मीयतासँ व्यक्तित्व जीवन्त बनैत अछि, मुदा आलोचनात्मक दूरी घटैत अछि। जीवन-सङ्घर्ष, गरीबी आ उदार स्वभावक वर्णन विस्तृत अछि; काव्य-संग्रह, पाठान्तर, छन्द, बिम्ब, भाषा आ विचार-विकासक व्यवस्थित विश्लेषण अपेक्षाकृत कम। 'आयल वसन्त'क लोकप्रियता सम्पूर्ण काव्य-व्यक्तित्वक प्रतिनिधि नहि भऽ सकैत अछि — कम प्रसिद्ध, कमजोर अथवा विचारात्मक कविता सभक परीक्षण रहितए मूल्याङ्कन अधिक सन्तुलित होइत।
२१. उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास'सम्बन्धी सीमा
भाषिक शुद्धतावाद मातृभाषा-स्वाभिमानक साधन भऽ सकैत अछि, मुदा कठोर रूपमे ओ भाषा-संकरता, नवशब्द, शहरी अनुभव आ बदलैत बोलचालकेँ अस्वीकार करि सकैत अछि। भाषा जीवित समाजक सङ्ग बदलैत अछि — प्रत्येक बाहरी शब्द अपवित्र आ प्रत्येक पुरान शब्द शुद्ध नहि होइत अछि; शुद्धताक कसौटी के निर्धारित करत — ई प्रश्न आवश्यक अछि। कथाकारक भाषा-साधनाक प्रशंसा अछि, मुदा कथानक, चरित्र, मनोविज्ञान आ सामाजिक दृष्टिक सीमापर समान विस्तार नहि — भाषा कथा-साहित्यक प्रमुख तत्त्व अछि, किन्तु एकमात्र तत्त्व नहि। संगहि एतय एक आलोचनात्मक अन्तर्विरोध सेहो अछि — रमानन्द झा व्यासक कथाकेँ 'समसामयिक जीवनसँ विशेष प्रभावित नहि होएब' आ 'परिवर्तित युग-जीवनक विकृतिसँ अप्रभावित रहब'केँ गुण मानैत छथि, जखन कि अन्यत्र (गंगानन्द सिंह, चन्द्रग्रहण, ललित, धीरेन्द्रक विवेचनमे) ओ यथार्थ-संवेदना आ परिवेश-सम्पृक्तिकेँ सर्वोच्च मूल्य मानैत छथि — मूल्य-मानदण्डक अस्थिरताक ई स्पष्ट प्रमाण थिक, जकर विस्तृत विवेचन आगाँ पद्धतिगत सीमामे कएल गेल अछि।
२२. राजेश्वर झासम्बन्धी अध्यायक सीमा
ई अध्याय स्वयं अत्यन्त आलोचनात्मक अछि, मुदा कतेको स्थानपर खण्डनक स्वर अत्यधिक कठोर बनि जाइत अछि। शोधकर्ताक ऐतिहासिक परिस्थिति, उपलब्ध स्रोत आ समयक पद्धतिगत सीमा सेहो ध्यानमे राखल जा सकैत छल। राजेश्वर झाक निष्कर्ष प्रमाणहीन अछि — ई देखाओल गेल, मुदा वैकल्पिक काल-विभाजन अथवा अवहट्ट-विकासक पूर्ण प्रतिमान प्रस्तुत नहि कएल गेल। व्यक्तित्व आ कृतित्वक परिचयक बाद त्रुटि-सूची विस्तृत अछि; श्रेष्ठ शोध, उपयोगी सङ्कलन अथवा सफल नाटकक निकट पाठ कम अछि। आलोचना केवल असहमति नहि, उपयोगी अंशक पुनर्स्थापन सेहो होयबाक चाही। संगहि राजेश्वर झाक निधनक शोक-प्रसङ्गमे आत्मीयता-जनित भावुकता आलोचनात्मक दूरीकेँ प्रभावित करैत अछि।
२३. ललितक कथासम्बन्धी अध्यायक सीमा
अध्याय सामाजिक, राजनीतिक, अस्तित्ववादी, लैङ्गिक आ धार्मिक अनेक प्रश्न एकत्र करैत अछि। एहि विस्तारसँ कतेको कथाक विशिष्ट रूप आ सौन्दर्य पाछाँ पड़ि जाइत अछि। यौनिक इच्छाकेँ जैविक आवश्यकता कहि धार्मिक-नैतिक बन्धनसँ मुक्त करबाक व्याख्या एकाङ्गी भऽ सकैत अछि — इच्छा सत्ता, सहमति, लैङ्गिक असमानता आ भावात्मक सम्बन्धसँ सेहो जुड़ल अछि। कथा सभकेँ युगक प्रत्यक्ष दस्तावेज मानल गेल अछि; साहित्य यथार्थक प्रतिलिपि नहि — चयन, कल्पना, प्रतीक आ कथन-दृष्टिद्वारा निर्मित रूप अछि। लेखक आ पात्रक विचारमे भेद आवश्यक अछि।
२४. धीरेन्द्रक कथासम्बन्धी सीमा
सामाजिक सन्दर्भक सैद्धान्तिक प्रस्ताव महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा प्रत्येक कथाकेँ वर्ग-शोषण, बेरोजगारी आ सामाजिक अन्यायमे सीमित करलापर रचनाक मनोवैज्ञानिक, भाषिक आ प्रतीकात्मक स्तर घटि सकैत अछि। 'गीध'क प्रतीक प्रभावशाली अछि, मुदा प्रतीकक अनेक सम्भावित अर्थक बदला एक निश्चित वर्गीय अर्थपर बल देल गेल अछि। कथाक भाषा, संवाद, मौन, कथा-वाचकक दूरी, अन्तक अनिश्चितता आ पाठकीय सहभागिताक अधिक विश्लेषण अपेक्षित छल। सामाजिक विषयक प्रासङ्गिकता स्वतः कलात्मक सिद्धिक प्रमाण नहि।
२५. प्रभासक कथा-यात्राक सीमा
'यात्रा' शब्द क्रमिक विकासक भाव उत्पन्न करैत अछि, मुदा प्रत्येक लेखकक सर्जना सरल रेखामे आरम्भिकसँ परिपक्व दिस नहि बढ़ैत अछि — बादक रचना सदैव पहिलसँ श्रेष्ठ हो, ई आवश्यक नहि। जीवनी आ सामाजिक परिवेशकेँ कथा-विकासक प्रमुख कारण मानल गेल अछि; साहित्यिक प्रभाव, पत्रिकाक सम्पादकीय नीति, पाठक-वर्ग, विधागत प्रयोग आ आत्मसमीक्षाक भूमिका कम स्पष्ट अछि। प्रभासक चुनल कथा सभक आधारपर सम्पूर्ण कथा-दृष्टि निर्धारित करब सीमित निष्कर्ष भऽ सकैत अछि — अप्रकाशित, दुर्लभ अथवा कम सफल कथा सेहो समग्र मूल्याङ्कन लेल आवश्यक अछि।
पद्धतिगत संकट : समग्र सीमाक विस्तृत विवेचन
सीमा १ : संकलनात्मक असंगति आ संरचनात्मक एकसूत्रताक अभाव
कृतिक सर्वप्रथम आ सर्वाधिक मौलिक सीमा ओकर उत्पत्ति-प्रक्रियामे निहित अछि। ई पचीस निबन्ध सन् १९७२ सँ १९८९ धरि विभिन्न पत्र-पत्रिकामे विभिन्न अवसरपर, विभिन्न पाठक-वर्गकेँ ध्यानमे राखि, स्वतन्त्र रूपेँ लिखल गेल छल। एकरा एकठाम राखि 'ग्रन्थ' बना देलासँ एक अन्तर्निहित असंगति उत्पन्न होइत अछि — कतहु व्यक्तित्व-प्रधान (त्रिलोचन झा, राजेश्वर झा), कतहु कृति-प्रधान ('सुमति', 'चन्द्रग्रहण'क नारी-पात्र), कतहु विधा-प्रधान (स्तम्भ-लेखन), कतहु प्रवृत्ति-प्रधान (यदुवर, द्विजवर) समीक्षा। कोनो एकसमान सैद्धान्तिक ढाँचा समस्त निबन्धकेँ नहि बान्हैत अछि। फलतः पाठककेँ बेर-बेर सन्दर्भ-परिवर्तन करय पड़ैत अछि। रूपवादी दृष्टिसँ ई संरचनात्मक शिथिलता थिक — ग्रन्थमे कोनो आरोह-अवरोह-युक्त तार्किक प्रगति नहि। अध्याय-क्रम प्रायः लेखक-जन्मक कालक्रमपर आधारित बुझाइत अछि, मुदा ई क्रम सेहो असंगत अछि — किछु निबन्ध अत्यन्त लघु, किछु अत्यन्त दीर्घ, बिना कोनो घोषित तर्कक। एक सुनियोजित ग्रन्थमे जे भूमिका, पद्धति-कथन आ उपसंहार अपेक्षित होइत अछि, से एहिमे अनुपस्थित अछि — प्रत्येक निबन्धक अन्तमे मात्र मूल प्रकाशन-स्रोत आ तिथि देल अछि, जे संकलनक जोड़ा-जाड़ी प्रकृतिकेँ उघारि दैत अछि। अध्याय सभक विस्तार, पद्धति आ आलोचनात्मक गहराई समान नहि।
सीमा २ : 'अनुपलब्धता'क आवर्ती स्वीकृति — समीक्षाक आधारभूत दुर्बलता
कृतिक सर्वाधिक गम्भीर पद्धतिगत संकट ई जे लगभग प्रत्येक प्रारम्भिक निबन्धमे समीक्षक स्वयं मूल रचनाक 'अनुपलब्धता'केँ स्वीकार करैत छथि। 'चन्द्रप्रभा'क प्रसङ्गमे — 'चन्द्रप्रभाक अध्ययन-विश्लेषण नीक जकाँ नहि कएल जा सकल अछि, एकर प्रमुख कारण थिक अनुपलब्धता'; त्रिलोचन झाक प्रसङ्गमे — 'बड़ कम सामग्री उपलब्ध अछि'; यदुवरक प्रसङ्गमे — 'यदुवरक प्रसंग अद्यावधि बड़ कम अनुसन्धान भेल अछि'; बिसरल जनार्दन झाक प्रसङ्गमे — 'पत्र-पत्रिकोमे जे रचना प्रकाशित भेल होएत, आब सर्वसुलभ नहि अछि।'
एतय एक गहन विरोधाभास उत्पन्न होइत अछि — जँ मूल कृति समीक्षककेँ स्वयं उपलब्ध नहि छल, तँ ओकर सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्याङ्कन कोन आधारपर सम्भव? बहुत ठाम समीक्षा वस्तुतः द्वितीयक स्रोतपर — जयकान्त मिश्रक मैथिली साहित्येतिहास, करुणाकान्त झाक शोध-प्रबन्ध, अन्य समीक्षकक उद्धरणपर — आश्रित भऽ जाइत अछि। रमानन्द झा स्वयं स्वीकार करैत छथि जे अधिकांश परवर्ती समीक्षकक 'सामग्रीक सीमा जयकान्त मिश्रक इतिहासे अछि' — मुदा ई आरोप स्वयं हुनकहुपर आंशिक रूपेँ लागू होइत अछि। पाठ-केन्द्रित समीक्षाक दृष्टिसँ ई एक मौलिक दुर्बलता थिक — पाठ बिना समीक्षा।
विदेह समान्तर इतिहास-प्रतिमानक दृष्टिसँ ई सीमा अत्यन्त शिक्षाप्रद थिक। समान्तर इतिहासक पहिल दायित्व अभिलेखीकरण आ पाठ-सुलभीकरण थिक — मूल पाठकेँ डिजिटल/मुद्रित रूपेँ सर्वसुलभ केने बिना ओकर पुनर्मूल्याङ्कन असम्भव। रमानन्द झा एहि आवश्यकताकेँ बेर-बेर रेखाङ्कित तँ करैत छथि ('सर्वसुलभ भेलेपर विशेष प्रकाश पड़ि सकत'), मुदा ओ स्वयं ओहि अभिलेखीय कार्यकेँ सम्पन्न नहि कऽ पबैत छथि — किएक तँ ओहि डिजिटल-पूर्व युगमे ई व्यक्तिगत श्रमसँ असम्भव-प्राय छल। इएह अभिलेखीय रिक्तताकेँ विदेह-आन्दोलन अपन ई-पत्रिका, पोथी-संग्रह आ पञ्जी-अभिलेखीकरणसँ भरबाक प्रयास करैत अछि। तात्पर्य — 'अखियासल'क सभसँ पैघ सीमा इएह ओकर सभसँ पैघ ऐतिहासिक सार्थकता थिक : ई ओहि रिक्तताकेँ नामाङ्कित करैत अछि जकरा भरब परवर्ती पीढ़ीक दायित्व बनि जाइत अछि।
सीमा ३ : मूल्य-मानदण्डक अस्थिरता आ आन्तरिक अन्तर्विरोध
गम्भीर सैद्धान्तिक दृष्टिसँ कृतिक सर्वाधिक विचारणीय दोष ओकर मूल्य-मानदण्डक अस्थिरता थिक। रमानन्द झा एक निबन्धमे जाहि गुणकेँ सर्वोच्च मानैत छथि, दोसरमे ओकरे विपरीतकेँ प्रशंसित करैत छथि —
(क) गंगानन्द सिंह, 'चन्द्रग्रहण'क नारी-पात्र, ललित आ धीरेन्द्रक विवेचनमे समसामयिक यथार्थ-संवेदना, परिवेश-सम्पृक्ति आ युग-जीवनक प्रतिबिम्बनकेँ सर्वोच्च मूल्य मानल गेल अछि; किन्तु व्यासक कथाकेँ ठीक एहि कारणेँ प्रशंसित कएल गेल जे ओ समसामयिक जीवनसँ विशेष प्रभावित नहि होइत अछि आ परिवर्तित युग-जीवनक विकृतिसँ अप्रभावित रहैत अछि। ई प्रत्यक्ष आत्मविरोध थिक — यथार्थ-सम्पृक्ति कखनहु गुण, कखनहु ओकर अभाव गुण।
(ख) हरिमोहन झाक हास्यकेँ 'विचारक उन्मेष नहि करब'क कारणेँ न्यून मूल्य देल गेल, किन्तु मधुपक गीतकेँ 'तत्काल हृदय-प्रभाव' आ आनन्दक कारणेँ उच्च मूल्य देल गेल — जखन कि गीत सेहो प्रायः वैचारिक मन्थन नहि, अपितु भाव-तात्कालिकतापर आश्रित होइत अछि। तत्काल-प्रभाव कखनहु गुण (गीत), कखनहु दोष (हास्य)।
(ग) 'कोबर-गीत' सन आत्म-विरोधी, प्रयोजन-प्रेरित रचनाकेँ 'व्यक्तिसँ पैघ समाज'क तर्कसँ उचित ठहराओल गेल, किन्तु क्षेमेन्द्रक औचित्य-विचारक दृष्टिसँ आत्माक प्रतिकूल रचना भाव-औचित्यक मूल-भङ्ग थिक — समीक्षक एतय सैद्धान्तिक स्पष्टता प्रदान नहि कऽ पबैत छथि।
ई अस्थिरता एहि कारणेँ अछि जे रमानन्द झा कोनो एक घोषित सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता नहि अपनबैत छथि। ओ प्रसङ्गानुसार कखनहु प्रभाववादी, कखनहु समाजशास्त्रीय, कखनहु जीवनीमूलक, कखनहु रूपवादी दृष्टि अपनबैत छथि। ई पद्धतिगत सारसंग्रहवाद एक दिस लचीलापन दैत अछि, तँ दोसर दिस मूल्याङ्कनकेँ अप्रत्याशित आ असंगत बना दैत अछि।
सीमा ४ : सैद्धान्तिक अनुशीलनक अभाव — शास्त्रीय शब्दावलीक अनुपस्थिति
यद्यपि रमानन्द झाक समीक्षामे रस, ध्वनि, व्यञ्जना, औचित्य आदि भारतीय काव्यशास्त्रीय अवधारणा अन्तर्निहित रूपेँ विद्यमान अछि, तथापि ओ एहि शास्त्रीय प्रतिमानकेँ कतहु सुस्पष्ट सैद्धान्तिक उपकरणक रूपमे प्रयोग नहि करैत छथि। 'व्यञ्जित', 'सम्प्रेषण', 'भावाश्रित' सन शब्द तँ अबैत अछि, मुदा आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, कुन्तक, क्षेमेन्द्र, भट्टनायक आदि आचार्यक नाम आ हुनक सिद्धान्तक व्यवस्थित अनुप्रयोग अनुपस्थित अछि। ओहिना, पाश्चात्य सिद्धान्तक कतहु नामोल्लेख अथवा सुविचारित प्रयोग नहि भेटैत अछि। एहिसँ एक द्वैध स्थिति उत्पन्न होइत अछि। एक दिस ई सैद्धान्तिक लाघव समीक्षाकेँ सुपाठ्य, सम्प्रेषणीय आ पत्रकारीय-सुलभ बनबैत अछि — जे ओकर मूल प्रकाशन-सन्दर्भ (पत्रिका)क अनुकूल छल। मुदा दोसर दिस ई अकादमिक गहनताक अभाव उत्पन्न करैत अछि। समीक्षा विवरणात्मक आ मूल्याङ्कनात्मक तँ अछि, मुदा सैद्धान्तिक-विश्लेषणात्मक कम अछि। एक समान्तर इतिहासकेँ दीर्घकालिक वैधता प्रदान करबा लेल जे सुदृढ़ सैद्धान्तिक आधार आवश्यक होइत अछि, से एहिमे अविकसित रहि जाइत अछि।
सीमा ५ : परिप्रेक्ष्यक सीमा — पुरुष-केन्द्रिकता आ वर्ण-केन्द्रिकता
समाजशास्त्रीय आ उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टिसँ कृतिक एक गम्भीर सीमा ओकर सामाजिक परिप्रेक्ष्यक संकीर्णतामे अछि। पचीस निबन्धमे चौबीस पुरुष-रचनाकारकेँ समर्पित अछि; मात्र एक (हरिलता) स्त्री-रचनाकारकेँ। ओहूमे हरिलताक विवेचन मुख्यतः वैष्णव भक्ति धरि सीमित रहि जाइत अछि। स्त्री अधिकतर पात्र अथवा प्रेरणाक रूपमे उपस्थित छथि, स्वतन्त्र लेखिका, सम्पादिका आ आलोचकक रूपमे कम — स्त्री-लेखिकाक स्वतन्त्र साहित्यिक इतिहास पर्याप्त विकसित नहि।
ओहिना, विवेचित प्रायः समस्त रचनाकार एक विशिष्ट सामाजिक स्तरसँ अबैत छथि। मिथिलाक दलित, अतिपिछड़ा, अल्पसंख्यक आ लोक-परम्पराक — मौखिक साहित्य, गीत-नाद-परम्पराक अनाम रचयिता — रचनाकार एहि समान्तर इतिहाससँ प्रायः अनुपस्थित रहि जाइत छथि; जाति आ वर्गक प्रश्न उठैत अछि, मुदा दलित समुदायक आत्मस्वर सीमित अछि। ई सीमा युग-सापेक्ष थिक (जे उपलब्ध अभिलेख प्रायः उच्च-वर्णक छल), तथापि विदेह समान्तर-प्रतिमानक पूर्ण जनतान्त्रिक समावेशिताक कसौटीपर 'अखियासल' आंशिक रूपेँ अपूर्ण रहि जाइत अछि। समान्तर इतिहासक अर्थ मात्र बिसरल उच्चवर्णीय रचनाकारक पुनरुद्धार नहि, अपितु समग्र हाशियाक — दलित, स्त्री, लोक, मौखिक — पुनःस्थापना थिक; एहि व्यापक अर्थमे रमानन्द झाक परियोजना एक आरम्भ मात्र थिक, पूर्णता नहि।
सीमा ६ : पाठ-प्रामाणिकता आ सम्पादकीय अशुद्धिक प्रश्न
कृतिमे उद्धृत पद्यांश आ गद्यांशक पाठ-प्रामाणिकता सन्दिग्ध रहि जाइत अछि। किएक तँ स्वयं समीक्षक स्वीकार करैत छथि जे बहुतो रचना पत्र-पत्रिकामे छिड़िआएल आ अनुपलब्ध अछि, तेँ उद्धृत अंशक मूल पाठसँ तुलना-सत्यापन प्रायः असम्भव छल। परवर्ती सम्पादन आ मुद्रण-प्रक्रियामे एहि पाठक शुद्धता आओर संकटग्रस्त भऽ सकैत अछि — उपलब्ध प्रतिमे वर्तनी-अस्थिरता आ मुद्रण-दोष सेहो विद्यमान अछि। एक विश्वसनीय समान्तर इतिहास लेल पाठ-समीक्षा आ आलोचनात्मक संस्करणक अनुशासन अनिवार्य थिक, जकर अभाव एहि आरम्भिक कृतिमे स्वाभाविक अछि। 'प्रथम' आ 'मौलिक' सन पद लेल अधिक कठोर पाठालोचन, पाण्डुलिपि-अध्ययन आ प्रकाशन-इतिहास आवश्यक अछि; निष्कर्ष जँ सीमित सामग्रीपर आधारित हो, तँ अनुमानकेँ प्रमाणक स्थान नहि लेबाक चाही।
सीमा ७ : आत्मीयता-जनित प्रशंसाक अतिरेक आ आलोचनात्मक दूरीक अभाव
अनेक निबन्धमे — विशेषतः लक्ष्मीपति सिंह, मोहन आ राजेश्वर झा-सम्बन्धी अध्यायमे — समीक्षक आ विवेच्य रचनाकारक बीच व्यक्तिगत आत्मीयता समीक्षाकेँ संस्मरणात्मक श्रद्धाञ्जलिक रूप दऽ दैत अछि। मोहनक स्मरण, लक्ष्मीपति सिंहक विहुँसैत आकृतिक भावुक चित्रण, राजेश्वर झाक निधनक शोक — ई सभटा भावनात्मक रूपेँ मार्मिक तँ अछि, मुदा एहिसँ आलोचनात्मक दूरी भङ्ग होइत अछि। वस्तुनिष्ठ समीक्षाक दृष्टिसँ ई प्रशंसा-पूर्वाग्रह थिक, जे मूल्याङ्कनक निष्पक्षताकेँ प्रभावित करैत अछि। अपवाद-स्वरूप हरिमोहन झा-सम्बन्धी निबन्धमे समीक्षक जे आलोचनात्मक साहस देखबैत छथि, से समस्त संग्रहमे समान रूपेँ उपस्थित नहि अछि। जीवनी कतहु-कतहु कृतिक विश्लेषणपर आ विषयवस्तु रूप-सौन्दर्यपर भारी पड़ैत अछि।
सीमा ८ : समान्तर इतिहास-प्रतिमानक अपूर्ण सैद्धान्तिकीकरण
अन्ततः, विदेह समान्तर इतिहास-प्रतिमानक दृष्टिसँ सर्वाधिक मौलिक सीमा ई जे रमानन्द झा समान्तर इतिहासक अवधारणाकेँ व्यवहारमे तँ जीबैत छथि, मुदा ओकरा सिद्धान्तक रूपमे स्पष्टतः प्रतिपादित नहि करैत छथि। 'दू कोटिक साहित्यकार'क सिद्धान्त एकर सर्वाधिक निकट थिक, मुदा ओ मुख्यधाराक कैननक — जयकान्त मिश्रक इतिहासक — विकल्प अथवा विरोध नहि, अपितु ओकर पूरक बनि रहि जाइत अछि। समीक्षक बेर-बेर जयकान्त मिश्रकेँ प्रामाणिक आधार मानि हुनकहि सूचनापर आश्रित रहैत छथि, जखन कि समान्तर इतिहासक असली दायित्व मुख्यधाराक कैननक आधार-मान्यताकेँ स्वयं प्रश्नाङ्कित करब थिक। तात्पर्य — 'अखियासल' समान्तर इतिहासक सामग्री तँ प्रस्तुत करैत अछि, मुदा ओकर सैद्धान्तिकी अविकसित छोड़ि दैत अछि। ई कैननकेँ विस्तारित करैत अछि, मुदा कैनन-निर्माणक शक्ति-संरचनाकेँ विखण्डित नहि करैत अछि। इएह ओहि कार्यक रिक्तता थिक जकरा विदेह-आन्दोलन अपन घोषित सैद्धान्तिकी, संस्थागत अभिलेखीकरण आ जनतान्त्रिक समावेशितासँ पूर्ण करबाक प्रयास करैत अछि।
संगहि ई सेहो कहबाक चाही जे मातृभाषा-प्रेम पोथीक ऊर्जा अछि, मुदा कतेको स्थानपर ई प्रेम सांस्कृतिक गौरववाद अथवा बाहरी प्रभावक प्रति अत्यधिक संशयमे बदलि जाइत अछि — जखन कि भाषा सदैव सम्पर्क, मिश्रण आ परिवर्तनसँ विकसित होइत अछि; आ राष्ट्रीय अथवा सांस्कृतिक आस्था कतहु-कतहु प्रश्नरहित मूल्य बनि जाइत अछि।
समग्र आलोचनात्मक निर्णय
पोथीक प्रमुख उपलब्धि
'अखियासल'क सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि अछि — साहित्यिक इतिहासक विस्मृत स्थान सभपर प्रकाश देब। ई पोथी पूछैत अछि —
मैथिली कथाक वास्तविक आरम्भ कतयसँ मानल जाए?
प्रभाव आ अनुवादमे की अन्तर अछि?
'प्रथम' कृति निर्धारित करबाक प्रमाण की हो?
दुर्लभ पाण्डुलिपि इतिहाससँ कोना बाहर भऽ जाइत अछि?
पत्रिका, सम्पादक आ प्रकाशक साहित्य निर्माणमे की भूमिका निभबैत छथि?
राष्ट्रीय आन्दोलनमे मैथिली साहित्यकारक योगदान किएक विस्मृत भेल?
हास्यक लोकप्रियताक भीतर सामाजिक अन्याय ओझल तँ नहि?
भाषिक शुद्धता आ भाषिक विकासक बीच कोन सम्बन्ध अछि?
स्वतन्त्रताक बाद गरीब, बेरोजगार आ श्रमिकक जीवन किएक नहि बदलल?
साहित्यकारक वैयक्तिक अनुभव कोना सामाजिक अनुभव बनैत अछि?
ई प्रश्न पोथीकेँ साधारण व्यक्तित्व-कृतित्व सङ्ग्रहसँ ऊपर उठबैत अछि।
भारतीय साहित्यशास्त्रक दृष्टिसँ
पोथी रसक सामाजिक विस्तार करैत अछि। करुणा केवल पात्रक दुःखपर आँसू बहायब नहि, दुःखक सामाजिक कारण खोजब अछि। वीरता केवल रणभूमिमे नहि, मातृभाषा-रक्षा, सत्यक पक्ष आ शोषण-विरोधमे अछि। हास्य केवल मनोरञ्जन नहि, सत्ता आ रूढ़िक मुखौटा उतारबाक साधन अछि। ध्वनि-सिद्धान्तक अनुसार अनेक कृतिक भीतर प्रत्यक्ष कथासँ अधिक महत्त्वपूर्ण अप्रत्यक्ष सामाजिक अर्थ अछि। औचित्य-सिद्धान्त लेखककेँ इतिहासक दावा, विधागत नामकरण आ चरित्रक विश्वसनीयता परखबाक आधार दैत अछि। मुदा शास्त्रीय निकषपर मुख्यधाराक अनेक आरम्भिक रचनाक सीमा सेहो स्पष्ट होइत अछि — नीति आ उपदेशक भरमारसँ रसभङ्ग, अभिधाक प्राधान्यसँ ध्वनिक क्षय, आ नारा बनैत कवितामे वक्रोक्तिक विनाश।
पाश्चात्य सिद्धान्तक दृष्टिसँ
'अखियासल'मे नव-इतिहासवादी आ मार्क्सवादी प्रवृत्ति विशेष प्रखर अछि। साहित्य सत्ता, धन, जाति, भाषा, संस्था आ सामाजिक आन्दोलनसँ जुड़ल अछि। ललित आ धीरेन्द्रक कथा-विवेचन अस्तित्वगत संकट, वर्गीय शोषण आ आधुनिक मनुष्यक निरर्थकता उद्घाटित करैत अछि। नारीवादी दृष्टि उपस्थित अछि — विशेषतः 'निर्दयी सासु', 'सुमति' आ 'चन्द्रग्रहण'क विवेचनमे — मुदा ओकर पूर्ण सम्भावना (जेना हरिलताक प्रतिरोधी पाठ) अविकसित रहि जाइत अछि। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टिसँ मातृभाषा-विमुखता, हिन्दी-अङ्ग्रेजीक प्रभुत्व आ मैथिलीक सार्वजनिक क्षेत्रसँ निष्कासन पोथीक स्थायी चिन्ता अछि।
विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ
'अखियासल' मैथिली साहित्यक वैकल्पिक वंशावली बनबैत अछि। एहि वंशावलीमे —
श्रीकृष्ण ठाकुर आ 'चन्द्रप्रभा',
जीवछ मिश्र आ 'रामेश्वर',
रासबिहारी लाल दास आ 'सुमति',
जनसीदन आ बिसरल जनार्दन झा सन साहित्यसेवी,
त्रिलोचन झा सन मातृभाषानुरागी,
यदुवर आ द्विजवर सन जागरणकारी कवि,
हरिलता सन संघर्षशील कवीश्वरी,
लक्ष्मीपति सिंह सन सम्पादक,
मधुप आ मोहन सन गीतकार,
यात्री सन स्तम्भकार,
व्यास सन भाषिक शुद्धतावादी,
राजेश्वर झा सन संस्था-निर्माता,
किरण, ललित, धीरेन्द्र आ प्रभास सन सामाजिक कथाकार
— एकहि विस्तृत इतिहासमे स्थान पबैत छथि। ई इतिहास मिथिलाकेँ राजवंश अथवा पाण्डित्यक केन्द्र मात्र नहि मानैत अछि। एहि मिथिलामे भूखल बालक, अत्याचारित पुतोहु, बेरोजगार युवक, शोषित किसान, मातृभाषा-विहीन शिक्षित वर्ग, मुद्रणालयक श्रमिक आ विस्मृत सम्पादक सभ उपस्थित छथि।
उपसंहार : आरम्भक गरिमा आ रिक्तताक उत्तराधिकार
'अखियासल'क महत्त्व अन्तिम निर्णय देबामे नहि, मैथिली साहित्यक इतिहासपर पुनर्विचार करबामे अछि। ई पोथी प्रतिष्ठित इतिहासक सामने वैकल्पिक प्रश्न राखैत अछि। लेखक साहित्यक चमकैत शिखर मात्र नहि देखैत छथि; ओ नीचाँ दबाओल ईंट, टूटल पाण्डुलिपि, पुरान पत्रिका, भूखल पात्र, उपेक्षित भाषा आ विस्मृत साहित्यसेवीकेँ सेहो देखैत छथि। पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुरसँ लऽ कऽ प्रभास कुमार चौधरी धरि साहित्यमे यथार्थवाद, राष्ट्रवाद आ समाज-सुधारक क्रमिक विकास दृष्टिगोचर होइछ, आ संगहि — जखन एहि सम्पूर्ण रचना-संसारकेँ समान्तर इतिहास-दृष्टि, नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसा आ पाश्चात्य-भारतीय काव्यशास्त्रक कठोर निकषपर कसल जाइछ — तखन एकर ढाँचागत, वैचारिक आ सैद्धान्तिक सीमा सेहो उजागर होइत अछि: सामन्ती मानसिकताक अवशेष, सुधारवादक सीमा, पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रह आ वञ्चित वर्गक प्रामाणिक स्वरक अभाव। साहित्य तखनहि पूर्णतः समान्तर आ प्रामाणिक बनि सकैछ जखन ओ राज्याश्रय आ सामन्ती वर्चस्वसँ मुक्त भऽ, शोषितक यथार्थकेँ बिना कोनो हेत्वाभासकेँ, पूर्ण ज्ञानमीमांसीय साहसक सङ्ग प्रस्तुत करए।
एकर श्रेष्ठता ओतए अछि जतए —
लेखक अभिलेख खोजैत छथि,
प्रचलित भूल सुधारैत छथि,
विस्मृत लेखककेँ पुनः उपस्थित करैत छथि,
सामाजिक जीवन आ साहित्यक सम्बन्ध खोलैत छथि,
प्रशंसा करितो आलोचनात्मक दूरी रखैत छथि,
मातृभाषा आ जनजीवनकेँ साहित्येतिहासक केन्द्र बनबैत छथि।
एकर सीमा ओतए अछि जतए —
अनुमान प्रमाणक स्थान लैत अछि,
जीवनी कृतिक विश्लेषणपर भारी पड़ैत अछि,
विषयवस्तु रूप-सौन्दर्यकेँ ढाँकि दैत अछि,
मूल्य-मानदण्ड अस्थिर भऽ जाइत अछि,
राष्ट्रीय अथवा सांस्कृतिक आस्था प्रश्नरहित मूल्य बनि जाइत अछि,
स्त्री, दलित आ निम्नवर्गक आत्मस्वर पर्याप्त स्वतन्त्रता नहि पबैत अछि।
समग्र मूल्याङ्कनक निष्कर्ष ई जे 'अखियासल' अपन युगक एक अग्रगामी, साहसी आ ऐतिहासिक दृष्टिसँ अपरिहार्य कृति थिक, जकर मौलिकता ओकर सीमासँ अभिन्न रूपेँ जुड़ल अछि। एकर गुण — प्रथम-अन्वेषणक साहस, बिसरल रचनाकारक पुनरुद्धार, समाजशास्त्रीय अन्तर्दृष्टि, 'दू कोटिक साहित्यकार'क मौलिक सिद्धान्त, आ मैथिली साहित्येतिहासकेँ व्यक्ति-केन्द्रित कैननसँ मुक्त कऽ जन-केन्द्रित बनएबाक प्रयास — ई सभटा एकरा मैथिली आलोचनाक एक कोसिला-प्रस्तर बनबैत अछि। संगहि एकर सीमा — संकलनात्मक असंगति, मूल पाठक अनुपलब्धता, मूल्य-मानदण्डक अस्थिरता, सैद्धान्तिक अनुशीलनक अभाव, परिप्रेक्ष्यक संकीर्णता, पाठ-प्रामाणिकताक संकट, आत्मीयता-जनित पूर्वाग्रह आ समान्तर इतिहासक अपूर्ण सैद्धान्तिकीकरण — ई सभटा कोनो व्यक्तिगत न्यूनता नहि, अपितु ओहि मुद्रण-सीमित, डिजिटल-पूर्व, संस्था-विहीन युगक संरचनात्मक बाध्यताक प्रतिफल थिक।
इएह द्वैध — गुण आ सीमाक अभिन्नता — 'अखियासल'केँ विदेह समान्तर इतिहास-आन्दोलनक एक पूर्व-रूप बनबैत अछि। जे रिक्तताकेँ रमानन्द झा नामाङ्कित करैत छथि — सर्वसुलभता, अभिलेखीकरण, पुनर्मूल्याङ्कन — ओहि रिक्तताकेँ भरब परवर्ती पीढ़ीक ऐतिहासिक दायित्व बनि जाइत अछि। एहि अर्थमे, कृतिक सभसँ पैघ सीमा इएह ओकर सभसँ पैघ उत्तराधिकार थिक। 'आँखि' ओहि दृष्टिक थिक जे बिसरल पाठकेँ देखबाक साहस केलक, आ 'साल' ओहि युगक थिक जाहिमे ओहि दृष्टिकेँ पूर्ण करबाक साधन अनुपलब्ध छल — 'अखियासल' नाम स्वयं एहि द्वैधक व्यञ्जना करैत अछि। तथापि मैथिली आलोचना आ साहित्येतिहासमे 'अखियासल'क स्थान महत्त्वपूर्ण अछि। ई पोथी इतिहासक बन्द कपाट खोलि कहैत अछि जे साहित्यक वास्तविक परम्परा केवल प्रसिद्ध नामक सूची नहि — ओ स्मृति, विस्मृति, संघर्ष, भाषा, संस्था, पाठक आ जनजीवनक संयुक्त समान्तर इतिहास अछि।
परिशिष्ट : संग्रहक अध्याय-सूची (मूल प्रकाशन-स्रोत सहित)
सन्दर्भ-ग्रन्थ-सूची
1. रमानन्द झा 'रमण', अखियासल, भारतीय भाषा संस्थान (सी.आइ.आइ.एल.), मैसूर, १९९५।
2. जयकान्त मिश्र, अ हिस्ट्री ऑफ मैथिली लिटरेचर (मैथिली साहित्यक इतिहास)।
3. करुणाकान्त झा, शोध-प्रबन्ध (मैथिली साहित्य-सम्बन्धी), 'अखियासल'मे उद्धृत।
4. गजेन्द्र ठाकुर, अ पैरेलल हिस्ट्री ऑफ मिथिला एण्ड मैथिली लिटरेचर, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, भाग १, https://www.videha.co.in/new_page_1.htm
5. गजेन्द्र ठाकुर, अ पैरेलल हिस्ट्री ऑफ मिथिला एण्ड मैथिली लिटरेचर, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, भाग २७, https://www.videha.co.in/new_page_27.htm
6. गजेन्द्र ठाकुर, अ पैरेलल हिस्ट्री ऑफ मिथिला एण्ड मैथिली लिटरेचर, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, भाग २८, https://www.videha.co.in/new_page_28.htm
7. गजेन्द्र ठाकुर, अ पैरेलल हिस्ट्री ऑफ मिथिला एण्ड मैथिली लिटरेचर, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, भाग ९०, https://www.videha.co.in/new_page_90.htm
8. गजेन्द्र ठाकुर, रचना-सङ्कलन, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, https://www.videha.co.in/gajenthakur.htm
9. मूल निबन्ध सभक प्रथम-प्रकाशन पत्र-पत्रिका : मिथिला मिहिर, मिथिलामोद, भाखा, मैथिली अकादमी पत्रिका, बसात, हालचाल, मैथिली प्रकाश तथा अखिल भारतीय मैथिली साहित्य सम्मेलन/परिषद्क स्मारिका (१९७२–१९८९)।
२.२२. गजेन्द्र ठाकुर- अखियासल (ठेठी-अंगिका मैथिली)
'अखियासल': भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त आरो विदेह समान्तर इतिहास के नजर सें विस्तृत आलोचनात्मक आस्वाद
-गजेन्द्र ठाकुर
प्रस्तावना: कृति, कृतिकार आरो समीक्षा के सुरू-बिन्दु
डा॰ रमानन्द झा 'रमण' के 'अखियासल' मैथिली साहित्य के इतिहास, कथा-विकास, सुरुआती उपन्यास, बिसरल साहित्यसेवी, राष्ट्रीय चेतना, गीत-काव्य, पत्रकारिता, स्तम्भ-लेखन आरो आधुनिक कथा के सामाजिक सरोकार के पुनर्मूल्याङ्कन करैवाला आलोचनात्मक निबन्ध-संग्रह छै। ई संग्रह भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर सें सन् १९९५ ई॰ में छपलै आरो एकरा में पचीस गो स्वतन्त्र आलोचनात्मक निबन्ध संकलित छै। ई सब्भे निबन्ध के मूल परकाशन-स्रोत 'मिथिला मिहिर', 'मिथिलामोद', 'भाखा', 'मैथिली अकादमी पत्रिका', 'बसात', 'हालचाल', 'मैथिली प्रकाश' जइसन पत्र-पत्रिका आरो अखिल भारतीय मैथिली साहित्य सम्मेलन के स्मारिका छै। तात्पर्य ई जे ई कोय एकहि बेर योजनाबद्ध रूप में लिखल गेलै ग्रन्थ नै, बल्कि सन् १९७२ सें लऽ कऽ १९८९ धरि के लगभग दू दशक के पत्रकारीय-आलोचनात्मक श्रम के संचयन छै। ई संकलनात्मक स्वरूप के ध्यान में रखने बिना एकर समुचित मूल्याङ्कन सम्भव नै।
पोथी के सुरुआत पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुर आरो 'चन्द्रप्रभा' के मैथिली के सुरुआती कथाकारिता आरो कथा-संग्रह के परम्परा में प्रतिष्ठित करै के प्रयास सें होय छै आरो अंत आधुनिकतम कथाकार प्रभास कुमार चौधरीपर — यानी मैथिली के पहिलों कथाकार सें लऽ कऽ समकालीन कथाकार तक, अकसर दुइ शताब्दी के फैलाव ई पचीस निबन्ध में समाहित छै। ई दीर्घ पटल के कारणें 'अखियासल' खाली समीक्षा नै, बल्कि एक प्रकार के समान्तर साहित्येतिहास के नींव-प्रस्तर बनी जाय छै — आरो इहे ओकर सबसें बड़का मौलिकता आरो सबसें बड़का सीमा दुनू के स्रोत छै।
ई पोथी साहित्य के स्थापित शिखर-पुरुष सब्भे के प्रशस्ति खाली नै करै छै। एकर मूल प्रश्न छै — मैथिली साहित्य के इतिहास में के स्मरणीय बनाओल गेलै, के बिसरल भेलै, कोन रचना 'प्रथम' कहल गेलै, कोन पाण्डुलिपि पाठक तक नै पहुँचल, आरो साहित्यिक मान्यता निर्माण में संस्था, पत्रिका, सम्पादक, प्रकाशक, प्रवासी केन्द्र आरो सामाजिक सत्ता कइसन भूमिका निभाबै रहलै। कृति के केन्द्रीय अभिप्राय साफ छै — मैथिली गद्य आरो पद्य के ओहि प्रारम्भिक आरो उपेक्षित रचनाकार सिनी के प्रकाश में अनब, जिनका मुख्यधारा के साहित्येतिहास बिसरि गेलै अथवा जिनका सम्बंधी सामग्री 'अनुपलब्ध' रहि गेलै।
'अखियासल' के पचीस अध्याय एकरेखीय इतिहास के बदला कई समान्तर धारा के उघार करै छै —
मैथिली के सुरुआती कथा आरो उपन्यास के खोज,
बिसरल रचनाकार के पुनर्प्रतिष्ठा,
स्वतन्त्रता-सङ्ग्राम आरो मातृभाषा-जागरण,
कथा, गीत, गप्प, स्तम्भ आरो पत्रकारिता के विधागत विवेचन,
नारी, गरीब, किसान, बेरोजगार युवक आरो शोषित वर्ग के अनुभव,
स्वतन्त्रता के बाद के राजनीतिक विडम्बना,
सामाजिक संक्रमण, अस्तित्व-संकट आरो नैतिक अवमूल्यन।
ई अर्थ में 'अखियासल' आलोचना खाली नै, मैथिली साहित्य के अभिलेखीय फेर-उभार आरो समान्तर इतिहास-लेखन के जरूरी उपक्रम छै।
परस्तुत मूल्याङ्कन में तीन दृष्टि-प्रतिमान के एकसाथ परयोग कैल गेलै — (क) भारतीय काव्यशास्त्रीय प्रतिमान (रस, ध्वनि, वक्रोक्ति, औचित्य, रीति, अलङ्कार, साधारणीकरण, लोकमङ्गल); (ख) पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त (ऐतिहासिकतावाद आरो नव-ऐतिहासिकतावाद, मार्क्सवादी समाजशास्त्रीय समीक्षा, रूपवाद, नारीवादी विमर्श, उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श, अस्तित्ववादी-मनोविश्लेषणवादी दृष्टि, पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धान्त, विखण्डनवाद के हाशिया-फेर-उभार आरो कैनन के राजनीति); आरो (ग) विदेह समान्तर साहित्य-आन्दोलन के समान्तर इतिहास-प्रतिमान आरो गङ्गेश उपाध्याय-मूल के नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसा, जे मुख्यधारा के कैनन-निर्माण के खिलाफ लुप्तप्राय, हाशियाकृत आरो अभिलेखहीन रचनाकार के पुनःस्थापना के अपन घोषित लक्ष्य मानै छै, आरो जे नव्य-न्याय के 'हेत्वाभास' आरो 'शब्द-प्रमाण' के उपयोग कऽ साहित्य में निहित वैचारिक छल के अनावृत करै छै। ई तेसरका प्रतिमान के दृष्टि सें 'अखियासल' एक अग्रगामी पूर्व-रूप (प्रोटो-पाठ) छै — कैलेकि रमानन्द झा जे काज १९७० सें ८० दशक में व्यक्तिगत श्रम सें केने छेलै, विदेह-आन्दोलन ओकरे संस्थागत, अभिलेखीय आरो जनतान्त्रिक फैलाव दै छै।
ई समीक्षा के बनावट दू भाग में विभक्त छै। पूर्वार्ध में प्रत्येक अध्याय के विशिष्ट गुण, उपलब्धि आरो सैद्धान्तिक महत्त्व के विवेचन छै; उत्तरार्ध पूर्णतः सीमा, कमजोरी आरो पद्धतिगत संकट के समर्पित छै।
आलोचनात्मक प्रतिमान
भारतीय साहित्यशास्त्रीय दृष्टि
रस — पोथी के विभिन्न अध्याय में करुण, वीर, हास्य, शृङ्गार, भक्ति आरो रौद्र रस के विवेचन भेटै छै। 'रामेश्वर' के भूख आरो पारिवारिक विघटन करुण रस उपजाबै छै; द्विजवर के राष्ट्रीय कविता वीर आरो रौद्र रस जगाबै छै; हरिमोहन झा के गप्प हास्य-व्यङ्ग्य के भूमि रचै छै; हरिलता के भजन भक्ति आरो मधुर रस के धारा बहाबै छै; आरसी आरो मोहन के गीत शृङ्गार, परकृति आरो भावमाधुर्य के अनुभव दै छै।
ध्वनि — कई रचना के प्रत्यक्ष कथा पाछाँ अप्रत्यक्ष सामाजिक अरथ छै। भूख केवल भोजन के कमी नै, आर्थिक संरचना के अन्याय छै। विवाह केवल घरेलू संस्कार नै, स्त्री के सामाजिक स्थिति आरो जातिगत प्रतिष्ठा के क्षेत्र छै। भाषा केवल सम्प्रेषण के साधन नै, सांस्कृतिक स्वाधीनता के प्रतीक छै।
वक्रोक्ति — यात्री के स्तम्भ, हरिमोहन झा के गप्प, श्यामानन्द झा के व्यङ्ग्य, ललित आरो धीरेन्द्र के कथा आरो आरसी के राजनीतिक कविता वक्र कथन, विडम्बना, व्यङ्ग्य आरो प्रतीक के माध्यम सें अपन अरथ उपजाबै छै।
औचित्य — रमणजी बेर-बेर ई प्रश्न उठाबै छै जे रचना के विषय, पात्र, भाषा, शैली, काल आरो विधा के बीच औचित्य छै कि नै। कथा के उपन्यास, गप्प के कथा, अनुवाद के मौलिक कृति अथवा प्रभाव के अनुवाद कहब उचित छै कि नै — ई सब्भे औचित्य के प्रश्न छै।
साधारणीकरण — एक व्यक्ति के भूख, बेरोजगारी, विवाह-दुःख अथवा सांस्कृतिक क्षोभ तखन साहित्यिक मूल्य ग्रहण करै छै जखन ऊ पूरा समुदाय अथवा युग के अनुभव बनी जाय छै। धीरेन्द्र के कथा-विवेचन में लेखक साफ करै छै जे वैयक्तिक अनुभव सामाजिक मन के अभिव्यक्ति बनलापर साहित्य सामाजिक सन्दर्भ ग्रहण करै छै।
लोकमङ्गल — अखियासल के आलोचना साहित्य के समाज सें पृथक नै मानै छै। मातृभाषा-सेवा, स्त्रीशिक्षा, जातिविरोध, श्रम के प्रतिष्ठा, गरीब के अधिकार आरो राष्ट्रीय स्वाधीनता साहित्यिक मूल्याङ्कन के जरूरी आधार बनै छै।
पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त के आधार
रूपवादी दृष्टि — कथानक, चरित्र-निर्माण, संवाद, वातावरण, कथा-गति, प्रतीक, पुनरावृत्ति, गीतात्मकता आरो विधागत संरचना के परीक्षण रूपवादी नजर सें कएल जा सकै छै।
नव-इतिहासवादी दृष्टि — प्रत्येक रचना के ओकर समय के सत्ता, संस्था, भाषा-राजनीति, स्वतन्त्रता-आन्दोलन, सामाजिक सुधार, सामन्तवाद आरो आर्थिक परिवर्तन सें जोड़ि कऽ पढ़ल गेलै।
मार्क्सवादी दृष्टि — भूख, निर्धनता, श्रम, सामन्ती शोषण, पुलिस-प्रशासन, पूँजी, चुनाव, बेरोजगारी आरो वर्ग-बँटवारा कई अध्याय के मूल प्रश्न छै।
नारीवादी दृष्टि — 'निर्दयी सासु', 'सुमति', 'चन्द्रग्रहण', हरिलता के भजन, कुमार गंगानन्द सिंह के कथा आरो ललित के कथा-विवेचन स्त्री के शिक्षा, विवाह, देह, इच्छा, घरेलू श्रम, विधवापन आरो सामाजिक नियन्त्रण के प्रश्न उठाबै छै।
उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि — मैथिलीपर हिन्दी आरो अङ्ग्रेजी के दबाव, मातृभाषा के उपेक्षा, देवनागरी के प्रसार के राजनीति, स्थानीय भाषा-साहित्य के अधिकार आरो राष्ट्रीयता के भीतर भाषिक बहुलता — ई सब्भे उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श के विषय छै।
अस्तित्ववादी आरो मनोविश्लेषणवादी दृष्टि — ललित आरो धीरेन्द्र के कथा-विवेचन में निरर्थकता, एकाकीपन, बेरोजगारी, दायित्व के असह्य भार, यौनिक इच्छा, आत्मपरायापन आरो सामाजिक असंगति के विश्लेषण भेटै छै।
पाठक-प्रतिक्रिया दृष्टि — हरिमोहन झा के गप्प आरो यात्री के स्तम्भ-लेखन के अध्याय पाठक-समुदाय, पत्रिका के संवादात्मकता, हास्य के लोकप्रियता आरो पाठकीय रुचि के निर्माणपर ध्यान दै छै।
विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि आरो नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसा
विदेह समान्तर इतिहास के मूल धारणा छै जे साहित्यिक इतिहास केवल राजकीय मान्यता, पुरस्कार, विश्वविद्यालय आरो प्रसिद्ध लेखक के इतिहास नै होय छै। ओहि इतिहास में निम्न सब्भे के समान अधिकार छै —
दुर्लभ पाण्डुलिपि,
अप्रसारित पोथी,
स्थानीय पत्र-पत्रिका,
ग्रामीण रचनाकार,
मातृभाषा-सेवी,
बिसरल सम्पादक,
आर्थिक कमी में लिखै कवि,
स्त्री-पात्र के मौन,
किसान आरो मजदूर के पीड़ा,
भाषिक पराधीनता,
मिथिला आरो प्रवास के सांस्कृतिक सम्बंध।
मैथिली साहित्य के इतिहास सदिखन एगो वैचारिक संघर्ष के क्षेत्र रहलै। एक ओर 'मुख्यधाराक परम्परा' छै, जे शास्त्रीय सन्तुलन, संस्थागत मान्यता, ब्राह्मणवादी आभिजात्य आरो अतीत के परिमार्जित कऽ परस्तुत करबापर केन्द्रित रहलै, तें दोसरका ओर 'विदेह समान्तर परम्परा' छै, जे जनमानस के धड़कै हृदय, शोषित-वञ्चित के प्रतिरोध आरो यथार्थवादी चित्रण सें जुड़ल छै। नव्य-न्याय के 'शब्द-प्रमाण' सिद्धान्त के अनुसार सत्य ओहिजा खण्डित होय छै जहाँ प्रमाण के दबा देल जाय छै — जइसन दूषण पञ्जी के छुपायब; आरो 'हेत्वाभास'-विवेचन सें साहित्य में निहित तार्किक दोष आरो वैचारिक छेलै अनावृत होय छै। 'अखियासल' के परधान उपलब्धि ई छै जे ऊ मैथिली साहित्य के मुख्य सड़क के बगल में दबाओल कई पदचिह्न के फेर दृश्य बनाबै छै।
पूर्वार्ध: अध्यायवार उपलब्धि आरो आलोचनात्मक आस्वाद
१. मैथिली के पहिलों कथाकार पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुर आरो 'चन्द्रप्रभा'
संग्रह के पहिलों निबन्ध एक तरहें समस्त कृति के बीजाध्याय छै। ई अध्याय मैथिली कथा-साहित्य के सुरुआत-बिन्दु सम्बंधी प्रचलित धारणा के संशोधित करै छै। रमानन्द झा एहिठाम 'प्रथम' के खोज के आलोचनात्मक कर्म के रूप में प्रतिष्ठित करै छै — "कथा विकासक मार्ग पर सर्वप्रथम कोन मैथिली सेवी अग्रसर भेलाह, तकर अनुसंधान।" ई घोषणा-वाक्य पूरा संग्रह के पद्धतिगत घोषणापत्र छै।
पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुर के जन्म १७५० ई॰ में खण्डवलाकुल में भेलै छेलै; ऊ सर्वसीमा निवासी पं॰ महेश्वर ठाकुर के पुत्र छेलै आरो हुनकर निधन १८२२ ई॰ में भेलै। हुनकर ग्रन्थसभ में 'मिथिला तीर्थप्रकाश', 'नारी धर्मप्रकाश', 'शूद्र विवाह पद्धति', 'वैतरणीदानम्', 'शुद्ध निर्णय' आरो 'शिवपूजा प्रदीपिका' प्रमुख छै। हुनका मैथिली के पहिलों कथाकार आरो 'चन्द्रप्रभा' के पहिलों कथाकृति सिद्ध करै के हेतु समीक्षक वंशावली, तिथि, गुरु-शिष्य-परम्परा आरो खण्डनात्मक परमाण — जयकान्त मिश्र के 'चन्द्रभागा' नामकरण के भ्रम-निवारण — सब्भे के सहारा लै छै। 'चन्द्रभागा' के बदला 'चन्द्रप्रभा' नाम के ई शुद्धिकरण आलोचना के अभिलेखीय सावधानी देखाबै छै।
लेखक 'चन्द्रप्रभा' के उन्नैसम शताब्दी के मैथिली गद्य के नमूना आरो सुरुआती कथा-संग्रह के रूप में स्थापित करै छै। पाण्डुलिपि जीर्ण छेलै, कृति के किछुए अंश उपलब्ध रहलै आरो एकर परकाशन लेखक के निधन के बहुत वर्ष बाद सन् १९३९ में भेलै। 'चन्द्रप्रभा' के बनावट गुरु-शिष्य संवाद आरो एक कथा सें दोसरका कथा निकलै के पद्धतिपर आधारित छै; एकरा में गुरु-शिष्या संवाद के माध्यम सें नीतिवचन के समर्थन कैल गेलै, जाहि में प्राचीन गद्य-शैली के उत्कृष्ट निदर्शन भेटैछ। ई नजर सें एकर सम्बंध पञ्चतन्त्र, विद्यापति के 'पुरुष-परीक्षा' आरो संस्कृत के आख्यान-उपाख्यान-परम्परा सें जुड़ै छै — ई शुद्ध शास्त्रीय परम्परा-अन्वितिक दृष्टि छै। कथा सब्भे शिक्षाप्रद, घटनाप्रधान आरो नैतिक निष्कर्षवाली छै।
भारतीय औचित्य के नजर सें एकर महत्त्व कथानक के जटिलता में नै, सुरुआती मैथिली गद्य के ऐतिहासिक भूमिका में छै। पाश्चात्य नजर सें ई उद्गम-खोज छै, जे ऐतिहासिकतावादी समीक्षा के केन्द्रीय प्रवृत्ति छी। विदेह समान्तर इतिहास के नजर सें ई अध्याय सबसें जरूरी छै — कैलेकि 'चन्द्रप्रभा' के "अनुपलब्धता"के समीक्षक अपने रेखांकित करै छै, आरो दुर्लभ पाण्डुलिपि, सम्पादक आरो प्रकाशक के श्रम के साहित्यिक इतिहास के अङ्ग बनाबै छै। हाशियाकृत, अभिलेखहीन, लुप्त-पाठक पुनःस्थापना — इहे समान्तर इतिहास के मूल-मन्त्र छै, आरो रमानन्द झा एकर पहिलों घोष एहिजा करै छै।
२. मैथिली के पहिलों उपन्यासकार पं॰ जीवछ मिश्र आरो 'रामेश्वर'
लेखक 'रामेश्वर' के सन् १९१६ में मिथिला प्रिंटिंग वर्क्स, मधुबनी सें प्रकाशित मैथिली के पहिलों मौलिक उपन्यास मानै छै। पं॰ जीवछ मिश्र के जन्म १८६३ ई॰ में भेलै छेलै; पिता के असामयिक निधन के कारणें हुनकर शिक्षा बाधित भेलै, तइयो ऊ संस्कृत, मैथिली, हिन्दी आरो उर्दू के गहन अध्ययन कैलकै। हुनकर जिनगी, साहित्यिक प्रेरणा आरो मातृभाषा के प्रति प्रतिबद्धता के फैलाव सें परस्तुत कैल गेलै — हिन्दी-विस्तारवाद के खिलाफ प्रतिरोध आरो 'मैथिल महासभा' के वंशानुगत नेतृत्व के विरोध, ई सब्भे असल में औपनिवेशिक-कालीन भाषिक अस्मिता-संघर्ष के जीवन्त दस्तावेज छै।
उपन्यास के केन्द्र में भूख, श्राद्ध के आडम्बर, ऋण, पुलिस-प्रशासन के अत्याचार, झूठ अभियोग, कारावास, पारिवारिक विघटन आरो अपराध के सामाजिक उत्पत्ति छै। रामेश्वर अपन पिता के श्राद्ध के लेली कर्ज लै छै, घर-घराड़ी बेचयपर विवश होय छै, आरो आखिर में पुलिस के प्रताड़ना सें क्षुब्ध भऽ डकै बनि जाय छै; ओकर पत्नी पार्वती कमला में कूदि आत्महत्या के कोसिस करै छै। रामेश्वर जन्मजात अपराधी नै; आर्थिक विवशता, सामन्ती सत्ता आरो प्रशासनिक छेलै हुनका अपराध के बाटपर ढकेलै छै। मार्क्सवादी नजर सें रामेश्वर के अपराध वास्तव में वर्गीय शोषण के परिणाम छै। करुण रस के निर्माण उपन्यास के सुरुआती दृश्य सें होय छै — श्राद्ध के बाद फेकल भोजनपर कुकुर सब्भे टूटि पड़ै छै आरो भूखल बुतरू दूर सें देखै रहै छै। लेखक के अनुसार संवाद सोझ आरो स्वाभाविक छै आरो वातावरण-निर्माण प्रभावकारी।
मार्क्सवादी-नवऐतिहासिकतावादी दृष्टि सें ई निबन्ध कृति के सर्वश्रेष्ठ अध्याय-मध्ये एक छै। समीक्षक 'रामेश्वर' के खाली सौन्दर्यशास्त्रीय वस्तु नै, बल्कि सत्ता-बनावट — राज दरभंगा, मैथिल महासभा, हिन्दी साहित्य परिषद — के खिलाफ ठाढ़ भेलै प्रतिरोधी पाठक रूप में व्याख्या करै छै। जीवछ मिश्र के निर्भीकता आरो 'मठाधीशक षड्यन्त्रक भण्डाफोड़' — ई नव-ऐतिहासिकतावाद के शक्ति-प्रवचन-विश्लेषण सें अद्भुत रूप में मेल खाइत छै। विदेह समान्तर इतिहास के दृष्टि सें 'रामेश्वर' राजदरबार के नै, भूखल ग्रामीण परिवार के इतिहास लिखै छै — यथार्थवाद के ई विदारक प्रस्तुति मैथिली गद्य के स्वर्ण-शिखर छै।
३. रासबिहारी लाल दास आरो उपन्यास 'सुमति'
'सुमति' (१९१८ ई॰) मैथिली में आधुनिक उपन्यास के विधा स्थापित करै के सुरुआती कोसिस छै। लेखक रासबिहारी लाल दास के साहित्यिक कमी-बोध, 'मिथिला दर्पण' सें सम्बंध आरो मातृभाषा में उपन्यास दै के संकल्प के रेखांकित करै छै। समाज में व्याप्त अपव्यय, दहेज आरो प्रदर्शनकारी प्रवृत्ति के कारणें परिवार के कोना पतन होय छै, आरो एक सुशिक्षिता नारी सुमति कोना अपन बुद्धि सें खसै घर के सम्हारै छै, ई ई उपन्यास के मूल स्वर छै। सहेलोला बाबू आरो मनोरथ लाभ के बीच सिद्धान्त-विवाह के प्रसङ्ग, कर्ज लऽ कऽ बरियाती के स्वागत, आरो आखिर में पूरा सम्पत्ति के विनाश के जे सजीव चित्रण छै, ऊ सामाजिक यथार्थवाद के प्रखर उदाहरण छै। सुमति सासुर अबितहि अपन गहना बेचि परिवार के ऋणमुक्त करै छै आरो समाज के लेली एगो आदर्श स्थापित करै छै।
अध्याय पूर्ववर्ती इतिहासकार के मत के सेहो समाहित करै छै। जयकान्त मिश्र कथानक-विन्यास, चरित्र-निर्माण आरो कथन-कौशल के अपरिपक्व मानै छै, मतरकि विषय के मैथिली उपन्यास लेली उपयुक्त स्वीकारै छै; राधाकृष्ण चौधरी एकरा आधुनिक मैथिली उपन्यास-लेखन के पहिलों सफल कोसिस कहै छै। ई निबन्ध के एगो खास शक्ति अन्तर्पाठीयता के सूक्ष्म बोध में छै — 'सुमति' में हिन्दी कविता के प्रयोग के जीवछ मिश्र 'मैथिली भाषा आ कविक अक्षमताक द्योतक' मानने रहलै, आरो रमानन्द झा ई समकालीन आलोचनात्मक संवाद के उघारै छै। इहे आलोचना-क-आलोचना ई निबन्ध के सैद्धान्तिक गहराइ दै छै। भारतीय औचित्य-सिद्धान्त के दृष्टि सें हिन्दी-पद्य के मैथिली-गद्य में परयोग भाषा-औचित्य-भङ्ग छै — रमानन्द झा ई दोष के 'शैलीजन्य शिथिलता' कहि मानी लै छै, तइयो सामाजिक जागरण के युग-स्वर के परधान मानि कृति के जरूरी घोषित करै छै। ई मूल्याङ्कन-सन्तुलन — दोष-स्वीकृति संग-संग ऐतिहासिक-सामाजिक महत्त्व के रक्षा — समीक्षक के परिपक्वता के परिचायक छै।
औचित्य के नजर सें अध्याय ऐतिहासिक महत्त्व आरो कलात्मक सिद्धि बीच भेद करै छै। कोय कृति 'प्रथम' भऽ सकै छै, मतरकि केवल पहिलों होय के कारण कलात्मक रूप सें पूरा नै बनी जाय छै। विदेह समान्तर इतिहास के नजर सें 'सुमति' विधागत संक्रमण के दस्तावेज छै — नीति-आख्यान सें आधुनिक सामाजिक उपन्यास तक बढ़ै मैथिली गद्य के अस्थिर, मतरकि जरूरी डेग।
४. जनार्दन झा 'जनसीदन' आरो 'निर्दयी सासु'
ई अध्याय विवाह-व्यवस्था, घटक, कन्यापक्ष, सासु-पुतोहु सम्बंध आरो घरेलू स्त्री-उत्पीड़न के कथा-विवेचन के केन्द्र में आनै छै। जनसीदन (१८७२–१९५१) के 'निर्दयी सासु' सन् १९१४ ई॰ में 'मिथिला मिहिर' में धारावाहिक रूप में छपलै; एकर कथावस्तु सामाजिक घटनापर आधारित छै आरो चित्रण एतेक स्वाभाविक छै जे घटना पाठक के सोझाँ घटै प्रतीत होय छै। एकरा में सासु अनूपरानी आरो ननदि के अत्याचार सहै मूक नारी शारदा के कारुणिक चित्रण भेलै, जे ओहि समय के समाज में स्त्री-शिक्षा के विरोध आरो पितृसत्तात्मक क्रूरता के प्रमाणित करै छै। ज्योतिषी चिन्तामणि झा द्वारा शारदा के शिक्षित करब आरो परिपाटी-विरोधी कन्यादान, आरो अनूपरानी द्वारा ओकर विरोध — असल में प्राचीन आरो नवीन जिनगी-मूल्य के द्वन्द्व छै, जकरा समीक्षक 'प्रखर सामाजिक चेतनाक प्रतिफल' कहै छै।
जनसीदन के 'शशिकला', 'कलियुगी संन्यासी' आदि के विवेचन में समीक्षक विधा-विवाद के — हरिमोहन झा 'निर्दयी सासु' के 'प्रहसन' कहलकै, आन 'उपन्यास' — सुन्नर ढंगेँ परस्तुत करै छै। मुख्य उपलब्धि ई जे रमानन्द झा जनसीदन के व्यक्तित्व के प्रखरता-सम्बंधी अपन प्रारम्भिक सन्देह के उपलब्ध साहित्य के विश्लेषण सें अपने संशोधित करै छै — सामाजिक-सुधारवादी चेतना के आलोक में व्यक्तित्व प्रखर भेटै छै। ई आत्म-संशोधनकारी आलोचना-पद्धति कृति के बौद्धिक ईमानदारी के परमाण छै।
नारीवादी नजर सें कथा घरेलू सत्ता के जटिल रूप उघारै छै। स्त्री केवल पुरुषद्वारा नै, पितृसत्तात्मक संस्कार ग्रहण कएने दोसरका स्त्रीद्वारा सेहो प्रताड़ित होय छै; सासु अपने व्यवस्था के उत्पाद होइतहुँ पुतोहुपर व्यवस्था के प्रतिनिधि बनि जाय छै। करुण रस के स्रोत नवविवाहिता के असहायता छै। ध्वनि-सिद्धान्त सें देखलापर विवाह के उत्सव के पाछाँ कन्या के आर्थिक मूल्याङ्कन, परिवार के प्रतिष्ठा आरो पितृसत्तात्मक नियन्त्रण के कठोर इतिहास सुनाय छै। मार्क्सवादी नजर सें 'मिथिलाक समाजकेँ कोला-कोलामे बाँटि शोषण करैत' व्यवस्था के खिलाफ शंखनाद के रूप में एकर पाठ वर्ग-चेतना आरो सामाजिक अन्तर्विरोध के साहित्यिक अभिव्यक्ति के उत्तम उदाहरण छै।
५. पं॰ जनार्दन झा — एक बिसरल साहित्यसेवी
ई नान्हकी मतरकि सैद्धान्तिक दृष्टि सें सबसें बेसी जरूरी निबन्ध में रमानन्द झा अपन समस्त आलोचनात्मक परियोजना के सैद्धान्तिक आधार परस्तुत करै छै — 'दू कोटिक साहित्यकार' के सिद्धान्त। पहिलों कोटि के (विद्यापति जइसन) रचनाकार ततेक व्यापक होय छै जे दोसरका कोटि के रचनाकार के आच्छादित कऽ दै छै, आरो कालान्तर में लोक हुनका बिसरि जाय छै। गङ्गा-कोशीक विशाल जल आरो गाम-गाम के जोड़निहार छोट धार के स्थानीय महत्त्व के रूपक ई सिद्धान्त के अविस्मरणीय बनाबै छै — इतिहास के वास्तविक नदी में केवल विशाल प्रवाह नै, छोट-छोट धार सेहो जल दै छै, आरो पं॰ जनार्दन झा ओहि अदृश्य धारा के प्रतिनिधि छै।
लेखक के तर्क छै जे साहित्य के मुख्य धारा केवल प्रसिद्ध लेखक सें नै, कई स्थानीय आरो 'दोसरा पाँति' के साहित्यसेवी के निरन्तर श्रम सें बनै छै। पं॰ जनार्दन झा के रचना दुर्लभ भेला कारण हुनकर नाम इतिहास सें लगभग लुप्त भऽ गेलै। 'जानकी परिणय' जइसन खण्डकाव्य में अकाल, जनकपुर, सीताजन्म, धनुषभङ्ग आरो विवाह-संस्कार के चित्रण छै; भाषिक सरलता, मौलिकता आरो सांस्कृतिक विवरण एकरा साहित्येतिहास के उपयोगी सामग्री बनाबै छै।
ई सिद्धान्त पाश्चात्य कैनन-निर्माण आरो साहित्यिक-आर्थिकीक सिद्धान्त सें आश्चर्यजनक रूप में साम्य रखै छै। रमानन्द झा जे कहै छै — प्रकाशन के कमी, अनियतकालीन पत्रिका आरो सर्वसुलभता के कमी बहुत रचनाकार के प्रकाश सें वञ्चित कऽ देलकै — ई विदेह समान्तर इतिहास-प्रतिमान के केन्द्रीय अभिकल्पना छै। सत्य कहल जाए तें ई पूरा निबन्ध विदेह-आन्दोलन के पूर्व-घोषणापत्र छै।
६. पं॰ त्रिलोचन झा, बेतिया — बिसरल मातृभाषानुरागी
त्रिलोचन झा (१८७८–१९३८ ई॰) अनुवाद के, कवि, कथाकार-आख्यानलेखक, जीवनीकार, निबन्धकार, सामाजिक कार्यकर्ता आरो संस्थापक व्यक्तित्व के रूप में परस्तुत छै। हुनका में अपूर्व संगठन-शक्ति छेलै; 'सुबोधिनी सभा' आरो मैथिली-आन्दोलन के संगठनात्मक इतिहास के ई निबन्ध उघारै छै। ऊ मातृभूमि-वन्दना आरो अतीत-गानक माध्यम सें सुप्त मैथिल समाज के जगाबय चाहलनि — "चण्डि तोहर मिथीला देश" जकाँ हुनकर पङ्क्तिसभ जनमानस में ऊर्जा के सञ्चार कैलकै। ऊ 'श्रीमद्भगवद्गीतादर्श' नाम सें गीताक मैथिली पद्यानुवाद सेहो कैलकै, जे हुनकर प्रखर गवेषणात्मक दृष्टि के परिचायक छै।
हुनकर लेख विभिन्न पत्र-पत्रिका में बिखरल रहने पूरा मूल्याङ्कन कठिन भेलै — 'बड़ कम सामग्री उपलब्ध अछि', ई समीक्षक अपने बेर-बेर मानी लै छै — मतरकि उपलब्ध सामग्री मातृभाषा आरो साहित्य के प्रति गाढ़ अनुराग प्रमाणित करै छै। हुनकर दृष्टि में भाषा आरो साहित्य समाज के प्रगति के आधार छेलै। ऊ मैथिल समाज के आलस्य, आत्मकेन्द्रितता आरो सांस्कृतिक उदासीनता के ललकारै छेलै आरो मिथिला के प्रतिष्ठा फेर प्राप्त करै के मिल-जुल के दायित्व के बोध करबै छेलै। उत्तर-औपनिवेशिक नजर सें मातृभाषा-सेवा राजनीतिक स्वाधीनता के फैलाव छै — भाषा-विहीन स्वराज अधूरा स्वराज छै। एहिठाम सामग्री के कमी के स्वीकृति में समान्तर इतिहास-लेखन के मूल संकट — अभिलेख-दारिद्र्य — प्रत्यक्ष होय छै।
७. राष्ट्रीय चेतना के पुरोधा कवि यदुनाथ झा 'यदुवर'
यदुवर (१८८८–१९३५ ई॰) 'मिथिला गीताञ्जलि' (१९२३) के माध्यम सें राष्ट्रीय स्वाधीनता-संग्रामक चेतना के मैथिली काव्य में स्थापित कैलकै। हुनकर कविता मिथिला, मैथिली आरो भारतीय राष्ट्रीयता के संयुक्त स्वर छै। ऊ पुरान परम्परा के तोड़ि राष्ट्रीय कार्य के सूत्रपात कैलकै आरो संगीत के रागपाश सें मैथिली कविता के सर्वप्रथम मुक्त कैलकै। हुनकर 'मैथिली साहित्य दिग्दर्शन' मैथिली के पहिलों अनुसन्धानपरक निबन्ध मानल जाय छै, जाहि में ऊ साहित्य के पूरा लेखा-जोखा परस्तुत कैलकै छै।
यदुवर के 'राष्ट्रीय चेतनाक पुरोधा' घोषित करै रमानन्द झा एक विशिष्ट स्थापना करै छै — 'कवीश्वर चन्दा झासँ चलल देश-कालसँ जुड़बाक प्रवृत्तिपरसँ धार्मिक लेप पोछि राष्ट्रीय आ देशोत्थान-विषयक रचनाक सुदृढ़ परिपाटी यदुवरक रचनासँ प्रारम्भ भेल।' 'धार्मिक लेप पोछब' — ई पदावली साहित्यिक प्रवृत्ति के धर्मनिरपेक्षीकरणक सूक्ष्म ऐतिहासिक बोध के प्रकट करै छै आरो नव-ऐतिहासिकतावादी प्रवृत्ति-रेखाङ्कनक उत्तम नमूना छै।
ऊ शिक्षित मैथिल समाज के मातृभाषा-विमुखता, आलस्य आरो बाह्य भाषिक प्रभुत्व के खिलाफ जागरण के आह्वान करै छै। हुनकर काव्य के वीर रस युद्धक्षेत्रक खाली नै, भाषिक-सांस्कृतिक संघर्ष के वीर रस छै। मातृभाषा में लिखब, साहित्य प्रकाशित करब आरो मैथिल समाज के जगाबै हुनका लेली राष्ट्रसेवा छेलै। उत्तर-औपनिवेशिक नजर सें यदुवर भाषा के हीनताबोध के औपनिवेशिक मानसिकता के परिणाम मानै छै। विदेह समान्तर इतिहास में हुनकर कविता राजनीतिक आन्दोलन के समानान्तर चलै भाषिक स्वाधीनता-आन्दोलन के दस्तावेज बनै छै।
८. कवि-सेनानी छेदी झा 'द्विजवर'
अध्याय — मैथिली साहित्यकार सब्भे राष्ट्रीय चेतना सें पृथक छेलै — ई सामान्य आरोप के खण्डन करै छै। द्विजवर के जन्म १८९३ ई॰ में सहरसाक वनगाँव में भेलै छेलै। ऊ केवल राष्ट्रीय कविता लिखनिहार नै, गान्धीजीक आह्वानपर सरकारी सेवा छोड़ि स्वतन्त्रता-सङ्ग्राम में सक्रिय भाग लेनिहार कवि-सेनानी छेलै आरो चार बेर जेल गेलाह। यदुवर आरो द्विजवर के तुलना करै समीक्षक एक सूक्ष्म भेद स्थापित करै छै — यदुवर सरकारी सेवक रहै के कारणें खाली साहित्यिक स्तरपर सक्रिय, जखन कि द्विजवर सरकारी सेवा के त्यागि राजनीति आरो साहित्य दुन्नु स्तरपर सक्रिय। 'एकहि व्यक्तिमे सर्जनात्मक प्रतिभा आ आन्दोलनात्मक क्षमताक संगम' के 'बिरल घटना' कहब — ई मूल्याङ्कन साहित्य आरो कर्म के अद्वै के प्रतिष्ठित करै छै, जे प्रतिबद्ध-साहित्य के अवधारणा सें मेल खाइत छै।
स्वदेशी, चरखा, आर्थिक स्वतन्त्रता आरो ग्रामजीवन हुनकर राष्ट्रीयता के आधार छै — 'चरखा चौमासा' जकाँ कविता में स्वदेशी आन्दोलन के गूँज साफ सुनल जा सकैछ। राष्ट्र हुनका लेली अमूर्त सत्ता नै, गाम-घर, नदी, खेत, मनुष्य आरो प्रकृति के संयुक्त जिनगी छै। हुनकर रचना 'छूतहर' समाज के अस्पृश्यता आरो सामन्ती क्रूरताक खिलाफ प्रहार छै — "अस्पृश्य भेलहुँ कै कोन पाप? मृतिका एक एके कुम्हार" — ई पङ्क्ति सामाजिक विषमतापर प्रखर प्रहार करै छै आरो हुनकर कविता में वञ्चित वर्ग के स्वर साफ छै। वीर रस के संग करुण आरो रौद्र रस के मेल हुनकर कविता के प्रचार-पद सें ऊपर उठाबै छै। विदेह समान्तर इतिहास में द्विजवर साहित्य आरो राजनीतिक कर्म के मध्यक कृत्रिम बँटवारा तोड़ै छै।
९. कुमार गंगानन्द सिंह के कथा-संवेदना
कुमार गंगानन्द सिंह के कथा-यात्रा दीर्घ काल (१९२४–१९६५) तक पसरल छै। 'मनुष्यक मोल', 'विवाह', 'बिहाड़ि', 'पण्डितपुत्र', 'पञ्च परमेश्वर', 'आमक गाछी' आदि कथा में सामाजिक सुधार, विवाह-कुरीति, अस्पृश्यता, शिक्षा आरो ग्रामजीवन के समस्या उठाओल गेलै। 'मनुष्यक मोल' में एक बाल-विधवा के आत्महत्या के कारुणिक यथार्थ छै; 'बिहाड़ि' में अछूतोद्धार के चेतना छै, जहाँ शोषित वर्ग बाबू-भैया के बेगारी करबा सें मना कऽ हड़ताल करै छै। लेखक हुनकर कथा-विधि के महत्त्व ई बात में देखै छै जे ऊ पुराण अथवा धर्मग्रन्थ सें कथावस्तु नै लै, अपन समकालीन समाज सें लै छै — उपाख्यान के उपदेशात्मक परम्परा सें हटि समाज के जीवित विकृतिपर प्रहार करब हुनकर उपलब्धि छै।
ई निबन्ध में रमानन्द झा 'अनुभूति-अभिव्यक्ति-सत्य-सम्प्रेषण' के शृङ्खला स्थापित करै छै — 'अनुभूतिक अभिव्यक्तिमे सत्यक सम्प्रेषण रहैछ, सत्यक सम्प्रेषणमे जीवन आ परिवेशक यथार्थ व्यञ्जित रहैछ।' ई 'व्यञ्जना'-पद सोझे आनन्दवर्धन के ध्वनि-सिद्धान्त के स्मरण करबै छै — साहित्य के सार्थकता वाच्यार्थ में नै, व्यङ्ग्यार्थ में छै। संग-संग 'काल-प्रवाहमे प्रमाणित होएब' के कसौटी कालातीत-मूल्य के अवधारणा सें मेल खाइत छै। 'मनुष्यक मोल' आरो 'विवाह' के कर्तृत्व-विवाद (जयकान्त मिश्र आरो श्रीश एकरा 'भोल' के रचना मानने रहलै) के समाधान करै रमानन्द झा भाषा-प्रयोग के समाजशास्त्रीय पाठ परस्तुत करै छै — 'बिहाड़ि' कथा में रौदी-कामातिक हिन्दी-मिश्रित बोली 'अशिक्षितपर अन्य भाषाक प्रभाव' के व्यञ्जित करै छै। ई भाषिक-यथार्थवाद के सूक्ष्म आलोचनात्मक बोध छै।
स्त्री-पात्र, बालविवाह, विधवापन आरो घरेलू उत्पीड़न के चित्रण करुण रस उपजाबै छै। कथा-भाषा सोझ, लोकानुकूल आरो विनोदपूर्ण छै। 'आमक गाछी' जइसन छोट कथा में अनावश्यक फैलाव के कमी आरो रहस्यपूर्ण अन्त आधुनिक कथा के निकट लै छै।
१०. कवीश्वरी हरिलता के वैष्णवता
ई निबन्ध के विशिष्टता ई जे रमानन्द झा एक स्त्री-रचनाकार — कवीश्वरी हरिलता (मोदवती, जन्म १९०३ ई॰) — के साहित्य-साधना के प्रकाश में अनै छै, जे विदेह समान्तर इतिहास के लैङ्गिक फेर-उभार के अग्रगामी सङ्केत छै। हरिलता के जिनगी-वृत्त — खाली चार वर्ष के अवस्था में विवाह, अल्पवय में वैधव्य आरो पति के विक्षिप्तता, 'स्त्रीगण लेल पढ़ब निषिद्ध छलैक' तइयो 'सासु आदिसँ चोरा कऽ अक्षर सिखब' — ई सब्भे नारी-अस्मिता के संघर्ष-गाथा छै।
हुनकर 'भजनमालिका' (१९३७ ई॰) वैष्णव सगुण भक्ति के उत्कृष्ट निदर्शन छै। भक्ति-काव्यशास्त्रीय दृष्टि सें रमानन्द झा हरिलता के 'निराकारकेँ अप्राप्त मानि सगुण-आराधना' के वैष्णव-परम्परा के अनुरूप सिद्ध करै छै — पलना में झूलै, अँगना में ठुमुकै, वृन्दावन में गाय चरबै सगुण-कृष्ण के चित्रण 'श्रुति-मधुरता आ रस-प्रचुरता' सें युक्त। हुनकर गीत में भक्ति के छओ अङ्ग — आनुकूल्य-संकल्प, प्रातिकूल्य-वर्जन, रक्षण-विश्वास, गोप्तृत्व-वरण, आत्मनिक्षेप, कार्पण्य — आरो माधुर्य रस प्रवाहित छै। बाल-वैधव्य के असह्य पीड़ा के ऊ कृष्ण-भक्ति के मधुर रस में रूपान्तरित कऽ देलीह। ई भक्ति-रस आरो वात्सल्य-रस के शास्त्रीय विवेचन छै।
११. कविवर श्यामानन्द झा के काव्य-वस्तु
लेखक श्यामानन्द झा के काव्य के राष्ट्रीय, सामाजिक, सांस्कृतिक आरो व्यावहारिक चार वर्ग में पढ़ै छै आरो 'युग-सचेत कवि' के अवधारणा परस्तुत करै छै। कवि के आक्रोश व्यक्तिगत नै, ओहि समय के राजनीतिक पराधीनता, आर्थिक असमानता, भाषिक अपमान आरो सामाजिक उदासीनता सें उत्पन्न छै — 'जरि जाय जेँ जजाते करिते पटाय की हो' जइसन आक्रोश के पाछाँ तात्कालिक परिवेश के कारुणिक स्थिति छै। गान्धी-युगीन राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक पतन के खिलाफ सामन्ती वर्ग के उदासीनता — 'कोउ नृप होहिं हमे का हानी' — के तीक्ष्ण व्यङ्ग्यात्मक चित्रण भेटै छै।
हुनकर कविता भारतीय स्वाधीनता, मैथिली के रक्षा, आर्थिक समानता, सामाजिक जागरण आरो सांस्कृतिक पुनरुत्थान के आह्वान करै छै। ऊ अङ्ग्रेजी आरो हिन्दी के अन्धभक्त उच्च वर्गपर व्यङ्ग्य करै लिखै छै जे लोक अपन भूषण-वसन के छोड़ि विद्यापति के नाम सें कान छिपबै छै आरो "टोप ओ नेकटाय"पर लोट-पोट रहै छै — ई सांस्कृतिक दासता के खिलाफ उद्घोष छै। 'देश सेवा हित छदामो बाहर होएब दुर्लभ ... सोम होथि छदाम लय' — ई विदग्ध व्यङ्ग्य कुन्तक के वक्रोक्ति-सिद्धान्त के वाक्य-वक्रताक परमाण छै। रस के नजर सें एकरा में करुण आरो वीर के संग सामन्ती वृत्तिक प्रति बीभत्स-भाव के सामञ्जस्य छै; मार्क्सवादी नजर सें ई पूँजी-केन्द्रीकरण आरो वर्ग-विषमता के प्रत्यक्ष साहित्यिक आलोचना छै। गरीबी, वस्त्र, भोजन, आवास आरो पारिवारिक भार के वर्णन हुनकर सामाजिक दृष्टि के परमाण छै।
हुनकर 'मैथिल सन्देश' आरो 'मैथिली गीत-चन्द्रिका' में राष्ट्रप्रेम आरो लोक-संस्कृति के समन्वय छै। व्यावहारिक गीत में सोहर, नामकरण, उपनयन, विवाह, कोबर, समदाउन आरो अन्य संस्कार के समावेश लोकजीवन के काव्यात्मक अभिलेख रचै छै। शृङ्गार, हास्य, भक्ति आरो लोकरीतिक समन्वय हुनकर काव्य-वस्तु के व्यापक बनाबै छै।
१२. बाबू लक्ष्मीपति सिंह आरो मैथिली पत्रकारिता
ई निबन्ध में रमानन्द झा साहित्य-समीक्षा के सीमा लाँघि पत्रकारिता-इतिहास के क्षेत्र में प्रवेश करै छै। लक्ष्मीपति सिंह (१९०७–१९७२) के लेखक साहित्यकार, सम्पादक, प्रकाशक, संस्कृतिकर्मी आरो मैथिली पत्रकारिता के संस्थापक-पुरुष के रूप में देखै छै — 'एक विधामे बान्हल नहि, एक भाषामे नहि'। पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुर के शिष्यत्व सें प्राप्त साहित्य-सर्जना के मन्त्र के ऊ जीवनभरि मातृभाषा-सेवा में लगौलनि आरो प्रवासी-मैथिल के मिथिला सें जोड़बाक आजीवन कोसिस कैलकै।
हुनकर योगदान केवल अपन लेखन तक सीमित नै। दुर्लभ रचना के सम्पादन, परकाशन, लेखक के प्रोत्साहन आरो पत्रिका के माध्यम सें पाठक-समुदाय के निर्माण मैथिली सार्वजनिक क्षेत्र के विकास के आधार बनल। ऊ मैथिली पत्रकारिता के राजनीतिक आरो आर्थिक दासता सें मुक्त कऽ आत्मनिर्भर बनाबै के वकालत कैलकै आरो साफ कैलकै जे मैथिली के पत्र-पत्रिका केवल साहित्यिक एकाधिकार नै, बल्कि समाचार आरो जन-सरोकार के माध्यम होय के चाही। निबन्ध के आखिरी अंश मैथिली समाचार-पत्र के भविष्य-सम्बंधी दूरदर्शी विश्लेषण छै — विज्ञापन, संवाददाता-प्रतिनिधित्व, सम्पादकीय नीति आरो पाठक-आधार के कमी में मैथिलहु के आन भाषा के पत्रपर निर्भर रहै के विवशता। ई मीडिया-समाजशास्त्रीय अन्तर्दृष्टि अपन युग सें आगू छै।
पाठक-प्रतिक्रिया के नजर सें पत्रकारिता लेखक आरो पाठक के बीच जीवित संवाद स्थापित करै छै। विदेह समान्तर इतिहास में सम्पादक साहित्य के पार्श्व-पात्र नै, स्मृति आरो पाठकत्वक निर्माता छै।
१३. कविचूड़ामणि मधुप के गीत-साहित्य
काशीकान्त मिश्र 'मधुप' के गीति-साहित्य के विवेचन ई संग्रह के सबसें बेसी रसशास्त्रीय निबन्ध छै। 'गीत भावाश्रित होइछ, हृदयपर ओकर प्रभाव तत्काल पड़ैछ, रागात्मिका वृत्तिक तार झनझना उठैछ' — ई विवेचन सोझे भरतमुनिक रस-निष्पत्ति आरो अभिनवगुप्त के रस-चर्वणाक मैथिली पुनराख्यान छै; 'नादब्रह्मकेँ जगबैत' गीत-साधना के अवधारणा भारतीय संगीत-दर्शनक नादब्रह्म-सिद्धान्त सें जुड़ै छै। मधुप के 'घसल अठन्नी सोनाकेँ घसि कऽ हीरा' बनौनिहार आरो 'विद्यापति ओ मीरा' के स्वर में बजनिहार कहि (मणिपद्मक शब्द में) रमानन्द झा गीति-परम्परा के शीर्ष-स्थान दै छै।
मधुप के गीत-संसार में शृङ्गार, भक्ति, गृहस्थजीवन, नारी-आदर्श, सामाजिक शिक्षा आरो सांस्कृतिक संस्कार के मेल छै। गीत केवल पढ़ै के वस्तु नै, कण्ठस्थ करै के, गाबयबाक आरो सामुदायिक रूप सें अनुभव करै के रचना छै — 'लोक-जीवनमे गीतक अत्याज्यता' (आँगन, दलान, खेत, खरिहान, कोबर, सिमरिया-घाट) के ई मूल्याङ्कन भट्टनायक के साधारणीकरण-सिद्धान्त के उत्तम परयोग छै। जखन मैथिल युवा वर्ग सिनेमा के गीत के धुनपर पागल छेलै, तखन मधुपजी मैथिली भाषा के विलुप्त होएबा सें बचै के लेली सिनेमा के तर्जपर मैथिली गीत लिखलकै — विदेह समान्तर इतिहास के दृष्टि सें ई जनभाषा के जीवित रखै के एगो लोकतन्त्रवादी, जमीनी कोसिस छेलै। 'वट-सावित्री' जकाँ पावनिक कथा के ऊ गीत के रूप देलकै जाहि सें नीरसता समाप्त भेलै, स्त्री आरो बुतरू तक कथा पहुँचल आरो लोक-कण्ठ में मैथिली स्थापित भेलै — ई गीत के सामाजिक प्रयोगशीलता देखाबै छै।
रस के नजर सें मधुप के गीत में भक्ति, विप्रलम्भ शृङ्गार आरो करुणा के समन्वय छै। ध्वनि के नजर सें गृहस्थ आदर्श के भीतर स्त्री के सामाजिक भूमिका, परिवार के नैतिक अनुशासन आरो लोकपरम्पराक संरक्षण निहित छै।
१४. भट्टीकाव्य के परम्परा आरो मधुपजी
ई निबन्ध कृति के सबसें साहसी सैद्धान्तिक अध्याय छै आरो संस्कृत के शिक्षाप्रद काव्यपरम्परा आरो मैथिली काव्य के अन्तर्सम्बन्धक खोज करै छै। भट्टीकाव्य में कथा केवल रसास्वाद लेली नै, व्याकरण, अलङ्कार, छन्द आरो भाषाज्ञानक शिक्षण लेली सेहो प्रयुक्त छै; मधुपजी के काव्य में ई शिक्षणपरक परम्परा के आधुनिक मैथिली रूप देखल गेलै। भारतीय काव्यशास्त्र के दृष्टि सें ज्ञान आरो आनन्द के एकता ई अध्याय के प्रमुख सूत्र छै — काव्य नितान्त उपदेश होइत तें रसहीन भऽ जाय; नितान्त मनोरञ्जन होइत तें शैक्षिक प्रयोजन लुप्त भऽ जाय। मधुप के उपलब्धि ई द्वन्द्व में समन्वय स्थापित करब छै।
'कोबर-गीत' के रचना के आधार बनाय रमानन्द झा एक निर्भीक प्रश्न उठाबै छै — 'कविता कथी लेल लिखल जाइत अछि?' आरो साफ उत्तर दै छै — 'यश' आरो 'अर्थ'; कोय कवि ई दुन्नु शर्तक सीमा सें बाहर नै। ई घोषणा साहित्य के शुद्धतावादी आदर्शवाद के चुनौती दै ओकर भौतिक-आर्थिक आधार के उघारै छै — जे साफ तौर पर मार्क्सवादी साहित्य-समाजशास्त्र के अन्तर्दृष्टि छै। प्रसङ्ग ई जे विद्यालयक अनुदान बचै के विवशता में — कुमार गंगानन्द सिंह आरो राजपण्डित बलदेव मिश्र के दबाव में — मधुपजी के महाराज कामेश्वर सिंह के 'कोबर गीत' लिखय पड़लनि। 'कोबर-गीत' के 'युगीन विवशताक द्योतक' कहि रमानन्द झा एक जटिल नैतिक-सौन्दर्यशास्त्रीय प्रश्न के सामना करै छै — कवि अपन आत्मा के प्रतिकूल किएक लिखै छै? ऊ मानी लै छै जे मधुप के 'कवित्व-शक्ति ततेक प्रखर छल जे अनिश्चित विषयोपर सेहो दिव्य-मार्मिकता आबि जाइत छलैक।' ई प्रयोजन आरो प्रतिभा के द्वन्द्व के ईमानदार विवेचन छै। विदेह समान्तर इतिहास के नजर सें ई अध्याय संस्कृत आरो मैथिली के स्वामी-दास सम्बन्ध में नै, संवादशील परम्परा में रखै छै।
१५. काञ्चीनाथ झा 'किरण' के कथा-जगत
किरण (१९०६–१९८९) के रमानन्द झा तेसरका दशक के संक्रान्ति-काल के प्रतिनिधि कथाकार मानै छै — विद्यापतीय कल्पनालोक सें हटि 'देसिल वयना' के यथार्थ ओर उन्मुख। हुनकर कथा-जगत ('चन्द्रग्रहण', 'धर्मरत्नाकर', 'समाजक चित्र') सामाजिक विषमता, जाति, श्रम, धर्मान्धता, सत्ता, स्त्री आरो मनुष्य के नैतिक सङ्घर्ष के कथा-जगत छै। लेखक हुनकर रचना में समाज के अँधार परत के भेदैवाला आलोचनात्मक प्रकाश देखै छै। 'चन्द्रग्रहण' में प्राकृतिक घटनापर अन्धविश्वास के आड़ में होइत व्यभिचार आरो ठगी उजागर छै; 'धर्मरत्नाकर' में राम किसन जकाँ शोषित रैयत के हाहाकार आरो धर्मरत्नाकर बाबू साहेब के पाखण्ड बेनकाब कैल गेलै।
'जाड़क पालामे ठिठुरैत नाङट नेना', 'लाज झँपबा लेल व्याकुल तरुणी', 'स्कूलक फीस लेल दौड़ करैत देशक भविष्य' — ई सब्भे बिम्ब यथार्थवादी करुण-रस के तीव्र सम्प्रेषण छै। पाठक-प्रतिक्रिया-सिद्धान्त के दृष्टि सें किरण के कथा के विस्फोट-क्षण — 'कल्पनाक मचकीपर आस लगैत काल यथार्थसँ सरोकार छूटि जाएब' — के रमानन्द झा जाहि सूक्ष्मता सें पकड़ै छै, ऊ रूपवादी अपरिचितीकरणक बोध के परिचायक छै।
मार्क्सवादी नजर सें किरण सुविधा-सम्पन्न वर्ग आरो श्रमजीवी वर्ग के अन्तर उजागर करै छै; दलित दृष्टि सें सामाजिक प्रतिष्ठा के ब्राह्मणवादी निर्धारण प्रश्नाङ्कित होय छै; नारीवादी नजर सें स्त्री के जिनगी केवल गृहस्थ आदर्श के उदाहरण नै, स्वतन्त्र सामाजिक अनुभव के क्षेत्र बनै छै। किरण के कथा लोकमङ्गलवादी छै, मतरकि उपदेश खाली नै — पात्र के अन्तर्विरोध, विडम्बना आरो सामाजिक असंगति कथा के जीवित बनाबै छै। विदेह समान्तर इतिहास में किरण मिथिला के गौरवगानक बदला मिथिला के भीतर के विषमता देखाबै छै।
१६. मैथिली उपन्यास के आलोक में 'चन्द्रग्रहण' के नारी-पात्र
ई निबन्ध कृति के सबसें बेसी आधुनिक-आलोचनात्मक अध्याय छै आरो मैथिली उपन्यास में स्त्री-पात्र के परिवर्तनशील रूपक अध्ययन करै छै। किरण के 'चन्द्रग्रहण' (१९३२) के रजनी आरो सुषमा सें लऽ कऽ 'रूपा' (१९८८) धरि के नारी-पात्र के विकास-रेखा के रमानन्द झा समाज-सुधार-आन्दोलन के ऐतिहासिक पिछुलका बात सें जोड़ि विश्लेषित करै छै — 'जेना-जेना परिवेशमे सुधारात्मक-आन्दोलनात्मक चेतना प्रखर होइत गेल, उपन्यासक चरित्र-निर्माणमे तकर प्रभाव पड़ैत रहल।' ई साहित्य आरो समाज के द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध के उत्कृष्ट नव-ऐतिहासिकतावादी पाठ छै।
सामाजिक सुधार-आन्दोलन, शिक्षा आरो आधुनिक चेतना के प्रभाव सें 'चन्द्रग्रहण' के नारी-पात्र पारम्परिक मौनता छोड़ि नूतन व्यक्तित्व ग्रहण करै छै। नारी के अन्तःकामना, प्रेम, विरह, देहबोध, निर्णय आरो सामाजिक दायित्व कथा के सक्रिय अङ्ग बनै छै; वातावरण आरो नायिका के अन्तःस्थितिक समान्तर विन्यास मनोवैज्ञानिक गहराई उपजाबै छै। नारीवादी समीक्षा के दृष्टि सें ई निबन्ध कृति के सबसें बेसी अग्रगामी छै — कैलेकि रमानन्द झा पण्डित-वर्ग के ओहि पाखण्ड के उघारै छै जेकर 'समस्त उपदेश अनके लेल' होइत छै, आरो जे मेला-ठेला में अपहृत नारी के सेहो शिक्षा सें वञ्चित रखै छै। 'रचनाकारक व्यक्तित्वक आक्रामकता' के चरित्र-निर्माण में देखब — ई अभिव्यञ्जनावादी आलोचना छै। स्त्री के केवल त्यागमूर्ति अथवा कुलरक्षिका नै, इच्छाशील आरो विचारशील मनुष्य के रूप में देखै के ई कोसिस जरूरी छै।
१७. प्रो॰ हरिमोहन झा एवं हुनकर 'चर्चरी'
मैथिली के सबसें बेसी लोकप्रिय हास्य-व्यङ्ग्यकार हरिमोहन झा (१९०८–१९८४) के 'चर्चरी' एक विधा के पोथी नै — ई संग्रह में कथा, एकाङ्की, छायारूपक, पत्र, दलान के गप्प, पोखरिक गप्प, प्रहसन आरो सांस्कृतिक निबन्ध सम्मिलित छै। 'चर्चरी' के ई विविध-विधात्मक स्वरूप के व्यञ्जन-सम्मिलित 'चर्चरी' (भोज्य-पदार्थ) के रूपक सें उघारलों करब — ई नामकरण-मूल के विश्लेषण चतुर छै। लेखक एकरा पारम्परिक कथा अथवा निबन्ध नै, स्वतन्त्र गप्प-विधा के रूप में पहचानै छै — हुनकर रचना-संसार ('चर्चरी', 'खट्टर ककाक तरंग', 'प्रणम्य देवता') मैथिली में गप्प-विधा के प्रवर्तन कैलकै। हास्य-व्यङ्ग्य आरो वक्रोक्ति के माध्यम सें ऊ थोथा पाण्डित्य, रूढ़िवाद आरो सामाजिक पाखण्डपर प्रहार कैलकै। हुनकर 'पाँच पत्र' जकाँ रचना रस-सिद्धान्त के दृष्टि सें करुण रस के उत्कृष्ट निदर्शन छै, जे पति-पत्नी के बदलै रागात्मक सम्बंध आरो युग-बोध के मार्मिक रूप में परस्तुत करै छै; 'रेलक झगड़ा' जकाँ प्रहसन में आधुनिक शिक्षा के वायु सें सिहकल परिवार के हास्यपूर्ण चित्रण छै।
हरिमोहन झा के सबसें बड़का उपलब्धि मैथिली में विशाल पाठक-समुदाय के निर्माण छै। मैथिल समाज के हास्यप्रिय संस्कार के ऊ साहित्यिक रूप देलकै आरो पाठक के साहित्य ओर आकर्षित कैलकै। भारतीय हास्यरस आरो पाश्चात्य व्यङ्ग्य-दृष्टि ई रचना में एकत्र होय छै; गप्प के मिश्रित विधागत स्वरूप लोक के मौखिक कथन, शास्त्रीय विनोद आरो आधुनिक मुद्रित साहित्य के बीच सेतु बनाबै छै।
संग-संग ई निबन्ध संग्रह के सबसें बेसी असहमति-परधान निबन्ध में एक छै। रमानन्द झा हरिमोहन झा-जइसन कैननी लेखक के सीमा के निर्भीकता सें रेखांकित करै छै — 'अधिकांश रचना पढ़लापर विचारक उन्मेष नहि होइछ, वैचारिक मन्थन नहि होइछ, मात्र गुदगुदी लगैछ, एक बेर हँसा गेलापर ओकर प्रभाव बिला जाइछ।' ई कैनन-केन्द्रित मूल्याङ्कन के खिलाफ विदेह-प्रतिमान के पुनर्मूल्याङ्कन-साहस के अग्रदूत छै — लोकप्रियता के साहित्यिक श्रेष्ठता के पर्याय नै मानब।
१८. कविवर यात्री के स्तम्भ-लेखन
यात्री (नागार्जुन) के स्तम्भ-लेखन के साहित्यिक विधा के रूप में प्रतिष्ठित करै रमानन्द झा मैथिली पत्रकारिता आरो साहित्य के अन्तःसम्बन्ध के उघारै छै। प्रारम्भिक पत्र-पत्रिका के उद्देश्य मातृभाषा-सेवा आरो सामाजिक कुरीति के निदान छेलै; पाठकीय स्तम्भ लेखक, सम्पादक आरो पाठक के बीच वैचारिक संवाद स्थापित करै छेलै। 'यत्र तत्र सर्वत्र', 'यत्किंचित' आरो 'चिन्तन-अनुचिन्तन' जइसन स्तम्भ में यात्री राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था, भाषा आरो संस्कृतिपर तात्कालिक टिप्पणी करै छै; 'चोआ-काका' जइसन व्यङ्ग्य-पात्र के विकास धरि के विश्लेषण ई निबन्ध में छै। यात्री के 'तेज दृष्टिक सीमा-रेखासँ छोटसँ छोट घटनाक बाहर नहि रहब' — ई व्यङ्ग्यकार के सर्वग्राही दृष्टि के स्वीकृति छै।
यात्री अपन स्तम्भ के माध्यम सें शासक वर्ग के वाक्जाल, मिथिलाञ्चलक आर्थिक उपेक्षा आरो भाषा-साम्राज्यवादक तीक्ष्ण आलोचना कैलकै। ऊ हिन्दी के सम्पर्कभाषाक सम्मान दैतहुँ ओकर नामपर मैथिली आरो अन्य भाषा के अधिकार छीनबाक विरोध करै छै। स्तम्भ के भाषा तीक्ष्ण, व्यङ्ग्यपूर्ण, संवादात्मक आरो पात्रप्रधान छै। विधा-फैलाव के दृष्टि सें ई निबन्ध साहित्येतिहास के अखबारी गद्य ओर उन्मुख करै छै आरो मैथिली गद्य में राजनीतिक व्यङ्ग्य आरो सामाजिक चिन्तन के एगो नव प्रतिमान रेखांकित करै छै।
१९. कविवर आरसी
आरसी प्रसाद सिंह (जन्म १९११ ई॰) मैथिली आरो हिन्दी दुन्नु भाषा में सर्जन करै छेलै, मतरकि मैथिली में हुनकर मुख्य परिचय गीतकार के छै। 'शेफालिका', 'माटिक दीप', 'पूजाक फूल' आरो 'सूर्यमुखी' के माध्यम सें हुनकर काव्य-यात्रा राष्ट्रीयता, परकृति, प्रेम, सामाजिक चेतना आरो जन-अधिकार तक विस्तृत होय छै। हुनकर प्रारम्भिक गीत में राष्ट्रीय एकता, स्वाधीनता, त्याग आरो भारतीय समन्वित संस्कृति के स्वर छै — ऊ नव युग के नव निर्माण आरो कोटि-कोटि भारतवासी के ऐक्य-सूत्र में बान्हबाक आह्वान करै छै; बाद के कविता में मिथिला के शोषण, भाषिक अधिकार, बाढ़, राजनीतिक भ्रष्टाचार आरो जनाक्रोश मुखर होय छै।
रूपवादी नजर सें आरसी के खासियत गीतात्मकता, बिम्ब, अनुप्रास, इन्द्रियबोध आरो कोमल भावप्रवाह छै। ई निबन्ध के खास शक्ति इन्द्रियबोध-विश्लेषण में छै — हरसिंगार आरो सुमन में रस-गन्ध, पवन में स्पर्श, सुरभि-धार में रस-गन्ध-नाद के सम्मिश्रण — ई विभिन्न इन्द्रियबोध के सम्मिश्रण-विश्लेषण पाश्चात्य आधुनिक काव्य-समीक्षा के परिष्कृत उपकरण छी; भारतीय दृष्टि सें ई गुण-रीति (माधुर्य-गुण) आरो अलङ्कार-विवेचन के क्षेत्र छै। 'शेफालिका' सें 'सूर्यमुखी' धरि के यात्रा वैयक्तिक सौन्दर्यचेतना सें सामाजिक चेतना ओर बढ़ै कवि के विकास छै।
२०. उपेन्द्र ठाकुर 'मोहन' आरो हुनकर कविता
संग्रह के बहुत विस्तृत निबन्ध में सें ई एक 'आयल वसन्त' के अमर गीतकार मोहन के समर्पित छै। मोहनजी के कविता स्मृति, परकृति, वसन्त, गीतात्मकता आरो जिनगी-सङ्घर्ष के सम्मिलित संसार छै। 'आयल वसन्त' जइसन गीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी कण्ठस्थ रहलै, जाहि सें कविता पाठ्यपुस्तकक बाहर जीवित सामुदायिक स्मृति बनल। रमानन्द झा एहिजा आत्मकथात्मक शैली — छात्र-जीवन में श्रीरामचन्द्र बाबू के कक्षा में गीत-श्रवण, 'मिहिर'-कार्यालय में मोहन के अनवरत कर्मशीलताक स्मरण — अपनाबै छै, जे समीक्षा के संस्मरणात्मक आत्मीयता दै छै।
मोहन के मातृभाषा-प्रेम — 'घरक गोसाउनि झँखथि अन्हारेँ, मन्दिर बारब दीप?', 'गाम नोत नहि, नोत बेलाही' — के माध्यम सें भाषिक अस्मिता के तीक्ष्ण चेतना उघारलों होय छै। 'जखन मैथिली सूपक भाँटा भेल संकटापन्न, की राष्ट्रीयता? देश-भक्ति की?' — ई पदावली भाषा आरो राष्ट्रीयता के अन्तःसम्बन्ध के प्रश्नाङ्कित करै छै।
मोहनजी के जिनगी आर्थिक कमी, शिक्षा के संघर्ष, प्रवास, रोजगार-कमी आरो मुद्रणालय के श्रम सें बनल। ई कारण हुनकर कविता केवल प्रकृति के माधुर्य नै, श्रमशील जीवन के भीतर सौन्दर्य बचायबाक प्रयत्न छै। विदेह समान्तर इतिहास के दृष्टि सें मुद्रणालय के प्रूफ-संशोध के सेहो साहित्येतिहास के निर्माता छै — ऊ केवल दोसर के पोथी सुधारै नै, अपन समय के भाषिक रूप, वर्तनी आरो साहित्यिक संस्कृति के संरक्षक बनै छै।
२१. शुद्धतावादी कथाकार उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास'
उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास' (जन्म १९१७ ई॰) मैथिली भाषा के शुद्ध, देशज आरो स्वाभाविक रूपक पक्षधर कथाकार छै। 'विडम्बना' आरो 'भजना भजले' के विवेचन में रमानन्द झा मात्रा बनाम गुणवत्ता के सैद्धान्तिक प्रश्न उठाबै छै — 'ढाकीक-ढाकी लिखेलेपर जँ कोनो जीवन-मूल्य स्वीकृत नहि भऽ सकल ... तँ जीवन-कालहिमे रचनाकार अप्रासङ्गिक घोषित भऽ जाइत अछि।' ई रूपवादी गुणवत्ता-केन्द्रित मूल्याङ्कन छै; व्यास के कथा के 'बासितेवासि नहि, टटका बनल रहब' — कालातीत ताजगी — के कसौटी कालातीत-मूल्य के अवधारणा सें मेल खाइत छै।
हुनकर कथा भाषा-परयोग, सामाजिक व्यङ्ग्य, नैतिक विडम्बना आरो ग्रामजीवन के जीवित संवाद के कारण विशिष्ट छै। शुद्धतावाद हुनका लेली केवल शब्द के छनोट नै, सांस्कृतिक प्रतिरोध छै — बाहरी भाषिक प्रभाव के बीच मैथिली के अपन वाक्य-विन्यास, लोकोक्ति, उच्चारण आरो भावभूमि बचायब मातृभाषा के अस्मिता बचायब छेलै। रूपवादी नजर सें हुनकर कथा-भाषा पात्र के सामाजिक स्तर आरो मानसिकता निर्माण करै छै; उत्तर-औपनिवेशिक नजर सें भाषिक शुद्धता के आग्रह स्वाभिमान के प्रतीक छै।
२२. पं॰ राजेश्वर झा: व्यक्तित्व ऊ कृतित्व
राजेश्वर झा (१९२२–१९७७) शोधकर्ता, नाटककार, कथाकार, सम्पादक, प्रकाशक आरो संस्थापक के रूप में बहुत सक्रिय छेलै। हुनकर कृति के अनुसन्धानपरक, ऐतिहासिक-पौराणिक आरो सर्जनात्मक तीन वर्ग में बाँटल गेलै — 'मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास', 'मैथिली साहित्यक आदिकाल', 'अवहट्टक उद्भव ओ विकास' आदि हुनकर शोधपरक कृति छै। ई विवेचन में रमानन्द झा एक गम्भीर पद्धतिगत घोषणा करै छै — 'साहित्यकारक व्यक्तित्वकेँ बूझब सर्वप्रथम आवश्यक अछि, विना व्यक्तित्व बूझने कृतित्वक तहमे जाएब सम्भव नहि।' ई जीवनीमूलक समीक्षा के साफ प्रतिपादन छै। राजेश्वर बाबू के आर्थिक विपन्नता के अछै प्रतिवर्ष पोथी-परकाशन आरो लोक के लिखै के लेली प्रेरित करब — ई प्रेरक भूमिका के रमानन्द झा कृतित्व सें बेसी मूल्यवान् मानै छै ('तराजूक पलरापर व्यक्तित्व भरिगर भऽ जएतनि')। संस्था-निर्माता के ई मूल्याङ्कन विदेह-आन्दोलन के संस्था-केन्द्रित दृष्टि के पूर्वाभास छै।
अध्याय के खासियत ई छै जे लेखक प्रशंसापर रुकै नै। राजेश्वर झा के साहित्येतिहास के काल-बँटवारा, ईसापूर्व सहस्राब्दी सें मैथिली साहित्य के सुरुआत आरो अवहट्टसम्बन्धी कई निष्कर्ष के प्रमाणहीन कहै छै। औचित्य आरो ऐतिहासिक पद्धति के दृष्टि सें ई अध्याय 'अखियासल' के सबसें बेसी सन्तुलित आलोचना में सें एक छै — व्यक्ति के श्रम के सम्मान आरो हुनकर निष्कर्ष के कठोर परीक्षण एकसाथ सम्भव छै।
२३. ललित के कथा में परिवेश के संक्रान्त जिनगी
ललित के कथा के रमानन्द झा स्वातन्त्र्योत्तर मोहभङ्ग के साहित्यिक दस्तावेज के रूप में व्याख्या करै छै — स्वतन्त्रतापूर्व आशा आरो स्वतन्त्रतापरान्त मोहभङ्ग के बीच के संक्रमण: 'आशाक किरण निराशामे बदलि गेलैक, लाबनि टूटि कऽ खसि पड़लैक।' पहिलों निर्वाचन में धुरफन्दी, स्वार्थान्धता, धन, जाति आरो जातिवादक नग्न-नाच, नकली नेता, गरीब मतदाता आरो भ्रष्ट विकास-योजना — ई सब्भे सामाजिक परिवेश के यथार्थ बनै छै। ई मार्क्सवादी-यथार्थवादी समीक्षा के उत्कृष्ट परयोग छै, जे साहित्य के राष्ट्रीय-राजनीतिक यथार्थ के संक्रमणशील प्रतिबिम्ब मानै छै।
मार्क्सवादी नजर सें 'प्रतिनिधि' जइसन कथा सुविधा-भोगी शासक वर्ग आरो अधिकार-विहीन गरीब के द्वन्द्व उघारै छै — श्रम के हीन बुझनिहार शिक्षित युवक आखिर में शारीरिक श्रम के महत्त्व स्वीकारै छै। 'लड़ाइ'-कथा में द्वैध-मानसिकता आरो दू पीढ़ी के वैचारिक स्तर आरो दायित्वबोधक विश्लेषण छै। 'रमजानी', 'मृत्युञ्जय', 'ओभरलोड', 'दू चित्र' आदि कथा में परम्परा-विघटन, रोजगार-संकट, धार्मिक पाखण्ड, देहगत आवश्यकता, अस्तित्वगत भार आरो सामन्ती मानसिकता के अवशेष छै।
२४. धीरेन्द्र के कथा के सामाजिक सन्दर्भ
अध्याय सामाजिक सन्दर्भ के सैद्धान्तिक व्याख्या सें सुरुआत होय छै आरो एकरा में रमानन्द झा अपन सबसें बेसी परिष्कृत सैद्धान्तिक प्रतिपादन परस्तुत करै छै — 'सामाजिकता थिक समाजरूपी नेहाइपर पीटि तैयार रूपाकृति; नेहाइ थिक व्यक्ति-मन आ सामाजिक-मनक द्वन्द्व।' ई व्यक्ति-मन बनाम सामाजिक-मन के द्वन्द्वात्मक सिद्धान्त कृति के बौद्धिक शिखर छै — जे मार्क्सवादी द्वन्द्ववाद आरो मनोविश्लेषणात्मक समीक्षा के संगम सें निर्मित छै। लेखक के वैयक्तिक अनुभव तखन सामाजिक बनै छै जखन पाठक के सुप्त अनुभव के जागृत कऽ मिल-जुल के मन के प्रतिनिधित्व करए — रचनाकार के अनुभव के 'समाजक अनुभव भऽ पएब, समाजक दर्पण भऽ पएब' कला के प्रतिबिम्ब-सिद्धान्त के सुस्पष्ट मैथिली अभिव्यक्ति छै।
धीरेन्द्र के कथा में शिक्षित बेरोजगारी, सिफारिश, भ्रष्ट नियुक्ति, सत्य के अवमूल्यन, गरीब के श्रम के अपहरण आरो वर्गीय शोषण के चित्र छै। 'मनुख बिकाइत' आरो 'गीध' के प्रतीक आधुनिक समाज में मनुष्य के वस्तुकरण आरो शक्तिशाली द्वारा निर्बलक भक्षण व्यक्त करै छै — मार्क्सवादी नजर सें 'गीध' पूँजी आरो सत्ता द्वारा श्रमजीवी शरीरक उपभोगक रूपक छै। साधारणीकरण के दृष्टि सें बेरोजगार युवक के निजी वेदना देश के लाखों युवक के वेदना बनै छै। धीरेन्द्र के कथा के 'आँखिक डबडबाएब' के समान-तत्त्व आरो शिल्प के रूप में विवेचित करब सूक्ष्म रूपवादी अवलोकन छै, यद्यपि एहिजा समीक्षक भावुकता आरो शिल्प के भेद-रेखापर अपन असमंजस अपने मानी लै छै।
२५. प्रभास के कथा-यात्रा
संग्रह के आखिरी आरो सबसें बेसी दीर्घ निबन्ध प्रभास कुमार चौधरी (जन्म १९४१ ई॰) के समर्पित छै। रमानन्द झा एहिजा एक व्यापक प्रभाव-अध्ययन करै छै — मैथिली कथापर संस्कृत, अङ्ग्रेजी आरो बङ्गला, तीन साहित्य के प्रभाव के विश्लेषण। ई तुलनात्मक साहित्य के पद्धतिगत परयोग छै, जे संग्रह के ऐतिहासिक वर्णन सें उठाय सैद्धान्तिक तुलना के स्तरपर लऽ जाय छै।
प्रभास के दू दशक के कथा-यात्रा के क्रमिक यात्रा मानि लेखक हुनकर जिनगी-दृष्टि, सामाजिक चेतना आरो कथन-पद्धति में भेलै परिवर्तन के परीक्षण करै छै — कथाकार के 'घरसँ चलि, गाममे घुमि, क्रमशः भावगत निर्लिप्तता आ निष्क्रियता-बोध धरि पहुँचब' के विकास-रेखा। आर्थिक विपन्नता, समाज के स्वार्थ, गरीब के उपेक्षा आरो तथाकथित सम्भ्रान्त वर्ग के अमानवीयता हुनकर कथा के मुख्य विषय बनै छै। प्रभास के कथा-यात्रा व्यक्ति-केन्द्रित अनुभव सें व्यापक सामाजिक बनावट ओर बढ़ै छै — पात्र प्रारम्भ में परिस्थिति के शिकार बुझाइत छै, मतरकि धीरे-धीरे शोषण के संरचना के पहचानय लागै छै। ई लेखकीय चेतना के विकासात्मक अध्ययन समीक्षक के परिपक्व दृष्टि के द्योतक छै। संग्रह के अंत ई आधुनिकतम कथाकारपर होएब 'प्रथम' सें 'समकालीन' धरि के यात्रा के पूरा करै छै। विदेह समान्तर इतिहास के नजर सें प्रभास के कथा इतिहास के विजय-घोष नै, उपेक्षित मनुष्य के दैनिक पराजय, संघर्ष आरो आत्मरक्षाक इतिहास लिखै छै।
उत्तरार्ध: अध्यायवार सीमा, अन्तर्विरोध आरो अपूर्णता
ई मूल्याङ्कन के दोसरका आधा भाग पूर्णतः 'अखियासल' के सीमा, कमजोरी आरो पद्धतिगत संकट के समर्पित छै। ई आलोचनात्मक कठोरता कोय अवमूल्यन नै, बल्कि कृति के ऐतिहासिक महत्त्व के गम्भीर स्वीकृति के जरूरी अङ्ग छै — एक अग्रगामी ग्रन्थ के सीमा के निर्मम विवेचन उपरान्तहि ओकर उत्तराधिकारी कोसिस अपन दिशा निर्धारित कऽ सकै छै।
१. श्रीकृष्ण ठाकुर आरो 'चन्द्रप्रभा' अध्याय के सीमा
'चन्द्रप्रभा' के पहिलों कथा-संग्रह मानै के तर्क जरूरी छै, मतरकि उपलब्ध पाण्डुलिपि अपूर्ण छै। पूरा पाठ, रचनाकाल, पाठान्तर आरो लेखक के आखिरी रूपक कमी में 'प्रथम' पद सावधानी सें देल जाएबाक चाही। अध्याय ऐतिहासिक महत्त्वपर अधिक केन्द्रित छै; कथा सब्भे के पृथक कथानक, चरित्र, कथावाचक, समय-विन्यास आरो भाषिक संरचना के निकट परीक्षण कम छै। संस्कृत नीति-कथा परम्परा सें समानता देखाओल गेलै, मतरकि समानता, प्रभाव, रूपान्तरण आरो मौलिकता के साफ भेद सर्वत्र नै राखल गेलै। संग-संग, विदेह-दृष्टि सें ई सेहो कहल जा सकैछ जे 'चन्द्रप्रभा' के कथा-संसार मुख्यतः संस्कृत ग्रन्थ के छाया में पलल-बढ़ल छै; एकरा में जमीनी लोक-जिनगी आरो वञ्चित वर्ग के यथार्थवादी चित्रण के कमी छै, आरो नीति-उपदेश के प्राधान्य रस-निष्पत्ति में बाधक बनै छै। सुरुआती होय के गौरव कृति के कलात्मक सीमा के ओझल नै करै के चाही।
२. जीवछ मिश्र आरो 'रामेश्वर' अध्याय के सीमा
अध्याय 'रामेश्वर' के पहिलों मौलिक उपन्यास सिद्ध करै के दिशा में प्रबल छै, मतरकि 'प्रथम' के परमाण लेली समकालीन परकाशन-सूची, विज्ञापन, पाण्डुलिपि आरो अन्य सम्भावित उपन्यास के व्यवस्थित तुलना अपेक्षित छेलै। रामेश्वर के अपराध के सामाजिक विवशता सें व्याख्यायित करब युक्तिसंगत छै, मतरकि पत्नीपर अविश्वास, हिंसक प्रवृत्ति आरो डकैती में सक्रिय सहभागिता के नैतिक उत्तरदायित्व कम प्रश्नाङ्कित भेलै। अन्त में पुत्र सें पुनर्मिलन आरो चरित्र-परिवर्तन बहुत आकस्मिक छै — मनोवैज्ञानिक रूपान्तरण के क्रमिक परक्रिया गायब रहने समाधान अतिनाटकीय बुझाइत छै। मार्क्सवादी निकषपर सेहो ई कहल जा सकैछ जे आखिर में उपन्यासकार रामेश्वर के हृदय-परिवर्तन करा कऽ वर्ग-संघर्ष के एगो नैतिक आदर्शवाद में बदलि दै छै — क्रान्तिक सम्भावना के सुधारवाद के पानि सें निझा देल जाय छै। स्त्री-पात्र पार्वती के पीड़ा छै, मतरकि हुनकर स्वाधीन दृष्टि सीमित छै।
३. 'सुमति' अध्याय के सीमा
अध्याय पूर्ववर्ती आलोचक के मत के संग संवाद करै छै, मतरकि 'सुमति' के पूरा कथानक, पात्र-बनावट, दृष्टिबिन्दु आरो भाषा-विन्यास के पर्याप्त प्रत्यक्ष विश्लेषण नै करै छै। ऐतिहासिक महत्त्व आरो 'सफल आधुनिक उपन्यास' होय के दावा बीच तनाव छै — जखन कथानक असंगठित, चरित्र अस्पष्ट आरो प्रस्तुति अपरिपक्व छै, तखन 'सफलता' के कसौटी साफ होय के चाही। नारीवादी नजर सें एगो गम्भीर प्रश्न ई जे सुमति के शिक्षा के एकमात्र उद्देश्य देखाओल गेलै — खसै सासुर के सम्हारब आरो परिवार के कर्ज सें मुक्त करब; एहिजा नारी के अपन कोय स्वतन्त्र सत्ता वा आकाङ्क्षा नै छै, ऊ पितृसत्तात्मक परिवार के उद्धारकक भूमिका तक सीमित छै। 'उचित वक्ता' रूप में कथावाचक के बेर-बेर हस्तक्षेप उपन्यास के संरचनात्मक स्वायत्तते के खण्डित करै छै, जकरा जयकान्त मिश्र 'अपरिपक्व शिल्प' कहने छै; भाषा निबन्धात्मक छै, जाहि में तुलसीदासक चौपाइक भरमार छै — ई काव्य-दोष छै। सामाजिक सुधारक विषय अपनहि कलात्मक श्रेष्ठता के परमाण नै — कथा-वस्तु जरूरी होइतहुँ ओकर प्रस्तुति, चरित्रगत जटिलता आरो आन्तरिक अनिवार्यता समान रूप सें आवश्यक छै।
४. 'निर्दयी सासु' अध्याय के सीमा
कथा स्त्री-उत्पीड़न के प्रश्न उठाबै छै, मतरकि सासु के 'निर्दयी' खलपात्र बनाओलापर पितृसत्ताक व्यापक बनावट व्यक्तिगत क्रूरता में सीमित भऽ सकै छै। सासु अपने कोन सामाजिक दबाव, आर्थिक भय, विवाह-व्यवस्था आरो प्रतिष्ठा-बोध के उत्पाद छै — ई प्रश्न के पर्याप्त विवेचन नै छै। पुतोहु के चरित्र करुणा के पात्र बनै छै, मतरकि ओकर प्रतिरोध, इच्छाशक्ति, स्त्री-समुदाय के सहयोग आरो वैकल्पिक जिनगी-सम्भावना कम विकसित छै — नायिका शारदा पूरा कथा में अकसर मूक छै, आरो वञ्चित-विमर्श के यक्ष प्रश्न — की उपाश्रित बाजि सकै छै? — एहिजा पूर्णतः प्रासङ्गिक छै। एकाङ्गी आरो सपाट चरित्र-निर्माण संरचनावादी दृष्टि सें सेहो सीमा छै। नारीवादी नजर सें स्त्री के केवल पीड़िता बनायब सेहो प्रतिनिधित्व के सीमा छै।
५. बिसरल साहित्यसेवी जनार्दन झासम्बन्धी सीमा
अध्याय के अभिलेखीय उद्देश्य प्रशंसनीय छै, मतरकि सीमित सामग्रीपर आधारित जिनगी-विवेचन कतेको स्थानपर अनुमानपर निर्भर छै। 'जानकी परिणय' के सांस्कृतिक विवरण के चर्चा छै, मतरकि काव्य के छन्द, भाषा, अलङ्कार, कथन-गति आरो पात्र-निर्माण के फैलाव कम छै। बिसरल लेखक के फेर प्रतिष्ठित करै के उत्साह में कृति के वास्तविक कलात्मक सीमा कहियो-कहियो गौण होय जाय छै — इतिहास में स्थान देब आरो उच्च साहित्यिक मूल्य देब एके बात नै।
६. त्रिलोचन झासम्बन्धी अध्याय के सीमा
लेखक अपने मानी लै छै जे त्रिलोचन झा के सामग्री बिखरल आरो कम उपलब्ध छै। ई कारण अध्याय जीवनीपरक पुनर्निर्माण अधिक, कृति-आधारित आलोचना कम बनी जाय छै। मातृभाषा-प्रेम, संगठन आरो समाजसेवाक प्रशंसा पर्याप्त छै, मतरकि हुनकर विशिष्ट साहित्यिक शैली, भाषिक परयोग, विधागत क्षमता आरो विचार के अन्तर्विरोध कम साफ छै। मिथिला के गौरव फेर प्राप्त करै के आह्वान कहियो-कहियो रोमानी अतीतवाद ओर जा सकै छै — समाज के वर्ग-भेद आरो जाति-भेद के ओझराय केवल भावनात्मक एकता के आह्वान अव्यावहारिक बनि सकैछ। प्राचीन गौरव के संग जातिगत विषमता, स्त्री-बहिष्कार आरो सामाजिक रूढ़ि के आलोचना सेहो समान रूप सें आवश्यक छेलै।
७. यदुवरसम्बन्धी अध्याय के सीमा
यदुवर के राष्ट्रीय आरो भाषिक चेतनापर अधिक बल देल गेलै; काव्य के रूप, छन्द, ध्वनि, बिम्ब, वक्रोक्ति आरो वैयक्तिक स्वर के विश्लेषण अपेक्षाकृत कम छै। मातृभाषा-जागरण के कविता कतेको स्थानपर घोषणात्मक आरो उपदेशात्मक भऽ सकै छै — 'जय जय जयति मैथिल जाति' जइसन पङ्क्ति में अभिधा के प्राधान्य छै, ध्वन्यार्थ कम — आरो अध्याय प्रचारात्मकता आरो काव्यात्मकताक अन्तर साफ नै करै छै। 'मैथिल' समुदाय के एकरूप मानल गेलै; जाति, वर्ग, लिङ्ग आरो क्षेत्रानुसार मैथिल अनुभव के भिन्नतापर विचार कम छै। भाषिक अस्मिता सब्भे मैथिल लेली एके रूप में अनुभवित होय छै — ई मान्यता प्रश्नास्पद छै। आदर्शवादक अतिरेक में मिथिला के सामन्ती व्यवस्था के ठोस आलोचना के कमी सेहो एगो सीमा छै।
८. द्विजवरसम्बन्धी अध्याय के सीमा
कवि-सेनानी के सक्रिय जिनगी निश्चय जरूरी छै, मतरकि जीवनी के वीरता काव्य के स्वतन्त्र आलोचनापर भारी पड़ै छै। राजनीतिक सक्रियता अपनहि उत्कृष्ट काव्य के परमाण नै — कविता सब्भे के भाषा, छन्द, प्रतीक, वैचारिक जटिलता आरो कलात्मक स्थायित्व के अधिक निकट विश्लेषण आवश्यक छेलै। राष्ट्रीयता के निर्विवाद लोकमङ्गल के मूल्य मानि लेली गेलै; राष्ट्रवाद के भीतर वर्ग, जाति, धर्म आरो लैङ्गिक असमानता सेहो रहि सकै छै। स्वदेशी आरो चरखा के सामाजिक अरथ छै, मतरकि आधुनिक आर्थिक संरचना सें ओकर सम्बंध आलोचनात्मक रूप सें नै खोलल गेलै। 'छूतहर' में शोषित के बात छै, मतरकि ई क्रान्तिकारी चेतना के बदला गान्धीवादी सुधारवादी परिधि तक सीमित रहि जाय छै आरो छन्द-बद्धता कहीं-कहीं यथार्थ के कुण्ठित करै छै।
९. कुमार गंगानन्द सिंहसम्बन्धी सीमा
लेखक अपने देखाबै छै जे कथाकार के कतेको कथा लक्ष्य-परधान छै — पहिने नैतिक निष्कर्ष स्थिर होय छै, ओकर बाद पात्र आरो घटना जोड़ल जाय छै। ई कारण कथा जीवन के स्वाभाविक जटिलता के बदला उदाहरण बनी जाय छै। कई कथा में दीर्घ कालखण्ड, अनावश्यक मोड़, घटना के फैलाव आरो अन्त में पूरा समाधान कथा-प्रभाव के कमजोर करै छै — लेखक सेहो 'विवाह' आरो 'बिहाड़ि' के तन्तुवाय फलकि जाएब स्वीकारै छै। सामाजिक सुधारक आग्रह रहितहुँ जाति-उन्मूलन आधा बाटपर रुकि जाय छै — अस्पृश्यताविरोधी कथा दलित पात्र के पूरा सामाजिक समानता तक नै लऽ जाय छै आरो 'बिहाड़ि' के सुधार आखिर में उच्च वर्ग के अनुकम्पापर निर्भर रहै छै। नव्य-न्याय के दृष्टि सें 'पञ्च परमेश्वर' में खिलाफ हेत्वाभास के स्थिति छै — एक ओर सुधारक बात आरो दोसरका ओर ग्राम-पञ्चायत के ई उपदेश जे "सामन्त आ जमीन्दारक आमोद-प्रमोदमे व्याघात नहि करबाक चाही" — सुधारक गप्प करै शोषक वर्ग के सुख-शान्तिक वकालत। स्त्री-पात्र के संख्या सेहो कम छै।
१०. हरिलतासम्बन्धी अध्याय के सीमा
ई निबन्ध के सीमा ई जे समीक्षक हरिलता के वैधव्य-जनित वेदना के खाली 'ईश्वरोन्मुखता' के कारण मानि लै छै, ओकर सामाजिक-आलोचनात्मक सम्भावना के अनदेखा कऽ दै छै। एक सशक्त नारीवादी पाठ एहिजा सम्भव छेलै — बाल-विवाह, वैधव्य, स्त्री-शिक्षा के निषेधक खिलाफ चोरा कऽ अक्षर सीखबाक संघर्ष — मतरकि विवेचन मुख्यतः वैष्णव भक्ति तक सीमित रहि गेलै। मनोविश्लेषणक दृष्टि सें ई प्रश्न सेहो उठै छै जे भक्ति एहिजा सामाजिक यथार्थ सें पलायन के साधन तें नै बनल — भौतिक यन्त्रणा के आध्यात्मिक रहस्यवाद में रूपान्तरित कऽ सामाजिक अधिकार के प्रश्न के स्थगित कऽ देब। ई दुन्नु सम्भावित पाठ — भक्ति-रस के शास्त्रीय आस्वाद आरो सामाजिक प्रतिरोध के अपठित सम्भावना — के बीच के तनाव के निबन्ध नै खोलै छै।
११. श्यामानन्द झासम्बन्धी अध्याय के सीमा
अध्याय के शीर्ष के 'काव्य-वस्तु' छै आरो लेखक साफ करै छै जे ऊ कला-पक्ष के बदला वस्तु-पक्ष के अध्ययन करै छै। ई कारण छन्द, बिम्ब, ध्वनि, वाक्य-विन्यास, अलङ्कार आरो शैली के समुचित मूल्याङ्कन छूटि जाय छै। सांस्कृतिक पुनरुत्थान के विचार में 'आर्य संस्कृति' के आदर्शीकरण छै; ई संस्कृति के भीतर जाति, स्त्री-अधिकार आरो सामाजिक बहिष्कार के प्रश्न कम उठै छै। विदेशी प्रभाव अथवा देवनागरी के प्रयोग के कतेको स्थानपर षड्यन्त्रक रूप में देखल गेलै — भाषिक परिवर्तन के जटिल सामाजिक, मुद्रणगत आरो शैक्षिक कारण सेहो सोचै वाला छेलै। व्यङ्ग्य कहीं-कहीं व्यक्तिगत आक्रोश आरो नारा में बदलि जाय छै, जाहि सें ध्वनि क्षीण भऽ जाय छै।
१२. लक्ष्मीपति सिंह आरो पत्रकारितासम्बन्धी सीमा
अध्याय व्यक्तित्व के स्नेहपूर्ण स्मरण अधिक छै, पत्रकारिता के संस्थागत इतिहास कम। पत्रिका के प्रसार-सङ्ख्या, आर्थिक आधार, ग्राहक-वर्ग, वितरण-क्षेत्र, सम्पादकीय नीति आरो पाठकीय प्रतिक्रिया सम्बंधी तथ्य सीमित छै। महिला पाठिका, ग्रामीण ग्राहक, मुद्रक, वितरक आरो सहयोगी लेखक के भूमिका साफ नै होय छै। पत्रकारिता आरो साहित्यिक सम्पादन के सीमा सेहो अधिक साफ होय के चाही — समाचार, विचार, साहित्य, संस्था-सूचना आरो सामाजिक अभियानक पृथक कार्यप्रणालीक विश्लेषण कएल जा सकै छेलै। संग-संग, मैथिली पत्रकारिता के 'वैसाखी'पर ठाढ़ रहै के जे स्वीकृति छै, ओकर विश्लेषण में आर्थिक संकटपर जतेक जोर छै, वैचारिक शून्यता आरो सत्ता सें प्रश्न करै के साहस के अभावपर ओतेक नै।
१३. मधुप के गीत-साहित्य के सीमा
अध्याय मधुप के गीत के सामाजिक आरो सांस्कृतिक उपयोगितापर बल दै छै, मतरकि धुन, मात्रा, ताल, गायन-परम्परा आरो प्रदर्शन-सन्दर्भ के विस्तृत विश्लेषण कम छै। सावित्री, पतिव्रता आरो गृहस्थ आदर्श के स्त्री-छवि पितृसत्तात्मक आदर्श के पुष्ट करि सकै छै — स्त्री के शिक्षा आरो नैतिक सामर्थ्यक प्रशंसा छै, मतरकि ओकर आत्मनिर्णय, इच्छा आरो वैकल्पिक जीवन के प्रश्न सीमित छै। गीत के लोकप्रियता आरो साहित्यिक स्थायित्व अलग-अलग कसौटी छै — कण्ठस्थता काव्य-मूल्य के जरूरी सङ्केत छै, मतरकि एकमात्र परमाण नै।
१४. भट्टीकाव्य परम्परासम्बन्धी सीमा
संस्कृत भट्टीकाव्य आरो मधुप के काव्य के बीच सम्बंध रोचक छै, मतरकि प्रत्यक्ष पाठगत समानता, अनुकरण, रूपान्तरण आरो स्वतन्त्र विकास के साफ परमाण अधिक चाही। शिक्षणपरक काव्य के परम्परागत निरन्तरताक रूप में देखब कतेको भिन्न काल, भाषा आरो पाठक-समुदाय के एकरूप बना सकै छै। व्याकरण अथवा अलङ्कार सिखयबाक प्रयोजन कहियो काव्य के रसात्मक स्वतन्त्रता के सीमित करै छै — अध्याय ई तनाव के पर्याप्त कठोरता सें नै परखै छै। सबसें गम्भीर प्रश्न औचित्य-सिद्धान्त के — 'आत्माक प्रतिकूल' रचना के 'व्यक्तिसँ पैघ समाज' के तर्क सें उचित ठहराएब भाव-औचित्य के मूल-भङ्ग के प्रश्न अनुत्तरित छोड़ि दै छै; प्रयोजन-प्रेरित रचना के सौन्दर्यशास्त्रीय स्थिति की हएत, ताहिपर सैद्धान्तिक स्पष्टता नै भेटै छै। विदेह ज्ञानमीमांसा के कठोरतम निकषपर तें राज्याश्रय में लिखल 'कोबर गीत' दरबारी विवशता के द्योतक छै — जनभाषाक गीतकार जखन राजस्तुति लिखय लेली बाध्य कएल जाय छै, तखन ज्ञानमीमांसीय साहस आरो सबद-परमाण दुन्नु आहत होय छै — यद्यपि रमानन्द झा के 'युगीन विवशता' के सहानुभूतिपूर्ण व्याख्या ई प्रकरणक ऐतिहासिक जटिलता के सेहो रेखांकित करै छै।
१५. किरण के कथा-जगतसम्बन्धी सीमा
किरण के सामाजिक प्रगतिशीलताक प्रशंसा कतेको स्थानपर कथा के औपचारिक विश्लेषण के पाछाँ छोड़ि दै छै। कथानक, कथावाचक, दृष्टिबिन्दु, समय, मौन आरो प्रतीक के फैलाव अपेक्षित छै। मार्क्सवादी अथवा सुधारवादी निष्कर्ष सब्भे कथापर समान रूप सें लागू कएलापर रचना के अन्तर्विरोध, अस्पष्टता आरो बहुअर्थकता घटि सकै छै। किरण के 'मैथिल दृष्टि' कोन सामाजिक स्थान सें बनै छै — ब्राह्मण, दलित, स्त्री, किसान अथवा नगरवासी सब्भे के दृष्टि एक होय छै कि नै — ई प्रश्न कम उठै छै। नव्य-न्याय के दृष्टि सें 'चन्द्रग्रहण' के तर्क-पद्धति में सव्यभिचार हेत्वाभास के स्थिति देखल जा सकैछ — अन्धविश्वास के खण्डन लेली 'विधर्मी द्वारा अपहरण' जइसन अतिनाटकीय आरो साम्प्रदायिक रङ्गवला तर्क के सहारा — जँ अपहरण नै होइत, तें की गङ्गा-स्नान-सम्बंधी अन्धविश्वास उचित छेलै? तर्क के ई शिथिलता कथा के प्रगतिशील अभिप्राय के कमजोर करै छै।
१६. 'चन्द्रग्रहण' के नारी-पात्रसम्बन्धी सीमा
स्त्री-पात्र के नूतनता पहचानल गेलै, मतरकि स्त्री के मूल्याङ्कन कतेको स्थानपर त्याग, शील, प्रेम आरो पारिवारिक दायित्व के परम्परागत कसौटी सें होय छै। नायिका के कामना आरो देहबोध के चर्चा छै, मतरकि स्त्री के आर्थिक स्वतन्त्रता, सम्पत्ति-अधिकार, शिक्षा, श्रम आरो सार्वजनिक जीवन में सहभागिता के प्रश्न सीमित छै। कथा-वाचक के पुरुष-दृष्टि आरो पात्र के अपन स्वर में साफ अन्तर करब आवश्यक छेलै — लेखकद्वारा स्त्री के बजाओल जाएब आरो स्त्री के स्वतन्त्र आत्मकथन समान नै।
१७. 'चर्चरी' अध्याय के सीमा
गप्प के स्वतन्त्र विधा मानै के तर्क सर्जनात्मक छै, मतरकि विधा के जरूरी लच्छन, सीमा, बनावट आरो कथा-निबन्ध-प्रहसन सें भेद व्यवस्थित रूप सें निर्धारित नै छै। हरिमोहन झा के हास्य कहियो सामाजिक विद्रूपताक सूक्ष्म परीक्षण के बदला पात्र के उपहास बनी जाय छै — हास्य के लक्ष्य अकसर कमजोर, ग्रामीण, स्त्री अथवा रूढ़िवादी पात्र बनलापर सत्ता-विरोधी व्यङ्ग्य के धार मन्द भऽ सकै छै। मार्क्सवादी नजर सें ई सेहो कहल गेलै जे हरिमोहन झा समाज के ऊपरी सतहपर चोट करै छै — कर्मकाण्ड आरो पण्डिताइपर — मतरकि सामन्ती आर्थिक आधारपर प्रहार नै करै छै; केवल हँसी-ठट्ठा सें समाज के गम्भीर घाउक चिकित्सा असम्भव। लेखक अपने पूर्ववर्ती आलोचक के — प्रो॰ जयदेव मिश्र आरो डा॰ जयकान्त मिश्र के — ई मत उद्धृत करै छै जे हरिमोहन बाबू पुरान मूल्य के तें तोड़ि देलकै, मतरकि कोय नव आरो रचनात्मक जिनगी-मूल्य स्थापित नै कऽ सकलाह — ई वैचारिक शून्यता के प्रश्न उठाबै छै, आरो ई सेहो जे दोष खोजबाक अत्यधिक आग्रह उदात्त सांस्कृतिक मूल्य के क्षति पहुँचबै छै आरो विकल्प परस्तुत नै करै।
१८. यात्री के स्तम्भ-लेखन के सीमा
स्तम्भ तात्कालिक घटनापर लिखल जाय छै, तें ओकर कई सन्दर्भ समय बीतलापर अस्पष्ट होय जाय छै; पूरा पत्रिका, समाचार आरो पाठकीय प्रतिक्रिया बिना टिप्पणी के आशय अधूरा रहि सकै छै। यात्री के पहिलों पुरुष के तीक्ष्ण स्वर स्तम्भ के जीवन्त बनाबै छै, मतरकि कतेको स्थानपर व्यक्तिगत निर्णय, व्यङ्ग्य अथवा आक्रोश विश्लेषणपर भारी पड़ि सकै छै। स्तम्भ-लेखन के विधागत सीमा सेहो छै — तात्कालिक प्रतिक्रिया सें आगू बढ़ि ई कोय दीर्घकालीन सैद्धान्तिक विकल्प नै दऽ पाबै छै। तीनू स्तम्भ कम अवधिक लेली चलल; ई कारण यात्री के स्तम्भ-चिन्तन के दीर्घकालीन विकासक्रम निर्धारित करब कठिन छै। उपलब्ध सामग्री के आलोचनात्मक सम्पादन आरो कालानुक्रमिक परकाशन आवश्यक छै।
१९. आरसीसम्बन्धी अध्याय के सीमा
आरसी के विशाल काव्ययात्रा के राष्ट्रीयता, मिथिला-प्रेम, सामाजिकता आरो गीतात्मकता के प्रमुख सूत्र में समेटल गेलै, मतरकि चरणानुसार वैचारिक परिवर्तन के अधिक सूक्ष्म विश्लेषण सम्भव छेलै। प्रारम्भिक राष्ट्रीय कविता कहियो घोषणात्मक छै — प्रखर राष्ट्रवाद के शोर में कहीं-कहीं मिथिला के आन्तरिक वर्ग-संघर्ष आरो सीमान्तकृत समाज के सूक्ष्म यथार्थ दबा जाय छै आरो कविता प्रचार ओर झुकि जाय छै। मिथिला के प्राकृतिक सौन्दर्य के वर्णन आदर्शीकृत छै, जखन यथार्थ में बाढ़, गरीबी आरो पलायन सेहो समान रूप सें अखनका छेलै। छायावाद आरो रहस्यवादक प्रभाव उल्लेखित छै, मतरकि आरसी ई प्रभाव के कोना मैथिली अनुभव में रूपान्तरित करै छै, ओकर तुलनात्मक परीक्षण कम छै।
२०. मोहनजीसम्बन्धी अध्याय के सीमा
अध्याय संस्मरणात्मक आत्मीयता सें भरल छै। ई आत्मीयता सें व्यक्तित्व जीवन्त बनै छै, मतरकि आलोचनात्मक दूरी घटै छै। जिनगी-सङ्घर्ष, गरीबी आरो उदार स्वभाव के वर्णन विस्तृत छै; काव्य-संग्रह, पाठान्तर, छन्द, बिम्ब, भाषा आरो विचार-विकास के व्यवस्थित विश्लेषण अपेक्षाकृत कम। 'आयल वसन्त' के लोकप्रियता पूरा काव्य-व्यक्तित्व के प्रतिनिधि नै भऽ सकै छै — कम प्रसिद्ध, कमजोर अथवा विचारात्मक कविता सब्भे के परीक्षण रहितए मूल्याङ्कन अधिक सन्तुलित होइत।
२१. उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास'सम्बंधी सीमा
भाषिक शुद्धतावाद मातृभाषा-स्वाभिमान के साधन भऽ सकै छै, मतरकि कठोर रूप में ऊ भाषा-संकरता, नवशब्द, शहरी अनुभव आरो बदलै बोलचाल के अस्वीकार करि सकै छै। भाषा जीवित समाज के संग बदलै छै — प्रत्येक बाहरी सबद अपवित्र आरो प्रत्येक पुरान सबद शुद्ध नै होय छै; शुद्धता के कसौटी के निर्धारित करत — ई प्रश्न आवश्यक छै। कथाकार के भाषा-साधना के प्रशंसा छै, मतरकि कथानक, चरित्र, मनोविज्ञान आरो सामाजिक दृष्टि के सीमापर समान फैलाव नै — भाषा कथा-साहित्य के प्रमुख तत्त्व छै, मतरकि एकमात्र तत्त्व नै। संग-संग एहिजा एक आलोचनात्मक अन्तर्विरोध सेहो छै — रमानन्द झा व्यास के कथा के 'समसामयिक जीवनसँ विशेष प्रभावित नहि होएब' आरो 'परिवर्तित युग-जीवनक विकृतिसँ अप्रभावित रहब' के गुण मानै छै, जखन कि अन्यत्र (गंगानन्द सिंह, चन्द्रग्रहण, ललित, धीरेन्द्र के विवेचन में) ऊ यथार्थ-संवेदना आरो परिवेश-सम्पृक्ति के सर्वोच्च मूल्य मानै छै — मूल्य-मानदण्ड के अस्थिरता के ई साफ परमाण छै, जेकर विस्तृत विवेचन आगू पद्धतिगत सीमा में कैल गेलै।
२२. राजेश्वर झासम्बन्धी अध्याय के सीमा
ई अध्याय अपने बहुत आलोचनात्मक छै, मतरकि कतेको स्थानपर खण्डन के स्वर अत्यधिक कठोर बनी जाय छै। शोधकर्ता के ऐतिहासिक परिस्थिति, उपलब्ध स्रोत आरो समय के पद्धतिगत सीमा सेहो ध्यान में राखल जा सकै छेलै। राजेश्वर झा के निष्कर्ष प्रमाणहीन छै — ई देखाओल गेलै, मतरकि वैकल्पिक काल-बँटवारा अथवा अवहट्ट-विकास के पूरा प्रतिमान परस्तुत नै कैल गेलै। व्यक्तित्व आरो कृतित्व के परिचय के बाद त्रुटि-सूची विस्तृत छै; श्रेष्ठ सोध, उपयोगी सङ्कलन अथवा सफल नाटकक निकट पाठ कम छै। आलोचना केवल असहमति नै, उपयोगी अंश के पुनर्स्थापन सेहो होय के चाही। संग-संग राजेश्वर झा के निधन के शोक-प्रसङ्ग में आत्मीयता-जनित भावुकता आलोचनात्मक दूरी के प्रभावित करै छै।
२३. ललित के कथासम्बन्धी अध्याय के सीमा
अध्याय सामाजिक, राजनीतिक, अस्तित्ववादी, लैङ्गिक आरो धार्मिक कई प्रश्न एकत्र करै छै। ई फैलाव सें कतेको कथा के विशिष्ट रूप आरो सौन्दर्य पाछाँ पड़ि जाय छै। यौनिक इच्छा के जैविक आवश्यकता कहि धार्मिक-नैतिक बन्धन सें मुक्त करै के व्याख्या एकाङ्गी भऽ सकै छै — इच्छा सत्ता, सहमति, लैङ्गिक असमानता आरो भावात्मक सम्बन्ध सें सेहो जुड़ल छै। कथा सब्भे के युग के प्रत्यक्ष दस्तावेज मानल गेलै; साहित्य यथार्थ के प्रतिलिपि नै — चयन, कल्पना, प्रतीक आरो कथन-दृष्टिद्वारा निर्मित रूप छै। लेखक आरो पात्र के विचार में भेद आवश्यक छै।
२४. धीरेन्द्र के कथासम्बन्धी सीमा
सामाजिक सन्दर्भ के सैद्धान्तिक प्रस्ताव जरूरी छै, मतरकि प्रत्येक कथा के वर्ग-शोषण, बेरोजगारी आरो सामाजिक अन्याय में सीमित करलापर रचना के मनोवैज्ञानिक, भाषिक आरो प्रतीकात्मक स्तर घटि सकै छै। 'गीध' के प्रतीक प्रभावशाली छै, मतरकि प्रतीक के कई सम्भावित अर्थ के बदला एक निश्चित वर्गीय अर्थपर बल देल गेलै। कथा के भाषा, संवाद, मौन, कथा-वाचक के दूरी, अन्त के अनिश्चितता आरो पाठकीय सहभागिता के अधिक विश्लेषण अपेक्षित छेलै। सामाजिक विषय के प्रासङ्गिकता स्वतः कलात्मक सिद्धि के परमाण नै।
२५. प्रभास के कथा-यात्रा के सीमा
'यात्रा' सबद क्रमिक विकास के भाव उपजाबै छै, मतरकि प्रत्येक लेखक के सर्जना सोझ रेखा में सुरुआती सें परिपक्व ओर नै बढ़ै छै — बाद के रचना सदैव पहिल सें श्रेष्ठ हो, ई आवश्यक नै। जीवनी आरो सामाजिक परिवेश के कथा-विकास के प्रमुख कारण मानल गेलै; साहित्यिक प्रभाव, पत्रिका के सम्पादकीय नीति, पाठक-वर्ग, विधागत परयोग आरो आत्मसमीक्षाक भूमिका कम साफ छै। प्रभास के चुनल कथा सब्भे के आधारपर पूरा कथा-दृष्टि निर्धारित करब सीमित निष्कर्ष भऽ सकै छै — अप्रकाशित, दुर्लभ अथवा कम सफल कथा सेहो पूरा मूल्याङ्कन लेली आवश्यक छै।
पद्धतिगत संकट: पूरा सीमा के विस्तृत विवेचन
सीमा १: संकलनात्मक असंगति आरो संरचनात्मक एकसूत्रताक कमी
कृति के सर्वप्रथम आरो सबसें बेसी मौलिक सीमा ओकर उत्पत्ति-प्रक्रिया में निहित छै। ई पचीस निबन्ध सन् १९७२ सें १९८९ तक विभिन्न पत्र-पत्रिका में विभिन्न अवसरपर, विभिन्न पाठक-वर्ग के ध्यान में राखि, स्वतन्त्र रूप में लिखल गेलै छेलै। एकरा एकठाम राखि 'ग्रन्थ' बना देला सें एक अन्तर्निहित असंगति उपजै छै — कहीं व्यक्तित्व-परधान (त्रिलोचन झा, राजेश्वर झा), कहीं कृति-परधान ('सुमति', 'चन्द्रग्रहण' के नारी-पात्र), कहीं विधा-परधान (स्तम्भ-लेखन), कहीं प्रवृत्ति-परधान (यदुवर, द्विजवर) समीक्षा। कोय एकसमान सैद्धान्तिक ढाँचा समस्त निबन्ध के नै बान्है छै। फलतः पाठक के बेर-बेर सन्दर्भ-परिवर्तन करय पड़ै छै। रूपवादी नजर सें ई संरचनात्मक शिथिलता छै — ग्रन्थ में कोय आरोह-अवरोह-युक्त तार्किक प्रगति नै। अध्याय-क्रम अकसर लेखक-जन्म के कालक्रमपर आधारित बुझाइत छै, मतरकि ई क्रम सेहो असंगत छै — कुछ निबन्ध बहुत नान्हकी, कुछ बहुत दीर्घ, बिना कोय घोषित तर्क के। एक सुनियोजित ग्रन्थ में जे भूमिका, पद्धति-कथन आरो उपसंहार अपेक्षित होय छै, से एकरा में गायब छै — प्रत्येक निबन्ध के अन्त में खाली मूल परकाशन-स्रोत आरो तिथि देल छै, जे संकलनक जोड़ा-जाड़ी प्रकृति के उघारि दै छै। अध्याय सब्भे के फैलाव, पद्धति आरो आलोचनात्मक गहराई समान नै।
सीमा २: 'अनुपलब्धता' के आवर्ती स्वीकृति — समीक्षा के आधारभूत कमजोरी
कृति के सबसें बेसी गम्भीर पद्धतिगत संकट ई जे लगभग प्रत्येक प्रारम्भिक निबन्ध में समीक्षक अपने मूल रचना के 'अनुपलब्धता' के मानी लै छै। 'चन्द्रप्रभा' के प्रसङ्ग में — 'चन्द्रप्रभाक अध्ययन-विश्लेषण नीक जकाँ नहि कएल जा सकल अछि, एकर प्रमुख कारण थिक अनुपलब्धता'; त्रिलोचन झा के प्रसङ्ग में — 'बड़ कम सामग्री उपलब्ध अछि'; यदुवर के प्रसङ्ग में — 'यदुवरक प्रसंग अद्यावधि बड़ कम अनुसन्धान भेल अछि'; बिसरल जनार्दन झा के प्रसङ्ग में — 'पत्र-पत्रिकोमे जे रचना प्रकाशित भेल होएत, आब सर्वसुलभ नहि अछि।'
एहिजा एक गहन विरोधाभास उपजै छै — जँ मूल कृति समीक्षक के अपने उपलब्ध नै छेलै, तें ओकर सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्याङ्कन कोन आधारपर सम्भव? बहुत ठाम समीक्षा असल में दोसरका स्रोतपर — जयकान्त मिश्र के मैथिली साहित्येतिहास, करुणाकान्त झा के सोध-प्रबन्ध, अन्य समीक्षक के उद्धरणपर — आश्रित होय जाय छै। रमानन्द झा अपने मानी लै छै जे अधिकांश परवर्ती समीक्षक के 'सामग्रीक सीमा जयकान्त मिश्रक इतिहासे अछि' — मतरकि ई आरोप अपने हुनकहुपर आंशिक रूप में लागू होय छै। पाठ-केन्द्रित समीक्षा के दृष्टि सें ई एक मौलिक कमजोरी छै — पाठ बिना समीक्षा।
विदेह समान्तर इतिहास-प्रतिमान के दृष्टि सें ई सीमा बहुत शिक्षाप्रद छै। समान्तर इतिहास के पहिलों दायित्व अभिलेखीकरण आरो पाठ-सुलभीकरण छै — मूल पाठ के डिजिटल/मुद्रित रूप में सर्वसुलभ केने बिना ओकर पुनर्मूल्याङ्कन असम्भव। रमानन्द झा ई आवश्यकता के बेर-बेर रेखाङ्कित तें करै छै ('सर्वसुलभ भेलेपर विशेष प्रकाश पड़ि सकत'), मतरकि ऊ अपने ओहि अभिलेखीय कार्य के सम्पन्न नै कऽ पाबै छै — कैलेकि ओहि डिजिटल-पूर्व युग में ई व्यक्तिगत श्रम सें असम्भव-प्राय छेलै। इहे अभिलेखीय रिक्तता के विदेह-आन्दोलन अपन ई-पत्रिका, पोथी-संग्रह आरो पञ्जी-अभिलेखीकरण सें भरबाक कोसिस करै छै। तात्पर्य — 'अखियासल' के सबसें बड़का सीमा इहे ओकर सबसें बड़का ऐतिहासिक सार्थकता छै: ई ओहि रिक्तता के नामाङ्कित करै छै जकरा भरब परवर्ती पीढ़ी के दायित्व बनी जाय छै।
सीमा ३: मूल्य-मानदण्ड के अस्थिरता आरो आन्तरिक अन्तर्विरोध
गम्भीर सैद्धान्तिक दृष्टि सें कृति के सबसें बेसी सोचै वाला दोष ओकर मूल्य-मानदण्ड के अस्थिरता छै। रमानन्द झा एक निबन्ध में जाहि गुण के सर्वोच्च मानै छै, दोसर में ओकरे विपरीत के प्रशंसित करै छै —
(क) गंगानन्द सिंह, 'चन्द्रग्रहण' के नारी-पात्र, ललित आरो धीरेन्द्र के विवेचन में समसामयिक यथार्थ-संवेदना, परिवेश-सम्पृक्ति आरो युग-जीवन के प्रतिबिम्बन के सर्वोच्च मूल्य मानल गेलै; मतरकि व्यास के कथा के ठीक ई कारणें प्रशंसित कैल गेलै जे ऊ समसामयिक जीवन सें खास प्रभावित नै होय छै आरो परिवर्तित युग-जीवन के विकृति सें अप्रभावित रहै छै। ई प्रत्यक्ष आत्मविरोध छै — यथार्थ-सम्पृक्ति कखनहु गुण, कखनहु ओकर कमी गुण।
(ख) हरिमोहन झा के हास्य के 'विचारक उन्मेष नहि करब' के कारणें न्यून मूल्य देल गेलै, मतरकि मधुप के गीत के 'तत्काल हृदय-प्रभाव' आरो आनन्द के कारणें उच्च मूल्य देल गेलै — जखन कि गीत सेहो अकसर वैचारिक मन्थन नै, बल्कि भाव-तात्कालिकतापर आश्रित होय छै। तत्काल-प्रभाव कखनहु गुण (गीत), कखनहु दोष (हास्य)।
(ग) 'कोबर-गीत' जइसन आत्म-विरोधी, प्रयोजन-प्रेरित रचना के 'व्यक्तिसँ पैघ समाज' के तर्क सें उचित ठहराओल गेलै, मतरकि क्षेमेन्द्र के औचित्य-विचार के दृष्टि सें आत्मा के प्रतिकूल रचना भाव-औचित्य के मूल-भङ्ग छै — समीक्षक एहिजा सैद्धान्तिक स्पष्टता प्रदान नै कऽ पाबै छै।
ई अस्थिरता ई कारणें छै जे रमानन्द झा कोय एक घोषित सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता नै अपनाबै छै। ऊ प्रसङ्गानुसार कखनहु प्रभाववादी, कखनहु समाजशास्त्रीय, कखनहु जीवनीमूलक, कखनहु रूपवादी दृष्टि अपनाबै छै। ई पद्धतिगत सारसंग्रहवाद एक ओर लचीलापन दै छै, तें दोसरका ओर मूल्याङ्कन के अप्रत्याशित आरो असंगत बना दै छै।
सीमा ४: सैद्धान्तिक अनुशीलन के कमी — शास्त्रीय शब्दावलीक अनुपस्थिति
यद्यपि रमानन्द झा के समीक्षा में रस, ध्वनि, व्यञ्जना, औचित्य आदि भारतीय काव्यशास्त्रीय अवधारणा अन्तर्निहित रूप में विद्यमान छै, तइयो ऊ ई शास्त्रीय प्रतिमान के कहीं सुस्पष्ट सैद्धान्तिक उपकरण के रूप में परयोग नै करै छै। 'व्यञ्जित', 'सम्प्रेषण', 'भावाश्रित' जइसन सबद तें आबै छै, मतरकि आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, कुन्तक, क्षेमेन्द्र, भट्टनायक आदि आचार्यक नाम आरो हुनकर सिद्धान्त के व्यवस्थित अनुप्रयोग गायब छै। ओहिना, पाश्चात्य सिद्धान्त के कहीं नामोल्लेख अथवा सुविचारित परयोग नै भेटै छै। ई सें एक द्वैध स्थिति उपजै छै। एक ओर ई सैद्धान्तिक लाघव समीक्षा के सुपाठ्य, सम्प्रेषणीय आरो पत्रकारीय-सुलभ बनाबै छै — जे ओकर मूल परकाशन-सन्दर्भ (पत्रिका) के अनुकूल छेलै। मतरकि दोसरका ओर ई अकादमिक गहनताक कमी उपजाबै छै। समीक्षा विवरणात्मक आरो मूल्याङ्कनात्मक तें छै, मतरकि सैद्धान्तिक-विश्लेषणात्मक कम छै। एक समान्तर इतिहास के दीर्घकालिक वैधता प्रदान करबा लेली जे सुदृढ़ सैद्धान्तिक आधार आवश्यक होय छै, से एकरा में अविकसित रहि जाय छै।
सीमा ५: पिछुलका संदर्भ के सीमा — पुरुष-केन्द्रिकता आरो वर्ण-केन्द्रिकता
समाजशास्त्रीय आरो उत्तर-औपनिवेशिक नजर सें कृति के एक गम्भीर सीमा ओकर सामाजिक पिछुलका संदर्भ के संकीर्णता में छै। पचीस निबन्ध में चौबीस पुरुष-रचनाकार के समर्पित छै; खाली एक (हरिलता) स्त्री-रचनाकार के। ओहू में हरिलता के विवेचन मुख्यतः वैष्णव भक्ति तक सीमित रहि जाय छै। स्त्री अधिकतर पात्र अथवा प्रेरणा के रूप में उपस्थित छै, स्वतन्त्र लेखिका, सम्पादिका आरो आलोचक के रूप में कम — स्त्री-लेखिका के स्वतन्त्र साहित्यिक इतिहास पर्याप्त विकसित नै।
ओहिना, विवेचित अकसर समस्त रचनाकार एक विशिष्ट सामाजिक स्तर सें आबै छै। मिथिला के दलित, अतिपिछड़ा, अल्पसंख्यक आरो लोक-परम्परा के — मौखिक साहित्य, गीत-नाद-परम्परा के अनाम रचयिता — रचनाकार ई समान्तर इतिहास सें अकसर गायब रहि जाय छै; जाति आरो वर्ग के प्रश्न उठै छै, मतरकि दलित समुदाय के आत्मस्वर सीमित छै। ई सीमा युग-सापेक्ष छै (जे उपलब्ध अभिलेख अकसर उच्च-वर्ण के छेलै), तइयो विदेह समान्तर-प्रतिमान के पूरा जनतान्त्रिक समावेशिताक कसौटीपर 'अखियासल' आंशिक रूप में अपूर्ण रहि जाय छै। समान्तर इतिहास के अरथ खाली बिसरल उच्चवर्णीय रचनाकार के फेर-उभार नै, बल्कि पूरा हाशिया के — दलित, स्त्री, लोक, मौखिक — पुनःस्थापना छै; ई व्यापक अर्थ में रमानन्द झा के परियोजना एक सुरुआत खाली छै, पूर्णता नै।
सीमा ६: पाठ-प्रामाणिकता आरो सम्पादकीय अशुद्धिक प्रश्न
कृति में उद्धृत पद्यांश आरो गद्यांशक पाठ-प्रामाणिकता सन्दिग्ध रहि जाय छै। कैलेकि अपने समीक्षक मानी लै छै जे बहुत रचना पत्र-पत्रिका में छिड़िआएल आरो अनुपलब्ध छै, तें उद्धृत अंश के मूल पाठ सें तुलना-सत्यापन अकसर असम्भव छेलै। परवर्ती सम्पादन आरो मुद्रण-प्रक्रिया में ई पाठक शुद्धता आओर संकटग्रस्त भऽ सकै छै — उपलब्ध प्रति में वर्तनी-अस्थिरता आरो मुद्रण-दोष सेहो विद्यमान छै। एक विश्वसनीय समान्तर इतिहास लेली पाठ-समीक्षा आरो आलोचनात्मक संस्करणक अनुशासन जरूरी छै, जेकर कमी ई सुरुआती कृति में स्वाभाविक छै। 'प्रथम' आरो 'मौलिक' जइसन पद लेली अधिक कठोर पाठालोचन, पाण्डुलिपि-अध्ययन आरो परकाशन-इतिहास आवश्यक छै; निष्कर्ष जँ सीमित सामग्रीपर आधारित हो, तें अनुमान के प्रमाण के स्थान नै लै के चाही।
सीमा ७: आत्मीयता-जनित प्रशंसा के अतिरेक आरो आलोचनात्मक दूरी के कमी
कई निबन्ध में — विशेषतः लक्ष्मीपति सिंह, मोहन आरो राजेश्वर झा-सम्बंधी अध्याय में — समीक्षक आरो विवेच्य रचनाकार के बीच व्यक्तिगत आत्मीयता समीक्षा के संस्मरणात्मक श्रद्धाञ्जलिक रूप दऽ दै छै। मोहन के स्मरण, लक्ष्मीपति सिंह के विहुँसै आकृतिक भावुक चित्रण, राजेश्वर झा के निधन के शोक — ई सब्भे भावनात्मक रूप में मार्मिक तें छै, मतरकि ई सें आलोचनात्मक दूरी भङ्ग होय छै। वस्तुनिष्ठ समीक्षा के दृष्टि सें ई प्रशंसा-पूर्वाग्रह छै, जे मूल्याङ्कन के निष्पक्षता के प्रभावित करै छै। अपवाद-स्वरूप हरिमोहन झा-सम्बंधी निबन्ध में समीक्षक जे आलोचनात्मक साहस देखाबै छै, से समस्त संग्रह में समान रूप में उपस्थित नै छै। जीवनी कहीं-कहीं कृति के विश्लेषणपर आरो विषयवस्तु रूप-सौन्दर्यपर भारी पड़ै छै।
सीमा ८: समान्तर इतिहास-प्रतिमान के अपूर्ण सैद्धान्तिकीकरण
आखिर में, विदेह समान्तर इतिहास-प्रतिमान के दृष्टि सें सबसें बेसी मौलिक सीमा ई जे रमानन्द झा समान्तर इतिहास के अवधारणा के व्यवहार में तें जीबै छै, मतरकि ओकरा सिद्धान्त के रूप में साफ तौर पर प्रतिपादित नै करै छै। 'दू कोटिक साहित्यकार' के सिद्धान्त एकर सबसें बेसी निकट छै, मतरकि ऊ मुख्यधारा के कैनन के — जयकान्त मिश्र के इतिहास के — विकल्प अथवा विरोध नै, बल्कि ओकर पूरक बनि रहि जाय छै। समीक्षक बेर-बेर जयकान्त मिश्र के सच्चा आधार मानि हुनकहि सूचनापर आश्रित रहै छै, जखन कि समान्तर इतिहास के असली दायित्व मुख्यधारा के कैनन के आधार-मान्यता के अपने प्रश्नाङ्कित करब छै। तात्पर्य — 'अखियासल' समान्तर इतिहास के सामग्री तें परस्तुत करै छै, मतरकि ओकर सैद्धान्तिकी अविकसित छोड़ि दै छै। ई कैनन के विस्तारित करै छै, मतरकि कैनन-निर्माण के शक्ति-संरचना के विखण्डित नै करै छै। इहे ओहि कार्य के रिक्तता छै जकरा विदेह-आन्दोलन अपन घोषित सैद्धान्तिकी, संस्थागत अभिलेखीकरण आरो जनतान्त्रिक समावेशिता सें पूरा करै के कोसिस करै छै।
संग-संग ई सेहो कहबाक चाही जे मातृभाषा-प्रेम पोथी के ऊर्जा छै, मतरकि कतेको स्थानपर ई प्रेम सांस्कृतिक गौरववाद अथवा बाहरी प्रभाव के प्रति अत्यधिक संशय में बदलि जाय छै — जखन कि भाषा सदैव सम्पर्क, मिश्रण आरो परिवर्तन सें विकसित होय छै; आरो राष्ट्रीय अथवा सांस्कृतिक आस्था कहीं-कहीं प्रश्नरहित मूल्य बनी जाय छै।
पूरा आलोचनात्मक निर्णय
पोथी के प्रमुख उपलब्धि
'अखियासल' के सबसें बेसी जरूरी उपलब्धि छै — साहित्यिक इतिहास के बिसरल स्थान सभपर प्रकाश देब। ई पोथी पूछै छै —
मैथिली कथा के वास्तविक सुरुआत कतय सें मानल जाए?
प्रभाव आरो अनुवाद में की अन्तर छै?
'प्रथम' कृति निर्धारित करै के परमाण की हो?
दुर्लभ पाण्डुलिपि इतिहास सें कोना बाहर होय जाय छै?
पत्रिका, सम्पादक आरो प्रकाशक साहित्य निर्माण में की भूमिका निभाबै छै?
राष्ट्रीय आन्दोलन में मैथिली साहित्यकार के योगदान किएक बिसरल भेलै?
हास्य के लोकप्रियता के भीतर सामाजिक अन्याय ओझल तें नै?
भाषिक शुद्धता आरो भाषिक विकास के बीच कोन सम्बंध छै?
स्वतन्त्रता के बाद गरीब, बेरोजगार आरो श्रमिक के जिनगी किएक नै बदलल?
साहित्यकार के वैयक्तिक अनुभव कोना सामाजिक अनुभव बनै छै?
ई प्रश्न पोथी के साधारण व्यक्तित्व-कृतित्व सङ्ग्रह सें ऊपर उठाबै छै।
भारतीय साहित्यशास्त्र के दृष्टि सें
पोथी रस के सामाजिक फैलाव करै छै। करुणा केवल पात्र के दुःखपर आँसू बहायब नै, दुःख के सामाजिक कारण खोजब छै। वीरता केवल रणभूमि में नै, मातृभाषा-रक्षा, सत्य के पक्ष आरो शोषण-विरोध में छै। हास्य केवल मनोरञ्जन नै, सत्ता आरो रूढ़ि के मुखौटा उतारबाक साधन छै। ध्वनि-सिद्धान्त के अनुसार कई कृति के भीतर प्रत्यक्ष कथा सें अधिक जरूरी अप्रत्यक्ष सामाजिक अरथ छै। औचित्य-सिद्धान्त लेखक के इतिहास के दावा, विधागत नामकरण आरो चरित्र के विश्वसनीयता परखबाक आधार दै छै। मतरकि शास्त्रीय निकषपर मुख्यधारा के कई सुरुआती रचना के सीमा सेहो साफ होय छै — नीति आरो उपदेश के भरमार सें रसभङ्ग, अभिधा के प्राधान्य सें ध्वनि के क्षय, आरो नारा बनै कविता में वक्रोक्ति के विनाश।
पाश्चात्य सिद्धान्त के दृष्टि सें
'अखियासल' में नव-इतिहासवादी आरो मार्क्सवादी प्रवृत्ति खास प्रखर छै। साहित्य सत्ता, धन, जाति, भाषा, संस्था आरो सामाजिक आन्दोलन सें जुड़ल छै। ललित आरो धीरेन्द्र के कथा-विवेचन अस्तित्वगत संकट, वर्गीय शोषण आरो आधुनिक मनुष्य के निरर्थकता उघारै छै। नारीवादी दृष्टि उपस्थित छै — विशेषतः 'निर्दयी सासु', 'सुमति' आरो 'चन्द्रग्रहण' के विवेचन में — मतरकि ओकर पूरा सम्भावना (जइसन हरिलता के प्रतिरोधी पाठ) अविकसित रहि जाय छै। उत्तर-औपनिवेशिक नजर सें मातृभाषा-विमुखता, हिन्दी-अङ्ग्रेजी के प्रभुत्व आरो मैथिली के सार्वजनिक क्षेत्र सें निष्कासन पोथी के स्थायी चिन्ता छै।
विदेह समान्तर इतिहास के नजर सें
'अखियासल' मैथिली साहित्य के वैकल्पिक वंशावली बनाबै छै। ई वंशावली में —
श्रीकृष्ण ठाकुर आरो 'चन्द्रप्रभा',
जीवछ मिश्र आरो 'रामेश्वर',
रासबिहारी लाल दास आरो 'सुमति',
जनसीदन आरो बिसरल जनार्दन झा जइसन साहित्यसेवी,
त्रिलोचन झा जइसन मातृभाषानुरागी,
यदुवर आरो द्विजवर जइसन जागरणकारी कवि,
हरिलता जइसन संघर्षशील कवीश्वरी,
लक्ष्मीपति सिंह जइसन सम्पादक,
मधुप आरो मोहन जइसन गीतकार,
यात्री जइसन स्तम्भकार,
व्यास जइसन भाषिक शुद्धतावादी,
राजेश्वर झा जइसन संस्था-निर्माता,
किरण, ललित, धीरेन्द्र आरो प्रभास जइसन सामाजिक कथाकार
— एकहि विस्तृत इतिहास में स्थान पाबै छै। ई इतिहास मिथिला के राजवंश अथवा पाण्डित्य के केन्द्र खाली नै मानै छै। ई मिथिला में भूखल बुतरू, अत्याचारित पुतोहु, बेरोजगार युवक, शोषित किसान, मातृभाषा-विहीन शिक्षित वर्ग, मुद्रणालय के श्रमिक आरो बिसरल सम्पादक सब्भे उपस्थित छै।
उपसंहार: सुरुआत के गरिमा आरो रिक्तता के उत्तराधिकार
'अखियासल' के महत्त्व आखिरी निर्णय देबा में नै, मैथिली साहित्य के इतिहासपर पुनर्विचार करबा में छै। ई पोथी प्रतिष्ठित इतिहास के सामने वैकल्पिक प्रश्न राखै छै। लेखक साहित्य के चमकै शिखर खाली नै देखै छै; ऊ नीचाँ दबाओल ईंट, टूटल पाण्डुलिपि, पुरान पत्रिका, भूखल पात्र, उपेक्षित भाषा आरो बिसरल साहित्यसेवी के सेहो देखै छै। पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुर सें लऽ कऽ प्रभास कुमार चौधरी तक साहित्य में यथार्थवाद, राष्ट्रवाद आरो समाज-सुधारक क्रमिक विकास दृष्टिगोचर होय छै, आरो संग-संग — जखन ई पूरा रचना-संसार के समान्तर इतिहास-दृष्टि, नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसा आरो पाश्चात्य-भारतीय काव्यशास्त्र के कठोर निकषपर कसल जाय छै — तखन एकर ढाँचागत, वैचारिक आरो सैद्धान्तिक सीमा सेहो उजागर होय छै: सामन्ती मानसिकता के अवशेष, सुधारवाद के सीमा, पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रह आरो वञ्चित वर्ग के सच्चा स्वर के कमी। साहित्य तखनहि पूर्णतः समान्तर आरो सच्चा बनि सकैछ जखन ऊ राज्याश्रय आरो सामन्ती वर्चस्व सें मुक्त भऽ, शोषित के यथार्थ के बिना कोय हेत्वाभास के, पूरा ज्ञानमीमांसीय साहस के संग परस्तुत करए।
एकर श्रेष्ठता ओतए छै जतए —
लेखक अभिलेख खोजै छै,
प्रचलित भूल सुधारै छै,
बिसरल लेखक के फेर उपस्थित करै छै,
सामाजिक जिनगी आरो साहित्य के सम्बंध खोलै छै,
प्रशंसा करितो आलोचनात्मक दूरी रखै छै,
मातृभाषा आरो जनजीवन के साहित्येतिहास के केन्द्र बनाबै छै।
एकर सीमा ओतए छै जतए —
अनुमान प्रमाण के स्थान लै छै,
जीवनी कृति के विश्लेषणपर भारी पड़ै छै,
विषयवस्तु रूप-सौन्दर्य के ढाँकि दै छै,
मूल्य-मानदण्ड अस्थिर होय जाय छै,
राष्ट्रीय अथवा सांस्कृतिक आस्था प्रश्नरहित मूल्य बनी जाय छै,
स्त्री, दलित आरो निम्नवर्गक आत्मस्वर पर्याप्त स्वतन्त्रता नै पाबै छै।
पूरा मूल्याङ्कन के निष्कर्ष ई जे 'अखियासल' अपन युग के एक अग्रगामी, साहसी आरो ऐतिहासिक दृष्टि सें अपरिहार्य कृति छै, जेकर मौलिकता ओकर सीमा सें अभिन्न रूप में जुड़ल छै। एकर गुण — पहिलों-खोज के साहस, बिसरल रचनाकार के फेर-उभार, समाजशास्त्रीय अन्तर्दृष्टि, 'दू कोटिक साहित्यकार' के मौलिक सिद्धान्त, आरो मैथिली साहित्येतिहास के व्यक्ति-केन्द्रित कैनन सें मुक्त कऽ जन-केन्द्रित बनएबाक कोसिस — ई सब्भे एकरा मैथिली आलोचना के एक कोसिला-प्रस्तर बनाबै छै। संग-संग एकर सीमा — संकलनात्मक असंगति, मूल पाठक अनुपलब्धता, मूल्य-मानदण्ड के अस्थिरता, सैद्धान्तिक अनुशीलन के कमी, पिछुलका संदर्भ के संकीर्णता, पाठ-प्रामाणिकता के संकट, आत्मीयता-जनित पूर्वाग्रह आरो समान्तर इतिहास के अपूर्ण सैद्धान्तिकीकरण — ई सब्भे कोय व्यक्तिगत न्यूनता नै, बल्कि ओहि मुद्रण-सीमित, डिजिटल-पूर्व, संस्था-विहीन युग के संरचनात्मक बाध्यताक प्रतिफल छै।
इहे द्वैध — गुण आरो सीमा के अभिन्नता — 'अखियासल' के विदेह समान्तर इतिहास-आन्दोलन के एक पूर्व-रूप बनाबै छै। जे रिक्तता के रमानन्द झा नामाङ्कित करै छै — सर्वसुलभता, अभिलेखीकरण, पुनर्मूल्याङ्कन — ओहि रिक्तता के भरब परवर्ती पीढ़ी के ऐतिहासिक दायित्व बनी जाय छै। ई अर्थ में, कृति के सबसें बड़का सीमा इहे ओकर सबसें बड़का उत्तराधिकार छै। 'आँखि' ओहि दृष्टि के छै जे बिसरल पाठ के देखै के साहस केलक, आरो 'साल' ओहि युग के छै जाहि में ओहि दृष्टि के पूरा करै के साधन अनुपलब्ध छेलै — 'अखियासल' नाम अपने ई द्वैध के व्यञ्जना करै छै। तइयो मैथिली आलोचना आरो साहित्येतिहास में 'अखियासल' के स्थान जरूरी छै। ई पोथी इतिहास के बन्द कपाट खोलि कहै छै जे साहित्य के वास्तविक परम्परा केवल प्रसिद्ध नाम के सूची नै — ऊ स्मृति, विस्मृति, संघर्ष, भाषा, संस्था, पाठक आरो जनजीवनक संयुक्त समान्तर इतिहास छै।
परिशिष्ट: संग्रह के अध्याय-सूची (मूल परकाशन-स्रोत सहित)
सन्दर्भ-ग्रन्थ-सूची
1. रमानन्द झा 'रमण', अखियासल, भारतीय भाषा संस्थान (सी.आइ.आइ.एल.), मैसूर, १९९५।
2. जयकान्त मिश्र, अ हिस्ट्री ऑफ मैथिली लिटरेचर (मैथिली साहित्य के इतिहास)।
3. करुणाकान्त झा, सोध-प्रबन्ध (मैथिली साहित्य-सम्बंधी), 'अखियासल' में उद्धृत।
4. गजेन्द्र ठाकुर, अ पैरेलल हिस्ट्री ऑफ मिथिला एण्ड मैथिली लिटरेचर, विदेह: पहिलों मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, भाग १, https://www.videha.co.in/new_page_1.htm
5. गजेन्द्र ठाकुर, अ पैरेलल हिस्ट्री ऑफ मिथिला एण्ड मैथिली लिटरेचर, विदेह: पहिलों मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, भाग २७, https://www.videha.co.in/new_page_27.htm
6. गजेन्द्र ठाकुर, अ पैरेलल हिस्ट्री ऑफ मिथिला एण्ड मैथिली लिटरेचर, विदेह: पहिलों मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, भाग २८, https://www.videha.co.in/new_page_28.htm
7. गजेन्द्र ठाकुर, अ पैरेलल हिस्ट्री ऑफ मिथिला एण्ड मैथिली लिटरेचर, विदेह: पहिलों मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, भाग ९०, https://www.videha.co.in/new_page_90.htm
8. गजेन्द्र ठाकुर, रचना-सङ्कलन, विदेह: पहिलों मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, https://www.videha.co.in/gajenthakur.htm
9. मूल निबन्ध सब्भे के पहिलों-परकाशन पत्र-पत्रिका: मिथिला मिहिर, मिथिलामोद, भाखा, मैथिली अकादमी पत्रिका, बसात, हालचाल, मैथिली प्रकाश आरो अखिल भारतीय मैथिली साहित्य सम्मेलन/परिषद्क स्मारिका (१९७२–१९८९)।
२.२३. गजेन्द्र ठाकुर- अखियासल (बज्जिका मैथिली)
'अखियासल': भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त आ विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से विस्तृत आलोचनात्मक आस्वाद
-गजेन्द्र ठाकुर
प्रस्तावना: कृति, कृतिकार आ समीक्षा के प्रस्थान-बिन्दु
डा॰ रमानन्द झा 'रमण' के 'अखियासल' मैथिली साहित्य के इतिहास, कथा-विकास, आरम्भिक उपन्यास, विस्मृत साहित्यसेवी, राष्ट्रीय चेतना, गीत-काव्य, पत्रकारिता, स्तम्भ-लेखन आ आधुनिक कथा के सामाजिक सरोकार के पुनर्मूल्याङ्कन करयवला आलोचनात्मक निबन्ध-संग्रह हय। ई संग्रह भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर से सन् १९९५ ई॰ में प्रकाशित भेल आ एमें पचीसगो स्वतन्त्र आलोचनात्मक निबन्ध संकलित हय। ई सब निबन्ध के मूल प्रकाशन-स्रोत 'मिथिला मिहिर', 'मिथिलामोद', 'भाखा', 'मैथिली अकादमी पत्रिका', 'बसात', 'हालचाल', 'मैथिली प्रकाश' जइसन पत्र-पत्रिका आ अखिल भारतीय मैथिली साहित्य सम्मेलन के स्मारिका हय। तात्पर्य ई जे ई कोनो एके बेर योजनाबद्ध रूप में लिखल गेल ग्रन्थ न, बल्कि सन् १९७२ से लेके १९८९ तक लगभग दू दशक के पत्रकारीय-आलोचनात्मक श्रम के संचयन हय। ई संकलनात्मक स्वरूप के ध्यान में रखने बिना एकर उचित मूल्याङ्कन सम्भव न।
पोथी के आरम्भ पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुर आ 'चन्द्रप्रभा' के मैथिली के आरम्भिक कथाकारिता आ कथा-संग्रह के परम्परा में प्रतिष्ठित करे के प्रयास से होय हय आ समापन आधुनिकतम कथाकार प्रभास कुमार चौधरी पर — अर्थात् मैथिली के पहिल कथाकार से लेके समकालीन कथाकार तक, प्रायः दुइ शताब्दी के विस्तार ई पचीस निबन्ध में समाहित हय। ई दीर्घ पटल के कारणेँ 'अखियासल' खाली समीक्षा न, बल्कि एक प्रकार के समान्तर साहित्येतिहास के आधारशिला-प्रस्तर बन जाय हय — आ इहे ओकर सबसे बड़ मौलिकता आ सबसे बड़ सीमा दुनू के स्रोत हय।
ई पोथी साहित्य के स्थापित शिखर-पुरुष सब के प्रशस्ति खाली न करै हय। एकर मूल प्रश्न हय — मैथिली साहित्य के इतिहास में के स्मरणीय बनावल गेल, के विस्मृत भेल, कोन रचना 'प्रथम' कहल गेल, कोन पाण्डुलिपि पाठक तक न पहुँचल, आ साहित्यिक मान्यता निर्माण में संस्था, पत्रिका, सम्पादक, प्रकाशक, प्रवासी केन्द्र आ सामाजिक सत्ता केहन भूमिका निभावै रहल। कृति के केन्द्रीय अभिप्राय साफ हय — मैथिली गद्य आ पद्य के ओ प्रारम्भिक आ उपेक्षित रचनाकार लोक के प्रकाश में अनब, जिनका मुख्यधारा के साहित्येतिहास बिसर गेल वा जिनका सम्बन्धी सामग्री 'अनुपलब्ध' रह गेल।
'अखियासल' के पचीस अध्याय एकरेखीय इतिहास के बदला अनेक समान्तर धारा के उद्घाटन करै हय —
मैथिली के आरम्भिक कथा आ उपन्यास के खोज,
विस्मृत रचनाकार के पुनर्प्रतिष्ठा,
स्वतन्त्रता-सङ्ग्राम आ मातृभाषा-जागरण,
कथा, गीत, गप्प, स्तम्भ आ पत्रकारिता के विधागत विवेचन,
नारी, गरीब, किसान, बेरोजगार युवक आ शोषित वर्ग के अनुभव,
स्वतन्त्रता के बाद के राजनीतिक विडम्बना,
सामाजिक संक्रमण, अस्तित्व-संकट आ नैतिक अवमूल्यन।
ई अर्थ में 'अखियासल' आलोचना खाली न, मैथिली साहित्य के अभिलेखीय पुनरुद्धार आ समान्तर इतिहास-लेखन के महत्त्वपूर्ण उपक्रम हय।
प्रस्तुत मूल्याङ्कन में तीन दृष्टि-प्रतिमान के एकसाथ प्रयोग कैल गेल हय — (क) भारतीय काव्यशास्त्रीय प्रतिमान (रस, ध्वनि, वक्रोक्ति, औचित्य, रीति, अलङ्कार, साधारणीकरण, लोकमङ्गल); (ख) पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त (ऐतिहासिकतावाद आ नव-ऐतिहासिकतावाद, मार्क्सवादी समाजशास्त्रीय समीक्षा, रूपवाद, नारीवादी विमर्श, उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श, अस्तित्ववादी-मनोविश्लेषणवादी दृष्टि, पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धान्त, विखण्डनवाद के हाशिया-पुनरुद्धार आ कैनन के राजनीति); आ (ग) विदेह समान्तर साहित्य-आन्दोलन के समान्तर इतिहास-प्रतिमान आ गङ्गेश उपाध्याय-मूलक नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसा, जे मुख्यधारा के कैनन-निर्माण के विरुद्ध लुप्तप्राय, हाशियाकृत आ अभिलेखहीन रचनाकार के पुनःस्थापना के अपन घोषित लक्ष्य मानै हय, आ जे नव्य-न्याय के 'हेत्वाभास' आ 'शब्द-प्रमाण' के उपयोग के साहित्य में निहित वैचारिक छल के अनावृत करै हय। ई तेसर प्रतिमान के दृष्टि से 'अखियासल' एक अग्रगामी पूर्व-रूप (प्रोटो-पाठ) हय — काहे कि रमानन्द झा जे काज १९७० से ८० दशक में व्यक्तिगत श्रम से कैलथिन, विदेह-आन्दोलन ओकरे संस्थागत, अभिलेखीय आ जनतान्त्रिक विस्तार दे हय।
ई समीक्षा के संरचना दू भाग में विभक्त हय। पूर्वार्ध में हरेक अध्याय के विशिष्ट गुण, उपलब्धि आ सैद्धान्तिक महत्त्व के विवेचन हय; उत्तरार्ध पूरा तरह से सीमा, दुर्बलता आ पद्धतिगत संकट के समर्पित हय।
आलोचनात्मक प्रतिमान
भारतीय साहित्यशास्त्रीय दृष्टि
रस — पोथी के विभिन्न अध्याय में करुण, वीर, हास्य, शृंगार, भक्ति आ रौद्र रस के विवेचन भेटै हय। 'रामेश्वर' के भूख आ पारिवारिक विघटन करुण रस पैदा करै हय; द्विजवर के राष्ट्रीय कविता वीर आ रौद्र रस जगावै हय; हरिमोहन झा के गप्प हास्य-व्यङ्ग्य के भूमि रचै हय; हरिलता के भजन भक्ति आ मधुर रस के धारा बहावै हय; आरसी आ मोहन के गीत शृंगार, प्रकृति आ भावमाधुर्य के अनुभव दे हय।
ध्वनि — अनेक रचना के प्रत्यक्ष कथा पाछाँ अप्रत्यक्ष सामाजिक अर्थ हय। भूख खाली भोजन के अभाव न, आर्थिक संरचना के अन्याय हय। विवाह खाली घरेलू संस्कार न, स्त्री के सामाजिक स्थिति आ जातिगत प्रतिष्ठा के क्षेत्र हय। भाषा खाली सम्प्रेषण के साधन न, सांस्कृतिक स्वाधीनता के प्रतीक हय।
वक्रोक्ति — यात्री के स्तम्भ, हरिमोहन झा के गप्प, श्यामानन्द झा के व्यङ्ग्य, ललित आ धीरेन्द्र के कथा आ आरसी के राजनीतिक कविता वक्र कथन, विडम्बना, व्यङ्ग्य आ प्रतीक के माध्यम से अपन अर्थ पैदा करै हय।
औचित्य — रमणजी बेर-बेर ई प्रश्न उठावै हथिन कि रचना के विषय, पात्र, भाषा, शैली, काल आ विधा के बीच औचित्य हय कि न। कथा के उपन्यास, गप्प के कथा, अनुवाद के मौलिक कृति वा प्रभाव के अनुवाद कहब उचित हय कि न — ई सब औचित्य के प्रश्न हय।
साधारणीकरण — एक व्यक्ति के भूख, बेरोजगारी, विवाह-दुःख वा सांस्कृतिक क्षोभ तब साहित्यिक मूल्य ग्रहण करै हय जब ओ पूरा समुदाय वा युग के अनुभव बन जाय हय। धीरेन्द्र के कथा-विवेचन में लेखक साफ करै हथिन कि वैयक्तिक अनुभव सामाजिक मन के अभिव्यक्ति बनला पर साहित्य सामाजिक सन्दर्भ ग्रहण करै हय।
लोकमङ्गल — अखियासल के आलोचना साहित्य के समाज से पृथक न मानै हय। मातृभाषा-सेवा, स्त्रीशिक्षा, जातिविरोध, श्रम के प्रतिष्ठा, गरीब के अधिकार आ राष्ट्रीय स्वाधीनता साहित्यिक मूल्याङ्कन के महत्त्वपूर्ण आधार बनै हय।
पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त के आधार
रूपवादी दृष्टि — कथानक, चरित्र-निर्माण, संवाद, वातावरण, कथा-गति, प्रतीक, पुनरावृत्ति, गीतात्मकता आ विधागत संरचना के परीक्षण रूपवादी दृष्टि से कैल जा सकै हय।
नव-इतिहासवादी दृष्टि — हरेक रचना के ओकर समय के सत्ता, संस्था, भाषा-राजनीति, स्वतन्त्रता-आन्दोलन, सामाजिक सुधार, सामन्तवाद आ आर्थिक परिवर्तन से जोड़के पढ़ल गेल हय।
मार्क्सवादी दृष्टि — भूख, निर्धनता, श्रम, सामन्ती शोषण, पुलिस-प्रशासन, पूँजी, चुनाव, बेरोजगारी आ वर्ग-विभाजन अनेक अध्याय के मूल प्रश्न हय।
नारीवादी दृष्टि — 'निर्दयी सासु', 'सुमति', 'चन्द्रग्रहण', हरिलता के भजन, कुमार गंगानन्द सिंह के कथा आ ललित के कथा-विवेचन स्त्री के शिक्षा, विवाह, देह, इच्छा, घरेलू श्रम, विधवापन आ सामाजिक नियन्त्रण के प्रश्न उठावै हय।
उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि — मैथिली पर हिन्दी आ अंग्रेजी के दबाव, मातृभाषा के उपेक्षा, देवनागरी के प्रसार के राजनीति, स्थानीय भाषा-साहित्य के अधिकार आ राष्ट्रीयता के भीतर भाषिक बहुलता — ई सब उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श के विषय हय।
अस्तित्ववादी आ मनोविश्लेषणवादी दृष्टि — ललित आ धीरेन्द्र के कथा-विवेचन में निरर्थकता, एकाकीपन, बेरोजगारी, दायित्व के असह्य भार, यौनिक इच्छा, आत्मपरायापन आ सामाजिक असंगति के विश्लेषण भेटै हय।
पाठक-प्रतिक्रिया दृष्टि — हरिमोहन झा के गप्प आ यात्री के स्तम्भ-लेखन के अध्याय पाठक-समुदाय, पत्रिका के संवादात्मकता, हास्य के लोकप्रियता आ पाठकीय रुचि के निर्माण पर ध्यान दे हय।
विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि आ नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसा
विदेह समान्तर इतिहास के मूल धारणा हय कि साहित्यिक इतिहास खाली राजकीय मान्यता, पुरस्कार, विश्वविद्यालय आ प्रसिद्ध लेखक के इतिहास न होय हय। ओ इतिहास में निम्न सब के समान अधिकार हय —
दुर्लभ पाण्डुलिपि,
अप्रसारित पोथी,
स्थानीय पत्र-पत्रिका,
ग्रामीण रचनाकार,
मातृभाषा-सेवी,
विस्मृत सम्पादक,
आर्थिक अभाव में लिखै कवि,
स्त्री-पात्र के मौन,
किसान आ मजदूर के पीड़ा,
भाषिक पराधीनता,
मिथिला आ प्रवास के सांस्कृतिक सम्बन्ध।
मैथिली साहित्य के इतिहास सदिखन एकगो वैचारिक संघर्ष के क्षेत्र रहल हय। एक ओर 'मुख्यधारा के परम्परा' हय, जे शास्त्रीय सन्तुलन, संस्थागत मान्यता, ब्राह्मणवादी आभिजात्य आ अतीत के परिमार्जित के प्रस्तुत करबा पर केन्द्रित रहल हय, त दोसर ओर 'विदेह समान्तर परम्परा' हय, जे जनमानस के धड़कै हृदय, शोषित-वञ्चित के प्रतिरोध आ यथार्थवादी चित्रण से जुड़ल हय। नव्य-न्याय के 'शब्द-प्रमाण' सिद्धान्त के अनुसार सत्य उहाँ खण्डित होय हय जहाँ प्रमाण के दबा देल जाय हय — जइसन दूषण पञ्जी के छुपायब; आ 'हेत्वाभास'-विवेचन से साहित्य में निहित तार्किक दोष आ वैचारिक छल अनावृत होय हय। 'अखियासल' के प्रधान उपलब्धि ई हय कि ओ मैथिली साहित्य के मुख्य सड़क के बगल में दबाओल अनेक पदचिह्न के फेर दृश्य बनावै हय।
पूर्वार्ध: अध्यायवार उपलब्धि आ आलोचनात्मक आस्वाद
१. मैथिली के पहिल कथाकार पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुर आ 'चन्द्रप्रभा'
संग्रह के प्रथम निबन्ध एक प्रकार से समस्त कृति के बीजाध्याय हय। ई अध्याय मैथिली कथा-साहित्य के आरम्भ-बिन्दु सम्बन्धी प्रचलित धारणा के संशोधित करै हय। रमानन्द झा इहाँ 'प्रथम' के अन्वेषण के आलोचनात्मक कर्म के रूप में प्रतिष्ठित करै हथिन — "कथा विकास के मार्ग पर सबसे पहिने कोन मैथिली सेवी अग्रसर भेलथिन, ओकर अनुसंधान।" ई घोषणा-वाक्य पूरा संग्रह के पद्धतिगत घोषणापत्र हय।
पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुर के जन्म १७५० ई॰ में खण्डवलाकुल में भेल हल; ओ सर्वसीमा निवासी पं॰ महेश्वर ठाकुर के पुत्र हलथिन आ हुनकर निधन १८२२ ई॰ में भेल। हुनकर ग्रन्थ सब में 'मिथिला तीर्थप्रकाश', 'नारी धर्मप्रकाश', 'शूद्र विवाह पद्धति', 'वैतरणीदानम्', 'शुद्ध निर्णय' आ 'शिवपूजा प्रदीपिका' प्रमुख हय। हुनका मैथिली के पहिल कथाकार आ 'चन्द्रप्रभा' के पहिल कथाकृति सिद्ध करे के हेतु समीक्षक वंशावली, तिथि, गुरु-शिष्य-परम्परा आ खण्डनात्मक प्रमाण — जयकान्त मिश्र के 'चन्द्रभागा' नामकरण के भ्रम-निवारण — सब के सहारा ले हथिन। 'चन्द्रभागा' के बदला 'चन्द्रप्रभा' नाम के ई शुद्धिकरण आलोचना के अभिलेखीय सावधानी देखाबै हय।
लेखक 'चन्द्रप्रभा' के उन्नैसम शताब्दी के मैथिली गद्य के नमूना आ आरम्भिक कथा-संग्रह के रूप में स्थापित करै हथिन। पाण्डुलिपि जीर्ण हल, कृति के किछुए अंश उपलब्ध रहल आ एकर प्रकाशन लेखक के निधन के बहुत वर्ष बाद सन् १९३९ में भेल। 'चन्द्रप्रभा' के संरचना गुरु-शिष्य संवाद आ एक कथा से दोसर कथा निकले के पद्धति पर आधारित हय; एमें गुरु-शिष्या संवाद के माध्यम से नीतिवचन के समर्थन कैल गेल हय, जे में प्राचीन गद्य-शैली के उत्कृष्ट निदर्शन भेटै हय। ई दृष्टि से एकर सम्बन्ध पञ्चतन्त्र, विद्यापति के 'पुरुष-परीक्षा' आ संस्कृत के आख्यान-उपाख्यान-परम्परा से जुड़ै हय — ई शुद्ध शास्त्रीय परम्परा-अन्विति के दृष्टि हय। कथा सब शिक्षाप्रद, घटनाप्रधान आ नैतिक निष्कर्षवाली हय।
भारतीय औचित्य-दृष्टि से एकर महत्त्व कथानक के जटिलता में न, आरम्भिक मैथिली गद्य के ऐतिहासिक भूमिका में हय। पाश्चात्य दृष्टि से ई उद्गम-अन्वेषण हय, जे ऐतिहासिकतावादी समीक्षा के केन्द्रीय प्रवृत्ति छी। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से ई अध्याय सबसे महत्त्वपूर्ण हय — काहे कि 'चन्द्रप्रभा' के "अनुपलब्धता" के समीक्षक खुद रेखाङ्कित करै हथिन, आ दुर्लभ पाण्डुलिपि, सम्पादक आ प्रकाशक के श्रम के साहित्यिक इतिहास के अंग बनावै हथिन। हाशियाकृत, अभिलेखहीन, लुप्त-पाठक पुनःस्थापना — इहे समान्तर इतिहास के मूल-मन्त्र हय, आ रमानन्द झा एकर पहिल घोष इहाँ करै हथिन।
२. मैथिली के प्रथम उपन्यासकार पं॰ जीवछ मिश्र आ 'रामेश्वर'
लेखक 'रामेश्वर' के सन् १९१६ में मिथिला प्रिंटिंग वर्क्स, मधुबनी से प्रकाशित मैथिली के प्रथम मौलिक उपन्यास मानै हथिन। पं॰ जीवछ मिश्र के जन्म १८६३ ई॰ में भेल हल; पिता के असामयिक निधन के कारणेँ हुनकर शिक्षा बाधित भेल, तबो ओ संस्कृत, मैथिली, हिन्दी आ उर्दू के गहन अध्ययन कैलथिन। हुनकर जीवन, साहित्यिक प्रेरणा आ मातृभाषा के प्रति प्रतिबद्धता के विस्तार से प्रस्तुत कैल गेल हय — हिन्दी-विस्तारवाद के विरुद्ध प्रतिरोध आ 'मैथिल महासभा' के वंशानुगत नेतृत्व के विरोध, ई सब असल में औपनिवेशिक-कालीन भाषिक अस्मिता-संघर्ष के जीवन्त दस्तावेज हय।
उपन्यास के केन्द्र में भूख, श्राद्ध के आडम्बर, ऋण, पुलिस-प्रशासन के अत्याचार, झूठ अभियोग, कारावास, पारिवारिक विघटन आ अपराध के सामाजिक उत्पत्ति हय। रामेश्वर अपन पिता के श्राद्ध के खातिर कर्ज ले हय, घर-घराड़ी बेचय पर विवश होय हय, आ अन्त में पुलिस के प्रताड़ना से क्षुब्ध होके डकैत बन जाय हय; ओकर पत्नी पार्वती कमला में कूदके आत्महत्या के प्रयास करै हय। रामेश्वर जन्मजात अपराधी न; आर्थिक विवशता, सामन्ती सत्ता आ प्रशासनिक छल हुनका अपराध के बाट पर धकेलै हय। मार्क्सवादी दृष्टि से रामेश्वर के अपराध वास्तव में वर्गीय शोषण के परिणाम हय। करुण रस के निर्माण उपन्यास के आरम्भिक दृश्य से होय हय — श्राद्ध के बाद फेकल भोजन पर कुकुर सब टूट पड़ै हय आ भूखल बालक दूर से देखै रहै हय। लेखक के अनुसार संवाद सरल आ स्वाभाविक हय आ वातावरण-निर्माण प्रभावकारी।
मार्क्सवादी-नवऐतिहासिकतावादी दृष्टि से ई निबन्ध कृति के सर्वश्रेष्ठ अध्याय-मध्ये एक हय। समीक्षक 'रामेश्वर' के खाली सौन्दर्यशास्त्रीय वस्तु न, बल्कि सत्ता-संरचना — राज दरभंगा, मैथिल महासभा, हिन्दी साहित्य परिषद — के विरुद्ध ठाढ़ भेल प्रतिरोधी पाठक रूप में व्याख्यायित करै हथिन। जीवछ मिश्र के निर्भीकता आ 'मठाधीश के षड्यन्त्र के भण्डाफोड़' — ई नव-ऐतिहासिकतावाद के शक्ति-प्रवचन-विश्लेषण से अद्भुत रूप में मेल खाय हय। विदेह समान्तर इतिहास के दृष्टि से 'रामेश्वर' राजदरबार के न, भूखल ग्रामीण परिवार के इतिहास लिखै हय — यथार्थवाद के ई विदारक प्रस्तुति मैथिली गद्य के स्वर्ण-शिखर हय।
३. रासबिहारी लाल दास आ उपन्यास 'सुमति'
'सुमति' (१९१८ ई॰) मैथिली में आधुनिक उपन्यास के विधा स्थापित करे के आरम्भिक प्रयास हय। लेखक रासबिहारी लाल दास के साहित्यिक अभाव-बोध, 'मिथिला दर्पण' से सम्बन्ध आ मातृभाषा में उपन्यास देवे के संकल्प के रेखाङ्कित करै हथिन। समाज में व्याप्त अपव्यय, दहेज आ प्रदर्शनकारी प्रवृत्ति के कारणेँ परिवार के कोना पतन होय हय, आ एक सुशिक्षिता नारी सुमति कोना अपन बुद्धि से खसै घर के सम्हारै हय, ई ई उपन्यास के मूल स्वर हय। सहेलोला बाबू आ मनोरथ लाभ के बीच सिद्धान्त-विवाह के प्रसङ्ग, कर्ज लेके बरियाती के स्वागत, आ अन्त में पूरा सम्पत्ति के विनाश के जे सजीव चित्रण हय, ओ सामाजिक यथार्थवाद के प्रखर उदाहरण हय। सुमति सासुर अबितहि अपन गहना बेचि परिवार के ऋणमुक्त करै हय आ समाज के खातिर एकगो आदर्श स्थापित करै हय।
अध्याय पूर्ववर्ती इतिहासकार के मत के भी समाहित करै हय। जयकान्त मिश्र कथानक-विन्यास, चरित्र-निर्माण आ कथन-कौशल के अपरिपक्व मानै हथिन, मुदा विषय के मैथिली उपन्यास खातिर उपयुक्त स्वीकारै हथिन; राधाकृष्ण चौधरी एकरा आधुनिक मैथिली उपन्यास-लेखन के पहिल सफल प्रयास कहै हथिन। ई निबन्ध के एकगो विशेष शक्ति अन्तर्पाठीयता के सूक्ष्म बोध में हय — 'सुमति'में हिन्दी कविता के प्रयोग के जीवछ मिश्र 'मैथिली भाषा आ कवि के अक्षमता के द्योतक' मानने रहथिन, आ रमानन्द झा ई समकालीन आलोचनात्मक संवाद के उद्घाटित करै हथिन। इहे आलोचना- के-आलोचना ई निबन्ध के सैद्धान्तिक गहराइ दे हय। भारतीय औचित्य-सिद्धान्त के दृष्टि से हिन्दी-पद्य के मैथिली-गद्य में प्रयोग भाषा-औचित्य-भङ्ग हय — रमानन्द झा ई दोष के 'शैलीजन्य शिथिलता' कहके स्वीकार करै हथिन, तबो सामाजिक जागरण के युग-स्वर के प्रधान मानके कृति के महत्त्वपूर्ण घोषित करै हथिन। ई मूल्याङ्कन-सन्तुलन — दोष-स्वीकृति साथे ऐतिहासिक-सामाजिक महत्त्व के रक्षा — समीक्षक के परिपक्वता के परिचायक हय।
औचित्य-दृष्टि से अध्याय ऐतिहासिक महत्त्व आ कलात्मक सिद्धि बीच भेद करै हय। कोनो कृति 'प्रथम' हो सकै हय, मुदा खाली प्रथम होय के कारण कलात्मक रूप से पूर्ण न बन जाय हय। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से 'सुमति' विधागत संक्रमण के दस्तावेज हय — नीति-आख्यान से आधुनिक सामाजिक उपन्यास तक बढ़ै मैथिली गद्य के अस्थिर, मुदा महत्त्वपूर्ण डेग।
४. जनार्दन झा 'जनसीदन' आ 'निर्दयी सासु'
ई अध्याय विवाह-व्यवस्था, घटक, कन्यापक्ष, सासु-पुतोहु सम्बन्ध आ घरेलू स्त्री-उत्पीड़न के कथा-विवेचन के केन्द्र में आनै हय। जनसीदन (१८७२–१९५१) के 'निर्दयी सासु' सन् १९१४ ई॰ में 'मिथिला मिहिर' में धारावाहिक रूप में प्रकाशित भेल; एकर कथावस्तु सामाजिक घटना पर आधारित हय आ चित्रण एतना स्वाभाविक हय कि घटना पाठक के सोझा घटै प्रतीत होय हय। एमें सासु अनूपरानी आ ननदि के अत्याचार सहै मूक नारी शारदा के कारुणिक चित्रण भेल हय, जे तत्कालीन समाज में स्त्री-शिक्षा के विरोध आ पितृसत्तात्मक क्रूरता के प्रमाणित करै हय। ज्योतिषी चिन्तामणि झा द्वारा शारदा के शिक्षित करब आ परिपाटी-विरोधी कन्यादान, आ अनूपरानी द्वारा ओकर विरोध — असल में प्राचीन आ नवीन जीवन-मूल्य के द्वन्द्व हय, जकरा समीक्षक 'प्रखर सामाजिक चेतना के प्रतिफल' कहै हथिन।
जनसीदन के 'शशिकला', 'कलियुगी संन्यासी' आदि के विवेचन में समीक्षक विधा-विवाद के — हरिमोहन झा 'निर्दयी सासु' के 'प्रहसन' कहलथिन, आन 'उपन्यास' — सुन्दर ढंगेँ प्रस्तुत करै हथिन। मुख्य उपलब्धि ई जे रमानन्द झा जनसीदन के व्यक्तित्व के प्रखरता-सम्बन्धी अपन प्रारम्भिक सन्देह के उपलब्ध साहित्य के विश्लेषण से खुद संशोधित करै हथिन — सामाजिक-सुधारवादी चेतना के आलोक में व्यक्तित्व प्रखर भेटै छनि। ई आत्म-संशोधनकारी आलोचना-पद्धति कृति के बौद्धिक ईमानदारी के प्रमाण हय।
नारीवादी दृष्टि से कथा घरेलू सत्ता के जटिल रूप उद्घाटित करै हय। स्त्री खाली पुरुषद्वारा न, पितृसत्तात्मक संस्कार ग्रहण कइले दोसर स्त्रीद्वारा भी प्रताड़ित होय हय; सासु खुद व्यवस्था के उत्पाद रहितो पुतोहु पर व्यवस्था के प्रतिनिधि बन जाय हथिन। करुण रस के स्रोत नवविवाहिता के असहायता हय। ध्वनि-सिद्धान्त से देखे पर विवाह के उत्सव के पाछाँ कन्या के आर्थिक मूल्याङ्कन, परिवार के प्रतिष्ठा आ पितृसत्तात्मक नियन्त्रण के कठोर इतिहास सुनाय हय। मार्क्सवादी दृष्टि से 'मिथिला के समाज के कोला-कोला में बाँटके शोषण करै' व्यवस्था के विरुद्ध शंखनाद के रूप में एकर पाठ वर्ग-चेतना आ सामाजिक अन्तर्विरोध के साहित्यिक अभिव्यक्ति के उत्तम उदाहरण हय।
५. पं॰ जनार्दन झा — एक बिसरल साहित्यसेवी
ई लघु मुदा सैद्धान्तिक दृष्टि से सबसे बेसी महत्त्वपूर्ण निबन्ध में रमानन्द झा अपन समस्त आलोचनात्मक परियोजना के सैद्धान्तिक आधार प्रस्तुत करै हथिन — 'दू कोटि के साहित्यकार' के सिद्धान्त। पहिल कोटि के (विद्यापति जइसन) रचनाकार एतना व्यापक होय हथिन कि दोसर कोटि के रचनाकार के आच्छादित कर दे हथिन, आ कालान्तर में लोक हुनका बिसर जाय हय। गङ्गा-कोशी के विशाल जल आ गाम-गाम के जोड़निहार छोट धार के स्थानीय महत्त्व के रूपक ई सिद्धान्त के अविस्मरणीय बनावै हय — इतिहास के वास्तविक नदी में खाली विशाल प्रवाह न, छोट-छोट धार भी जल दे हय, आ पं॰ जनार्दन झा ओ अदृश्य धारा के प्रतिनिधि हथिन।
लेखक के तर्क हय कि साहित्य के मुख्य धारा खाली प्रसिद्ध लेखक से न, अनेक स्थानीय आ 'दोसरा पाँति' के साहित्यसेवी के निरन्तर श्रम से बनै हय। पं॰ जनार्दन झा के रचना दुर्लभ भेला कारण हुनकर नाम इतिहास से लगभग लुप्त हो गेल। 'जानकी परिणय' जइसन खण्डकाव्य में अकाल, जनकपुर, सीताजन्म, धनुषभङ्ग आ विवाह-संस्कार के चित्रण हय; भाषिक सरलता, मौलिकता आ सांस्कृतिक विवरण एकरा साहित्येतिहास के उपयोगी सामग्री बनावै हय।
ई सिद्धान्त पाश्चात्य कैनन-निर्माण आ साहित्यिक-आर्थिकी के सिद्धान्त से आश्चर्यजनक रूप में साम्य रखै हय। रमानन्द झा जे कहै हथिन — प्रकाशन के अभाव, अनियतकालीन पत्रिका आ सर्वसुलभता के अभाव बहुतो रचनाकार के प्रकाश से वञ्चित कर देलक — ई विदेह समान्तर इतिहास-प्रतिमान के केन्द्रीय अभिकल्पना हय। सत्य कहल जाय त ई पूरा निबन्ध विदेह-आन्दोलन के पूर्व-घोषणापत्र हय।
६. पं॰ त्रिलोचन झा, बेतिया — बिसरल मातृभाषानुरागी
त्रिलोचन झा (१८७८–१९३८ ई॰) अनुवादक, कवि, कथाकार-आख्यानलेखक, जीवनीकार, निबन्धकार, सामाजिक कार्यकर्ता आ संस्थापक व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत हथिन। हुनका में अपूर्व संगठन-शक्ति हल; 'सुबोधिनी सभा' आ मैथिली-आन्दोलन के संगठनात्मक इतिहास के ई निबन्ध उद्घाटित करै हय। ओ मातृभूमि-वन्दना आ अतीत-गान के माध्यम से सुप्त मैथिल समाज के जगावे चाहलथिन — "चण्डि तोहर मिथीला देश" जइसन हुनकर पङ्क्ति सब जनमानस में ऊर्जा के सञ्चार कैलक। ओ 'श्रीमद्भगवद्गीतादर्श' नाम से गीता के मैथिली पद्यानुवाद भी कैलथिन, जे हुनकर प्रखर गवेषणात्मक दृष्टि के परिचायक हय।
हुनकर लेख विभिन्न पत्र-पत्रिका में बिखरल रहने समग्र मूल्याङ्कन कठिन भेल — 'बड़ कम सामग्री उपलब्ध हय', ई समीक्षक खुद बेर-बेर स्वीकार करै हथिन — मुदा उपलब्ध सामग्री मातृभाषा आ साहित्य के प्रति गाढ़ अनुराग प्रमाणित करै हय। हुनकर दृष्टि में भाषा आ साहित्य समाज के प्रगति के आधार हल। ओ मैथिल समाज के आलस्य, आत्मकेन्द्रितता आ सांस्कृतिक उदासीनता के ललकारै हलथिन आ मिथिला के प्रतिष्ठा फेर प्राप्त करे के सामूहिक दायित्व के बोध करावै हलथिन। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि से मातृभाषा-सेवा राजनीतिक स्वाधीनता के विस्तार हय — भाषा-विहीन स्वराज अधूरा स्वराज हय। इहाँ सामग्री के अभाव के स्वीकृति में समान्तर इतिहास-लेखन के मूल संकट — अभिलेख-दारिद्र्य — प्रत्यक्ष होय हय।
७. राष्ट्रीय चेतना के पुरोधा कवि यदुनाथ झा 'यदुवर'
यदुवर (१८८८–१९३५ ई॰) 'मिथिला गीताञ्जलि' (१९२३) के माध्यम से राष्ट्रीय स्वाधीनता-संग्राम के चेतना के मैथिली काव्य में स्थापित कैलथिन। हुनकर कविता मिथिला, मैथिली आ भारतीय राष्ट्रीयता के संयुक्त स्वर हय। ओ पुरान परम्परा के तोड़ि राष्ट्रीय कार्य के सूत्रपात कैलथिन आ संगीत के रागपाश से मैथिली कविता के सबसे पहिने मुक्त कैलथिन। हुनकर 'मैथिली साहित्य दिग्दर्शन' मैथिली के प्रथम अनुसन्धानपरक निबन्ध मानल जाय हय, जे में ओ साहित्य के समग्र लेखा-जोखा प्रस्तुत कैलथिन हय।
यदुवर के 'राष्ट्रीय चेतना के पुरोधा' घोषित करै रमानन्द झा एक विशिष्ट स्थापना करै हथिन — 'कवीश्वर चन्दा झा से चलल देश-काल से जुड़बा के प्रवृत्ति पर से धार्मिक लेप पोछि राष्ट्रीय आ देशोत्थान-विषय के रचना के सुदृढ़ परिपाटी यदुवर के रचना से प्रारम्भ भेल।' 'धार्मिक लेप पोछब' — ई पदावली साहित्यिक प्रवृत्ति के धर्मनिरपेक्षीकरण के सूक्ष्म ऐतिहासिक बोध के प्रकट करै हय आ नव-ऐतिहासिकतावादी प्रवृत्ति-रेखाङ्कन के उत्तम नमूना हय।
ओ शिक्षित मैथिल समाज के मातृभाषा-विमुखता, आलस्य आ बाह्य भाषिक प्रभुत्व के विरुद्ध जागरण के आह्वान करै हथिन। हुनकर काव्य के वीर रस युद्धक्षेत्र के खाली न, भाषिक-सांस्कृतिक संघर्ष के वीर रस हय। मातृभाषा में लिखब, साहित्य प्रकाशित करब आ मैथिल समाज के जगायब हुनका खातिर राष्ट्रसेवा हल। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि से यदुवर भाषा के हीनताबोध के औपनिवेशिक मानसिकता के परिणाम मानै हथिन। विदेह समान्तर इतिहास में हुनकर कविता राजनीतिक आन्दोलन के समानान्तर चलै भाषिक स्वाधीनता-आन्दोलन के दस्तावेज बनै हय।
८. कवि-सेनानी छेदी झा 'द्विजवर'
अध्याय — मैथिली साहित्यकार सब राष्ट्रीय चेतना से पृथक हलथिन — ई सामान्य आरोप के खण्डन करै हय। द्विजवर के जन्म १८९३ ई॰ में सहरसा के वनगाँव में भेल हल। ओ खाली राष्ट्रीय कविता लिखनिहार न, गान्धीजी के आह्वान पर सरकारी सेवा छोड़के स्वतन्त्रता-सङ्ग्राम में सक्रिय भाग लेनिहार कवि-सेनानी हलथिन आ चारि बेर जेल गेलथिन। यदुवर आ द्विजवर के तुलना करै समीक्षक एक सूक्ष्म भेद स्थापित करै हथिन — यदुवर सरकारी सेव के रहे के कारणेँ खाली साहित्यिक स्तर पर सक्रिय, जब कि द्विजवर सरकारी सेवा के त्यागि राजनीति आ साहित्य दुनो स्तर पर सक्रिय। 'एके व्यक्ति में सर्जनात्मक प्रतिभा आ आन्दोलनात्मक क्षमता के संगम' के 'बिरल घटना' कहब — ई मूल्याङ्कन साहित्य आ कर्म के अद्वैत के प्रतिष्ठित करै हय, जे प्रतिबद्ध-साहित्य के अवधारणा से मेल खाय हय।
स्वदेशी, चरखा, आर्थिक स्वतन्त्रता आ ग्रामजीवन हुनकर राष्ट्रीयता के आधार हय — 'चरखा चौमासा' जइसन कविता में स्वदेशी आन्दोलन के गूँज साफ सुनल जा सकै हय। राष्ट्र हुनका खातिर अमूर्त सत्ता न, गाम-घर, नदी, खेत, मनुष्य आ प्रकृति के संयुक्त जीवन हय। हुनकर रचना 'छूतहर' समाज के अस्पृश्यता आ सामन्ती क्रूरता के विरुद्ध प्रहार हय — "अस्पृश्य भेलहुँ कै कोन पाप? मृतिका एक एके कुम्हार" — ई पङ्क्ति सामाजिक विषमता पर प्रखर प्रहार करै हय आ हुनकर कविता में वञ्चित वर्ग के स्वर साफ हय। वीर रस के संग करुण आ रौद्र रस के मेल हुनकर कविता के प्रचार-पद से ऊपर उठावै हय। विदेह समान्तर इतिहास में द्विजवर साहित्य आ राजनीतिक कर्म के मध्य के कृत्रिम विभाजन तोड़ै हथिन।
९. कुमार गंगानन्द सिंह के कथा-संवेदना
कुमार गंगानन्द सिंह के कथा-यात्रा दीर्घ काल (१९२४–१९६५) तक पसरल हय। 'मनुष्य के मोल', 'विवाह', 'बिहाड़ि', 'पण्डितपुत्र', 'पञ्च परमेश्वर', 'आम के गाछी' आदि कथा में सामाजिक सुधार, विवाह-कुरीति, अस्पृश्यता, शिक्षा आ ग्रामजीवन के समस्या उठाओल गेल हय। 'मनुष्य के मोल'में एक बाल-विधवा के आत्महत्या के कारुणिक यथार्थ हय; 'बिहाड़ि'में अछूतोद्धार के चेतना हय, जहाँ शोषित वर्ग बाबू-भैया के बेगारी करबा से मना के हड़ताल करै हय। लेखक हुनकर कथा-विधि के महत्त्व ई बात में देखै हथिन कि ओ पुराण वा धर्मग्रन्थ से कथावस्तु न ले, अपन समकालीन समाज से ले हथिन — उपाख्यान के उपदेशात्मक परम्परा से हटि समाज के जीवित विकृति पर प्रहार करब हुनकर उपलब्धि हय।
ई निबन्ध में रमानन्द झा 'अनुभूति-अभिव्यक्ति-सत्य-सम्प्रेषण' के शृङ्खला स्थापित करै हथिन — 'अनुभूति के अभिव्यक्ति में सत्य के सम्प्रेषण रहै हय, सत्य के सम्प्रेषण में जीवन आ परिवेश के यथार्थ व्यञ्जित रहै हय।' ई 'व्यञ्जना'-पद प्रत्यक्षतः आनन्दवर्धन के ध्वनि-सिद्धान्त के स्मरण करावै हय — साहित्य के सार्थकता वाच्यार्थ में न, व्यङ्ग्यार्थ में हय। साथे 'काल-प्रवाह में प्रमाणित होएब' के कसौटी कालातीत-मूल्य के अवधारणा से मेल खाय हय। 'मनुष्य के मोल' आ 'विवाह' के कर्तृत्व-विवाद (जयकान्त मिश्र आ श्रीश एकरा 'भोल' के रचना मानने रहथिन) के समाधान करै रमानन्द झा भाषा-प्रयोग के समाजशास्त्रीय पाठ प्रस्तुत करै हथिन — 'बिहाड़ि' कथा में रौदी-कामाति के हिन्दी-मिश्रित बोली 'अशिक्षित पर आन भाषा के प्रभाव' के व्यञ्जित करै हय। ई भाषिक-यथार्थवाद के सूक्ष्म आलोचनात्मक बोध हय।
स्त्री-पात्र, बालविवाह, विधवापन आ घरेलू उत्पीड़न के चित्रण करुण रस पैदा करै हय। कथा-भाषा सरल, लोकानुकूल आ विनोदपूर्ण हय। 'आम के गाछी' जइसन छोट कथा में अनावश्यक विस्तार के अभाव आ रहस्यपूर्ण अन्त आधुनिक कथा के निकट ले हय।
१०. कवीश्वरी हरिलता के वैष्णवता
ई निबन्ध के विशिष्टता ई जे रमानन्द झा एक स्त्री-रचनाकार — कवीश्वरी हरिलता (मोदवती, जन्म १९०३ ई॰) — क साहित्य-साधना के प्रकाश में आनै हथिन, जे विदेह समान्तर इतिहास के लैङ्गिक पुनरुद्धार के अग्रगामी संकेत हय। हरिलता के जीवन-वृत्त — खाली चारि वर्ष के अवस्था में विवाह, अल्पवय में वैधव्य आ पति के विक्षिप्तता, 'स्त्रीगण खातिर पढ़ब निषिद्ध हल' तबो 'सासु आदि से चोरा के अक्षर सीखब' — ई सब नारी-अस्मिता के संघर्ष-गाथा हय।
हुनकर 'भजनमालिका' (१९३७ ई॰) वैष्णव सगुण भक्ति के उत्कृष्ट निदर्शन हय। भक्ति-काव्यशास्त्रीय दृष्टि से रमानन्द झा हरिलता के 'निराकार के अप्राप्त मानके सगुण-आराधना' के वैष्णव-परम्परा के अनुरूप सिद्ध करै हथिन — पलना में झूलै, अँगना में ठुमुकै, वृन्दावन में गाय चरावै सगुण-कृष्ण के चित्रण 'श्रुति-मधुरता आ रस-प्रचुरता' से युक्त। हुनकर गीत में भक्ति के छओ अंग — आनुकूल्य-संकल्प, प्रातिकूल्य-वर्जन, रक्षण-विश्वास, गोप्तृत्व-वरण, आत्मनिक्षेप, कार्पण्य — आ माधुर्य रस प्रवाहित हय। बाल-वैधव्य के असह्य पीड़ा के ओ कृष्ण-भक्ति के मधुर रस में रूपान्तरित के देलथिन। ई भक्ति-रस आ वात्सल्य-रस के शास्त्रीय विवेचन हय।
११. कविवर श्यामानन्द झा के काव्य-वस्तु
लेखक श्यामानन्द झा के काव्य के राष्ट्रीय, सामाजिक, सांस्कृतिक आ व्यावहारिक चारि वर्ग में पढ़ै हथिन आ 'युग-सचेत कवि' के अवधारणा प्रस्तुत करै हथिन। कवि के आक्रोश व्यक्तिगत न, तत्कालीन राजनीतिक पराधीनता, आर्थिक असमानता, भाषिक अपमान आ सामाजिक उदासीनता से उत्पन्न हय — 'जरि जाय जेँ जजाते करिते पटाय की हो' जइसन आक्रोश के पाछाँ तात्कालिक परिवेश के कारुणिक स्थिति हय। गान्धी-युगीन राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक पतन के विरुद्ध सामन्ती वर्ग के उदासीनता — 'कोउ नृप होहिं ह में का हानी' — क तीक्ष्ण व्यङ्ग्यात्मक चित्रण भेटै हय।
हुनकर कविता भारतीय स्वाधीनता, मैथिली के रक्षा, आर्थिक समानता, सामाजिक जागरण आ सांस्कृतिक पुनरुत्थान के आह्वान करै हय। ओ अंग्रेजी आ हिन्दी के अन्धभक्त उच्च वर्ग पर व्यङ्ग्य करै आ लिखै हथिन कि लोक अपन भूषण-वसन के छोड़के विद्यापति के नाम से कान छिपावै हय आ "टोप ओ नेकटाय"पर लोट-पोट रहै हय — ई सांस्कृतिक दासता के विरुद्ध उद्घोष हय। 'देश सेवा हित छदामो बाहर होएब दुर्लभ ... सोम होथिन छदाम लय' — ई विदग्ध व्यङ्ग्य कुन्तक के वक्रोक्ति-सिद्धान्त के वाक्य-वक्रता के प्रमाण हय। रस-दृष्टि से एमें करुण आ वीर के संग सामन्ती वृत्ति के प्रति बीभत्स-भाव के सामञ्जस्य हय; मार्क्सवादी दृष्टि से ई पूँजी-केन्द्रीकरण आ वर्ग-विषमता के प्रत्यक्ष साहित्यिक आलोचना हय। गरीबी, वस्त्र, भोजन, आवास आ पारिवारिक भार के वर्णन हुनकर सामाजिक दृष्टि के प्रमाण हय।
हुनकर 'मैथिल सन्देश' आ 'मैथिली गीत-चन्द्रिका'में राष्ट्रप्रेम आ लोक-संस्कृति के समन्वय हय। व्यावहारिक गीत में सोहर, नामकरण, उपनयन, विवाह, कोबर, समदाउन आ आन संस्कार के समावेश लोकजीवन के काव्यात्मक अभिलेख रचै हय। शृंगार, हास्य, भक्ति आ लोकरीति के समन्वय हुनकर काव्य-वस्तु के व्यापक बनावै हय।
१२. बाबू लक्ष्मीपति सिंह आ मैथिली पत्रकारिता
ई निबन्ध में रमानन्द झा साहित्य-समीक्षा के सीमा लाँघि पत्रकारिता-इतिहास के क्षेत्र में प्रवेश करै हथिन। लक्ष्मीपति सिंह (१९०७–१९७२) के लेखक साहित्यकार, सम्पादक, प्रकाशक, संस्कृतिकर्मी आ मैथिली पत्रकारिता के संस्थापक-पुरुष के रूप में देखै हथिन — 'एक विधा में बान्हल न, एक भाषा में न'। पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुर के शिष्यत्व से प्राप्त साहित्य-सर्जना के मन्त्र के ओ जीवनभरि मातृभाषा-सेवा में लगौलनि आ प्रवासी-मैथिल के मिथिला से जोड़े के आजीवन प्रयास कैलथिन।
हुनकर योगदान खाली अपन लेखन तक सीमित न। दुर्लभ रचना के सम्पादन, प्रकाशन, लेखक के प्रोत्साहन आ पत्रिका के माध्यम से पाठक-समुदाय के निर्माण मैथिली सार्वजनिक क्षेत्र के विकास के आधार बनल। ओ मैथिली पत्रकारिता के राजनीतिक आ आर्थिक दासता से मुक्त कर आत्मनिर्भर बनावे के वकालत कैलथिन आ साफ कैलथिन जे मैथिली के पत्र-पत्रिका खाली साहित्यिक एकाधिकार न, बल्कि समाचार आ जन-सरोकार के माध्यम होय के चाही। निबन्ध के अन्तिम अंश मैथिली समाचार-पत्र के भविष्य-सम्बन्धी दूरदर्शी विश्लेषण हय — विज्ञापन, संवाददाता-प्रतिनिधित्व, सम्पादकीय नीति आ पाठक-आधार के अभाव में मैथिलहु के आन भाषा के पत्र पर निर्भर रहे के विवशता। ई मीडिया-समाजशास्त्रीय अन्तर्दृष्टि अपन युग से आगाँ हय।
पाठक-प्रतिक्रिया दृष्टि से पत्रकारिता लेखक आ पाठक के बीच जीवित संवाद स्थापित करै हय। विदेह समान्तर इतिहास में सम्पादक साहित्य के पार्श्व-पात्र न, स्मृति आ पाठकत्व के निर्माता हथिन।
१३. कविचूड़ामणि मधुप के गीत-साहित्य
काशीकान्त मिश्र 'मधुप' के गीति-साहित्य के विवेचन ई संग्रह के सबसे बेसी रसशास्त्रीय निबन्ध हय। 'गीत भावाश्रित होय हय, हृदय पर ओकर प्रभाव तत्काल पड़ै हय, रागात्मिका वृत्ति के तार झनझना उठै हय' — ई विवेचन प्रत्यक्षतः भरतमुनि के रस-निष्पत्ति आ अभिनवगुप्त के रस-चर्वणा के मैथिली पुनराख्यान हय; 'नादब्रह्म के जगावै' गीत-साधना के अवधारणा भारतीय संगीत-दर्शन के नादब्रह्म-सिद्धान्त से जुड़ै हय। मधुप के 'घसल अठन्नी सोना के घसि के हीरा' बनौनिहार आ 'विद्यापति ओ मीरा' के स्वर में बजनिहार कहके (मणिपद्म के शब्द में) रमानन्द झा गीति-परम्परा के शीर्ष-स्थान दे हथिन।
मधुप के गीत-संसार में शृंगार, भक्ति, गृहस्थजीवन, नारी-आदर्श, सामाजिक शिक्षा आ सांस्कृतिक संस्कार के मेल हय। गीत खाली पढ़े के वस्तु न, कण्ठस्थ करे के, गावे के आ सामुदायिक रूप से अनुभव करे के रचना हय — 'लोक-जीवन में गीत के अत्याज्यता' (आँगन, दलान, खेत, खरिहान, कोबर, सिमरिया-घाट) के ई मूल्याङ्कन भट्टनायक के साधारणीकरण-सिद्धान्त के उत्तम प्रयोग हय। जब मैथिल युवा वर्ग सिनेमा के गीत के धुन पर पागल हल, तब मधुपजी मैथिली भाषा के विलुप्त होएबा से बचावे के खातिर सिनेमा के तर्ज पर मैथिली गीत लिखलथिन — विदेह समान्तर इतिहास के दृष्टि से ई जनभाषा के जीवित रखे के एकगो लोकतन्त्रवादी, जमीनी प्रयास हल। 'वट-सावित्री' जइसन पावनि के कथा के ओ गीत के रूप देलथिन जे से नीरसता समाप्त भेल, स्त्री आ बालक तक कथा पहुँचल आ लोक-कण्ठ में मैथिली स्थापित भेल — ई गीत के सामाजिक प्रयोगशीलता देखाबै हय।
रस-दृष्टि से मधुप के गीत में भक्ति, विप्रलम्भ शृंगार आ करुणा के समन्वय हय। ध्वनि-दृष्टि से गृहस्थ आदर्श के भीतर स्त्री के सामाजिक भूमिका, परिवार के नैतिक अनुशासन आ लोकपरम्परा के संरक्षण निहित हय।
१४. भट्टीकाव्य के परम्परा आ मधुपजी
ई निबन्ध कृति के सबसे साहसी सैद्धान्तिक अध्याय हय आ संस्कृत के शिक्षाप्रद काव्यपरम्परा आ मैथिली काव्य के अन्तर्सम्बन्ध के खोज करै हय। भट्टीकाव्य में कथा खाली रसास्वाद खातिर न, व्याकरण, अलङ्कार, छन्द आ भाषाज्ञान के शिक्षण खातिर भी प्रयुक्त हय; मधुपजी के काव्य में ई शिक्षणपरक परम्परा के आधुनिक मैथिली रूप देखल गेल हय। भारतीय काव्यशास्त्र के दृष्टि से ज्ञान आ आनन्द के एकता ई अध्याय के प्रमुख सूत्र हय — काव्य नितान्त उपदेश होय त रसहीन होके जाय; नितान्त मनोरञ्जन होय त शैक्षिक प्रयोजन लुप्त होके जाय। मधुप के उपलब्धि ई द्वन्द्व में समन्वय स्थापित करब हय।
'कोबर-गीत' के रचना के आधार बनाके रमानन्द झा एक निर्भीक प्रश्न उठावै हथिन — 'कविता काहे खातिर लिखल जाय हय?' आ साफ उत्तर दे हथिन — 'यश' आ 'अर्थ'; कोनो कवि ई दुनो शर्त के सीमा से बाहर न। ई घोषणा साहित्य के शुद्धतावादी आदर्शवाद के चुनौती दे ओकर भौतिक-आर्थिक आधार के उद्घाटित करै हय — जे स्पष्टतः मार्क्सवादी साहित्य-समाजशास्त्र के अन्तर्दृष्टि हय। प्रसङ्ग ई जे विद्यालय के अनुदान बचावे के विवशता में — कुमार गंगानन्द सिंह आ राजपण्डित बलदेव मिश्र के दबाव में — मधुपजी के महाराज कामेश्वर सिंह के 'कोबर गीत' लिखय पड़लथिन। 'कोबर-गीत' के 'युगीन विवशता के द्योतक' कहके रमानन्द झा एक जटिल नैतिक-सौन्दर्यशास्त्रीय प्रश्न के सामना करै हथिन — कवि अपन आत्मा के प्रतिकूल काहे लिखै हथिन? ओ स्वीकार करै हथिन कि मधुप के 'कवित्व-शक्ति एतना प्रखर हल जे अनिश्चित विषयो पर भी दिव्य-मार्मिकता आबि जाय हल।' ई प्रयोजन आ प्रतिभा के द्वन्द्व के ईमानदार विवेचन हय। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से ई अध्याय संस्कृत आ मैथिली के स्वामी-दास सम्बन्ध में न, संवादशील परम्परा में रखै हय।
१५. काञ्चीनाथ झा 'किरण' के कथा-जगत
किरण (१९०६–१९८९) के रमानन्द झा तृतीय दशक के संक्रान्ति-काल के प्रतिनिधि कथाकार मानै हथिन — विद्यापतीय कल्पनालो के से हटि 'देसिल वयना' के यथार्थ ओर उन्मुख। हुनकर कथा-जगत ('चन्द्रग्रहण', 'धर्मरत्नाकर', 'समाज के चित्र') सामाजिक विषमता, जाति, श्रम, धर्मान्धता, सत्ता, स्त्री आ मनुष्य के नैतिक सङ्घर्ष के कथा-जगत हय। लेखक हुनकर रचना में समाज के अँधार परत के भेदयवला आलोचनात्मक प्रकाश देखै हथिन। 'चन्द्रग्रहण'में प्राकृतिक घटना पर अन्धविश्वास के आड़ में होय व्यभिचार आ ठगी उजागर हय; 'धर्मरत्नाकर'में राम किसन जइसन शोषित रैयत के हाहाकार आ धर्मरत्नाकर बाबू साहेब के पाखण्ड बेनकाब कैल गेल हय।
'जाड़ के पाला में ठिठुरै नाङट नेना', 'लाज झँपबा खातिर व्याकुल तरुणी', 'स्कूल के फीस खातिर दौड़ करै देश के भविष्य' — ई सब बिम्ब यथार्थवादी करुण-रस के तीव्र सम्प्रेषण हय। पाठक-प्रतिक्रिया-सिद्धान्त के दृष्टि से किरण के कथा के विस्फोट-क्षण — 'कल्पना के मचकी पर आस लगै काल यथार्थ से सरोकार छूटि जाएब' — के रमानन्द झा जे सूक्ष्मता से पकड़ै हथिन, ओ रूपवादी अपरिचितीकरण के बोध के परिचायक हय।
मार्क्सवादी दृष्टि से किरण सुविधा-सम्पन्न वर्ग आ श्रमजीवी वर्ग के अन्तर उजागर करै हथिन; दलित दृष्टि से सामाजिक प्रतिष्ठा के ब्राह्मणवादी निर्धारण प्रश्नाङ्कित होय हय; नारीवादी दृष्टि से स्त्री के जीवन खाली गृहस्थ आदर्श के उदाहरण न, स्वतन्त्र सामाजिक अनुभव के क्षेत्र बनै हय। किरण के कथा लोकमङ्गलवादी हय, मुदा उपदेश खाली न — पात्र के अन्तर्विरोध, विडम्बना आ सामाजिक असंगति कथा के जीवित बनावै हय। विदेह समान्तर इतिहास में किरण मिथिला के गौरवगान के बदला मिथिला के भीतर के विषमता देखाबै हथिन।
१६. मैथिली उपन्यास के आलोक में 'चन्द्रग्रहण' के नारी-पात्र
ई निबन्ध कृति के सबसे बेसी आधुनिक-आलोचनात्मक अध्याय हय आ मैथिली उपन्यास में स्त्री-पात्र के परिवर्तनशील रूपक अध्ययन करै हय। किरण के 'चन्द्रग्रहण' (१९३२) के रजनी आ सुषमा से लेके 'रूपा' (१९८८) तक नारी-पात्र के विकास-रेखा के रमानन्द झा समाज-सुधार-आन्दोलन के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जोड़के विश्लेषित करै हथिन — 'जइसन-जइसन परिवेश में सुधारात्मक-आन्दोलनात्मक चेतना प्रखर होय गेल, उपन्यास के चरित्र-निर्माण में ओकर प्रभाव पड़ै रहल।' ई साहित्य आ समाज के द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध के उत्कृष्ट नव-ऐतिहासिकतावादी पाठ हय।
सामाजिक सुधार-आन्दोलन, शिक्षा आ आधुनिक चेतना के प्रभाव से 'चन्द्रग्रहण' के नारी-पात्र पारम्परिक मौनता छोड़के नूतन व्यक्तित्व ग्रहण करै हय। नारी के अन्तःकामना, प्रेम, विरह, देहबोध, निर्णय आ सामाजिक दायित्व कथा के सक्रिय अंग बनै हय; वातावरण आ नायिका के अन्तःस्थिति के समान्तर विन्यास मनोवैज्ञानिक गहराई पैदा करै हय। नारीवादी समीक्षा के दृष्टि से ई निबन्ध कृति के सबसे बेसी अग्रगामी हय — काहे कि रमानन्द झा पण्डित-वर्ग के ओ पाखण्ड के उघारै हथिन जकर 'समस्त उपदेश अनके खातिर' होय हय, आ जे मेला-ठेला में अपहृत नारी के भी शिक्षा से वञ्चित रखै हय। 'रचनाकार के व्यक्तित्व के आक्रामकता' के चरित्र-निर्माण में देखब — ई अभिव्यञ्जनावादी आलोचना हय। स्त्री के खाली त्यागमूर्ति वा कुलरक्षिका न, इच्छाशील आ विचारशील मनुष्य के रूप में देखे के ई प्रयास महत्त्वपूर्ण हय।
१७. प्रो॰ हरिमोहन झा आ हुनकर 'चर्चरी'
मैथिली के सबसे बेसी लोकप्रिय हास्य-व्यङ्ग्यकार हरिमोहन झा (१९०८–१९८४) के 'चर्चरी' एक विधा के पोथी न — ई संग्रह में कथा, एकाङ्की, छायारूपक, पत्र, दलान के गप्प, पोखरि के गप्प, प्रहसन आ सांस्कृतिक निबन्ध सम्मिलित हय। 'चर्चरी' के ई विविध-विधात्मक स्वरूप के व्यञ्जन-सम्मिलित 'चर्चरी' (भोज्य-पदार्थ) के रूपक से उद्घाटित करब — ई नामकरण-मूलक विश्लेषण चतुर हय। लेखक एकरा पारम्परिक कथा वा निबन्ध न, स्वतन्त्र गप्प-विधा के रूप में पहचानै हथिन — हुनकर रचना-संसार ('चर्चरी', 'खट्टर कका के तरंग', 'प्रणम्य देवता') मैथिली में गप्प-विधा के प्रवर्तन कैलक। हास्य-व्यङ्ग्य आ वक्रोक्ति के माध्यम से ओ थोथा पाण्डित्य, रूढ़िवाद आ सामाजिक पाखण्ड पर प्रहार कैलथिन। हुनकर 'पाँच पत्र' जइसन रचना रस-सिद्धान्त के दृष्टि से करुण रस के उत्कृष्ट निदर्शन हय, जे पति-पत्नी के बदलै रागात्मक सम्बन्ध आ युग-बोध के मार्मिक रूप में प्रस्तुत करै हय; 'रेल के झगड़ा' जइसन प्रहसन में आधुनिक शिक्षा के वायु से सिहकल परिवार के हास्यपूर्ण चित्रण हय।
हरिमोहन झा के सबसे बड़ उपलब्धि मैथिली में विशाल पाठक-समुदाय के निर्माण हय। मैथिल समाज के हास्यप्रिय संस्कार के ओ साहित्यिक रूप देलथिन आ पाठक के साहित्य दिस आकर्षित कैलथिन। भारतीय हास्यरस आ पाश्चात्य व्यङ्ग्य-दृष्टि ई रचना में एकत्र होय हय; गप्प के मिश्रित विधागत स्वरूप लोक के मौखिक कथन, शास्त्रीय विनोद आ आधुनिक मुद्रित साहित्य के बीच सेतु बनावै हय।
साथे ई निबन्ध संग्रह के सबसे बेसी असहमति-प्रधान निबन्ध में एक हय। रमानन्द झा हरिमोहन झा-जइसन कैननी लेखक के सीमा के निर्भीकता से रेखाङ्कित करै हथिन — 'अधिकांश रचना पढ़ला पर विचार के उन्मेष न होय हय, वैचारिक मन्थन न होय हय, खाली गुदगुदी लगै हय, एक बेर हँसा गेला पर ओकर प्रभाव बिला जाय हय।' ई कैनन-केन्द्रित मूल्याङ्कन के विरुद्ध विदेह-प्रतिमान के पुनर्मूल्याङ्कन-साहस के अग्रदूत हय — लोकप्रियता के साहित्यिक श्रेष्ठता के पर्याय न मानब।
१८. कविवर यात्री के स्तम्भ-लेखन
यात्री (नागार्जुन) के स्तम्भ-लेखन के साहित्यिक विधा के रूप में प्रतिष्ठित करै रमानन्द झा मैथिली पत्रकारिता आ साहित्य के अन्तःसम्बन्ध के उद्घाटित करै हथिन। प्रारम्भिक पत्र-पत्रिका के उद्देश्य मातृभाषा-सेवा आ सामाजिक कुरीति के निदान हल; पाठकीय स्तम्भ लेखक, सम्पादक आ पाठक के बीच वैचारिक संवाद स्थापित करै हल। 'यत्र तत्र सर्वत्र', 'यत्किंचित' आ 'चिन्तन-अनुचिन्तन' जइसन स्तम्भ में यात्री राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था, भाषा आ संस्कृति पर तात्कालिक टिप्पणी करै हथिन; 'चोआ-काका' जइसन व्यङ्ग्य-पात्र के विकास तक विश्लेषण ई निबन्ध में हय। यात्री के 'तेज दृष्टि के सीमा-रेखा से छोट से छोट घटना के बाहर न रहब' — ई व्यङ्ग्यकार के सर्वग्राही दृष्टि के स्वीकृति हय।
यात्री अपन स्तम्भ के माध्यम से शासक वर्ग के वाक्जाल, मिथिलाञ्चल के आर्थिक उपेक्षा आ भाषा-साम्राज्यवाद के तीक्ष्ण आलोचना कैलथिन। ओ हिन्दी के सम्पर्कभाषा के सम्मान देतो ओकर नाम पर मैथिली आ आन भाषा के अधिकार छीने के विरोध करै हथिन। स्तम्भ के भाषा तीक्ष्ण, व्यङ्ग्यपूर्ण, संवादात्मक आ पात्रप्रधान हय। विधा-विस्तार के दृष्टि से ई निबन्ध साहित्येतिहास के अखबारी गद्य दिस उन्मुख करै हय आ मैथिली गद्य में राजनीतिक व्यङ्ग्य आ सामाजिक चिन्तन के एकगो नव प्रतिमान रेखाङ्कित करै हय।
१९. कविवर आरसी
आरसी प्रसाद सिंह (जन्म १९११ ई॰) मैथिली आ हिन्दी दुनो भाषा में सर्जन करै हलथिन, मुदा मैथिली में हुनकर मुख्य परिचय गीतकार के हय। 'शेफालिका', 'माटि के दीप', 'पूजा के फूल' आ 'सूर्यमुखी' के माध्यम से हुनकर काव्य-यात्रा राष्ट्रीयता, प्रकृति, प्रेम, सामाजिक चेतना आ जन-अधिकार तक विस्तृत होय हय। हुनकर प्रारम्भिक गीत में राष्ट्रीय एकता, स्वाधीनता, त्याग आ भारतीय समन्वित संस्कृति के स्वर हय — ओ नव युग के नव निर्माण आ कोटि-कोटि भारतवासी के ऐक्य-सूत्र में बाँधे के आह्वान करै हथिन; बाद के कविता में मिथिला के शोषण, भाषिक अधिकार, बाढ़, राजनीतिक भ्रष्टाचार आ जनाक्रोश मुखर होय हय।
रूपवादी दृष्टि से आरसी के विशेषता गीतात्मकता, बिम्ब, अनुप्रास, इन्द्रियबोध आ कोमल भावप्रवाह हय। ई निबन्ध के विशेष शक्ति इन्द्रियबोध-विश्लेषण में हय — हरसिंगार आ सुमन में रस-गन्ध, पवन में स्पर्श, सुरभि-धार में रस-गन्ध-नाद के सम्मिश्रण — ई विभिन्न इन्द्रियबोध के सम्मिश्रण-विश्लेषण पाश्चात्य आधुनिक काव्य-समीक्षा के परिष्कृत उपकरण छी; भारतीय दृष्टि से ई गुण-रीति (माधुर्य-गुण) आ अलङ्कार-विवेचन के क्षेत्र हय। 'शेफालिका' से 'सूर्यमुखी' तक यात्रा वैयक्तिक सौन्दर्यचेतना से सामाजिक चेतना ओर बढ़ै कवि के विकास हय।
२०. उपेन्द्र ठाकुर 'मोहन' आ हुनकर कविता
संग्रह के बहुत विस्तृत निबन्ध में से ई एक 'आयल वसन्त' के अमर गीतकार मोहन के समर्पित हय। मोहनजी के कविता स्मृति, प्रकृति, वसन्त, गीतात्मकता आ जीवन-सङ्घर्ष के सम्मिलित संसार हय। 'आयल वसन्त' जइसन गीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी कण्ठस्थ रहल, जे से कविता पाठ्यपुस्तक के बाहर जीवित सामुदायिक स्मृति बनल। रमानन्द झा इहाँ आत्मकथात्मक शैली — छात्र-जीवन में श्रीरामचन्द्र बाबू के कक्षा में गीत-श्रवण, 'मिहिर'-कार्यालय में मोहन के अनवरत कर्मशीलता के स्मरण — अपनावै हथिन, जे समीक्षा के संस्मरणात्मक आत्मीयता दे हय।
मोहन के मातृभाषा-प्रेम — 'घर के गोसाउनि झँखथि अन्हारेँ, मन्दिर बारब दीप?', 'गाम नोत न, नोत बेलाही' — क माध्यम से भाषिक अस्मिता के तीक्ष्ण चेतना उद्घाटित होय हय। 'जब मैथिली सूप के भाँटा भेल संकटापन्न, की राष्ट्रीयता? देश-भक्ति की?' — ई पदावली भाषा आ राष्ट्रीयता के अन्तःसम्बन्ध के प्रश्नाङ्कित करै हय।
मोहनजी के जीवन आर्थिक अभाव, शिक्षा के संघर्ष, प्रवास, रोजगार-अभाव आ मुद्रणालय के श्रम से बनल। ई कारण हुनकर कविता खाली प्रकृति के माधुर्य न, श्रमशील जीवन के भीतर सौन्दर्य बचावे के प्रयत्न हय। विदेह समान्तर इतिहास के दृष्टि से मुद्रणालय के प्रूफ-संशोधक भी साहित्येतिहास के निर्माता हथिन — ओ खाली दोसर के पोथी सुधारै न, अपन समय के भाषिक रूप, वर्तनी आ साहित्यिक संस्कृति के संरक्षक बनै हथिन।
२१. शुद्धतावादी कथाकार उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास'
उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास' (जन्म १९१७ ई॰) मैथिली भाषा के शुद्ध, देशज आ स्वाभाविक रूपक पक्षधर कथाकार हथिन। 'विडम्बना' आ 'भजना भजले' के विवेचन में रमानन्द झा मात्रा बनाम गुणवत्ता के सैद्धान्तिक प्रश्न उठावै हथिन — 'ढाकी के-ढाकी लिखेले पर अगर कोनो जीवन-मूल्य स्वीकृत न होके सकल ... त जीवन-कालहि में रचनाकार अप्रासङ्गिक घोषित हो जाय हय।' ई रूपवादी गुणवत्ता-केन्द्रित मूल्याङ्कन हय; व्यास के कथा के 'बासितेवासि न, टटका बनल रहब' — कालातीत ताजगी — क कसौटी कालातीत-मूल्य के अवधारणा से मेल खाय हय।
हुनकर कथा भाषा-प्रयोग, सामाजिक व्यङ्ग्य, नैतिक विडम्बना आ ग्रामजीवन के जीवित संवाद के कारण विशिष्ट हय। शुद्धतावाद हुनका खातिर खाली शब्द के छनोट न, सांस्कृतिक प्रतिरोध हय — बाहरी भाषिक प्रभाव के बीच मैथिली के अपन वाक्य-विन्यास, लोकोक्ति, उच्चारण आ भावभूमि बचायब मातृभाषा के अस्मिता बचायब हल। रूपवादी दृष्टि से हुनकर कथा-भाषा पात्र के सामाजिक स्तर आ मानसिकता निर्माण करै हय; उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि से भाषिक शुद्धता के आग्रह स्वाभिमान के प्रतीक हय।
२२. पं॰ राजेश्वर झा: व्यक्तित्व ओ कृतित्व
राजेश्वर झा (१९२२–१९७७) शोधकर्ता, नाटककार, कथाकार, सम्पादक, प्रकाशक आ संस्थापक के रूप में बहुत सक्रिय हलथिन। हुनकर कृति के अनुसन्धानपरक, ऐतिहासिक-पौराणिक आ सर्जनात्मक तीन वर्ग में बाँटल गेल हय — 'मिथिलाक्षर के उद्भव ओ विकास', 'मैथिली साहित्य के आदिकाल', 'अवहट्ट के उद्भव ओ विकास' आदि हुनकर शोधपरक कृति हय। ई विवेचन में रमानन्द झा एक गम्भीर पद्धतिगत घोषणा करै हथिन — 'साहित्यकार के व्यक्तित्व के बूझब सबसे पहिने जरूरी हय, बिना व्यक्तित्व बूझने कृतित्व के तह में जाएब सम्भव न।' ई जीवनीमूलक समीक्षा के साफ प्रतिपादन हय। राजेश्वर बाबू के आर्थिक विपन्नता के रहतो प्रतिवर्ष पोथी-प्रकाशन आ लोक के लिखे के खातिर प्रेरित करब — ई प्रेरक भूमिका के रमानन्द झा कृतित्व से बेसी मूल्यवान् मानै हथिन ('तराजू के पलरा पर व्यक्तित्व भरिगर होके जएतनि')। संस्था-निर्माता के ई मूल्याङ्कन विदेह-आन्दोलन के संस्था-केन्द्रित दृष्टि के पूर्वाभास हय।
अध्याय के विशेषता ई हय कि लेखक प्रशंसा पर रुकै न। राजेश्वर झा के साहित्येतिहास के काल-विभाजन, ईसापूर्व सहस्राब्दी से मैथिली साहित्य के आरम्भ आ अवहट्टसम्बन्धी अनेक निष्कर्ष के प्रमाणहीन कहै हथिन। औचित्य आ ऐतिहासिक पद्धति के दृष्टि से ई अध्याय 'अखियासल' के सबसे बेसी सन्तुलित आलोचना में से एक हय — व्यक्ति के श्रम के सम्मान आ हुनकर निष्कर्ष के कठोर परीक्षण एकसाथ सम्भव हय।
२३. ललित के कथा में परिवेश के संक्रान्त जीवन
ललित के कथा के रमानन्द झा स्वातन्त्र्योत्तर मोहभङ्ग के साहित्यिक दस्तावेज के रूप में व्याख्यायित करै हथिन — स्वतन्त्रतापूर्व आशा आ स्वतन्त्रतापरान्त मोहभङ्ग के बीच के संक्रमण: 'आशा के किरण निराशा में बदलि गेलै के, लाबनि टूटि के खसि पड़लै के।' प्रथम निर्वाचन में धुरफन्दी, स्वार्थान्धता, धन, जाति आ जातिवाद के नग्न-नाच, नकली नेता, गरीब मतदाता आ भ्रष्ट विकास-योजना — ई सब सामाजिक परिवेश के यथार्थ बनै हय। ई मार्क्सवादी-यथार्थवादी समीक्षा के उत्कृष्ट प्रयोग हय, जे साहित्य के राष्ट्रीय-राजनीतिक यथार्थ के संक्रमणशील प्रतिबिम्ब मानै हय।
मार्क्सवादी दृष्टि से 'प्रतिनिधि' जइसन कथा सुविधा-भोगी शासक वर्ग आ अधिकार-विहीन गरीब के द्वन्द्व उद्घाटित करै हय — श्रम के हीन बुझनिहार शिक्षित युवक अन्त में शारीरिक श्रम के महत्त्व स्वीकारै हय। 'लड़ाइ'-कथा में द्वैध-मानसिकता आ दू पीढ़ी के वैचारिक स्तर आ दायित्वबोध के विश्लेषण हय। 'रमजानी', 'मृत्युञ्जय', 'ओभरलोड', 'दू चित्र' आदि कथा में परम्परा-विघटन, रोजगार-संकट, धार्मिक पाखण्ड, देहगत आवश्यकता, अस्तित्वगत भार आ सामन्ती मानसिकता के अवशेष हय।
२४. धीरेन्द्र के कथा के सामाजिक सन्दर्भ
अध्याय सामाजिक सन्दर्भ के सैद्धान्तिक व्याख्या से आरम्भ होय हय आ एमें रमानन्द झा अपन सबसे बेसी परिष्कृत सैद्धान्तिक प्रतिपादन प्रस्तुत करै हथिन — 'सामाजिकता हय समाजरूपी नेहाइ पर पीटि तैयार रूपाकृति; नेहाइ हय व्यक्ति-मन आ सामाजिक-मन के द्वन्द्व।' ई व्यक्ति-मन बनाम सामाजिक-मन के द्वन्द्वात्मक सिद्धान्त कृति के बौद्धिक शिखर हय — जे मार्क्सवादी द्वन्द्ववाद आ मनोविश्लेषणात्मक समीक्षा के संगम से निर्मित हय। लेखक के वैयक्तिक अनुभव तब सामाजिक बनै हय जब पाठक के सुप्त अनुभव के जागृत के सामूहिक मन के प्रतिनिधित्व करय — रचनाकार के अनुभव के 'समाज के अनुभव होके पएब, समाज के दर्पण होके पएब' कला के प्रतिबिम्ब-सिद्धान्त के सुस्पष्ट मैथिली अभिव्यक्ति हय।
धीरेन्द्र के कथा में शिक्षित बेरोजगारी, सिफारिश, भ्रष्ट नियुक्ति, सत्य के अवमूल्यन, गरीब के श्रम के अपहरण आ वर्गीय शोषण के चित्र हय। 'मनुख बिकाय' आ 'गीध' के प्रतीक आधुनिक समाज में मनुष्य के वस्तुकरण आ शक्तिशाली द्वारा निर्बल के भक्षण व्यक्त करै हय — मार्क्सवादी दृष्टि से 'गीध' पूँजी आ सत्ता द्वारा श्रमजीवी शरीर के उपभोग के रूपक हय। साधारणीकरण के दृष्टि से बेरोजगार युवक के निजी वेदना देश के लाखों युवक के वेदना बनै हय। धीरेन्द्र के कथा के 'आँखि के डबडबाएब' के समान-तत्त्व आ शिल्प के रूप में विवेचित करब सूक्ष्म रूपवादी अवलोकन हय, यद्यपि इहाँ समीक्षक भावुकता आ शिल्प के भेद-रेखा पर अपन असमंजस खुद स्वीकार करै हथिन।
२५. प्रभास के कथा-यात्रा
संग्रह के अन्तिम आ सबसे बेसी दीर्घ निबन्ध प्रभास कुमार चौधरी (जन्म १९४१ ई॰) के समर्पित हय। रमानन्द झा इहाँ एक व्यापक प्रभाव-अध्ययन करै हथिन — मैथिली कथा पर संस्कृत, अंग्रेजी आ बङ्गला, तीन साहित्य के प्रभाव के विश्लेषण। ई तुलनात्मक साहित्य के पद्धतिगत प्रयोग हय, जे संग्रह के ऐतिहासिक वर्णन से उठाय सैद्धान्तिक तुलना के स्तर पर ले जाय हय।
प्रभास के दू दशक के कथा-यात्रा के क्रमिक यात्रा मानके लेखक हुनकर जीवन-दृष्टि, सामाजिक चेतना आ कथन-पद्धति में भेल परिवर्तन के परीक्षण करै हथिन — कथाकार के 'घर से चलके, गाम में घूमके, क्रमशः भावगत निर्लिप्तता आ निष्क्रियता-बोध तक पहुँचब' के विकास-रेखा। आर्थिक विपन्नता, समाज के स्वार्थ, गरीब के उपेक्षा आ तथाकथित सम्भ्रान्त वर्ग के अमानवीयता हुनकर कथा के मुख्य विषय बनै हय। प्रभास के कथा-यात्रा व्यक्ति-केन्द्रित अनुभव से व्यापक सामाजिक संरचना दिस बढ़ै हय — पात्र प्रारम्भ में परिस्थिति के शिकार बुझाय हय, मुदा धीरे-धीरे शोषण के संरचना के पहचानय लगै हय। ई लेखकीय चेतना के विकासात्मक अध्ययन समीक्षक के परिपक्व दृष्टि के द्योतक हय। संग्रह के समापन ई आधुनिकतम कथाकार पर होएब 'प्रथम' से 'समकालीन' तक यात्रा के पूर्ण करै हय। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से प्रभास के कथा इतिहास के विजय-घोष न, उपेक्षित मनुष्य के दैनिक पराजय, संघर्ष आ आत्मरक्षा के इतिहास लिखै हय।
उत्तरार्ध: अध्यायवार सीमा, अन्तर्विरोध आ अपूर्णता
ई मूल्याङ्कन के दोसर आधा भाग पूरा तरह से 'अखियासल' के सीमा, दुर्बलता आ पद्धतिगत संकट के समर्पित हय। ई आलोचनात्मक कठोरता कोनो अवमूल्यन न, बल्कि कृति के ऐतिहासिक महत्त्व के गम्भीर स्वीकृति के अनिवार्य अंग हय — एक अग्रगामी ग्रन्थ के सीमा के निर्मम विवेचन उपरान्तहि ओकर उत्तराधिकारी प्रयास अपन दिशा निर्धारित के सकै हय।
१. श्रीकृष्ण ठाकुर आ 'चन्द्रप्रभा' अध्याय के सीमा
'चन्द्रप्रभा' के प्रथम कथा-संग्रह माने के तर्क महत्त्वपूर्ण हय, मुदा उपलब्ध पाण्डुलिपि अपूर्ण हय। पूरा पाठ, रचनाकाल, पाठान्तर आ लेखक के अन्तिम रूपक अभाव में 'प्रथम' पद सावधानी से देल जाएबा के चाही। अध्याय ऐतिहासिक महत्त्व पर बेसी केन्द्रित हय; कथा सब के पृथक कथानक, चरित्र, कथावाचक, समय-विन्यास आ भाषिक संरचना के निकट परीक्षण कम हय। संस्कृत नीति-कथा परम्परा से समानता देखावल गेल हय, मुदा समानता, प्रभाव, रूपान्तरण आ मौलिकता के साफ भेद सर्वत्र न राखल गेल। साथे, विदेह-दृष्टि से ई भी कहल जा सकै हय कि 'चन्द्रप्रभा' के कथा-संसार मुख्य रूप से संस्कृत ग्रन्थ के छाया में पलल-बढ़ल हय; एमें जमीनी लोक-जीवन आ वञ्चित वर्ग के यथार्थवादी चित्रण के अभाव हय, आ नीति-उपदेश के प्राधान्य रस-निष्पत्ति में बाधक बनै हय। आरम्भिक होय के गौरव कृति के कलात्मक सीमा के ओझल न करे के चाही।
२. जीवछ मिश्र आ 'रामेश्वर' अध्याय के सीमा
अध्याय 'रामेश्वर' के प्रथम मौलिक उपन्यास सिद्ध करे के दिशा में प्रबल हय, मुदा 'प्रथम' के प्रमाण खातिर समकालीन प्रकाशन-सूची, विज्ञापन, पाण्डुलिपि आ आन सम्भावित उपन्यास के व्यवस्थित तुलना अपेक्षित हल। रामेश्वर के अपराध के सामाजिक विवशता से व्याख्यायित करब युक्तिसंगत हय, मुदा पत्नी पर अविश्वास, हिंसक प्रवृत्ति आ डकैती में सक्रिय सहभागिता के नैतिक उत्तरदायित्व कम प्रश्नाङ्कित भेल हय। अन्त में पुत्र से पुनर्मिलन आ चरित्र-परिवर्तन बहुत आकस्मिक हय — मनोवैज्ञानिक रूपान्तरण के क्रमिक प्रक्रिया अनुपस्थित रहने समाधान अतिनाटकीय बुझाय हय। मार्क्सवादी निकष पर भी ई कहल जा सकै हय कि अन्त में उपन्यासकार रामेश्वर के हृदय-परिवर्तन करा के वर्ग-संघर्ष के एकगो नैतिक आदर्शवाद में बदल दे हथिन — क्रान्ति के सम्भावना के सुधारवाद के पानि से निझा देल जाय हय। स्त्री-पात्र पार्वती के पीड़ा हय, मुदा हुनकर स्वाधीन दृष्टि सीमित हय।
३. 'सुमति' अध्याय के सीमा
अध्याय पूर्ववर्ती आलोचक के मत के संग संवाद करै हय, मुदा 'सुमति' के पूरा कथानक, पात्र-संरचना, दृष्टिबिन्दु आ भाषा-विन्यास के पर्याप्त प्रत्यक्ष विश्लेषण न करै हय। ऐतिहासिक महत्त्व आ 'सफल आधुनिक उपन्यास' होय के दावा बीच तनाव हय — जब कथानक असंगठित, चरित्र अस्पष्ट आ प्रस्तुति अपरिपक्व हय, तब 'सफलता' के कसौटी साफ होय के चाही। नारीवादी दृष्टि से एकगो गम्भीर प्रश्न ई जे सुमति के शिक्षा के एकमात्र उद्देश्य देखावल गेल हय — खसै सासुर के सम्हारब आ परिवार के कर्ज से मुक्त करब; इहाँ नारी के अपन कोनो स्वतन्त्र सत्ता वा आकाङ्क्षा न हय, ओ पितृसत्तात्मक परिवार के उद्धारक के भूमिका तक सीमित हय। 'उचित वक्ता' रूप में कथावाचक के बेर-बेर हस्तक्षेप उपन्यास के संरचनात्मक स्वायत्तते के खण्डित करै हय, जकरा जयकान्त मिश्र 'अपरिपक्व शिल्प' कहने हथिन; भाषा निबन्धात्मक हय, जे में तुलसीदास के चौपाइ के भरमार हय — ई काव्य-दोष हय। सामाजिक सुधार के विषय अपनहीं कलात्मक श्रेष्ठता के प्रमाण न — कथा-वस्तु महत्त्वपूर्ण रहितो ओकर प्रस्तुति, चरित्रगत जटिलता आ आन्तरिक अनिवार्यता समान रूप से जरूरी हय।
४. 'निर्दयी सासु' अध्याय के सीमा
कथा स्त्री-उत्पीड़न के प्रश्न उठावै हय, मुदा सासु के 'निर्दयी' खलपात्र बनाओला पर पितृसत्ता के व्यापक संरचना व्यक्तिगत क्रूरता में सीमित हो सकै हय। सासु खुद कोन सामाजिक दबाव, आर्थिक भय, विवाह-व्यवस्था आ प्रतिष्ठा-बोध के उत्पाद हथिन — ई प्रश्न के पर्याप्त विवेचन न हय। पुतोहु के चरित्र करुणा के पात्र बनै हय, मुदा ओकर प्रतिरोध, इच्छाशक्ति, स्त्री-समुदाय के सहयोग आ वैकल्पिक जीवन-सम्भावना कम विकसित हय — नायिका शारदा पूरा कथा में प्रायः मूक हय, आ वञ्चित-विमर्श के यक्ष प्रश्न — की उपाश्रित बाज सकै हय? — इहाँ पूरा तरह से प्रासङ्गिक हय। एकाङ्गी आ सपाट चरित्र-निर्माण संरचनावादी दृष्टि से भी सीमा हय। नारीवादी दृष्टि से स्त्री के खाली पीड़िता बनाके भी प्रतिनिधित्व के सीमा हय।
५. बिसरल साहित्यसेवी जनार्दन झासम्बन्धी सीमा
अध्याय के अभिलेखीय उद्देश्य प्रशंसनीय हय, मुदा सीमित सामग्री पर आधारित जीवन-विवेचन कतको स्थान पर अनुमान पर निर्भर हय। 'जानकी परिणय' के सांस्कृतिक विवरण के चर्चा हय, मुदा काव्य के छन्द, भाषा, अलङ्कार, कथन-गति आ पात्र-निर्माण के विस्तार कम हय। विस्मृत लेखक के फेर प्रतिष्ठित करे के उत्साह में कृति के वास्तविक कलात्मक सीमा कहियो-कहियो गौण हो जाय हय — इतिहास में स्थान देब आ उच्च साहित्यिक मूल्य देब एके बात न।
६. त्रिलोचन झासम्बन्धी अध्याय के सीमा
लेखक खुद स्वीकार करै हथिन कि त्रिलोचन झा के सामग्री बिखरल आ कम उपलब्ध हय। ई कारण अध्याय जीवनीपरक पुनर्निर्माण बेसी, कृति-आधारित आलोचना कम बन जाय हय। मातृभाषा-प्रेम, संगठन आ समाजसेवा के प्रशंसा पर्याप्त हय, मुदा हुनकर विशिष्ट साहित्यिक शैली, भाषिक प्रयोग, विधागत क्षमता आ विचार के अन्तर्विरोध कम साफ हय। मिथिला के गौरव फेर प्राप्त करे के आह्वान कहियो-कहियो रोमानी अतीतवाद ओर जा सकै हय — समाज के वर्ग-भेद आ जाति-भेद के ओझरा खाली भावनात्मक एकता के आह्वान अव्यावहारिक बन सकै हय। प्राचीन गौरव के संग जातिगत विषमता, स्त्री-बहिष्कार आ सामाजिक रूढ़ि के आलोचना भी समान रूप से जरूरी हल।
७. यदुवरसम्बन्धी अध्याय के सीमा
यदुवर के राष्ट्रीय आ भाषिक चेतना पर बेसी बल देल गेल हय; काव्य के रूप, छन्द, ध्वनि, बिम्ब, वक्रोक्ति आ वैयक्तिक स्वर के विश्लेषण अपेक्षाकृत कम हय। मातृभाषा-जागरण के कविता कतको स्थान पर घोषणात्मक आ उपदेशात्मक हो सकै हय — 'जय जय जयति मैथिल जाति' जइसन पङ्क्ति में अभिधा के प्राधान्य हय, ध्वन्यार्थ कम — आ अध्याय प्रचारात्मकता आ काव्यात्मकता के अन्तर साफ न करै हय। 'मैथिल' समुदाय के एकरूप मानल गेल हय; जाति, वर्ग, लिङ्ग आ क्षेत्रानुसार मैथिल अनुभव के भिन्नता पर विचार कम हय। भाषिक अस्मिता सब मैथिल खातिर एके रूप में अनुभवित होय हय — ई मान्यता प्रश्नास्पद हय। आदर्शवाद के अतिरेक में मिथिला के सामन्ती व्यवस्था के ठोस आलोचना के अभाव भी एकगो सीमा हय।
८. द्विजवरसम्बन्धी अध्याय के सीमा
कवि-सेनानी के सक्रिय जीवन निश्चय महत्त्वपूर्ण हय, मुदा जीवनी के वीरता काव्य के स्वतन्त्र आलोचना पर भारी पड़ै हय। राजनीतिक सक्रियता अपनहीं उत्कृष्ट काव्य के प्रमाण न — कविता सब के भाषा, छन्द, प्रतीक, वैचारिक जटिलता आ कलात्मक स्थायित्व के बेसी निकट विश्लेषण जरूरी हल। राष्ट्रीयता के निर्विवाद लोकमङ्गल के मूल्य मानके खातिर गेल हय; राष्ट्रवाद के भीतर वर्ग, जाति, धर्म आ लैङ्गिक असमानता भी रह सकै हय। स्वदेशी आ चरखा के सामाजिक अर्थ हय, मुदा आधुनिक आर्थिक संरचना से ओकर सम्बन्ध आलोचनात्मक रूप से न खोलल गेल। 'छूतहर'में शोषित के बात हय, मुदा ई क्रान्तिकारी चेतना के बदला गान्धीवादी सुधारवादी परिधि तक सीमित रह जाय हय आ छन्द-बद्धता कहीं-कहीं यथार्थ के कुण्ठित करै हय।
९. कुमार गंगानन्द सिंहसम्बन्धी सीमा
लेखक खुद देखाबै हथिन कि कथाकार के कतको कथा लक्ष्य-प्रधान हय — पहिने नैतिक निष्कर्ष स्थिर होय हय, ओकर बाद पात्र आ घटना जोड़ल जाय हय। ई कारण कथा जीवन के स्वाभाविक जटिलता के बदला उदाहरण बन जाय हय। अनेक कथा में दीर्घ कालखण्ड, अनावश्यक मोड़, घटना के विस्तार आ अन्त में पूरा समाधान कथा-प्रभाव के कमजोर करै हय — लेखक भी 'विवाह' आ 'बिहाड़ि' के तन्तुवाय फलकि जाएब स्वीकारै हथिन। सामाजिक सुधार के आग्रह रहितो जाति-उन्मूलन आधा बाट पर रुक जाय हय — अस्पृश्यताविरोधी कथा दलित पात्र के पूर्ण सामाजिक समानता तक न ले जाय हय आ 'बिहाड़ि' के सुधार अन्त में उच्च वर्ग के अनुकम्पा पर निर्भर रहै हय। नव्य-न्याय के दृष्टि से 'पञ्च परमेश्वर'में विरुद्ध हेत्वाभास के स्थिति हय — एक ओर सुधार के बात आ दोसर ओर ग्राम-पञ्चायत के ई उपदेश जे "सामन्त आ जमीन्दार के आमोद-प्रमोद में व्याघात न करे के चाही" — सुधार के गप्प करै शोषक वर्ग के सुख-शान्ति के वकालत। स्त्री-पात्र के संख्या भी कम हय।
१०. हरिलतासम्बन्धी अध्याय के सीमा
ई निबन्ध के सीमा ई जे समीक्षक हरिलता के वैधव्य-जनित वेदना के खाली 'ईश्वरोन्मुखता' के कारण मानके ले हथिन, ओकर सामाजिक-आलोचनात्मक सम्भावना के अनदेखा के दे हथिन। एक सशक्त नारीवादी पाठ इहाँ सम्भव हल — बाल-विवाह, वैधव्य, स्त्री-शिक्षा के निषेध के विरुद्ध चोरा के अक्षर सीखे के संघर्ष — मुदा विवेचन मुख्य रूप से वैष्णव भक्ति तक सीमित रह गेल। मनोविश्लेषण के दृष्टि से ई प्रश्न भी उठै हय कि भक्ति इहाँ सामाजिक यथार्थ से पलायन के साधन त न बनल — भौतिक यन्त्रणा के आध्यात्मिक रहस्यवाद में रूपान्तरित के सामाजिक अधिकार के प्रश्न के स्थगित के देब। ई दुनो सम्भावित पाठ — भक्ति-रस के शास्त्रीय आस्वाद आ सामाजिक प्रतिरोध के अपठित सम्भावना — क बीच के तनाव के निबन्ध न खोलै हय।
११. श्यामानन्द झासम्बन्धी अध्याय के सीमा
अध्याय के शीर्ष के 'काव्य-वस्तु' हय आ लेखक साफ करै हथिन कि ओ कला-पक्ष के बदला वस्तु-पक्ष के अध्ययन करै हथिन। ई कारण छन्द, बिम्ब, ध्वनि, वाक्य-विन्यास, अलङ्कार आ शैली के उचित मूल्याङ्कन छूटि जाय हय। सांस्कृतिक पुनरुत्थान के विचार में 'आर्य संस्कृति' के आदर्शीकरण हय; ई संस्कृति के भीतर जाति, स्त्री-अधिकार आ सामाजिक बहिष्कार के प्रश्न कम उठै हय। विदेशी प्रभाव वा देवनागरी के प्रयोग के कतको स्थान पर षड्यन्त्र के रूप में देखल गेल हय — भाषिक परिवर्तन के जटिल सामाजिक, मुद्रणगत आ शैक्षिक कारण भी विचारणीय हल। व्यङ्ग्य कहीं-कहीं व्यक्तिगत आक्रोश आ नारा में बदलि जाय हय, जे से ध्वनि क्षीण होके जाय हय।
१२. लक्ष्मीपति सिंह आ पत्रकारितासम्बन्धी सीमा
अध्याय व्यक्तित्व के स्नेहपूर्ण स्मरण बेसी हय, पत्रकारिता के संस्थागत इतिहास कम। पत्रिका के प्रसार-सङ्ख्या, आर्थिक आधार, ग्राहक-वर्ग, वितरण-क्षेत्र, सम्पादकीय नीति आ पाठकीय प्रतिक्रिया सम्बन्धी तथ्य सीमित हय। महिला पाठिका, ग्रामीण ग्राहक, मुद्रक, वितरक आ सहयोगी लेखक के भूमिका साफ न होय हय। पत्रकारिता आ साहित्यिक सम्पादन के सीमा भी बेसी साफ होय के चाही — समाचार, विचार, साहित्य, संस्था-सूचना आ सामाजिक अभियान के पृथक कार्यप्रणाली के विश्लेषण कैल जा सकै हल। साथे, मैथिली पत्रकारिता के 'वैसाखी'पर ठाढ़ रहे के जे स्वीकृति हय, ओकर विश्लेषण में आर्थिक संकट पर जतना जोर हय, वैचारिक शून्यता आ सत्ता से प्रश्न करे के साहस के अभाव पर ओतना न।
१३. मधुप के गीत-साहित्य के सीमा
अध्याय मधुप के गीत के सामाजिक आ सांस्कृतिक उपयोगिता पर बल दे हय, मुदा धुन, मात्रा, ताल, गायन-परम्परा आ प्रदर्शन-सन्दर्भ के विस्तृत विश्लेषण कम हय। सावित्री, पतिव्रता आ गृहस्थ आदर्श के स्त्री-छवि पितृसत्तात्मक आदर्श के पुष्ट कर सकै हय — स्त्री के शिक्षा आ नैतिक सामर्थ्य के प्रशंसा हय, मुदा ओकर आत्मनिर्णय, इच्छा आ वैकल्पिक जीवन के प्रश्न सीमित हय। गीत के लोकप्रियता आ साहित्यिक स्थायित्व अलग-अलग कसौटी हय — कण्ठस्थता काव्य-मूल्य के महत्त्वपूर्ण संकेत हय, मुदा एकमात्र प्रमाण न।
१४. भट्टीकाव्य परम्परासम्बन्धी सीमा
संस्कृत भट्टीकाव्य आ मधुप के काव्य के बीच सम्बन्ध रोचक हय, मुदा प्रत्यक्ष पाठगत समानता, अनुकरण, रूपान्तरण आ स्वतन्त्र विकास के साफ प्रमाण बेसी चाही। शिक्षणपरक काव्य के परम्परागत निरन्तरता के रूप में देखब कतको भिन्न काल, भाषा आ पाठक-समुदाय के एकरूप बना सकै हय। व्याकरण वा अलङ्कार सिखावे के प्रयोजन कहियो काव्य के रसात्मक स्वतन्त्रता के सीमित करै हय — अध्याय ई तनाव के पर्याप्त कठोरता से न परखै हय। सबसे गम्भीर प्रश्न औचित्य-सिद्धान्त के — 'आत्मा के प्रतिकूल' रचना के 'व्यक्ति से बड़ समाज' के तर्क से उचित ठहराएब भाव-औचित्य के मूल-भङ्ग के प्रश्न अनुत्तरित छोड़के दे हय; प्रयोजन-प्रेरित रचना के सौन्दर्यशास्त्रीय स्थिति की हएत, ओ पर सैद्धान्तिक स्पष्टता न भेटै हय। विदेह ज्ञानमीमांसा के कठोरतम निकष पर त राज्याश्रय में लिखल 'कोबर गीत' दरबारी विवशता के द्योतक हय — जनभाषा के गीतकार जब राजस्तुति लिखय खातिर बाध्य कैल जाय हथिन, तब ज्ञानमीमांसीय साहस आ शब्द-प्रमाण दुनो आहत होय हय — यद्यपि रमानन्द झा के 'युगीन विवशता' के सहानुभूतिपूर्ण व्याख्या ई प्रकरण के ऐतिहासिक जटिलता के भी रेखाङ्कित करै हय।
१५. किरण के कथा-जगतसम्बन्धी सीमा
किरण के सामाजिक प्रगतिशीलता के प्रशंसा कतको स्थान पर कथा के औपचारिक विश्लेषण के पाछाँ छोड़के दे हय। कथानक, कथावाचक, दृष्टिबिन्दु, समय, मौन आ प्रतीक के विस्तार अपेक्षित हय। मार्क्सवादी वा सुधारवादी निष्कर्ष सब कथा पर समान रूप से लागू कइला पर रचना के अन्तर्विरोध, अस्पष्टता आ बहुअर्थकता घट सकै हय। किरण के 'मैथिल दृष्टि' कोन सामाजिक स्थान से बनै हय — ब्राह्मण, दलित, स्त्री, किसान वा नगरवासी सब के दृष्टि एक होय हय कि न — ई प्रश्न कम उठै हय। नव्य-न्याय के दृष्टि से 'चन्द्रग्रहण' के तर्क-पद्धति में सव्यभिचार हेत्वाभास के स्थिति देखल जा सकै हय — अन्धविश्वास के खण्डन खातिर 'विधर्मी द्वारा अपहरण' जइसन अतिनाटकीय आ साम्प्रदायिक रंगवला तर्क के सहारा — अगर अपहरण न होय, त की गङ्गा-स्नान-सम्बन्धी अन्धविश्वास उचित हल? तर्क के ई शिथिलता कथा के प्रगतिशील अभिप्राय के कमजोर करै हय।
१६. 'चन्द्रग्रहण' के नारी-पात्रसम्बन्धी सीमा
स्त्री-पात्र के नूतनता पहचानल गेल हय, मुदा स्त्री के मूल्याङ्कन कतको स्थान पर त्याग, शील, प्रेम आ पारिवारिक दायित्व के परम्परागत कसौटी से होय हय। नायिका के कामना आ देहबोध के चर्चा हय, मुदा स्त्री के आर्थिक स्वतन्त्रता, सम्पत्ति-अधिकार, शिक्षा, श्रम आ सार्वजनिक जीवन में सहभागिता के प्रश्न सीमित हय। कथा-वाचक के पुरुष-दृष्टि आ पात्र के अपन स्वर में साफ अन्तर करब जरूरी हल — लेखकद्वारा स्त्री के बजाओल जाएब आ स्त्री के स्वतन्त्र आत्मकथन समान न।
१७. 'चर्चरी' अध्याय के सीमा
गप्प के स्वतन्त्र विधा माने के तर्क सर्जनात्मक हय, मुदा विधा के अनिवार्य लक्षण, सीमा, संरचना आ कथा-निबन्ध-प्रहसन से भेद व्यवस्थित रूप से निर्धारित न हय। हरिमोहन झा के हास्य कहियो सामाजिक विद्रूपता के सूक्ष्म परीक्षण के बदला पात्र के उपहास बन जाय हय — हास्य के लक्ष्य प्रायः कमजोर, ग्रामीण, स्त्री वा रूढ़िवादी पात्र बनला पर सत्ता-विरोधी व्यङ्ग्य के धार मन्द हो सकै हय। मार्क्सवादी दृष्टि से ई भी कहल गेल हय कि हरिमोहन झा समाज के ऊपरी सतह पर चोट करै हथिन — कर्मकाण्ड आ पण्डिताइ पर — मुदा सामन्ती आर्थिक आधार पर प्रहार न करै हथिन; खाली हँसी-ठट्ठा से समाज के गम्भीर घाउ के चिकित्सा असम्भव। लेखक खुद पूर्ववर्ती आलोचक के — प्रो॰ जयदेव मिश्र आ डा॰ जयकान्त मिश्र के — ई मत उद्धृत करै हथिन कि हरिमोहन बाबू पुरान मूल्य के त तोड़ देलथिन, मुदा कोनो नव आ रचनात्मक जीवन-मूल्य स्थापित न कर सकलथिन — ई वैचारिक शून्यता के प्रश्न उठावै हय, आ ई भी जे दोष खोजे के अत्यधिक आग्रह उदात्त सांस्कृतिक मूल्य के क्षति पहुँचावै हय आ विकल्प प्रस्तुत न करै।
१८. यात्री के स्तम्भ-लेखन के सीमा
स्तम्भ तात्कालिक घटना पर लिखल जाय हय, तेँ ओकर अनेक सन्दर्भ समय बीतला पर अस्पष्ट हो जाय हय; पूरा पत्रिका, समाचार आ पाठकीय प्रतिक्रिया बिना टिप्पणी के आशय अधूरा रह सकै हय। यात्री के प्रथम पुरुष के तीक्ष्ण स्वर स्तम्भ के जीवन्त बनावै हय, मुदा कतको स्थान पर व्यक्तिगत निर्णय, व्यङ्ग्य वा आक्रोश विश्लेषण पर भारी पड़ि सकै हय। स्तम्भ-लेखन के विधागत सीमा भी हय — तात्कालिक प्रतिक्रिया से आगाँ बढ़ि ई कोनो दीर्घकालीन सैद्धान्तिक विकल्प न दऽ पावै हय। तीनू स्तम्भ कम अवधि के खातिर चलल; ई कारण यात्री के स्तम्भ-चिन्तन के दीर्घकालीन विकासक्रम निर्धारित करब कठिन हय। उपलब्ध सामग्री के आलोचनात्मक सम्पादन आ कालानुक्रमिक प्रकाशन जरूरी हय।
१९. आरसीसम्बन्धी अध्याय के सीमा
आरसी के विशाल काव्ययात्रा के राष्ट्रीयता, मिथिला-प्रेम, सामाजिकता आ गीतात्मकता के प्रमुख सूत्र में समेटल गेल हय, मुदा चरणानुसार वैचारिक परिवर्तन के बेसी सूक्ष्म विश्लेषण सम्भव हल। प्रारम्भिक राष्ट्रीय कविता कहियो घोषणात्मक हय — प्रखर राष्ट्रवाद के शोर में कहीं-कहीं मिथिला के आन्तरिक वर्ग-संघर्ष आ सीमान्तकृत समाज के सूक्ष्म यथार्थ दबा जाय हय आ कविता प्रचार ओर झुकि जाय हय। मिथिला के प्राकृतिक सौन्दर्य के वर्णन आदर्शीकृत हय, जब यथार्थ में बाढ़, गरीबी आ पलायन भी समान रूप से वर्तमान हल। छायावाद आ रहस्यवाद के प्रभाव उल्लेखित हय, मुदा आरसी ई प्रभाव के कोना मैथिली अनुभव में रूपान्तरित करै हथिन, ओकर तुलनात्मक परीक्षण कम हय।
२०. मोहनजीसम्बन्धी अध्याय के सीमा
अध्याय संस्मरणात्मक आत्मीयता से भरल हय। ई आत्मीयता से व्यक्तित्व जीवन्त बनै हय, मुदा आलोचनात्मक दूरी घटै हय। जीवन-सङ्घर्ष, गरीबी आ उदार स्वभाव के वर्णन विस्तृत हय; काव्य-संग्रह, पाठान्तर, छन्द, बिम्ब, भाषा आ विचार-विकास के व्यवस्थित विश्लेषण अपेक्षाकृत कम। 'आयल वसन्त' के लोकप्रियता पूरा काव्य-व्यक्तित्व के प्रतिनिधि न हो सकै हय — कम प्रसिद्ध, कमजोर वा विचारात्मक कविता सब के परीक्षण रहितए मूल्याङ्कन बेसी सन्तुलित होय।
२१. उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास'सम्बन्धी सीमा
भाषिक शुद्धतावाद मातृभाषा-स्वाभिमान के साधन हो सकै हय, मुदा कठोर रूप में ओ भाषा-संकरता, नवशब्द, शहरी अनुभव आ बदलै बोलचाल के अस्वीकार कर सकै हय। भाषा जीवित समाज के संग बदलै हय — हरेक बाहरी शब्द अपवित्र आ हरेक पुरान शब्द शुद्ध न होय हय; शुद्धता के कसौटी के निर्धारित करत — ई प्रश्न जरूरी हय। कथाकार के भाषा-साधना के प्रशंसा हय, मुदा कथानक, चरित्र, मनोविज्ञान आ सामाजिक दृष्टि के सीमा पर समान विस्तार न — भाषा कथा-साहित्य के प्रमुख तत्त्व हय, मुदा एकमात्र तत्त्व न। साथे इहाँ एक आलोचनात्मक अन्तर्विरोध भी हय — रमानन्द झा व्यास के कथा के 'समसामयिक जीवन से विशेष प्रभावित न होएब' आ 'परिवर्तित युग-जीवन के विकृति से अप्रभावित रहब' के गुण मानै हथिन, जब कि अन्यत्र (गंगानन्द सिंह, चन्द्रग्रहण, ललित, धीरेन्द्र के विवेचन में) ओ यथार्थ-संवेदना आ परिवेश-सम्पृक्ति के सर्वोच्च मूल्य मानै हथिन — मूल्य-मानदण्ड के अस्थिरता के ई साफ प्रमाण हय, जकर विस्तृत विवेचन आगाँ पद्धतिगत सीमा में कैल गेल हय।
२२. राजेश्वर झासम्बन्धी अध्याय के सीमा
ई अध्याय खुद बहुत आलोचनात्मक हय, मुदा कतको स्थान पर खण्डन के स्वर अत्यधिक कठोर बन जाय हय। शोधकर्ता के ऐतिहासिक परिस्थिति, उपलब्ध स्रोत आ समय के पद्धतिगत सीमा भी ध्यान में राखल जा सकै हल। राजेश्वर झा के निष्कर्ष प्रमाणहीन हय — ई देखावल गेल, मुदा वैकल्पिक काल-विभाजन वा अवहट्ट-विकास के पूर्ण प्रतिमान प्रस्तुत न कैल गेल। व्यक्तित्व आ कृतित्व के परिचय के बाद त्रुटि-सूची विस्तृत हय; श्रेष्ठ शोध, उपयोगी सङ्कलन वा सफल नाटक के निकट पाठ कम हय। आलोचना खाली असहमति न, उपयोगी अंश के पुनर्स्थापन भी होय के चाही। साथे राजेश्वर झा के निधन के शोक-प्रसङ्ग में आत्मीयता-जनित भावुकता आलोचनात्मक दूरी के प्रभावित करै हय।
२३. ललित के कथासम्बन्धी अध्याय के सीमा
अध्याय सामाजिक, राजनीतिक, अस्तित्ववादी, लैङ्गिक आ धार्मिक अनेक प्रश्न एकत्र करै हय। ई विस्तार से कतको कथा के विशिष्ट रूप आ सौन्दर्य पाछाँ पड़ि जाय हय। यौनिक इच्छा के जैविक आवश्यकता कहके धार्मिक-नैतिक बन्धन से मुक्त करे के व्याख्या एकाङ्गी हो सकै हय — इच्छा सत्ता, सहमति, लैङ्गिक असमानता आ भावात्मक सम्बन्ध से भी जुड़ल हय। कथा सभ के युग के प्रत्यक्ष दस्तावेज मानल गेल हय; साहित्य यथार्थ के प्रतिलिपि न — चयन, कल्पना, प्रतीक आ कथन-दृष्टिद्वारा निर्मित रूप हय। लेखक आ पात्र के विचार में भेद जरूरी हय।
२४. धीरेन्द्र के कथासम्बन्धी सीमा
सामाजिक सन्दर्भ के सैद्धान्तिक प्रस्ताव महत्त्वपूर्ण हय, मुदा हरेक कथा के वर्ग-शोषण, बेरोजगारी आ सामाजिक अन्याय में सीमित करला पर रचना के मनोवैज्ञानिक, भाषिक आ प्रतीकात्मक स्तर घट सकै हय। 'गीध' के प्रतीक प्रभावशाली हय, मुदा प्रतीक के अनेक सम्भावित अर्थ के बदला एक निश्चित वर्गीय अर्थ पर बल देल गेल हय। कथा के भाषा, संवाद, मौन, कथा-वाचक के दूरी, अन्त के अनिश्चितता आ पाठकीय सहभागिता के बेसी विश्लेषण अपेक्षित हल। सामाजिक विषय के प्रासङ्गिकता स्वतः कलात्मक सिद्धि के प्रमाण न।
२५. प्रभास के कथा-यात्रा के सीमा
'यात्रा' शब्द क्रमिक विकास के भाव पैदा करै हय, मुदा हरेक लेखक के सर्जना सरल रेखा में आरम्भिक से परिपक्व ओर न बढ़ै हय — बाद के रचना सदैव पहिल से श्रेष्ठ हो, ई जरूरी न। जीवनी आ सामाजिक परिवेश के कथा-विकास के प्रमुख कारण मानल गेल हय; साहित्यिक प्रभाव, पत्रिका के सम्पादकीय नीति, पाठक-वर्ग, विधागत प्रयोग आ आत्मसमीक्षा के भूमिका कम साफ हय। प्रभास के चुनल कथा सब के आधार पर पूरा कथा-दृष्टि निर्धारित करब सीमित निष्कर्ष हो सकै हय — अप्रकाशित, दुर्लभ वा कम सफल कथा भी समग्र मूल्याङ्कन खातिर जरूरी हय।
पद्धतिगत संकट: समग्र सीमा के विस्तृत विवेचन
सीमा १: संकलनात्मक असंगति आ संरचनात्मक एकसूत्रता के अभाव
कृति के सबसे पहिने आ सबसे बेसी मौलिक सीमा ओकर उत्पत्ति-प्रक्रिया में निहित हय। ई पचीस निबन्ध सन् १९७२ से १९८९ तक विभिन्न पत्र-पत्रिका में विभिन्न अवसर पर, विभिन्न पाठक-वर्ग के ध्यान में रखके, स्वतन्त्र रूप में लिखल गेल हल। एकरा एकठाम रखके 'ग्रन्थ' बना देला से एक अन्तर्निहित असंगति पैदा होय हय — कहीं व्यक्तित्व-प्रधान (त्रिलोचन झा, राजेश्वर झा), कहीं कृति-प्रधान ('सुमति', 'चन्द्रग्रहण' के नारी-पात्र), कहीं विधा-प्रधान (स्तम्भ-लेखन), कहीं प्रवृत्ति-प्रधान (यदुवर, द्विजवर) समीक्षा। कोनो एकसमान सैद्धान्तिक ढाँचा समस्त निबन्ध के न बाँधै हय। फलतः पाठक के बेर-बेर सन्दर्भ-परिवर्तन करय पड़ै हय। रूपवादी दृष्टि से ई संरचनात्मक शिथिलता हय — ग्रन्थ में कोनो आरोह-अवरोह-युक्त तार्किक प्रगति न। अध्याय-क्रम प्रायः लेखक-जन्म के कालक्रम पर आधारित बुझाय हय, मुदा ई क्रम भी असंगत हय — किछु निबन्ध बहुत लघु, किछु बहुत दीर्घ, बिना कोनो घोषित तर्क के। एक सुनियोजित ग्रन्थ में जे भूमिका, पद्धति-कथन आ उपसंहार अपेक्षित होय हय, से एमें अनुपस्थित हय — हरेक निबन्ध के अन्त में खाली मूल प्रकाशन-स्रोत आ तिथि देल हय, जे संकलन के जोड़ा-जाड़ी प्रकृति के उघारि दे हय। अध्याय सब के विस्तार, पद्धति आ आलोचनात्मक गहराई समान न।
सीमा २: 'अनुपलब्धता' के आवर्ती स्वीकृति — समीक्षा के आधारभूत दुर्बलता
कृति के सबसे बेसी गम्भीर पद्धतिगत संकट ई जे लगभग हरेक प्रारम्भिक निबन्ध में समीक्षक खुद मूल रचना के 'अनुपलब्धता' के स्वीकार करै हथिन। 'चन्द्रप्रभा' के प्रसङ्ग में — 'चन्द्रप्रभा के अध्ययन-विश्लेषण नीक जइसन न कैल जा सकल हय, एकर प्रमुख कारण हय अनुपलब्धता'; त्रिलोचन झा के प्रसङ्ग में — 'बड़ कम सामग्री उपलब्ध हय'; यदुवर के प्रसङ्ग में — 'यदुवर के प्रसंग अद्यावधि बड़ कम अनुसन्धान भेल हय'; बिसरल जनार्दन झा के प्रसङ्ग में — 'पत्र-पत्रिको में जे रचना प्रकाशित भेल होयत, अब सर्वसुलभ न हय।'
इहाँ एक गहन विरोधाभास पैदा होय हय — अगर मूल कृति समीक्षक के खुद उपलब्ध न हल, त ओकर सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्याङ्कन कोन आधार पर सम्भव? बहुत ठाम समीक्षा असल में द्वितीय के स्रोत पर — जयकान्त मिश्र के मैथिली साहित्येतिहास, करुणाकान्त झा के शोध-प्रबन्ध, आन समीक्षक के उद्धरण पर — आश्रित हो जाय हय। रमानन्द झा खुद स्वीकार करै हथिन कि अधिकांश परवर्ती समीक्षक के 'सामग्री के सीमा जयकान्त मिश्र के इतिहासे हय' — मुदा ई आरोप खुद हुनकहु पर आंशिक रूप में लागू होय हय। पाठ-केन्द्रित समीक्षा के दृष्टि से ई एक मौलिक दुर्बलता हय — पाठ बिना समीक्षा।
विदेह समान्तर इतिहास-प्रतिमान के दृष्टि से ई सीमा बहुत शिक्षाप्रद हय। समान्तर इतिहास के पहिल दायित्व अभिलेखीकरण आ पाठ-सुलभीकरण हय — मूल पाठ के डिजिटल/मुद्रित रूप में सर्वसुलभ केने बिना ओकर पुनर्मूल्याङ्कन असम्भव। रमानन्द झा ई आवश्यकता के बेर-बेर रेखाङ्कित त करै हथिन ('सर्वसुलभ भेले पर विशेष प्रकाश पड़ि सकत'), मुदा ओ खुद ओ अभिलेखीय कार्य के सम्पन्न न के पावै हथिन — काहे कि ओ डिजिटल-पूर्व युग में ई व्यक्तिगत श्रम से असम्भव-प्राय हल। इहे अभिलेखीय रिक्तता के विदेह-आन्दोलन अपन ई-पत्रिका, पोथी-संग्रह आ पञ्जी-अभिलेखीकरण से भरे के प्रयास करै हय। तात्पर्य — 'अखियासल' के सबसे बड़ सीमा इहे ओकर सबसे बड़ ऐतिहासिक सार्थकता हय: ई ओ रिक्तता के नामाङ्कित करै हय जकरा भरब परवर्ती पीढ़ी के दायित्व बन जाय हय।
सीमा ३: मूल्य-मानदण्ड के अस्थिरता आ आन्तरिक अन्तर्विरोध
गम्भीर सैद्धान्तिक दृष्टि से कृति के सबसे बेसी विचारणीय दोष ओकर मूल्य-मानदण्ड के अस्थिरता हय। रमानन्द झा एक निबन्ध में जे गुण के सर्वोच्च मानै हथिन, दोसर में ओकरे विपरीत के प्रशंसित करै हथिन —
(क) गंगानन्द सिंह, 'चन्द्रग्रहण' के नारी-पात्र, ललित आ धीरेन्द्र के विवेचन में समसामयिक यथार्थ-संवेदना, परिवेश-सम्पृक्ति आ युग-जीवन के प्रतिबिम्बन के सर्वोच्च मूल्य मानल गेल हय; मुदा व्यास के कथा के ठीक एही कारण से प्रशंसित कैल गेल जे ओ समसामयिक जीवन से विशेष प्रभावित न होय हय आ परिवर्तित युग-जीवन के विकृति से अप्रभावित रहै हय। ई प्रत्यक्ष आत्मविरोध हय — यथार्थ-सम्पृक्ति कखनियो गुण, कखनियो ओकर अभाव गुण।
(ख) हरिमोहन झा के हास्य के 'विचार के उन्मेष न करब' के कारणेँ न्यून मूल्य देल गेल, मुदा मधुप के गीत के 'तत्काल हृदय-प्रभाव' आ आनन्द के कारणेँ उच्च मूल्य देल गेल — जब कि गीत भी प्रायः वैचारिक मन्थन न, बल्कि भाव-तात्कालिकता पर आश्रित होय हय। तत्काल-प्रभाव कखनियो गुण (गीत), कखनियो दोष (हास्य)।
(ग) 'कोबर-गीत' जइसन आत्म-विरोधी, प्रयोजन-प्रेरित रचना के 'व्यक्ति से बड़ समाज' के तर्क से उचित ठहरावल गेल, मुदा क्षेमेन्द्र के औचित्य-विचार के दृष्टि से आत्मा के प्रतिकूल रचना भाव-औचित्य के मूल-भङ्ग हय — समीक्षक इहाँ सैद्धान्तिक स्पष्टता प्रदान न के पावै हथिन।
ई अस्थिरता एही कारण से हय कि रमानन्द झा कोनो एक घोषित सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता न अपनावै हथिन। ओ प्रसङ्गानुसार कखनियो प्रभाववादी, कखनियो समाजशास्त्रीय, कखनियो जीवनीमूलक, कखनियो रूपवादी दृष्टि अपनावै हथिन। ई पद्धतिगत सारसंग्रहवाद एक ओर लचीलापन दे हय, त दोसर ओर मूल्याङ्कन के अप्रत्याशित आ असंगत बना दे हय।
सीमा ४: सैद्धान्तिक अनुशीलन के अभाव — शास्त्रीय शब्दावली के अनुपस्थिति
यद्यपि रमानन्द झा के समीक्षा में रस, ध्वनि, व्यञ्जना, औचित्य आदि भारतीय काव्यशास्त्रीय अवधारणा अन्तर्निहित रूप में विद्यमान हय, तबो ओ ई शास्त्रीय प्रतिमान के कहीं सुस्पष्ट सैद्धान्तिक उपकरण के रूप में प्रयोग न करै हथिन। 'व्यञ्जित', 'सम्प्रेषण', 'भावाश्रित' जइसन शब्द त आवै हय, मुदा आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, कुन्तक, क्षेमेन्द्र, भट्टनायक आदि आचार्य के नाम आ हुनकर सिद्धान्त के व्यवस्थित अनुप्रयोग अनुपस्थित हय। ओहिने, पाश्चात्य सिद्धान्त के कहीं नामोल्लेख वा सुविचारित प्रयोग न भेटै हय। एही से एक द्वैध स्थिति पैदा होय हय। एक ओर ई सैद्धान्तिक लाघव समीक्षा के सुपाठ्य, सम्प्रेषणीय आ पत्रकारीय-सुलभ बनावै हय — जे ओकर मूल प्रकाशन-सन्दर्भ (पत्रिका) के अनुकूल हल। मुदा दोसर ओर ई अकादमिक गहनता के अभाव पैदा करै हय। समीक्षा विवरणात्मक आ मूल्याङ्कनात्मक त हय, मुदा सैद्धान्तिक-विश्लेषणात्मक कम हय। एक समान्तर इतिहास के दीर्घकालिक वैधता प्रदान करबा खातिर जे सुदृढ़ सैद्धान्तिक आधार जरूरी होय हय, से एमें अविकसित रह जाय हय।
सीमा ५: परिप्रेक्ष्य के सीमा — पुरुष-केन्द्रिकता आ वर्ण-केन्द्रिकता
समाजशास्त्रीय आ उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि से कृति के एक गम्भीर सीमा ओकर सामाजिक परिप्रेक्ष्य के संकीर्णता में हय। पचीस निबन्ध में चौबीस पुरुष-रचनाकार के समर्पित हय; खाली एक (हरिलता) स्त्री-रचनाकार के। ओहू में हरिलता के विवेचन मुख्य रूप से वैष्णव भक्ति तक सीमित रह जाय हय। स्त्री जादेकर पात्र वा प्रेरणा के रूप में उपस्थित हथिन, स्वतन्त्र लेखिका, सम्पादिका आ आलोचक के रूप में कम — स्त्री-लेखिका के स्वतन्त्र साहित्यिक इतिहास पर्याप्त विकसित न।
ओहिने, विवेचित प्रायः समस्त रचनाकार एक विशिष्ट सामाजिक स्तर से आवै हथिन। मिथिला के दलित, अतिपिछड़ा, अल्पसंख्यक आ लोक-परम्परा के — मौखिक साहित्य, गीत-नाद-परम्परा के अनाम रचयिता — रचनाकार ई समान्तर इतिहास से प्रायः अनुपस्थित रह जाय हथिन; जाति आ वर्ग के प्रश्न उठै हय, मुदा दलित समुदाय के आत्मस्वर सीमित हय। ई सीमा युग-सापेक्ष हय (जे उपलब्ध अभिलेख प्रायः उच्च-वर्ण के हल), तबो विदेह समान्तर-प्रतिमान के पूर्ण जनतान्त्रिक समावेशिता के कसौटी पर 'अखियासल' आंशिक रूप में अपूर्ण रह जाय हय। समान्तर इतिहास के अर्थ खाली बिसरल उच्चवर्णीय रचनाकार के पुनरुद्धार न, बल्कि समग्र हाशिया के — दलित, स्त्री, लोक, मौखिक — पुनःस्थापना हय; ई व्यापक अर्थ में रमानन्द झा के परियोजना एक आरम्भ खाली हय, पूर्णता न।
सीमा ६: पाठ-प्रामाणिकता आ सम्पादकीय अशुद्धि के प्रश्न
कृति में उद्धृत पद्यांश आ गद्यांश के पाठ-प्रामाणिकता सन्दिग्ध रह जाय हय। काहे कि खुद समीक्षक स्वीकार करै हथिन कि बहुतो रचना पत्र-पत्रिका में छितरायल आ अनुपलब्ध हय, तेँ उद्धृत अंश के मूल पाठ से तुलना-सत्यापन प्रायः असम्भव हल। परवर्ती सम्पादन आ मुद्रण-प्रक्रिया में ई पाठक शुद्धता आओर संकटग्रस्त हो सकै हय — उपलब्ध प्रति में वर्तनी-अस्थिरता आ मुद्रण-दोष भी विद्यमान हय। एक विश्वसनीय समान्तर इतिहास खातिर पाठ-समीक्षा आ आलोचनात्मक संस्करण के अनुशासन अनिवार्य हय, जकर अभाव ई आरम्भिक कृति में स्वाभाविक हय। 'प्रथम' आ 'मौलिक' जइसन पद खातिर बेसी कठोर पाठालोचन, पाण्डुलिपि-अध्ययन आ प्रकाशन-इतिहास जरूरी हय; निष्कर्ष अगर सीमित सामग्री पर आधारित हो, त अनुमान के प्रमाण के स्थान न लेवे के चाही।
सीमा ७: आत्मीयता-जनित प्रशंसा के अतिरेक आ आलोचनात्मक दूरी के अभाव
अनेक निबन्ध में — विशेषतः लक्ष्मीपति सिंह, मोहन आ राजेश्वर झा-सम्बन्धी अध्याय में — समीक्षक आ विवेच्य रचनाकार के बीच व्यक्तिगत आत्मीयता समीक्षा के संस्मरणात्मक श्रद्धाञ्जलि के रूप दऽ दे हय। मोहन के स्मरण, लक्ष्मीपति सिंह के विहुँसै आकृति के भावुक चित्रण, राजेश्वर झा के निधन के शोक — ई सब भावनात्मक रूप में मार्मिक त हय, मुदा एही से आलोचनात्मक दूरी भङ्ग होय हय। वस्तुनिष्ठ समीक्षा के दृष्टि से ई प्रशंसा-पूर्वाग्रह हय, जे मूल्याङ्कन के निष्पक्षता के प्रभावित करै हय। अपवाद-स्वरूप हरिमोहन झा-सम्बन्धी निबन्ध में समीक्षक जे आलोचनात्मक साहस देखाबै हथिन, से समस्त संग्रह में समान रूप में उपस्थित न हय। जीवनी कहीं-कहीं कृति के विश्लेषण पर आ विषयवस्तु रूप-सौन्दर्य पर भारी पड़ै हय।
सीमा ८: समान्तर इतिहास-प्रतिमान के अपूर्ण सैद्धान्तिकीकरण
अन्त में, विदेह समान्तर इतिहास-प्रतिमान के दृष्टि से सबसे बेसी मौलिक सीमा ई जे रमानन्द झा समान्तर इतिहास के अवधारणा के व्यवहार में त जीयै हथिन, मुदा ओकरा सिद्धान्त के रूप में स्पष्टतः प्रतिपादित न करै हथिन। 'दू कोटि के साहित्यकार' के सिद्धान्त एकर सबसे बेसी निकट हय, मुदा ओ मुख्यधारा के कैनन के — जयकान्त मिश्र के इतिहास के — विकल्प वा विरोध न, बल्कि ओकर पूरक बनि रह जाय हय। समीक्षक बेर-बेर जयकान्त मिश्र के प्रामाणिक आधार मानके हुनकहि सूचना पर आश्रित रहै हथिन, जब कि समान्तर इतिहास के असली दायित्व मुख्यधारा के कैनन के आधार-मान्यता के खुद प्रश्नाङ्कित करब हय। तात्पर्य — 'अखियासल' समान्तर इतिहास के सामग्री त प्रस्तुत करै हय, मुदा ओकर सैद्धान्तिकी अविकसित छोड़के दे हय। ई कैनन के विस्तारित करै हय, मुदा कैनन-निर्माण के शक्ति-संरचना के विखण्डित न करै हय। इहे ओ कार्य के रिक्तता हय जकरा विदेह-आन्दोलन अपन घोषित सैद्धान्तिकी, संस्थागत अभिलेखीकरण आ जनतान्त्रिक समावेशिता से पूर्ण करे के प्रयास करै हय।
साथे ई भी कहे के चाही जे मातृभाषा-प्रेम पोथी के ऊर्जा हय, मुदा कतको स्थान पर ई प्रेम सांस्कृतिक गौरववाद वा बाहरी प्रभाव के प्रति अत्यधिक संशय में बदलि जाय हय — जब कि भाषा सदैव सम्पर् के, मिश्रण आ परिवर्तन से विकसित होय हय; आ राष्ट्रीय वा सांस्कृतिक आस्था कहीं-कहीं प्रश्नरहित मूल्य बन जाय हय।
समग्र आलोचनात्मक निर्णय
पोथी के प्रमुख उपलब्धि
'अखियासल' के सबसे बेसी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हय — साहित्यिक इतिहास के विस्मृत स्थान सभ पर प्रकाश देब। ई पोथी पूछै हय —
मैथिली कथा के वास्तविक आरम्भ कतय से मानल जाय?
प्रभाव आ अनुवाद में की अन्तर हय?
'प्रथम' कृति निर्धारित करे के प्रमाण की हो?
दुर्लभ पाण्डुलिपि इतिहास से कोना बाहर हो जाय हय?
पत्रिका, सम्पादक आ प्रकाशक साहित्य निर्माण में की भूमिका निभावै हथिन?
राष्ट्रीय आन्दोलन में मैथिली साहित्यकार के योगदान काहे विस्मृत भेल?
हास्य के लोकप्रियता के भीतर सामाजिक अन्याय ओझल त न?
भाषिक शुद्धता आ भाषिक विकास के बीच कोन सम्बन्ध हय?
स्वतन्त्रता के बाद गरीब, बेरोजगार आ श्रमिक के जीवन काहे न बदलल?
साहित्यकार के वैयक्तिक अनुभव कोना सामाजिक अनुभव बनै हय?
ई प्रश्न पोथी के साधारण व्यक्तित्व-कृतित्व सङ्ग्रह से ऊपर उठावै हय।
भारतीय साहित्यशास्त्र के दृष्टि से
पोथी रस के सामाजिक विस्तार करै हय। करुणा खाली पात्र के दुःख पर आँसू बहायब न, दुःख के सामाजिक कारण खोजब हय। वीरता खाली रणभूमि में न, मातृभाषा-रक्षा, सत्य के पक्ष आ शोषण-विरोध में हय। हास्य खाली मनोरञ्जन न, सत्ता आ रूढ़ि के मुखौटा उतारे के साधन हय। ध्वनि-सिद्धान्त के अनुसार अनेक कृति के भीतर प्रत्यक्ष कथा से बेसी महत्त्वपूर्ण अप्रत्यक्ष सामाजिक अर्थ हय। औचित्य-सिद्धान्त लेखक के इतिहास के दावा, विधागत नामकरण आ चरित्र के विश्वसनीयता परखबा के आधार दे हय। मुदा शास्त्रीय निकष पर मुख्यधारा के अनेक आरम्भिक रचना के सीमा भी साफ होय हय — नीति आ उपदेशक भरमार से रसभङ्ग, अभिधा के प्राधान्य से ध्वनि के क्षय, आ नारा बनै कविता में वक्रोक्ति के विनाश।
पाश्चात्य सिद्धान्त के दृष्टि से
'अखियासल'में नव-इतिहासवादी आ मार्क्सवादी प्रवृत्ति विशेष प्रखर हय। साहित्य सत्ता, धन, जाति, भाषा, संस्था आ सामाजिक आन्दोलन से जुड़ल हय। ललित आ धीरेन्द्र के कथा-विवेचन अस्तित्वगत संकट, वर्गीय शोषण आ आधुनिक मनुष्य के निरर्थकता उद्घाटित करै हय। नारीवादी दृष्टि उपस्थित हय — विशेषतः 'निर्दयी सासु', 'सुमति' आ 'चन्द्रग्रहण' के विवेचन में — मुदा ओकर पूर्ण सम्भावना (जइसन हरिलता के प्रतिरोधी पाठ) अविकसित रह जाय हय। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि से मातृभाषा-विमुखता, हिन्दी-अंग्रेजी के प्रभुत्व आ मैथिली के सार्वजनिक क्षेत्र से निष्कासन पोथी के स्थायी चिन्ता हय।
विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से
'अखियासल' मैथिली साहित्य के वैकल्पिक वंशावली बनावै हय। ई वंशावली में —
श्रीकृष्ण ठाकुर आ 'चन्द्रप्रभा',
जीवछ मिश्र आ 'रामेश्वर',
रासबिहारी लाल दास आ 'सुमति',
जनसीदन आ बिसरल जनार्दन झा जइसन साहित्यसेवी,
त्रिलोचन झा जइसन मातृभाषानुरागी,
यदुवर आ द्विजवर जइसन जागरणकारी कवि,
हरिलता जइसन संघर्षशील कवीश्वरी,
लक्ष्मीपति सिंह जइसन सम्पादक,
मधुप आ मोहन जइसन गीतकार,
यात्री जइसन स्तम्भकार,
व्यास जइसन भाषिक शुद्धतावादी,
राजेश्वर झा जइसन संस्था-निर्माता,
किरण, ललित, धीरेन्द्र आ प्रभास जइसन सामाजिक कथाकार
— एके विस्तृत इतिहास में स्थान पावै हथिन। ई इतिहास मिथिला के राजवंश वा पाण्डित्य के केन्द्र खाली न मानै हय। ई मिथिला में भूखल बालक, अत्याचारित पुतोहु, बेरोजगार युवक, शोषित किसान, मातृभाषा-विहीन शिक्षित वर्ग, मुद्रणालय के श्रमिक आ विस्मृत सम्पादक सब उपस्थित हथिन।
उपसंहार: आरम्भ के गरिमा आ रिक्तता के उत्तराधिकार
'अखियासल' के महत्त्व अन्तिम निर्णय देबा में न, मैथिली साहित्य के इतिहास पर पुनर्विचार करबा में हय। ई पोथी प्रतिष्ठित इतिहास के सामने वैकल्पिक प्रश्न रखै हय। लेखक साहित्य के चमकै शिखर खाली न देखै हथिन; ओ नीचे दबाओल ईंट, टूटल पाण्डुलिपि, पुरान पत्रिका, भूखल पात्र, उपेक्षित भाषा आ विस्मृत साहित्यसेवी के भी देखै हथिन। पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुर से लेके प्रभास कुमार चौधरी तक साहित्य में यथार्थवाद, राष्ट्रवाद आ समाज-सुधार के क्रमिक विकास दृष्टिगोचर होय हय, आ साथे — जब ई पूरा रचना-संसार के समान्तर इतिहास-दृष्टि, नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसा आ पाश्चात्य-भारतीय काव्यशास्त्र के कठोर निकष पर कसल जाय हय — तब एकर ढाँचागत, वैचारिक आ सैद्धान्तिक सीमा भी उजागर होय हय: सामन्ती मानसिकता के अवशेष, सुधारवाद के सीमा, पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रह आ वञ्चित वर्ग के प्रामाणिक स्वर के अभाव। साहित्य तखनहि पूरा तरह से समान्तर आ प्रामाणिक बन सकै हय जब ओ राज्याश्रय आ सामन्ती वर्चस्व से मुक्त होके, शोषित के यथार्थ के बिना कोनो हेत्वाभास के, पूर्ण ज्ञानमीमांसीय साहस के संग प्रस्तुत करय।
एकर श्रेष्ठता उहाँ हय जहाँ —
लेखक अभिलेख खोजै हथिन,
प्रचलित भूल सुधारै हथिन,
विस्मृत लेखक के फेर उपस्थित करै हथिन,
सामाजिक जीवन आ साहित्य के सम्बन्ध खोलै हथिन,
प्रशंसा करितो आलोचनात्मक दूरी रखै हथिन,
मातृभाषा आ जनजीवन के साहित्येतिहास के केन्द्र बनावै हथिन।
एकर सीमा उहाँ हय जहाँ —
अनुमान प्रमाण के स्थान ले हय,
जीवनी कृति के विश्लेषण पर भारी पड़ै हय,
विषयवस्तु रूप-सौन्दर्य के ढाँकि दे हय,
मूल्य-मानदण्ड अस्थिर हो जाय हय,
राष्ट्रीय वा सांस्कृतिक आस्था प्रश्नरहित मूल्य बन जाय हय,
स्त्री, दलित आ निम्नवर्ग के आत्मस्वर पर्याप्त स्वतन्त्रता न पावै हय।
समग्र मूल्याङ्कन के निष्कर्ष ई जे 'अखियासल' अपन युग के एक अग्रगामी, साहसी आ ऐतिहासिक दृष्टि से अपरिहार्य कृति हय, जकर मौलिकता ओकर सीमा से अभिन्न रूप में जुड़ल हय। एकर गुण — प्रथम-अन्वेषण के साहस, बिसरल रचनाकार के पुनरुद्धार, समाजशास्त्रीय अन्तर्दृष्टि, 'दू कोटि के साहित्यकार' के मौलिक सिद्धान्त, आ मैथिली साहित्येतिहास के व्यक्ति-केन्द्रित कैनन से मुक्त के जन-केन्द्रित बनावे के प्रयास — ई सब एकरा मैथिली आलोचना के एक कोसिला-प्रस्तर बनावै हय। साथे एकर सीमा — संकलनात्मक असंगति, मूल पाठक अनुपलब्धता, मूल्य-मानदण्ड के अस्थिरता, सैद्धान्तिक अनुशीलन के अभाव, परिप्रेक्ष्य के संकीर्णता, पाठ-प्रामाणिकता के संकट, आत्मीयता-जनित पूर्वाग्रह आ समान्तर इतिहास के अपूर्ण सैद्धान्तिकीकरण — ई सब कोनो व्यक्तिगत न्यूनता न, बल्कि ओ मुद्रण-सीमित, डिजिटल-पूर्व, संस्था-विहीन युग के संरचनात्मक बाध्यता के प्रतिफल हय।
इहे द्वैध — गुण आ सीमा के अभिन्नता — 'अखियासल' के विदेह समान्तर इतिहास-आन्दोलन के एक पूर्व-रूप बनावै हय। जे रिक्तता के रमानन्द झा नामाङ्कित करै हथिन — सर्वसुलभता, अभिलेखीकरण, पुनर्मूल्याङ्कन — ओ रिक्तता के भरब परवर्ती पीढ़ी के ऐतिहासिक दायित्व बन जाय हय। ई अर्थ में, कृति के सबसे बड़ सीमा इहे ओकर सबसे बड़ उत्तराधिकार हय। 'आँखि' ओ दृष्टि के हय कि बिसरल पाठ के देखे के साहस कैलक, आ 'साल' ओ युग के हय कि में ओ दृष्टि के पूर्ण करे के साधन अनुपलब्ध हल — 'अखियासल' नाम खुद ई द्वैध के व्यञ्जना करै हय। तबो मैथिली आलोचना आ साहित्येतिहास में 'अखियासल' के स्थान महत्त्वपूर्ण हय। ई पोथी इतिहास के बन्द कपाट खोलि कहै हय कि साहित्य के वास्तविक परम्परा खाली प्रसिद्ध नाम के सूची न — ओ स्मृति, विस्मृति, संघर्ष, भाषा, संस्था, पाठक आ जनजीवन के संयुक्त समान्तर इतिहास हय।
परिशिष्ट: संग्रह के अध्याय-सूची (मूल प्रकाशन-स्रोत सहित)
सन्दर्भ-ग्रन्थ-सूची
1. रमानन्द झा 'रमण', अखियासल, भारतीय भाषा संस्थान (सी.आइ.आइ.एल.), मैसूर, १९९५।
2. जयकान्त मिश्र, अ हिस्ट्री ऑफ मैथिली लिटरेचर (मैथिली साहित्य के इतिहास)।
3. करुणाकान्त झा, शोध-प्रबन्ध (मैथिली साहित्य-सम्बन्धी), 'अखियासल'में उद्धृत।
4. गजेन्द्र ठाकुर, अ पैरेलल हिस्ट्री ऑफ मिथिला एण्ड मैथिली लिटरेचर, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, भाग १, https://www.videha.co.in/new_page_1.htm
5. गजेन्द्र ठाकुर, अ पैरेलल हिस्ट्री ऑफ मिथिला एण्ड मैथिली लिटरेचर, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, भाग २७, https://www.videha.co.in/new_page_27.htm
6. गजेन्द्र ठाकुर, अ पैरेलल हिस्ट्री ऑफ मिथिला एण्ड मैथिली लिटरेचर, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, भाग २८, https://www.videha.co.in/new_page_28.htm
7. गजेन्द्र ठाकुर, अ पैरेलल हिस्ट्री ऑफ मिथिला एण्ड मैथिली लिटरेचर, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, भाग ९०, https://www.videha.co.in/new_page_90.htm
8. गजेन्द्र ठाकुर, रचना-सङ्कलन, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, https://www.videha.co.in/gajenthakur.htm
9. मूल निबन्ध सब के प्रथम-प्रकाशन पत्र-पत्रिका: मिथिला मिहिर, मिथिलामोद, भाखा, मैथिली अकादमी पत्रिका, बसात, हालचाल, मैथिली प्रकाश आ अखिल भारतीय मैथिली साहित्य सम्मेलन/परिषद् के स्मारिका (१९७२–१९८९)।
२.२४. गजेन्द्र ठाकुर- हिआओल (केन्द्रीय मैथिली बोली)
‘हिआओल’ : भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त आ विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ विस्तृत आलोचनात्मक आस्वाद
-गजेन्द्र ठाकुर
(डा. रमानन्द झा ‘रमण’, मैथिली आलोचना, अखियासल प्रकाशन, लालगंज, सरिसब-पाही, मधुबनी, २०१२)
१. उपक्रम : पोथी-परिचय आ ’हिआओल’क अर्थ-गरिमा
‘अखियासल’, ‘बेसाहल’ आ ‘भजारल’क अनन्तर डा. रमानन्द झा ’रमण’क ई चारिम आलोचना-संग्रह ’हिआओल’ (२०१२) मैथिली आलोचनाक ओहि विरल परम्पराक कड़ी थिक जाहिमे आलोचना गुटबन्दीक चपेटसँ मुक्त भऽ पाठ, पत्र-पत्रिका आ अभिलेखकेँ प्रमाण मानि चलैत अछि। पोथीक नामकरणेमे लेखकक विनम्र प्रविधिक घोषणा अछि — ‘हिआओल’ अर्थात् थाहल, अन्दाजल। ई शब्द-चयन आत्मश्लाघाक स्थान पर अनुसन्धानक अनन्त सम्भावनाक स्वीकार थिक; क्षेमेन्द्रक औचित्य-सिद्धान्तक भाषामे कही तँ शीर्षकहिमे प्रबन्धौचित्यक बीज रोपल अछि। लेखकीयमे स्वयं स्वीकारल गेल अछि जे ई सभ आलेख मनोरंजक साहित्यक कोटिक नहि थिक, ‘अरबेधि-अरबेधि’ एहन विषयक चयन कएल गेल अछि जकर अध्ययन अपेक्षित छैक मुदा लोक-दृष्टि जतऽ प्रायः नहि जाइत अछि। पण्डित गोविन्द झा आवरण-टिप्पणीमे मार्मिक शब्दमे लिखने छथि जे मैथिली-जगतक आनो नामी आलोचककेँ पूर्वज-साहित्य आ परम्परामे सड़ाइन गन्ध लगैत छनि, मुदा रमणजीकेँ ‘पुरान चाउरक भात टटका दहीक संग’ प्रिय छनि — अर्थात् परम्पराक संरक्षण आ नव मूल्याङ्कन दुनू काज ई पूर्वज-पूजा बूझि करैत छथि। फूलचन्द्र मिश्र ‘रमण’ पुरोवाक्मे उचिते लिखने छथि जे एहि निबन्ध-संग्रहमे आलोचना-प्रत्यालोचनाक संगम अछि आ लेखकक उद्देश्य ककरो प्रतिष्ठाकेँ धूमिल करब नहि, विमर्श हेतु बिन्दु सभ उपस्थित करब थिक — ‘वादे वादे जायते तत्त्वबोधः’।
एहि पोथीमे भाषा-विज्ञान, साहित्येतिहास, प्रत्यालोचना, कथा, कविता, महाकाव्य, लोकगाथा, लोकगीत, पत्रकारिता, प्राकृतिक विपत्ति, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद आ भाषिक उपनिवेशवादसँ सम्बन्धित सत्रह अध्याय समाहित अछि। विषय-सूचीसँ स्पष्ट होइत अछि जे संग्रहक विस्तार ग्रियर्सनक भाषा-अध्ययनसँ आरम्भ भऽ उपनिवेशवादक नव चालि धरि जाइत अछि। सत्रह निबन्धक ई संग्रह तीन वर्गमे सहजहिं बँटि जाइत अछि। पहिल, भाषा-चिन्तन आ भाषा-राजनीति : मैथिली एवं मिथिला भाषाक अध्ययन; रमानाथ झा आ मिथिला भाषा; मैथिली लोकगीत — अवस्था एवं संरक्षण; उपनिवेशवादक नऽव चालि। दोसर, व्यक्ति ओ कृति-केन्द्रित प्रत्यालोचना : प्रत्यालोचक किरणजी; उपेक्षितक आँखिसँ कन्यादान; अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह; यात्रीक भाषा; मनमोहन झाक कथाक अनालोचित पक्ष। तेसर, विधा ओ प्रवृत्ति-केन्द्रित इतिहास-दृष्टि : पत्रकारिताक विकासमे प्रवासीक योगदान; लोकगाथामे दीनाभद्री; मैथिली कथाक विकास — किछु नव तथ्य; कवितामे मिथिलाक भूकम्प; कथी लऽ लगेलिऐ हे कोसी माइ; महाकाव्यमे युग-सन्दर्भ; नऽव गीतमे समाज-चेतना; मैथिली कविताक वर्तमान धारा। एहि त्रिवर्गीय संरचनामे लेखकक समग्र आलोचकीय व्यक्तित्व — भाषाशास्त्री, पाठालोचक, इतिहासकार आ प्रत्यालोचक — क चारू रूप एकहि ठाम भेटैत अछि।
ई पोथी एकरेखीय साहित्येतिहास नहि, अपितु प्रचलित निष्कर्ष सभकेँ प्रश्नांकित करैत अनेक समान्तर आख्यानक संकलन अछि। लेखकक मुख्य प्रवृत्ति अछि — विस्मृत लेखक आ रचनाकेँ पुनः प्रतिष्ठित करब, पूर्ववर्ती आलोचनाक अधूरापन देखायब, लोक आ शिष्टक कृत्रिम विभाजन तोड़ब, मैथिली भाषा-साहित्यक विकासकेँ सत्ता, समाज, भूगोल आ इतिहाससँ जोड़ब, तथा मुख्य इतिहासक पार्श्वमे दबाओल स्त्री, दलित, श्रमिक, प्रवासी, ग्रामीण, बाढ़िपीड़ित आ भाषिक समुदायकेँ दृश्य बनायब। लेखक स्वयं आलोचनाकेँ रचनाक भाषा, शिल्प, तथ्य, कथ्य, पात्र आ चरित्रक गुण-दोषक सूक्ष्म विवेचन मानैत छथि। हुनका लेल आलोचना दोषान्वेषण मात्र नहि, गुणक आलोकन सेहो अछि, आ साहित्यक सृजनसँ बेसी ओकर संरक्षण ओ मूल्याङ्कनकेँ ओ महत्त्व दैत छथि।
२. समीक्षा-पद्धति : त्रिविध कसौटी
प्रस्तुत मूल्याङ्कन तीन कसौटी पर आधारित अछि।
भारतीय काव्यशास्त्रक आधार
पहिल कसौटी भारतीय काव्यशास्त्र थिक — भरतक रस-निष्पत्ति, आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धान्त, कुन्तकक वक्रोक्ति, क्षेमेन्द्रक औचित्य-विचार, साधारणीकरण, लोकमंगल-दृष्टि आ न्यायदर्शनक प्रमाण-मीमांसा (विशेषतः अभाव-प्रमाणक प्रश्न, जे स्वयं रमणजीक तर्क-पद्धतिमे बेरि-बेरि झलकैत अछि)। रस-सिद्धान्त रचनामे अन्ततः उत्पन्न भावानुभूतिक परीक्षा करैत अछि। ध्वनि-सिद्धान्त प्रत्यक्ष कथनक पाछाँ निहित सामाजिक, राजनीतिक आ सांस्कृतिक अर्थ खोलैत अछि। वक्रोक्ति-सिद्धान्त सामान्य कथनसँ हटिकऽ रचनात्मक भाषा, प्रतीक, व्यङ्ग्य आ विचलनक सौन्दर्य देखैत अछि। औचित्य-सिद्धान्त विषय, भाषा, पात्र, प्रसंग आ निष्कर्षक परस्पर संगतिक जाँच करैत अछि। साधारणीकरण देखैत अछि जे व्यक्तिगत अनुभव कोना सामूहिक अनुभव बनैत अछि। लोकमंगल-दृष्टि साहित्यक सामाजिक उपयोगिता, अन्याय-विरोध आ जनहितक मूल्याङ्कन करैत अछि।
पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्तक आधार
दोसर कसौटी पाश्चात्य सिद्धान्त थिक — उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श, नव-इतिहासवाद, समाजभाषाविज्ञान, शैलीविज्ञान, पाठालोचन-शास्त्र, अभिग्रहण-सौन्दर्यशास्त्र (पाठक-अनुक्रिया), मार्क्सवादी ओ निम्नवर्गीय (अधीनस्थ) विमर्श, नारीवाद, दलित-विमर्श आ पर्यावरणीय आलोचना। रूपवादी दृष्टि भाषिक विन्यास, संरचना, प्रतीक, पुनरावृत्ति आ कथन-पद्धतिक विश्लेषण करैत अछि। पाठक-प्रतिक्रिया दृष्टि अर्थकेँ स्थिर नहि मानि पाठकक अनुभवसँ निर्मित मानैत अछि। मार्क्सवादी दृष्टि वर्ग, श्रम, उत्पादन, शोषण आ सत्ता-संरचनाकेँ केन्द्रमे रखैत अछि। नारीवादी दृष्टि स्त्रीक मौन, देह, श्रम, शिक्षा, अधिकार आ प्रतिनिधित्वक परीक्षण करैत अछि। दलित आ अधीनस्थ दृष्टि इतिहासमे दबाओल समुदायक स्वर आ आत्मप्रतिनिधित्व खोजैत अछि। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि भाषा, शिक्षा, ज्ञान आ संस्कृतिपर औपनिवेशिक प्रभुत्वक निरन्तरताकेँ उद्घाटित करैत अछि। नव-इतिहासवादी दृष्टि साहित्यिक कृतिकेँ अपन समयक सत्ता, संस्था, अर्थव्यवस्था आ सामाजिक संघर्षसँ जोड़ैत अछि। पर्यावरणीय आलोचना मनुष्य, नदी, वनस्पति, पशु-पक्षी, भूमि आ विपत्तिक परस्पर सम्बन्ध देखैत अछि।
विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि
तेसर कसौटी विदेह समान्तर साहित्य-इतिहासक दृष्टि थिक, जे राजवंश, दरबार, शास्त्र, प्रतिष्ठित लेखक आ संस्थाक इतिहासक समानान्तर लोकजीवनक इतिहास लिखैत अछि आ प्रतिष्ठान-पोषित प्रतिमानक स्थान पर अनालोचित, उपेक्षित, लोकधर्मी आ अभिलेख-सिद्ध धाराकेँ केन्द्रमे अनैत अछि। एहि दृष्टिमे मिथिला केवल राजनीतिक सीमा नहि, सांस्कृतिक भूगोल अछि; भारत आ नेपालक मैथिली क्षेत्र एक दीर्घ सांस्कृतिक प्रवाहक अङ्ग अछि; इतिहास राजाक संग किसान, स्त्री, दलित, मुसहर, श्रमिक, गायक, पत्रकार, प्रवासी आ विपत्तिग्रस्त जनक सेहो होइत अछि; साहित्यिक इतिहास केवल प्रकाशित पोथीक नहि, लोककण्ठ, व्रतकथा, गीत, अप्रकाशित पाण्डुलिपि आ विस्मृत रचनाकारक सेहो होइत अछि; तथा नदी, बाढ़ि, भूकम्प, पलायन आ भाषिक विस्थापन ऐतिहासिक शक्ति बनि उठैत अछि। ई तेसर कसौटी एहि पोथीक लेल विशेष सार्थक अछि, कारण ‘हिआओल’क अनेक अध्याय — ’अनालोचित कवि’, ‘अनालोचित पक्ष’, ‘उपेक्षितक आँखिसँ’, ‘किछु नव तथ्य’ — स्वयं प्रति-प्रतिमान निर्माणक, अर्थात् समान्तर इतिहास-लेखनक पूर्वाभ्यास थिक। ’हिआओल’क मूल उपलब्धि एही समान्तर इतिहास-बोधमे निहित अछि। एहि मूल्याङ्कनक लगभग आधा भाग अध्याय सभक सीमा-विवेचन पर केन्द्रित अछि — ई स्वयं रमणजीक घोषित सिद्धान्तक अनुकूल थिक जे आलोचना अभिनन्दन-पत्र नहि थिक आ प्रीतिकर होएब ओकरा लेल आवश्यक नहि छैक।
३. अध्यायवार उपलब्धि आ आलोचनात्मक आस्वाद
३.१ मैथिली एवं मिथिला भाषाक अध्ययन
उद्घाटक निबन्ध कोलब्रुक (१८०१)सँ ग्रियर्सन धरिक पश्चिमी भाषा-अध्ययनक कालक्रम प्रस्तुत करैत ई मार्मिक प्रश्न उठबैत अछि जे साहित्य-सर्जनाक सुदीर्घ अविच्छिन्न परम्परा रहितहुँ मैथिलीक व्याकरण सभसँ पछाति किएक लिखल गेल। कोलब्रुकक ई संकीर्ण स्थापना जे मैथिली कोनो समृद्ध भाषा नहि थिक आ एकर कोनो विशिष्ट कवि नहि अछि, तकरा विखण्डित करैत बीम्स (१८७२), केलौग, हार्नले (१८८०) आ अन्ततः ग्रियर्सन (१८८१) कोना मैथिलीकेँ स्वतन्त्र भाषाक रूपमे प्रतिष्ठित कएलनि, तकर मूल अंग्रेजी साक्ष्य सोझाँ राखि लेखक देखबैत छथि जे प्रारम्भिक पश्चिमी अध्ययन मैथिलीक अध्ययन नहि, प्रशासनिक सुविधार्थ ‘नमूना-संकलन’ मात्र छल। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टिएँ ई अध्याय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि — मैकालेक १८३५क टिप्पणी (‘जाहि भाषाकेँ केओ बिना सरकारी पाइक पढ़बा लेल तैयार नहि, ताहि पर खर्च किएक’) आ १८६४क ट्रेवेलियन-टिप्पणीक उद्धरणसँ स्पष्ट होइत अछि जे भाषा-नीति उपनिवेशक उपयोगिताक दासी छल। ‘बिहारी अस्मिताक पहिल उद्भावक जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन छलाह’ — ई व्यंग्य-गर्भित स्थापना नव-इतिहासवादी सूझक उदाहरण थिक, जे नामकरणक राजनीतिकेँ अस्मिताक राजनीतिसँ जोड़ैत अछि। ग्रियर्सन एहिठाम द्वैध व्यक्तित्वक रूपमे उपस्थित होइत छथि : एक दिस हुनकर सर्वेक्षण मैथिलीकेँ स्वतन्त्र पहचान दैत अछि आ हिन्दीक छायासँ मुक्त करबाक दिशामे मैथिलीक स्वतन्त्र ध्वनि-संरचना ओ क्रिया-रूपावलीकेँ प्रामाणिकता दैत अछि; दोसर दिस ‘बिहारी’ सन सामूहिक नाम औपनिवेशिक प्रशासनक सुविधानुसार भाषिक विविधताकेँ एक खाँचामे राखैत अछि।
अध्यायक प्रमुख उपलब्धि ई अछि जे लेखक भाषा-विकासकेँ केवल व्याकरण-लेखनक इतिहास नहि मानैत छथि। ओ कार्यभार आ कार्य-पारदर्शिताक समाजभाषावैज्ञानिक कसौटीसँ मैथिलीक ह्रासक व्याख्या करैत छथि — जाहि भाषाक प्रयोग प्रशासन, शिक्षा, न्याय, व्यापार आ सार्वजनिक जीवनमे घटैत अछि, ओकर सामाजिक सामर्थ्य सेहो घटैत अछि। कर्णाट-शासनमे मैथिलीक राजकाजक भाषा रहबाक अभिलेखीय प्रमाण, नेपालक राजकीय अभिलेख, तथा भोलालाल दासकेँ कहल गेल ओ प्रसिद्ध वाक्य (‘मैथिलीकेँ स्वीकृत कएने मिथिला जीबि उठत…’) — ई सभ बिहार-निर्माणक राजनीतिक अन्तर्कथाकेँ उघारैत अछि। पारम्परिक आ शिक्षाशास्त्रीय व्याकरणक भेद तथा शिक्षाशास्त्रीय व्याकरणक पाँच स्तरक विवेचन मैथिलीमे प्रायः पहिल बेर एतेक व्यवस्थित रूपमे आएल अछि। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ ई अध्याय विशेष महत्त्वपूर्ण अछि, कारण भाषा-इतिहासकेँ राजकीय मान्यतासँ नहि, शिलालेख, लोकव्यवहार, व्याकरण-लेखन आ सांस्कृतिक विस्तारसँ जोड़ल गेल अछि — भाषा राजनीतिक सीमा पार करैत एक सभ्यतागत प्रवाह बनि जाइत अछि।
३.२ रमानाथ झा आ मिथिला भाषा
संग्रहक मेरुदण्ड ई दीर्घतम निबन्ध प्रत्यालोचनाक प्रतिमान थिक। आचार्य रमानाथ झाक जन्मशतवार्षिकी (१९०६–२००६)क बहन्ने हुनका पर जीवन-काल आ मरणोपरान्त लगाओल गेल आरोपक ‘टाल’क अभिलेखीय परीक्षण कएल गेल अछि। शशिनाथ चौधरीक १९३२क परिषद्-प्रतिवेदन सन दुर्लभ साक्ष्यसँ ई सिद्ध कएल गेल जे पटना विश्वविद्यालयमे मैथिलीक स्वीकृति-सम्बन्धी षड्यन्त्रक आरोप तथ्य-सम्मत नहि अछि। चन्दा झाक मिथिला भाषा रामायणक चारिम संस्करणसँ रमानाथ झाक आधा पृष्ठक ’क्षमा-प्रार्थना’ छाँटि देबाक प्रसंग, आ ओकर तुलना सोवियत ’व्यक्तिपूजा’क आरोपमे नेताक शवकेँ समाधिसँ उपाड़बाक घटनासँ — ई प्रत्यालोचनाक तीक्ष्णतम क्षण थिक, जतऽ स्थानीय साहित्यिक राजनीति विश्व-इतिहासक आलोकमे अर्थवान भऽ जाइत अछि।
निबन्धक उत्तरार्धमे रमानाथ झाक अवदानक — अध्यापन, पाठ्यक्रम-निर्माण, अनुसन्धान, भाषा-मान्यता, सम्पादन आ साहित्येतिहास — क व्यवस्थित पुनर्पाठ अछि। रमानाथ झाकेँ मैथिली आलोचनाक केन्द्र-स्तम्भ मानैत रमणजी मिथिला भाषाक प्राचीनताक पाँच ऐतिहासिक साक्ष्यक उल्लेख करैत छथि : कालिदासक विक्रमोर्वशीयक दोहा, प्राकृत पैंगलक वर्णवृत्त, नेपालसँ प्राप्त सहजपन्थी सिद्ध लोकनिक चर्यापद, डाकवचन, आ अवहट्टमे विद्यापतिक रचना। बुद्धवचन-महावीरवचन-अर्धमागधीक विवेचनसँ विदेह जनपदक भाषाक सातत्य, तिरहुता लिपिक व्याप्ति, मानकीकरणक इतिहासमे पण्डित जीवनाथ रायक चिन्ता आ महाराज लक्ष्मीश्वर सिंहक १८८०क ओ ऐतिहासिक आदेश जाहिसँ देवनागरी आ हिन्दीकेँ राजकाजमे प्रवेश भेटलैक आ अन्ततः तिरहुता (मिथिलाक्षर) लिपिक विस्थापन भेल — ई सभ प्रसंग अध्यायकेँ भाषा-राजनीतिक दस्तावेज बना दैत अछि। सभसँ मौलिक अछि हाउगेन आ फर्गुसनक भाषा-प्रबन्धन सिद्धान्तक चारि चरण (चयन, संहिताकरण, प्रकार्य-विस्तार, ग्राह्यता)क कसौटी पर रमानाथ झाक कार्यक पुनर्मूल्याङ्कन — ई देखाएब जे जाहि शास्त्रक जन्महुँ नहि भेल छल, ताहि शास्त्रक प्रक्रियाक अनुरूप रमानाथ झा मैथिलीक भाषा-नियोजन कऽ गेलाह। बहुवाचिकता (द्विभाषिक स्तर-भेद)क अवधारणासँ मैथिल समाजक भाषिक यथार्थक व्याख्या समाजभाषाविज्ञानक मैथिलीमे सफल अवतरण थिक।
भारतीय परम्परामे आलोचककेँ ‘सहृदय’ कहल गेल अछि; एहि अध्यायमे रमणजी सहृदयताक अर्थ अन्धप्रशंसा नहि, ऐतिहासिक न्याय मानैत छथि। हुनकर आग्रह अछि जे व्यक्तिक योगदानक मूल्याङ्कन ओकर समय, संस्थागत कठिनाइ आ उपलब्ध साधनक आधारपर हो। पाठक-प्रतिक्रिया दृष्टिसँ ई अध्याय देखबैत अछि जे एके व्यक्तित्वक मूल्याङ्कन विभिन्न पीढ़ी अलग-अलग ढङ्गसँ करैत अछि — संस्थापक पीढ़ीक श्रम पछिला पीढ़ीक लेल सामान्य सुविधा बनि जाइत अछि, फलतः मूल संघर्ष विस्मृत भऽ जाइत अछि। विदेह समान्तर इतिहासक स्तरपर अध्याय ई प्रश्न उठबैत अछि जे मैथिली भाषा-साहित्यक संस्थागत निर्माण केना भेल : विश्वविद्यालय, पाठ्यक्रम, साहित्यिक संस्था आ व्यक्तिगत विद्वत्ता एक-दोसरसँ जुड़ल छल; अतः साहित्यिक इतिहास केवल प्रकाशित रचनाक इतिहास नहि, संस्था-निर्माणक इतिहास सेहो अछि।
३.३ प्रत्यालोचक किरणजी
ई निबन्ध ‘प्रत्यालोचना’ पदकेँ मैथिली आलोचना-शास्त्रमे सैद्धान्तिक प्रतिष्ठा दैत अछि — आलोचनाक आलोचना, जे लेखकक अनुसार समाजक वैचारिक गतिशीलता आ जीवन्तताक लक्षण थिक। डा. काञ्चीनाथ झा ’किरण’क आलोचकीय व्यक्तित्वक त्रिविध विश्लेषण (लोक आलोचक, साहित्यिक आलोचक, प्रत्यालोचक) आ रचनाकारक तीन कोटिक वर्गीकरण (युगातीत, युगानुगामी, सचेत विपक्षी) पद्धति-सजग आलोचनाक परिचायक अछि। किरणजीक नव स्थापना सभक — वर्णरत्नाकर काव्य-ग्रन्थ थिक, लोकसाहित्य शिष्ट-साहित्यसँ पैघ, विद्यापति स्वाधीनताकामी सेनानी, तथा चन्दा झाक स्थान पर अकाली कवि फतूर लाल नवयुगक प्रवर्तक — सहृदय प्रस्तुतिक संगहि हुनक अन्तर्विरोधक निर्मम उद्घाटन सेहो अछि : जे किरणजी रमानाथ झाक राधाकृष्ण-विषयक मतक तीव्र खण्डन करैत छथि, वैह अन्यत्र विद्यापतिक नायिकाकेँ राजदरबारी संस्कारक कल्पित पात्र कहि प्रकारान्तरसँ ओही मतक समर्थन कऽ दैत छथि। कुलानन्द मिश्रक चन्द्रग्रहण-टिप्पणीक प्रसंगमे लेखकक ई सूत्र-वाक्य आलोचना-नीतिशास्त्रक निष्कर्ष जकाँ अछि जे कृतिमे व्यक्त विचारक विवेचन ने भक्त जकाँ हो, ने अपन मतवादकेँ रचनाकार पर आरोपित करैत।
किरणजी जाति, रूढ़ि, अन्धविश्वास, श्रमक अवमानना आ सामाजिक विषमताक विरुद्ध आलोचनात्मक स्वर उठबैत छथि; ’पराशर’क माध्यमसँ श्रम, भूख, जातीय विभाजन, धार्मिक आडम्बर आ स्त्री-पुरुष सम्बन्धक प्रश्न उठाओल गेल अछि, जे आभिजात्य पण्डित-समाजक कौलीनता आ पाँजि-व्यवस्थापर कठोर प्रहार थिक। भारतीय दृष्टिसँ किरणजीक आलोचना लोकमंगलवादी अछि — हुनका लेल साहित्यक श्रेष्ठता ओकर सामाजिक उत्तरदायित्वसँ पृथक नहि। पाश्चात्य मार्क्सवादी दृष्टिसँ हुनकर विचार सामाजिक उत्पादन, श्रम आ प्रभुत्वशाली वर्गक आलोचनासँ जुड़ैत अछि; दलित दृष्टिसँ ओ शास्त्रीय पात्रकेँ निम्नवर्गीय अनुभवक आलोकमे पुनः लिखैत छथि। ’मैथिल आँखि’क अवधारणा एहि अध्यायक मौलिक सूत्र अछि, जकरा ’गुलामी नजरि’क विरुद्ध संघर्षक रूपमे राखल गेल अछि — एकर अर्थ संकीर्ण प्रादेशिकता नहि, अपन भाषिक-सांस्कृतिक अनुभवक आधारपर विश्वकेँ देखब। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिमे ई स्थानीय ज्ञानक पुनर्प्रतिष्ठा आ स्थापित संभ्रान्तवादी इतिहास-लेखनक विरुद्ध निम्नवर्गीय प्रतिरोधक स्वर थिक।
३.४ अपेक्षिताक आँखि छोड़ि, उपेक्षितक आँखिसँ कन्यादान पढ़ल जाए
ई संग्रहक सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण अध्यायमे सँ एक थिक आ अभिग्रहण-सौन्दर्यशास्त्र (पाठक-अनुक्रिया सिद्धान्त)क मैथिलीमे विरल प्रयोग। हरिमोहन झाक पाठकक तीन श्रेणी — मनोरंजनार्थी, हनुमान-चालीसा-भक्त, आ समाज-कथा बूझि पढ़निहार — क विभाजन कऽ लेखक ई देखबैत छथि जे कृतिक अर्थ पाठक-दृष्टिसँ निर्मित होइत अछि। तखन दृष्टि-परिवर्तनक प्रस्ताव अबैत अछि : अपेक्षिता (सी. सी. मिश्र सन शिक्षित वर)क आँखि छोड़ि उपेक्षिता बुच्ची दाइक आँखिसँ उपन्यास पढ़ल जाए। ई नारी-विमर्शक ओ पद्धति थिक जे केन्द्रकेँ हटा हाशियाकेँ केन्द्र बनबैत अछि। प्रचलित हास्यप्रधान पाठकेँ छोड़ि लेखक बुच्ची दाइक मौन, अशिक्षा, भय आ सांस्कृतिक विस्थापनकेँ केन्द्र बनबैत छथि — प्रश्न ई अछि जे बुच्ची दाइ बजैत किएक नहि छथि, हुनकर जीवनक निर्णय दोसर लोक किएक करैत अछि, आ शिक्षित समाज हुनकर मौनक लेल कतेक उत्तरदायी अछि। बुच्ची दाइक निरक्षरता लेल ओ व्यक्तिकेँ नहि, समाजक ’संरचनात्मक निर्माणक दोष’केँ उत्तरदायी मानैत छथि।
सभसँ बलगर पक्ष अछि अभिलेख-प्रथम प्रमाण : जनसीदनक यशोदा (जे रामायण बाँचि लैत अछि), रासबिहारी लाल दासक सुमति, पुण्यानन्द झाक योगमाया, पुलकित मिश्रक मोहिनी — कन्यादानसँ पूर्वक मैथिली उपन्यासक नारी-पात्र निरक्षर नहि, साक्षर छलीह। एहि तथ्य-शृंखलासँ ई क्रान्तिकारी स्थापना निकलैत अछि जे स्त्री-शिक्षाक प्रश्न पर हरिमोहन झा अपन पूर्ववर्ती औपन्यासिक परम्परासँ आगाँ नहि, पाछाँ छथि। मिथिला दर्पणक योगानन्द आ कन्यादानक सी. सी. मिश्रक तुलना, तथा ’अबोधक अपंगताक दोषी अबोध स्वयं की ओकर समाज?’क प्रश्न मानवीय गरिमाक कसौटी पर हास्यक औचित्य-परीक्षा थिक। भाषिक दृष्टिसँ अध्यायक सूक्ष्म निष्कर्ष ई अछि जे शहराती पति आ ग्रामीण पत्नी एके सांस्कृतिक-भाषिक धरातलपर नहि छथि — पतिद्वारा हिन्दीमे संवाद करब स्त्रीक मौनकेँ आरो गाढ़ करैत अछि। नारीवादी आलोचनासँ ई पुनर्पाठ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि : विवाहक हास्यक आवरणक भीतर स्त्रीक वस्तुकरण, भाषिक असमानता, शिक्षा-वञ्चना आ पितृसत्तात्मक नियन्त्रण अछि; बुच्ची दाइ केवल पात्र नहि, अशिक्षित मैथिल कन्याक प्रतीक बनि जाइत छथि। ध्वनि-सिद्धान्तक आलोकमे उपन्यासक हास्यक पाछाँ करुण ध्वनि सुनाइत अछि। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ ई अध्याय प्रतिष्ठित हास्यकृतिक भीतर दबाओल स्त्री-इतिहासकेँ पुनः दृश्य बनबैत अछि।
३.५ अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह
ई अध्याय विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिक बीज-पद्धतिक श्रेष्ठ उदाहरण थिक — ‘अनालोचित’क पुनर्वास। पत्र-पत्रिकामे छिड़िआएल कविताकेँ ’झोड़ि’ कऽ लेखक एक विस्मृत कविक काव्य-संसारक पुनर्निर्माण करैत छथि आ हुनका राष्ट्रीय चेतना, मिथिला-बोध, सामाजिक सुधार, स्त्री-दुःख, बाढ़ि, शोषण आ सांस्कृतिक संकटक कविक रूपमे प्रस्तुत करैत छथि। स्वयं लेखक स्वीकार करैत छथि जे सम्पूर्ण रचनावली उपलब्ध नहि रहने ई आरम्भिक अनुसन्धान अछि। ‘शरदागम’क व्याख्या ध्वनि-सिद्धान्तक व्यावहारिक प्रयोग थिक — पावसक प्रयाण, फुलाएल कास, थीर सरोवर आ विवश पुरन्दरमे १९३५क शासन-सुधार आ जन-आक्रोशक व्यंग्यार्थक उद्घाटन; प्रकृति-वर्णनक अभिधाक भीतर राजनीतिक व्यञ्जनाक ई पाठ आनन्दवर्धनक ’अर्थान्तर-संक्रमित’ ध्वनिक जीवन्त निदर्शन थिक। ‘पछबा’ कविताक विश्लेषणमे पश्चिमी भाषा-संस्कृतिक धुक्कड़सँ भारतीय शब्द-सम्पदाक झड़बाक जे प्रतीक-योजना देखाओल गेल अछि, से सांस्कृतिक साम्राज्यवादक पूर्वाभास जकाँ अछि आ अन्तिम अध्यायसँ एहि निबन्धकेँ जोड़ि दैत अछि — ‘पछबा’ केवल हवा नहि, पाश्चात्य सांस्कृतिक दबावक प्रतीक बनैत अछि, आ शरदागमन औपनिवेशिक शासनक क्षीणताक सङ्केत। ‘नोत पूरब’ सन सांस्कृतिक सन्दर्भ-गर्भित शब्दक टीका, विधवा-विलापक करुण चित्र, आ बाढ़ि-भूकम्पक द्वैध त्रासदीक कवि-साक्ष्य — सभ मिलि एक ‘निरपेक्ष’ किन्तु मैथिली-पक्षधर कविक मूर्ति गढ़ैत अछि। नव-इतिहासवादी दृष्टिसँ कविताकेँ स्वतन्त्र सौन्दर्य-वस्तु नहि, स्वतन्त्रता आन्दोलन, विभाजन, सामाजिक सुधार, बाढ़ि आ सांस्कृतिक संस्थाक गतिविधिसँ जोड़ल गेल अछि; करुण रस विधवा, बाढ़िपीड़ित आ उपेक्षित मिथिलाक चित्रणमे प्रखर होइत अछि। प्रतिष्ठित साहित्येतिहास जाहि कविक पोथी उपलब्ध नहि रहने हुनका पार्श्वमे छोड़ि दैत अछि, रमणजी पत्र-पत्रिकामे बिखरल सामग्रीक आधारपर हुनकर वैकल्पिक साहित्यिक जीवनचरित निर्मित करैत छथि — विस्मृत लेखकक पुनरुद्धारक आदर्श उदाहरण।
३.६ यात्रीक भाषा : शब्दचयन एवं शब्दनिर्माण
शैलीविज्ञानक चारि उपकरण — चयन, विचलन, समानान्तरता आ अप्रस्तुत-विधान — क सहारे वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ (नागार्जुन)क काव्य-भाषाक ई विश्लेषण संग्रहक सर्वाधिक शास्त्र-सम्पन्न आ व्यवस्थित भाषिक अध्याय थिक। यात्रीक काव्यभाषामे देशज, तत्सम, तद्भव आ आगन्तुक शब्दक सर्जनात्मक मेल देखाओल गेल अछि — ‘अपरोजक’ (नाभिपद्मसम्भूत विधाता लेल), ‘ऊत्तुंग खोपा’, ‘तपोवनी’ सन देशी-अनदेशी शब्दक संकर-निर्माण, आ ‘दलकब’ क्रियाक अर्थ-व्यञ्जकताक पद-परीक्षा। प्रत्येक स्थल पर लेखक देखबैत छथि जे पर्यायवाचीमे सँ एकहि शब्द किएक अनिवार्य अछि : एक शब्दक चयन मात्र अर्थ नहि, पात्रक सामाजिक स्थिति, वक्ताक मनोदशा, व्यङ्ग्य आ सांस्कृतिक स्मृतिकेँ व्यक्त करैत अछि। ई विवेचन कुन्तकक वर्ण-विन्यास-वक्रता आ पद-पूर्वार्ध-वक्रताक आधुनिक रूपान्तर जकाँ अछि, आ ’विचलन’क अवधारणा ’निरंकुशाः कवयः’क शास्त्रीय अनुमतिसँ जोड़ल गेल अछि — पूर्व-पश्चिमक ई सेतु-बन्ध दुर्लभ अछि। वक्रोक्ति-सिद्धान्तक दृष्टिसँ व्याकरणिक क्रमक विचलन, असामान्य संयोग आ नूतन शब्दनिर्माण भाषाकेँ सामान्य सूचना-साधनसँ काव्यात्मक अनुभवमे बदलैत अछि; ध्वनि-सिद्धान्तक अनुसार शब्दक कोशगत अर्थसँ अधिक ओकर प्रसङ्गगत व्यञ्जना महत्त्वपूर्ण होइत अछि। गौरी, कार्तिक, गणेश, लक्ष्मी सन पौराणिक पात्रक कोश-स्वीकृत अर्थसँ फराक नव-सन्दर्भीकरणक विश्लेषण, कंकाल-शृंखला आ मामा-गीतमे समानान्तरताक प्रयोग, अप्रस्तुत विधानमे सादृश्य, मानवीकरण आ इन्द्रियबोधक चित्र — सभ यात्री-काव्यक भाषिक वैलक्षण्यक प्रामाणिक कुंजी थिक। यात्रीक ’भाषाक भूगोल’क अवधारणा उल्लेखनीय अछि — कवि अपन भाषा-क्षेत्रक वस्तु, श्रम, रीति, मिथक आ बोलचालसँ परिचित छथि, तेँ हुनकर शब्द केवल सजावट नहि, जीवित जनजीवनक वाहक अछि। यात्रीक भाषा आभिजात्य संस्कृतनिष्ठ मैथिलीक विरुद्ध जनपदीय बहुस्वरताक प्रकटीकरण सेहो थिक।
३.७ मनमोहन झाक कथाक अनालोचित पक्ष
करुणाक कथाकारक रूपमे प्रतिष्ठित मनमोहन झाक कथा-साहित्यक सर्वथा अनालोचित पक्ष — भारतीय राष्ट्रीयता आ मैथिल उपराष्ट्रीयता — क उद्घाटन एहि लघु निबन्धक उपलब्धि थिक। पटना सचिवालय-गोलीकाण्ड (१९४२)क पृष्ठभूमि पर लिखल ‘आहत आत्मा’क नरेन्द्र बाबू, ताजमहलक वैभवक नीचाँ दबल श्रमिक-वेदनाक कथा, ’वीरभोग्या’, ’सप्तपदी’क महाश्वेता आ ’मीनाक्षी’क बलिदान — ई सभ देखबैत अछि जे करुणाक अन्तःसलिला धारक भीतर राष्ट्र-प्रेम आ मिथिला-संस्कृतिक रक्षाक दृढ़ स्वर बहैत अछि। रस-दृष्टिसँ करुण आ वीर रसक समन्वय एहि कथाक मूल शक्ति अछि — पात्रक व्यक्तिगत प्रेम राष्ट्र, मातृभूमि अथवा सांस्कृतिक अस्मिताक लेल त्यागमे परिणत होइत अछि। नव-इतिहासवादी दृष्टिसँ कथाक भावभूमि स्वतन्त्रता आन्दोलन, विदेशी आक्रमण आ मिथिलाक सांस्कृतिक स्मृतिसँ निर्मित अछि। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ मिथिला भारतीय राष्ट्रक विरोधी नहि, ओकर भीतर विशिष्ट सांस्कृतिक इकाई अछि — एहि कारण मैथिल उपराष्ट्रीयता विखण्डन नहि, बहुस्तरीय भारतीयताक रूप बनैत अछि। मनमोहन झाक निधन (२००९)क दसम दिनक भीतर लिखल ई आलेख श्रद्धांजलि आ आलोचनाक मर्यादित संगम थिक।
३.८ मैथिली पत्रकारिताक विकासमे प्रवासीक योगदान
पत्रकारिताक परिभाषा (निर्धारित लक्ष्यक अनुरूप पाठ्य-सामग्रीक निष्पक्ष प्रसार)सँ आरम्भ कऽ लेखक पत्र, पत्रकार आ पत्रकारिताक बीच अन्तर स्पष्ट करैत छथि। हुनकर प्रश्न अछि — मैथिलीमे नियमित, आर्थिक रूपसँ आत्मनिर्भर समाचार-पत्र परम्परा सीमित रहने ‘पत्रकारिता’ शब्दक अर्थ कोना निर्धारित हो? प्रवासी-निवासीक विधिक कसौटी (विदेशी मुद्रा विनिमय अधिनियम)क सोझाँ ओ सांस्कृतिक मिथिलाक अखण्डताक तर्क रखैत छथि — नेपाल-तराइ आ भारतीय मिथिलाक बीच युग-युगक अविच्छिन्न सांस्कृतिक एकसूत्रताक आगाँ राजनीतिक सीमा गौण। प्रवासी मैथिल लोकनि द्वारा जयपुरसँ प्रकाशित ‘मैथिल-हितसाधन’ (१९०५) आ बनारससँ प्रकाशित ‘मिथिलामोद’ (१९०५) सामाजिक शिक्षा, स्त्रीशिक्षा, रूढ़िविरोध, भाषा-संवर्धन आ निर्भीक सम्पादकीय दृष्टिक वाहक बनल; एहि पत्रिका सभक उद्गार-उद्धरण सहित विवेचन ऐतिहासिक दृष्टिएँ बहुमूल्य अछि। सभसँ सूक्ष्म अछि ज्ञान-समाजशास्त्रीय ई विश्लेषण जे सम्पादकीय निर्भीकताक सामाजिक आधार की छल — विद्यावाचस्पति मधुसूदन ओझा आ मम मुरलीधर झा तत्कालीन सत्ता-केन्द्र दरभंगा पर आश्रित नहि छलाह, तेँ स्पष्टवादिता सम्भव भेल। सार्वजनिक क्षेत्रक सिद्धान्तसँ ई पत्र-पत्रिका समाजक वैचारिक संवाद-मञ्च बनैत अछि — मिथिलाक भीतर जे प्रश्न उठाएब कठिन छल, प्रवासक अपेक्षाकृत स्वतन्त्र वातावरणमे ओ प्रश्न निर्भीकतासँ उठल। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ प्रवास सीमा-बाहरक अवस्था नहि, मिथिलाक विस्तृत सांस्कृतिक परिधि अछि — जयपुर, बनारस, अजमेर, कलकत्ता, दिल्ली, नेपाल आदि स्थान मैथिली चेतनाक वैकल्पिक केन्द्र बनैत अछि। पत्रकारिताकेँ आजीविका आ व्यवसायक कसौटीसँ फराक कऽ देखबाक प्रस्ताव मैथिली पत्रकारिताक इतिहास-लेखन लेल एक वैकल्पिक (समान्तर) ढाँचा प्रस्तुत करैत अछि।
३.९ मैथिली लोकगाथामे दीनाभद्री
ई अध्याय पाठालोचन-शास्त्र आ निम्नवर्गीय विमर्शक संगम-स्थल थिक। ग्रियर्सन-संकलित गीत दीनाभद्री (१८८५)केँ मूल-स्रोतक प्रतिष्ठा दैत लेखक ई मार्मिक प्रश्न उठबैत छथि जे परवर्ती विद्वान् अपन-अपन व्यक्तिगत संकलनकेँ आधार बना लिखैत गेलाह, मुदा मूल पाठ आ अपन पाठक अन्तरक हिसाब केओ नहि देलनि — ई साहित्यिक अराजकता थिक; ग्रियर्सनक संकलनकेँ उपेक्षित राखि ‘मूल गाथा अप्रकाशित’ कहब ऐतिहासिक रूपसँ अनुचित अछि। दुनू पाठक तुलनात्मक अध्ययन (सात बनाम तेरह अध्याय, गुलामी जटक भूमिका-भेद, स्वाधीनताक बाद दीनाभद्रीक मुहमे अंग्रेजी शब्दक प्रवेश) लोकगाथाक ‘लोच’-सिद्धान्तक प्रामाणिक निदर्शन थिक — लोककण्ठमे रहैत गाथा वाचक, काल आ श्रोताक अनुसार बदलैत रहैत अछि, आ इएह लोच ओकर जीवनी-शक्ति थिक।
दीना आ भद्री मुसहर जातिक वीर भ्रातृद्वय छथि; जोरावर सिंहक सामन्ती अत्याचारक विरुद्ध हुनक विद्रोह, शौर्य, भ्रातृ-प्रेम, पंचायती लोकतन्त्रमे आस्था (‘पंचसँ निसाफ’) आ शोषक-प्रतिकारक विश्लेषण देखबैत अछि जे नायकत्वक समस्त शास्त्रीय गुण दलित समाजोमे वर्तमान छल — ई स्थापना राजकुल-केन्द्रित नायकत्व-सिद्धान्तक प्रति-कथन थिक। लोकगाथामे जातीय उत्पीड़न, सामाजिक विषमता, साहस, न्याय आ सामुदायिक स्मृति संरक्षित अछि; लोकनायकक महत्ता राजकीय पदसँ नहि, पीड़ित समुदायक रक्षा आ आत्मसम्मानसँ निर्धारित होइत अछि। दलित आलोचनासँ ई अध्याय विशेष उल्लेखनीय अछि — मुख्य इतिहास जाहि समुदायकेँ इतिहासहीन मानैत अछि, ओकर लोकगाथा स्वयं इतिहासक वैकल्पिक अभिलेख बनि जाइत अछि। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिमे दीनाभद्री राजदरबारक नायक नहि, लोककण्ठक नायक छथि — एहि परिवर्तनसँ साहित्यिक आ राजनीतिक स्थानक पुनर्वितरण होइत अछि, आ लोकगाथाक वर्तमान राजनीतिक अवकाश-निर्माणमे भूमिकाक संकेत एकरा समकालीन विमर्शसँ जोड़ैत अछि।
३.१० मैथिली कथाक विकास : किछु नव तथ्य
नव-इतिहासवादी पुनर्लेखनक ई श्रेष्ठ उदाहरण थिक। स्थापित मान्यता — चन्दा झाकृत पुरुषपरीक्षाक अनुवाद (१८८९) मैथिली कथाक प्रस्थान-बिन्दु — क खण्डन तीन कसौटी पर कएल गेल अछि : अनुवादक प्रचार-प्रसारक तत्कालीन असम्भाव्यता, शब्दानुवादक अनाकर्षक भाषा (जयकान्त मिश्र आ रमानाथ झाक साक्ष्य सहित), आ प्रभावित वर्गक अव्यावहारिकता (संस्कृतक अधीत विद्वान् अनुवादसँ प्रेरित किएक होएताह?)। तकर विकल्पमे लेखक मैथिली कथाक आरम्भ केवल मुद्रित आधुनिक कथासँ मानबाक विरोध करैत छथि : ज्योतिरीश्वरक वर्णरत्नाकरमे चौंसठि कलामे परिगणित ‘कथाकौशल’, व्रतकथाक तेसर धारा (मधुश्रावणी, सिरता-बिसता)क वाचिक परम्परा, लोककथा, हास्य-व्यङ्ग्य आ मौखिक आख्यानक दीर्घ परम्पराकेँ आधुनिक कथाक पूर्वपीठिका मानल गेल अछि। रचनात्मक उपलब्धि ई अछि जे लेखक कथा आ कथाकौशलमे भेद करैत छथि — कथ्य एक वस्तु अछि; श्रोताकेँ बान्हि रखबाक भाषा, गति, स्वर, संवाद आ प्रस्तुति दोसर। एहि दृष्टिसँ मौखिक साहित्य अपरिपक्व नहि, अपन स्वतन्त्र सौन्दर्यशास्त्रवाला विधा अछि।
श्रीकृष्ण ठाकुरक चन्द्रप्रभा (रचना १८८०क दशक धरि, प्रकाशन १९३९)केँ मैथिलीक पहिल मौलिक कथाक प्रस्थान-बिन्दु मानबाक प्रस्ताव, ‘चन्द्रभागा’क स्थानपर ’चन्द्रप्रभा’ नामक शुद्धि, ’विलक्षण दाम्पत्य’क विधागत पुनर्निर्धारण आ ’मदनराज चरित’क काल-सम्बन्धी प्रश्न अध्यायक शोधपरक उपलब्धि अछि। चन्द्रप्रभाक रसधज-राजाक कथाक व्याख्या — प्रजापीड़क शासकक विरुद्ध प्रजाक असहयोग आ पलायन — मे १८५७क असफलताक बादक जन-आक्रोशक प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति देखब, फूलबाड़ी आ मालीक प्रतीकक माध्यमसँ प्रजा आ शासनक सम्बन्ध पढ़ब, तथा विद्यासिन्धुक बेंग-कथा (इन्द्र-पृथ्वी-बेंग)मे औपनिवेशिक शोषण आ सत्याग्रही प्रतिरोधक रूपक पढ़ब — ई साहित्य आ इतिहासक पारस्परिक पाठक (नव-इतिहासवादक मूल प्रविधिक) सुन्दर प्रयोग थिक; ध्वनि-दृष्टिसँ राजकथा औपनिवेशिक आ सामन्ती अत्याचारक आलोचना बनि जाइत अछि।
३.११ मैथिली कवितामे मिथिलाक भूकम्प
प्रकृतिक उद्दीपक रूपक वर्णन-बहुल मैथिली काव्य-परम्परामे ध्वंसक रूपक उपेक्षाक सैद्धान्तिक प्रश्नसँ ई निबन्ध खुजैत अछि। एहिमे सन् १९३४ आ १९८८क भूकम्पक काव्यात्मक अभिलेखक अध्ययन अछि। कविवर सीताराम झाक ‘भूकम्प वर्णन’ आ कृष्णनन्दन सिंहक ’कम्पकारिका’क तुलनात्मक अध्ययनमे कम्पकारिकाक ऐतिहासिक प्रलेख-मूल्य (भूकम्प-पूर्व मिथिलाक राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक स्थिति सहित) रेखांकित कएल गेल अछि — ई केवल विनाश-वर्णन नहि, तत्कालीन मिथिलाक राजनीति, अर्थव्यवस्था, भ्रष्टाचार, वस्तु-मूल्य आ पुनर्निर्माणक काव्यात्मक दस्तावेज थिक। अठारह वर्षक वयसमे भोगल त्रासकेँ अड़तीस वर्ष धरि स्मृतिमे जिआ कऽ काव्यबद्ध करबाक मनोवैज्ञानिक टिप्पणी, दरभंगा अस्पताल आ चतुर्भुज स्थानक करुण-व्यंग्य-मिश्रित चित्र, तथा १९८८क भूकम्प-काव्य-संकलनसँ यात्री, चन्द्रभानु सिंह, धीरेन्द्र आ जीवकान्तक साक्ष्य — सभ मिलि आपदा-साहित्यक एक लघु इतिहास बनि जाइत अछि। धीरेन्द्रक पाँतीमे विपत्तिमे मनुजताक एक भऽ जएबाक निरीक्षण करुण-रसक सामाजिक परिणतिक सूचक थिक।
करुण आ भयानक रसक संयोजन एहि अध्यायक केन्द्र अछि। घर, अस्पताल, मन्दिर, बाजार, राजभवन, गरीबक झोपड़ी — सभ विनाशक समान परिधिमे आबि जाइत अछि, मुदा समान प्राकृतिक आघातक सामाजिक परिणाम असमान होइत अछि। पर्यावरणीय आलोचनासँ प्राकृतिक घटना आ सामाजिक निर्मितिक अन्तर स्पष्ट होइत अछि — भूकम्प प्राकृतिक अछि, मुदा कमजोर भवन, सरकारी उपेक्षा, असमान संसाधन आ राहतक राजनीति मानवीय निर्णयक परिणाम अछि। विदेह समान्तर इतिहासमे विपत्ति साहित्यिक इतिहासक वैध विषय बनैत अछि।
३.१२ कथी लऽ लगेलिऐ हे कोसी माइ
बाढ़ि-साहित्यक ई प्रवृत्ति-सर्वेक्षण आरसी प्रसाद सिंहक हाकरोससँ आरम्भ भऽ चन्दा झा, यात्री (कौशिकीक धार), लक्ष्मीपति सिंह, चन्द्रभानु सिंह, सियाराम झा ‘सरस’ आ सुकान्त सोम धरि पसरल अछि। एहि अध्यायमे कोसी आ मिथिलाक अन्य नदी सभकेँ मातृरूप, जीवनदायिनी शक्ति आ विनाशकारी बाढ़ि — तीनू रूपमे देखल गेल अछि। ‘नदी मातृक क्षेत्र’क शास्त्रीय गौरव आ प्रतिवर्षक जल-प्रलय, भूख, विस्थापन, ऋण आ पलायनक यथार्थक बीचक विडम्बनाकेँ लेखक कोसी-माइक लोकगीतीय उपरागसँ जोड़ि दैत छथि — माइक प्रकोप मानि मनौती करैत लोक-मानसक चित्रण सांस्कृतिक अध्ययनक सामग्री थिक। कोसीक ’माइ’ रूप सांस्कृतिक आत्मीयता उत्पन्न करैत अछि, मुदा कवितामे एहि माइसँ प्रश्न सेहो कएल जाइत अछि — भक्ति आ प्रतिरोध एकसाथ उपस्थित अछि। सुकान्त सोमक कवितामे मन्त्रीक हवाई-सर्वेक्षणक व्यंग्य — सुखाएल बाँसक फट्ठी सन आकृति सभक ऊपर उड़ैत विमान आ अखबारमे एकटा हरियर मुस्काइत चेहरा — सत्ता-आलोचनाक तीक्ष्णतम उदाहरणक रूपमे उद्धृत अछि। राहत-सामग्रीक लूट, साँप-मूसक मिलन आ पारिस्थितिकीय क्षतिक प्रसंग बाढ़िकेँ प्राकृतिक आपदासँ आगाँ राजनीतिक-नैतिक प्रश्न बना दैत अछि। पर्यावरणीय आलोचनाक दृष्टिसँ ई अध्याय मनुष्यकेन्द्रित सीमा पार करैत पशु-पक्षी, बगुला, खेत, पोखरि, वनस्पति आ सम्पूर्ण जीव-मण्डलक त्रासदी देखबैत अछि; नदीक प्राकृतिक प्रवाह, बान्ह, तटबन्ध, राहत-व्यवस्था, सरकारी सर्वेक्षण आ भ्रष्टाचार एक जटिल राजनीतिक पर्यावरण बनबैत अछि। विदेह समान्तर इतिहासक दृष्टिसँ बाढ़ि मिथिलाक बाहरी दुर्घटना नहि, ओकर सामाजिक संरचना, लोकगीत, स्मृति, अर्थव्यवस्था आ पलायनक निर्णायक इतिहास अछि।
३.१३ मैथिली महाकाव्यमे युग-सन्दर्भ
पाँच महाकाव्य — सुभद्राहरण (मुंशी रघुनन्दन दास), राधाविरह (मधुप), अगस्त्यायनी (मार्कण्डेय प्रवासी), त्रिपुण्ड (धीरेन्द्र) आ पराशर (किरण) — क चयन पाँच युगीन प्रयोजनक आधार पर कएल गेल अछि : स्वाधीनता-संघर्ष, नारी-सशक्तीकरण, राष्ट्रीय भावात्मक एकता, श्रम-निष्ठ युवा-शक्ति आ मैथिल उपराष्ट्रीयता। पौराणिक कथानकक भीतर समकालीन इतिहास पढ़बाक ई पद्धति — जहलसँ पुत्रक पत्र पाबि लिखल सुभद्राहरणमे असहयोग आन्दोलनक कर-बहिष्कार, अगस्त्यायनीमे भाषा-विवादक समाधान रूपमे शिवक डमरूसँ तमिल-संस्कृतक युगपत् जन्म, पराशरमे ’अन्न थिक प्राण’क श्रम-घोष आ सीताक मुहेँ मिथिलाक लोकतन्त्री गौरव — रूपक-पाठ (अन्योक्ति-व्याख्या)क सफल प्रयोग थिक। नव-इतिहासवादी सिद्धान्तक अनुरूप पुराणक पात्र अपन प्राचीन समयमे बन्द नहि रहैत छथि : अर्जुन स्वतन्त्रता सेनानीक कर्तव्यबोधक प्रतीक बनैत छथि; राधा राष्ट्र आ समाज-सुधारमे स्त्रीक सहभागिताक स्वर बनैत छथि; अगस्त्य उत्तर-दक्षिण समन्वयक वाहक बनैत छथि; त्रिपुण्डमे शिव कृषक आ श्रमिक बनैत छथि; पराशरमे श्रम-प्रतिष्ठा, वर्णभेद-विरोध, भूखक समक्ष कर्मकाण्डक निरर्थकता आ मैथिली अस्मिता व्यक्त अछि। भारतीय काव्यशास्त्रक साधारणीकरण प्रक्रिया एहिठाम स्पष्ट अछि — पुराणक विशिष्ट पात्र आधुनिक जनक सामूहिक आकांक्षाक प्रतिनिधि बनैत छथि। रचना-काल आ प्रकाशन-कालक सावधान अभिलेखन एहि अध्यायकेँ इतिहास-लेखनक दृष्टिएँ सेहो प्रामाणिक बनबैत अछि।
३.१४ नऽव गीतमे समाज-चेतना
‘नऽव गीत’ पदक प्रवर्तन आ परिभाषा एहि निबन्धक सैद्धान्तिक योगदान थिक — ई वयोवर्गक नहि, मूल्यबोधक द्योतक; नवीन गीतक उपरान्त रचल सभटा गीत नऽव गीत नहि। नऽव गीत पारम्परिक रूढ़ कथ्य, मिथ्या गौरव, उपदेशात्मकता आ भावुक विलापसँ हटि आधुनिक सामाजिक विसङ्गति, औद्योगीकरण, महानगरीय त्रास, भूख, बेरोजगारी आ संघर्षकेँ लयात्मक रूप दैत अछि। यन्त्र-युगक उपज मानि एहिमे बुद्धि-तत्त्व आ भाव-तत्त्वक लयात्मक सम्मिश्रणक लक्षण-निर्धारण, आ प्राचीन गीतक गार्हस्थ्य शृंगार, चन्दा झाक भाव-विह्वलता, राष्ट्रीय चेतनावादी अतीत-गान तथा मंचीय तुकबन्दी — चारूसँ एकर सीमा-रेखा खीचब वर्गीकरण-शास्त्रक सुन्दर अभ्यास थिक। नऽव गीतमे बुद्धि आ भावना विरोधी नहि, परस्पर पूरक अछि; निजी दुःख सामूहिक सामाजिक संकटमे साधारणीकृत होइत अछि। गंगेश गुंजनक ’दूभिक पेंपी पर बड़क गाछ पतरब’क प्रतीक-व्याख्या — दलित-शोषितक नव चेतना पर प्रभु-वर्गक पसरब — मार्क्सवादी पाठक संयत प्रयोग थिक; बुद्धिनाथ मिश्रक जेठुआ मकइ आ मार्कण्डेय प्रवासीक फागुन-आह्वानक विश्लेषण नऽव गीतक वैविध्यकेँ प्रमाणित करैत अछि। बालुपर लिखल इतिहास, माटिक डिबिया जकाँ जरैत गाम — ई प्रतीक आधुनिक असमानताक तीव्र ध्वनि उत्पन्न करैत अछि। मार्क्सवादी दृष्टिसँ सुविधा-भोगी वर्ग, विफल विकास-योजना, महानगरक प्रभुत्व आ ग्रामीण दण्डक आलोचना अछि; रूपवादी दृष्टिसँ नूतन प्रतीक, खण्डित बिम्ब आ बोलचालक लय नऽव गीतक वैशिष्ट्य अछि। अध्याय नऽव गीतक विविधताकेँ कमजोरी नहि, जीवित विकासक प्रमाण मानैत अछि।
३.१५ मैथिली कविताक वर्तमान धारा
भुवनेश्वर-संगोष्ठी (२०१२)मे पठित ई आलेख रवीन्द्रनाथ आ सुब्रह्मण्यम भारतीक साक्ष्यसँ भारतीय सामासिक संस्कृतिक पट पर मागधी-प्राच्य परिवारक चारू सहोदरा (असमिया, ओड़िआ, बंगला, मैथिली)क साझा विरासत, विद्यापतिक प्रभाव आ औपनिवेशिक भाषा-सत्ताक इतिहासकेँ स्मरण करैत मैथिली कविताक चारि वर्तमान धाराक निर्धारण करैत अछि : मानवजाति पर आएल संकटक चिन्ता (जीवकान्तक युद्ध-जर्जर शताब्दीकेँ विदाइ), उपभोक्तावादी संस्कृतिक विरोध, सांस्कृतिक साम्राज्यवादक प्रतिरोध (सूचना-महापथ पर एकरेखीय विकासक मत्स्यन्याय), आ जैविक-सांस्कृतिक वैविध्यक क्षरण-चिन्ता (छओ बिगहा आठ कट्ठाक कलम-उजाड़ि, बगुलाक पलायन)। जीवकान्त आ उदयनारायण सिंह ’नचिकेता’क कविताक आलोकमे उपभोक्तावादी दानवताक विरुद्ध मानवक अस्तित्व आ सांस्कृतिक स्वायत्तताक संघर्ष विश्लेषित अछि। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टिसँ सूचना-साधन, बजार, उच्च प्रौद्योगिकी आ सांस्कृतिक प्रभुत्वक सम्बन्ध उद्घाटित होइत अछि — एकर आशय ई नहि जे बाहरी संस्कृतिसँ सम्पर्क वर्जित हो, अपितु एकतरफा प्रभुत्व स्थानीय भाषा, लिपि, जीवन-पद्धति आ कल्पनाशक्तिकेँ समाप्त नहि करए। पर्यावरणीय दृष्टिसँ जैवविविधता, स्थानीय धान, आमक प्रजाति, पोखरि, बगुला आ प्राकृतिक आवासक विनाश आधुनिक कविताक चिन्ता बनैत अछि। आशबीक ’अपेक्षित बहुमुखता’क नियम — परिवेशसँ लड़बा लेल कमसँ कम ओतबे आन्तरिक वैविध्य चाही जतबा परिवेशमे अछि — क प्रयोग मैथिली आलोचनामे व्यवस्था-चिन्तनक प्रवेश थिक, आ ई अस्तित्व-रक्षाक प्रश्नकेँ भावुकतासँ निकालि विज्ञानक धरातल पर आनि दैत अछि। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ मैथिली कविता भारत आ नेपालक साझा भाषिक जीवन, लोकज्ञान आ सांस्कृतिक बहुलताक रक्षा करैत प्रतिरोधक काव्य बनैत अछि।
३.१६ मैथिली लोकगीत : अवस्था एवं संरक्षण
जनकपुरधामक राष्ट्रीय संगोष्ठीमे कार्यपत्र पर टिप्पणी-रूपमे प्रस्तुत ई आलेख ’लोके च वेदे च’क शास्त्रीय समानान्तरतासँ लोक-प्रतिष्ठाक भारतीय आधार जोड़ैत अछि। आरम्भमे लेखक प्रस्तुत आलेखक परिचयात्मक प्रवृत्तिक आलोचना करैत छथि आ माँग करैत छथि जे लोकगीतक केवल सूची नहि, ओकर सामाजिक कार्य, परिवर्तन आ विलुप्तिक कारणक विश्लेषण हो — जाँतक स्थानपर यन्त्र आ ढेकीक स्थानपर मिल आबि गेलापर श्रमगीतक भविष्य की होयत, ई प्रश्न अत्यन्त सार्थक अछि। लोकगीतकेँ लेखक सामूहिक भावात्मक अभिलेख, परम्परागत ज्ञान, औषधीय अनुभव, कृषि-संस्कृति, पारिवारिक सम्बन्ध आ जीवन-संस्कारक भण्डार मानैत छथि — मेथी-हरदिक औषधीय गुण, ’नानीक पीसल मेथी’क सामाजिक अर्थशास्त्र, धोबिनियाँक सोहागक पौराणिक कथा-गुम्फन, तुलसी, बेल, बाँस सन प्रतीक अनुभवसिद्ध लोकज्ञानक अङ्ग अछि। नारीवादी दृष्टिसँ अध्याय विशेष प्रखर अछि : बेटी-जन्मक अवसाद आ भ्रूण-परीक्षा-पूर्वक मरीच-प्रयोगक साक्ष्य, कन्याक सामाजिक अवमूल्यन, पतिद्वारा श्रम-शोषण, दहेज, सासु-ननदक नियन्त्रण आ नवविवाहिताक देहगत आकांक्षा लोकगीतमे सुरक्षित अछि। लगनीक अप्रस्तुत-विधान (लौंगक फूल, यमुनामे जाल)क रस-सजग व्याख्या शिष्ट-लोकक कृत्रिम भेदक खण्डन थिक। संरक्षण लेल यूनेस्कोक अमूर्त सांस्कृतिक सम्पदा-ढाँचासँ चिन्हबाक तीन आ संरक्षणक सात उपायक प्रस्ताव — अभिलेखागार, सङ्ग्रहालय, क्षेत्रीय वर्गीकरण, प्रशिक्षित सङ्कलक, ध्वनि-अभिलेखन आ समुदायकेँ प्रति उपलब्ध करायब — तथा समष्टि-चेतना आ ओगबर्नक सांस्कृतिक-तत्त्व-वैविध्यक सूत्रसँ नेपालक नव लोकतन्त्रमे लोकशक्तिक सांस्कृतिक आधारक तर्क व्यावहारिक नीति-प्रस्तावक स्तर धरि जाइत अछि, जे मैथिली आलोचनामे दुर्लभ अछि। विदेह समान्तर इतिहासमे लोकगीत अशिक्षित समुदायक मनोरञ्जन नहि, समाजक जीवित इतिहास अछि।
३.१७ उपनिवेशवादक नऽव चालि
समापन-निबन्ध उत्तर-औपनिवेशिक चिन्तनक व्यावहारिक शिखर थिक आ राजनीतिक स्वतन्त्रताक बादो भाषिक उपनिवेशवादक निरन्तरता उद्घाटित करैत अछि। तंजानियाक किस्वाहिली-प्रकरणक विस्तृत अध्ययन — स्वाधीनता (१९६२)क बाद शिक्षाक माध्यम बनएबाक संकल्प, आर्थिक संकट, विश्व बैंक आ अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोषक शर्त, निजीकरण, आ ब्रिटिश सहायता-योजनाक माध्यमे अंग्रेजीक पुनःस्थापन — सँ ई सूत्र निकालल गेल अछि जे राजनीतिक उपनिवेश गेलाक बाद भाषिक-सांस्कृतिक उपनिवेश आर्थिक सहायताक नव चालिसँ चलैत अछि। मेडागास्कर, जाम्बिया, मलेशिया आ भारतक (कर्पूरी ठाकुर-प्रसंग सहित) समान्तर दृष्टान्त, तथा एकहि दिन (१९ नवम्बर २००८) पटनामे ब्रिटिश मन्त्रीक बालिका-विद्यालय आ अमेरिकी दूतावासक महिला-महाविद्यालय गमनक सूक्ष्म पाठ — जे स्त्री-शिक्षाक नव-विकसित क्षेत्रकेँ औपनिवेशिक भाषाक प्रभाव-क्षेत्र बनएबाक सुनियोजित चालि थिक — विचारोत्तेजक अछि।
उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टिसँ लेखकक प्रमुख स्थापना अछि — राज्यसत्ता छोड़ि देब मात्र उपनिवेशवादक अन्त नहि; शासनक भाषा, ज्ञानक मानदण्ड, शिक्षाक माध्यम आ रोजगारक प्रवेश-द्वारपर अधिकार बनल रहला धरि औपनिवेशिक सत्ता नव रूपमे जीवित रहैत अछि। भारतमे अंग्रेजी माध्यमक निजी विद्यालयक विस्तार, स्थानीय भाषाक प्रति शिक्षित वर्गक हीनताबोध आ घरमे पीढ़ीगत भाषा-संक्रमणक टूटन मैथिलीक लेल दूतरफा संकट उत्पन्न करैत अछि। फिशमैनक भाषा-संक्रमण सिद्धान्तक सूत्र — अन्तरपुस्तीय मातृभाषा-संक्रमणक बिना भाषा-रक्षा असम्भव; जे भाषा अन्तर-पीढ़ीगत रूपसँ संक्रमित नहि होइत अछि, ओकर मृत्यु सुनिश्चित अछि — आ मैथिल परिवारसभसँ पारिवारिक भाषाक रूपमे मैथिलीक उठि जएबाक दृष्टान्त एहि निबन्धकेँ ’मैथिली पर दू तरफा मारि’क चेतावनी-पत्र बना दैत अछि। विदेह समान्तर इतिहासक दृष्टिसँ अध्यायक सर्वाधिक मार्मिक पक्ष पारिवारिक भाषा-विच्छेद अछि — जखन दादा-दादी पोता-पोतीसँ संवाद नहि कऽ पबैत छथि, तखन केवल शब्द नहि, कथा, गीत, संस्कार, लोकज्ञान आ सामूहिक स्मृति सेहो टूटैत अछि।
४. अध्यायवार सीमा, अन्तर्विरोध आ अपूर्णता
रमणजीक अपन घोषित सिद्धान्त थिक जे आलोचना अभिनन्दन-पत्र नहि थिक; व्यक्त विचारकेँ सप्रमाण खण्डित करब वा वैमत्य राखब अवमानना नहि। समीक्षाशास्त्रमे केवल प्रशंसा करब गुटबन्दी आ मित्र-मण्डलीक संकीर्ण दायराकेँ पोसबाक समान अछि। तेँ ओही कसौटी पर, आ ओही आदर-भावसँ, प्रत्येक अध्यायक सीमा, वर्गीय विलोपन आ सैद्धान्तिक अपूर्णताक विवेचन नीचाँ प्रस्तुत अछि। ई सीमा सभ पोथीक मूल्यकेँ घटबैत नहि अछि, अपितु आगाँक अनुसन्धान लेल ’वादे वादे जायते’क द्वार खोलैत अछि।
४.१ मैथिली एवं मिथिला भाषाक अध्ययन : सीमा
पहिल सीमा स्रोत-केन्द्रक थिक। अध्याय मुख्यतः पश्चिमी विद्वान्क (कोलब्रुक, बीम्स, हार्नले, ग्रियर्सन) साक्ष्य पर ठाढ़ अछि; दीनबन्धु झासँ पूर्वक देशी वैयाकरण-चेतना — पाँजि-प्रबन्धक भाषिक अभिलेख, ज्योतिरीश्वर-कालक शब्द-संग्रह-प्रवृत्ति, संस्कृत-टीका-परम्परामे मैथिली-प्रयोगक साक्ष्य — प्रायः अस्पर्शित रहि गेल। फलतः जाहि औपनिवेशिक ज्ञान-मीमांसाक आलोचना निबन्ध करैत अछि, तकरहि स्रोत-सामग्री पर ओ स्वयं आश्रित भऽ जाइत अछि — ई उत्तर-औपनिवेशिक विमर्शक चिर-परिचित आत्म-विरोध थिक। दोसर, औपनिवेशिक ज्ञान-निर्माणक अन्तर्विरोधक पर्याप्त विश्लेषण नहि अछि : ग्रियर्सनक कार्य मैथिलीक पहचानक साधन सेहो छल आ औपनिवेशिक जनगणना, वर्गीकरण आ प्रशासनक उपकरण सेहो; कैम्पबेल (१८७४)क शब्द-संग्रहकेँ केवल प्रशासनिक सुविधा मानब, आ ग्रियर्सन द्वारा कएल गेल औपभाषिक विभाजन — पूर्वी रूपकेँ ‘गँवारी’ आ निम्नवर्गक भाषिकाकेँ ‘जोलहा बोली’ कहब — क वर्ग-विभेदी पक्षकेँ नहि चिन्हब, प्राच्यवादी ज्ञान-संचयक ओहि आलोचनासँ वञ्चित रहि जाइत अछि जे एहि द्वैधताकेँ अधिक गम्भीरतासँ खोलि सकैत छल। तेसर, कार्यभार आ कार्य-पारदर्शिताक सिद्धान्तक प्रयोग आरम्भ तँ भेल, मुदा मैथिलीक विभिन्न प्रक्षेत्र (शिक्षा, प्रशासन, व्यापार, धर्म, संचार)मे प्रयोगक कोनो क्षेत्रवार विवरण वा तुलनात्मक आकलन नहि — सिद्धान्त उदाहरणक (अंग्रेजी, संस्कृत) स्तरहि पर रहि गेल, मैथिलीक मापन नहि भेल। चारिम, ’मानक मैथिली’क निर्धारणमे अन्य उपभाषा-रूपक सामाजिक अधिकारक प्रश्न — मानक कोन शक्ति-संरचनासँ बनैत अछि — अनुत्तरित अछि; भाषाक अवनतिक कारण बाहरी आक्रमण आ प्रशासनिक उपेक्षामे केन्द्रित अछि, मैथिल समाजक आन्तरिक जातिगत विभाजन, शिक्षित वर्गक भाषिक उदासीनता, स्त्रीशिक्षाक अभाव आ आर्थिक संरचनाक भूमिका तुलनात्मक रूपसँ कम विश्लेषित अछि। पाँचम, अंग्रेजी पाद-टिप्पणीक बाहुल्य बिना अनुवादक अछि, आ निबन्धक समापन प्रश्न-शृंखलामे विसर्जित भऽ जाइत अछि — व्याकरण-लेखनक विलम्बक जे कारण-मीमांसा आरम्भ भेल छल, तकर सुगठित निष्कर्ष-सूत्र पाठककेँ स्वयं जोड़ऽ पड़ैत छैक।
४.२ रमानाथ झा आ मिथिला भाषा : सीमा
संग्रहक ई दीर्घतम अध्याय संरचनाक दृष्टिएँ शिथिल अछि — प्रत्यालोचना, जीवनी, भाषा-प्राचीनता, लिपि-विमर्श, मानकीकरण आ भाषा-प्रबन्धन : छह स्वतन्त्र निबन्धक सामग्री एकहि छत्रमे अटकाओल गेल अछि, जाहिसँ तर्कक धार ठाम-ठाम मोथरा जाइत अछि। दोसर, सन्तुलनक घोषित प्रतिज्ञाक बादो स्वर कतोक स्थानपर आलोचनात्मक जीवन-विवेचनसँ अधिक प्रतिरक्षात्मक श्रद्धाञ्जलि बनि जाइत अछि : किरणजीक मत-खण्डनकेँ ‘आवेगात्मक’ आ ‘सुविचारित नहि’ कहल गेल, मुदा विरोधी पक्ष लेल प्रयुक्त लेखकक अपन शब्दावली (‘कौचर्य-प्रवीण’, ‘खिधांस’, ‘लटुआएल-दबकल’) सेहो आवेगसँ सर्वथा मुक्त नहि — प्रत्यालोचक जाहि तटस्थताक माँग करैत छथि, से स्वयं हुनक भाषामे कतहु-कतहु भंग होइत अछि; विरोधी मतक तर्कक निष्पक्ष पुनर्निर्माण नहि कएल गेलापर प्रत्युत्तरक विश्वसनीयता घटैत अछि। तेसर, हाउगेन-फर्गुसनक परवर्ती सिद्धान्तसँ रमानाथ झाक पूर्ववर्ती कार्यक संगति देखाएब जतेक आकर्षक अछि, ततबे कालदोषक जोखिमसँ भरल — ई संगति सप्रयोजन नियोजन छल की आकस्मिक समान्तरता, एकर विवेचन नहि भेल। चारिम, मैथिलीक अत्यन्त प्राचीन अस्तित्व सिद्ध करबाक उत्साहमे महाकाव्य, बौद्धकाल अथवा प्राचीन जनपदसँ सम्बन्धित किछु निष्कर्ष भाषावैज्ञानिक प्रमाणक अपेक्षा सांस्कृतिक अनुमानपर अधिक आधारित बुझाइत अछि — ‘मिथिला’ नामक प्राचीनता स्वतः वर्तमान मैथिली भाषाक अखण्ड रूपक प्रमाण नहि बनैत अछि। पाँचम, रमानाथ झाक अपन सीमा — जेना हुनक शब्दानुवादक नीरसता जकर चर्च दसम अध्यायमे स्वयं लेखक करैत छथि, हुनक मानकीकरण-प्रतिरूपक व्यावहारिक असफलता, वा मानकीकरणमे आभिजात्य वर्गक भाषिक रूपकेँ प्राथमिकता देलासँ आन वर्ग-क्षेत्रक मैथिलीक अवमूल्यनक प्रश्न — एहि अध्यायमे प्रायः मौन अछि; व्यक्ति-समर्थन आ सिद्धान्त-समर्थन एक वस्तु नहि, आ प्रशंसाक आधिक्यसँ चरित्र पूर्ण मानवीय व्यक्तित्वक बदला आदर्शीकृत प्रतिमा बनबाक जोखिममे पड़ैत अछि। छठम, ’साहित्य-पत्र’क बन्द होएबाक आरोपक जे खण्डन अछि, ओ तर्काश्रित बेसी, अभिलेखाश्रित कम — पत्रिकाक अर्थ-व्यवस्था, ग्राहक-संख्या वा बन्द होएबाक प्रत्यक्ष कारणक कोनो दस्तावेज नहि देल गेल।
४.३ प्रत्यालोचक किरणजी : सीमा
पहिल, अध्यायक केन्द्रीय स्थापना — किरणजीक आलोचना मूलतः प्रत्यालोचना थिक, स्वतन्त्र कृति-अवगाहनसँ नहि जनमल — एकटा गम्भीर न्यूनीकरणक जोखिम रखैत अछि; प्रत्यालोचनाक स्वभाव प्रतिक्रियात्मक होइत अछि आ एहि अध्यायमे किरणजीक विचार प्रायः पूर्ववर्ती निष्कर्षक खण्डनक माध्यमसँ सामने अबैत अछि, हुनकर स्वतन्त्र सौन्दर्यशास्त्रीय प्रतिमान अधिक व्यवस्थित रूपमे निर्मित नहि होइत अछि। जे ‘प्रतिक्रियावादिता’क प्रश्न लेखक स्वयं उठबैत छथि, से बिना पूर्ण उत्तरक छोड़ि देल गेल अछि — प्रश्न उठा कऽ ओकर मीमांसासँ बचि जाएब आलोचकीय दायित्वक अधूरा निर्वाह थिक। दोसर, विरोधाभास-प्रदर्शनमे उद्धरण-चयन एकतरफा अछि : किरणजीक जाहि स्थल सभमे आत्म-संशोधन वा मत-परिमार्जन भेल हो, से खोजल नहि गेल; कोनो चिन्तकक चालीस वर्षक लेखनमे मत-भिन्नता विकास सेहो भऽ सकैत अछि, केवल विरोधाभास नहि। तेसर, कुलानन्द मिश्रक चन्द्रग्रहण-प्रसंग अपूर्ण अछि — मिश्रजीक मूल आपत्तिक पूरा तर्क-पक्ष नहि राखल गेल, केवल खण्डनीय अंश उद्धृत भेल। चारिम, सामाजिक न्याय आ लोकमंगलक आग्रह महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा साहित्यकेँ केवल विचारधारात्मक उपयोगितासँ मापल गेलापर रूप, लय, जटिलता, हास्य, विरोधाभास आ कलात्मक स्वतन्त्रताक अवमूल्यन होयबाक आशङ्का रहैत अछि; किरणजीक क्रान्तिकारी वर्ग-दृष्टिकेँ पारम्परिक अलंकारशास्त्रक चौखठिमे बान्हि देलासँ ओकर सामाजिक धार कुनहटएबाक जोखिम सेहो अछि — दूषण-पाँजि आ कौलीनतावादी शुद्धतावादक जाहि आन्तरिक विखण्डनक दिस किरणजीक लेखनक संकेत छल, से पूर्ण विकसित नहि भेल। पाँचम, ’मैथिल आँखि’ स्थानीय दृष्टिक सशक्त अवधारणा अछि, मुदा एकर सीमा स्पष्ट नहि — की ई दृष्टि सभ जाति, लिङ्ग, वर्ग, धर्म आ क्षेत्रक मैथिल अनुभवकेँ समान रूपसँ ग्रहण करैत अछि, अथवा शिक्षित पुरुष-केन्द्रित सांस्कृतिक दृष्टि पुनः ’सम्पूर्ण मिथिला’क नामपर स्थापित होइत अछि? छठम, किरणजीक काव्य-कृति (पराशर सन)क आलोचकीय दृष्टिसँ हुनक आलोचना-गद्यक अन्तर्सम्बन्धक — कवि-आलोचकक द्वैध व्यक्तित्वक — कोनो विवेचन नहि; ई पक्ष तेरहम अध्यायमे फराक चलि गेल, दुनूक सेतु नहि बनल। संगहि, प्राचीन रचना सभमे आधुनिक राष्ट्रीयता, वर्ग-संघर्ष अथवा लोकतान्त्रिक मूल्य खोजैत काल ऐतिहासिक दूरीक सावधानी हरदम नहि राखल गेल अछि।
४.४ कन्यादान-पाठ : सीमा
एहि प्रखर निबन्धक पहिल सीमा थिक प्रश्न-शृंखलाक अनुत्तरता — ‘एकर उत्तरदायी के?’ बेरि-बेरि पूछल गेल (अशिक्षा? माए-बाप? सर-कुटुम्ब? समाज?), मुदा लेखक अपन निर्णय सप्रमाण नहि देलनि; उपेक्षिताक आँखिसँ पढ़बाक जे प्रतिज्ञा छल, से अन्ततः प्रश्नवाचक मुद्रामे स्थगित भऽ गेल। दोसर, कन्यादानक हास्य-रसक पक्ष — जे कृतिक लोकप्रियताक मूलाधार थिक — क रस-शास्त्रीय परीक्षा नहि भेल : हास्यक आलम्बन अबोध बुच्ची थिक की स्वयं अर्ध-शिक्षित समाज, हास्यक भीतर करुणक अन्तर्धारा कोन विन्याससँ बहैत अछि, कथावाचकक दूरी आ विडम्बनात्मक द्वयर्थताक विश्लेषण, तथा पाठकक असहज हँसीक परीक्षण — ई प्रश्न अस्पर्शित रहल; कतोक स्थानपर पुनर्पाठ अभियोग-पत्र बनि जाइत अछि आ साहित्यिक पात्रक प्रत्येक व्यवहारकेँ प्रत्यक्ष सामाजिक यथार्थ मानि लेखक अथवा कृतिक नैतिक दोष निर्धारित करब विधागत रूपसँ जोखिमपूर्ण अछि, कारण कन्यादान हास्य, व्यङ्ग्य, विडम्बना, अतिरञ्जना आ सामाजिक प्रकार-निर्माणक रचना अछि। तेसर, द्विरागमन — जाहिमे हरिमोहन झा स्वयं कथाक उत्तर-पक्ष रचलनि — क चर्चाक अभावसँ मूल्याङ्कन आधा पाठ पर ठाढ़ अछि; उपन्यास-युग्मक समग्र पाठेँ लेखकीय दृष्टिक न्याय भऽ सकैत छल। चारिम, पूर्ववर्ती उपन्यासक साक्षर नारी-पात्रक जे तालिका अछि, ओ मात्रात्मक साक्ष्य थिक — ओहि पात्र सभक साक्षरता कथानकमे कतेक केन्द्रीय अछि आ बुच्चीक निरक्षरता कतेक, एहि गुणात्मक तुलनाक बिना ’पाछाँ हटब’क स्थापना पूर्ण-प्रमाणित नहि कहल जा सकैत अछि। पाँचम, बुच्चीक निरक्षरता स्वयं व्यंग्यक अस्त्र — समाजक आत्म-दर्शनक दर्पण — रूपमे सप्रयोजन रचना तँ नहि थिक, ई प्रश्न छूटल; संगहि बुच्ची दाइक सम्भावित अन्तःचेतना, मौनक प्रतिरोधी अर्थ, स्त्री-समुदायक पारस्परिक सम्बन्ध आ घरेलू ज्ञानक विस्तार पूर्ण रूपसँ विकसित नहि भेल। छठम, पति-पत्नीमे भाषिक असमानताक प्रश्न मूल्यवान अछि, तथापि हिन्दी बोलब मात्र सांस्कृतिक अनात्मीयताक निश्चित प्रमाण मानब सरल निष्कर्ष भऽ सकैत अछि — वर्ग, शिक्षा, नगर-ग्राम दूरी आ वैवाहिक अपरिचयक संयुक्त प्रभावक विश्लेषण अपेक्षित छल।
४.५ अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह : सीमा
लेखक स्वयं स्वीकारैत छथि जे छिड़िआएल कवितामे सँ ‘किछु मात्रे झोड़ि’ सकलाह — ई ईमानदार स्वीकारोक्ति प्रशंसनीय अछि, मुदा एकर परिणाम ई जे निष्कर्ष सभ (निरपेक्षता, अनुदार समकालीनताक शिकार) सीमित नमूना पर ठाढ़ अछि आ सामान्यीकरणक वैधता संदिग्ध रहैत अछि — सीमित आ बिखरल उदाहरणक आधारपर कविक सम्पूर्ण काव्य-दृष्टि निर्धारित करब सावधानी माँगैत अछि। दोसर, कतोक प्राकृतिक प्रतीककेँ प्रत्यक्ष राजनीतिक रूपक मानल गेल अछि — ‘पछबा’ पाश्चात्य संस्कृति आ ‘शरदागम’ औपनिवेशिक क्षयक प्रतीक अवश्य भऽ सकैत अछि, मुदा प्रतीकक ई अर्थ कविताक आन्तरिक संरचना, रचनाकालीन साक्ष्य आ अन्य कवितासँ पुष्ट होयबाक चाही; जीवनीपरक तथ्य आ काव्यार्थ कतोक स्थानपर एक-दोसरमे मिलि जाइत अछि, आ कविक जीवनक राष्ट्रीय वातावरणसँ ई स्वतः सिद्ध नहि होइत अछि जे प्रत्येक प्रकृति-कविता राजनीतिक ध्वनि रखैत हो। तेसर, गद्य-कृति — श्रीचामुण्डा आ पंचवटी उपन्यास — क नाममात्र उल्लेख भेल; ‘अनालोचित’क पुनर्वासक जे प्रतिज्ञा छल, से कविता धरि सीमित रहि गेल आ कविक आधा व्यक्तित्व एहू अध्यायक बाद अनालोचिते रहल। चारिम, विवरण-बाहुल्य अछि — जीवन-वृत्त, पत्रिका-नाम, तिथि — मुदा काव्य-शास्त्रीय विश्लेषण (छन्द-विधान, बिम्ब-योजना, भाषिक स्तर) ’शरदागम’ आ ’पछबा’क बाहर विरल अछि; फलतः लक्ष्मीपति सिंह महत्त्वपूर्ण विचारक रूपमे उभरैत छथि, मुदा कविक विशिष्ट कलात्मक स्वर कम स्पष्ट होइत अछि। पाँचम, कविक दरबारी-सामन्ती परिवेशक सान्निध्यसँ हुनक वर्ग-दृष्टि कोना प्रभावित भेल — पाश्चात्य संस्कृतिक विरोधक संग गामक जमीन्दारी शोषणक विरुद्ध हुनक काव्यमे कोन स्वर अछि — ई वर्ग-प्रश्न अस्पर्शित रहल। छठम, कविक हिन्दी-लेखन आ मैथिली-लेखनक अन्तर्सम्बन्धक प्रश्न — द्विभाषिक कवि-चेतनाक गति — उठाओल नहि गेल, जखन कि पोथीक अन्तिम अध्यायक द्विभाषिकता-विमर्शसँ एकर सोझ संगति बनि सकैत छल।
४.६ यात्रीक भाषा : सीमा
पहिल, चारू उपकरण पश्चिमी शैलीविज्ञानसँ आनल गेल अछि आ भारतीय काव्यशास्त्रसँ संगति-स्थापन (‘निरंकुशाः कवयः’, वक्रोक्ति-सम्प्रदाय) संकेत-मात्र रहि गेल; कुन्तकक छह वक्रता-भेदसँ चयन-विचलनक व्यवस्थित मिलान भेल रहितैक तँ पूर्व-पश्चिम-सेतु पूर्ण बनितैक — से अवसर छूटि गेल। दोसर, उदाहरण चयन मुख्यतः सफल भाषिक प्रयोगपर केन्द्रित अछि आ विश्लेषण-सामग्री मुख्यतः पत्रहीन नग्न गाछ पर; यात्रीक कमजोर, अतिशय कृत्रिम, अस्पष्ट अथवा समयबद्ध शब्दनिर्माणक परीक्षण, तथा हुनक परवर्ती संग्रह आ गद्यक व्यवस्थित समावेश कएल गेल रहितए तँ ’यात्रीक भाषा’क समग्र चित्र आरो सन्तुलित होइत। तेसर, विचलनकेँ कतोक स्थानपर स्वयं सौन्दर्यक प्रमाण मानल गेल अछि, मुदा प्रत्येक व्याकरणिक उल्लङ्घन कलात्मक नहि होइत अछि — औचित्य, प्रसङ्ग, अर्थ-स्पष्टता आ पाठकीय प्रभावक कसौटीपर प्रत्येक विचलनक पृथक परीक्षा आवश्यक अछि। चारिम, ’भाषाक भूगोल’क आकर्षक रूपक अपरिभाषित रहल — एकर मानचित्रण (कोन अंचलक, कोन वर्गक, कोन व्यवसाय-क्षेत्रक शब्द-सम्पदा यात्री कतऽ सँ अनलनि) बिना ई रूपक अलंकारे रहि जाइत अछि, विश्लेषण-उपकरण नहि बनैत अछि; संगहि ’देशज’क गौरव उचित अछि, मुदा भाषा सदा मिश्रित आ परिवर्तनशील होइत अछि — देशज आ आगन्तुकक कठोर विभाजन स्वयं ऐतिहासिक रूपसँ अस्थिर अछि। पाँचम, समानान्तरता-खण्डमे मामा-गीतक उद्धरण दीर्घ अछि मुदा ओकर सामाजिक व्यंग्य-पाठ (मध्यवर्गीय जीवन-वृत्तक विडम्बना) संक्षेपमे निपटा देल गेल — शैली-विश्लेषण अर्थ-विश्लेषणसँ आगाँ भागि गेल; ध्वनि-संरचना, वाक्य-दीर्घता, कथन-स्वर, संवाद, व्यङ्ग्यक बहुस्तर, भाषिक संकरता आ विभिन्न विधामे भाषा-परिवर्तनक पर्याप्त विवेचन सेहो नहि अछि।
४.७ मनमोहन झा : सीमा
ई संग्रहक लघुतम अध्याय थिक आ एकर लघुते एकर मुख्य सीमा थिक। ’अनालोचित पक्ष’क घोषणा भेल, मुदा विश्लेषण कथा-सारक स्तर पर रहि गेल — पात्रक उद्धरण अछि, कथा-शिल्पक (दृष्टिबिन्दु, कथन-भंगिमा, समय-विन्यास, संवाद, कथन-गति, करुणा आ राष्ट्रीयताक रचनात्मक सन्धिक) विवेचन नहि। अध्याय पात्रक कथन, कथावाचकक दृष्टि आ लेखकक विचारमे पर्याप्त भेद नहि करैत अछि — कोनो पात्र राष्ट्र अथवा मिथिलाक लेल आत्मोत्सर्गक बात कहैत अछि, ताहिसँ सम्पूर्ण कथा अथवा लेखकक अन्तिम विचार स्वतः निर्धारित नहि होइत अछि। राष्ट्रीयता आ मैथिल उपराष्ट्रीयताकेँ प्रायः सकारात्मक नैतिक मूल्य मानि लेल गेल अछि — राष्ट्रवादक भीतर जाति, वर्ग, लिङ्ग, धर्म आ क्षेत्रीय प्रभुत्वक सम्भावना प्रश्नांकित नहि भेल, आ उपराष्ट्रीय गौरवक भीतर निम्नवर्गीय समाजक मूल प्रश्न (भूख, बेगारी) ओझल रहि गेल। आत्मबलिदानी स्त्री-पात्र सभक प्रशंसा करैत समय ई पूछब आवश्यक छल जे स्त्रीक स्वाधीनता हुनकर अपन जीवन-चयनमे अछि अथवा पुरुष-निर्धारित राष्ट्र आ संस्कृतिक लेल बलिदानमे — नारीवादी दृष्टिसँ त्यागक महिमामण्डन पितृसत्तात्मक आदर्शकेँ पुनः पुष्ट करि सकैत अछि। करुण-रसक ख्याति आ नव-प्रतिपादित राष्ट्रीय स्वरक अन्तःसम्बन्धक रस-शास्त्रीय मीमांसा — करुणा राष्ट्रीय चेतनाक उद्दीपन बनैत अछि की अवरोध — सर्वथा अस्पर्शित अछि। निधनक दसम दिन लिखल गेलाक कारण श्रद्धांजलिक आर्द्र स्वर आलोचनाक तटस्थता पर भारी अछि; बंगला कथाक प्रभावक जे प्रचलित चर्च अछि, तकर परीक्षण स्थगित रहि गेल।
४.८ प्रवासीक योगदान : सीमा
पहिल, प्रवासी-निवासीक निर्धारण हेतु विदेशी मुद्रा-विनिमय अधिनियमक विधिक कसौटीक प्रयोग साहित्यिक-सांस्कृतिक विश्लेषण लेल अटपटाह अछि — लेखक स्वयं एकर असंगति देखबैत छथि, मुदा तखन अपन वैकल्पिक कसौटी (‘सांस्कृतिक मिथिलाक सघनता’)क कोनो परिचालनीय परिभाषा नहि दैत छथि; नेपाल-तराइकेँ सांस्कृतिक निरन्तरताक कारण ’प्रवास’सँ बाहर रखबाक तर्क भावनात्मक रूपसँ सशक्त अछि, मुदा राजनीतिक सीमा, नागरिकता, प्रशासन, आर्थिक सम्बन्ध आ भिन्न ऐतिहासिक अनुभवक वास्तविकता सेहो विचारणीय अछि। दोसर, प्रवासी पत्रकारिताक इतिहास मुख्यतः शिक्षित पुरुष सम्पादक आ प्रतिष्ठित पत्रिकाक इतिहास बनि रहि जाइत अछि — महिला सम्पादक, मुद्रक, वितरक, पाठिका, आर्थिक सहयोगी, ग्रामीण ग्राहक आ पत्राचार-लेखकक भूमिका बहुत कम देखाइत अछि; संगहि सम्पादक-वर्गक अपन सामाजिक स्थिति — जमीन्दार-संभ्रान्त वर्गक संरक्षण आ ओकर वैचारिक प्रभाव — क वर्ग-विश्लेषण नहि भेल। तेसर, अध्याय आँकड़ा-रहित अछि — कोन पत्रिका कतेक दिन चलल, प्रसार-संख्या, ग्राहक-वर्ग, वितरण-क्षेत्र, अर्थ-स्रोत, नियमितता, प्रतिबन्ध, राजकीय दबाव आ पाठकीय प्रतिक्रिया — पत्रकारिताक इतिहास-लेखन जाहि परिमाणात्मक आधारक अपेक्षा करैत अछि, से एतऽ नहि अछि; पत्रिकाक वैचारिक प्रभावक आकलन मुख्यतः सम्पादकीय सामग्रीसँ भेल अछि। चारिम, स्वाधीनोत्तर कालक सर्वेक्षण असन्तुलित अछि — मिथिला दर्शनक चर्च भेल, मुदा दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ताक परवर्ती पत्रिका-प्रयास ’नाम गनाएब’सँ आगाँ नहि गेल। पाँचम, प्रवासी-योगदानक छाया-पक्ष — प्रवास-जन्य आदर्शीकरण, मिथिलाक यथार्थसँ दूरी, भावुक अतीत-मोह — क आलोचनात्मक परीक्षा नहि भेल; योगदानक अभिनन्दन अछि, योगदानक सीमाक हिआओल नहि। छठम, पत्रकारिता आ साहित्यिक पत्रिकाक सीमा कतोक स्थानपर धुँधला अछि — साहित्यिक विशेषाङ्क, सामाजिक पत्रिका, समाचार-पत्र आ विचार-पत्रक पृथक कार्यपद्धतिक अधिक स्पष्ट वर्गीकरण अपेक्षित छल।
४.९ दीनाभद्री : सीमा
पहिल, पाठ-प्रामाणिकताक जे केन्द्रीय प्रश्न उठाओल गेल — कोन पाठ आधार मानल जाए — तकर समाधान लेखक स्वयं नहि देलनि; समीक्षित पाठक समालोचनात्मक संस्करण (पाठान्तर-सूची सहित) तैयार करबाक जे स्वाभाविक अगिला डेग छल, से प्रस्तावो रूपमे नहि आएल। संगहि लोकगाथाक एक मूल पाठ खोजबाक प्रवृत्ति स्वयं मौखिक परम्पराक बहुरूपतासँ मेल नहि खाइत — प्रत्येक क्षेत्र, गायक, अवसर, जातीय उपसमूह आ पीढ़ी अपन पाठ निर्मित करैत अछि। दोसर, ग्रियर्सनक संकलन महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा औपनिवेशिक सङ्कलक, अनुवादक, लिप्यन्तरक आ सम्पादकक मध्यस्थताक आलोचनात्मक परीक्षण पर्याप्त नहि — घुमन्तू गायकक जीवित प्रस्तुति लिखित पाठमे आबि कतेक बदलल, ई प्रश्न आवश्यक अछि। तेसर, महेन्द्रनारायण राम आ फूलो पासवानक दावाक खण्डनमे जे कठोरता अछि (‘इतिहास-सम्मत नहि’, ‘नकारात्मक दृष्टि’), से हुनक संकलन-श्रमक स्वीकृतिक संग सन्तुलित नहि भेल — प्रत्यालोचनाक जे मर्यादा-सूत्र तेसर अध्यायमे प्रतिपादित अछि, से एतऽ किछु शिथिल अछि। चारिम — आ ई गम्भीरतम — दलित लोकगाथाक विवेचन पूर्णतः अभिजात आलोचकीय स्थितिसँ भेल अछि : मुसहर समुदायक अपन गायक, अपन भगता, अपन वर्तमान वाचिक परम्पराक कोनो प्रत्यक्ष साक्ष्य (क्षेत्र-कार्य) नहि अछि; जाहि तेलुगु दलित-विमर्शक उद्धरण अध्यायमे अछि — जे कहैत अछि जे दलित-विषयमे बाजबाक अधिकार पर स्वयं दलित-स्वरक दावी अछि — तकर आलोक अपनहि पद्धति पर नहि पड़ल; बाहरी आलोचकक व्याख्या आ समुदायक आत्मव्याख्यामे अन्तर भऽ सकैत अछि। दीनाभद्रीक गाथाकेँ प्रेतयोनिसँ मुक्ति आ तीर्थ-पूजा सन सनातनी ढाँचामे राखि पढ़लासँ हुनक स्वायत्त विद्रोही रूपक संस्कृतिकरणक जोखिम सेहो प्रश्नांकित नहि भेल। पाँचम, गाथाक स्त्री-पात्र (निरसो, हिरिया, जिरिया)क भूमिकाक स्वतन्त्र विश्लेषण नहि भेल — निम्नवर्गीय विमर्शक भीतरो नारी-स्वर हाशिये पर रहि गेल; संगहि मुसहर समुदायक आन्तरिक विविधता, अनुष्ठान, प्रस्तुति-सन्दर्भ, आर्थिक परिवर्तन आ वर्तमान राजनीतिक उपयोगक विस्तृत क्षेत्रीय अध्ययन अपेक्षित छल।
४.१० कथाक विकास : सीमा
पहिल, चन्द्रप्रभाक तिथि-निर्धारण (रचना १८८०क दशक धरि) मुख्यतः सम्पादक लक्ष्मीपति सिंहक स्मृति-कथन (‘साठि-सत्तरि वर्ष पूर्वक’) आ जीर्ण-शीर्ण पाण्डुलिपिक वर्णन पर आधारित अछि — पाण्डुलिपि-विज्ञानक कोनो बाह्य कसौटी (कागज, मसि, लिपि-शैलीक काल-निर्धारण)क अभावमे प्रस्थान-बिन्दुक ई पुनर्स्थापन ओतबे दृढ़ नहि अछि जतेक निबन्धक स्वर सुझबैत अछि; जाहि कठोरतासँ रामदेव झाक मदनराज-चरित-विषयक तिथि-भ्रमक खण्डन भेल, ओही कठोरताक प्रयोग अपन पक्षक साक्ष्य पर नहि भेल — ई मापदण्डक द्वैध थिक। दोसर, आत्म-सन्दर्भक सघनता — मैथिलीक आरम्भिक कथा, मिथिला दर्पण, निर्दयी सासु आदि उद्धृत स्रोतक सम्पादक स्वयं लेखक छथि; सम्पादन-श्रम स्तुत्य अछि, मुदा अपनहि सम्पादित सामग्रीकेँ निर्णायक प्रमाण बनएबामे स्वार्थ-संलग्नताक आभास अनिवार्य अछि, जकर कोनो पद्धतिगत निराकरण (स्वतन्त्र साक्ष्यसँ पुष्टि) नहि कएल गेल। तेसर, जलधर झाक ‘विलक्षण दाम्पत्य’क विधागत स्वरूप — रम्य-रचना, समाचार-मूलक गद्य की कथा — क जे विवाद अछि, से अनिर्णीत छोड़ल गेल; ’आद्य कथा मानबाक औचित्य नहि’ कहल गेल मुदा कथात्वक कसौटी (कथानक, चरित्र, परिणति) सूत्रबद्ध नहि भेल — मौखिक आख्यान, व्रतकथा, नीति-कथा, आख्यायिका, उपन्यास आ आधुनिक लघुकथाक विधागत भेद सेहो पर्याप्त कठोरतासँ निर्धारित नहि अछि। चारिम, लुप्त सामग्रीक सम्भावना इतिहासक महत्त्वपूर्ण प्रश्न अछि, मुदा ‘उपलब्ध नहि अछि’सँ ’अवश्य छल’ धरि पहुँचब अनुमानक छलाँग होइत अछि — पाण्डुलिपि, उल्लेख, प्रकाशन-विज्ञापन, पत्राचार आ समकालीन समीक्षा सन बाहरी साक्ष्य आवश्यक अछि; वाचिक कथा-परम्पराक तेसर धाराक स्थापना सेहो रमानाथ झाक प्राचीन कथन पर आश्रित अछि, स्वतन्त्र क्षेत्र-साक्ष्य अनुपस्थित। पाँचम, पुरुषपरीक्षाक अनुवाद प्रभावहीन छल — ई सम्भव निष्कर्ष अछि, मुदा एकर प्रचार, पाठक-संख्या आ प्रभावक अभावक प्रत्यक्ष प्रमाण सेहो सीमित अछि; प्रभाव केवल लोकप्रियतासँ नहि, भाषिक अथवा शैलीगत अनुकरणसँ सेहो निर्धारित होइत अछि। छठम, चन्द्रप्रभाक राजनीतिक प्रतीकात्मक पाठ रोचक अछि, मुदा प्रत्येक राजा-प्रजा कथा औपनिवेशिक प्रतिरोधक रूपक हो, ई निश्चित नहि — सामाजिक नीति-कथा, राजधर्म आ पुरातन उपदेश-परम्पराक सम्भावना समान रूपसँ जाँचल जाएबाक चाही।
४.११ भूकम्प : सीमा
अध्याय द्वि-केन्द्रित अछि — सीताराम झा आ कृष्णनन्दन सिंह — आ १९८८क संकलनक प्रयोग चयनित उद्धरण धरि सीमित; संकलनक समग्र प्रवृत्ति-विश्लेषण (कतेक कवि, कोन-कोन दृष्टि, कोन छन्द-परम्परा) नहि भेल। दोसर, अध्याय कविताकेँ ऐतिहासिक दस्तावेजक रूपमे प्रभावपूर्ण ढङ्गसँ पढ़ैत अछि, मुदा दस्तावेजी मूल्य काव्यात्मक मूल्यपर भारी पड़ैत अछि — छन्द, ध्वनि, गति, विराम, पुनरावृत्ति आ भयानक रसक संरचनाक तुलनात्मक विश्लेषण सीमित अछि; आपदा-वर्णन लेल छन्दक औचित्य-प्रश्न — करुण-रस आ बद्ध-छन्दक सम्बन्ध — अस्पर्शित रहल। तेसर, भूकम्पक लोक-स्मृति — लोकगीत, कहबी, जनश्रुति — सर्वथा छूटल, जखन कि लोकगीत-अध्यायक लेखकसँ एहि स्रोतक उपयोगक अपेक्षा स्वाभाविक छल; शिष्ट काव्य आ लोक-अभिव्यक्तिक तुलनासँ आपदा-स्मृतिक द्विस्तरीय पाठ बनि सकैत छल। चारिम, कम्पकारिकाक ‘धर्मशाला बँचि गेल, काशी-वैद्यनाथ मन्दिर बँचल’ सन पाँतीक जे दैवी-लीला-परक व्याख्या कविक अछि, तकर आलोचनात्मक परीक्षण (भवन-संरचनाक भौतिक कारण बनाम आस्था-पाठ) नहि भेल — आलोचक एतऽ कविक विश्व-दृष्टिक वर्णनकर्ता रहि गेलाह, विश्लेषक नहि बनलाह; धार्मिक विश्वास आ वास्तविक विनाश-वितरणक अन्तर्विरोध पर्याप्त प्रश्नांकित नहि भेल। पाँचम, पीड़ित स्त्री, दलित बस्ती, भूमिहीन मजदूर, अपाङ्ग व्यक्ति आ अनाथ बालकक पृथक अनुभवक खोज कम अछि — राहत-वितरण आ पुनर्वासमे वर्ग-भेद आ जाति-भेद पर रचित लोक-अभिव्यक्ति उपेक्षित रहल; ’सम्पूर्ण मिथिला’क सामूहिक त्रासक भीतर सामाजिक विषमता छिपि सकैत अछि। संगहि भूकम्पक कारण, भूगर्भीय संरचना, राहत-नीति, मृतक-संख्या आ सामाजिक वितरणक ऐतिहासिक स्रोतसँ काव्य-वर्णनक तुलना कएल जाइत तँ साहित्य आ इतिहासक सम्बन्ध अधिक स्पष्ट होइत।
४.१२ कोसी : सीमा
ई अध्याय संग्रहक सर्वाधिक वर्णनात्मक अछि — कवि-दर-कवि उद्धरण-माला अछि, मुदा विश्लेषणक सूत्र पातर। पहिल, बाढ़िक राजनीतिक अर्थशास्त्र — बान्ह-निर्माणक इतिहास, कोसी-परियोजना, नेपाल-भारत जल-सन्धि, गाद, धारा-परिवर्तन, जल-प्रबन्धन, तटबन्धक भीतरक बस्तीक स्थायी विस्थापन — क कोनो चर्च नहि; ‘लोककृत त्रासदी’क पद एक ठाम आएल अछि, मुदा ओकर विस्तार नहि भेल, जाहिसँ बाढ़ि प्रायः नियतिक प्रकोप बनल रहि गेल आ सरकारी नीतिक आलोचना नैतिक रूपसँ प्रभावी मुदा नीतिगत रूपसँ अपूर्ण रहि जाइत अछि। दोसर, कथा-उपन्यासक (पंचवटी, लिली रेक पटाक्षेप, इन्किलाब) मात्र नामोल्लेख अछि — ’बाढ़ि-साहित्य’क जे व्यापक शीर्षक-ध्वनि अछि, से कविता धरि सिकुड़ि गेल। तेसर, लोकगीतक कोसी-उपरागक जे मार्मिक सन्दर्भ शीर्षकहिमे अछि, तकर पाठ-विश्लेषण अत्यल्प अछि — शीर्षक जे वादा करैत अछि, पाठ से पूरा नहि करैत अछि। चारिम, कविताकेँ कतोक स्थानपर प्रत्यक्ष सामाजिक प्रतिवेदनक समान पढ़ल गेल अछि — कवितामे अतिशयोक्ति, प्रतीक, भावात्मक संक्षेप आ वक्ताक काल्पनिकता सेहो होइत अछि; संगहि नदीकेँ ’माइ’ कहब आत्मीय अछि, मुदा मातृत्वक प्रतीक प्राकृतिक विनाशकेँ भाग्य अथवा देवीक कोप मानि राजनीतिक उत्तरदायित्व धुँधला करि सकैत अछि — नदी नहि, अनुचित बान्ह, कमजोर प्रशासन, भ्रष्ट राहत आ असमान बसावट अनेक त्रासदीक कारण होइत अछि, आ शृंगारिक-कारुणिक व्याख्यामे रोमानीकरणक जोखिम रहैत अछि। पाँचम, बाढ़िक बोझ स्त्री, निम्नजाति, भूमिहीन, पशुपालक आ प्रवासी मजदूरपर भिन्न-भिन्न पड़ैत अछि — एहि अन्तरसम्बन्धी विश्लेषणक विस्तार अपेक्षित छल। छठम, बाढ़ि-वर्णनक पुनरावृत्ति-दोष — प्रत्येक वर्ष एकहि अनुभवक एकहि प्रकारक अभिव्यक्ति — क जे संकेत लेखक स्वयं दैत छथि, तकरा कसौटी बना कऽ कविता सभक तारतम्य-निर्णय (के रूढ़ि, के मौलिक) नहि कएल गेल।
४.१३ महाकाव्यमे युग-सन्दर्भ : सीमा
पहिल, पाँच महाकाव्यक चयन प्रयोजन-आधारित घोषित अछि, मुदा बहिष्करणक तर्क अपूर्ण — ‘शेष महाकाव्य युग-सन्दर्भसँ हीन नहि’ कहि आगाँ बढ़ि जाएब चयन-पूर्वाग्रहक प्रश्न खुजल छोड़ि दैत अछि; कीचकवध, दत्तवती वा चित्रा सन कृतिक अनुपस्थितिक कारण-कथन अपेक्षित छल, आ शेष महाकाव्यक उल्लेख मात्रसँ ई निर्धारित नहि होइत अछि जे चुनल कृति सम्पूर्ण परम्पराक पर्याप्त प्रतिनिधित्व करैत अछि। दोसर, तीनू पुरस्कृत महाकाव्यक चयनसँ जाहि प्रतिष्ठान-निरपेक्षताक दावी पोथीक स्वर अछि, ताहिमे व्यवधान अबैत अछि — साहित्य अकादमीक स्वीकृतिक छाया चयन पर देखि पड़ैत अछि। तेसर, युग-सन्दर्भक खोजमे काव्यत्व गौण भऽ गेल — रस-निष्पत्ति, बिम्ब-विधान, छन्द-प्रयोग, महाकाव्यत्वक शास्त्रीय लक्षण (सर्ग-बद्धता, नायक-स्वरूप, व्यापक कथानक, उदात्त शैली, चरित्र-विकास, वर्णन, संवाद) पर प्रायः मौन; फलतः महाकाव्य विचार-वाहक प्रलेख जकाँ पढ़ाएल, काव्य जकाँ कम। चारिम, पुराणक पात्रकेँ आधुनिक स्वतन्त्रता सेनानी, समाज-सुधारक, कृषक अथवा क्षेत्रीय राष्ट्रवादीक रूपमे पढ़ब फलदायी अछि, मुदा ऐतिहासिक वर्तमानवादक जोखिम सेहो अछि — प्राचीन मिथक आधुनिक विचारक सीधा पूर्वरूप नहि। पाँचम, कृतिवार विस्तार असन्तुलित अछि — सुभद्राहरण आ पराशरकेँ जतेक स्थान, राधाविरह आ त्रिपुण्डकेँ ताहिसँ बहुत कम; नारी-सशक्तीकरणक जे स्थापना राधाविरहसँ जोड़ल गेल, से दू-तीन उद्धरणक भरोसे अछि आ विप्रलम्भ-शृंगारक प्रधान रससँ एहि सामाजिक पाठक सम्बन्धक मीमांसा नहि भेल — राधाक कर्तव्य पुनः पति आ राष्ट्रक सेवासँ निर्धारित अछि; स्त्रीक आत्मनिर्णय, देह, कामना आ निजी जीवनक स्वतन्त्र मूल्यपर चर्चा सीमित रहि जाइत अछि। छठम, अगस्त्यायनी आ पराशर सन कृतिमे जाति-संघर्ष आ आभिजात्य व्यवस्थाक जे प्रश्न निहित अछि, तकर सोझाँ-सोझी विखण्डनक स्थान पर ’युग-धर्म’क सामान्य विमर्श धरि रुकि जाएब सामन्ती संरचनाक पूर्ण आलोचनाक अवसर गमा दैत अछि।
४.१४ नऽव गीत : सीमा
पहिल, ’नऽव गीत’क अवधि आ व्याप्तिक निर्धारण अस्पष्ट रहल — कोन तिथिसँ, कोन कृतिसँ एकर आरम्भ मानल जाए, कोन-कोन गीतकार एहि कोटिमे अबैत छथि — एकर कोनो सूची वा काल-रेखा नहि; परिभाषा मूल्यबोध-आधारित अछि, मुदा मूल्यबोधक कसौटी व्यक्तिनिष्ठ रहि गेल, आ एहि परिभाषासँ अनेक आधुनिक कविता स्वतः नऽव गीतक भीतर आबि सकैत अछि — गीतत्वक विशिष्ट कसौटी स्पष्ट नहि। दोसर, साक्ष्य-आधार तीन-चारि गीतकार (गुंजन, प्रवासी, बुद्धिनाथ मिश्र) धरि सीमित — एतेक पातर आधार पर समग्र प्रवृत्ति-निर्धारण आगमन-दोषसँ ग्रस्त अछि; नऽव गीतकारक सामाजिक स्थिति, प्रकाशन-मञ्च, पाठक, पीढ़ीगत अन्तर आ स्त्री-गीतकारक योगदानक विस्तृत मानचित्र नहि बनैत अछि। तेसर, नऽव गीत आ नऽव कविताक भेद-विवेचन सूत्र-रूपमे दऽ विस्तार हेतु अपनहि पोथीक सन्दर्भ देल गेल — आत्म-निर्देशक ई प्रवृत्ति पाठककेँ अपूर्ण तर्कक संग छोड़ि दैत अछि। चारिम, गीतक गीतत्व — गेयता, स्वर-विधान, आरोह-अवरोह, ध्वनि-क्रम, अन्त्यानुप्रास, मात्रा, आवृत्ति, लोक-धुनसँ सम्बन्ध आ सामूहिक गायन-सम्भावना — पर कोनो विचार नहि; ’लयात्मक सम्मिश्रण’क पद आएल, मुदा लय-विश्लेषणक कोनो उदाहरण नहि, जखन कि गीत-विधाक प्राण गेयतेमे बसैत अछि — सामाजिक विषय मात्रसँ रचना गीत नहि बनैत अछि। पाँचम, पारम्परिक प्रेम, भक्ति अथवा प्रकृति-काव्यकेँ कतोक स्थानपर रूढ़ि मानि छोड़ि देल गेल — मुदा आधुनिकता केवल विषय-परिवर्तन नहि; पुरान विषयक नूतन संवेदना आ रूपान्तरण सेहो आधुनिक होइत अछि। छठम, वर्तमान युगमे नव माध्यम — ध्वनि-दृश्य मञ्च, अन्तर्जाल आ ई-पत्रिका — सँ भऽ रहल गीतक लोकतन्त्रीकरणक चर्च नहि अछि; गीत-विमर्श पारम्परिक मुद्रित संकलनक सीमामे रहि गेल।
४.१५ वर्तमान धारा : सीमा
पहिल, ई व्याख्यान-पाठ थिक आ ओकर श्रोता-सापेक्षता निबन्धमे बनल रहि गेल — पूर्वांचलीय भाषा-बन्धुत्वक दीर्घ भूमिका (जे भुवनेश्वरक सभा लेल सार्थक छल) पोथीक पाठक लेल विषयान्तर जकाँ लगैत अछि आ ‘वर्तमान धारा’क मूल विवेचन लेल स्थान घटा दैत अछि। दोसर, ’वर्तमान धारा’क चारू विषय अत्यन्त व्यापक अछि — मानव-संकट, उपभोक्तावाद, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद आ पर्यावरण लगभग सम्पूर्ण आधुनिक साहित्यकेँ समेटि सकैत अछि; काव्य-आन्दोलन, पीढ़ी, रूप, भाषा आ सौन्दर्यबोधक आधारपर अधिक सूक्ष्म वर्गीकरण अपेक्षित छल, आ धारा-विभाजनक पारस्परिक अतिच्छादन (उपभोक्तावाद आ सांस्कृतिक साम्राज्यवाद कतऽ फराक?) पर विचार नहि। तेसर, चारू धाराक साक्ष्य-घनत्व असमान अछि — मानव-संकट आ सांस्कृतिक साम्राज्यवादक धारा सुसाक्षित, मुदा उपभोक्तावाद-विरोधक धारा एक-दू उद्धरण पर; चुनल कविताक संख्या सीमित अछि आ ताहिपर आधारित व्यापक निष्कर्ष सम्पूर्ण वर्तमान मैथिली कविताक प्रतिनिधित्वक दावा पूर्ण रूपसँ सिद्ध नहि करैत अछि। चारिम, वर्तमान धाराक सूचीमे नारी-स्वर आ दलित-स्वरक अनुपस्थिति खटकैत अछि — जाहि आलोचकक अपन पोथीमे उपेक्षिता आ दीनाभद्री पर स्वतन्त्र अध्याय अछि, हुनक वर्तमान-धारा-चित्रणमे ई दुनू धारा नहि गनाएब आन्तरिक संगतिक अभाव थिक; स्त्रीवादी, दलित, आदिवासी, प्रवासी, अन्तर्जालीय आ प्रयोगधर्मी कविताकेँ पृथक वर्तमान धाराक रूपमे पर्याप्त स्थान नहि भेटल, आ विमर्श मुख्यतः प्रतिष्ठित केन्द्रक कवि धरि सीमित रहि गेल। पाँचम, नेपालक मैथिली कविताक भिन्न प्रवृत्तिक जे संकेत अछि (’राजतन्त्रक भयसँ भिन्न रहल’), तकर एकोटा उदाहरण नहि — स्थापना निराधार लटकल अछि। छठम, सांस्कृतिक साम्राज्यवादक विवेचन कतोक स्थानपर स्थानीय संस्कृति बनाम बाहरी संस्कृतिक द्वैत बना दैत अछि — संस्कृति सदैव आदान-प्रदान, मिश्रण, ग्रहण आ प्रतिरोधसँ विकसित होइत अछि; प्रत्येक बाहरी प्रभाव विनाशकारी नहि आ प्रत्येक स्थानीय परम्परा मुक्तिकामी नहि।
४.१६ लोकगीत : सीमा
पहिल, ई स्वतन्त्र निबन्ध नहि, कार्यपत्र पर टिप्पणी थिक आ एकर संरचनामे से झलकैत अछि — आरम्भमे कार्यपत्रक पद्धति-दोषक चर्च, बीचमे स्वतन्त्र लोकगीत-विमर्श, अन्तमे नीति-प्रस्ताव; तीनू खण्डक सन्धि शिथिल अछि। दोसर, यूनेस्को-ढाँचाक सात संरक्षण-उपायक जे सूची अछि, से प्रायः अनूदित-प्रतिध्वनित अछि — मैथिली लोकगीतक विशिष्ट स्थिति (के गाओत, कोन पीढ़ी, कोन अवसर बँचल अछि, कोन मरि रहल अछि)क क्षेत्र-सर्वेक्षण बिना ई उपाय-सूची यान्त्रिक अनुप्रयोग बनि गेल; संगहि अभिलेखागार, सङ्ग्रहालय आ वर्गीकरण आवश्यक अछि, मुदा जीवित लोकगीतकेँ स्थिर नमूनामे बदलि देबाक खतरा रहैत अछि — लोकगीतक जीवन गायन, अवसर, देहगत प्रस्तुति, सामूहिक सहभागिता आ परिवर्तनशील पाठमे अछि, केवल ध्वनि-सङ्ग्रहमे नहि, आ सांस्थानिक संरक्षणसँ लोक-अभिव्यक्तिक प्रतिरोधी धार कुनहटएबाक प्रश्न सेहो विचारणीय अछि। तेसर, लोकगीतक संगीत-पक्ष — राग, ताल, स्वर-लिपिबद्धता — सर्वथा अछूत; ’अवस्था एवं संरक्षण’क शीर्षकमे जे संरक्षण अछि, से पाठ-संरक्षण धरि सोचल गेल, ध्वनि-संरक्षण (स्वर-आलेखन)क चर्च नहि। चारिम, सङ्कलक, शोधकर्ता आ संस्थाकेँ अधिकार देल गेल अछि, मुदा गायक समुदायक स्वामित्व, सहमति, आर्थिक लाभ, नामोल्लेख आ अभिलेखपर पहुँचक प्रश्न पर्याप्त विकसित नहि। पाँचम, लोकगीतक भीतरक पितृसत्तात्मक स्वर — जकर मार्मिक उदाहरण (बेटी-जन्मक अवसाद, अरजल बिआनि) स्वयं निबन्धमे अछि — क आलोचनात्मक सामना नहि भेल; संरक्षणक उत्साहमे ई प्रश्न दबि गेल जे लोक-सम्पदाक कोन अंश संरक्ष्य अछि आ कोन अंश समीक्ष्य। छठम, लोकज्ञानमे औषधीय अथवा वैज्ञानिक तत्त्वक उपस्थिति महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा प्रत्येक परम्परागत विश्वासकेँ वैज्ञानिक सत्य मानि लेब रोमानीकरण होयत — अनुभवजन्य उपयोगिता आ चिकित्सकीय प्रमाणमे भेद रहैत अछि; संगहि स्त्रीक हास्य, सामूहिक प्रतिरोध, गीत-निर्माणक अधिकार आ जातिगत स्त्री-अनुभवक भिन्नता पर आरो विस्तार सम्भव छल।
४.१७ उपनिवेशवादक नऽव चालि : सीमा
पहिल, तंजानिया-प्रकरणक विस्तार जतेक अछि, मैथिली-स्थितिक तुलनात्मक विश्लेषण ताहि अनुपातमे संक्षिप्त — किस्वाहिलीक जे संस्थागत आँकड़ा (बजट-प्रतिशत, नीति-तिथि) देल गेल, तकर समकक्ष मैथिलीक कोनो आँकड़ा (विद्यालयमे मैथिली-माध्यमक स्थिति, निजी विद्यालयक प्रसार-संख्या) नहि; दृष्टान्त सुदृढ़, अनुप्रयोग पातर, आ प्रत्येक देशक भिन्न इतिहास, भाषिक जनसंख्या, अर्थव्यवस्था आ शिक्षा-संरचनाक अन्तर पर्याप्त स्पष्ट नहि रहने तुलनात्मक निष्कर्ष किछु स्थानपर अत्यधिक शीघ्र अछि। दोसर, विश्व बैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष आ विदेशी सहायता भाषिक प्रभुत्वमे भूमिका निभबैत अछि, तथापि स्थानीय अभिजन, सरकारी अकर्मण्यता, अभिभावकक रोजगार-चिन्ता, शिक्षाक गुणवत्ता, पाठ्यपुस्तकक अभाव आ मातृभाषी संस्थाक कमजोरी सेहो उत्तरदायी अछि — बाहरी षड्यन्त्रक व्याख्या आन्तरिक उत्तरदायित्वकेँ ओझल करि सकैत अछि; मिथिलाक भीतरक भाषिक हीनताबोध आ आन्तरिक उपनिवेशक विखण्डन बिना बाहरी भाषिक उपनिवेशवादसँ संघर्ष अधूरा रहत, ई प्रश्न पर्याप्त विकसित नहि भेल। तेसर, निबन्ध निदान-प्रधान अछि, चिकित्सा-न्यून — भाषा-मृत्युक संकट देखाओल गेल, मुदा फिशमैनहिक प्रतिवर्तन-सिद्धान्तक (भाषा-ह्रास उनटएबाक) रचनात्मक पक्ष, जे ओही ग्रन्थमे अछि, नहि आनल गेल; पाठक चेतल तँ जाइत अछि, मुदा दिशाहीन; संगहि अंग्रेजी आ मैथिलीकेँ सर्वथा विरोधी मानब व्यावहारिक समाधान नहि — बहुभाषिक शिक्षा, मातृभाषामे आधारभूत ज्ञान, भारतीय सम्पर्कभाषा आ अन्तरराष्ट्रीय भाषाक क्रमिक शिक्षणक समन्वित रूपपर चर्चा अपेक्षित छल, कारण द्विभाषिकता स्वतः भाषा-मृत्यु नहि, असमान प्रतिष्ठावाली द्विभाषिकता संकट बनैत अछि। चारिम, व्यक्तिगत दृष्टान्त (प्राध्यापक-दम्पति, वकील साहेब, ग्रामीण महिला) नाम-सन्दर्भ-रहित अछि — सत्यापन असम्भव; जे लेखक अन्यत्र अभिलेख-प्रमाणक आग्रही छथि, से एतऽ किंवदन्ती-शैली अपना लैत छथि। पाँचम, आठम अनुसूचीमे समावेश (२००३)केँ ’प्राणक संचार’क जे आशावादी विराम-बिन्दु बनाओल गेल, तकर आलोचनात्मक परीक्षण नहि — अनुसूची-प्रवेशक दस वर्ष बाद प्रकाशित पोथीमे ई प्रश्न स्वाभाविक छल जे संवैधानिक मान्यतासँ जमीनी संक्रमण-स्थितिमे की बदलल; निबन्धक अपनहि तर्क (सरकारी मान्यता पर्याप्त नहि, अन्तरपुस्तीय संक्रमण अनिवार्य) एहि आशावादकेँ काटैत अछि — ई अन्तिम आत्म-विरोध अनसुलझल रहि गेल। छठम, शहरी द्विभाषिक परिवार, मिश्रित विवाह, प्रवासी बालक आ नूतन माध्यममे मैथिलीक सम्भावनाक चर्चा कम अछि।
४.१८ समग्र सीमा
अध्यायवार सीमाक अतिरिक्त किछु सीमा समग्र ग्रन्थ-स्तरक अछि। पहिल, पुनरावृत्ति : निबन्ध-संग्रहक स्वाभाविक दोष एतऽ सघन अछि — किरणजीक ‘आनक कानब खसब देखि कय’ वला पद्य दू अध्यायमे, सीताक ‘जनक नहि छथि राजाक दास’ वला प्रसंग तीन अध्यायमे, भोलालाल दास-सम्बन्धी उद्धरण आ किरण-रमानाथ विवादक बिन्दु अनेक ठाम दोहराएल अछि; सम्पादन-स्तर पर सन्दर्भ-निर्देशसँ ई बँचि सकैत छल। दोसर, अननूदित अंग्रेजी : पाद-टिप्पणी आ मूल-पाठ दुनूमे अंग्रेजी उद्धरणक बाहुल्य मैथिली-मात्र पाठककेँ साक्ष्यसँ वञ्चित करैत अछि — मातृभाषा-पक्षधर ग्रन्थक ई आन्तरिक विडम्बना थिक। तेसर, आत्म-सन्दर्भ : उद्धृत स्रोत सभमे लेखकक अपन सम्पादित-लिखित पोथीक अनुपात पर्याप्त अछि — ई एक दिस हुनक अध्यवसायक प्रमाण थिक, दोसर दिस प्रमाण-स्वातन्त्र्यक प्रश्न उठबैत अछि। चारिम, पद्धति-वैषम्य : किछु अध्याय (यात्री, रमानाथ झा) सिद्धान्त-सघन छथि तँ किछु (कोसी, मनमोहन झा) विवरण-प्रधान; किछु अध्याय निकट पाठपर आधारित अछि, किछु इतिहास-संशोधनक दस्तावेज, किछु विचारात्मक प्रतिवाद — एहि विविधतासँ पोथी समृद्ध बनैत अछि, मुदा समान कसौटीक अनुप्रयोगक अभावमे संग्रहक आन्तरिक स्थापत्य विषम लगैत अछि आ एकर एकीकृत सिद्धान्त स्पष्ट नहि रहि पबैत अछि। पाँचम, मुद्रण-दोष : ठाम-ठाम अशुद्धि आ सन्दर्भ-शैलीक अनेकरूपता (कतहु पूर्ण, कतहु अपूर्ण पाद-टिप्पणी) एहन प्रमाण-आग्रही ग्रन्थक विश्वसनीयता-मानकसँ मेल नहि खाइत अछि। छठम, समाधान-न्यूनता : संग्रहक अधिकांश निबन्ध प्रश्न आ निदान पर विरमि जाइत अछि — प्रश्नोत्थापनकेँ लेखक स्वयं अभीष्ट कहने छथि, तथापि कमसँ कम भाषा-संकट सन विषयमे कार्य-सूत्रक अपेक्षा अतृप्त रहि जाइत अछि। सातम, लेखकक मैथिलीप्रेम पोथीक ऊर्जा अछि, मुदा कतोक स्थानपर ई प्रेम सांस्कृतिक आदर्शीकरण, प्राचीन गौरव, बाहरी शक्तिक प्रति अत्यधिक संशय अथवा राष्ट्रीय प्रतीकक अतिव्याख्यामे परिणत होइत अछि। आठम, स्त्री, दलित, श्रमिक आ लोकक प्रश्न उठाओल गेल अछि, मुदा एहि सभ दृष्टिक अन्तरसम्बन्ध — जेना दलित स्त्री, बाढ़िपीड़ित भूमिहीन स्त्री, प्रवासी मजदूर, सीमावर्ती भाषाभाषी — क व्यवस्थित विवेचन कम अछि; जतऽ-जतऽ आभिजात्य वर्चस्वसँ पूर्ण टकराएब सम्भव छल, ततऽ-ततऽ समीक्षा कतहु-कतहु अर्ध-प्रगतिशील रहि जाइत अछि।
५. समग्र आलोचनात्मक निर्णय
५.१ पोथीक प्रमुख उपलब्धि
’हिआओल’क सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि ई अछि जे ई मैथिली साहित्येतिहासक प्रचलित सरल रेखाकेँ बाधित करैत अछि। ई पोथी पूछैत अछि — स्वतन्त्र भाषा कहबाक अधिकार केकरा अछि? साहित्यिक मानक के बनबैत अछि? कोन लेखक इतिहासमे प्रतिष्ठित आ कोन विस्मृत होइत छथि? लोककण्ठक सामग्री साहित्य अछि कि नहि? स्त्रीक मौनकेँ हास्य मानल जाए कि सामाजिक त्रास? दलित लोकनायक इतिहासक विषय किएक नहि? भूकम्प आ बाढ़ साहित्येतिहासक घटना किएक नहि? प्रवासी केन्द्र मैथिली चेतनाक निर्माणमे की भूमिका निभबैत अछि? राजनीतिक स्वतन्त्रताक बाद भाषिक पराधीनता कोना जीवित रहैत अछि? एहि प्रश्नक कारण पोथी केवल आलोचनात्मक निबन्ध-संग्रह नहि, मैथिली साहित्यक वैकल्पिक ज्ञान-मानचित्र बनि जाइत अछि।
भारतीय काव्यशास्त्रक दृष्टिसँ पोथीक आलोचना रस आ अलंकार धरि सीमित नहि — ओ ध्वनि, औचित्य, वक्रोक्ति, लोकमंगल आ साधारणीकरणकेँ सामाजिक इतिहाससँ जोड़ैत अछि। पाश्चात्य सिद्धान्तक दृष्टिसँ पोथी एकसाथ उत्तर-औपनिवेशिक, नव-इतिहासवादी, मार्क्सवादी, नारीवादी, दलित, रूपवादी आ पर्यावरणीय प्रश्न उठबैत अछि, यद्यपि लेखक एहि सभ सिद्धान्तकेँ सदैव व्यवस्थित नाम आ पद्धतिसँ लागू नहि करैत छथि। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ ‘हिआओल’ राजकीय आ प्रतिष्ठित इतिहासक समानान्तर निम्नलिखित इतिहास लिखैत अछि — भाषिक दमनक इतिहास, उपेक्षित आलोचक आ कविक इतिहास, अशिक्षित स्त्रीक इतिहास, दलित लोकनायकक इतिहास, प्रवासी पत्र-पत्रिकाक इतिहास, मौखिक कथाक इतिहास, भूकम्प आ बाढ़क इतिहास, लोकगीतमे सुरक्षित स्त्री-श्रम आ लोकज्ञानक इतिहास, आओर पीढ़ीगत भाषा-विच्छेदक इतिहास।
५.२ समग्र मूल्याङ्कन
’हिआओल’क महत्त्व अन्तिम निर्णय देबामे नहि, प्रश्नक नूतन भूमि तैयार करबामे अछि। ई पोथी पूर्ण साहित्येतिहास नहि, मुदा भावी साहित्येतिहासक लेल अनिवार्य संकेत-पोथी अछि; ई अन्तिम सिद्धान्त नहि, मुदा स्थापित सिद्धान्तक निश्चिन्तताकेँ भङ्ग करयवला आलोचनात्मक हस्तक्षेप अछि। एकर श्रेष्ठ रूप ओतए देखाइत अछि जतए लेखक विस्मृत दस्तावेज खोजैत छथि, स्थापित निष्कर्षक प्रमाण माँगैत छथि, भाषिक रूपक सूक्ष्म विश्लेषण करैत छथि, स्त्री, लोक, दलित आ विपत्तिग्रस्त जनक स्वर सुनैत छथि, आ साहित्यकेँ जीवित सामाजिक इतिहाससँ जोड़ैत छथि। एकर सीमा ओतए प्रकट होइत अछि जतए प्रतिवाद विश्लेषणपर भारी पड़ैत अछि, अनुमान प्रमाणक स्थान लैत अछि, राष्ट्रीय अथवा सांस्कृतिक आस्था कलात्मक परीक्षणकेँ दबा दैत अछि, आ जटिल इतिहास सरल द्वैतमे बदलि जाइत अछि। संगहि, जतऽ-जतऽ आभिजात्य वर्चस्वसँ पूर्ण टकराएब सम्भव छल, ततऽ-ततऽ समीक्षा अर्ध-प्रगतिशील रहि जाइत अछि — कौलीन्य, पाँजि-प्रथा आ राज्य-प्रायोजित संस्थानक विखण्डन जतेक तीक्ष्णतासँ अपेक्षित छल, ताहिसँ किछु न्यून भेल।
६. उपसंहार
समग्रतः ‘हिआओल’ मैथिली आलोचनाक ओहि दुर्लभ कोटिक ग्रन्थ थिक जे श्रद्धा आ संशय — दुनूकेँ प्रमाणक कसौटी पर कसैत अछि। भारतीय काव्यशास्त्रक दृष्टिएँ एकर मूल कसौटी औचित्य थिक — शब्दक औचित्य (यात्री-अध्याय), पाठक-दृष्टिक औचित्य (कन्यादान), इतिहास-कथनक औचित्य (कथाक विकास); ध्वनि-सिद्धान्तक व्यवहार ‘शरदागम’ आ ’पछबा’क पाठमे, आ रस-चेतना करुण-प्रधान अध्याय सभमे उपस्थित अछि, यद्यपि रस-मीमांसा एकर दुर्बल पक्ष रहल। पाश्चात्य कसौटी पर ई उत्तर-औपनिवेशिक आ समाजभाषावैज्ञानिक विमर्शक मैथिलीमे अग्रणी प्रयोग थिक, जकर सीमा सिद्धान्तक असमान आ कतहु-कतहु यान्त्रिक अनुप्रयोगमे अछि। आ विदेह समान्तर इतिहासक दृष्टिएँ एकर महत्त्व सर्वोपरि अछि — अनालोचित कवि, उपेक्षिता नायिका, दलित महानायक, प्रवासी सम्पादक, लोकगीतक अज्ञात गायिका : प्रतिष्ठान जकरा-जकरा हाशिया पर रखलक, रमणजी तकरा-तकरा अभिलेखक बलेँ केन्द्रमे अनलनि।
मुदा एहू दृष्टिएँ एक अन्तिम सीमा-रेखा खीचब न्यायोचित होएत : समानान्तर धाराक पूर्ण पद्धति ओतऽ पहुँचैत अछि जतऽ हाशियाक स्वर अपने बाजए — ‘हिआओल’मे हाशिया लेल बाजल गेल अछि, हाशियाकेँ बजाओल कम गेल अछि। ई अपूर्णता आगामी अनुसन्धानक निमन्त्रण थिक, आ इएह निमन्त्रण-धर्मिता — विचारकलोकनि विमर्शक हेतु उपस्थित होथि — एहि पोथीक स्थायी मूल्य थिक। मैथिली आलोचनाक इतिहासमे ’हिआओल’ प्रत्यालोचनाक प्रतिमान-ग्रन्थ आ समानान्तर इतिहास-लेखनक पूर्वपीठिका — दुनू रूपमे स्मरणीय रहत।
डा. रमानन्द झा ‘रमण’क ’हिआओल’ (२०१२) मैथिली साहित्यिक आलोचनाक क्षेत्रमे एकटा सराहनीय आ साहसिक डेग थिक, जाहिमे कतेको स्थापित स्थापनाकेँ गम्भीर बौद्धिक चुनौती देल गेल अछि। रमणजीक भाषा-प्रेम आ मैथिलीक ठेठ शब्द-संस्कृतिक प्रति अनुराग सर्वथा स्पृहणीय अछि। एहि सैद्धान्तिक सीमाक बावजूद, ‘हिआओल’ मैथिली समीक्षाशास्त्रक सुदीर्घ पथ पर एकटा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मीलक पत्थर थिक, जे भावी पीढ़ीकेँ स्थापित आभिजात्य इतिहास-लेखनक विरुद्ध “हिआओ” (साहस) सँ लड़बाक दिशा-निर्देश अवश्य करैत अछि। ई पोथी साहित्यक मुख्य द्वारक अतिरिक्त पछुआरि, आँगन, खेत, नदी, लोककण्ठ, स्त्रीक मौन, मुसहरक गाथा, प्रवासीक पत्रिका आ भूकम्पसँ ढहल घरक भीतरसँ इतिहास देखबाक दृष्टि दैत अछि। एहि अर्थमे ई विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिक एक सशक्त आलोचनात्मक आधारग्रन्थ अछि।
सन्दर्भ-सूची
डा. रमानन्द झा ‘रमण’, हिआओल (मैथिली आलोचना-संग्रह), अखियासल प्रकाशन, लालगंज, सरिसब-पाही, मधुबनी, २०१२।
डा. रमानन्द झा ‘रमण’, अखियासल (आलोचना-संग्रह)।
डा. रमानन्द झा ‘रमण’, बेसाहल (आलोचना-संग्रह)।
डा. रमानन्द झा ‘रमण’, भजारल (आलोचना-संग्रह)।
जी. ए. ग्रियर्सन, An Introduction to the Maithili Language of North Bihar, कलकत्ता, १८८१।
जी. ए. ग्रियर्सन, Maithili Chrestomathy एवं दीनाभद्रीसम्बन्धी संकलन, १८८५।
हरिमोहन झा, कन्यादान (मैथिली उपन्यास)।
PART 27, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/new_page_27.htm।
PART 28, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/new_page_28.htm।
PART 82, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/new_page_82.htm।
A Parallel History of Mithila & Maithili Literature, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/new_page_90.htm।
नूतन अंक सम्पादकीय, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/aboutme.htm।
“रमानन्द झा ‘रमण’”, मैथिली लेखक संघ, maithililekhaksangh.blogspot.com/2010/07/blog-post_677.html।
२.२५. गजेन्द्र ठाकुर- हिआओल (ठेठी-अंगिका मैथिली)
‘हिआओल’ : भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त आरो विदेह समान्तर इतिहास के नजर सें विस्तृत आलोचनात्मक आस्वाद
-गजेन्द्र ठाकुर
(डा. रमानन्द झा ‘रमण’, मैथिली आलोचना, अखियासल प्रकाशन, लालगंज, सरिसब-पाही, मधुबनी, २०१२)
१. उपक्रम : पोथी-परिचय आरो ’हिआओल’ के अरथ-गरिमा
‘अखियासल’, ‘बेसाहल’ आरो ‘भजारल’ के अनन्तर डा. रमानन्द झा ’रमण’ के ई चौथका आलोचना-संग्रह ’हिआओल’ (२०१२) मैथिली आलोचना के ओहि विरल परम्परा के कड़ी छै जे में आलोचना गुटबन्दी के चपेट सें मुक्त होय कें पाठ, पत्र-पत्रिका आरो अभिलेख के परमाण मानि चलै छै। पोथी के नामकरणे में लेखक के विनम्र प्रविधि के घोषणा छै — ‘हिआओल’ यानी थाहल, अन्दाजल। ई सबद-चयन आत्मश्लाघा के स्थान पर अनुसन्धान के अनन्त सम्भावना के स्वीकार छै; क्षेमेन्द्र के औचित्य-सिद्धान्त के भाषा में कही तें शीर्षकहि में प्रबन्धौचित्य के बीज रोपल छै। लेखकीय में अपने स्वीकारल गेलै जे ई सब आलेख मनोरंजक साहित्य के कोटि के नै छै, ‘अरबेधि-अरबेधि’ अइसन विषयक चयन कैल गेलै जेकर अध्ययन अपेक्षित छै मतरकि लोक-नजर जहाँ प्रायः नै जाय छै। पण्डित गोविन्द झा आवरण-टिप्पणी में मार्मिक सबद में लिखने छै जे मैथिली-जगत के आनो नामी आलोचक के पूर्वज-साहित्य आरो परम्परा में सड़ाइन गन्ध लागैछै, मतरकि रमणजी के ‘पुरान चाउरक भात टटका दहीक संग’ प्रिय छै — यानी परम्परा के संरक्षण आरो नव मूल्याङ्कन दुनू काज ई पूर्वज-पूजा बूझि करैछै। फूलचन्द्र मिश्र ‘रमण’ पुरोवाक्में उचिते लिखने छै जे ई निबन्ध-संग्रह में आलोचना-प्रत्यालोचना के संगम छै आरो लेखक के मकसद ककरो प्रतिष्ठा के धूमिल करना नै, विमर्श हेतु बिन्दु सब हाजिर करना छै — ‘वादे वादे जायते तत्त्वबोधः’।
ई पोथी में भाषा-विज्ञान, साहित्येतिहास, प्रत्यालोचना, कथा, कविता, महाकाव्य, लोकगाथा, लोकगीत, पत्रकारिता, प्राकृतिक विपत्ति, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद आरो भाषिक उपनिवेशवाद सें सम्बन्धित सत्रह अध्याय समाहित छै। विषय-सूची सें स्पष्ट होय छै जे संग्रह के विस्तार ग्रियर्सन के भाषा-अध्ययन सें आरम्भ होय कें उपनिवेशवाद के नव चालि तक जाय छै। सत्रह निबन्ध के ई संग्रह तीन वर्ग में सहजहिं बँटि जाय छै। पहिलों, भाषा-चिन्तन आरो भाषा-राजनीति : मैथिली आरो मिथिला भाषा के अध्ययन; रमानाथ झा आरो मिथिला भाषा; मैथिली लोकगीत — अवस्था आरो संरक्षण; उपनिवेशवाद के नऽव चालि। दोसरका, व्यक्ति ओ कृति-केन्द्रित प्रत्यालोचना : प्रत्यालोचक किरणजी; उपेक्षित के आँखि सें कन्यादान; अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह; यात्री के भाषा; मनमोहन झा के कथा के अनालोचित पक्ष। तेसरका, विधा ओ प्रवृत्ति-केन्द्रित इतिहास-नजर : पत्रकारिता के विकास में प्रवासी के योगदान; लोकगाथा में दीनाभद्री; मैथिली कथा के विकास — कुछ नव तथ्य; कविता में मिथिला के भूकम्प; कथी लऽ लगेलिऐ हे कोसी माइ; महाकाव्य में युग-सन्दर्भ; नऽव गीत में समाज-चेतना; मैथिली कविता के वर्तमान धारा। ई त्रिवर्गीय बनावट में लेखक के पूरा आलोचकीय व्यक्तित्व — भाषाशास्त्री, पाठालोच के, इतिहासकार आरो प्रत्यालोचक — के चारू रूप एकहि ठाम मिलैछै।
ई पोथी एकरेखीय साहित्येतिहास नै, बल्कि प्रचलित निष्कर्ष सब के प्रश्नांकित करै अनेक समान्तर आख्यान के संकलन छै। लेखक के मुख्य प्रवृत्ति छै — विस्मृत लेखक आरो रचना के फेर सें प्रतिष्ठित करना, पूर्ववर्ती आलोचना के अधूरापन देखाना, लोक आरो शिष्ट के कृत्रिम विभाजन तोड़ब, मैथिली भाषा-साहित्य के विकास के सत्ता, समाज, भूगोल आरो इतिहास सें जोड़ना, आरो मुख्य इतिहास के पार्श्व में दबाओल स्त्री, दलित, श्रमिक, प्रवासी, ग्रामीण, बाढ़िपीड़ित आरो भाषिक समुदाय के दृश्य बनाना। लेखक अपने आलोचना के रचना के भाषा, शिल्प, तथ्य, कथ्य, पात्र आरो चरित्र के गुन-दोष के बारीक विवेचन मानैछै। हुनका लेली आलोचना दोषान्वेषण खाली नै, गुन के आलोकन सेहो छै, आरो साहित्य के सृजन सें बेसी ओकर संरक्षण ओ मूल्याङ्कन के ओ महत्त्व दैछै।
२. समीक्षा-पद्धति : त्रिविध कसौटी
परस्तुत मूल्याङ्कन तीन कसौटी पर आधारित छै।
भारतीय काव्यशास्त्र के आधार
पहिलों कसौटी भारतीय काव्यशास्त्र छै — भरत के रस-निष्पत्ति, आनन्दवर्धन के ध्वनि-सिद्धान्त, कुन्तक के वक्रोक्ति, क्षेमेन्द्र के औचित्य-विचार, साधारणीकरण, लोकमंगल-नजर आरो न्यायदर्शन के परमाण-मीमांसा (विशेषतः अभाव-परमाण के प्रश्न, जे अपने रमणजी के तर्क-पद्धति में बार-बार झलकैछै)। रस-सिद्धान्त रचना में अन्ततः उत्पन्न भावानुभूति के परीक्षा करैछै। ध्वनि-सिद्धान्त प्रत्यक्ष कथन के पीछे निहित सामाजिक, राजनीतिक आरो सांस्कृतिक अरथ खोलै छै। वक्रोक्ति-सिद्धान्त सामान्य कथन सें हटिकें रचनात्मक भाषा, प्रतीक, व्यङ्ग्य आरो विचलन के सुन्नरता देखैछै। औचित्य-सिद्धान्त विषय, भाषा, पात्र, परसंग आरो निष्कर्ष के परस्पर संगति के जाँच करैछै। साधारणीकरण देखैछै जे व्यक्तिगत अनुभव कोना सामूहिक अनुभव बनैछै। लोकमंगल-नजर साहित्य के सामाजिक उपयोगिता, अन्याय-विरोध आरो जनहित के मूल्याङ्कन करैछै।
पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त के आधार
दोसरका कसौटी पाश्चात्य सिद्धान्त छै — उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श, नव-इतिहासवाद, समाजभाषाविज्ञान, शैलीविज्ञान, पाठालोचन-शास्त्र, अभिग्रहण-सौन्दर्यशास्त्र (पाठक-अनुक्रिया), मार्क्सवादी ओ निम्नवर्गीय (अधीनस्थ) विमर्श, नारीवाद, दलित-विमर्श आरो पर्यावरणीय आलोचना। रूपवादी नजर भाषिक विन्यास, बनावट, प्रतीक, पुनरावृत्ति आरो कथन-पद्धति के विश्लेषण करैछै। पाठक-प्रतिक्रिया नजर अरथ के स्थिर नै मानि पाठक के अनुभव सें निर्मित मानैछै। मार्क्सवादी नजर वर्ग, श्रम, उत्पादन, शोषण आरो सत्ता-बनावट केन्द्र में राखैछै। नारीवादी नजर स्त्री के मौन, देह, श्रम, शिक्षा, अधिकार आरो प्रतिनिधित्व के परीक्षण करैछै। दलित आरो अधीनस्थ नजर इतिहास में दबाओल समुदाय के स्वर आरो आत्मप्रतिनिधित्व खोजैछै। उत्तर-औपनिवेशिक नजर भाषा, शिक्षा, ज्ञान आरो संस्कृतिपर औपनिवेशिक प्रभुत्व के निरन्तरता के उद्घाटित करैछै। नव-इतिहासवादी नजर साहित्यिक कृति के अपन समय के सत्ता, संस्था, अर्थव्यवस्था आरो सामाजिक संघर्ष सें जोड़ै छै। पर्यावरणीय आलोचना मनुष्य, नदी, वनस्पति, पशु-पक्षी, भूमि आरो विपत्तिक परस्पर सम्बन्ध देखैछै।
विदेह समान्तर इतिहास-नजर
तेसरका कसौटी विदेह समान्तर साहित्य-इतिहास के नजर छै, जे राजवंश, दरबार, शास्त्र, प्रतिष्ठित लेखक आरो संस्था के इतिहास के समानान्तर लोकजीवन के इतिहास लिखैछै आरो प्रतिष्ठान-पोषित प्रतिमानक स्थान पर अनालोचित, उपेक्षित, लोकधर्मी आरो अभिलेख-सिद्ध धारा केन्द्र में आनै छै। ई नजर में मिथिला केवल राजनीतिक सीमा नै, सांस्कृतिक भूगोल छै; भारत आरो नेपाल के मैथिली क्षेत्र एक दीर्घ सांस्कृतिक प्रवाहक अङ्ग छै; इतिहास राजा के संग किसान, स्त्री, दलित, मुसहर, श्रमिक, गायक, पत्रकार, प्रवासी आरो विपत्तिग्रस्त जनक सेहो होय छै; साहित्यिक इतिहास केवल प्रकाशित पोथी के नै, लोककण्ठ, व्रतकथा, गीत, अप्रकाशित पाण्डुलिपि आरो विस्मृत रचनाकार के सेहो होय छै; आरो नदी, बाढ़ि, भूकम्प, पलायन आरो भाषिक विस्थापन ऐतिहासिक सक्ति बनि उठै छै। ई तेसरका कसौटी ई पोथी के लेली विशेष सार्थक छै, कारण ‘हिआओल’ के अनेक अध्याय — ’अनालोचित कवि’, ‘अनालोचित पक्ष’, ‘उपेक्षितक आँखिसँ’, ‘किछु नव तथ्य’ — अपने प्रति-प्रतिमान निर्माण के, यानी समान्तर इतिहास-लेखन के पूर्वाभ्यास छै। ’हिआओल’ के मूल उपलब्धि इहे समान्तर इतिहास-बोध में निहित छै। ई मूल्याङ्कन के लगभग आधा भाग अध्याय सब के सीमा-विवेचन पर केन्द्रित छै — ई अपने रमणजी के घोषित सिद्धान्त के अनुकूल छै जे आलोचना अभिनन्दन-पत्र नै छै आरो प्रीतिकर होना ओकरा लेली आवश्यक नै छै।
३. अध्यायवार उपलब्धि आरो आलोचनात्मक आस्वाद
३.१ मैथिली आरो मिथिला भाषा के अध्ययन
उद्घाटक निबन्ध कोलब्रुक (१८०१)सें ग्रियर्सन धरिक पश्चिमी भाषा-अध्ययन के कालक्रम परस्तुत करै ई मार्मिक सवाल उठाबैछै जे साहित्य-सर्जना के सुदीर्घ अविच्छिन्न परम्परा रहितहुँ मैथिली के व्याकरण सबसें पछाति काहे लिखलों गेलै। कोलब्रुक के ई संकीर्ण स्थापना जे मैथिली कोय समृद्ध भाषा नै छै आरो एकर कोय खास कवि नै छै, ओकरा विखण्डित करै बीम्स (१८७२), केलौग, हार्नले (१८८०) आरो अन्ततः ग्रियर्सन (१८८१) कोना मैथिली के स्वतन्त्र भाषा के रूप में प्रतिष्ठित कैलकै, ओकर मूल अंग्रेजी साक्ष्य सामने राखि लेखक देखाबैछै जे प्रारम्भिक पश्चिमी अध्ययन मैथिली के अध्ययन नै, प्रशासनिक सुविधार्थ ‘नमूना-संकलन’ खाली छेलै। उत्तर-औपनिवेशिक नजर सें ई अध्याय बहुत महत्त्वपूर्ण छै — मैकाले के १८३५के टिप्पणी (‘जाहि भाषाकेँ केओ बिना सरकारी पाइक पढ़बा लेल तैयार नहि, ताहि पर खर्च किएक’) आरो १८६४के ट्रेवेलियन-टिप्पणी के उद्धरण सें स्पष्ट होय छै जे भाषा-नीति उपनिवेश के उपयोगिता के दासी छेलै। ‘बिहारी अस्मिताक पहिल उद्भावक जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन छलाह’ — ई व्यंग्य-गर्भित स्थापना नव-इतिहासवादी सूझ के उदाहरण छै, जे नामकरण के राजनीति के अस्मिता के राजनीति सें जोड़ै छै। ग्रियर्सन एहिठाम द्वैध व्यक्तित्व के रूप में हाजिर होय छै : एक ओर हुनकर सर्वेक्षण मैथिली के स्वतन्त्र पहचान दैछै आरो हिन्दी के छाया सें मुक्त करैके दिशा में मैथिली के स्वतन्त्र ध्वनि-बनावट ओ क्रिया-रूपावली के प्रामाणिकता दैछै; दोसरका ओर ‘बिहारी’ जइसन सामूहिक नाम औपनिवेशिक प्रशासन के सुविधानुसार भाषिक विविधता के एक खाँचा में राखैछै।
अध्याय के प्रमुख उपलब्धि ई छै जे लेखक भाषा-विकास केवल व्याकरण-लेखन के इतिहास नै मानैछै। ओ कार्यभार आरो कार्य-पारदर्शिता के समाजभाषावैज्ञानिक कसौटी सें मैथिली के ह्रास के व्याख्या करैछै — जे भाषा के परयोग प्रशासन, शिक्षा, न्याय, व्यापार आरो सार्वजनिक जिनगी में घटै छै, ओकर सामाजिक सामर्थ्य सेहो घटै छै। कर्णाट-शासन में मैथिली के राजकाज के भाषा रहबा के अभिलेखीय परमाण, नेपाल के राजकीय अभिलेख, आरो भोलालाल दास के कहल गेलै ओ प्रसिद्ध वाक्य (‘मैथिलीकेँ स्वीकृत कएने मिथिला जीबि उठत…’) — ई सब बिहार-निर्माण के राजनीतिक अन्तर्कथा के उघारै छै। पारम्परिक आरो शिक्षाशास्त्रीय व्याकरण के भेद आरो शिक्षाशास्त्रीय व्याकरण के पाँच स्तर के विवेचन मैथिली में प्रायः पहिलों बेर एतेक व्यवस्थित रूप में आयल छै। विदेह समान्तर इतिहास के नजर सें ई अध्याय विशेष महत्त्वपूर्ण छै, कारण भाषा-इतिहास के राजकीय मान्यता सें नै, शिलालेख, लोकव्यवहार, व्याकरण-लेखन आरो सांस्कृतिक विस्तार सें जोड़ल गेलै — भाषा राजनीतिक सीमा पार करै एक सभ्यतागत प्रवाह बनि जाय छै।
३.२ रमानाथ झा आरो मिथिला भाषा
संग्रह के मेरुदण्ड ई दीर्घतम निबन्ध प्रत्यालोचना के प्रतिमान छै। आचार्य रमानाथ झा के जन्मशतवार्षिकी (१९०६–२००६)के बहन्ने हुनका पर जिनगी-काल आरो मरणोपरान्त लगाओल गेलै आरोप के ‘टाल’ के अभिलेखीय परीक्षण कैल गेलै। शशिनाथ चौधरी के १९३२के परिषद्-प्रतिवेदन जइसन दुर्लभ साक्ष्य सें ई सिद्ध कैल गेलै जे पटना विश्वविद्यालय में मैथिली के स्वीकृति-सम्बन्धी षड्यन्त्र के आरोप तथ्य-सम्मत नै छै। चन्दा झा के मिथिला भाषा रामायण के चौथका संस्करण सें रमानाथ झा के आधा पृष्ठ के ’क्षमा-प्रार्थना’ छाँटि दैके परसंग, आरो ओकर तुलना सोवियत ’व्यक्तिपूजा’ के आरोप में नेता के शव के समाधि सें उपाड़बा के घटना सें — ई प्रत्यालोचना के तीक्ष्णतम क्षण छै, जहाँ स्थानीय साहित्यिक राजनीति विश्व-इतिहास के आलोक में अर्थवान होय जाय छै।
निबन्ध के उत्तरार्ध में रमानाथ झा के अवदान के — अध्यापन, पाठ्यक्रम-निर्माण, अनुसन्धान, भाषा-मान्यता, सम्पादन आरो साहित्येतिहास — के व्यवस्थित पुनर्पाठ छै। रमानाथ झा के मैथिली आलोचना केन्द्र-स्तम्भ मानैत रमणजी मिथिला भाषा के प्राचीनता के पाँच ऐतिहासिक साक्ष्य के उल्लेख करैछै : कालिदास के विक्रमोर्वशीय के दोहा, प्राकृत पैंगल के वर्णवृत्त, नेपाल सें प्राप्त सहजपन्थी सिद्ध लोकनिक चर्यापद, डाकवचन, आरो अवहट्ट में विद्यापति के रचना। बुद्धवचन-महावीरवचन-अर्धमागधी के विवेचन सें विदेह जनपद के भाषा के सातत्य, तिरहुता लिपिक व्याप्ति, मानकीकरण के इतिहास में पण्डित जीवनाथ राय के चिन्ता आरो महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह के १८८०के ओ ऐतिहासिक आदेश जेकरा सें देवनागरी आरो हिन्दी के राजकाज में प्रवेश भेटलै के आरो अन्ततः तिरहुता (मिथिलाक्षर) लिपिक विस्थापन भेलै — ई सब परसंग अध्याय के भाषा-राजनीतिक दस्तावेज बना दैछै। सबसें मौलिक छै हाउगेन आरो फर्गुसन के भाषा-प्रबन्धन सिद्धान्त के चार चरण (चयन, संहिताकरण, प्रकार्य-विस्तार, ग्राह्यता)के कसौटी पर रमानाथ झा के काम के पुनर्मूल्याङ्कन — ई देखाना जे जे शास्त्र के जन्महुँ नै भेलै छेलै, ओहि शास्त्र के प्रक्रिया के अनुरूप रमानाथ झा मैथिली के भाषा-नियोजन कें गेलाह। बहुवाचिकता (द्विभाषिक स्तर-भेद)के अवधारणा सें मैथिल समाज के भाषिक यथार्थ के व्याख्या समाजभाषाविज्ञान के मैथिली में सफल अवतरण छै।
भारतीय परम्परा में आलोचक के ‘सहृदय’ कहल गेलै; ई अध्याय में रमणजी सहृदयता के अरथ अन्धप्रशंसा नै, ऐतिहासिक न्याय मानैछै। हुनकर आग्रह छै जे व्यक्ति के योगदान के मूल्याङ्कन ओकर समय, संस्थागत कठिनाइ आरो उपलब्ध साधन के आधारपर हो। पाठक-प्रतिक्रिया नजर सें ई अध्याय देखाबैछै जे एके व्यक्तित्व के मूल्याङ्कन विभिन्न पीढ़ी अलग-अलग ढङ्ग सें करैछै — संस्थाप के पीढ़ी के श्रम पछिला पीढ़ी के लेली सामान्य सुविधा बनि जाय छै, फलतः मूल संघर्ष विस्मृत होय जाय छै। विदेह समान्तर इतिहास के स्तरपर अध्याय ई सवाल उठाबैछै जे मैथिली भाषा-साहित्य के संस्थागत निर्माण केना भेलै : विश्वविद्यालय, पाठ्यक्रम, साहित्यिक संस्था आरो व्यक्तिगत विद्वत्ता एक-दोसरका सें जुड़ल छेलै; अतः साहित्यिक इतिहास केवल प्रकाशित रचना के इतिहास नै, संस्था-निर्माण के इतिहास सेहो छै।
३.३ प्रत्यालोचक किरणजी
ई निबन्ध ‘प्रत्यालोचना’ पद के मैथिली आलोचना-शास्त्र में सैद्धान्तिक प्रतिष्ठा दैछै — आलोचना के आलोचना, जे लेखक के अनुसार समाज के वैचारिक गतिशीलता आरो जीवन्तता के लच्छन छै। डा. काञ्चीनाथ झा ’किरण’ के आलोचकीय व्यक्तित्व के त्रिविध विश्लेषण (लोक आलोचक, साहित्यिक आलोचक, प्रत्यालोचक) आरो रचनाकार के तीन कोटि के वर्गीकरण (युगातीत, युगानुगामी, सचेत विपक्षी) पद्धति-सजग आलोचना के परिचाय के छै। किरणजी के नव स्थापना सब के — वर्णरत्नाकर काव्य-ग्रन्थ छै, लोकसाहित्य शिष्ट-साहित्य सें बड़का, विद्यापति स्वाधीनताकामी सेनानी, आरो चन्दा झा के स्थान पर अकाली कवि फतूर लाल नवयुग के प्रवर्त के — सहृदय प्रस्तुतिक साथे हुनकर अन्तर्विरोध के निर्मम उद्घाटन सेहो छै : जे किरणजी रमानाथ झा के राधाकृष्ण-विषयक मत के तीव्र खण्डन करैछै, वैह अन्यत्र विद्यापति के नायिका के राजदरबारी संस्कारक कल्पित पात्र कहि प्रकारान्तर सें ओहि मत के समर्थन कें दैछै। कुलानन्द मिश्र के चन्द्रग्रहण-टिप्पणी के परसंग में लेखक के ई सूत्र-वाक्य आलोचना-नीतिशास्त्र के निष्कर्ष जइसन छै जे कृति में व्यक्त विचार के विवेचन ने भक्त जइसन हो, ने अपन मतवाद के रचनाकार पर आरोपित करै।
किरणजी जाति, रूढ़ि, अन्धविश्वास, श्रम के अवमानना आरो सामाजिक विषमता के विरुद्ध आलोचनात्मक स्वर उठाबैछै; ’पराशर’ के माध्यम सें श्रम, भूख, जातीय विभाजन, धार्मिक आडम्बर आरो स्त्री-पुरुष सम्बन्ध के प्रश्न उठावल गेलै, जे आभिजात्य पण्डित-समाज के कौलीनता आरो पाँजि-व्यवस्थापर कठोर प्रहार छै। भारतीय नजर सें किरणजी के आलोचना लोकमंगलवादी छै — हुनका लेली साहित्य के श्रेष्ठता ओकर सामाजिक उत्तरदायित्व सें अलग नै। पाश्चात्य मार्क्सवादी नजर सें हुनकर विचार सामाजिक उत्पादन, श्रम आरो प्रभुत्वशाली वर्ग के आलोचना सें जुड़ै छै; दलित नजर सें ओ शास्त्रीय पात्र के निम्नवर्गीय अनुभव के आलोक में पुनः लिखैछै। ’मैथिल आँखि’ के अवधारणा ई अध्याय के मौलिक सूत्र छै, जेकरा ’गुलामी नजरि’ के विरुद्ध संघर्ष के रूप में राखलों गेलै — एकर अरथ संकीर्ण प्रादेशिकता नै, अपन भाषिक-सांस्कृतिक अनुभव के आधारपर विश्व के देखना। विदेह समान्तर इतिहास के नजर में ई स्थानीय ज्ञान के पुनर्प्रतिष्ठा आरो स्थापित संभ्रान्तवादी इतिहास-लेखन के विरुद्ध निम्नवर्गीय प्रतिरोधक स्वर छै।
३.४ अपेक्षिता के आँखि छोड़ि, उपेक्षित के आँखि सें कन्यादान पढ़ल जाए
ई संग्रह के सबसें बेसी चुनौतीपूर्ण अध्याय में सें एक छै आरो अभिग्रहण-सौन्दर्यशास्त्र (पाठक-अनुक्रिया सिद्धान्त)के मैथिली में विरल परयोग। हरिमोहन झा के पाठक के तीन सरेनी — मनोरंजनार्थी, हनुमान-चालीसा-भक्त, आरो समाज-कथा बूझि पढ़निहार — के विभाजन कें लेखक ई देखाबैछै जे कृति के अरथ पाठक-नजर सें निर्मित होय छै। तब नजर-परिवर्तन के प्रस्ताव आबैछै : अपेक्षिता (सी. सी. मिश्र जइसन शिक्षित वर)के आँखि छोड़ि उपेक्षिता बुच्ची दाइ के आँखि सें उपन्यास पढ़ल जाए। ई नारी-विमर्श के ओ पद्धति छै जे केन्द्र के हटा हाशिया केन्द्र बनाबै छै। प्रचलित हास्यप्रधान पाठ के छोड़ि लेखक बुच्ची दाइ के मौन, अशिक्षा, भय आरो सांस्कृतिक विस्थापन केन्द्र बनाबै छै — प्रश्न ई छै जे बुच्ची दाइ बाजै काहे नै छै, हुनकर जिनगी के फैसला दोसरका लोक काहे करैछै, आरो शिक्षित समाज हुनकर मौन के लेली कतेक जिम्मेवार छै। बुच्ची दाइ के निरक्षरता लेली ओ व्यक्ति के नै, समाज के ’संरचनात्मक निर्माणक दोष’ केेँ जिम्मेवार मानैछै।
सबसें बलगर पक्ष छै अभिलेख-प्रथम परमाण : जनसीदन के यशोदा (जे रामायण बाँचि लै छै), रासबिहारी लाल दास के सुमति, पुण्यानन्द झा के योगमाया, पुलकित मिश्र के मोहिनी — कन्यादान सें पूर्वक मैथिली उपन्यास के नारी-पात्र निरक्षर नै, साक्षर छेली। ई तथ्य-शृंखला सें ई क्रान्तिकारी स्थापना निकलै छै जे स्त्री-शिक्षा के प्रश्न पर हरिमोहन झा अपन पूर्ववर्ती औपन्यासिक परम्परा सें आगू नै, पीछे छै। मिथिला दर्पण के योगानन्द आरो कन्यादान के सी. सी. मिश्र के तुलना, आरो ’अबोधक अपंगताक दोषी अबोध स्वयं की ओकर समाज?’ के प्रश्न मानवीय गरिमा के कसौटी पर हास्य के औचित्य-परीक्षा छै। भाषिक नजर सें अध्याय के बारीक निष्कर्ष ई छै जे शहराती पति आरो ग्रामीण पत्नी एके सांस्कृतिक-भाषिक धरातलपर नै छै — पतिद्वारा हिन्दी में संवाद करना स्त्री के मौन के आरो गाढ़ करैछै। नारीवादी आलोचना सें ई पुनर्पाठ बहुत महत्त्वपूर्ण छै : विवाहक हास्य के आवरण के भीतर स्त्री के वस्तुकरण, भाषिक असमानता, शिक्षा-वञ्चना आरो पितृसत्तात्मक नियन्त्रण छै; बुच्ची दाइ केवल पात्र नै, अशिक्षित मैथिल कन्या के प्रतीक बनि जाय छै। ध्वनि-सिद्धान्त के आलोक में उपन्यास के हास्य के पीछे करुण ध्वनि सुनाय छै। विदेह समान्तर इतिहास के नजर सें ई अध्याय प्रतिष्ठित हास्यकृतिक भीतर दबाओल स्त्री-इतिहास के पुनः दृश्य बनाबै छै।
३.५ अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह
ई अध्याय विदेह समान्तर इतिहास-नजर के बीज-पद्धति के श्रेष्ठ उदाहरण छै — ‘अनालोचित’ के पुनर्वास। पत्र-पत्रिका में छिड़िआएल कविता के ’झोड़ि’ कें लेखक एक विस्मृत कवि के काव्य-संसार के पुनर्निर्माण करैछै आरो हुनका राष्ट्रीय चेतना, मिथिला-बोध, सामाजिक सुधार, स्त्री-दुःख, बाढ़ि, शोषण आरो सांस्कृतिक संकट के कवि के रूप में परस्तुत करैछै। अपने लेखक स्वीकार करैछै जे सम्पूर्ण रचनावली उपलब्ध नै रहला ई आरम्भिक अनुसन्धान छै। ‘शरदागम’ के व्याख्या ध्वनि-सिद्धान्त के व्यावहारिक परयोग छै — पावस के प्रयाण, फुलाएल कास, थीर सरोवर आरो विवश पुरन्दर में १९३५के शासन-सुधार आरो जन-आक्रोश के व्यंग्यार्थ के उद्घाटन; परकृति-वर्णन के अभिधा के भीतर राजनीतिक व्यञ्जना के ई पाठ आनन्दवर्धन के ’अर्थान्तर-संक्रमित’ ध्वनि के जीवन्त निदर्शन छै। ‘पछबा’ कविता के विश्लेषण में पश्चिमी भाषा-संस्कृति के धुक्कड़ सें भारतीय सबद-सम्पदा के झड़बा के जे प्रतीक-योजना देखावल गेलै, से सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के पूर्वाभास जइसन छै आरो अन्तिम अध्याय सें ई निबन्ध के जोड़ि दैछै — ‘पछबा’ केवल हवा नै, पाश्चात्य सांस्कृतिक दबाव के प्रतीक बनैछै, आरो शरदागमन औपनिवेशिक शासन के क्षीणता के सङ्केत। ‘नोत पूरब’ जइसन सांस्कृतिक सन्दर्भ-गर्भित सबद के टीका, विधवा-विलाप के करुण चित्र, आरो बाढ़ि-भूकम्प के द्वैध त्रासदी के कवि-साक्ष्य — सब मिलि एक ‘निरपेक्ष’ किन्तु मैथिली-पक्षधर कवि के मूर्ति गढ़ै छै। नव-इतिहासवादी नजर सें कविता के स्वतन्त्र सुन्नरता-वस्तु नै, स्वतन्त्रता आन्दोलन, विभाजन, सामाजिक सुधार, बाढ़ि आरो सांस्कृतिक संस्था के गतिविधि सें जोड़ल गेलै; करुण रस विधवा, बाढ़िपीड़ित आरो उपेक्षित मिथिला के चित्रण में प्रखर होय छै। प्रतिष्ठित साहित्येतिहास जे कवि के पोथी उपलब्ध नै रहला हुनका पार्श्व में छोड़ि दैछै, रमणजी पत्र-पत्रिका में बिखरल सामग्री के आधारपर हुनकर वैकल्पिक साहित्यिक जीवनचरित निर्मित करैछै — विस्मृत लेखक के पुनरुद्धार के आदर्श उदाहरण।
३.६ यात्री के भाषा : शब्दचयन आरो शब्दनिर्माण
शैलीविज्ञान के चार उपकरण — चयन, विचलन, समानान्तरता आरो अप्रस्तुत-विधान — के सहारे वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ (नागार्जुन)के काव्य-भाषा के ई विश्लेषण संग्रह के सबसें बेसी शास्त्र-सम्पन्न आरो व्यवस्थित भाषिक अध्याय छै। यात्री के काव्यभाषा में देसज, तत्सम, तद्भव आरो आगन्तु के सबद के सर्जनात्मक मेल देखावल गेलै — ‘अपरोजक’ (नाभिपद्मसम्भूत विधाता लेली), ‘ऊत्तुंग खोपा’, ‘तपोवनी’ जइसन देशी-अनदेशी सबद के संकर-निर्माण, आरो ‘दलकब’ क्रिया के अरथ-व्यञ्जकता के पद-परीक्षा। प्रत्येक स्थल पर लेखक देखाबैछै जे पर्यायवाची में सें एकहि सबद काहे अनिवार्य छै : एक सबद के चयन खाली अरथ नै, पात्र के सामाजिक स्थिति, वक्ता के मनोदशा, व्यङ्ग्य आरो सांस्कृतिक स्मृति के व्यक्त करैछै। ई विवेचन कुन्तक के वर्ण-विन्यास-वक्रता आरो पद-पूर्वार्ध-वक्रता के आधुनिक रूपान्तर जइसन छै, आरो ’विचलन’ के अवधारणा ’निरंकुशाः कवयः’ के शास्त्रीय अनुमति सें जोड़ल गेलै — पूर्व-पश्चिम के ई सेतु-बन्ध दुर्लभ छै। वक्रोक्ति-सिद्धान्त के नजर सें व्याकरणिक क्रम के विचलन, असामान्य संयोग आरो नया शब्दनिर्माण भाषा के सामान्य सूचना-साधन सें काव्यात्मक अनुभव में बदलै छै; ध्वनि-सिद्धान्त के हिसाब सें सबद के कोशगत अरथ सें बेसी ओकर प्रसङ्गगत व्यञ्जना महत्त्वपूर्ण होय छै। गौरी, कार्तिक, गणेश, लक्ष्मी जइसन पौराणिक पात्र के कोश-स्वीकृत अरथ सें फराक नव-सन्दर्भीकरण के विश्लेषण, कंकाल-शृंखला आरो मामा-गीत में समानान्तरता के परयोग, अप्रस्तुत विधान में सादृश्य, मानवीकरण आरो इन्द्रियबोध के चित्र — सब यात्री-काव्य के भाषिक वैलक्षण्य के परमाणिक कुंजी छै। यात्री के ’भाषाक भूगोल’ के अवधारणा उल्लेखनीय छै — कवि अपन भाषा-क्षेत्र के वस्तु, श्रम, रीति, मिथ के आरो बोलचाल सें परिचित छै, तें हुनकर सबद केवल सजावट नै, जीवित जनजीवन के वाहक छै। यात्री के भाषा आभिजात्य संस्कृतनिष्ठ मैथिली के विरुद्ध जनपदीय बहुस्वरता के प्रकटीकरण सेहो छै।
३.७ मनमोहन झा के कथा के अनालोचित पक्ष
करुणा के कथाकारक रूप में प्रतिष्ठित मनमोहन झा के कथा-साहित्य के सर्वथा अनालोचित पक्ष — भारतीय राष्ट्रीयता आरो मैथिल उपराष्ट्रीयता — के उद्घाटन ई नान्हकी निबन्ध के उपलब्धि छै। पटना सचिवालय-गोलीकाण्ड (१९४२)के पृष्ठभूमि पर लिखल ‘आहत आत्मा’ के नरेन्द्र बाबू, ताजमहल के वैभव के नीचाँ दबल श्रमिक-वेदना के कथा, ’वीरभोग्या’, ’सप्तपदी’ के महाश्वेता आरो ’मीनाक्षी’ के बलिदान — ई सब देखाबैछै जे करुणा के अन्तःसलिला धार के भीतर राष्ट्र-प्रेम आरो मिथिला-संस्कृति के रक्षा के दृढ़ स्वर बहै छै। रस-नजर सें करुण आरो वीर रस के समन्वय ई कथा के मूल सक्ति छै — पात्र के व्यक्तिगत प्रेम राष्ट्र, मातृभूमि अथवा सांस्कृतिक अस्मिता के लेली त्याग में परिणत होय छै। नव-इतिहासवादी नजर सें कथा के भावभूमि स्वतन्त्रता आन्दोलन, विदेसी आक्रमण आरो मिथिला के सांस्कृतिक स्मृति सें निर्मित छै। विदेह समान्तर इतिहास के नजर सें मिथिला भारतीय राष्ट्र के विरोधी नै, ओकर भीतर खास सांस्कृतिक इकाई छै — ई कारण मैथिल उपराष्ट्रीयता विखण्डन नै, बहुस्तरीय भारतीयता के रूप बनैछै। मनमोहन झा के निधन (२००९)के दसम दिन के भीतर लिखल ई आलेख श्रद्धांजलि आरो आलोचना के मर्यादित संगम छै।
३.८ मैथिली पत्रकारिता के विकास में प्रवासी के योगदान
पत्रकारिता के परिभाषा (निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप पाठ्य-सामग्री के निष्पक्ष प्रसार)सें आरम्भ कें लेखक पत्र, पत्रकार आरो पत्रकारिता के बीच अन्तर स्पष्ट करैछै। हुनकर प्रश्न छै — मैथिली में नियमित, आर्थिक रूप सें आत्मनिर्भर समाचार-पत्र परम्परा सीमित रहला ‘पत्रकारिता’ सबद के अरथ कोना निर्धारित हो? प्रवासी-निवासी के विधिक कसौटी (विदेसी मुद्रा विनिमय अधिनियम)के सामने ओ सांस्कृतिक मिथिला के अखण्डता के तर्क राखैछै — नेपाल-तराइ आरो भारतीय मिथिला के बीच युग-युग के अविच्छिन्न सांस्कृतिक एकसूत्रता के आगू राजनीतिक सीमा गौण। प्रवासी मैथिल सिनी द्वारा जयपुर सें प्रकाशित ‘मैथिल-हितसाधन’ (१९०५) आरो बनारस सें प्रकाशित ‘मिथिलामोद’ (१९०५) सामाजिक शिक्षा, स्त्रीशिक्षा, रूढ़िविरोध, भाषा-संवर्धन आरो निर्भी के सम्पादकीय नजर के वाहक बनल; ई पत्रिका सब के उद्गार-उद्धरण सहित विवेचन ऐतिहासिक नजर सें बहुमूल्य छै। सबसें बारीक छै ज्ञान-समाजशास्त्रीय ई विश्लेषण जे सम्पादकीय निर्भीकता के सामाजिक आधार की छेलै — विद्यावाचस्पति मधुसूदन ओझा आरो मम मुरलीधर झा तत्कालीन सत्ता-केन्द्र दरभंगा पर आश्रित नै छेलै, तें स्पष्टवादिता सम्भव भेलै। सार्वजनिक क्षेत्र के सिद्धान्त सें ई पत्र-पत्रिका समाज के वैचारिक संवाद-मञ्च बनैछै — मिथिला के भीतर जे प्रश्न उठाना कठिन छेलै, प्रवास के अपेक्षाकृत स्वतन्त्र वातावरण में ओ प्रश्न निर्भीकता सें उठल। विदेह समान्तर इतिहास के नजर सें प्रवास सीमा-बाहर के अवस्था नै, मिथिला के विस्तृत सांस्कृतिक परिधि छै — जयपुर, बनारस, अजमेर, कलकत्ता, दिल्ली, नेपाल आदि स्थान मैथिली चेतना के वैकल्पिक केन्द्र बनैछै। पत्रकारिता के आजीविका आरो व्यवसाय के कसौटी सें फराक कें देखैके प्रस्ताव मैथिली पत्रकारिता के इतिहास-लेखन लेली एक वैकल्पिक (समान्तर) ढाँचा परस्तुत करैछै।
३.९ मैथिली लोकगाथा में दीनाभद्री
ई अध्याय पाठालोचन-शास्त्र आरो निम्नवर्गीय विमर्श के संगम-स्थल छै। ग्रियर्सन-संकलित गीत दीनाभद्री (१८८५)के मूल-स्रोत के प्रतिष्ठा दै लेखक ई मार्मिक सवाल उठाबैछै जे परवर्ती विद्वान् अपन-अपन व्यक्तिगत संकलन के आधार बना लिखै गेलाह, मतरकि मूल पाठ आरो अपन पाठक अन्तर के हिसाब कोय नै देलकै — ई साहित्यिक अराजकता छै; ग्रियर्सन के संकलन के उपेक्षित राखि ‘मूल गाथा अप्रकाशित’ कहना ऐतिहासिक रूप सें अनुचित छै। दुनू पाठक तुलनात्मक अध्ययन (सात बनाम तेरह अध्याय, गुलामी जट के भूमिका-भेद, स्वाधीनता के बाद दीनाभद्री के मुह में अंग्रेजी सबद के प्रवेश) लोकगाथा के ‘लोच’-सिद्धान्त के परमाणिक निदर्शन छै — लोककण्ठ में रहै गाथा वाचक, काल आरो श्रोता के अनुसार बदलै रहै छै, आरो इहे लोच ओकर जीवनी-सक्ति छै।
दीना आरो भद्री मुसहर जातिक वीर भ्रातृद्वय छै; जोरावर सिंह के सामन्ती अत्याचार के विरुद्ध हुनकर विद्रोह, शौर्य, भ्रातृ-प्रेम, पंचायती लोकतन्त्र में आस्था (‘पंचसँ निसाफ’) आरो शोष के-प्रतिकारक विश्लेषण देखाबैछै जे नायकत्व के समस्त शास्त्रीय गुन दलित समाजो में वर्तमान छेलै — ई स्थापना राजकुल-केन्द्रित नायकत्व-सिद्धान्त के प्रति-कथन छै। लोकगाथा में जातीय उत्पीड़न, सामाजिक विषमता, साहस, न्याय आरो सामुदायिक स्मृति संरक्षित छै; लोकनायक के महत्ता राजकीय पद सें नै, पीड़ित समुदाय के रक्षा आरो आत्मसम्मान सें निर्धारित होय छै। दलित आलोचना सें ई अध्याय विशेष उल्लेखनीय छै — मुख्य इतिहास जे समुदाय के इतिहासहीन मानैछै, ओकर लोकगाथा अपने इतिहास के वैकल्पिक अभिलेख बनि जाय छै। विदेह समान्तर इतिहास के नजर में दीनाभद्री राजदरबार के नायक नै, लोककण्ठ के नायक छै — ई परिवर्तन सें साहित्यिक आरो राजनीतिक स्थान के पुनर्वितरण होय छै, आरो लोकगाथा के वर्तमान राजनीतिक अवकाश-निर्माण में भूमिका के संकेत एकरा समकालीन विमर्श सें जोड़ै छै।
३.१० मैथिली कथा के विकास : कुछ नव तथ्य
नव-इतिहासवादी पुनर्लेखन के ई श्रेष्ठ उदाहरण छै। स्थापित मान्यता — चन्दा झाकृत पुरुषपरीक्षा के अनुवाद (१८८९) मैथिली कथा के प्रस्थान-बिन्दु — के खण्डन तीन कसौटी पर कैल गेलै : अनुवादक प्रचार-प्रसार के तत्कालीन असम्भाव्यता, शब्दानुवाद के अनाकर्ष के भाषा (जयकान्त मिश्र आरो रमानाथ झा के साक्ष्य सहित), आरो प्रभावित वर्ग के अव्यावहारिकता (संस्कृत के अधीत विद्वान् अनुवाद सें प्रेरित काहे होएताह?)। ओकर विकल्प में लेखक मैथिली कथा के आरम्भ केवल मुद्रित आधुनिक कथा सें मानैके विरोध करैछै : ज्योतिरीश्वर के वर्णरत्नाकर में चौंसठि कला में परिगणित ‘कथाकौशल’, व्रतकथा के तेसरका धारा (मधुश्रावणी, सिरता-बिसता)के वाचिक परम्परा, लोककथा, हास्य-व्यङ्ग्य आरो मौखिक आख्यान के दीर्घ परम्परा के आधुनिक कथा के पूर्वपीठिका मानलों गेलै। रचनात्मक उपलब्धि ई छै जे लेखक कथा आरो कथाकौशल में भेद करैछै — कथ्य एक वस्तु छै; श्रोता के बान्हि राखैके भाषा, गति, स्वर, संवाद आरो प्रस्तुति दोसरका। ई नजर सें मौखिक साहित्य अपरिपक्व नै, अपन स्वतन्त्र सौन्दर्यशास्त्रवाला विधा छै।
श्रीकृष्ण ठाकुर के चन्द्रप्रभा (रचना १८८०के दश के तक, प्रकाशन १९३९)के मैथिली के पहिलों मौलिक कथा के प्रस्थान-बिन्दु मानैके प्रस्ताव, ‘चन्द्रभागा’ के स्थानपर ’चन्द्रप्रभा’ नाम के शुद्धि, ’विलक्षण दाम्पत्य’ के विधागत पुनर्निर्धारण आरो ’मदनराज चरित’ के काल-सम्बन्धी प्रश्न अध्याय के शोधपर के उपलब्धि छै। चन्द्रप्रभा के रसधज-राजा के कथा के व्याख्या — प्रजापीड़ के शासक के विरुद्ध प्रजा के असहयोग आरो पलायन — में १८५७के असफलता के बाद के जन-आक्रोश के प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति देखना, फूलबाड़ी आरो माली के प्रतीक के माध्यम सें प्रजा आरो शासन के सम्बन्ध पढ़ना, आरो विद्यासिन्धु के बेंग-कथा (इन्द्र-पृथ्वी-बेंग)में औपनिवेशिक शोषण आरो सत्याग्रही प्रतिरोधक रूपक पढ़ना — ई साहित्य आरो इतिहास के पारस्परिक पाठक (नव-इतिहासवाद के मूल प्रविधि के) सुन्नर परयोग छै; ध्वनि-नजर सें राजकथा औपनिवेशिक आरो सामन्ती अत्याचार के आलोचना बनि जाय छै।
३.११ मैथिली कविता में मिथिला के भूकम्प
प्रकृतिक उद्दीप के रूपक वर्णन-बहुल मैथिली काव्य-परम्परा में ध्वंस के रूपक उपेक्षा के सैद्धान्तिक प्रश्न सें ई निबन्ध खुजै छै। एकरा में सन् १९३४ आरो १९८८के भूकम्प के काव्यात्मक अभिलेखक अध्ययन छै। कविवर सीताराम झा के ‘भूकम्प वर्णन’ आरो कृष्णनन्दन सिंह के ’कम्पकारिका’ के तुलनात्मक अध्ययन में कम्पकारिका के ऐतिहासिक प्रलेख-मूल्य (भूकम्प-पूर्व मिथिला के राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक स्थिति सहित) रेखांकित कैल गेलै — ई केवल विनाश-वर्णन नै, तत्कालीन मिथिला के राजनीति, अर्थव्यवस्था, भ्रष्टाचार, वस्तु-मूल्य आरो पुनर्निर्माण के काव्यात्मक दस्तावेज छै। अठारह वर्ष के वयस में भोगल त्रास के अड़तीस वर्ष तक स्मृति में जिआ कें काव्यबद्ध करैके मनोवैज्ञानिक टिप्पणी, दरभंगा अस्पताल आरो चतुर्भुज स्थान के करुण-व्यंग्य-मिश्रित चित्र, आरो १९८८के भूकम्प-काव्य-संकलन सें यात्री, चन्द्रभानु सिंह, धीरेन्द्र आरो जीवकान्त के साक्ष्य — सब मिलि आपदा-साहित्य के एक नान्हकी इतिहास बनि जाय छै। धीरेन्द्र के पाँती में विपत्ति में मनुजता के एक होय कें जएबा के निरीक्षण करुण-रस के सामाजिक परिणतिक सूच के छै।
करुण आरो भयान के रस के संयोजन ई अध्याय केन्द्र छै। घर, अस्पताल, मन्दिर, बाजार, राजभवन, गरीब के झोपड़ी — सब विनाश के समान परिधि में आबि जाय छै, मतरकि समान प्राकृतिक आघात के सामाजिक नतीजा असमान होय छै। पर्यावरणीय आलोचना सें प्राकृतिक घटना आरो सामाजिक निर्मितिक अन्तर स्पष्ट होय छै — भूकम्प प्राकृतिक छै, मतरकि कमजोर भवन, सरकारी उपेक्षा, असमान संसाधन आरो राहत के राजनीति मानवीय फैसला के नतीजा छै। विदेह समान्तर इतिहास में विपत्ति साहित्यिक इतिहास के वैध विषय बनैछै।
३.१२ कथी लऽ लगेलिऐ हे कोसी माइ
बाढ़ि-साहित्य के ई प्रवृत्ति-सर्वेक्षण आरसी प्रसाद सिंह के हाकरोस सें आरम्भ होय कें चन्दा झा, यात्री (कौशिकी के धार), लक्ष्मीपति सिंह, चन्द्रभानु सिंह, सियाराम झा ‘सरस’ आरो सुकान्त सोम तक पसरल छै। ई अध्याय में कोसी आरो मिथिला के अन्य नदी सब के मातृरूप, जीवनदायिनी सक्ति आरो विनाशकारी बाढ़ि — तीनू रूप में देखल गेलै। ‘नदी मातृक क्षेत्र’ के शास्त्रीय गौरव आरो प्रतिवर्ष के जल-प्रलय, भूख, विस्थापन, ऋण आरो पलायन के यथार्थ के बीच के विडम्बना के लेखक कोसी-माइ के लोकगीतीय उपराग सें जोड़ि दैछै — माइ के प्रकोप मानि मनौती करै लोक-मानस के चित्रण सांस्कृतिक अध्ययन के सामग्री छै। कोसी के ’माइ’ रूप सांस्कृतिक आत्मीयता उत्पन्न करैछै, मतरकि कविता में ई माइ सें प्रश्न सेहो कैल जाय छै — भक्ति आरो प्रतिरोध एकसाथ हाजिर छै। सुकान्त सोम के कविता में मन्त्री के हवाई-सर्वेक्षण के व्यंग्य — सुखाएल बाँस के फट्ठी जइसन आकृति सब के ऊपर उड़ै विमान आरो अखबार में एगो हरियर मुस्काइत चेहरा — सत्ता-आलोचना के तीक्ष्णतम उदाहरण के रूप में उद्धृत छै। राहत-सामग्री के लूट, साँप-मूस के मिलन आरो पारिस्थितिकीय क्षतिक परसंग बाढ़ि के प्राकृतिक आपदा सें आगू राजनीतिक-नैतिक प्रश्न बना दैछै। पर्यावरणीय आलोचना के नजर सें ई अध्याय मनुष्यकेन्द्रित सीमा पार करै पशु-पक्षी, बगुला, खेत, पोखरि, वनस्पति आरो सम्पूर्ण जीव-मण्डल के त्रासदी देखाबैछै; नदी के प्राकृतिक प्रवाह, बान्ह, तटबन्ध, राहत-व्यवस्था, सरकारी सर्वेक्षण आरो भ्रष्टाचार एक जटिल राजनीतिक पर्यावरण बनाबै छै। विदेह समान्तर इतिहास के नजर सें बाढ़ि मिथिला के बाहरी दुर्घटना नै, ओकर सामाजिक बनावट, लोकगीत, स्मृति, अर्थव्यवस्था आरो पलायन के निर्णायक इतिहास छै।
३.१३ मैथिली महाकाव्य में युग-सन्दर्भ
पाँच महाकाव्य — सुभद्राहरण (मुंशी रघुनन्दन दास), राधाविरह (मधुप), अगस्त्यायनी (मार्कण्डेय प्रवासी), त्रिपुण्ड (धीरेन्द्र) आरो पराशर (किरण) — के चयन पाँच युगीन प्रयोजनक आधार पर कैल गेलै : स्वाधीनता-संघर्ष, नारी-सशक्तीकरण, राष्ट्रीय भावात्मक एकता, श्रम-निष्ठ युवा-सक्ति आरो मैथिल उपराष्ट्रीयता। पौराणिक कथानक के भीतर समकालीन इतिहास पढ़ैके ई पद्धति — जहल सें बेटा के पत्र पाबि लिखल सुभद्राहरण में असहयोग आन्दोलन के कर-बहिष्कार, अगस्त्यायनी में भाषा-विवाद के समाधान रूप में शिव के डमरू सें तमिल-संस्कृत के युगपत् जन्म, पराशर में ’अन्न थिक प्राण’ के श्रम-घोष आरो सीता के मुहेँ मिथिला के लोकतन्त्री गौरव — रूपक-पाठ (अन्योक्ति-व्याख्या)के सफल परयोग छै। नव-इतिहासवादी सिद्धान्त के अनुरूप पुराण के पात्र अपन पुरान समय में बन्द नै रहै छै : अर्जुन स्वतन्त्रता सेनानी के कर्तव्यबोध के प्रतीक बनैछै; राधा राष्ट्र आरो समाज-सुधार में स्त्री के सहभागिता के स्वर बनैछै; अगस्त्य उत्तर-दक्षिण समन्वय के वाहक बनैछै; त्रिपुण्ड में शिव कृष के आरो श्रमिक बनैछै; पराशर में श्रम-प्रतिष्ठा, वर्णभेद-विरोध, भूख के समक्ष कर्मकाण्ड के निरर्थकता आरो मैथिली अस्मिता व्यक्त छै। भारतीय काव्यशास्त्र के साधारणीकरण प्रक्रिया एहिठाम स्पष्ट छै — पुराण के खास पात्र आधुनिक जनक सामूहिक आकांक्षा के प्रतिनिधि बनैछै। रचना-काल आरो प्रकाशन-काल के सावधान अभिलेखन ई अध्याय के इतिहास-लेखन के नजर सें सेहो परमाणिक बनाबै छै।
३.१४ नऽव गीत में समाज-चेतना
‘नऽव गीत’ पद के प्रवर्तन आरो परिभाषा ई निबन्ध के सैद्धान्तिक योगदान छै — ई वयोवर्ग के नै, मूल्यबोध के द्योत के; नवीन गीत के उपरान्त रचल सब्भे गीत नऽव गीत नै। नऽव गीत पारम्परिक रूढ़ कथ्य, मिथ्या गौरव, उपदेशात्मकता आरो भावु के विलाप सें हटि आधुनिक सामाजिक विसङ्गति, औद्योगीकरण, महानगरीय त्रास, भूख, बेरोजगारी आरो संघर्ष के लयात्मक रूप दैछै। यन्त्र-युग के उपज मानि एकरा में बुद्धि-तत्त्व आरो भाव-तत्त्व के लयात्मक सम्मिश्रण के लच्छन-निर्धारण, आरो पुरान गीत के गार्हस्थ्य शृंगार, चन्दा झा के भाव-विह्वलता, राष्ट्रीय चेतनावादी अतीत-गान आरो मंचीय तुकबन्दी — चारू सें एकर सीमा-रेखा खीचब वर्गीकरण-शास्त्र के सुन्नर अभ्यास छै। नऽव गीत में बुद्धि आरो भावना विरोधी नै, परस्पर पूर के छै; निजी दुःख सामूहिक सामाजिक संकट में साधारणीकृत होय छै। गंगेश गुंजनक ’दूभिक पेंपी पर बड़क गाछ पतरब’ के प्रतीक-व्याख्या — दलित-शोषित के नव चेतना पर प्रभु-वर्ग के पसरब — मार्क्सवादी पाठक संयत परयोग छै; बुद्धिनाथ मिश्र के जेठुआ मकइ आरो मार्कण्डेय प्रवासी के फागुन-आह्वान के विश्लेषण नऽव गीत के वैविध्य के प्रमाणित करैछै। बालुपर लिखल इतिहास, माटिक डिबिया जइसन जरै गाम — ई प्रतीक आधुनिक असमानता के तीव्र ध्वनि उत्पन्न करैछै। मार्क्सवादी नजर सें सुविधा-भोगी वर्ग, विफल विकास-योजना, महानगर के प्रभुत्व आरो ग्रामीण दण्ड के आलोचना छै; रूपवादी नजर सें नया प्रतीक, खण्डित बिम्ब आरो बोलचाल के लय नऽव गीत के वैशिष्ट्य छै। अध्याय नऽव गीत के विविधता के कमजोरी नै, जीवित विकास के परमाण मानैछै।
३.१५ मैथिली कविता के वर्तमान धारा
भुवनेश्वर-संगोष्ठी (२०१२)में पठित ई आलेख रवीन्द्रनाथ आरो सुब्रह्मण्यम भारती के साक्ष्य सें भारतीय सामासिक संस्कृति के पट पर मागधी-प्राच्य परिवार के चारू सहोदरा (असमिया, ओड़िआ, बंगला, मैथिली)के साझा विरासत, विद्यापति के प्रभाव आरो औपनिवेशिक भाषा-सत्ता के इतिहास के स्मरण करै मैथिली कविता के चार वर्तमान धारा के निर्धारण करैछै : मानवजाति पर आयल संकट के चिन्ता (जीवकान्त के युद्ध-जर्जर शताब्दी के विदाइ), उपभोक्तावादी संस्कृति के विरोध, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के प्रतिरोध (सूचना-महापथ पर एकरेखीय विकास के मत्स्यन्याय), आरो जैविक-सांस्कृतिक वैविध्य के क्षरण-चिन्ता (छओ बिगहा आठ कट्ठा के कलम-उजाड़ि, बगुला के पलायन)। जीवकान्त आरो उदयनारायण सिंह ’नचिकेता’ के कविता के आलोक में उपभोक्तावादी दानवता के विरुद्ध मानव के अस्तित्व आरो सांस्कृतिक स्वायत्तता के संघर्ष विश्लेषित छै। उत्तर-औपनिवेशिक नजर सें सूचना-साधन, बजार, उच्च प्रौद्योगिकी आरो सांस्कृतिक प्रभुत्व के सम्बन्ध उद्घाटित होय छै — एकर आशय ई नै जे बाहरी संस्कृति सें सम्पर् के वर्जित हो, बल्कि एकतरफा प्रभुत्व स्थानीय भाषा, लिपि, जिनगी-पद्धति आरो कल्पनाशक्ति के समाप्त नै करए। पर्यावरणीय नजर सें जैवविविधता, स्थानीय धान, आम के प्रजाति, पोखरि, बगुला आरो प्राकृतिक आवास के विनाश आधुनिक कविता के चिन्ता बनैछै। आशबी के ’अपेक्षित बहुमुखता’ के नियम — परिवेश सें लड़बा लेली कम सें कम ओतबे आन्तरिक वैविध्य चाही जतबा परिवेश में छै — के परयोग मैथिली आलोचना में व्यवस्था-चिन्तन के प्रवेश छै, आरो ई अस्तित्व-रक्षा के प्रश्न के भावुकता सें निकालि विज्ञान के धरातल पर आनि दैछै। विदेह समान्तर इतिहास के नजर सें मैथिली कविता भारत आरो नेपाल के साझा भाषिक जिनगी, लोकज्ञान आरो सांस्कृतिक बहुलता के रक्षा करै प्रतिरोधक काव्य बनैछै।
३.१६ मैथिली लोकगीत : अवस्था आरो संरक्षण
जनकपुरधाम के राष्ट्रीय संगोष्ठी में कार्यपत्र पर टिप्पणी-रूप में परस्तुत ई आलेख ’लोके च वेदे च’ के शास्त्रीय समानान्तरता सें लोक-प्रतिष्ठा के भारतीय आधार जोड़ै छै। आरम्भ में लेखक परस्तुत आलेखक परिचयात्मक प्रवृत्तिक आलोचना करैछै आरो माँग करैछै जे लोकगीत केवल सूची नै, ओकर सामाजिक कार्य, परिवर्तन आरो विलुप्तिक कारण के विश्लेषण हो — जाँत के स्थानपर यन्त्र आरो ढेकी के स्थानपर मिल आबि गेलापर श्रमगीत के भविष्य की होयत, ई प्रश्न बहुत सार्थक छै। लोकगीत के लेखक सामूहिक भावात्मक अभिलेख, परम्परागत ज्ञान, औषधीय अनुभव, कृषि-संस्कृति, पारिवारिक सम्बन्ध आरो जिनगी-संस्कारक भण्डार मानैछै — मेथी-हरदिक औषधीय गुन, ’नानीक पीसल मेथी’ के सामाजिक अर्थशास्त्र, धोबिनियाँ के सोहाग के पौराणिक कथा-गुम्फन, तुलसी, बेल, बाँस जइसन प्रतीक अनुभवसिद्ध लोकज्ञान के अङ्ग छै। नारीवादी नजर सें अध्याय विशेष प्रखर छै : बेटी-जन्म के अवसाद आरो भ्रूण-परीक्षा-पूर्वक मरीच-परयोग के साक्ष्य, कन्या के सामाजिक अवमूल्यन, पतिद्वारा श्रम-शोषण, दहेज, सासु-ननद के नियन्त्रण आरो नवविवाहिता के देहगत आकांक्षा लोकगीत में सुरक्षित छै। लगनी के अप्रस्तुत-विधान (लौंग के फूल, यमुना में जाल)के रस-सजग व्याख्या शिष्ट-लोक के कृत्रिम भेद के खण्डन छै। संरक्षण लेली यूनेस्को के अमूर्त सांस्कृतिक सम्पदा-ढाँचा सें चिन्हबा के तीन आरो संरक्षण के सात उपाय के प्रस्ताव — अभिलेखागार, सङ्ग्रहालय, क्षेत्रीय वर्गीकरण, प्रशिक्षित सङ्कलक, ध्वनि-अभिलेखन आरो समुदाय के प्रति उपलब्ध कराना — आरो समष्टि-चेतना आरो ओगबर्न के सांस्कृतिक-तत्त्व-वैविध्य के सूत्र सें नेपाल के नव लोकतन्त्र में लोकशक्तिक सांस्कृतिक आधार के तर्क व्यावहारिक नीति-प्रस्ताव के स्तर तक जाय छै, जे मैथिली आलोचना में दुर्लभ छै। विदेह समान्तर इतिहास में लोकगीत अशिक्षित समुदाय के मनोरञ्जन नै, समाज के जीवित इतिहास छै।
३.१७ उपनिवेशवाद के नऽव चालि
समापन-निबन्ध उत्तर-औपनिवेशिक चिन्तन के व्यावहारिक शिखर छै आरो राजनीतिक स्वतन्त्रता के बादो भाषिक उपनिवेशवाद के निरन्तरता उद्घाटित करैछै। तंजानिया के किस्वाहिली-प्रकरण के विस्तृत अध्ययन — स्वाधीनता (१९६२)के बाद शिक्षा के माध्यम बनाबैके संकल्प, आर्थिक संकट, विश्व बैं के आरो अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष के शर्त, निजीकरण, आरो ब्रिटिश सहायता-योजना के माध्य में अंग्रेजी के पुनःस्थापन — सें ई सूत्र निकालल गेलै जे राजनीतिक उपनिवेश गेला के बाद भाषिक-सांस्कृतिक उपनिवेश आर्थिक सहायता के नव चालि सें चलै छै। मेडागास्कर, जाम्बिया, मलेशिया आरो भारत के (कर्पूरी ठाकुर-परसंग सहित) समान्तर दृष्टान्त, आरो एकहि दिन (१९ नवम्बर २००८) पटना में ब्रिटिश मन्त्री के बालिका-विद्यालय आरो अमेरिकी दूतावास के महिला-महाविद्यालय गमन के बारीक पाठ — जे स्त्री-शिक्षा के नव-विकसित क्षेत्र के औपनिवेशिक भाषा के प्रभाव-क्षेत्र बनाबैके सुनियोजित चालि छै — विचारोत्तेज के छै।
उत्तर-औपनिवेशिक नजर सें लेखक के प्रमुख स्थापना छै — राज्यसत्ता छोड़ि दैना खाली उपनिवेशवाद के अन्त नै; शासन के भाषा, ज्ञान के मानदण्ड, शिक्षा के माध्यम आरो रोजगार के प्रवेश-द्वारपर अधिकार बनल रहला तक औपनिवेशिक सत्ता नव रूप में जीवित रहै छै। भारत में अंग्रेजी माध्यम के निजी विद्यालय के विस्तार, स्थानीय भाषा के प्रति शिक्षित वर्ग के हीनताबोध आरो घर में पीढ़ीगत भाषा-संक्रमण के टूटन मैथिली के लेली दूतरफा संकट उत्पन्न करैछै। फिशमैन के भाषा-संक्रमण सिद्धान्त के सूत्र — अन्तरपुस्तीय मातृभाषा-संक्रमण के बिना भाषा-रक्षा असम्भव; जे भाषा अन्तर-पीढ़ीगत रूप सें संक्रमित नै होय छै, ओकर मृत्यु सुनिश्चित छै — आरो मैथिल परिवारसभ सें पारिवारिक भाषा के रूप में मैथिली के उठि जएबा के दृष्टान्त ई निबन्ध के ’मैथिली पर दू तरफा मारि’ के चेतावनी-पत्र बना दैछै। विदेह समान्तर इतिहास के नजर सें अध्याय के सबसें बेसी मार्मिक पक्ष पारिवारिक भाषा-विच्छेद छै — जब दादा-दादी पोता-पोती सें संवाद नै कें पाबै छै, तब केवल सबद नै, कथा, गीत, संस्कार, लोकज्ञान आरो सामूहिक स्मृति सेहो टूटै छै।
४. अध्यायवार सीमा, अन्तर्विरोध आरो अपूर्णता
रमणजी के अपन घोषित सिद्धान्त छै जे आलोचना अभिनन्दन-पत्र नै छै; व्यक्त विचार के सप्रमाण खण्डित करना वा वैमत्य राखब अवमानना नै। समीक्षाशास्त्र में केवल प्रशंसा करना गुटबन्दी आरो मित्र-मण्डली के संकीर्ण दायरा के पोसबा के समान छै। तें ओहि कसौटी पर, आरो ओहि आदर-भाव सें, प्रत्येक अध्याय के सीमा, वर्गीय विलोपन आरो सैद्धान्तिक अपूर्णता के विवेचन नीचाँ परस्तुत छै। ई सीमा सब पोथी के मूल्य के घटाबै नै छै, बल्कि आगू के अनुसन्धान लेली ’वादे वादे जायते’ के द्वार खोलै छै।
४.१ मैथिली आरो मिथिला भाषा के अध्ययन : सीमा
पहिलों सीमा स्रोत-केन्द्र के छै। अध्याय मुख्यतः पश्चिमी विद्वान्के (कोलब्रुक, बीम्स, हार्नले, ग्रियर्सन) साक्ष्य पर ठाढ़ छै; दीनबन्धु झा सें पूर्वक देशी वैयाकरण-चेतना — पाँजि-प्रबन्ध के भाषिक अभिलेख, ज्योतिरीश्वर-काल के सबद-संग्रह-प्रवृत्ति, संस्कृत-टीका-परम्परा में मैथिली-परयोग के साक्ष्य — प्रायः अस्पर्शित रहि गेलै। फलतः जे औपनिवेशिक ज्ञान-मीमांसा के आलोचना निबन्ध करैछै, तकरहि स्रोत-सामग्री पर ओ अपने आश्रित होय जाय छै — ई उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श के चिर-परिचित आत्म-विरोध छै। दोसरका, औपनिवेशिक ज्ञान-निर्माण के अन्तर्विरोध के पर्याप्त विश्लेषण नै छै : ग्रियर्सन के कार्य मैथिली के पहचान के साधन सेहो छेलै आरो औपनिवेशिक जनगणना, वर्गीकरण आरो प्रशासन के उपकरण सेहो; कैम्पबेल (१८७४)के सबद-संग्रह केवल प्रशासनिक सुविधा मानना, आरो ग्रियर्सन द्वारा कैल गेलै औपभाषिक विभाजन — पूर्वी रूप के ‘गँवारी’ आरो निम्नवर्ग के भाषिका के ‘जोलहा बोली’ कहना — के वर्ग-विभेदी पक्ष के नै चिन्हब, प्राच्यवादी ज्ञान-संचय के ओहि आलोचना सें वञ्चित रहि जाय छै जे ई द्वैधता के बेसी गम्भीरता सें खोलि सकै छेलै। तेसरका, कार्यभार आरो कार्य-पारदर्शिता के सिद्धान्त के परयोग आरम्भ तें भेलै, मतरकि मैथिली के विभिन्न प्रक्षेत्र (शिक्षा, प्रशासन, व्यापार, धरम, संचार)में परयोग के कोय क्षेत्रवार विवरण वा तुलनात्मक आकलन नै — सिद्धान्त उदाहरण के (अंग्रेजी, संस्कृत) स्तरहि पर रहि गेलै, मैथिली के मापन नै भेलै। चौथका, ’मानक मैथिली’ के निर्धारण में अन्य उपभाषा-रूपक सामाजिक अधिकार के प्रश्न — मानक कोन सक्ति-बनावट सें बनैछै — अनुत्तरित छै; भाषा के अवनतिक कारण बाहरी आक्रमण आरो प्रशासनिक उपेक्षा में केन्द्रित छै, मैथिल समाज के आन्तरिक जातिगत विभाजन, शिक्षित वर्ग के भाषिक उदासीनता, स्त्रीशिक्षा के अभाव आरो आर्थिक बनावट के भूमिका तुलनात्मक रूप सें कम विश्लेषित छै। पाँचम, अंग्रेजी पाद-टिप्पणी के बाहुल्य बिना अनुवादक छै, आरो निबन्ध के समापन प्रश्न-शृंखला में विसर्जित होय जाय छै — व्याकरण-लेखन के विलम्ब के जे कारण-मीमांसा आरम्भ भेलै छेलै, ओकर सुगठित निष्कर्ष-सूत्र पाठक के अपने जोड़ऽ पड़ैछै।
४.२ रमानाथ झा आरो मिथिला भाषा : सीमा
संग्रह के ई दीर्घतम अध्याय बनावट के नजर सें शिथिल छै — प्रत्यालोचना, जीवनी, भाषा-प्राचीनता, लिपि-विमर्श, मानकीकरण आरो भाषा-प्रबन्धन : छह स्वतन्त्र निबन्ध के सामग्री एकहि छत्र में अटकाओल गेलै, जेकरा सें तर्क के धार ठाम-ठाम मोथरा जाय छै। दोसरका, सन्तुलन के घोषित प्रतिज्ञा के बादो स्वर कतोक स्थानपर आलोचनात्मक जिनगी-विवेचन सें बेसी प्रतिरक्षात्मक श्रद्धाञ्जलि बनि जाय छै : किरणजी के मत-खण्डन के ‘आवेगात्मक’ आरो ‘सुविचारित नहि’ कहल गेलै, मतरकि विरोधी पक्ष लेली प्रयुक्त लेखक के अपन शब्दावली (‘कौचर्य-प्रवीण’, ‘खिधांस’, ‘लटुआएल-दबकल’) सेहो आवेग सें सर्वथा मुक्त नै — प्रत्यालोचक जे तटस्थता के माँग करैछै, से अपने हुनकर भाषा में कतहु-कतहु भंग होय छै; विरोधी मत के तर्क के निष्पक्ष पुनर्निर्माण नै कैल गेलापर प्रत्युत्तर के विश्वसनीयता घटै छै। तेसरका, हाउगेन-फर्गुसन के परवर्ती सिद्धान्त सें रमानाथ झा के पूर्ववर्ती काम के संगति देखाना जतेक आकर्ष के छै, ततबे कालदोष के जोखिम सें भरल — ई संगति सप्रयोजन नियोजन छेलै की आकस्मिक समान्तरता, एकर विवेचन नै भेलै। चौथका, मैथिली के बहुत पुरान अस्तित्व सिद्ध करैके उत्साह में महाकाव्य, बौद्धकाल अथवा पुरान जनपद सें सम्बन्धित कुछ निष्कर्ष भाषावैज्ञानिक परमाण के अपेक्षा सांस्कृतिक अनुमानपर बेसी आधारित बुझाय छै — ‘मिथिला’ नाम के प्राचीनता स्वतः वर्तमान मैथिली भाषा के अखण्ड रूपक परमाण नै बनैछै। पाँचम, रमानाथ झा के अपन सीमा — जइसन हुनकर शब्दानुवाद के नीरसता जेकर चर्च दसम अध्याय में अपने लेखक करैछै, हुनकर मानकीकरण-प्रतिरूपक व्यावहारिक असफलता, वा मानकीकरण में आभिजात्य वर्ग के भाषिक रूप के प्राथमिकता देला सें आन वर्ग-क्षेत्र के मैथिली के अवमूल्यन के प्रश्न — ई अध्याय में प्रायः मौन छै; व्यक्ति-समर्थन आरो सिद्धान्त-समर्थन एक वस्तु नै, आरो प्रशंसा के आधिक्य सें चरित्र पूरा मानवीय व्यक्तित्व के बदला आदर्शीकृत प्रतिमा बनबा के जोखिम में पड़ैछै। छठम, ’साहित्य-पत्र’ के बन्द होयके आरोप के जे खण्डन छै, ओ तर्काश्रित बेसी, अभिलेखाश्रित कम — पत्रिका के अरथ-व्यवस्था, ग्राहक-संख्या वा बन्द होयके प्रत्यक्ष कारण के कोय दस्तावेज नै देल गेलै।
४.३ प्रत्यालोचक किरणजी : सीमा
पहिलों, अध्याय केन्द्रीय स्थापना — किरणजी के आलोचना मूलतः प्रत्यालोचना छै, स्वतन्त्र कृति-अवगाहन सें नै जनमल — एगो गम्भीर न्यूनीकरण के जोखिम राखैछै; प्रत्यालोचना के स्वभाव प्रतिक्रियात्मक होय छै आरो ई अध्याय में किरणजी के विचार प्रायः पूर्ववर्ती निष्कर्ष के खण्डन के माध्यम सें सामने आबैछै, हुनकर स्वतन्त्र सौन्दर्यशास्त्रीय प्रतिमान बेसी व्यवस्थित रूप में निर्मित नै होय छै। जे ‘प्रतिक्रियावादिता’ के प्रश्न लेखक अपने उठाबैछै, से बिना पूरा उत्तर के छोड़ि देल गेलै — प्रश्न उठा कें ओकर मीमांसा सें बचि जाएब आलोचकीय जिम्मेवारी के अधूरा निर्वाह छै। दोसरका, विरोधाभास-प्रदर्शन में उद्धरण-चयन एकतरफा छै : किरणजी के जे स्थल सब में आत्म-संशोधन वा मत-परिमार्जन भेलै हो, से खोजल नै गेलै; कोय चिन्तक के चालीस वर्ष के लेखन में मत-भिन्नता विकास सेहो होय कें सकै छै, केवल विरोधाभास नै। तेसरका, कुलानन्द मिश्र के चन्द्रग्रहण-परसंग अपूर्ण छै — मिश्रजी के मूल आपत्तिक पूरा तर्क-पक्ष नै राखलों गेलै, केवल खण्डनीय अंश उद्धृत भेलै। चौथका, सामाजिक न्याय आरो लोकमंगल के आग्रह महत्त्वपूर्ण छै, मतरकि साहित्य केवल विचारधारात्मक उपयोगिता सें मापल गेलापर रूप, लय, जटिलता, हास्य, विरोधाभास आरो कलात्मक स्वतन्त्रता के अवमूल्यन होयबा के आशङ्का रहै छै; किरणजी के क्रान्तिकारी वर्ग-नजर के पारम्परिक अलंकारशास्त्र के चौखठि में बान्हि देला सें ओकर सामाजिक धार कुनहटएबा के जोखिम सेहो छै — दूषण-पाँजि आरो कौलीनतावादी शुद्धतावाद के जे आन्तरिक विखण्डन के ओर किरणजी के लेखन के संकेत छेलै, से पूरा विकसित नै भेलै। पाँचम, ’मैथिल आँखि’ स्थानीय नजर के सशक्त अवधारणा छै, मतरकि एकर सीमा स्पष्ट नै — की ई नजर सब जाति, लिङ्ग, वर्ग, धरम आरो क्षेत्र के मैथिल अनुभव के समान रूप सें ग्रहण करैछै, अथवा शिक्षित पुरुष-केन्द्रित सांस्कृतिक नजर पुनः ’सम्पूर्ण मिथिला’ के नामपर स्थापित होय छै? छठम, किरणजी के काव्य-कृति (पराशर जइसन)के आलोचकीय नजर सें हुनकर आलोचना-गद्य के अन्तर्सम्बन्ध के — कवि-आलोचक के द्वैध व्यक्तित्व के — कोय विवेचन नै; ई पक्ष तेरहम अध्याय में फराक चलि गेलै, दुनू के सेतु नै बनल। साथे, पुरान रचना सब में आधुनिक राष्ट्रीयता, वर्ग-संघर्ष अथवा लोकतान्त्रिक मूल्य खोजै काल ऐतिहासिक दूरी के सावधानी हरदम नै राखलों गेलै।
४.४ कन्यादान-पाठ : सीमा
ई प्रखर निबन्ध के पहिलों सीमा छै प्रश्न-शृंखला के अनुत्तरता — ‘एकर उत्तरदायी के?’ बार-बार पूछल गेलै (अशिक्षा? माए-बाप? सर-कुटुम्ब? समाज?), मतरकि लेखक अपन फैसला सप्रमाण नै देलकै; उपेक्षिता के आँखि सें पढ़ैके जे प्रतिज्ञा छेलै, से अन्ततः प्रश्नवाचक मुद्रा में स्थगित होय गेलै। दोसरका, कन्यादान के हास्य-रस के पक्ष — जे कृति के लोकप्रियता के मूलाधार छै — के रस-शास्त्रीय परीक्षा नै भेलै : हास्य के आलम्बन अबोध बुच्ची छै की अपने अर्ध-शिक्षित समाज, हास्य के भीतर करुण के अन्तर्धारा कोन विन्यास सें बहै छै, कथावाचक के दूरी आरो विडम्बनात्मक द्वयर्थता के विश्लेषण, आरो पाठक के असहज हँसी के परीक्षण — ई प्रश्न अस्पर्शित रहलों; कतोक स्थानपर पुनर्पाठ अभियोग-पत्र बनि जाय छै आरो साहित्यिक पात्र के प्रत्येक व्यवहार के प्रत्यक्ष सामाजिक यथार्थ मानि लेखक अथवा कृति के नैतिक दोष निर्धारित करना विधागत रूप सें जोखिमपूर्ण छै, कारण कन्यादान हास्य, व्यङ्ग्य, विडम्बना, अतिरञ्जना आरो सामाजिक प्रकार-निर्माण के रचना छै। तेसरका, द्विरागमन — जे में हरिमोहन झा अपने कथा के उत्तर-पक्ष रचलनि — के चर्चा के अभाव सें मूल्याङ्कन आधा पाठ पर ठाढ़ छै; उपन्यास-युग्म के पूरा पाठेँ लेखकीय नजर के न्याय होय कें सकै छेलै। चौथका, पूर्ववर्ती उपन्यास के साक्षर नारी-पात्र के जे तालिका छै, ओ मात्रात्मक साक्ष्य छै — ओहि पात्र सब के साक्षरता कथानक में कतेक केन्द्रीय छै आरो बुच्ची के निरक्षरता कतेक, ई गुणात्मक तुलना के बिना ’पाछाँ हटब’ के स्थापना पूरा-प्रमाणित नै कहल जा सकै छै। पाँचम, बुच्ची के निरक्षरता अपने व्यंग्य के अस्त्र — समाज के आत्म-दर्शन के दर्पण — रूप में सप्रयोजन रचना तें नै छै, ई प्रश्न छूटल; साथे बुच्ची दाइ के सम्भावित अन्तःचेतना, मौन के प्रतिरोधी अरथ, स्त्री-समुदाय के पारस्परिक सम्बन्ध आरो घरेलू ज्ञान के विस्तार पूरा रूप सें विकसित नै भेलै। छठम, पति-पत्नी में भाषिक असमानता के प्रश्न मूल्यवान छै, तइयो हिन्दी बोलब खाली सांस्कृतिक अनात्मीयता के निश्चित परमाण मानना सरल निष्कर्ष होय कें सकै छै — वर्ग, शिक्षा, नगर-ग्राम दूरी आरो वैवाहिक अपरिचय के संयुक्त प्रभाव के विश्लेषण अपेक्षित छेलै।
४.५ अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह : सीमा
लेखक अपने स्वीकारै छै जे छिड़िआएल कविता में सें ‘किछु मात्रे झोड़ि’ सकलै — ई ईमानदार स्वीकारोक्ति प्रशंसनीय छै, मतरकि एकर नतीजा ई जे निष्कर्ष सब (निरपेक्षता, अनुदार समकालीनता के शिकार) सीमित नमूना पर ठाढ़ छै आरो सामान्यीकरण के वैधता संदिग्ध रहै छै — सीमित आरो बिखरल उदाहरण के आधारपर कवि के सम्पूर्ण काव्य-नजर निर्धारित करना सावधानी माँगै छै। दोसरका, कतोक प्राकृतिक प्रतीक के प्रत्यक्ष राजनीतिक रूपक मानलों गेलै — ‘पछबा’ पाश्चात्य संस्कृति आरो ‘शरदागम’ औपनिवेशिक क्षय के प्रतीक अवश्य होय कें सकै छै, मतरकि प्रतीक के ई अरथ कविता के आन्तरिक बनावट, रचनाकालीन साक्ष्य आरो अन्य कविता सें पुष्ट होयबा के चाही; जीवनीपर के तथ्य आरो काव्यार्थ कतोक स्थानपर एक-दोसरका में मिलि जाय छै, आरो कवि के जिनगी के राष्ट्रीय वातावरण सें ई स्वतः सिद्ध नै होय छै जे प्रत्येक परकृति-कविता राजनीतिक ध्वनि राखै हो। तेसरका, गद्य-कृति — श्रीचामुण्डा आरो पंचवटी उपन्यास — के नाममात्र उल्लेख भेलै; ‘अनालोचित’ के पुनर्वास के जे प्रतिज्ञा छेलै, से कविता तक सीमित रहि गेलै आरो कवि के आधा व्यक्तित्व एहू अध्याय के बाद अनालोचिते रहलों। चौथका, विवरण-बाहुल्य छै — जिनगी-वृत्त, पत्रिका-नाम, तिथि — मतरकि काव्य-शास्त्रीय विश्लेषण (छन्द-विधान, बिम्ब-योजना, भाषिक स्तर) ’शरदागम’ आरो ’पछबा’ के बाहर विरल छै; फलतः लक्ष्मीपति सिंह महत्त्वपूर्ण विचार के रूप में उभरै छै, मतरकि कवि के खास कलात्मक स्वर कम स्पष्ट होय छै। पाँचम, कवि के दरबारी-सामन्ती परिवेश के सान्निध्य सें हुनकर वर्ग-नजर कोना प्रभावित भेलै — पाश्चात्य संस्कृति के विरोध के संग गाम के जमीन्दारी शोषण के विरुद्ध हुनकर काव्य में कोन स्वर छै — ई वर्ग-प्रश्न अस्पर्शित रहलों। छठम, कवि के हिन्दी-लेखन आरो मैथिली-लेखन के अन्तर्सम्बन्ध के प्रश्न — द्विभाषिक कवि-चेतना के गति — उठाओल नै गेलै, जब कि पोथी के अन्तिम अध्याय के द्विभाषिकता-विमर्श सें एकर सोझ संगति बनि सकै छेलै।
४.६ यात्री के भाषा : सीमा
पहिलों, चारू उपकरण पश्चिमी शैलीविज्ञान सें आनल गेलै आरो भारतीय काव्यशास्त्र सें संगति-स्थापन (‘निरंकुशाः कवयः’, वक्रोक्ति-सम्प्रदाय) संकेत-खाली रहि गेलै; कुन्तक के छह वक्रता-भेद सें चयन-विचलन के व्यवस्थित मिलान भेलै रहितै के तें पूर्व-पश्चिम-सेतु पूरा बनितै के — से अवसर छूटि गेलै। दोसरका, उदाहरण चयन मुख्यतः सफल भाषिक प्रयोगपर केन्द्रित छै आरो विश्लेषण-सामग्री मुख्यतः पत्रहीन नग्न गाछ पर; यात्री के कमजोर, अतिशय कृत्रिम, अस्पष्ट अथवा समयबद्ध शब्दनिर्माण के परीक्षण, आरो हुनकर परवर्ती संग्रह आरो गद्य के व्यवस्थित समावेश कैल गेलै रहितए तें ’यात्रीक भाषा’ के पूरा चित्र आरो सन्तुलित होय। तेसरका, विचलन के कतोक स्थानपर अपने सुन्नरता के परमाण मानलों गेलै, मतरकि प्रत्येक व्याकरणिक उल्लङ्घन कलात्मक नै होय छै — औचित्य, प्रसङ्ग, अरथ-स्पष्टता आरो पाठकीय प्रभाव के कसौटीपर प्रत्येक विचलन के अलग परीक्षा आवश्यक छै। चौथका, ’भाषाक भूगोल’ के आकर्ष के रूपक अपरिभाषित रहलों — एकर मानचित्रण (कोन अंचल के, कोन वर्ग के, कोन व्यवसाय-क्षेत्र के सबद-सम्पदा यात्री कतऽ सें आनलकै) बिना ई रूपक अलंकारे रहि जाय छै, विश्लेषण-उपकरण नै बनैछै; साथे ’देशज’ के गौरव उचित छै, मतरकि भाषा सदा मिश्रित आरो परिवर्तनशील होय छै — देसज आरो आगन्तुक के कठोर विभाजन अपने ऐतिहासिक रूप सें अस्थिर छै। पाँचम, समानान्तरता-खण्ड में मामा-गीत के उद्धरण दीर्घ छै मतरकि ओकर सामाजिक व्यंग्य-पाठ (मध्यवर्गीय जिनगी-वृत्त के विडम्बना) संक्षेप में निपटा देल गेलै — शैली-विश्लेषण अरथ-विश्लेषण सें आगू भागि गेलै; ध्वनि-बनावट, वाक्य-दीर्घता, कथन-स्वर, संवाद, व्यङ्ग्य के बहुस्तर, भाषिक संकरता आरो विभिन्न विधा में भाषा-परिवर्तन के पर्याप्त विवेचन सेहो नै छै।
४.७ मनमोहन झा : सीमा
ई संग्रह के लघुतम अध्याय छै आरो एकर लघुते एकर मुख्य सीमा छै। ’अनालोचित पक्ष’ के घोषणा भेलै, मतरकि विश्लेषण कथा-सार के स्तर पर रहि गेलै — पात्र के उद्धरण छै, कथा-शिल्प के (दृष्टिबिन्दु, कथन-भंगिमा, समय-विन्यास, संवाद, कथन-गति, करुणा आरो राष्ट्रीयता के रचनात्मक सन्धिक) विवेचन नै। अध्याय पात्र के कथन, कथावाचक के नजर आरो लेखक के विचार में पर्याप्त भेद नै करैछै — कोय पात्र राष्ट्र अथवा मिथिला के लेली आत्मोत्सर्ग के बात कहैछै, ओकरा सें सम्पूर्ण कथा अथवा लेखक के अन्तिम विचार स्वतः निर्धारित नै होय छै। राष्ट्रीयता आरो मैथिल उपराष्ट्रीयता के प्रायः सकारात्मक नैतिक मूल्य मानि लेली गेलै — राष्ट्रवाद के भीतर जाति, वर्ग, लिङ्ग, धरम आरो क्षेत्रीय प्रभुत्व के सम्भावना प्रश्नांकित नै भेलै, आरो उपराष्ट्रीय गौरव के भीतर निम्नवर्गीय समाज के मूल प्रश्न (भूख, बेगारी) ओझल रहि गेलै। आत्मबलिदानी स्त्री-पात्र सब के प्रशंसा करै समय ई पूछब आवश्यक छेलै जे स्त्री के स्वाधीनता हुनकर अपन जिनगी-चयन में छै अथवा पुरुष-निर्धारित राष्ट्र आरो संस्कृति के लेली बलिदान में — नारीवादी नजर सें त्याग के महिमामण्डन पितृसत्तात्मक आदर्श के पुनः पुष्ट करि सकै छै। करुण-रस के ख्याति आरो नव-प्रतिपादित राष्ट्रीय स्वर के अन्तःसम्बन्ध के रस-शास्त्रीय मीमांसा — करुणा राष्ट्रीय चेतना के उद्दीपन बनैछै की अवरोध — सर्वथा अस्पर्शित छै। निधन के दसम दिन लिखल गेला के कारण श्रद्धांजलिक आर्द्र स्वर आलोचना के तटस्थता पर भारी छै; बंगला कथा के प्रभाव के जे प्रचलित चर्च छै, ओकर परीक्षण स्थगित रहि गेलै।
४.८ प्रवासी के योगदान : सीमा
पहिलों, प्रवासी-निवासी के निर्धारण हेतु विदेसी मुद्रा-विनिमय अधिनियम के विधिक कसौटी के परयोग साहित्यिक-सांस्कृतिक विश्लेषण लेली अटपटाह छै — लेखक अपने एकर असंगति देखाबैछै, मतरकि तब अपन वैकल्पिक कसौटी (‘सांस्कृतिक मिथिलाक सघनता’)के कोय परिचालनीय परिभाषा नै दैछै; नेपाल-तराइ के सांस्कृतिक निरन्तरता के कारण ’प्रवास’ सें बाहर राखैके तर्क भावनात्मक रूप सें सशक्त छै, मतरकि राजनीतिक सीमा, नागरिकता, प्रशासन, आर्थिक सम्बन्ध आरो भिन्न ऐतिहासिक अनुभव के वास्तविकता सेहो विचारणीय छै। दोसरका, प्रवासी पत्रकारिता के इतिहास मुख्यतः शिक्षित पुरुष सम्पादक आरो प्रतिष्ठित पत्रिका के इतिहास बनि रहि जाय छै — महिला सम्पादक, मुद्र के, वितर के, पाठिका, आर्थिक सहयोगी, ग्रामीण ग्राहक आरो पत्राचार-लेखक के भूमिका बहुत कम देखाइत छै; साथे सम्पादक-वर्ग के अपन सामाजिक स्थिति — जमीन्दार-संभ्रान्त वर्ग के संरक्षण आरो ओकर वैचारिक प्रभाव — के वर्ग-विश्लेषण नै भेलै। तेसरका, अध्याय आँकड़ा-रहित छै — कोन पत्रिका कतेक दिन चलल, प्रसार-संख्या, ग्राहक-वर्ग, वितरण-क्षेत्र, अरथ-स्रोत, नियमितता, प्रतिबन्ध, राजकीय दबाव आरो पाठकीय प्रतिक्रिया — पत्रकारिता के इतिहास-लेखन जे परिमाणात्मक आधार के अपेक्षा करैछै, से एहिजा नै छै; पत्रिका के वैचारिक प्रभाव के आकलन मुख्यतः सम्पादकीय सामग्री सें भेलै। चौथका, स्वाधीनोत्तर काल के सर्वेक्षण असन्तुलित छै — मिथिला दर्शन के चर्च भेलै, मतरकि दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता के परवर्ती पत्रिका-प्रयास ’नाम गनाएब’ सें आगू नै गेलै। पाँचम, प्रवासी-योगदान के छाया-पक्ष — प्रवास-जन्य आदर्शीकरण, मिथिला के यथार्थ सें दूरी, भावु के अतीत-मोह — के आलोचनात्मक परीक्षा नै भेलै; योगदान के अभिनन्दन छै, योगदान के सीमा के हिआओल नै। छठम, पत्रकारिता आरो साहित्यिक पत्रिका के सीमा कतोक स्थानपर धुँधला छै — साहित्यिक विशेषाङ् के, सामाजिक पत्रिका, समाचार-पत्र आरो विचार-पत्र के अलग कार्यपद्धतिक बेसी स्पष्ट वर्गीकरण अपेक्षित छेलै।
४.९ दीनाभद्री : सीमा
पहिलों, पाठ-प्रामाणिकता के जे केन्द्रीय प्रश्न उठावल गेलै — कोन पाठ आधार मानल जाए — ओकर समाधान लेखक अपने नै देलकै; समीक्षित पाठक समालोचनात्मक संस्करण (पाठान्तर-सूची सहित) तैयार करैके जे स्वाभाविक अगिला डेग छेलै, से प्रस्तावो रूप में नै आयल। साथे लोकगाथा के एक मूल पाठ खोजबा के प्रवृत्ति अपने मौखिक परम्परा के बहुरूपता सें मेल नै खाइत — प्रत्येक क्षेत्र, गायक, अवसर, जातीय उपसमूह आरो पीढ़ी अपन पाठ निर्मित करैछै। दोसरका, ग्रियर्सन के संकलन महत्त्वपूर्ण छै, मतरकि औपनिवेशिक सङ्कलक, अनुवादक, लिप्यन्तर के आरो सम्पादक के मध्यस्थता के आलोचनात्मक परीक्षण पर्याप्त नै — घुमन्तू गायक के जीवित प्रस्तुति लिखित पाठ में आबि कतेक बदलल, ई प्रश्न आवश्यक छै। तेसरका, महेन्द्रनारायण राम आरो फूलो पासवान के दावा के खण्डन में जे कठोरता छै (‘इतिहास-सम्मत नहि’, ‘नकारात्मक दृष्टि’), से हुनकर संकलन-श्रम के स्वीकृतिक संग सन्तुलित नै भेलै — प्रत्यालोचना के जे मर्यादा-सूत्र तेसरका अध्याय में प्रतिपादित छै, से एहिजा कुछ शिथिल छै। चौथका — आरो ई गम्भीरतम — दलित लोकगाथा के विवेचन पूर्णतः अभिजात आलोचकीय स्थिति सें भेलै : मुसहर समुदाय के अपन गायक, अपन भगता, अपन वर्तमान वाचिक परम्परा के कोय प्रत्यक्ष साक्ष्य (क्षेत्र-कार्य) नै छै; जे तेलुगु दलित-विमर्श के उद्धरण अध्याय में छै — जे कहैछै जे दलित-विषय में बाजबा के अधिकार पर अपने दलित-स्वर के दावी छै — ओकर आलोक अपनहि पद्धति पर नै पड़ल; बाहरी आलोचक के व्याख्या आरो समुदाय के आत्मव्याख्या में अन्तर होय कें सकै छै। दीनाभद्री के गाथा के प्रेतयोनि सें मुक्ति आरो तीर्थ-पूजा जइसन सनातनी ढाँचा में राखि पढ़ला सें हुनकर स्वायत्त विद्रोही रूपक संस्कृतिकरण के जोखिम सेहो प्रश्नांकित नै भेलै। पाँचम, गाथा के स्त्री-पात्र (निरसो, हिरिया, जिरिया)के भूमिका के स्वतन्त्र विश्लेषण नै भेलै — निम्नवर्गीय विमर्श के भीतरो नारी-स्वर हाशिये पर रहि गेलै; साथे मुसहर समुदाय के आन्तरिक विविधता, अनुष्ठान, प्रस्तुति-सन्दर्भ, आर्थिक परिवर्तन आरो वर्तमान राजनीतिक उपयोग के विस्तृत क्षेत्रीय अध्ययन अपेक्षित छेलै।
४.१० कथा के विकास : सीमा
पहिलों, चन्द्रप्रभा के तिथि-निर्धारण (रचना १८८०के दश के तक) मुख्यतः सम्पादक लक्ष्मीपति सिंह के स्मृति-कथन (‘साठि-सत्तरि वर्ष पूर्वक’) आरो जीर्ण-शीर्ण पाण्डुलिपिक वर्णन पर आधारित छै — पाण्डुलिपि-विज्ञान के कोय बाह्य कसौटी (कागज, मसि, लिपि-शैली के काल-निर्धारण)के अभाव में प्रस्थान-बिन्दु के ई पुनर्स्थापन ओतबे दृढ़ नै छै जतेक निबन्ध के स्वर सुझाबै छै; जे कठोरता सें रामदेव झा के मदनराज-चरित-विषयक तिथि-भ्रम के खण्डन भेलै, ओहि कठोरता के परयोग अपन पक्ष के साक्ष्य पर नै भेलै — ई मापदण्ड के द्वैध छै। दोसरका, आत्म-सन्दर्भ के सघनता — मैथिली के आरम्भिक कथा, मिथिला दर्पण, निर्दयी सासु आदि उद्धृत स्रोत के सम्पादक अपने लेखक छै; सम्पादन-श्रम स्तुत्य छै, मतरकि अपनहि सम्पादित सामग्री के निर्णायक परमाण बनएबा में स्वार्थ-संलग्नता के आभास अनिवार्य छै, जेकर कोय पद्धतिगत निराकरण (स्वतन्त्र साक्ष्य सें पुष्टि) नै कैल गेलै। तेसरका, जलधर झा के ‘विलक्षण दाम्पत्य’ के विधागत स्वरूप — रम्य-रचना, समाचार-मूल के गद्य की कथा — के जे विवाद छै, से अनिर्णीत छोड़ल गेलै; ’आद्य कथा मानबाक औचित्य नहि’ कहल गेलै मतरकि कथात्व के कसौटी (कथान के, चरित्र, परिणति) सूत्रबद्ध नै भेलै — मौखिक आख्यान, व्रतकथा, नीति-कथा, आख्यायिका, उपन्यास आरो आधुनिक लघुकथा के विधागत भेद सेहो पर्याप्त कठोरता सें निर्धारित नै छै। चौथका, लुप्त सामग्री के सम्भावना इतिहास के महत्त्वपूर्ण प्रश्न छै, मतरकि ‘उपलब्ध नहि अछि’ सें ’अवश्य छल’ तक पहुँचब अनुमानक छलाँग होय छै — पाण्डुलिपि, उल्लेख, प्रकाशन-विज्ञापन, पत्राचार आरो समकालीन समीक्षा जइसन बाहरी साक्ष्य आवश्यक छै; वाचिक कथा-परम्परा के तेसरका धारा के स्थापना सेहो रमानाथ झा के पुरान कथन पर आश्रित छै, स्वतन्त्र क्षेत्र-साक्ष्य गायब। पाँचम, पुरुषपरीक्षा के अनुवाद प्रभावहीन छेलै — ई सम्भव निष्कर्ष छै, मतरकि एकर प्रचार, पाठक-संख्या आरो प्रभाव के अभाव के प्रत्यक्ष परमाण सेहो सीमित छै; प्रभाव केवल लोकप्रियता सें नै, भाषिक अथवा शैलीगत अनुकरण सें सेहो निर्धारित होय छै। छठम, चन्द्रप्रभा के राजनीतिक प्रतीकात्मक पाठ रोच के छै, मतरकि प्रत्येक राजा-प्रजा कथा औपनिवेशिक प्रतिरोधक रूपक हो, ई निश्चित नै — सामाजिक नीति-कथा, राजधर्म आरो पुरातन उपदेश-परम्परा के सम्भावना समान रूप सें जाँचल जाएबा के चाही।
४.११ भूकम्प : सीमा
अध्याय द्वि-केन्द्रित छै — सीताराम झा आरो कृष्णनन्दन सिंह — आरो १९८८के संकलन के परयोग चयनित उद्धरण तक सीमित; संकलन के पूरा प्रवृत्ति-विश्लेषण (कतेक कवि, कोन-कोन नजर, कोन छन्द-परम्परा) नै भेलै। दोसरका, अध्याय कविता के ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में प्रभावपूर्ण ढङ्ग सें पढ़ै छै, मतरकि दस्तावेजी मूल्य काव्यात्मक मूल्यपर भारी पड़ैछै — छन्द, ध्वनि, गति, विराम, पुनरावृत्ति आरो भयान के रस के बनावट के तुलनात्मक विश्लेषण सीमित छै; आपदा-वर्णन लेली छन्द के औचित्य-प्रश्न — करुण-रस आरो बद्ध-छन्द के सम्बन्ध — अस्पर्शित रहलों। तेसरका, भूकम्प के लोक-स्मृति — लोकगीत, कहबी, जनश्रुति — सर्वथा छूटल, जब कि लोकगीत-अध्याय के लेखक सें ई स्रोत के उपयोग के अपेक्षा स्वाभाविक छेलै; शिष्ट काव्य आरो लोक-अभिव्यक्तिक तुलना सें आपदा-स्मृतिक द्विस्तरीय पाठ बनि सकै छेलै। चौथका, कम्पकारिका के ‘धर्मशाला बँचि गेल, काशी-वैद्यनाथ मन्दिर बँचल’ जइसन पाँती के जे दैवी-लीला-पर के व्याख्या कवि के छै, ओकर आलोचनात्मक परीक्षण (भवन-बनावट के भौतिक कारण बनाम आस्था-पाठ) नै भेलै — आलोचक एहिजा कवि के विश्व-नजर के वर्णनकर्ता रहि गेलाह, विश्लेष के नै बनलाह; धार्मिक विश्वास आरो वास्तविक विनाश-वितरण के अन्तर्विरोध पर्याप्त प्रश्नांकित नै भेलै। पाँचम, पीड़ित स्त्री, दलित बस्ती, भूमिहीन मजदूर, अपाङ्ग व्यक्ति आरो अनाथ बुतरू के अलग अनुभव के खोज कम छै — राहत-वितरण आरो पुनर्वास में वर्ग-भेद आरो जाति-भेद पर रचित लोक-अभिव्यक्ति उपेक्षित रहलों; ’सम्पूर्ण मिथिला’ के सामूहिक त्रास के भीतर सामाजिक विषमता छिपि सकै छै। साथे भूकम्प के कारण, भूगर्भीय बनावट, राहत-नीति, मृत के-संख्या आरो सामाजिक वितरण के ऐतिहासिक स्रोत सें काव्य-वर्णन के तुलना कैल जाय तें साहित्य आरो इतिहास के सम्बन्ध बेसी स्पष्ट होय।
४.१२ कोसी : सीमा
ई अध्याय संग्रह के सबसें बेसी वर्णनात्मक छै — कवि-दर-कवि उद्धरण-माला छै, मतरकि विश्लेषण के सूत्र पातर। पहिलों, बाढ़िक राजनीतिक अर्थशास्त्र — बान्ह-निर्माण के इतिहास, कोसी-परियोजना, नेपाल-भारत जल-सन्धि, गाद, धारा-परिवर्तन, जल-प्रबन्धन, तटबन्ध के भीतर के बस्ती के स्थायी विस्थापन — के कोय चर्च नै; ‘लोककृत त्रासदी’ के पद एक ठाम आयल छै, मतरकि ओकर विस्तार नै भेलै, जेकरा सें बाढ़ि प्रायः नियतिक प्रकोप बनल रहि गेलै आरो सरकारी नीतिक आलोचना नैतिक रूप सें प्रभावी मतरकि नीतिगत रूप सें अपूर्ण रहि जाय छै। दोसरका, कथा-उपन्यास के (पंचवटी, लिली रे के पटाक्षेप, इन्किलाब) खाली नामोल्लेख छै — ’बाढ़ि-साहित्य’ के जे व्यापक शीर्ष के-ध्वनि छै, से कविता तक सिकुड़ि गेलै। तेसरका, लोकगीत के कोसी-उपराग के जे मार्मिक सन्दर्भ शीर्षकहि में छै, ओकर पाठ-विश्लेषण अत्यल्प छै — शीर्ष के जे वादा करैछै, पाठ से पूरा नै करैछै। चौथका, कविता के कतोक स्थानपर प्रत्यक्ष सामाजिक प्रतिवेदन के समान पढ़ल गेलै — कविता में अतिशयोक्ति, प्रतीक, भावात्मक संक्षेप आरो वक्ता के काल्पनिकता सेहो होय छै; साथे नदी के ’माइ’ कहना आत्मीय छै, मतरकि मातृत्व के प्रतीक प्राकृतिक विनाश के भाग्य अथवा देवी के कोप मानि राजनीतिक उत्तरदायित्व धुँधला करि सकै छै — नदी नै, अनुचित बान्ह, कमजोर प्रशासन, भ्रष्ट राहत आरो असमान बसावट अनेक त्रासदी के कारण होय छै, आरो शृंगारिक-कारुणिक व्याख्या में रोमानीकरण के जोखिम रहै छै। पाँचम, बाढ़िक बोझ स्त्री, निम्नजाति, भूमिहीन, पशुपालक आरो प्रवासी मजदूरपर भिन्न-भिन्न पड़ैछै — ई अन्तरसम्बन्धी विश्लेषण के विस्तार अपेक्षित छेलै। छठम, बाढ़ि-वर्णन के पुनरावृत्ति-दोष — प्रत्येक वर्ष एकहि अनुभव के एकहि प्रकारक अभिव्यक्ति — के जे संकेत लेखक अपने दैछै, ओकरा कसौटी बना कें कविता सब के तारतम्य-फैसला (के रूढ़ि, के मौलिक) नै कैल गेलै।
४.१३ महाकाव्य में युग-सन्दर्भ : सीमा
पहिलों, पाँच महाकाव्य के चयन परयोजन-आधारित घोषित छै, मतरकि बहिष्करण के तर्क अपूर्ण — ‘शेष महाकाव्य युग-सन्दर्भसँ हीन नहि’ कहि आगू बढ़ि जाएब चयन-पूर्वाग्रह के प्रश्न खुजल छोड़ि दैछै; कीचकवध, दत्तवती वा चित्रा जइसन कृति के अनुपस्थितिक कारण-कथन अपेक्षित छेलै, आरो शेष महाकाव्य के उल्लेख खाली सें ई निर्धारित नै होय छै जे चुनल कृति सम्पूर्ण परम्परा के पर्याप्त प्रतिनिधित्व करैछै। दोसरका, तीनू पुरस्कृत महाकाव्य के चयन सें जे प्रतिष्ठान-निरपेक्षता के दावी पोथी के स्वर छै, ओकरा में व्यवधान आबैछै — साहित्य अकादमी के स्वीकृतिक छाया चयन पर देखि पड़ैछै। तेसरका, युग-सन्दर्भ के खोज में काव्यत्व गौण होय गेलै — रस-निष्पत्ति, बिम्ब-विधान, छन्द-परयोग, महाकाव्यत्व के शास्त्रीय लच्छन (सर्ग-बद्धता, नायक-स्वरूप, व्यापक कथान के, उदात्त शैली, चरित्र-विकास, वर्णन, संवाद) पर प्रायः मौन; फलतः महाकाव्य विचार-वाहक प्रलेख जइसन पढ़ाएल, काव्य जइसन कम। चौथका, पुराण के पात्र के आधुनिक स्वतन्त्रता सेनानी, समाज-सुधार के, कृष के अथवा क्षेत्रीय राष्ट्रवादी के रूप में पढ़ना फलदायी छै, मतरकि ऐतिहासिक वर्तमानवाद के जोखिम सेहो छै — पुरान मिथ के आधुनिक विचार के सीधा पूर्वरूप नै। पाँचम, कृतिवार विस्तार असन्तुलित छै — सुभद्राहरण आरो पराशर के जतेक स्थान, राधाविरह आरो त्रिपुण्ड के ओकरा सें बहुत कम; नारी-सशक्तीकरण के जे स्थापना राधाविरह सें जोड़ल गेलै, से दू-तीन उद्धरण के भरोसे छै आरो विप्रलम्भ-शृंगार के प्रधान रस सें ई सामाजिक पाठक सम्बन्ध के मीमांसा नै भेलै — राधा के कर्तव्य पुनः पति आरो राष्ट्र के सेवा सें निर्धारित छै; स्त्री के आत्मनिर्णय, देह, कामना आरो निजी जिनगी के स्वतन्त्र मूल्यपर चर्चा सीमित रहि जाय छै। छठम, अगस्त्यायनी आरो पराशर जइसन कृति में जाति-संघर्ष आरो आभिजात्य व्यवस्था के जे प्रश्न निहित छै, ओकर सामने-सोझी विखण्डन के स्थान पर ’युग-धर्म’ के सामान्य विमर्श तक रुकि जाएब सामन्ती बनावट के पूरा आलोचना के अवसर गमा दैछै।
४.१४ नऽव गीत : सीमा
पहिलों, ’नऽव गीत’ के अवधि आरो व्याप्तिक निर्धारण अस्पष्ट रहलों — कोन तिथि सें, कोन कृति सें एकर आरम्भ मानल जाए, कोन-कोन गीतकार ई कोटि में आबैछै — एकर कोय सूची वा काल-रेखा नै; परिभाषा मूल्यबोध-आधारित छै, मतरकि मूल्यबोध के कसौटी व्यक्तिनिष्ठ रहि गेलै, आरो ई परिभाषा सें अनेक आधुनिक कविता स्वतः नऽव गीत के भीतर आबि सकै छै — गीतत्व के खास कसौटी स्पष्ट नै। दोसरका, साक्ष्य-आधार तीन-चार गीतकार (गुंजन, प्रवासी, बुद्धिनाथ मिश्र) तक सीमित — एतेक पातर आधार पर पूरा प्रवृत्ति-निर्धारण आगमन-दोष सें ग्रस्त छै; नऽव गीतकारक सामाजिक स्थिति, प्रकाशन-मञ्च, पाठक, पीढ़ीगत अन्तर आरो स्त्री-गीतकारक योगदान के विस्तृत मानचित्र नै बनैछै। तेसरका, नऽव गीत आरो नऽव कविता के भेद-विवेचन सूत्र-रूप में दऽ विस्तार हेतु अपनहि पोथी के सन्दर्भ देल गेलै — आत्म-निर्देश के ई प्रवृत्ति पाठक के अपूर्ण तर्क के संग छोड़ि दैछै। चौथका, गीत के गीतत्व — गेयता, स्वर-विधान, आरोह-अवरोह, ध्वनि-क्रम, अन्त्यानुप्रास, मात्रा, आवृत्ति, लोक-धुन सें सम्बन्ध आरो सामूहिक गायन-सम्भावना — पर कोय विचार नै; ’लयात्मक सम्मिश्रण’ के पद आयल, मतरकि लय-विश्लेषण के कोय उदाहरण नै, जब कि गीत-विधा के प्राण गेयते में बसै छै — सामाजिक विषय खाली सें रचना गीत नै बनैछै। पाँचम, पारम्परिक प्रेम, भक्ति अथवा परकृति-काव्य के कतोक स्थानपर रूढ़ि मानि छोड़ि देल गेलै — मतरकि आधुनिकता केवल विषय-परिवर्तन नै; पुरान विषयक नया संवेदना आरो रूपान्तरण सेहो आधुनिक होय छै। छठम, वर्तमान युग में नव माध्यम — ध्वनि-दृश्य मञ्च, अन्तर्जाल आरो ई-पत्रिका — सें होय कें रहलों गीत के लोकतन्त्रीकरण के चर्च नै छै; गीत-विमर्श पारम्परिक मुद्रित संकलन के सीमा में रहि गेलै।
४.१५ वर्तमान धारा : सीमा
पहिलों, ई व्याख्यान-पाठ छै आरो ओकर श्रोता-सापेक्षता निबन्ध में बनल रहि गेलै — पूर्वांचलीय भाषा-बन्धुत्व के दीर्घ भूमिका (जे भुवनेश्वर के सभा लेली सार्थक छेलै) पोथी के पाठक लेली विषयान्तर जइसन लागैछै आरो ‘वर्तमान धारा’ के मूल विवेचन लेली स्थान घटा दैछै। दोसरका, ’वर्तमान धारा’ के चारू विषय बहुत व्यापक छै — मानव-संकट, उपभोक्तावाद, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद आरो पर्यावरण लगभग सम्पूर्ण आधुनिक साहित्य के समेटि सकै छै; काव्य-आन्दोलन, पीढ़ी, रूप, भाषा आरो सौन्दर्यबोध के आधारपर बेसी बारीक वर्गीकरण अपेक्षित छेलै, आरो धारा-विभाजनक पारस्परिक अतिच्छादन (उपभोक्तावाद आरो सांस्कृतिक साम्राज्यवाद कतऽ फराक?) पर विचार नै। तेसरका, चारू धारा के साक्ष्य-घनत्व असमान छै — मानव-संकट आरो सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के धारा सुसाक्षित, मतरकि उपभोक्तावाद-विरोध के धारा एक-दू उद्धरण पर; चुनल कविता के संख्या सीमित छै आरो ताहिपर आधारित व्यापक निष्कर्ष सम्पूर्ण वर्तमान मैथिली कविता के प्रतिनिधित्व के दावा पूरा रूप सें सिद्ध नै करैछै। चौथका, वर्तमान धारा के सूची में नारी-स्वर आरो दलित-स्वर के अनुपस्थिति खटकै छै — जे आलोचक के अपन पोथी में उपेक्षिता आरो दीनाभद्री पर स्वतन्त्र अध्याय छै, हुनकर वर्तमान-धारा-चित्रण में ई दुनू धारा नै गनाएब आन्तरिक संगति के अभाव छै; स्त्रीवादी, दलित, आदिवासी, प्रवासी, अन्तर्जालीय आरो प्रयोगधर्मी कविता के अलग वर्तमान धारा के रूप में पर्याप्त स्थान नै भेटल, आरो विमर्श मुख्यतः प्रतिष्ठित केन्द्र के कवि तक सीमित रहि गेलै। पाँचम, नेपाल के मैथिली कविता के भिन्न प्रवृत्तिक जे संकेत छै (’राजतन्त्रक भयसँ भिन्न रहल’), ओकर एकोटा उदाहरण नै — स्थापना निराधार लटकल छै। छठम, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के विवेचन कतोक स्थानपर स्थानीय संस्कृति बनाम बाहरी संस्कृति के द्वैत बना दैछै — संस्कृति सदैव आदान-प्रदान, मिश्रण, ग्रहण आरो प्रतिरोध सें विकसित होय छै; प्रत्येक बाहरी प्रभाव विनाशकारी नै आरो प्रत्येक स्थानीय परम्परा मुक्तिकामी नै।
४.१६ लोकगीत : सीमा
पहिलों, ई स्वतन्त्र निबन्ध नै, कार्यपत्र पर टिप्पणी छै आरो एकर बनावट में से झलकैछै — आरम्भ में कार्यपत्र के पद्धति-दोष के चर्च, बीच में स्वतन्त्र लोकगीत-विमर्श, अन्त में नीति-प्रस्ताव; तीनू खण्ड के सन्धि शिथिल छै। दोसरका, यूनेस्को-ढाँचा के सात संरक्षण-उपाय के जे सूची छै, से प्रायः अनूदित-प्रतिध्वनित छै — मैथिली लोकगीत के खास स्थिति (के गाओत, कोन पीढ़ी, कोन अवसर बँचल छै, कोन मरि रहलों छै)के क्षेत्र-सर्वेक्षण बिना ई उपाय-सूची यान्त्रिक अनुप्रयोग बनि गेलै; साथे अभिलेखागार, सङ्ग्रहालय आरो वर्गीकरण आवश्यक छै, मतरकि जीवित लोकगीत के स्थिर नमूना में बदलि दैके खतरा रहै छै — लोकगीत के जिनगी गायन, अवसर, देहगत प्रस्तुति, सामूहिक सहभागिता आरो परिवर्तनशील पाठ में छै, केवल ध्वनि-सङ्ग्रह में नै, आरो सांस्थानिक संरक्षण सें लोक-अभिव्यक्तिक प्रतिरोधी धार कुनहटएबा के प्रश्न सेहो विचारणीय छै। तेसरका, लोकगीत के संगीत-पक्ष — राग, ताल, स्वर-लिपिबद्धता — सर्वथा अछूत; ’अवस्था एवं संरक्षण’ के शीर्षक में जे संरक्षण छै, से पाठ-संरक्षण तक सोचल गेलै, ध्वनि-संरक्षण (स्वर-आलेखन)के चर्च नै। चौथका, सङ्कलक, शोधकर्ता आरो संस्था के अधिकार देल गेलै, मतरकि गायक समुदाय के स्वामित्व, सहमति, आर्थिक लाभ, नामोल्लेख आरो अभिलेखपर पहुँच के प्रश्न पर्याप्त विकसित नै। पाँचम, लोकगीत के भीतर के पितृसत्तात्मक स्वर — जेकर मार्मिक उदाहरण (बेटी-जन्म के अवसाद, अरजल बिआनि) अपने निबन्ध में छै — के आलोचनात्मक सामना नै भेलै; संरक्षण के उत्साह में ई प्रश्न दबि गेलै जे लोक-सम्पदा के कोन अंश संरक्ष्य छै आरो कोन अंश समीक्ष्य। छठम, लोकज्ञान में औषधीय अथवा वैज्ञानिक तत्त्व के उपस्थिति महत्त्वपूर्ण छै, मतरकि प्रत्येक परम्परागत विश्वास के वैज्ञानिक सत्य मानि लैना रोमानीकरण होयत — अनुभवजन्य उपयोगिता आरो चिकित्सकीय परमाण में भेद रहै छै; साथे स्त्री के हास्य, सामूहिक प्रतिरोध, गीत-निर्माण के अधिकार आरो जातिगत स्त्री-अनुभव के भिन्नता पर आरो विस्तार सम्भव छेलै।
४.१७ उपनिवेशवाद के नऽव चालि : सीमा
पहिलों, तंजानिया-प्रकरण के विस्तार जतेक छै, मैथिली-स्थितिक तुलनात्मक विश्लेषण ओहि अनुपात में संक्षिप्त — किस्वाहिली के जे संस्थागत आँकड़ा (बजट-प्रतिशत, नीति-तिथि) देल गेलै, ओकर समकक्ष मैथिली के कोय आँकड़ा (विद्यालय में मैथिली-माध्यम के स्थिति, निजी विद्यालय के प्रसार-संख्या) नै; दृष्टान्त सुदृढ़, अनुप्रयोग पातर, आरो प्रत्येक देश के भिन्न इतिहास, भाषिक जनसंख्या, अर्थव्यवस्था आरो शिक्षा-बनावट के अन्तर पर्याप्त स्पष्ट नै रहला तुलनात्मक निष्कर्ष कुछ स्थानपर अत्यधिक शीघ्र छै। दोसरका, विश्व बैं के, अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष आरो विदेसी सहायता भाषिक प्रभुत्व में भूमिका निभाबै छै, तइयो स्थानीय अभिजन, सरकारी अकर्मण्यता, अभिभावक के रोजगार-चिन्ता, शिक्षा के गुणवत्ता, पाठ्यपुस्तक के अभाव आरो मातृभाषी संस्था के कमजोरी सेहो जिम्मेवार छै — बाहरी षड्यन्त्र के व्याख्या आन्तरिक उत्तरदायित्व के ओझल करि सकै छै; मिथिला के भीतर के भाषिक हीनताबोध आरो आन्तरिक उपनिवेश के विखण्डन बिना बाहरी भाषिक उपनिवेशवाद सें संघर्ष अधूरा रहतै, ई प्रश्न पर्याप्त विकसित नै भेलै। तेसरका, निबन्ध निदान-प्रधान छै, चिकित्सा-न्यून — भाषा-मृत्यु के संकट देखावल गेलै, मतरकि फिशमैनहिक प्रतिवर्तन-सिद्धान्त के (भाषा-ह्रास उनटएबा के) रचनात्मक पक्ष, जे ओहि ग्रन्थ में छै, नै आनल गेलै; पाठक चेतल तें जाय छै, मतरकि दिशाहीन; साथे अंग्रेजी आरो मैथिली के सर्वथा विरोधी मानना व्यावहारिक समाधान नै — बहुभाषिक शिक्षा, मातृभाषा में आधारभूत ज्ञान, भारतीय सम्पर्कभाषा आरो अन्तरराष्ट्रीय भाषा के क्रमिक शिक्षण के समन्वित रूपपर चर्चा अपेक्षित छेलै, कारण द्विभाषिकता स्वतः भाषा-मृत्यु नै, असमान प्रतिष्ठावाली द्विभाषिकता संकट बनैछै। चौथका, व्यक्तिगत दृष्टान्त (प्राध्याप के-दम्पति, वकील साहेब, ग्रामीण महिला) नाम-सन्दर्भ-रहित छै — सत्यापन असम्भव; जे लेखक अन्यत्र अभिलेख-परमाण के आग्रही छै, से एहिजा किंवदन्ती-शैली अपना लै छै। पाँचम, आठम अनुसूची में समावेश (२००३)के ’प्राणक संचार’ के जे आशावादी विराम-बिन्दु बनाओल गेलै, ओकर आलोचनात्मक परीक्षण नै — अनुसूची-प्रवेश के दस वर्ष बाद प्रकाशित पोथी में ई प्रश्न स्वाभाविक छेलै जे संवैधानिक मान्यता सें जमीनी संक्रमण-स्थिति में की बदलल; निबन्ध के अपनहि तर्क (सरकारी मान्यता पर्याप्त नै, अन्तरपुस्तीय संक्रमण अनिवार्य) ई आशावाद के काटै छै — ई अन्तिम आत्म-विरोध अनसुलझल रहि गेलै। छठम, शहरी द्विभाषिक परिवार, मिश्रित विवाह, प्रवासी बुतरू आरो नया माध्यम में मैथिली के सम्भावना के चर्चा कम छै।
४.१८ पूरा सीमा
अध्यायवार सीमा के अतिरिक्त कुछ सीमा पूरा ग्रन्थ-स्तर के छै। पहिलों, पुनरावृत्ति : निबन्ध-संग्रह के स्वाभाविक दोष एहिजा सघन छै — किरणजी के ‘आनक कानब खसब देखि कय’ वला पद्य दू अध्याय में, सीता के ‘जनक नहि छथि राजाक दास’ वला परसंग तीन अध्याय में, भोलालाल दास-सम्बन्धी उद्धरण आरो किरण-रमानाथ विवाद के बिन्दु अनेक ठाम दोहराएल छै; सम्पादन-स्तर पर सन्दर्भ-निर्देश सें ई बँचि सकै छेलै। दोसरका, अननूदित अंग्रेजी : पाद-टिप्पणी आरो मूल-पाठ दुनू में अंग्रेजी उद्धरण के बाहुल्य मैथिली-खाली पाठक के साक्ष्य सें वञ्चित करैछै — मातृभाषा-पक्षधर ग्रन्थ के ई आन्तरिक विडम्बना छै। तेसरका, आत्म-सन्दर्भ : उद्धृत स्रोत सब में लेखक के अपन सम्पादित-लिखित पोथी के अनुपात पर्याप्त छै — ई एक ओर हुनकर अध्यवसाय के परमाण छै, दोसरका ओर परमाण-स्वातन्त्र्य के सवाल उठाबैछै। चौथका, पद्धति-वैषम्य : कुछ अध्याय (यात्री, रमानाथ झा) सिद्धान्त-सघन छै तें कुछ (कोसी, मनमोहन झा) विवरण-प्रधान; कुछ अध्याय निकट पाठपर आधारित छै, कुछ इतिहास-संशोधन के दस्तावेज, कुछ विचारात्मक प्रतिवाद — ई विविधता सें पोथी समृद्ध बनैछै, मतरकि समान कसौटी के अनुप्रयोग के अभाव में संग्रह के आन्तरिक स्थापत्य विषम लागैछै आरो एकर एकीकृत सिद्धान्त स्पष्ट नै रहि पाबै छै। पाँचम, मुद्रण-दोष : ठाम-ठाम अशुद्धि आरो सन्दर्भ-शैली के अनेकरूपता (कतहु पूरा, कतहु अपूर्ण पाद-टिप्पणी) अइसन परमाण-आग्रही ग्रन्थ के विश्वसनीयता-मानक सें मेल नै खाइत छै। छठम, समाधान-न्यूनता : संग्रह के अधिकांश निबन्ध प्रश्न आरो निदान पर विरमि जाय छै — प्रश्नोत्थापन के लेखक अपने अभीष्ट कहने छै, तइयो कम सें कम भाषा-संकट जइसन विषय में कार्य-सूत्र के अपेक्षा अतृप्त रहि जाय छै। सातम, लेखक के मैथिलीप्रेम पोथी के ऊर्जा छै, मतरकि कतोक स्थानपर ई प्रेम सांस्कृतिक आदर्शीकरण, पुरान गौरव, बाहरी शक्तिक प्रति अत्यधिक संशय अथवा राष्ट्रीय प्रतीक के अतिव्याख्या में परिणत होय छै। आठम, स्त्री, दलित, श्रमिक आरो लोक के प्रश्न उठावल गेलै, मतरकि ई सब नजर के अन्तरसम्बन्ध — जइसन दलित स्त्री, बाढ़िपीड़ित भूमिहीन स्त्री, प्रवासी मजदूर, सीमावर्ती भाषाभाषी — के व्यवस्थित विवेचन कम छै; जहाँ-जहाँ आभिजात्य वर्चस्व सें पूरा टकराएब सम्भव छेलै, ततऽ-ततऽ समीक्षा कतहु-कतहु अर्ध-प्रगतिशील रहि जाय छै।
५. पूरा आलोचनात्मक फैसला
५.१ पोथी के प्रमुख उपलब्धि
’हिआओल’ के सबसें बेसी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि ई छै जे ई मैथिली साहित्येतिहास के प्रचलित सरल रेखा के बाधित करैछै। ई पोथी पूछै छै — स्वतन्त्र भाषा कहैके अधिकार केकरा छै? साहित्यिक मानक के बनाबै छै? कोन लेखक इतिहास में प्रतिष्ठित आरो कोन विस्मृत होय छै? लोककण्ठ के सामग्री साहित्य छै कि नै? स्त्री के मौन के हास्य मानल जाए कि सामाजिक त्रास? दलित लोकनायक इतिहास के विषय काहे नै? भूकम्प आरो बाढ़ साहित्येतिहास के घटना काहे नै? प्रवासी केन्द्र मैथिली चेतना के निर्माण में की भूमिका निभाबै छै? राजनीतिक स्वतन्त्रता के बाद भाषिक पराधीनता कोना जीवित रहै छै? ई सवाल के कारण पोथी केवल आलोचनात्मक निबन्ध-संग्रह नै, मैथिली साहित्य के वैकल्पिक ज्ञान-मानचित्र बनि जाय छै।
भारतीय काव्यशास्त्र के नजर सें पोथी के आलोचना रस आरो अलंकार तक सीमित नै — ओ ध्वनि, औचित्य, वक्रोक्ति, लोकमंगल आरो साधारणीकरण के सामाजिक इतिहास सें जोड़ै छै। पाश्चात्य सिद्धान्त के नजर सें पोथी एकसाथ उत्तर-औपनिवेशिक, नव-इतिहासवादी, मार्क्सवादी, नारीवादी, दलित, रूपवादी आरो पर्यावरणीय सवाल उठाबैछै, यद्यपि लेखक ई सब सिद्धान्त के सदैव व्यवस्थित नाम आरो पद्धति सें लागू नै करैछै। विदेह समान्तर इतिहास के नजर सें ‘हिआओल’ राजकीय आरो प्रतिष्ठित इतिहास के समानान्तर निम्नलिखित इतिहास लिखैछै — भाषिक दमन के इतिहास, उपेक्षित आलोचक आरो कवि के इतिहास, अशिक्षित स्त्री के इतिहास, दलित लोकनायक के इतिहास, प्रवासी पत्र-पत्रिका के इतिहास, मौखिक कथा के इतिहास, भूकम्प आरो बाढ़ के इतिहास, लोकगीत में सुरक्षित स्त्री-श्रम आरो लोकज्ञान के इतिहास, आओर पीढ़ीगत भाषा-विच्छेद के इतिहास।
५.२ पूरा मूल्याङ्कन
’हिआओल’ के महत्त्व अन्तिम फैसला देबा में नै, सवाल के नया भूमि तैयार करबा में छै। ई पोथी पूरा साहित्येतिहास नै, मतरकि भावी साहित्येतिहास के लेली अनिवार्य संकेत-पोथी छै; ई अन्तिम सिद्धान्त नै, मतरकि स्थापित सिद्धान्त के निश्चिन्तता के भङ्ग करयवला आलोचनात्मक हस्तक्षेप छै। एकर श्रेष्ठ रूप ओतए देखाइत छै जतए लेखक विस्मृत दस्तावेज खोजैछै, स्थापित निष्कर्ष के परमाण माँगै छै, भाषिक रूपक बारीक विश्लेषण करैछै, स्त्री, लोक, दलित आरो विपत्तिग्रस्त जनक स्वर सुनै छै, आरो साहित्य के जीवित सामाजिक इतिहास सें जोड़ै छै। एकर सीमा ओतए प्रकट होय छै जतए प्रतिवाद विश्लेषणपर भारी पड़ैछै, अनुमान परमाण के स्थान लै छै, राष्ट्रीय अथवा सांस्कृतिक आस्था कलात्मक परीक्षण के दबा दैछै, आरो जटिल इतिहास सरल द्वैत में बदलि जाय छै। साथे, जहाँ-जहाँ आभिजात्य वर्चस्व सें पूरा टकराएब सम्भव छेलै, ततऽ-ततऽ समीक्षा अर्ध-प्रगतिशील रहि जाय छै — कौलीन्य, पाँजि-प्रथा आरो राज्य-प्रायोजित संस्थान के विखण्डन जतेक तीक्ष्णता सें अपेक्षित छेलै, ओकरा सें कुछ न्यून भेलै।
६. उपसंहार
समग्रतः ‘हिआओल’ मैथिली आलोचना के ओहि दुर्लभ कोटि के ग्रन्थ छै जे श्रद्धा आरो संशय — दुनू के परमाण के कसौटी पर कसै छै। भारतीय काव्यशास्त्र के नजर सें एकर मूल कसौटी औचित्य छै — सबद के औचित्य (यात्री-अध्याय), पाठक-नजर के औचित्य (कन्यादान), इतिहास-कथन के औचित्य (कथा के विकास); ध्वनि-सिद्धान्त के व्यवहार ‘शरदागम’ आरो ’पछबा’ के पाठ में, आरो रस-चेतना करुण-प्रधान अध्याय सब में हाजिर छै, यद्यपि रस-मीमांसा एकर दुर्बल पक्ष रहलों। पाश्चात्य कसौटी पर ई उत्तर-औपनिवेशिक आरो समाजभाषावैज्ञानिक विमर्श के मैथिली में अग्रणी परयोग छै, जेकर सीमा सिद्धान्त के असमान आरो कतहु-कतहु यान्त्रिक अनुप्रयोग में छै। आरो विदेह समान्तर इतिहास के नजर सें एकर महत्त्व सर्वोपरि छै — अनालोचित कवि, उपेक्षिता नायिका, दलित महानायक, प्रवासी सम्पादक, लोकगीत के अज्ञात गायिका : प्रतिष्ठान जेकरा-जेकरा हाशिया पर रखलकै, रमणजी ओकरा-ओकरा अभिलेखक बलेँ केन्द्र में आनलकै।
मतरकि एहू नजर सें एक अन्तिम सीमा-रेखा खीचब न्यायोचित होतै : समानान्तर धारा के पूरा पद्धति ओहिजा पहुँचै छै जहाँ हाशिया के स्वर अपने बाजै — ‘हिआओल’ में हाशिया लेली बाजल गेलै, हाशिया के बजाओल कम गेलै। ई अपूर्णता आगामी अनुसन्धान के निमन्त्रण छै, आरो इहे निमन्त्रण-धर्मिता — विचारकलोकनि विमर्श के हेतु हाजिर होय — ई पोथी के स्थायी मूल्य छै। मैथिली आलोचना के इतिहास में ’हिआओल’ प्रत्यालोचना के प्रतिमान-ग्रन्थ आरो समानान्तर इतिहास-लेखन के पूर्वपीठिका — दुनू रूप में स्मरणीय रहतै।
डा. रमानन्द झा ‘रमण’ के ’हिआओल’ (२०१२) मैथिली साहित्यिक आलोचना के क्षेत्र में एगो सराहनीय आरो साहसिक डेग छै, जे में कतेको स्थापित स्थापना के गम्भीर बौद्धिक चुनौती देल गेलै। रमणजी के भाषा-प्रेम आरो मैथिली के ठेठ सबद-संस्कृति के प्रति अनुराग सर्वथा स्पृहणीय छै। ई सैद्धान्तिक सीमा के बावजूद, ‘हिआओल’ मैथिली समीक्षाशास्त्र के सुदीर्घ पथ पर एगो बहुत महत्त्वपूर्ण मील के पत्थर छै, जे भावी पीढ़ी के स्थापित आभिजात्य इतिहास-लेखन के विरुद्ध “हिआओ” (साहस) सें लड़बा के दिशा-निर्देश अवश्य करैछै। ई पोथी साहित्य के मुख्य द्वार के अतिरिक्त पछुआरि, आँगन, खेत, नदी, लोककण्ठ, स्त्री के मौन, मुसहर के गाथा, प्रवासी के पत्रिका आरो भूकम्प सें ढहल घर के भीतर सें इतिहास देखैके नजर दैछै। ई अरथ में ई विदेह समान्तर इतिहास-नजर के एक सशक्त आलोचनात्मक आधारग्रन्थ छै।
सन्दर्भ-सूची
डा. रमानन्द झा ‘रमण’, हिआओल (मैथिली आलोचना-संग्रह), अखियासल प्रकाशन, लालगंज, सरिसब-पाही, मधुबनी, २०१२।
डा. रमानन्द झा ‘रमण’, अखियासल (आलोचना-संग्रह)।
डा. रमानन्द झा ‘रमण’, बेसाहल (आलोचना-संग्रह)।
डा. रमानन्द झा ‘रमण’, भजारल (आलोचना-संग्रह)।
जी. ए. ग्रियर्सन, An Introduction to the Maithili Language of North Bihar, कलकत्ता, १८८१।
जी. ए. ग्रियर्सन, Maithili Chrestomathy एवं दीनाभद्रीसम्बन्धी संकलन, १८८५।
हरिमोहन झा, कन्यादान (मैथिली उपन्यास)।
PART 27, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/new_page_27.htm।
PART 28, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/new_page_28.htm।
PART 82, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/new_page_82.htm।
A Parallel History of Mithila & Maithili Literature, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/new_page_90.htm।
नूतन अंक सम्पादकीय, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/aboutme.htm।
“रमानन्द झा ‘रमण’”, मैथिली लेखक संघ, maithililekhaksangh.blogspot.com/2010/07/blog-post_677.html।
२.२६. गजेन्द्र ठाकुर- हिआओल (बज्जिका मैथिली)
‘हिआओल’: भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त आ विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से विस्तृत आलोचनात्मक आस्वाद
-गजेन्द्र ठाकुर
(डा. रमानन्द झा ‘रमण’, मैथिली आलोचना, अखियासल प्रकाशन, लालगंज, सरिसब-पाही, मधुबनी, २०१२)
१. उपक्रम: पोथी-परिचय आ’हिआओल’ के अर्थ-गरिमा
‘अखियासल’, ‘बेसाहल’ आ ‘भजारल’ के बाद डा. रमानन्द झा’रमण’ के ई चारिम आलोचना-संग्रह’हिआओल’ (२०१२) मैथिली आलोचना के ओ विरल परम्परा के कड़ी हय जेमें आलोचना गुटबन्दी के चपेट से मुक्त होके पाठ, पत्र-पत्रिका आ अभिलेख के प्रमाण मानके चलै हय। पोथी के नामकरणे में लेखक के विनम्र प्रविधिक घोषणा हय — ‘हिआओल’ अर्थात् थाहल, अन्दाजल। ई शब्द-चयन आत्मश्लाघा के स्थान पर अनुसन्धान के अनन्त सम्भावना के स्वीकार हय; क्षेमेन्द्र के औचित्य-सिद्धान्त के भाषा में कही त शीर्षकहि में प्रबन्धौचित्य के बीज रोपल हय। लेखकीय में खुद स्वीकारल गेल हय कि ई सब आलेख मनोरंजक साहित्य के कोटि के न हय, ‘अरबेधि-अरबेधि’ अइसन विषय के चयन कैल गेल हय जकर अध्ययन अपेक्षित हय मुदा लोक-दृष्टि जहाँ प्रायः न जाय हय। पण्डित गोविन्द झा आवरण-टिप्पणी में मार्मिक शब्द में लिखने हथिन कि मैथिली-जगत के अउरी नामी आलोचक के पूर्वज-साहित्य आ परम्परा में सड़ाइन गन्ध लगै हय, मुदा रमणजी के ‘पुरान चाउर के भात टटका दही के संग’ प्रिय हय — अर्थात् परम्परा के संरक्षण आ नव मूल्याङ्कन दुनो काज ई पूर्वज-पूजा बूझि करै हथिन। फूलचन्द्र मिश्र ‘रमण’ पुरोवाक्मे उचिते लिखने हथिन कि ई निबन्ध-संग्रह में आलोचना-प्रत्यालोचना के संगम हय आ लेखक के उद्देश्य ककरो प्रतिष्ठा के धूमिल करब न, विमर्श हेतु बिन्दु सब उपस्थित करब हय — ‘वादे वादे जायते तत्त्वबोधः’।
ई पोथी में भाषा-विज्ञान, साहित्येतिहास, प्रत्यालोचना, कथा, कविता, महाकाव्य, लोकगाथा, लोकगीत, पत्रकारिता, प्राकृतिक विपत्ति, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद आ भाषिक उपनिवेशवाद से सम्बन्धित सत्रह अध्याय समाहित हय। विषय-सूची से साफ होय हय कि संग्रह के विस्तार ग्रियर्सन के भाषा-अध्ययन से आरम्भ होके उपनिवेशवाद के नव चालि तक जाय हय। सत्रह निबन्ध के ई संग्रह तीन वर्ग में सहजहिं बँटि जाय हय। पहिल, भाषा-चिन्तन आ भाषा-राजनीति: मैथिली आ मिथिला भाषा के अध्ययन; रमानाथ झा आ मिथिला भाषा; मैथिली लोकगीत — अवस्था आ संरक्षण; उपनिवेशवाद के नऽव चालि। दोसर, व्यक्ति ओ कृति-केन्द्रित प्रत्यालोचना: प्रत्यालोचक किरणजी; उपेक्षित के आँखि से कन्यादान; अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह; यात्री के भाषा; मनमोहन झा के कथा के अनालोचित पक्ष। तेसर, विधा ओ प्रवृत्ति-केन्द्रित इतिहास-दृष्टि: पत्रकारिता के विकास में प्रवासी के योगदान; लोकगाथा में दीनाभद्री; मैथिली कथा के विकास — किछु नव तथ्य; कविता में मिथिला के भूकम्प; कथी ले लगेलिऐ हे कोसी माइ; महाकाव्य में युग-सन्दर्भ; नऽव गीत में समाज-चेतना; मैथिली कविता के वर्तमान धारा। ई त्रिवर्गीय संरचना में लेखक के समग्र आलोचकीय व्यक्तित्व — भाषाशास्त्री, पाठालोच के, इतिहासकार आ प्रत्यालोचक — के चारू रूप एके ठाम भेटै हय।
ई पोथी एकरेखीय साहित्येतिहास न, बल्कि प्रचलित निष्कर्ष सब के प्रश्नांकित करै अनेक समान्तर आख्यान के संकलन हय। लेखक के मुख्य प्रवृत्ति हय — विस्मृत लेखक आ रचना के फेर प्रतिष्ठित करब, पूर्ववर्ती आलोचना के अधूरापन देखायब, लोक आ शिष्ट के कृत्रिम विभाजन तोड़ब, मैथिली भाषा-साहित्य के विकास के सत्ता, समाज, भूगोल आ इतिहास से जोड़ब, आ मुख्य इतिहास के पार्श्व में दबावल स्त्री, दलित, श्रमिक, प्रवासी, ग्रामीण, बाढ़िपीड़ित आ भाषिक समुदाय के दृश्य बनायब। लेखक खुद आलोचना के रचना के भाषा, शिल्प, तथ्य, कथ्य, पात्र आ चरित्र के गुण-दोष के सूक्ष्म विवेचन मानै हथिन। हुनका खातिर आलोचना दोषान्वेषण खाली न, गुण के आलोकन भी हय, आ साहित्य के सृजन से बेसी ओकर संरक्षण ओ मूल्याङ्कन के ओ महत्त्व दे हथिन।
२. समीक्षा-पद्धति: त्रिविध कसौटी
प्रस्तुत मूल्याङ्कन तीन कसौटी पर आधारित हय।
भारतीय काव्यशास्त्र के आधार
पहिल कसौटी भारतीय काव्यशास्त्र हय — भरत के रस-निष्पत्ति, आनन्दवर्धन के ध्वनि-सिद्धान्त, कुन्तक के वक्रोक्ति, क्षेमेन्द्र के औचित्य-विचार, साधारणीकरण, लोकमंगल-दृष्टि आ न्यायदर्शन के प्रमाण-मीमांसा (विशेषतः अभाव-प्रमाण के प्रश्न, जे खुद रमणजी के तर्क-पद्धति में बेरि-बेरि झलकै हय)। रस-सिद्धान्त रचना में अन्त में पैदा भावानुभूति के परीक्षा करै हय। ध्वनि-सिद्धान्त प्रत्यक्ष कथन के पीछे निहित सामाजिक, राजनीतिक आ सांस्कृतिक अर्थ खोलै हय। वक्रोक्ति-सिद्धान्त सामान्य कथन से हटिकऽ रचनात्मक भाषा, प्रतीक, व्यङ्ग्य आ विचलन के सौन्दर्य देखै हय। औचित्य-सिद्धान्त विषय, भाषा, पात्र, प्रसंग आ निष्कर्ष के परस् पर संगति के जाँच करै हय। साधारणीकरण देखै हय कि व्यक्तिगत अनुभव कइसे सामूहिक अनुभव बनै हय। लोकमंगल-दृष्टि साहित्य के सामाजिक उपयोगिता, अन्याय-विरोध आ जनहित के मूल्याङ्कन करै हय।
पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त के आधार
दोसर कसौटी पाश्चात्य सिद्धान्त हय — उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श, नव-इतिहासवाद, समाजभाषाविज्ञान, शैलीविज्ञान, पाठालोचन-शास्त्र, अभिग्रहण-सौन्दर्यशास्त्र (पाठक-अनुक्रिया), मार्क्सवादी ओ निम्नवर्गीय (अधीनस्थ) विमर्श, नारीवाद, दलित-विमर्श आ पर्यावरणीय आलोचना। रूपवादी दृष्टि भाषिक विन्यास, संरचना, प्रतीक, पुनरावृत्ति आ कथन-पद्धति के विश्लेषण करै हय। पाठक-प्रतिक्रिया दृष्टि अर्थ के स्थिर न मानके पाठक के अनुभव से निर्मित मानै हय। मार्क्सवादी दृष्टि वर्ग, श्रम, उत्पादन, शोषण आ सत्ता-संरचना केन्द्र में रखै हय। नारीवादी दृष्टि स्त्री के मौन, देह, श्रम, शिक्षा, अधिकार आ प्रतिनिधित्व के परीक्षण करै हय। दलित आ अधीनस्थ दृष्टि इतिहास में दबावल समुदाय के स्वर आ आत्मप्रतिनिधित्व खोजै हय। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि भाषा, शिक्षा, ज्ञान आ संस्कृति पर औपनिवेशिक प्रभुत्व के निरन्तरता के उद्घाटित करै हय। नव-इतिहासवादी दृष्टि साहित्यिक कृति के अपन समय के सत्ता, संस्था, अर्थव्यवस्था आ सामाजिक संघर्ष से जोड़ै हय। पर्यावरणीय आलोचना मनुष्य, नदी, वनस्पति, पशु-पक्षी, भूमि आ विपत्ति के परस् पर सम्बन्ध देखै हय।
विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि
तेसर कसौटी विदेह समान्तर साहित्य-इतिहास के दृष्टि हय, जे राजवंश, दरबार, शास्त्र, प्रतिष्ठित लेखक आ संस्था के इतिहास के समानान्तर लोकजीवन के इतिहास लिखै हय आ प्रतिष्ठान-पोषित प्रतिमान के स्थान पर अनालोचित, उपेक्षित, लोकधर्मी आ अभिलेख-सिद्ध धारा केन्द्र में आनै हय। ई दृष्टि में मिथिला खाली राजनीतिक सीमा न, सांस्कृतिक भूगोल हय; भारत आ नेपाल के मैथिली क्षेत्र एक दीर्घ सांस्कृतिक प्रवाह के अङ्ग हय; इतिहास राजा के संग किसान, स्त्री, दलित, मुसहर, श्रमिक, गायक, पत्रकार, प्रवासी आ विपत्तिग्रस्त जन के भी होय हय; साहित्यिक इतिहास खाली प्रकाशित पोथी के न, लोककण्ठ, व्रतकथा, गीत, अप्रकाशित पाण्डुलिपि आ विस्मृत रचनाकार के भी होय हय; आ नदी, बाढ़ि, भूकम्प, पलायन आ भाषिक विस्थापन ऐतिहासिक शक्ति बनि उठै हय। ई तेसर कसौटी ई पोथी के खातिर विशेष सार्थक हय, कारण ‘हिआओल’ के अनेक अध्याय —’अनालोचित कवि’, ‘अनालोचित पक्ष’, ‘उपेक्षित के आँखि से’, ‘किछु नव तथ्य’ — खुद प्रति-प्रतिमान निर्माण के, अर्थात् समान्तर इतिहास-लेखन के पूर्वाभ्यास हय।’हिआओल’ के मूल उपलब्धि एही समान्तर इतिहास-बोध में निहित हय। ई मूल्याङ्कन के लगभग आधा भाग अध्याय सभ के सीमा-विवेचन पर केन्द्रित हय — ई खुद रमणजी के घोषित सिद्धान्त के अनुकूल हय कि आलोचना अभिनन्दन-पत्र न हय आ प्रीतिकर होएब ओकरा खातिर आवश्यक न हय।
३. अध्यायवार उपलब्धि आ आलोचनात्मक आस्वाद
३.१ मैथिली आ मिथिला भाषा के अध्ययन
उद्घाटक निबन्ध कोलब्रुक (१८०१)से ग्रियर्सन तक के पश्चिमी भाषा-अध्ययन के कालक्रम प्रस्तुत करै ई मार्मिक प्रश्न उठावै हय कि साहित्य-सर्जना के सुदीर्घ अविच्छिन्न परम्परा रहितो मैथिली के व्याकरण सबसे पछाति काहे लिखल गेल। कोलब्रुक के ई संकीर्ण स्थापना जे मैथिली कोनो समृद्ध भाषा न हय आ एकर कोनो विशिष्ट कवि न हय, तकरा विखण्डित करै बीम्स (१८७२), केलौग, हार्नले (१८८०) आ अन्त में ग्रियर्सन (१८८१) कइसे मैथिली के स्वतन्त्र भाषा के रूप में प्रतिष्ठित कैलथिन, ओकर मूल अंग्रेजी साक्ष्य सोझाँ रखके लेखक देखाबै हथिन कि प्रारम्भिक पश्चिमी अध्ययन मैथिली के अध्ययन न, प्रशासनिक सुविधार्थ ‘नमूना-संकलन’ खाली हल। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि से ई अध्याय बहुत महत्त्वपूर्ण हय — मैकाले के १८३५ के टिप्पणी (‘जे भाषा केओ बिना सरकारी पाइ के पढ़बा खातिर तैयार न, ओ पर खर्च काहे’) आ १८६४ के ट्रेवेलियन-टिप्पणी के उद्धरण से साफ होय हय कि भाषा-नीति उपनिवेश के उपयोगिता के दासी हल। ‘बिहारी अस्मिता के पहिल उद्भावक जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन हलथिन’ — ई व्यंग्य-गर्भित स्थापना नव-इतिहासवादी सूझ के उदाहरण हय, जे नामकरण के राजनीति के अस्मिता के राजनीति से जोड़ै हय। ग्रियर्सन इहाँ द्वैध व्यक्तित्व के रूप में उपस्थित होय हथिन: एक ओर हुनकर सर्वेक्षण मैथिली के स्वतन्त्र पहचान दे हय आ हिन्दी के छाया से मुक्त करे के दिशा में मैथिली के स्वतन्त्र ध्वनि-संरचना ओ क्रिया-रूपावली के प्रामाणिकता दे हय; दोसर ओर ‘बिहारी’ जइसन सामूहिक नाम औपनिवेशिक प्रशासन के सुविधानुसार भाषिक विविधता के एक खाँचा में राखैत हय।
अध्याय के प्रमुख उपलब्धि ई हय कि लेखक भाषा-विकास के खाली व्याकरण-लेखन के इतिहास न मानै हथिन। ओ कार्यभार आ कार्य-पारदर्शिता के समाजभाषावैज्ञानिक कसौटी से मैथिली के ह्रास के व्याख्या करै हथिन — जे भाषा के प्रयोग प्रशासन, शिक्षा, न्याय, व्यापार आ सार्वजनिक जीवन में घटै हय, ओकर सामाजिक सामर्थ्य भी घटै हय। कर्णाट-शासन में मैथिली के राजकाज के भाषा रहे के अभिलेखीय प्रमाण, नेपाल के राजकीय अभिलेख, आ भोलालाल दास के कहल गेल ओ प्रसिद्ध वाक्य (‘मैथिली के स्वीकृत कैने मिथिला जीबि उठत…’) — ई सब बिहार-निर्माण के राजनीतिक अन्तर्कथा के उघारै हय। पारम्परिक आ शिक्षाशास्त्रीय व्याकरण के भेद आ शिक्षाशास्त्रीय व्याकरण के पाँच स्तर के विवेचन मैथिली में प्रायः पहिल बेर एतना व्यवस्थित रूप में आएल हय। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से ई अध्याय विशेष महत्त्वपूर्ण हय, कारण भाषा-इतिहास के राजकीय मान्यता से न, शिलालेख, लोकव्यवहार, व्याकरण-लेखन आ सांस्कृतिक विस्तार से जोड़ल गेल हय — भाषा राजनीतिक सीमा पार करै एक सभ्यतागत प्रवाह बन जाय हय।
३.२ रमानाथ झा आ मिथिला भाषा
संग्रह के मेरुदण्ड ई दीर्घतम निबन्ध प्रत्यालोचना के प्रतिमान हय। आचार्य रमानाथ झा के जन्मशतवार्षिकी (१९०६–२००६)के बहन्ने हुनका पर जीवन-काल आ मरणोपरान्त लगावल गेल आरोप के ‘टाल’ के अभिलेखीय परीक्षण कैल गेल हय। शशिनाथ चौधरी के १९३२ के परिषद्-प्रतिवेदन जइसन दुर्लभ साक्ष्य से ई सिद्ध कैल गेल जे पटना विश्वविद्यालय में मैथिली के स्वीकृति-सम्बन्धी षड्यन्त्र के आरोप तथ्य-सम्मत न हय। चन्दा झा के मिथिला भाषा रामायण के चारिम संस्करण से रमानाथ झा के आधा पृष्ठ के’ के्षमा-प्रार्थना’ छाँटि देवे के प्रसंग, आ ओकर तुलना सोवियत’व्यक्तिपूजा’ के आरोप में नेता के शव के समाधि से उपाड़बा के घटना से — ई प्रत्यालोचना के तीक्ष्णतम क्षण हय, जहाँ स्थानीय साहित्यिक राजनीति विश्व-इतिहास के आलोक में अर्थवान हो जाय हय।
निबन्ध के उत्तरार्ध में रमानाथ झा के अवदान के — अध्यापन, पाठ्यक्रम-निर्माण, अनुसन्धान, भाषा-मान्यता, सम्पादन आ साहित्येतिहास — के व्यवस्थित पुनर्पाठ हय। रमानाथ झा के मैथिली आलोचना केन्द्र-स्तम्भ मानै रमणजी मिथिला भाषा के प्राचीनता के पाँच ऐतिहासिक साक्ष्य के उल्लेख करै हथिन: कालिदास के विक्रमोर्वशीय के दोहा, प्राकृत पैंगल के वर्णवृत्त, नेपाल से प्राप्त सहजपन्थी सिद्ध लोग के चर्यापद, डाकवचन, आ अवहट्ट में विद्यापति के रचना। बुद्धवचन-महावीरवचन-अर्धमागधी के विवेचन से विदेह जनपद के भाषा के सातत्य, तिरहुता लिपि के व्याप्ति, मानकीकरण के इतिहास में पण्डित जीवनाथ राय के चिन्ता आ महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह के १८८० के ओ ऐतिहासिक आदेश जेसे देवनागरी आ हिन्दी के राजकाज में प्रवेश भेटलै के आ अन्त में तिरहुता (मिथिलाक्षर) लिपि के विस्थापन भेल — ई सब प्रसंग अध्याय के भाषा-राजनीतिक दस्तावेज बना दे हय। सबसे मौलिक हय हाउगेन आ फर्गुसन के भाषा-प्रबन्धन सिद्धान्त के चारि चरण (चयन, संहिताकरण, प्रकार्य-विस्तार, ग्राह्यता)के कसौटी पर रमानाथ झा के कार्य के पुनर्मूल्याङ्कन — ई देखाएब जे जे शास्त्र के जन्महुँ न भेल हल, ओ शास्त्र के प्रक्रिया के अनुरूप रमानाथ झा मैथिली के भाषा-नियोजन के गेलथिन। बहुवाचिकता (द्विभाषिक स्तर-भेद)के अवधारणा से मैथिल समाज के भाषिक यथार्थ के व्याख्या समाजभाषाविज्ञान के मैथिली में सफल अवतरण हय।
भारतीय परम्परा में आलोचक के ‘सहृदय’ कहल गेल हय; ई अध्याय में रमणजी सहृदयता के अर्थ अन्धप्रशंसा न, ऐतिहासिक न्याय मानै हथिन। हुनकर आग्रह हय कि व्यक्ति के योगदान के मूल्याङ्कन ओकर समय, संस्थागत कठिनाइ आ उपलब्ध साधन के आधार पर हो। पाठक-प्रतिक्रिया दृष्टि से ई अध्याय देखाबै हय कि एके व्यक्तित्व के मूल्याङ्कन अलग-अलग पीढ़ी अलग-अलग ढङ्ग से करै हय — संस्थापक पीढ़ी के श्रम पछिला पीढ़ी के खातिर सामान्य सुविधा बन जाय हय, फलतः मूल संघर्ष विस्मृत हो जाय हय। विदेह समान्तर इतिहास के स्तर पर अध्याय ई प्रश्न उठावै हय कि मैथिली भाषा-साहित्य के संस्थागत निर्माण केना भेल: विश्वविद्यालय, पाठ्यक्रम, साहित्यिक संस्था आ व्यक्तिगत विद्वत्ता एक-दोसर से जुड़ल हल; अतः साहित्यिक इतिहास खाली प्रकाशित रचना के इतिहास न, संस्था-निर्माण के इतिहास भी हय।
३.३ प्रत्यालोचक किरणजी
ई निबन्ध ‘प्रत्यालोचना’ पद के मैथिली आलोचना-शास्त्र में सैद्धान्तिक प्रतिष्ठा दे हय — आलोचना के आलोचना, जे लेखक के अनुसार समाज के वैचारिक गतिशीलता आ जीवन्तता के लक्षण हय। डा. काञ्चीनाथ झा’ केिरण’ के आलोचकीय व्यक्तित्व के त्रिविध विश्लेषण (लोक आलोचक, साहित्यिक आलोचक, प्रत्यालोचक) आ रचनाकार के तीन कोटि के वर्गीकरण (युगातीत, युगानुगामी, सचेत विपक्षी) पद्धति-सजग आलोचना के परिचायक हय। किरणजी के नव स्थापना सभ के — वर्णरत्नाकर काव्य-ग्रन्थ हय, लोकसाहित्य शिष्ट-साहित्य से बड़, विद्यापति स्वाधीनताकामी सेनानी, आ चन्दा झा के स्थान पर अकाली कवि फतूर लाल नवयुग के प्रवर्तक — सहृदय प्रस्तुति के साथे हुन के अन्तर्विरोध के निर्मम उद्घाटन भी हय: जे किरणजी रमानाथ झा के राधाकृष्ण-विषय के मत के तीव्र खण्डन करै हथिन, ओहे अन्यत्र विद्यापति के नायिका के राजदरबारी संस्कार के कल्पित पात्र कहके प्रकारान्तर से ओही मत के समर्थन के दे हथिन। कुलानन्द मिश्र के चन्द्रग्रहण-टिप्पणी के प्रसंग में लेखक के ई सूत्र-वाक्य आलोचना-नीतिशास्त्र के निष्कर्ष जइसन हय कि कृति में व्यक्त विचार के विवेचन ने भक्त जइसन हो, ने अपन मतवाद के रचनाकार पर आरोपित करै।
किरणजी जाति, रूढ़ि, अन्धविश्वास, श्रम के अवमानना आ सामाजिक विषमता के विरुद्ध आलोचनात्मक स्वर उठावै हथिन;’पराशर’ के माध्यम से श्रम, भूख, जातीय विभाजन, धार्मिक आडम्बर आ स्त्री-पुरुष सम्बन्ध के प्रश्न उठावल गेल हय, जे आभिजात्य पण्डित-समाज के कौलीनता आ पाँजि-व्यवस्था पर कठोर प्रहार हय। भारतीय दृष्टि से किरणजी के आलोचना लोकमंगलवादी हय — हुनका खातिर साहित्य के श्रेष्ठता ओकर सामाजिक उत्तरदायित्व से अलग न। पाश्चात्य मार्क्सवादी दृष्टि से हुनकर विचार सामाजिक उत्पादन, श्रम आ प्रभुत्वशाली वर्ग के आलोचना से जुड़ैत हय; दलित दृष्टि से ओ शास्त्रीय पात्र के निम्नवर्गीय अनुभव के आलोक में फेर लिखै हथिन।’मैथिल आँखि’ के अवधारणा ई अध्याय के मौलिक सूत्र हय, जकरा’गुलामी नजरि’ के विरुद्ध संघर्ष के रूप में राखल गेल हय — एकर अर्थ संकीर्ण प्रादेशिकता न, अपन भाषिक-सांस्कृतिक अनुभव के आधार पर विश्व के देखब। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि में ई स्थानीय ज्ञान के पुनर्प्रतिष्ठा आ स्थापित संभ्रान्तवादी इतिहास-लेखन के विरुद्ध निम्नवर्गीय प्रतिरोध के स्वर हय।
३.४ अपेक्षिता के आँखि छोड़के, उपेक्षित के आँखि से कन्यादान पढ़ल जाए
ई संग्रह के सबसे बेसी चुनौतीपूर्ण अध्याय में से एक हय आ अभिग्रहण-सौन्दर्यशास्त्र (पाठक-अनुक्रिया सिद्धान्त)के मैथिली में विरल प्रयोग। हरिमोहन झा के पाठक के तीन श्रेणी — मनोरंजनार्थी, हनुमान-चालीसा-भक्त, आ समाज-कथा बूझि पढ़निहार — के विभाजन के लेखक ई देखाबै हथिन कि कृति के अर्थ पाठक-दृष्टि से निर्मित होय हय। तब दृष्टि-परिवर्तन के प्रस्ताव आबै हय: अपेक्षिता (सी. सी. मिश्र जइसन शिक्षित वर)के आँखि छोड़के उपेक्षिता बुच्ची दाइ के आँखि से उपन्यास पढ़ल जाए। ई नारी-विमर्श के ओ पद्धति हय कि केन्द्र के हटा हाशिया केन्द्र बनावै हय। प्रचलित हास्यप्रधान पाठ के छोड़के लेखक बुच्ची दाइ के मौन, अशिक्षा, भय आ सांस्कृतिक विस्थापन केन्द्र बनावै हथिन — प्रश्न ई हय कि बुच्ची दाइ बाजै काहे न हथिन, हुनकर जीवन के निर्णय दोसर लोक काहे करै हय, आ शिक्षित समाज हुनकर मौन के खातिर कतना उत्तरदायी हय। बुच्ची दाइ के निरक्षरता खातिर ओ व्यक्ति के न, समाज के’संरचनात्मक निर्माण के दोष’ के उत्तरदायी मानै हथिन।
सबसे बलगर पक्ष हय अभिलेख-प्रथम प्रमाण: जनसीदन के यशोदा (जे रामायण बाँचि ले हय), रासबिहारी लाल दास के सुमति, पुण्यानन्द झा के योगमाया, पुलकित मिश्र के मोहिनी — कन्यादान से पहिले के मैथिली उपन्यास के नारी-पात्र निरक्षर न, साक्षर हली। ई तथ्य-शृंखला से ई क्रान्तिकारी स्थापना निकलैत हय कि स्त्री-शिक्षा के प्रश्न पर हरिमोहन झा अपन पूर्ववर्ती औपन्यासिक परम्परा से आगू न, पीछे हथिन। मिथिला दर्पण के योगानन्द आ कन्यादान के सी. सी. मिश्र के तुलना, आ’अबोध के अपंगता के दोषी अबोध खुद की ओकर समाज?’ के प्रश्न मानवीय गरिमा के कसौटी पर हास्य के औचित्य-परीक्षा हय। भाषिक दृष्टि से अध्याय के सूक्ष्म निष्कर्ष ई हय कि शहराती पति आ ग्रामीण पत्नी एके सांस्कृतिक-भाषिक धरातल पर न हथिन — पतिद्वारा हिन्दी में संवाद करब स्त्री के मौन के आरो गाढ़ करै हय। नारीवादी आलोचना से ई पुनर्पाठ बहुत महत्त्वपूर्ण हय: विवाह के हास्य के आवरण के भीतर स्त्री के वस्तुकरण, भाषिक असमानता, शिक्षा-वञ्चना आ पितृसत्तात्मक नियन्त्रण हय; बुच्ची दाइ खाली पात्र न, अशिक्षित मैथिल कन्या के प्रतीक बन जाय हथिन। ध्वनि-सिद्धान्त के आलोक में उपन्यास के हास्य के पीछे करुण ध्वनि सुनाइत हय। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से ई अध्याय प्रतिष्ठित हास्यकृति के भीतर दबावल स्त्री-इतिहास के फेर दृश्य बनावै हय।
३.५ अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह
ई अध्याय विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि के बीज-पद्धति के श्रेष्ठ उदाहरण हय — ‘अनालोचित’ के पुनर्वास। पत्र-पत्रिका में छिड़िआएल कविता के’झोड़ि’ के लेखक एक विस्मृत कवि के काव्य-संसार के पुनर्निर्माण करै हथिन आ हुनका राष्ट्रीय चेतना, मिथिला-बोध, सामाजिक सुधार, स्त्री-दुःख, बाढ़ि, शोषण आ सांस्कृतिक संकट के कवि के रूप में प्रस्तुत करै हथिन। खुद लेखक स्वीकार करै हथिन कि पूरा रचनावली उपलब्ध न रहने ई आरम्भिक अनुसन्धान हय। ‘शरदागम’ के व्याख्या ध्वनि-सिद्धान्त के व्यावहारिक प्रयोग हय — पावस के प्रयाण, फुलाएल कास, थीर सरोवर आ विवश पुरन्दर में १९३५ के शासन-सुधार आ जन-आक्रोश के व्यंग्यार्थ के उद्घाटन; प्रकृति-वर्णन के अभिधा के भीतर राजनीतिक व्यञ्जना के ई पाठ आनन्दवर्धन के’अर्थान्तर-संक्रमित’ ध्वनि के जीवन्त निदर्शन हय। ‘पछबा’ कविता के विश्लेषण में पश्चिमी भाषा-संस्कृति के धुक्कड़ से भारतीय शब्द-सम्पदा के झड़बा के जे प्रतीक-योजना देखावल गेल हय, से सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के पूर्वाभास जइसन हय आ अन्तिम अध्याय से ई निबन्ध के जोड़के दे हय — ‘पछबा’ खाली हवा न, पाश्चात्य सांस्कृतिक दबाव के प्रतीक बनै हय, आ शरदागमन औपनिवेशिक शासन के क्षीणता के सङ्केत। ‘नोत पूरब’ जइसन सांस्कृतिक सन्दर्भ-गर्भित शब्द के टीका, विधवा-विलाप के करुण चित्र, आ बाढ़ि-भूकम्प के द्वैध त्रासदी के कवि-साक्ष्य — सब मिलि एक ‘निरपेक्ष’ मुदा मैथिली-पक्षधर कवि के मूर्ति गढ़ैत हय। नव-इतिहासवादी दृष्टि से कविता के स्वतन्त्र सौन्दर्य-वस्तु न, स्वतन्त्रता आन्दोलन, विभाजन, सामाजिक सुधार, बाढ़ि आ सांस्कृतिक संस्था के गतिविधि से जोड़ल गेल हय; करुण रस विधवा, बाढ़िपीड़ित आ उपेक्षित मिथिला के चित्रण में प्रखर होय हय। प्रतिष्ठित साहित्येतिहास जे कवि के पोथी उपलब्ध न रहने हुनका पार्श्व में छोड़के दे हय, रमणजी पत्र-पत्रिका में बिखरल सामग्री के आधार पर हुनकर वैकल्पिक साहित्यिक जीवनचरित निर्मित करै हथिन — विस्मृत लेखक के पुनरुद्धार के आदर्श उदाहरण।
३.६ यात्री के भाषा: शब्दचयन आ शब्दनिर्माण
शैलीविज्ञान के चारि उपकरण — चयन, विचलन, समानान्तरता आ अप्रस्तुत-विधान — के सहारे वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ (नागार्जुन)के काव्य-भाषा के ई विश्लेषण संग्रह के सबसे बेसी शास्त्र-सम्पन्न आ व्यवस्थित भाषिक अध्याय हय। यात्री के काव्यभाषा में देशज, तत्सम, तद्भव आ आगन्तुक शब्द के सर्जनात्मक मेल देखावल गेल हय — ‘अपरोजक’ (नाभिपद्मसम्भूत विधाता खातिर), ‘ऊत्तुंग खोपा’, ‘तपोवनी’ जइसन देशी-अनदेशी शब्द के संकर-निर्माण, आ ‘दलकब’ क्रिया के अर्थ-व्यञ्जकता के पद-परीक्षा। हरेक स्थल पर लेखक देखाबै हथिन कि पर्यायवाची में से एके शब्द काहे अनिवार्य हय: एक शब्द के चयन खाली अर्थ न, पात्र के सामाजिक स्थिति, वक्ता के मनोदशा, व्यङ्ग्य आ सांस्कृतिक स्मृति के व्यक्त करै हय। ई विवेचन कुन्तक के वर्ण-विन्यास-वक्रता आ पद-पूर्वार्ध-वक्रता के आधुनिक रूपान्तर जइसन हय, आ’विचलन’ के अवधारणा’निरंकुशाः कवयः’ के शास्त्रीय अनुमति से जोड़ल गेल हय — पूर्व-पश्चिम के ई सेतु-बन्ध दुर्लभ हय। वक्रोक्ति-सिद्धान्त के दृष्टि से व्याकरणिक क्रम के विचलन, असामान्य संयोग आ नूतन शब्दनिर्माण भाषा के सामान्य सूचना-साधन से काव्यात्मक अनुभव में बदलै हय; ध्वनि-सिद्धान्त के अनुसार शब्द के कोशगत अर्थ से अधिक ओकर प्रसङ्गगत व्यञ्जना महत्त्वपूर्ण होय हय। गौरी, कार्तिक, गणेश, लक्ष्मी जइसन पौराणिक पात्र के कोश-स्वीकृत अर्थ से फराक नव-सन्दर्भीकरण के विश्लेषण, कंकाल-शृंखला आ मामा-गीत में समानान्तरता के प्रयोग, अप्रस्तुत विधान में सादृश्य, मानवीकरण आ इन्द्रियबोध के चित्र — सब यात्री-काव्य के भाषिक वैलक्षण्य के प्रामाणिक कुंजी हय। यात्री के’भाषा के भूगोल’ के अवधारणा उल्लेखनीय हय — कवि अपन भाषा-क्षेत्र के वस्तु, श्रम, रीति, मिथक आ बोलचाल से परिचित हथिन, तेँ हुनकर शब्द खाली सजावट न, जीवित जनजीवन के वाहक हय। यात्री के भाषा आभिजात्य संस्कृतनिष्ठ मैथिली के विरुद्ध जनपदीय बहुस्वरता के प्रकटीकरण भी हय।
३.७ मनमोहन झा के कथा के अनालोचित पक्ष
करुणा के कथाकार के रूप में प्रतिष्ठित मनमोहन झा के कथा-साहित्य के पूरा तरह से अनालोचित पक्ष — भारतीय राष्ट्रीयता आ मैथिल उपराष्ट्रीयता — के उद्घाटन ई लघु निबन्ध के उपलब्धि हय। पटना सचिवालय-गोलीकाण्ड (१९४२)के पृष्ठभूमि पर लिखल ‘आहत आत्मा’ के नरेन्द्र बाबू, ताजमहल के वैभव के नीचे दबल श्रमिक-वेदना के कथा,’वीरभोग्या’,’सप्तपदी’ के महाश्वेता आ’मीनाक्षी’ के बलिदान — ई सब देखाबै हय कि करुणा के अन्तःसलिला धार के भीतर राष्ट्र-प्रेम आ मिथिला-संस्कृति के रक्षा के दृढ़ स्वर बहैत हय। रस-दृष्टि से करुण आ वीर रस के समन्वय ई कथा के मूल शक्ति हय — पात्र के व्यक्तिगत प्रेम राष्ट्र, मातृभूमि वा सांस्कृतिक अस्मिता के खातिर त्याग में परिणत होय हय। नव-इतिहासवादी दृष्टि से कथा के भावभूमि स्वतन्त्रता आन्दोलन, विदेशी आक्रमण आ मिथिला के सांस्कृतिक स्मृति से निर्मित हय। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से मिथिला भारतीय राष्ट्र के विरोधी न, ओकर भीतर विशिष्ट सांस्कृतिक इकाई हय — ई कारण मैथिल उपराष्ट्रीयता विखण्डन न, बहुस्तरीय भारतीयता के रूप बनै हय। मनमोहन झा के निधन (२००९)के दसम दिन के भीतर लिखल ई आलेख श्रद्धांजलि आ आलोचना के मर्यादित संगम हय।
३.८ मैथिली पत्रकारिता के विकास में प्रवासी के योगदान
पत्रकारिता के परिभाषा (निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप पाठ्य-सामग्री के निष्पक्ष प्रसार)से आरम्भ के लेखक पत्र, पत्रकार आ पत्रकारिता के बीच अन्तर साफ करै हथिन। हुनकर प्रश्न हय — मैथिली में नियमित, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर समाचार-पत्र परम्परा सीमित रहने ‘पत्रकारिता’ शब्द के अर्थ कइसे निर्धारित हो? प्रवासी-निवासी के विधिक कसौटी (विदेशी मुद्रा विनिमय अधिनियम)के सोझाँ ओ सांस्कृतिक मिथिला के अखण्डता के तर्क रखै हथिन — नेपाल-तराइ आ भारतीय मिथिला के बीच युग-युग के अविच्छिन्न सांस्कृतिक एकसूत्रता के आगू राजनीतिक सीमा गौण। प्रवासी मैथिल लोग द्वारा जयपुर से प्रकाशित ‘मैथिल-हितसाधन’ (१९०५) आ बनारस से प्रकाशित ‘मिथिलामोद’ (१९०५) सामाजिक शिक्षा, स्त्रीशिक्षा, रूढ़िविरोध, भाषा-संवर्धन आ निर्भीक सम्पादकीय दृष्टि के वाहक बनल; ई पत्रिका सभ के उद्गार-उद्धरण सहित विवेचन ऐतिहासिक दृष्टि से बहुमूल्य हय। सबसे सूक्ष्म हय ज्ञान-समाजशास्त्रीय ई विश्लेषण जे सम्पादकीय निर्भीकता के सामाजिक आधार की हल — विद्यावाचस्पति मधुसूदन ओझा आ मम मुरलीधर झा तत्कालीन सत्ता-केन्द्र दरभंगा पर आश्रित न हलथिन, तेँ स्पष्टवादिता सम्भव भेल। सार्वजनिक क्षेत्र के सिद्धान्त से ई पत्र-पत्रिका समाज के वैचारिक संवाद-मञ्च बनै हय — मिथिला के भीतर जे प्रश्न उठाएब कठिन हल, प्रवास के अपेक्षाकृत स्वतन्त्र वातावरण में ओ प्रश्न निर्भीकता से उठल। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से प्रवास सीमा-बाहर के अवस्था न, मिथिला के विस्तृत सांस्कृतिक परिधि हय — जयपुर, बनारस, अजमेर, कलकत्ता, दिल्ली, नेपाल आदि स्थान मैथिली चेतना के वैकल्पिक केन्द्र बनै हय। पत्रकारिता के आजीविका आ व्यवसाय के कसौटी से फराक के देखे के प्रस्ताव मैथिली पत्रकारिता के इतिहास-लेखन खातिर एक वैकल्पिक (समान्तर) ढाँचा प्रस्तुत करै हय।
३.९ मैथिली लोकगाथा में दीनाभद्री
ई अध्याय पाठालोचन-शास्त्र आ निम्नवर्गीय विमर्श के संगम-स्थल हय। ग्रियर्सन-संकलित गीत दीनाभद्री (१८८५)के मूल-स्रोत के प्रतिष्ठा दे लेखक ई मार्मिक प्रश्न उठावै हथिन कि परवर्ती विद्वान् अपन-अपन व्यक्तिगत संकलन के आधार बना लिखै गेलथिन, मुदा मूल पाठ आ अपन पाठ के अन्तर के हिसाब केओ न देलथिन — ई साहित्यिक अराजकता हय; ग्रियर्सन के संकलन के उपेक्षित रखके ‘मूल गाथा अप्रकाशित’ कहब ऐतिहासिक रूप से अनुचित हय। दुनो पाठ के तुलनात्मक अध्ययन (सात बनाम तेरह अध्याय, गुलामी जट के भूमिका-भेद, स्वाधीनता के बाद दीनाभद्री के मुह में अंग्रेजी शब्द के प्रवेश) लोकगाथा के ‘लोच’-सिद्धान्त के प्रामाणिक निदर्शन हय — लोककण्ठ में रहै गाथा वाचक, काल आ श्रोता के अनुसार बदलै रहै हय, आ इहे लोच ओकर जीवनी-शक्ति हय।
दीना आ भद्री मुसहर जाति के वीर भ्रातृद्वय हथिन; जोरावर सिंह के सामन्ती अत्याचार के विरुद्ध हुन के विद्रोह, शौर्य, भ्रातृ-प्रेम, पंचायती लोकतन्त्र में आस्था (‘पंच से निसाफ’) आ शोष के-प्रतिकारक विश्लेषण देखाबै हय कि नायकत्व के समस्त शास्त्रीय गुण दलित समाजो में वर्तमान हल — ई स्थापना राजकुल-केन्द्रित नायकत्व-सिद्धान्त के प्रति-कथन हय। लोकगाथा में जातीय उत्पीड़न, सामाजिक विषमता, साहस, न्याय आ सामुदायिक स्मृति संरक्षित हय; लोकनायक के महत्ता राजकीय पद से न, पीड़ित समुदाय के रक्षा आ आत्मसम्मान से निर्धारित होय हय। दलित आलोचना से ई अध्याय विशेष उल्लेखनीय हय — मुख्य इतिहास जे समुदाय के इतिहासहीन मानै हय, ओकर लोकगाथा खुद इतिहास के वैकल्पिक अभिलेख बन जाय हय। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि में दीनाभद्री राजदरबार के नायक न, लोककण्ठ के नायक हथिन — ई परिवर्तन से साहित्यिक आ राजनीतिक स्थान के पुनर्वितरण होय हय, आ लोकगाथा के वर्तमान राजनीतिक अवकाश-निर्माण में भूमिका के संकेत एकरा समकालीन विमर्श से जोड़ै हय।
३.१० मैथिली कथा के विकास: किछु नव तथ्य
नव-इतिहासवादी पुनर्लेखन के ई श्रेष्ठ उदाहरण हय। स्थापित मान्यता — चन्दा झाकृत पुरुषपरीक्षा के अनुवाद (१८८९) मैथिली कथा के प्रस्थान-बिन्दु — के खण्डन तीन कसौटी पर कैल गेल हय: अनुवादक प्रचार-प्रसार के तत्कालीन असम्भाव्यता, शब्दानुवाद के अनाकर्षक भाषा (जयकान्त मिश्र आ रमानाथ झा के साक्ष्य सहित), आ प्रभावित वर्ग के अव्यावहारिकता (संस्कृत के अधीत विद्वान् अनुवाद से प्रेरित काहे होएताह?)। ओकर विकल्प में लेखक मैथिली कथा के आरम्भ खाली मुद्रित आधुनिक कथा से माने के विरोध करै हथिन: ज्योतिरीश्वर के वर्णरत्नाकर में चौंसठि कला में परिगणित ‘कथाकौशल’, व्रतकथा के तेसर धारा (मधुश्रावणी, सिरता-बिसता)के वाचिक परम्परा, लोककथा, हास्य-व्यङ्ग्य आ मौखिक आख्यान के दीर्घ परम्परा के आधुनिक कथा के पूर्वपीठिका मानल गेल हय। रचनात्मक उपलब्धि ई हय कि लेखक कथा आ कथाकौशल में भेद करै हथिन — कथ्य एक वस्तु हय; श्रोता के बान्हि रखे के भाषा, गति, स्वर, संवाद आ प्रस्तुति दोसर। ई दृष्टि से मौखिक साहित्य अपरिपक्व न, अपन स्वतन्त्र सौन्दर्यशास्त्रवाला विधा हय।
श्रीकृष्ण ठाकुर के चन्द्रप्रभा (रचना १८८० के दश के तक, प्रकाशन १९३९)के मैथिली के पहिल मौलिक कथा के प्रस्थान-बिन्दु माने के प्रस्ताव, ‘चन्द्रभागा’ के स्थान पर’चन्द्रप्रभा’ नाम के शुद्धि,’विलक्षण दाम्पत्य’ के विधागत पुनर्निर्धारण आ’मदनराज चरित’ के काल-सम्बन्धी प्रश्न अध्याय के शोधपरक उपलब्धि हय। चन्द्रप्रभा के रसधज-राजा के कथा के व्याख्या — प्रजापीड़ के शासक के विरुद्ध प्रजा के असहयोग आ पलायन — मे १८५७ के असफलता के बाद के जन-आक्रोश के प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति देखब, फूलबाड़ी आ माली के प्रतीक के माध्यम से प्रजा आ शासन के सम्बन्ध पढ़ब, आ विद्यासिन्धु के बेंग-कथा (इन्द्र-पृथ्वी-बेंग)मे औपनिवेशिक शोषण आ सत्याग्रही प्रतिरोध के रूपक पढ़ब — ई साहित्य आ इतिहास के पारस्परिक पाठक (नव-इतिहासवाद के मूल प्रविधिक) सुन्दर प्रयोग हय; ध्वनि-दृष्टि से राजकथा औपनिवेशिक आ सामन्ती अत्याचार के आलोचना बन जाय हय।
३.११ मैथिली कविता में मिथिला के भूकम्प
प्रकृति के उद्दीपक रूपक वर्णन-बहुल मैथिली काव्य-परम्परा में ध्वंस के रूपक उपेक्षा के सैद्धान्तिक प्रश्न से ई निबन्ध खुजैत हय। ई में सन् १९३४ आ १९८८ के भूकम्प के काव्यात्मक अभिलेख के अध्ययन हय। कविवर सीताराम झा के ‘भूकम्प वर्णन’ आ कृष्णनन्दन सिंह के’ केम्पकारिका’ के तुलनात्मक अध्ययन में कम्पकारिका के ऐतिहासिक प्रलेख-मूल्य (भूकम्प-पूर्व मिथिला के राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक स्थिति सहित) रेखांकित कैल गेल हय — ई खाली विनाश-वर्णन न, तत्कालीन मिथिला के राजनीति, अर्थव्यवस्था, भ्रष्टाचार, वस्तु-मूल्य आ पुनर्निर्माण के काव्यात्मक दस्तावेज हय। अठारह वर्ष के वयस में भोगल त्रास के अड़तीस वर्ष तक स्मृति में जिआ के काव्यबद्ध करे के मनोवैज्ञानिक टिप्पणी, दरभंगा अस्पताल आ चतुर्भुज स्थान के करुण-व्यंग्य-मिश्रित चित्र, आ १९८८ के भूकम्प-काव्य-संकलन से यात्री, चन्द्रभानु सिंह, धीरेन्द्र आ जीवकान्त के साक्ष्य — सब मिलि आपदा-साहित्य के एक लघु इतिहास बन जाय हय। धीरेन्द्र के पाँती में विपत्ति में मनुजता के एक होके जाय के निरीक्षण करुण-रस के सामाजिक परिणति के सूचक हय।
करुण आ भयान के रस के संयोजन ई अध्याय केन्द्र हय। घर, अस्पताल, मन्दिर, बाजार, राजभवन, गरीब के झोपड़ी — सब विनाश के समान परिधि में आबि जाय हय, मुदा समान प्राकृतिक आघात के सामाजिक परिणाम असमान होय हय। पर्यावरणीय आलोचना से प्राकृतिक घटना आ सामाजिक निर्मिति के अन्तर साफ होय हय — भूकम्प प्राकृतिक हय, मुदा कमजोर भवन, सरकारी उपेक्षा, असमान संसाधन आ राहत के राजनीति मानवीय निर्णय के परिणाम हय। विदेह समान्तर इतिहास में विपत्ति साहित्यिक इतिहास के वैध विषय बनै हय।
३.१२ कथी ले लगेलिऐ हे कोसी माइ
बाढ़ि-साहित्य के ई प्रवृत्ति-सर्वेक्षण आरसी प्रसाद सिंह के हाकरोस से आरम्भ होके चन्दा झा, यात्री (कौशिकी के धार), लक्ष्मीपति सिंह, चन्द्रभानु सिंह, सियाराम झा ‘सरस’ आ सुकान्त सोम तक पसरल हय। ई अध्याय में कोसी आ मिथिला के आन नदी सब के मातृरूप, जीवनदायिनी शक्ति आ विनाशकारी बाढ़ि — तीनू रूप में देखल गेल हय। ‘नदी मातृ के क्षेत्र’ के शास्त्रीय गौरव आ प्रतिवर्ष के जल-प्रलय, भूख, विस्थापन, ऋण आ पलायन के यथार्थ के बीच के विडम्बना के लेखक कोसी-माइ के लोकगीतीय उपराग से जोड़के दे हथिन — माइ के प्रकोप मानके मनौती करै लोक-मानस के चित्रण सांस्कृतिक अध्ययन के सामग्री हय। कोसी के’माइ’ रूप सांस्कृतिक आत्मीयता पैदा करै हय, मुदा कविता में ई माइ से प्रश्न भी कैल जाय हय — भक्ति आ प्रतिरोध एकसाथ उपस्थित हय। सुकान्त सोम के कविता में मन्त्री के हवाई-सर्वेक्षण के व्यंग्य — सुखाएल बाँस के फट्ठी जइसन आकृति सभ के ऊपर उड़ैत विमान आ अखबार में एकगो हरियर मुस्काइत चेहरा — सत्ता-आलोचना के तीक्ष्णतम उदाहरण के रूप में उद्धृत हय। राहत-सामग्री के लूट, साँप-मूस के मिलन आ पारिस्थितिकीय क्षति के प्रसंग बाढ़ि के प्राकृतिक आपदा से आगू राजनीतिक-नैतिक प्रश्न बना दे हय। पर्यावरणीय आलोचना के दृष्टि से ई अध्याय मनुष्यकेन्द्रित सीमा पार करै पशु-पक्षी, बगुला, खेत, पोखरि, वनस्पति आ पूरा जीव-मण्डल के त्रासदी देखाबै हय; नदी के प्राकृतिक प्रवाह, बान्ह, तटबन्ध, राहत-व्यवस्था, सरकारी सर्वेक्षण आ भ्रष्टाचार एक जटिल राजनीतिक पर्यावरण बनावै हय। विदेह समान्तर इतिहास के दृष्टि से बाढ़ि मिथिला के बाहरी दुर्घटना न, ओकर सामाजिक संरचना, लोकगीत, स्मृति, अर्थव्यवस्था आ पलायन के निर्णायक इतिहास हय।
३.१३ मैथिली महाकाव्य में युग-सन्दर्भ
पाँच महाकाव्य — सुभद्राहरण (मुंशी रघुनन्दन दास), राधाविरह (मधुप), अगस्त्यायनी (मार्कण्डेय प्रवासी), त्रिपुण्ड (धीरेन्द्र) आ पराशर (किरण) — के चयन पाँच युगीन प्रयोजन के आधार पर कैल गेल हय: स्वाधीनता-संघर्ष, नारी-सशक्तीकरण, राष्ट्रीय भावात्मक एकता, श्रम-निष्ठ युवा-शक्ति आ मैथिल उपराष्ट्रीयता। पौराणिक कथानक के भीतर समकालीन इतिहास पढ़े के ई पद्धति — जहल से पुत्र के पत्र पाबि लिखल सुभद्राहरण में असहयोग आन्दोलन के कर-बहिष्कार, अगस्त्यायनी में भाषा-विवाद के समाधान रूप में शिव के डमरू से तमिल-संस्कृत के युगपत् जन्म, पराशर में’अन्न हय प्राण’ के श्रम-घोष आ सीता के मुहेँ मिथिला के लोकतन्त्री गौरव — रूपक-पाठ (अन्योक्ति-व्याख्या)के सफल प्रयोग हय। नव-इतिहासवादी सिद्धान्त के अनुरूप पुराण के पात्र अपन प्राचीन समय में बन्द न रहै हथिन: अर्जुन स्वतन्त्रता सेनानी के कर्तव्यबोध के प्रतीक बनै हथिन; राधा राष्ट्र आ समाज-सुधार में स्त्री के सहभागिता के स्वर बनै हथिन; अगस्त्य उत्तर-दक्षिण समन्वयक वाहक बनै हथिन; त्रिपुण्ड में शिव कृषक आ श्रमिक बनै हथिन; पराशर में श्रम-प्रतिष्ठा, वर्णभेद-विरोध, भूख के समक्ष कर्मकाण्ड के निरर्थकता आ मैथिली अस्मिता व्यक्त हय। भारतीय काव्यशास्त्र के साधारणीकरण प्रक्रिया इहाँ साफ हय — पुराण के विशिष्ट पात्र आधुनिक जन के सामूहिक आकांक्षा के प्रतिनिधि बनै हथिन। रचना-काल आ प्रकाशन-काल के सावधान अभिलेखन ई अध्याय के इतिहास-लेखन के दृष्टि से भी प्रामाणिक बनावै हय।
३.१४ नऽव गीत में समाज-चेतना
‘नऽव गीत’ पद के प्रवर्तन आ परिभाषा ई निबन्ध के सैद्धान्तिक योगदान हय — ई वयोवर्ग के न, मूल्यबोध के द्योतक; नवीन गीत के उपरान्त रचल सब गीत नऽव गीत न। नऽव गीत पारम्परिक रूढ़ कथ्य, मिथ्या गौरव, उपदेशात्मकता आ भावु के विलाप से हटि आधुनिक सामाजिक विसङ्गति, औद्योगीकरण, महानगरीय त्रास, भूख, बेरोजगारी आ संघर्ष के लयात्मक रूप दे हय। यन्त्र-युग के उपज मानके ई में बुद्धि-तत्त्व आ भाव-तत्त्व के लयात्मक सम्मिश्रण के लक्षण-निर्धारण, आ प्राचीन गीत के गार्हस्थ्य शृंगार, चन्दा झा के भाव-विह्वलता, राष्ट्रीय चेतनावादी अतीत-गान आ मंचीय तुकबन्दी — चारू से एकर सीमा-रेखा खीचब वर्गीकरण-शास्त्र के सुन्दर अभ्यास हय। नऽव गीत में बुद्धि आ भावना विरोधी न, परस् पर पूरक हय; निजी दुःख सामूहिक सामाजिक संकट में साधारणीकृत होय हय। गंगेश गुंजन के’दूभि के पेंपी पर बड़ के गाछ पतरब’ के प्रतीक-व्याख्या — दलित-शोषित के नव चेतना पर प्रभु-वर्ग के पसरब — मार्क्सवादी पाठक संयत प्रयोग हय; बुद्धिनाथ मिश्र के जेठुआ मकइ आ मार्कण्डेय प्रवासी के फागुन-आह्वान के विश्लेषण नऽव गीत के वैविध्य के प्रमाणित करै हय। बालु पर लिखल इतिहास, माटि के डिबिया जइसन जरैत गाम — ई प्रतीक आधुनिक असमानता के तीव्र ध्वनि पैदा करै हय। मार्क्सवादी दृष्टि से सुविधा-भोगी वर्ग, विफल विकास-योजना, महानगर के प्रभुत्व आ ग्रामीण दण्ड के आलोचना हय; रूपवादी दृष्टि से नूतन प्रतीक, खण्डित बिम्ब आ बोलचाल के लय नऽव गीत के वैशिष्ट्य हय। अध्याय नऽव गीत के विविधता के कमजोरी न, जीवित विकास के प्रमाण मानै हय।
३.१५ मैथिली कविता के वर्तमान धारा
भुवनेश्वर-संगोष्ठी (२०१२)मे पठित ई आलेख रवीन्द्रनाथ आ सुब्रह्मण्यम भारती के साक्ष्य से भारतीय सामासिक संस्कृति के पट पर मागधी-प्राच्य परिवार के चारू सहोदरा (असमिया, ओड़िआ, बंगला, मैथिली)के साझा विरासत, विद्यापति के प्रभाव आ औपनिवेशिक भाषा-सत्ता के इतिहास के स्मरण करै मैथिली कविता के चारि वर्तमान धारा के निर्धारण करै हय: मानवजाति पर आएल संकट के चिन्ता (जीवकान्त के युद्ध-जर्जर शताब्दी के विदाइ), उपभोक्तावादी संस्कृति के विरोध, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के प्रतिरोध (सूचना-महापथ पर एकरेखीय विकास के मत्स्यन्याय), आ जैविक-सांस्कृतिक वैविध्य के क्षरण-चिन्ता (छओ बिगहा आठ कट्ठा के कलम-उजाड़ि, बगुला के पलायन)। जीवकान्त आ उदयनारायण सिंह’नचिकेता’ के कविता के आलोक में उपभोक्तावादी दानवता के विरुद्ध मानव के अस्तित्व आ सांस्कृतिक स्वायत्तता के संघर्ष विश्लेषित हय। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि से सूचना-साधन, बजार, उच्च प्रौद्योगिकी आ सांस्कृतिक प्रभुत्व के सम्बन्ध उद्घाटित होय हय — एकर आशय ई न जे बाहरी संस्कृति से सम्पर् के वर्जित हो, बल्कि एकतरफा प्रभुत्व स्थानीय भाषा, लिपि, जीवन-पद्धति आ कल्पनाशक्ति के समाप्त न करए। पर्यावरणीय दृष्टि से जैवविविधता, स्थानीय धान, आम के प्रजाति, पोखरि, बगुला आ प्राकृतिक आवास के विनाश आधुनिक कविता के चिन्ता बनै हय। आशबी के’अपेक्षित बहुमुखता’ के नियम — परिवेश से लड़बा खातिर कम से कम ओतने आन्तरिक वैविध्य चाही जतना परिवेश में हय — के प्रयोग मैथिली आलोचना में व्यवस्था-चिन्तन के प्रवेश हय, आ ई अस्तित्व-रक्षा के प्रश्न के भावुकता से निकालि विज्ञान के धरातल पर लाके दे हय। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से मैथिली कविता भारत आ नेपाल के साझा भाषिक जीवन, लोकज्ञान आ सांस्कृतिक बहुलता के रक्षा करै प्रतिरोध के काव्य बनै हय।
३.१६ मैथिली लोकगीत: अवस्था आ संरक्षण
जनकपुरधाम के राष्ट्रीय संगोष्ठी में कार्यपत्र पर टिप्पणी-रूप में प्रस्तुत ई आलेख’लोके च वेदे च’ के शास्त्रीय समानान्तरता से लोक-प्रतिष्ठा के भारतीय आधार जोड़ै हय। आरम्भ में लेखक प्रस्तुत आलेख के परिचयात्मक प्रवृत्ति के आलोचना करै हथिन आ माँग करै हथिन कि लोकगीत के खाली सूची न, ओकर सामाजिक कार्य, परिवर्तन आ विलुप्ति के कारण के विश्लेषण हो — जाँत के स्थान पर यन्त्र आ ढेकी के स्थान पर मिल आबि गेला पर श्रमगीत के भविष्य की होयत, ई प्रश्न बहुत सार्थक हय। लोकगीत के लेखक सामूहिक भावात्मक अभिलेख, परम्परागत ज्ञान, औषधीय अनुभव, कृषि-संस्कृति, पारिवारिक सम्बन्ध आ जीवन-संस्कार के भण्डार मानै हथिन — मेथी-हरदि के औषधीय गुण,’नानी के पीसल मेथी’ के सामाजिक अर्थशास्त्र, धोबिनियाँ के सोहाग के पौराणिक कथा-गुम्फन, तुलसी, बेल, बाँस जइसन प्रतीक अनुभवसिद्ध लोकज्ञान के अङ्ग हय। नारीवादी दृष्टि से अध्याय विशेष प्रखर हय: बेटी-जन्म के अवसाद आ भ्रूण-परीक्षा-पहिले के मरीच-प्रयोग के साक्ष्य, कन्या के सामाजिक अवमूल्यन, पतिद्वारा श्रम-शोषण, दहेज, सासु-ननद के नियन्त्रण आ नवविवाहिता के देहगत आकांक्षा लोकगीत में सुरक्षित हय। लगनी के अप्रस्तुत-विधान (लौंग के फूल, यमुना में जाल)के रस-सजग व्याख्या शिष्ट-लोक के कृत्रिम भेद के खण्डन हय। संरक्षण खातिर यूनेस्को के अमूर्त सांस्कृतिक सम्पदा-ढाँचा से चिन्हे के तीन आ संरक्षण के सात उपाय के प्रस्ताव — अभिलेखागार, सङ्ग्रहालय, क्षेत्रीय वर्गीकरण, प्रशिक्षित सङ्कलक, ध्वनि-अभिलेखन आ समुदाय के प्रति उपलब्ध करायब — आ समष्टि-चेतना आ ओगबर्न के सांस्कृतिक-तत्त्व-वैविध्य के सूत्र से नेपाल के नव लोकतन्त्र में लोकशक्ति के सांस्कृतिक आधार के तर्क व्यावहारिक नीति-प्रस्ताव के स्तर तक जाय हय, जे मैथिली आलोचना में दुर्लभ हय। विदेह समान्तर इतिहास में लोकगीत अशिक्षित समुदाय के मनोरञ्जन न, समाज के जीवित इतिहास हय।
३.१७ उपनिवेशवाद के नऽव चालि
समापन-निबन्ध उत्तर-औपनिवेशिक चिन्तन के व्यावहारिक शिखर हय आ राजनीतिक स्वतन्त्रता के बादो भाषिक उपनिवेशवाद के निरन्तरता उद्घाटित करै हय। तंजानिया के किस्वाहिली-प्रकरण के विस्तृत अध्ययन — स्वाधीनता (१९६२)के बाद शिक्षा के माध्यम बनावे के संकल्प, आर्थिक संकट, विश्व बैंक आ अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष के शर्त, निजीकरण, आ ब्रिटिश सहायता-योजना के माध्य में अंग्रेजी के पुनःस्थापन — से ई सूत्र निकालल गेल हय कि राजनीतिक उपनिवेश गेला के बाद भाषिक-सांस्कृतिक उपनिवेश आर्थिक सहायता के नव चालि से चलै हय। मेडागास्कर, जाम्बिया, मलेशिया आ भारत के (कर्पूरी ठाकुर-प्रसंग सहित) समान्तर दृष्टान्त, आ एके दिन (१९ नवम्बर २००८) पटना में ब्रिटिश मन्त्री के बालिका-विद्यालय आ अमेरिकी दूतावास के महिला-महाविद्यालय गमन के सूक्ष्म पाठ — जे स्त्री-शिक्षा के नव-विकसित क्षेत्र के औपनिवेशिक भाषा के प्रभाव-क्षेत्र बनावे के सुनियोजित चालि हय — विचारोत्तेजक हय।
उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि से लेखक के प्रमुख स्थापना हय — राज्यसत्ता छोड़के देब खाली उपनिवेशवाद के अन्त न; शासन के भाषा, ज्ञान के मानदण्ड, शिक्षा के माध्यम आ रोजगार के प्रवेश-द्वार पर अधिकार बनल रहला तक औपनिवेशिक सत्ता नव रूप में जीवित रहै हय। भारत में अंग्रेजी माध्यम के निजी विद्यालय के विस्तार, स्थानीय भाषा के प्रति शिक्षित वर्ग के हीनताबोध आ घर में पीढ़ीगत भाषा-संक्रमण के टूटन मैथिली के खातिर दूतरफा संकट पैदा करै हय। फिशमैन के भाषा-संक्रमण सिद्धान्त के सूत्र — अन्तरपुस्तीय मातृभाषा-संक्रमण के बिना भाषा-रक्षा असम्भव; जे भाषा अन्तर-पीढ़ीगत रूप से संक्रमित न होय हय, ओकर मृत्यु सुनिश्चित हय — आ मैथिल परिवारसभ से पारिवारिक भाषा के रूप में मैथिली के उठि जाय के दृष्टान्त ई निबन्ध के’मैथिली पर दू तरफा मारि’ के चेतावनी-पत्र बना दे हय। विदेह समान्तर इतिहास के दृष्टि से अध्याय के सबसे बेसी मार्मिक पक्ष पारिवारिक भाषा-विच्छेद हय — जब दादा-दादी पोता-पोती से संवाद न के पावै हथिन, तब खाली शब्द न, कथा, गीत, संस्कार, लोकज्ञान आ सामूहिक स्मृति भी टूटैत हय।
४. अध्यायवार सीमा, अन्तर्विरोध आ अपूर्णता
रमणजी के अपन घोषित सिद्धान्त हय कि आलोचना अभिनन्दन-पत्र न हय; व्यक्त विचार के सप्रमाण खण्डित करब वा वैमत्य राखब अवमानना न। समीक्षाशास्त्र में खाली प्रशंसा करब गुटबन्दी आ मित्र-मण्डली के संकीर्ण दायरा के पोसे के समान हय। तेँ ओही कसौटी पर, आ ओही आदर-भाव से, हरेक अध्याय के सीमा, वर्गीय विलोपन आ सैद्धान्तिक अपूर्णता के विवेचन नीचे प्रस्तुत हय। ई सीमा सब पोथी के मूल्य के घटबैत न हय, बल्कि आगाँ के अनुसन्धान खातिर’वादे वादे जायते’ के द्वार खोलै हय।
४.१ मैथिली आ मिथिला भाषा के अध्ययन: सीमा
पहिल सीमा स्रोत-केन्द्र के हय। अध्याय मुख्य रूप से पश्चिमी विद्वान् के (कोलब्रुक, बीम्स, हार्नले, ग्रियर्सन) साक्ष्य पर ठाढ़ हय; दीनबन्धु झा से पहिले के देशी वैयाकरण-चेतना — पाँजि-प्रबन्ध के भाषिक अभिलेख, ज्योतिरीश्वर-काल के शब्द-संग्रह-प्रवृत्ति, संस्कृत-टीका-परम्परा में मैथिली-प्रयोग के साक्ष्य — प्रायः अस्पर्शित रहि गेल। फलतः जे औपनिवेशिक ज्ञान-मीमांसा के आलोचना निबन्ध करै हय, तकरहि स्रोत-सामग्री पर ओ खुद आश्रित हो जाय हय — ई उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श के चिर-परिचित आत्म-विरोध हय। दोसर, औपनिवेशिक ज्ञान-निर्माण के अन्तर्विरोध के पर्याप्त विश्लेषण न हय: ग्रियर्सन के कार्य मैथिली के पहचान के साधन भी हल आ औपनिवेशिक जनगणना, वर्गीकरण आ प्रशासन के उपकरण भी; कैम्पबेल (१८७४)के शब्द-संग्रह के खाली प्रशासनिक सुविधा मानब, आ ग्रियर्सन द्वारा कैल गेल औपभाषिक विभाजन — पूर्वी रूप के ‘गँवारी’ आ निम्नवर्ग के भाषिका के ‘जोलहा बोली’ कहब — के वर्ग-विभेदी पक्ष के न चिन्हब, प्राच्यवादी ज्ञान-संचय के ओ आलोचना से वञ्चित रह जाय हय कि ई द्वैधता के अधिक गम्भीरता से खोलि सकै हल। तेसर, कार्यभार आ कार्य-पारदर्शिता के सिद्धान्त के प्रयोग आरम्भ त भेल, मुदा मैथिली के अलग-अलग प्रक्षेत्र (शिक्षा, प्रशासन, व्यापार, धर्म, संचार)मे प्रयोग के कोनो क्षेत्रवार विवरण वा तुलनात्मक आकलन न — सिद्धान्त उदाहरण के (अंग्रेजी, संस्कृत) स्तरहि पर रहि गेल, मैथिली के मापन न भेल। चारिम,’मान के मैथिली’ के निर्धारण में आन उपभाषा-रूपक सामाजिक अधिकार के प्रश्न — मान के कोन शक्ति-संरचना से बनै हय — अनुत्तरित हय; भाषा के अवनति के कारण बाहरी आक्रमण आ प्रशासनिक उपेक्षा में केन्द्रित हय, मैथिल समाज के आन्तरिक जातिगत विभाजन, शिक्षित वर्ग के भाषिक उदासीनता, स्त्रीशिक्षा के अभाव आ आर्थिक संरचना के भूमिका तुलनात्मक रूप से कम विश्लेषित हय। पाँचम, अंग्रेजी पाद-टिप्पणी के बाहुल्य बिना अनुवादक हय, आ निबन्ध के समापन प्रश्न-शृंखला में विसर्जित हो जाय हय — व्याकरण-लेखन के विलम्ब के जे कारण-मीमांसा आरम्भ भेल हल, ओकर सुगठित निष्कर्ष-सूत्र पाठक के खुद जोड़ऽ पड़ै हय।
४.२ रमानाथ झा आ मिथिला भाषा: सीमा
संग्रह के ई दीर्घतम अध्याय संरचना के दृष्टि से शिथिल हय — प्रत्यालोचना, जीवनी, भाषा-प्राचीनता, लिपि-विमर्श, मानकीकरण आ भाषा-प्रबन्धन: छह स्वतन्त्र निबन्ध के सामग्री एके छत्र में अटकावल गेल हय, जेसे तर्क के धार ठाम-ठाम मोथरा जाय हय। दोसर, सन्तुलन के घोषित प्रतिज्ञा के बादो स्वर कतको स्थान पर आलोचनात्मक जीवन-विवेचन से अधिक प्रतिरक्षात्मक श्रद्धाञ्जलि बन जाय हय: किरणजी के मत-खण्डन के ‘आवेगात्मक’ आ ‘सुविचारित न’ कहल गेल, मुदा विरोधी पक्ष खातिर प्रयुक्त लेखक के अपन शब्दावली (‘कौचर्य-प्रवीण’, ‘खिधांस’, ‘लटुआएल-दबकल’) भी आवेग से पूरा तरह से मुक्त न — प्रत्यालोचक जे तटस्थता के माँग करै हथिन, से खुद हुन के भाषा में कहीं-कहीं भंग होय हय; विरोधी मत के तर्क के निष्पक्ष पुनर्निर्माण न कैल गेला पर प्रत्युत्तर के विश्वसनीयता घटै हय। तेसर, हाउगेन-फर्गुसन के परवर्ती सिद्धान्त से रमानाथ झा के पूर्ववर्ती कार्य के संगति देखाएब जतना आकर्षक हय, ततबे कालदोष के जोखिम से भरल — ई संगति सप्रयोजन नियोजन हल की आकस्मिक समान्तरता, एकर विवेचन न भेल। चारिम, मैथिली के बहुत प्राचीन अस्तित्व सिद्ध करे के उत्साह में महाकाव्य, बौद्धकाल वा प्राचीन जनपद से सम्बन्धित किछु निष्कर्ष भाषावैज्ञानिक प्रमाण के अपेक्षा सांस्कृतिक अनुमान पर अधिक आधारित बुझाय हय — ‘मिथिला’ नाम के प्राचीनता स्वतः वर्तमान मैथिली भाषा के अखण्ड रूपक प्रमाण न बनै हय। पाँचम, रमानाथ झा के अपन सीमा — जेना हुन के शब्दानुवाद के नीरसता जकर चर्च दसम अध्याय में खुद लेखक करै हथिन, हुन के मानकीकरण-प्रतिरूप के व्यावहारिक असफलता, वा मानकीकरण में आभिजात्य वर्ग के भाषिक रूप के प्राथमिकता देला से आन वर्ग-क्षेत्र के मैथिली के अवमूल्यन के प्रश्न — ई अध्याय में प्रायः मौन हय; व्यक्ति-समर्थन आ सिद्धान्त-समर्थन एक वस्तु न, आ प्रशंसा के आधिक्य से चरित्र पूर्ण मानवीय व्यक्तित्व के बदला आदर्शीकृत प्रतिमा बने के जोखिम में पड़ै हय। छठम,’साहित्य-पत्र’ के बन्द होय के आरोप के जे खण्डन हय, ओ तर्काश्रित बेसी, अभिलेखाश्रित कम — पत्रिका के अर्थ-व्यवस्था, ग्राहक-संख्या वा बन्द होय के प्रत्यक्ष कारण के कोनो दस्तावेज न देल गेल।
४.३ प्रत्यालोचक किरणजी: सीमा
पहिल, अध्याय केन्द्रीय स्थापना — किरणजी के आलोचना मूलतः प्रत्यालोचना हय, स्वतन्त्र कृति-अवगाहन से न जनमल — एकगो गम्भीर न्यूनीकरण के जोखिम रखै हय; प्रत्यालोचना के स्वभाव प्रतिक्रियात्मक होय हय आ ई अध्याय में किरणजी के विचार प्रायः पूर्ववर्ती निष्कर्ष के खण्डन के माध्यम से सामने आबै हय, हुनकर स्वतन्त्र सौन्दर्यशास्त्रीय प्रतिमान अधिक व्यवस्थित रूप में निर्मित न होय हय। जे ‘प्रतिक्रियावादिता’ के प्रश्न लेखक खुद उठावै हथिन, से बिना पूर्ण उत्तर के छोड़के देल गेल हय — प्रश्न उठा के ओकर मीमांसा से बचि जाएब आलोचकीय दायित्व के अधूरा निर्वाह हय। दोसर, विरोधाभास-प्रदर्शन में उद्धरण-चयन एकतरफा हय: किरणजी के जे स्थल सब में आत्म-संशोधन वा मत-परिमार्जन भेल हो, से खोजल न गेल; कोनो चिन्तक के चालीस वर्ष के लेखन में मत-भिन्नता विकास भी होके सकै हय, खाली विरोधाभास न। तेसर, कुलानन्द मिश्र के चन्द्रग्रहण-प्रसंग अपूर्ण हय — मिश्रजी के मूल आपत्ति के पूरा तर्क-पक्ष न राखल गेल, खाली खण्डनीय अंश उद्धृत भेल। चारिम, सामाजिक न्याय आ लोकमंगल के आग्रह महत्त्वपूर्ण हय, मुदा साहित्य के खाली विचारधारात्मक उपयोगिता से मापल गेला पर रूप, लय, जटिलता, हास्य, विरोधाभास आ कलात्मक स्वतन्त्रता के अवमूल्यन होय के आशङ्का रहै हय; किरणजी के क्रान्तिकारी वर्ग-दृष्टि के पारम्परिक अलंकारशास्त्र के चौखठि में बान्हि देला से ओकर सामाजिक धार कुनहटएबा के जोखिम भी हय — दूषण-पाँजि आ कौलीनतावादी शुद्धतावाद के जे आन्तरिक विखण्डन के ओर किरणजी के लेखन के संकेत हल, से पूर्ण विकसित न भेल। पाँचम,’मैथिल आँखि’ स्थानीय दृष्टि के सशक्त अवधारणा हय, मुदा एकर सीमा साफ न — की ई दृष्टि सब जाति, लिङ्ग, वर्ग, धर्म आ क्षेत्र के मैथिल अनुभव के समान रूप से ग्रहण करै हय, वा शिक्षित पुरुष-केन्द्रित सांस्कृतिक दृष्टि फेर’पूरा मिथिला’ के नाम पर स्थापित होय हय? छठम, किरणजी के काव्य-कृति (पराशर जइसन)के आलोचकीय दृष्टि से हुन के आलोचना-गद्य के अन्तर्सम्बन्ध के — कवि-आलोचक के द्वैध व्यक्तित्व के — कोनो विवेचन न; ई पक्ष तेरहम अध्याय में फराक चलि गेल, दुनू के सेतु न बनल। साथे, प्राचीन रचना सब में आधुनिक राष्ट्रीयता, वर्ग-संघर्ष वा लोकतान्त्रिक मूल्य खोजै काल ऐतिहासिक दूरी के सावधानी हरदम न राखल गेल हय।
४.४ कन्यादान-पाठ: सीमा
ई प्रखर निबन्ध के पहिल सीमा हय प्रश्न-शृंखला के अनुत्तरता — ‘एकर उत्तरदायी के?’ बेरि-बेरि पूछल गेल (अशिक्षा? माए-बाप? सर-कुटुम्ब? समाज?), मुदा लेखक अपन निर्णय सप्रमाण न देलथिन; उपेक्षिता के आँखि से पढ़े के जे प्रतिज्ञा हल, से अन्त में प्रश्नवाच के मुद्रा में स्थगित होके गेल। दोसर, कन्यादान के हास्य-रस के पक्ष — जे कृति के लोकप्रियता के मूलाधार हय — के रस-शास्त्रीय परीक्षा न भेल: हास्य के आलम्बन अबोध बुच्ची हय की खुद अर्ध-शिक्षित समाज, हास्य के भीतर करुण के अन्तर्धारा कोन विन्यास से बहैत हय, कथावाचक के दूरी आ विडम्बनात्मक द्वयर्थता के विश्लेषण, आ पाठक के असहज हँसी के परीक्षण — ई प्रश्न अस्पर्शित रहल; कतको स्थान पर पुनर्पाठ अभियोग-पत्र बन जाय हय आ साहित्यिक पात्र के हरेक व्यवहार के प्रत्यक्ष सामाजिक यथार्थ मानके लेखक वा कृति के नैतिक दोष निर्धारित करब विधागत रूप से जोखिमपूर्ण हय, कारण कन्यादान हास्य, व्यङ्ग्य, विडम्बना, अतिरञ्जना आ सामाजिक प्रकार-निर्माण के रचना हय। तेसर, द्विरागमन — जेमें हरिमोहन झा खुद कथा के उत्तर-पक्ष रचलनि — के चर्चा के अभाव से मूल्याङ्कन आधा पाठ पर ठाढ़ हय; उपन्यास-युग्म के समग्र पाठेँ लेखकीय दृष्टि के न्याय होके सकै हल। चारिम, पूर्ववर्ती उपन्यास के साक्षर नारी-पात्र के जे तालिका हय, ओ मात्रात्मक साक्ष्य हय — ओ पात्र सभ के साक्षरता कथानक में कतना केन्द्रीय हय आ बुच्ची के निरक्षरता कतना, ई गुणात्मक तुलना के बिना’पीछे हटब’ के स्थापना पूर्ण-प्रमाणित न कहल जा सकै हय। पाँचम, बुच्ची के निरक्षरता खुद व्यंग्य के अस्त्र — समाज के आत्म-दर्शन के दर्पण — रूप में सप्रयोजन रचना त न हय, ई प्रश्न छूटल; साथे बुच्ची दाइ के सम्भावित अन्तःचेतना, मौन के प्रतिरोधी अर्थ, स्त्री-समुदाय के पारस्परिक सम्बन्ध आ घरेलू ज्ञान के विस्तार पूरा रूप से विकसित न भेल। छठम, पति-पत्नी में भाषिक असमानता के प्रश्न मूल्यवान हय, तबो हिन्दी बोलब खाली सांस्कृतिक अनात्मीयता के निश्चित प्रमाण मानब सरल निष्कर्ष होके सकै हय — वर्ग, शिक्षा, नगर-ग्राम दूरी आ वैवाहिक अपरिचय के संयुक्त प्रभावक विश्लेषण अपेक्षित हल।
४.५ अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह: सीमा
लेखक खुद स्वीकारै हथिन कि छिड़िआएल कविता में से ‘किछु मात्रे झोड़ि’ सकलथिन — ई ईमानदार स्वीकारोक्ति प्रशंसनीय हय, मुदा एकर परिणाम ई जे निष्कर्ष सब (निरपेक्षता, अनुदार समकालीनता के शिकार) सीमित नमूना पर ठाढ़ हय आ सामान्यीकरण के वैधता संदिग्ध रहै हय — सीमित आ बिखरल उदाहरण के आधार पर कवि के पूरा काव्य-दृष्टि निर्धारित करब सावधानी माँगै हय। दोसर, कतको प्राकृतिक प्रतीक के प्रत्यक्ष राजनीतिक रूपक मानल गेल हय — ‘पछबा’ पाश्चात्य संस्कृति आ ‘शरदागम’ औपनिवेशिक क्षय के प्रतीक अवश्य होके सकै हय, मुदा प्रतीक के ई अर्थ कविता के आन्तरिक संरचना, रचनाकालीन साक्ष्य आ आन कविता से पुष्ट होय के चाही; जीवनीपरक तथ्य आ काव्यार्थ कतको स्थान पर एक-दोसर में मिलि जाय हय, आ कवि के जीवन के राष्ट्रीय वातावरण से ई स्वतः सिद्ध न होय हय कि हरेक प्रकृति-कविता राजनीतिक ध्वनि रखै हो। तेसर, गद्य-कृति — श्रीचामुण्डा आ पंचवटी उपन्यास — के नाममात्र उल्लेख भेल; ‘अनालोचित’ के पुनर्वास के जे प्रतिज्ञा हल, से कविता तक सीमित रहि गेल आ कवि के आधा व्यक्तित्व एहू अध्याय के बाद अनालोचिते रहल। चारिम, विवरण-बाहुल्य हय — जीवन-वृत्त, पत्रिका-नाम, तिथि — मुदा काव्य-शास्त्रीय विश्लेषण (छन्द-विधान, बिम्ब-योजना, भाषिक स्तर)’शरदागम’ आ’पछबा’ के बाहर विरल हय; फलतः लक्ष्मीपति सिंह महत्त्वपूर्ण विचार के रूप में उभरैत हथिन, मुदा कवि के विशिष्ट कलात्मक स्वर कम साफ होय हय। पाँचम, कवि के दरबारी-सामन्ती परिवेश के सान्निध्य से हुन के वर्ग-दृष्टि कइसे प्रभावित भेल — पाश्चात्य संस्कृति के विरोध के संग गाम के जमीन्दारी शोषण के विरुद्ध हुन के काव्य में कोन स्वर हय — ई वर्ग-प्रश्न अस्पर्शित रहल। छठम, कवि के हिन्दी-लेखन आ मैथिली-लेखन के अन्तर्सम्बन्ध के प्रश्न — द्विभाषिक कवि-चेतना के गति — उठावल न गेल, जब कि पोथी के अन्तिम अध्याय के द्विभाषिकता-विमर्श से एकर सोझ संगति बनि सकै हल।
४.६ यात्री के भाषा: सीमा
पहिल, चारू उपकरण पश्चिमी शैलीविज्ञान से आनल गेल हय आ भारतीय काव्यशास्त्र से संगति-स्थापन (‘निरंकुशाः कवयः’, वक्रोक्ति-सम्प्रदाय) संकेत-खाली रहि गेल; कुन्तक के छह वक्रता-भेद से चयन-विचलन के व्यवस्थित मिलान भेल रहितै के त पूर्व-पश्चिम-सेतु पूर्ण बनितै के — से अवसर छूटि गेल। दोसर, उदाहरण चयन मुख्य रूप से सफल भाषिक प्रयोग पर केन्द्रित हय आ विश्लेषण-सामग्री मुख्य रूप से पत्रहीन नग्न गाछ पर; यात्री के कमजोर, अतिशय कृत्रिम, अस्पष्ट वा समयबद्ध शब्दनिर्माण के परीक्षण, आ हुन के परवर्ती संग्रह आ गद्य के व्यवस्थित समावेश कैल गेल रहितए त’यात्री के भाषा’ के समग्र चित्र आरो सन्तुलित होय। तेसर, विचलन के कतको स्थान पर खुद सौन्दर्य के प्रमाण मानल गेल हय, मुदा हरेक व्याकरणिक उल्लङ्घन कलात्मक न होय हय — औचित्य, प्रसङ्ग, अर्थ-स्पष्टता आ पाठकीय प्रभावक कसौटी पर हरेक विचलन के अलग परीक्षा आवश्यक हय। चारिम,’भाषा के भूगोल’ के आकर्षक रूपक अपरिभाषित रहल — एकर मानचित्रण (कोन अंचल के, कोन वर्ग के, कोन व्यवसाय-क्षेत्र के शब्द-सम्पदा यात्री कहाँ से अनलनि) बिना ई रूपक अलंकारे रह जाय हय, विश्लेषण-उपकरण न बनै हय; साथे’देशज’ के गौरव उचित हय, मुदा भाषा सदा मिश्रित आ परिवर्तनशील होय हय — देशज आ आगन्तुक के कठोर विभाजन खुद ऐतिहासिक रूप से अस्थिर हय। पाँचम, समानान्तरता-खण्ड में मामा-गीत के उद्धरण दीर्घ हय मुदा ओकर सामाजिक व्यंग्य-पाठ (मध्यवर्गीय जीवन-वृत्त के विडम्बना) संक्षेप में निपटा देल गेल — शैली-विश्लेषण अर्थ-विश्लेषण से आगू भागि गेल; ध्वनि-संरचना, वाक्य-दीर्घता, कथन-स्वर, संवाद, व्यङ्ग्य के बहुस्तर, भाषिक संकरता आ अलग-अलग विधा में भाषा-परिवर्तन के पर्याप्त विवेचन भी न हय।
४.७ मनमोहन झा: सीमा
ई संग्रह के लघुतम अध्याय हय आ एकर लघुते एकर मुख्य सीमा हय।’अनालोचित पक्ष’ के घोषणा भेल, मुदा विश्लेषण कथा-सार के स्तर पर रहि गेल — पात्र के उद्धरण हय, कथा-शिल्प के (दृष्टिबिन्दु, कथन-भंगिमा, समय-विन्यास, संवाद, कथन-गति, करुणा आ राष्ट्रीयता के रचनात्मक सन्धि के) विवेचन न। अध्याय पात्र के कथन, कथावाचक के दृष्टि आ लेखक के विचार में पर्याप्त भेद न करै हय — कोनो पात्र राष्ट्र वा मिथिला के खातिर आत्मोत्सर्ग के बात कहै हय, ओसे पूरा कथा वा लेखक के अन्तिम विचार स्वतः निर्धारित न होय हय। राष्ट्रीयता आ मैथिल उपराष्ट्रीयता के प्रायः सकारात्मक नैतिक मूल्य मानके खातिर गेल हय — राष्ट्रवाद के भीतर जाति, वर्ग, लिङ्ग, धर्म आ क्षेत्रीय प्रभुत्व के सम्भावना प्रश्नांकित न भेल, आ उपराष्ट्रीय गौरव के भीतर निम्नवर्गीय समाज के मूल प्रश्न (भूख, बेगारी) ओझल रहि गेल। आत्मबलिदानी स्त्री-पात्र सभ के प्रशंसा करै समय ई पूछब आवश्यक हल जे स्त्री के स्वाधीनता हुनकर अपन जीवन-चयन में हय वा पुरुष-निर्धारित राष्ट्र आ संस्कृति के खातिर बलिदान में — नारीवादी दृष्टि से त्याग के महिमामण्डन पितृसत्तात्मक आदर्श के फेर पुष्ट करि सकै हय। करुण-रस के ख्याति आ नव-प्रतिपादित राष्ट्रीय स्वर के अन्तःसम्बन्ध के रस-शास्त्रीय मीमांसा — करुणा राष्ट्रीय चेतना के उद्दीपन बनै हय की अवरोध — पूरा तरह से अस्पर्शित हय। निधन के दसम दिन लिखल गेला के कारण श्रद्धांजलि के आर्द्र स्वर आलोचना के तटस्थता पर भारी हय; बंगला कथा के प्रभावक जे प्रचलित चर्च हय, ओकर परीक्षण स्थगित रहि गेल।
४.८ प्रवासी के योगदान: सीमा
पहिल, प्रवासी-निवासी के निर्धारण हेतु विदेशी मुद्रा-विनिमय अधिनियम के विधिक कसौटी के प्रयोग साहित्यिक-सांस्कृतिक विश्लेषण खातिर अटपटाह हय — लेखक खुद एकर असंगति देखाबै हथिन, मुदा तब अपन वैकल्पिक कसौटी (‘सांस्कृतिक मिथिला के सघनता’)के कोनो परिचालनीय परिभाषा न दे हथिन; नेपाल-तराइ के सांस्कृतिक निरन्तरता के कारण’प्रवास’से बाहर रखे के तर्क भावनात्मक रूप से सशक्त हय, मुदा राजनीतिक सीमा, नागरिकता, प्रशासन, आर्थिक सम्बन्ध आ भिन्न ऐतिहासिक अनुभव के वास्तविकता भी विचारणीय हय। दोसर, प्रवासी पत्रकारिता के इतिहास मुख्य रूप से शिक्षित पुरुष सम्पादक आ प्रतिष्ठित पत्रिका के इतिहास बनि रह जाय हय — महिला सम्पादक, मुद्रक, वितरक, पाठिका, आर्थिक सहयोगी, ग्रामीण ग्राहक आ पत्राचार-लेखक के भूमिका बहुत कम देखाय हय; साथे सम्पादक-वर्ग के अपन सामाजिक स्थिति — जमीन्दार-संभ्रान्त वर्ग के संरक्षण आ ओकर वैचारिक प्रभाव — के वर्ग-विश्लेषण न भेल। तेसर, अध्याय आँकड़ा-रहित हय — कोन पत्रिका कतना दिन चलल, प्रसार-संख्या, ग्राहक-वर्ग, वितरण-क्षेत्र, अर्थ-स्रोत, नियमितता, प्रतिबन्ध, राजकीय दबाव आ पाठकीय प्रतिक्रिया — पत्रकारिता के इतिहास-लेखन जे परिमाणात्मक आधार के अपेक्षा करै हय, से इहाँ न हय; पत्रिका के वैचारिक प्रभावक आकलन मुख्य रूप से सम्पादकीय सामग्री से भेल हय। चारिम, स्वाधीनोत्तर काल के सर्वेक्षण असन्तुलित हय — मिथिला दर्शन के चर्च भेल, मुदा दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता के परवर्ती पत्रिका-प्रयास’नाम गनाएब’से आगू न गेल। पाँचम, प्रवासी-योगदान के छाया-पक्ष — प्रवास-जन्य आदर्शीकरण, मिथिला के यथार्थ से दूरी, भावु के अतीत-मोह — के आलोचनात्मक परीक्षा न भेल; योगदान के अभिनन्दन हय, योगदान के सीमा के हिआओल न। छठम, पत्रकारिता आ साहित्यिक पत्रिका के सीमा कतको स्थान पर धुँधला हय — साहित्यिक विशेषाङ् के, सामाजिक पत्रिका, समाचार-पत्र आ विचार-पत्र के अलग कार्यपद्धतिक अधिक साफ वर्गीकरण अपेक्षित हल।
४.९ दीनाभद्री: सीमा
पहिल, पाठ-प्रामाणिकता के जे केन्द्रीय प्रश्न उठावल गेल — कोन पाठ आधार मानल जाए — ओकर समाधान लेखक खुद न देलथिन; समीक्षित पाठ के समालोचनात्मक संस्करण (पाठान्तर-सूची सहित) तैयार करे के जे स्वाभाविक अगिला डेग हल, से प्रस्तावो रूप में न आएल। साथे लोकगाथा के एक मूल पाठ खोजे के प्रवृत्ति खुद मौखिक परम्परा के बहुरूपता से मेल न खाय — हरेक क्षेत्र, गायक, अवसर, जातीय उपसमूह आ पीढ़ी अपन पाठ निर्मित करै हय। दोसर, ग्रियर्सन के संकलन महत्त्वपूर्ण हय, मुदा औपनिवेशिक सङ्कलक, अनुवादक, लिप्यन्तरक आ सम्पादक के मध्यस्थता के आलोचनात्मक परीक्षण पर्याप्त न — घुमन्तू गायक के जीवित प्रस्तुति लिखित पाठ में आबि कतना बदलल, ई प्रश्न आवश्यक हय। तेसर, महेन्द्रनारायण राम आ फूलो पासवान के दावा के खण्डन में जे कठोरता हय (‘इतिहास-सम्मत न’, ‘नकारात्मक दृष्टि’), से हुन के संकलन-श्रम के स्वीकृति के संग सन्तुलित न भेल — प्रत्यालोचना के जे मर्यादा-सूत्र तेसर अध्याय में प्रतिपादित हय, से इहाँ किछु शिथिल हय। चारिम — आ ई गम्भीरतम — दलित लोकगाथा के विवेचन पूरा तरह से अभिजात आलोचकीय स्थिति से भेल हय: मुसहर समुदाय के अपन गायक, अपन भगता, अपन वर्तमान वाचिक परम्परा के कोनो प्रत्यक्ष साक्ष्य (क्षेत्र-कार्य) न हय; जे तेलुगु दलित-विमर्श के उद्धरण अध्याय में हय — जे कहै हय कि दलित-विषय में बाजबा के अधिकार पर खुद दलित-स्वर के दावी हय — ओकर आलोक अपनहि पद्धति पर न पड़ल; बाहरी आलोचक के व्याख्या आ समुदाय के आत्मव्याख्या में अन्तर होके सकै हय। दीनाभद्री के गाथा के प्रेतयोनि से मुक्ति आ तीर्थ-पूजा जइसन सनातनी ढाँचा में रखके पढ़ला से हुन के स्वायत्त विद्रोही रूपक संस्कृतिकरण के जोखिम भी प्रश्नांकित न भेल। पाँचम, गाथा के स्त्री-पात्र (निरसो, हिरिया, जिरिया)के भूमिका के स्वतन्त्र विश्लेषण न भेल — निम्नवर्गीय विमर्श के भीतरो नारी-स्वर हाशिये पर रहि गेल; साथे मुसहर समुदाय के आन्तरिक विविधता, अनुष्ठान, प्रस्तुति-सन्दर्भ, आर्थिक परिवर्तन आ वर्तमान राजनीतिक उपयोग के विस्तृत क्षेत्रीय अध्ययन अपेक्षित हल।
४.१० कथा के विकास: सीमा
पहिल, चन्द्रप्रभा के तिथि-निर्धारण (रचना १८८० के दश के तक) मुख्य रूप से सम्पादक लक्ष्मीपति सिंह के स्मृति-कथन (‘साठि-सत्तरि वर्ष पहिले के’) आ जीर्ण-शीर्ण पाण्डुलिपि के वर्णन पर आधारित हय — पाण्डुलिपि-विज्ञान के कोनो बाह्य कसौटी (कागज, मसि, लिपि-शैली के काल-निर्धारण)के अभाव में प्रस्थान-बिन्दु के ई पुनर्स्थापन ओतने दृढ़ न हय जतना निबन्ध के स्वर सुझबैत हय; जे कठोरता से रामदेव झा के मदनराज-चरित-विषय के तिथि-भ्रम के खण्डन भेल, ओही कठोरता के प्रयोग अपन पक्ष के साक्ष्य पर न भेल — ई मापदण्ड के द्वैध हय। दोसर, आत्म-सन्दर्भ के सघनता — मैथिली के आरम्भिक कथा, मिथिला दर्पण, निर्दयी सासु आदि उद्धृत स्रोत के सम्पादक खुद लेखक हथिन; सम्पादन-श्रम स्तुत्य हय, मुदा अपनहि सम्पादित सामग्री के निर्णायक प्रमाण बनएबा में स्वार्थ-संलग्नता के आभास अनिवार्य हय, जकर कोनो पद्धतिगत निराकरण (स्वतन्त्र साक्ष्य से पुष्टि) न कैल गेल। तेसर, जलधर झा के ‘विलक्षण दाम्पत्य’ के विधागत स्वरूप — रम्य-रचना, समाचार-मूल के गद्य की कथा — के जे विवाद हय, से अनिर्णीत छोड़ल गेल;’आद्य कथा माने के औचित्य न’ कहल गेल मुदा कथात्व के कसौटी (कथानक, चरित्र, परिणति) सूत्रबद्ध न भेल — मौखिक आख्यान, व्रतकथा, नीति-कथा, आख्यायिका, उपन्यास आ आधुनिक लघुकथा के विधागत भेद भी पर्याप्त कठोरता से निर्धारित न हय। चारिम, लुप्त सामग्री के सम्भावना इतिहास के महत्त्वपूर्ण प्रश्न हय, मुदा ‘उपलब्ध न हय’से’अवश्य हल’ तक पहुँचब अनुमान के छलाँग होय हय — पाण्डुलिपि, उल्लेख, प्रकाशन-विज्ञापन, पत्राचार आ समकालीन समीक्षा जइसन बाहरी साक्ष्य आवश्यक हय; वाचिक कथा-परम्परा के तेसर धारा के स्थापना भी रमानाथ झा के प्राचीन कथन पर आश्रित हय, स्वतन्त्र क्षेत्र-साक्ष्य अनुपस्थित। पाँचम, पुरुषपरीक्षा के अनुवाद प्रभावहीन हल — ई सम्भव निष्कर्ष हय, मुदा एकर प्रचार, पाठक-संख्या आ प्रभावक अभाव के प्रत्यक्ष प्रमाण भी सीमित हय; प्रभाव खाली लोकप्रियता से न, भाषिक वा शैलीगत अनुकरण से भी निर्धारित होय हय। छठम, चन्द्रप्रभा के राजनीतिक प्रतीकात्मक पाठ रोचक हय, मुदा हरेक राजा-प्रजा कथा औपनिवेशिक प्रतिरोध के रूपक हो, ई निश्चित न — सामाजिक नीति-कथा, राजधर्म आ पुरातन उपदेश-परम्परा के सम्भावना समान रूप से जाँचल जाएबा के चाही।
४.११ भूकम्प: सीमा
अध्याय द्वि-केन्द्रित हय — सीताराम झा आ कृष्णनन्दन सिंह — आ १९८८ के संकलन के प्रयोग चयनित उद्धरण तक सीमित; संकलन के समग्र प्रवृत्ति-विश्लेषण (कतना कवि, कोन-कोन दृष्टि, कोन छन्द-परम्परा) न भेल। दोसर, अध्याय कविता के ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में प्रभावपूर्ण ढङ्ग से पढ़ैत हय, मुदा दस्तावेजी मूल्य काव्यात्मक मूल्य पर भारी पड़ै हय — छन्द, ध्वनि, गति, विराम, पुनरावृत्ति आ भयान के रस के संरचना के तुलनात्मक विश्लेषण सीमित हय; आपदा-वर्णन खातिर छन्द के औचित्य-प्रश्न — करुण-रस आ बद्ध-छन्द के सम्बन्ध — अस्पर्शित रहल। तेसर, भूकम्प के लोक-स्मृति — लोकगीत, कहबी, जनश्रुति — पूरा तरह से छूटल, जब कि लोकगीत-अध्याय के लेखक से ई स्रोत के उपयोग के अपेक्षा स्वाभाविक हल; शिष्ट काव्य आ लोक-अभिव्यक्ति के तुलना से आपदा-स्मृति के द्विस्तरीय पाठ बनि सकै हल। चारिम, कम्पकारिका के ‘धर्मशाला बँचि गेल, काशी-वैद्यनाथ मन्दिर बँचल’ जइसन पाँती के जे दैवी-लीला-पर के व्याख्या कवि के हय, ओकर आलोचनात्मक परीक्षण (भवन-संरचना के भौतिक कारण बनाम आस्था-पाठ) न भेल — आलोचक इहाँ कवि के विश्व-दृष्टि के वर्णनकर्ता रहि गेलथिन, विश्लेषक न बनलाह; धार्मिक विश्वास आ वास्तविक विनाश-वितरण के अन्तर्विरोध पर्याप्त प्रश्नांकित न भेल। पाँचम, पीड़ित स्त्री, दलित बस्ती, भूमिहीन मजदूर, अपाङ्ग व्यक्ति आ अनाथ बालक के अलग अनुभव के खोज कम हय — राहत-वितरण आ पुनर्वास में वर्ग-भेद आ जाति-भेद पर रचित लोक-अभिव्यक्ति उपेक्षित रहल;’पूरा मिथिला’ के सामूहिक त्रास के भीतर सामाजिक विषमता छिपि सकै हय। साथे भूकम्प के कारण, भूगर्भीय संरचना, राहत-नीति, मृत के-संख्या आ सामाजिक वितरण के ऐतिहासिक स्रोत से काव्य-वर्णन के तुलना कैल जाय त साहित्य आ इतिहास के सम्बन्ध अधिक साफ होय।
४.१२ कोसी: सीमा
ई अध्याय संग्रह के सबसे बेसी वर्णनात्मक हय — कवि-दर-कवि उद्धरण-माला हय, मुदा विश्लेषण के सूत्र पातर। पहिल, बाढ़िक राजनीतिक अर्थशास्त्र — बान्ह-निर्माण के इतिहास, कोसी-परियोजना, नेपाल-भारत जल-सन्धि, गाद, धारा-परिवर्तन, जल-प्रबन्धन, तटबन्ध के भीतर के बस्ती के स्थायी विस्थापन — के कोनो चर्च न; ‘लोककृत त्रासदी’ के पद एक ठाम आएल हय, मुदा ओकर विस्तार न भेल, जेसे बाढ़ि प्रायः नियतिक प्रकोप बनल रहि गेल आ सरकारी नीति के आलोचना नैतिक रूप से प्रभावी मुदा नीतिगत रूप से अपूर्ण रह जाय हय। दोसर, कथा-उपन्यास के (पंचवटी, लिली रे के पटाक्षेप, इन्किलाब) खाली नामोल्लेख हय —’बाढ़ि-साहित्य’ के जे व्यापक शीर्षक-ध्वनि हय, से कविता तक सिकुड़ि गेल। तेसर, लोकगीत के कोसी-उपराग के जे मार्मिक सन्दर्भ शीर्षकहि में हय, ओकर पाठ-विश्लेषण अत्यल्प हय — शीर्षक जे वादा करै हय, पाठ से पूरा न करै हय। चारिम, कविता के कतको स्थान पर प्रत्यक्ष सामाजिक प्रतिवेदन के समान पढ़ल गेल हय — कविता में अतिशयोक्ति, प्रतीक, भावात्मक संक्षेप आ वक्ता के काल्पनिकता भी होय हय; साथे नदी के’माइ’ कहब आत्मीय हय, मुदा मातृत्व के प्रतीक प्राकृतिक विनाश के भाग्य वा देवी के कोप मानके राजनीतिक उत्तरदायित्व धुँधला करि सकै हय — नदी न, अनुचित बान्ह, कमजोर प्रशासन, भ्रष्ट राहत आ असमान बसावट अनेक त्रासदी के कारण होय हय, आ शृंगारिक-कारुणिक व्याख्या में रोमानीकरण के जोखिम रहै हय। पाँचम, बाढ़िक बोझ स्त्री, निम्नजाति, भूमिहीन, पशुपाल के आ प्रवासी मजदूर पर भिन्न-भिन्न पड़ै हय — ई अन्तरसम्बन्धी विश्लेषण के विस्तार अपेक्षित हल। छठम, बाढ़ि-वर्णन के पुनरावृत्ति-दोष — हरेक वर्ष एके अनुभव के एके प्रकार के अभिव्यक्ति — के जे संकेत लेखक खुद दे हथिन, तकरा कसौटी बना के कविता सभ के तारतम्य-निर्णय (के रूढ़ि, के मौलिक) न कैल गेल।
४.१३ महाकाव्य में युग-सन्दर्भ: सीमा
पहिल, पाँच महाकाव्य के चयन प्रयोजन-आधारित घोषित हय, मुदा बहिष्करण के तर्क अपूर्ण — ‘शेष महाकाव्य युग-सन्दर्भ से हीन न’ कहके आगू बढ़ि जाएब चयन-पूर्वाग्रह के प्रश्न खुजल छोड़के दे हय; कीचकवध, दत्तवती वा चित्रा जइसन कृति के अनुपस्थिति के कारण-कथन अपेक्षित हल, आ शेष महाकाव्य के उल्लेख खाली से ई निर्धारित न होय हय कि चुनल कृति पूरा परम्परा के पर्याप्त प्रतिनिधित्व करै हय। दोसर, तीनू पुरस्कृत महाकाव्य के चयन से जे प्रतिष्ठान-निरपेक्षता के दावी पोथी के स्वर हय, ओमें व्यवधान आबै हय — साहित्य अकादमी के स्वीकृति के छाया चयन पर देखि पड़ै हय। तेसर, युग-सन्दर्भ के खोज में काव्यत्व गौण हो गेल — रस-निष्पत्ति, बिम्ब-विधान, छन्द-प्रयोग, महाकाव्यत्व के शास्त्रीय लक्षण (सर्ग-बद्धता, नायक-स्वरूप, व्यापक कथानक, उदात्त शैली, चरित्र-विकास, वर्णन, संवाद) पर प्रायः मौन; फलतः महाकाव्य विचार-वाहक प्रलेख जइसन पढ़ाएल, काव्य जइसन कम। चारिम, पुराण के पात्र के आधुनिक स्वतन्त्रता सेनानी, समाज-सुधारक, कृषक वा क्षेत्रीय राष्ट्रवादी के रूप में पढ़ब फलदायी हय, मुदा ऐतिहासिक वर्तमानवाद के जोखिम भी हय — प्राचीन मिथक आधुनिक विचार के सीधा पूर्वरूप न। पाँचम, कृतिवार विस्तार असन्तुलित हय — सुभद्राहरण आ पराशर के जतना स्थान, राधाविरह आ त्रिपुण्ड के ओसे बहुत कम; नारी-सशक्तीकरण के जे स्थापना राधाविरह से जोड़ल गेल, से दू-तीन उद्धरण के भरोसे हय आ विप्रलम्भ-शृंगार के प्रधान रस से ई सामाजिक पाठक सम्बन्ध के मीमांसा न भेल — राधा के कर्तव्य फेर पति आ राष्ट्र के सेवा से निर्धारित हय; स्त्री के आत्मनिर्णय, देह, कामना आ निजी जीवन के स्वतन्त्र मूल्य पर चर्चा सीमित रह जाय हय। छठम, अगस्त्यायनी आ पराशर जइसन कृति में जाति-संघर्ष आ आभिजात्य व्यवस्था के जे प्रश्न निहित हय, ओकर सोझाँ-सोझी विखण्डन के स्थान पर’युग-धर्म’ के सामान्य विमर्श तक रुकि जाएब सामन्ती संरचना के पूर्ण आलोचना के अवसर गमा दे हय।
४.१४ नऽव गीत: सीमा
पहिल,’नऽव गीत’ के अवधि आ व्याप्ति के निर्धारण अस्पष्ट रहल — कोन तिथि से, कोन कृति से एकर आरम्भ मानल जाए, कोन-कोन गीतकार ई कोटि में आबै हथिन — एकर कोनो सूची वा काल-रेखा न; परिभाषा मूल्यबोध-आधारित हय, मुदा मूल्यबोध के कसौटी व्यक्तिनिष्ठ रहि गेल, आ ई परिभाषा से अनेक आधुनिक कविता स्वतः नऽव गीत के भीतर आबि सकै हय — गीतत्व के विशिष्ट कसौटी साफ न। दोसर, साक्ष्य-आधार तीन-चारि गीतकार (गुंजन, प्रवासी, बुद्धिनाथ मिश्र) तक सीमित — एतना पातर आधार पर समग्र प्रवृत्ति-निर्धारण आगमन-दोष से ग्रस्त हय; नऽव गीतकार के सामाजिक स्थिति, प्रकाशन-मञ्च, पाठक, पीढ़ीगत अन्तर आ स्त्री-गीतकार के योगदान के विस्तृत मानचित्र न बनै हय। तेसर, नऽव गीत आ नऽव कविता के भेद-विवेचन सूत्र-रूप में दऽ विस्तार हेतु अपनहि पोथी के सन्दर्भ देल गेल — आत्म-निर्देशक ई प्रवृत्ति पाठक के अपूर्ण तर्क के संग छोड़के दे हय। चारिम, गीत के गीतत्व — गेयता, स्वर-विधान, आरोह-अवरोह, ध्वनि-क्रम, अन्त्यानुप्रास, मात्रा, आवृत्ति, लोक-धुन से सम्बन्ध आ सामूहिक गायन-सम्भावना — पर कोनो विचार न;’लयात्मक सम्मिश्रण’ के पद आएल, मुदा लय-विश्लेषण के कोनो उदाहरण न, जब कि गीत-विधा के प्राण गेयते में बसैत हय — सामाजिक विषय खाली से रचना गीत न बनै हय। पाँचम, पारम्परिक प्रेम, भक्ति वा प्रकृति-काव्य के कतको स्थान पर रूढ़ि मानके छोड़के देल गेल — मुदा आधुनिकता खाली विषय-परिवर्तन न; पुरान विषय के नूतन संवेदना आ रूपान्तरण भी आधुनिक होय हय। छठम, वर्तमान युग में नव माध्यम — ध्वनि-दृश्य मञ्च, अन्तर्जाल आ ई-पत्रिका — से होके रहल गीत के लोकतन्त्रीकरण के चर्च न हय; गीत-विमर्श पारम्परिक मुद्रित संकलन के सीमा में रहि गेल।
४.१५ वर्तमान धारा: सीमा
पहिल, ई व्याख्यान-पाठ हय आ ओकर श्रोता-सापेक्षता निबन्ध में बनल रहि गेल — पूर्वांचलीय भाषा-बन्धुत्व के दीर्घ भूमिका (जे भुवनेश्वर के सभा खातिर सार्थक हल) पोथी के पाठक खातिर विषयान्तर जइसन लगै हय आ ‘वर्तमान धारा’ के मूल विवेचन खातिर स्थान घटा दे हय। दोसर,’वर्तमान धारा’ के चारू विषय बहुत व्यापक हय — मानव-संकट, उपभोक्तावाद, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद आ पर्यावरण लगभग पूरा आधुनिक साहित्य के समेटि सकै हय; काव्य-आन्दोलन, पीढ़ी, रूप, भाषा आ सौन्दर्यबोध के आधार पर अधिक सूक्ष्म वर्गीकरण अपेक्षित हल, आ धारा-विभाजन के पारस्परिक अतिच्छादन (उपभोक्तावाद आ सांस्कृतिक साम्राज्यवाद कहाँ फराक?) पर विचार न। तेसर, चारू धारा के साक्ष्य-घनत्व असमान हय — मानव-संकट आ सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के धारा सुसाक्षित, मुदा उपभोक्तावाद-विरोध के धारा एक-दू उद्धरण पर; चुनल कविता के संख्या सीमित हय आ ओ पर आधारित व्यापक निष्कर्ष पूरा वर्तमान मैथिली कविता के प्रतिनिधित्व के दावा पूरा रूप से सिद्ध न करै हय। चारिम, वर्तमान धारा के सूची में नारी-स्वर आ दलित-स्वर के अनुपस्थिति खटकै हय — जे आलोचक के अपन पोथी में उपेक्षिता आ दीनाभद्री पर स्वतन्त्र अध्याय हय, हुन के वर्तमान-धारा-चित्रण में ई दुनो धारा न गनाएब आन्तरिक संगति के अभाव हय; स्त्रीवादी, दलित, आदिवासी, प्रवासी, अन्तर्जालीय आ प्रयोगधर्मी कविता के अलग वर्तमान धारा के रूप में पर्याप्त स्थान न भेटल, आ विमर्श मुख्य रूप से प्रतिष्ठित केन्द्र के कवि तक सीमित रहि गेल। पाँचम, नेपाल के मैथिली कविता के भिन्न प्रवृत्ति के जे संकेत हय (’राजतन्त्र के भय से भिन्न रहल’), ओकर एकोटा उदाहरण न — स्थापना निराधार लटकल हय। छठम, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के विवेचन कतको स्थान पर स्थानीय संस्कृति बनाम बाहरी संस्कृति के द्वैत बना दे हय — संस्कृति सदैव आदान-प्रदान, मिश्रण, ग्रहण आ प्रतिरोध से विकसित होय हय; हरेक बाहरी प्रभाव विनाशकारी न आ हरेक स्थानीय परम्परा मुक्तिकामी न।
४.१६ लोकगीत: सीमा
पहिल, ई स्वतन्त्र निबन्ध न, कार्यपत्र पर टिप्पणी हय आ एकर संरचना में से झलकै हय — आरम्भ में कार्यपत्र के पद्धति-दोष के चर्च, बीच में स्वतन्त्र लोकगीत-विमर्श, अन्त में नीति-प्रस्ताव; तीनू खण्ड के सन्धि शिथिल हय। दोसर, यूनेस्को-ढाँचा के सात संरक्षण-उपाय के जे सूची हय, से प्रायः अनूदित-प्रतिध्वनित हय — मैथिली लोकगीत के विशिष्ट स्थिति (के गाओत, कोन पीढ़ी, कोन अवसर बँचल हय, कोन मरि रहल हय)के क्षेत्र-सर्वेक्षण बिना ई उपाय-सूची यान्त्रिक अनुप्रयोग बन गेल; साथे अभिलेखागार, सङ्ग्रहालय आ वर्गीकरण आवश्यक हय, मुदा जीवित लोकगीत के स्थिर नमूना में बदलि देवे के खतरा रहै हय — लोकगीत के जीवन गायन, अवसर, देहगत प्रस्तुति, सामूहिक सहभागिता आ परिवर्तनशील पाठ में हय, खाली ध्वनि-सङ्ग्रह में न, आ सांस्थानिक संरक्षण से लोक-अभिव्यक्ति के प्रतिरोधी धार कुनहटएबा के प्रश्न भी विचारणीय हय। तेसर, लोकगीत के संगीत-पक्ष — राग, ताल, स्वर-लिपिबद्धता — पूरा तरह से अछूत;’अवस्था आ संरक्षण’ के शीर्षक में जे संरक्षण हय, से पाठ-संरक्षण तक सोचल गेल, ध्वनि-संरक्षण (स्वर-आलेखन)के चर्च न। चारिम, सङ्कलक, शोधकर्ता आ संस्था के अधिकार देल गेल हय, मुदा गायक समुदाय के स्वामित्व, सहमति, आर्थिक लाभ, नामोल्लेख आ अभिलेख पर पहुँच के प्रश्न पर्याप्त विकसित न। पाँचम, लोकगीत के भीतर के पितृसत्तात्मक स्वर — जकर मार्मिक उदाहरण (बेटी-जन्म के अवसाद, अरजल बिआनि) खुद निबन्ध में हय — के आलोचनात्मक सामना न भेल; संरक्षण के उत्साह में ई प्रश्न दबि गेल जे लोक-सम्पदा के कोन अंश संरक्ष्य हय आ कोन अंश समीक्ष्य। छठम, लोकज्ञान में औषधीय वा वैज्ञानिक तत्त्व के उपस्थिति महत्त्वपूर्ण हय, मुदा हरेक परम्परागत विश्वास के वैज्ञानिक सत्य मानके लेब रोमानीकरण होयत — अनुभवजन्य उपयोगिता आ चिकित्सकीय प्रमाण में भेद रहै हय; साथे स्त्री के हास्य, सामूहिक प्रतिरोध, गीत-निर्माण के अधिकार आ जातिगत स्त्री-अनुभव के भिन्नता पर आरो विस्तार सम्भव हल।
४.१७ उपनिवेशवाद के नऽव चालि: सीमा
पहिल, तंजानिया-प्रकरण के विस्तार जतना हय, मैथिली-स्थिति के तुलनात्मक विश्लेषण ओ अनुपात में संक्षिप्त — किस्वाहिली के जे संस्थागत आँकड़ा (बजट-प्रतिशत, नीति-तिथि) देल गेल, ओकर समकक्ष मैथिली के कोनो आँकड़ा (विद्यालय में मैथिली-माध्यम के स्थिति, निजी विद्यालय के प्रसार-संख्या) न; दृष्टान्त सुदृढ़, अनुप्रयोग पातर, आ हरेक देश के भिन्न इतिहास, भाषिक जनसंख्या, अर्थव्यवस्था आ शिक्षा-संरचना के अन्तर पर्याप्त साफ न रहने तुलनात्मक निष्कर्ष किछु स्थान पर अत्यधिक शीघ्र हय। दोसर, विश्व बैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष आ विदेशी सहायता भाषिक प्रभुत्व में भूमिका निभावै हय, तबो स्थानीय अभिजन, सरकारी अकर्मण्यता, अभिभावक के रोजगार-चिन्ता, शिक्षा के गुणवत्ता, पाठ्यपुस्तक के अभाव आ मातृभाषी संस्था के कमजोरी भी उत्तरदायी हय — बाहरी षड्यन्त्र के व्याख्या आन्तरिक उत्तरदायित्व के ओझल करि सकै हय; मिथिला के भीतर के भाषिक हीनताबोध आ आन्तरिक उपनिवेश के विखण्डन बिना बाहरी भाषिक उपनिवेशवाद से संघर्ष अधूरा रहत, ई प्रश्न पर्याप्त विकसित न भेल। तेसर, निबन्ध निदान-प्रधान हय, चिकित्सा-न्यून — भाषा-मृत्यु के संकट देखावल गेल, मुदा फिशमैनहि के प्रतिवर्तन-सिद्धान्त के (भाषा-ह्रास उनटएबा के) रचनात्मक पक्ष, जे ओही ग्रन्थ में हय, न आनल गेल; पाठक चेतल त जाय हय, मुदा दिशाहीन; साथे अंग्रेजी आ मैथिली के पूरा तरह से विरोधी मानब व्यावहारिक समाधान न — बहुभाषिक शिक्षा, मातृभाषा में आधारभूत ज्ञान, भारतीय सम्पर्कभाषा आ अन्तरराष्ट्रीय भाषा के क्रमिक शिक्षण के समन्वित रूप पर चर्चा अपेक्षित हल, कारण द्विभाषिकता स्वतः भाषा-मृत्यु न, असमान प्रतिष्ठावाली द्विभाषिकता संकट बनै हय। चारिम, व्यक्तिगत दृष्टान्त (प्राध्यापक-दम्पति, वकील साहेब, ग्रामीण महिला) नाम-सन्दर्भ-रहित हय — सत्यापन असम्भव; जे लेखक अन्यत्र अभिलेख-प्रमाण के आग्रही हथिन, से इहाँ किंवदन्ती-शैली अपना ले हथिन। पाँचम, आठम अनुसूची में समावेश (२००३)के’प्राण के संचार’ के जे आशावादी विराम-बिन्दु बनावल गेल, ओकर आलोचनात्मक परीक्षण न — अनुसूची-प्रवेश के दस वर्ष बाद प्रकाशित पोथी में ई प्रश्न स्वाभाविक हल जे संवैधानिक मान्यता से जमीनी संक्रमण-स्थिति में की बदलल; निबन्ध के अपनहि तर्क (सरकारी मान्यता पर्याप्त न, अन्तरपुस्तीय संक्रमण अनिवार्य) ई आशावाद के काटैत हय — ई अन्तिम आत्म-विरोध अनसुलझल रहि गेल। छठम, शहरी द्विभाषिक परिवार, मिश्रित विवाह, प्रवासी बालक आ नूतन माध्यम में मैथिली के सम्भावना के चर्चा कम हय।
४.१८ समग्र सीमा
अध्यायवार सीमा के अतिरिक्त किछु सीमा समग्र ग्रन्थ-स्तर के हय। पहिल, पुनरावृत्ति: निबन्ध-संग्रह के स्वाभाविक दोष इहाँ सघन हय — किरणजी के ‘आन के कानब खसब देखि कय’ वला पद्य दू अध्याय में, सीता के ‘जनक न हथिन राजा के दास’ वला प्रसंग तीन अध्याय में, भोलालाल दास-सम्बन्धी उद्धरण आ किरण-रमानाथ विवाद के बिन्दु अनेक ठाम दोहराएल हय; सम्पादन-स्तर पर सन्दर्भ-निर्देश से ई बँचि सकै हल। दोसर, अननूदित अंग्रेजी: पाद-टिप्पणी आ मूल-पाठ दुनो में अंग्रेजी उद्धरण के बाहुल्य खाली मैथिली पाठक के साक्ष्य से वञ्चित करै हय — मातृभाषा-पक्षधर ग्रन्थ के ई आन्तरिक विडम्बना हय। तेसर, आत्म-सन्दर्भ: उद्धृत स्रोत सब में लेखक के अपन सम्पादित-लिखित पोथी के अनुपात पर्याप्त हय — ई एक ओर हुन के अध्यवसाय के प्रमाण हय, दोसर ओर प्रमाण-स्वातन्त्र्य के प्रश्न उठावै हय। चारिम, पद्धति-वैषम्य: किछु अध्याय (यात्री, रमानाथ झा) सिद्धान्त-सघन हथिन त किछु (कोसी, मनमोहन झा) विवरण-प्रधान; किछु अध्याय निकट पाठ पर आधारित हय, किछु इतिहास-संशोधन के दस्तावेज, किछु विचारात्मक प्रतिवाद — ई विविधता से पोथी समृद्ध बनै हय, मुदा समान कसौटी के अनुप्रयोग के अभाव में संग्रह के आन्तरिक स्थापत्य विषम लगै हय आ एकर एकीकृत सिद्धान्त साफ न रहि पावै हय। पाँचम, मुद्रण-दोष: ठाम-ठाम अशुद्धि आ सन्दर्भ-शैली के अनेकरूपता (कहीं पूर्ण, कहीं अपूर्ण पाद-टिप्पणी) अइसन प्रमाण-आग्रही ग्रन्थ के विश्वसनीयता-मान के से मेल न खाय हय। छठम, समाधान-न्यूनता: संग्रह के अधिकांश निबन्ध प्रश्न आ निदान पर विरमि जाय हय — प्रश्नोत्थापन के लेखक खुद अभीष्ट कहने हथिन, तबो कम से कम भाषा-संकट जइसन विषय में कार्य-सूत्र के अपेक्षा अतृप्त रह जाय हय। सातम, लेखक के मैथिलीप्रेम पोथी के ऊर्जा हय, मुदा कतको स्थान पर ई प्रेम सांस्कृतिक आदर्शीकरण, प्राचीन गौरव, बाहरी शक्ति के प्रति अत्यधिक संशय वा राष्ट्रीय प्रतीक के अतिव्याख्या में परिणत होय हय। आठम, स्त्री, दलित, श्रमिक आ लोक के प्रश्न उठावल गेल हय, मुदा ई सब दृष्टि के अन्तरसम्बन्ध — जेना दलित स्त्री, बाढ़िपीड़ित भूमिहीन स्त्री, प्रवासी मजदूर, सीमावर्ती भाषाभाषी — के व्यवस्थित विवेचन कम हय; जहाँ-जहाँ आभिजात्य वर्चस्व से पूर्ण टकराएब सम्भव हल, उहाँ-उहाँ समीक्षा कहीं-कहीं अर्ध-प्रगतिशील रह जाय हय।
५. समग्र आलोचनात्मक निर्णय
५.१ पोथी के प्रमुख उपलब्धि
’हिआओल’ के सबसे बेसी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि ई हय कि ई मैथिली साहित्येतिहास के प्रचलित सरल रेखा के बाधित करै हय। ई पोथी पूछै हय — स्वतन्त्र भाषा कहे के अधिकार केकरा हय? साहित्यिक मान के बनावै हय? कोन लेखक इतिहास में प्रतिष्ठित आ कोन विस्मृत होय हथिन? लोककण्ठ के सामग्री साहित्य हय कि न? स्त्री के मौन के हास्य मानल जाए कि सामाजिक त्रास? दलित लोकनायक इतिहास के विषय काहे न? भूकम्प आ बाढ़ साहित्येतिहास के घटना काहे न? प्रवासी केन्द्र मैथिली चेतना के निर्माण में की भूमिका निभावै हय? राजनीतिक स्वतन्त्रता के बाद भाषिक पराधीनता कइसे जीवित रहै हय? ई प्रश्न के कारण पोथी खाली आलोचनात्मक निबन्ध-संग्रह न, मैथिली साहित्य के वैकल्पिक ज्ञान-मानचित्र बन जाय हय।
भारतीय काव्यशास्त्र के दृष्टि से पोथी के आलोचना रस आ अलंकार तक सीमित न — ओ ध्वनि, औचित्य, वक्रोक्ति, लोकमंगल आ साधारणीकरण के सामाजिक इतिहास से जोड़ै हय। पाश्चात्य सिद्धान्त के दृष्टि से पोथी एकसाथ उत्तर-औपनिवेशिक, नव-इतिहासवादी, मार्क्सवादी, नारीवादी, दलित, रूपवादी आ पर्यावरणीय प्रश्न उठावै हय, यद्यपि लेखक ई सब सिद्धान्त के सदैव व्यवस्थित नाम आ पद्धति से लागू न करै हथिन। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से ‘हिआओल’ राजकीय आ प्रतिष्ठित इतिहास के समानान्तर निम्नलिखित इतिहास लिखै हय — भाषिक दमन के इतिहास, उपेक्षित आलोचक आ कवि के इतिहास, अशिक्षित स्त्री के इतिहास, दलित लोकनायक के इतिहास, प्रवासी पत्र-पत्रिका के इतिहास, मौखिक कथा के इतिहास, भूकम्प आ बाढ़ के इतिहास, लोकगीत में सुरक्षित स्त्री-श्रम आ लोकज्ञान के इतिहास, आओर पीढ़ीगत भाषा-विच्छेद के इतिहास।
५.२ समग्र मूल्याङ्कन
’हिआओल’ के महत्त्व अन्तिम निर्णय देबा में न, प्रश्न के नूतन भूमि तैयार करबा में हय। ई पोथी पूर्ण साहित्येतिहास न, मुदा भावी साहित्येतिहास के खातिर अनिवार्य संकेत-पोथी हय; ई अन्तिम सिद्धान्त न, मुदा स्थापित सिद्धान्त के निश्चिन्तता के भङ्ग करयवला आलोचनात्मक हस्तक्षेप हय। एकर श्रेष्ठ रूप उहाँ देखाय हय जहाँ लेखक विस्मृत दस्तावेज खोजै हथिन, स्थापित निष्कर्ष के प्रमाण माँगै हथिन, भाषिक रूपक सूक्ष्म विश्लेषण करै हथिन, स्त्री, लोक, दलित आ विपत्तिग्रस्त जन के स्वर सुनै हथिन, आ साहित्य के जीवित सामाजिक इतिहास से जोड़ै हथिन। एकर सीमा उहाँ प्रकट होय हय जहाँ प्रतिवाद विश्लेषण पर भारी पड़ै हय, अनुमान प्रमाण के स्थान ले हय, राष्ट्रीय वा सांस्कृतिक आस्था कलात्मक परीक्षण के दबा दे हय, आ जटिल इतिहास सरल द्वैत में बदलि जाय हय। साथे, जहाँ-जहाँ आभिजात्य वर्चस्व से पूर्ण टकराएब सम्भव हल, उहाँ-उहाँ समीक्षा अर्ध-प्रगतिशील रह जाय हय — कौलीन्य, पाँजि-प्रथा आ राज्य-प्रायोजित संस्थान के विखण्डन जतना तीक्ष्णता से अपेक्षित हल, ओसे किछु न्यून भेल।
६. उपसंहार
समग्रतः ‘हिआओल’ मैथिली आलोचना के ओ दुर्लभ कोटि के ग्रन्थ हय कि श्रद्धा आ संशय — दुनो के प्रमाण के कसौटी पर कसैत हय। भारतीय काव्यशास्त्र के दृष्टि से एकर मूल कसौटी औचित्य हय — शब्द के औचित्य (यात्री-अध्याय), पाठक-दृष्टि के औचित्य (कन्यादान), इतिहास-कथन के औचित्य (कथा के विकास); ध्वनि-सिद्धान्त के व्यवहार ‘शरदागम’ आ’पछबा’ के पाठ में, आ रस-चेतना करुण-प्रधान अध्याय सब में उपस्थित हय, यद्यपि रस-मीमांसा एकर दुर्बल पक्ष रहल। पाश्चात्य कसौटी पर ई उत्तर-औपनिवेशिक आ समाजभाषावैज्ञानिक विमर्श के मैथिली में अग्रणी प्रयोग हय, जकर सीमा सिद्धान्त के असमान आ कहीं-कहीं यान्त्रिक अनुप्रयोग में हय। आ विदेह समान्तर इतिहास के दृष्टि से एकर महत्त्व सर्वोपरि हय — अनालोचित कवि, उपेक्षिता नायिका, दलित महानायक, प्रवासी सम्पादक, लोकगीत के अज्ञात गायिका: प्रतिष्ठान जकरा-जकरा हाशिया पर रखल के, रमणजी तकरा-तकरा अभिलेख के बलेँ केन्द्र में अनलनि।
मुदा एहू दृष्टि से एक अन्तिम सीमा-रेखा खीचब न्यायोचित होयत: समानान्तर धारा के पूर्ण पद्धति उहाँ पहुँचैत हय जहाँ हाशिया के स्वर अपने बाजए — ‘हिआओल’मे हाशिया खातिर बाजल गेल हय, हाशिया के बजाओल कम गेल हय। ई अपूर्णता आगामी अनुसन्धान के निमन्त्रण हय, आ इहे निमन्त्रण-धर्मिता — विचारकलोकनि विमर्श के हेतु उपस्थित होथिन — ई पोथी के स्थायी मूल्य हय। मैथिली आलोचना के इतिहास में’हिआओल’ प्रत्यालोचना के प्रतिमान-ग्रन्थ आ समानान्तर इतिहास-लेखन के पूर्वपीठिका — दुनो रूप में स्मरणीय रहत।
डा. रमानन्द झा ‘रमण’ के’हिआओल’ (२०१२) मैथिली साहित्यिक आलोचना के क्षेत्र में एकगो सराहनीय आ साहसिक डेग हय, जेमें कतको स्थापित स्थापना के गम्भीर बौद्धिक चुनौती देल गेल हय। रमणजी के भाषा-प्रेम आ मैथिली के ठेठ शब्द-संस्कृति के प्रति अनुराग पूरा तरह से स्पृहणीय हय। ई सैद्धान्तिक सीमा के बावजूद, ‘हिआओल’ मैथिली समीक्षाशास्त्र के सुदीर्घ पथ पर एकगो बहुत महत्त्वपूर्ण मील के पत्थर हय, जे भावी पीढ़ी के स्थापित आभिजात्य इतिहास-लेखन के विरुद्ध “हिआओ” (साहस) से लड़े के दिशा-निर्देश अवश्य करै हय। ई पोथी साहित्य के मुख्य द्वार के अतिरिक्त पछुआरि, आँगन, खेत, नदी, लोककण्ठ, स्त्री के मौन, मुसहर के गाथा, प्रवासी के पत्रिका आ भूकम्प से ढहल घर के भीतर से इतिहास देखे के दृष्टि दे हय। ई अर्थ में ई विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि के एक सशक्त आलोचनात्मक आधारग्रन्थ हय।
सन्दर्भ-सूची
डा. रमानन्द झा ‘रमण’, हिआओल (मैथिली आलोचना-संग्रह), अखियासल प्रकाशन, लालगंज, सरिसब-पाही, मधुबनी, २०१२।
डा. रमानन्द झा ‘रमण’, अखियासल (आलोचना-संग्रह)।
डा. रमानन्द झा ‘रमण’, बेसाहल (आलोचना-संग्रह)।
डा. रमानन्द झा ‘रमण’, भजारल (आलोचना-संग्रह)।
जी. ए. ग्रियर्सन, An Introduction to the Maithili Language of North Bihar, कलकत्ता, १८८१।
जी. ए. ग्रियर्सन, Maithili Chrestomathy आ दीनाभद्रीसम्बन्धी संकलन, १८८५।
हरिमोहन झा, कन्यादान (मैथिली उपन्यास)।
PART 27, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/new_page_27.htm।
PART 28, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/new_page_28.htm।
PART 82, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/new_page_82.htm।
A Parallel History of Mithila & Maithili Literature, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/new_page_90.htm।
नूतन अंक सम्पादकीय, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/aboutme.htm।
“रमानन्द झा ‘रमण’”, मैथिली लेखक संघ, maithililekhaksangh.blogspot.com/2010/07/blog-post_677.html।
२.२७.डा धनाकर ठाकुर- चेतना समिति क द्रोणाचार्य रमणजी
डा धनाकर ठाकुर
चेतना समितिक द्रोणाचार्य रमणजी
रमणजी पर पोथी निकलए आओर हम नहि लिखी से सम्भव नहि आओर हुनक समग्र मूल्यांकन सन झंझटटिया काज केओ करत नहि किन्तु रमणजी आधुनिक मैधिली काल जकरा हम 1973 सँ जनैत छी जहिया हमरा द्वारा वायरस पर मैथिली भाषामे उत्कृष्ट लेखक सृजन भए गेल संभवतः ओ रमणजीक साहित्यिक काल कहाओत जाहिमे ओ मैथिलीक राजदरबारी चेतना समितिक दरबारमे गुरुसम्पादकीय रोलमे रहलाह निर्विवाद, मधुर, सौम्य मैथिलीक बुद्धिमत्ताक प्रतीक ओ प्रस्तुतकर्ता तेँ जिनकर द्रोणप्रभामंडलीमे अनेक चेला चीनी भए गेलाह किन्तु श्वाँसहुँमे मैथिली बाँचनिहार गुरु गुड़हि रहि गेलाह बिना साहित्य अकादमी पुरस्कार पौने लगातार मैथिली लिखैत नगर गाम डगर-डगर सगर रातिमे मैथिलीक दीपक जरबैत जँ आधुनिक मैथिली आइ साहित्यिक रूपमे जे-जेना अछि ओहिमे कोनहुँ मैथिली प्राध्यापकक अपेक्षा गुरूतर काज केने छथि रिजर्व बैंक कर्मचारी रमणजी जे एतेक रिजर्व रहैत छथि कि केओ हिनका बुझिए नहि पाएल जे मैथिली लेल ओ की-की रिजर्वक रखने छथि। हिनका गुरु द्रोणाचार्य जिनक अधिक पटनिया शिष्य यदि कौरव सम नहि कही त आओर क्वचित् पांडव सम तथापि जहिया कहिओ मैथिली राज्यसभाक विवरण लिखल जैत मैथिलीक लालू दुःशासनीय चीरहरण भेल कोनहुँ प्रतिरोध नहि, गुरु द्रोणाचार्य आँखि मुनि रहबाक अतिरिक्त की करिताह, मिथिला राज्यक बात तऽ चेतना समिति लेल सांढ़क लाल कपड़ा यद्यपि ओहि भवनमे डा जयकान्त मिश्रकेँ संक्षरकमे मिथिला राज्य संघर्ष समितिक स्थापना हमरा द्वारा 8.1.1995 क भेल आओर हम प्रायः समितिक द्वारा एहि वा जाहि कारणसँ बारल रहल होइ रमणजीक हृदयमे ओतेक जे कोनहुँ अमैथिलहुँ छात्र भोरमे परीक्षा देब जाइत बाथरूम जेबाक आज्ञा मंगलक आओर बादमे हमर नाम लऽ लेलक त स्नान-जलपान करा अज्ञातहुँकेँ पठौनिहार उदार व्यक्तित्व जिनक हुनकरहि सन लोकक चलते ने आइ मैथिली वा काल्हि मिथिला राज्य होएत जाहि लेल बिना संग चेतना समितिक प्रतिबद्धता वांछित आओर एहि एकपंक्तीय लेखन एहि रम्य, सुरम्य मैथिली लेखक, सम्पादक, समालोचक, संगठक रमणजीकँ जिनक बिना मैथिलीक आधुनिक अर्धशताब्दीक कोनहुँ आकलन अपूर्णहि मानल जैत, कोनहुँ पुरस्कारसँ ऊपर वस्तु भए गेलाह जिनक नाम पर आइ ने काल्हि यैह समितिक पुरस्कार हैत भनहि ओ या हम ओ देखए रहि वा नहि।
२.२८. आचार्य रामानंद मंडल डॉ रमानंद झा रमण: व्यक्तित्व आ कृतित्व
आचार्य रामानंद मंडल
डॉ रमानंद झा रमण: व्यक्तित्व आ कृतित्व
चर्चित आलोचक डा रमानंद झा रमण के जन्म 02जनवरी 1949 के मधुवनी जिलांतर्गत लालगंज मे भेल हय। पिता स्वर्गीय परमानंद झा के सुपुत्र एम ए (हिंदी) आ मैथिली में पीएचडी कैले छतन। बैंक आफ इंडिया के अधिकारी पद स सेवा निवृत्त छतन। मितभाषी आ मधुरभाषी वरीय आलोचक के साहित्यिक यात्रा जुलाई 1966 मे विचार एवं चरित्र निबन्ध लेखन से भेलय।हुनकर रचना सचित्र बालमासिक मे प्रकाशित भेल हय।हुनकर प्रकाशित आलोचना पोथी निम्नलिखित हय।
१. नवीन मैथिली कविता।
२. मैथिली नव कविता।
३. मैथिली साहित्य ओ राजनीति।
४. अखियासल।
५. बेसाहल।
६. हिआओल।
७. लक्ष्मीपति सिंह,विनिबंध।
८. चितिर -बितिर।
९. बेरायल।
१०. अनुसंधाश-प्रतिमान।
११. बीज भाषण
१२. विवर्त।
डा रमण द्वारा संपादित पोथी निम्नांकित हय।
१. मैथिली आरम्भिक कथा।
२. श्यामानंद रचनावली।
३.निर्दयीसासु एवं पुनर्विवाह।
४.चेतनाथ झा कृत श्री जगन्नाथपुरी यात्रा।
५.तेजनाथ झा कृति सुरराज विजयनाटक।
६.रासबिहारी लाल दास कृत सुमति।
७.जीवछ मिश्र कृत रामेश्वर।
८.पंडित गोविंद झा: अर्चा ओ चर्चा।
९.भेंटघाट पंडित।
१०.रुचय त स्त्री ने त फूसि।
११. पुण्यानंद झा कृत मिथिला दर्पण।
१२.उग्रानंद कृत शिवगंगा, कथा संग्रह।
१३.यदुवर -रचनावली।
१४.मैथिली उपन्यास मे चित्रित समाज, चेतना समिति।
१५.विद्यापति विवरण।
१६.कविश्वर चेतना। चेतना समिति।
१७.मैथिलीक आरम्भिक यात्रा साहित्य।
१८.ग्रिअर्सनक गीत दीनाभद्री ओ गीत नेवारक अनुवाद पं गोविंद झा।
१९.ग्रिअर्सनक मैथिली व्याकरण अनुवाद पं गोविंद झा।
२०.लक्ष्मीपति सिंह रचना संचयन।
२१.चंद्रग्रहण -कांचीनाथ झा किरण।
२२.मिथिलाक विदुषी महिला -अरुंधति देवी।
२३.अगिलेसुआ कथा संग्रह -हरिनंदन ठाकुर सरोज।
२४.मणिपद्म -चेतना समिति।
२५.मैथिली लोक साहित्य एवं लोक संस्कृति -चेतना समिति।
२६.मैथिली कथा नेपाल , कथा संग्रह आफंत।
२७.लिली रे कृत कथा संग्रह -परदा.
२८.लिली रे कृत कथा संग्रह -लाली गुंरास।
२९.लिली रे कृत कथा संग्रह -विशाखन।
३०. लिली रे कृत दीर्घ कथा -नीकलोक।
३१.लिली रे कृत उपन्यास -पटाक्षेप -साहित्यिकी।
३२.लिली रे कृत उपन्यास उपसंहार।
३३.लिली रे कृत आत्मकथा -समय के पड़ैत।
३४. जीवछ मिश्रक रचनावली।
३५.आब की कविता करब हम -महावीर झा वीर।
३६.मैथिली कथा: भाषा एवं शिल्प।
३७.तेजनाथ रचनावली।
३८.विद्यापति -चेतना समिति।
३९.महाकवि लालदास:समय ओ रचना। चेतना समिति।
४०. मधुपि, चेतना समिति।
४१.महाकवि लालदास रचनावली खंड-१.
४२.हरिश्चंद्रनृत्यं -मल्लकालिन मैथिली नाटक।
४३. आधुनिक मैथिली नाट्य संचयन -साहित्य अकादमी।
४४.मैथिली कथाक धाप।
४५.सरोज रचनावली -मैथिली अकादमी।
डा रमण झा द्वारा अनुवादित पोथी निम्नलिखित हय।
१.मौलियरक दू नाटक -साहित्य अकादमी।
२.छओ बिगहा आठ कट्ठा।
३.सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा।
४.टाकाक गाछ, भारतीय रिजर्व बैंक, पटना।
५.लखपति जी लुटेलाह, भारतीय रिजर्व बैंक, पटना।
डा रमण द्वारा संपादित पत्र पत्रिका -
१.कोषाक्षर -भारतीय रिजर्व बैंक ।
२.प्रयोजन -मैथिली मासिक पटना।
३. कथा -दिशा मैथिली कथा मासिक संपादक मंडल सदस्य।
४. घर -बाहर मैथिली त्रैमासिक, चेतना समिति।
डा रमानंद झा रमण निम्नलिखित सम्मान से सम्मानित हतन।
१.जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन पुरस्कार -१९९५.
२.भाषा भारती सम्मान -२००४-२००५.
३.किरण पुरस्कार -२०११.
४.साहित्यिकी सम्मान।
डॉ रमानंद झा रमण के काज से मैथिली साहित्य लाभान्वित हय। परंच हासिया के मैथिली साहित्य डा झा के आलोचनात्मक दृष्टि से ओझल लगैत हय।डा झा आलोचना पोथी विवर्त मे दुसाध राजा सलहेस के जाति आ राजसत्ता पर प्रश्न ठाढ करैत छतन।न त राजा सलहेस दुसाध रहलन आ न राजा रहलन। केवल वो नाम के राजा सलहेस रहलन।डा झा एहन मत प्रकट क के मतिभ्रम तोडैत छतन कि नव मतिभ्रम पैदा करैत छतन।इ त भविष्य के गर्भ मे हय।
वर्तमान में डा झा कंकड़बाग पटना में रहैत चेतना समिति पटना से प्रकाशित घर -बाहर के संपादन करैत हतन। साहित्य अकादमी,साहित्यिकी आ चेतना समिति से प्राप्त साहित्यिक काज संपादक आ अनुवादक के रूप मे निष्पादन करैत हतन।वरीय आलोचक डा झा मितभाषी, मधुरभाषी आ गंभीर व्यक्तित्व के रुप मे जानल जायत छतन।हिनकर व्यक्तित्व आ कृतित्व मिथिला मैथिली के साहित्यिक इतिहास में स्वर्णाकित रहत।
२.२९. आशीष अनचिन्हार- पोथी संग्रहकर्ता इतिहासकार होथि से जरूरी नहि
आशीष अनचिन्हार
(मैथिली गजल विशेषज्ञ, मैथिली वेब पत्रकारिता विशेषज्ञ, ब्लॉगर, शोधकर्ता, आलोचक, संपादक)
पोथी संग्रहकर्ता इतिहासकार होथि से जरूरी नहि
1
इतिहास लिखबाक लेल पोथीक संग्रह करब, ओकर भंडार करब आवश्यक नहि छै। ई काज सभ कोनो पुस्तकप्रेमी, पुस्कालयमे काज करैत कर्मचारी सेहो करैत अछि, मुदा ओकरा सभकेँ इतिहासकार ने मानल जाइत छै आ ने कहल जाइत छै। इतिहासकार लेल पहिल आ अंतिम वस्तु छै इतिहासबोध भेनाइ। इतिहासबोध रहलाक बाद पोथीक भंडार अपने आप भऽ जाइत छै, सोर्स आ तथ्य अपने आप आबि जाइत छै। ई अलग बात जे चेला-चपाटीसँ भरल समाजकेँ पोथिए संग्रहकर्ताकेँ इतिहासकारक रूपमे प्रचार कएल जाइत छै। मैथिलीक मुख्यधारामे एखन धरि इतिहासबोध बला इतिहास कम्मे लिखाएल छै, नाममात्र। एकमात्र जयकांत मिश्रकेँ इतिहासकार कहि सकैत छी। कारण हुनका लग इतिहासबोध छलनि। एकर अतिरिक्त मुख्यधाराक शेष इतिहास तात्कालिक लोभ-लाभ, असहमति-आलोचनासँ आहत भऽ इग्नोर करब, संबंधवाद आदिकेँ ध्यानमे राखि लिखल गेल अछि आ एखनो लिखाइत अछि।
2
रचना प्रकाशित करबाक बहुत रास साधन-सामग्री होइत छै जे समय-समयपर बदलैत रहैत छै। आ रचना माने कोनो विधाक। वर्तमान समयमे अधिकांश रचना पत्रिकामे छपैत छै आ तकर बाद पोथी रूपमे। किछु रचना सीधे पोथी रूपमे सेहो छपैत अछि। आब एहि ठाम रचनासँ हटि कने विधापर चली, कारण अंततः रचनाकेँ कोनो ने कोनो विधामे विभाजित कएले टा जाइत छै। आब एहिठाम प्रश्न उठैत अछि जे कोनो विधाक शुरूआत कहियासँ मानल जेबाक चाही। तँ सोझ ओ सरल उत्तर छै जे जहिया ओकर पहिल प्रकाशन भेलै से चाहे ओ पत्रिकामे प्रकाशित भेल हो वा कि पोथी रूपमे। जे सुयोग्य आ वास्तविक इतिहासकार छथि से पहिल प्रकाशनेसँ ओकरा मूल्यांकन करैत छथि आ बादमे जे एलै तकरा ओ विस्तारक रूपमे मानै छथि। मुदा जँ कोनो इतिहासकार आन-आन विधा लेल, आन-आन रचनाकार लेल एक नियम राखथि आ जिनकासँ वैचारिक असहमति छनि तिनका लेल दोसर नियम राखथि तखन दोषयुक्त इतिहास लिखैत छथि।
3
मैथिली साहित्यमे हाइकू बहुत पहिनेसँ लिखाइत छल मुदा अन्य जापानी विधा जेना टंका, शेनर्यू, हैबून, हैगा, वाका आदि लगभग 16-17 वर्ष पहिने गजेन्द्र ठाकुर द्वारा मैथिलीमे आनल गेल। आ से मात्र ओ अपने नहि, अपना संग बहुतोकेँ ई विधा सभ सिखेलाह आ एहि विधा सभमे बहुत रचनाकार ओ रचना सभ ख्याति पेलाह।
2009 मे प्रकाशित कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक नामक पोथीमे 'मैथिली हाइकू हैकू क्षणिका' नामक आलेखमे हाइकूक अतिरिक्त अन्य जापानी विधा जेना टंका, शेनर्यू, हैबून, हैगा, वाका आदिपर नीक चर्चा केलथि। गजेन्द्र ठाकुरक ई पोथी सार्वजनिक रूपें इंटरनेटपर तऽ उपलब्ध छलैहे संगहि संग एकर प्रिंट रूप सेहो सामान्य पाठकससँ लऽ कऽ विभिन्न आलोचकगण गेलै। एकर बाद गजेन्द्र ठाकुर विदेहक फेसबुक ग्रुपपर टंका, शेनर्यू, हैबून, हैगा, वाका सिखाबऽ लगलखिन आ लगभग 2012 धरि बहुत रास रचनाकार एहि विधामे एलाह एवं ओ सभ अपन-अपनमे सेहो ओकरा प्रकाशित करबेलनि जाहिमे उमेश मंडल, शिव कुमार झा 'टिल्लू' मुन्नाजी, रामविलास साहू, चंदन कुमार झा, सुनील कुमार झा (आब सुनील कुमार भानू) आदिक नाम अछि। बादमे फसबुक ग्रुपक बहुत रास पोस्टकेँ मैथिली हाइकू नामक ब्लागपर सेहो राखि देल गेलै सुविधा लेल।
चंदन कुमार झाक हाइकू संग्रह ‘सम्भावना’ अछि जाहिमे चंदन झा गजेन्द्र ठाकुर द्वारा पल्लवित एहि सभ विधाक उल्लेख अछि, सौभाग्यसँ चंदन झाक एहि पोथीक भूमिका रमण जी लिखने छथि। मुदा..........
4
किछु वर्ष पूर्व प्रकाशित धर्मेन्द्र विह्वलक पोथी 'व्योमक ओहिपार’ केर भूमिका डा. रमानंद झा रमण एना लिखने छथि जेना कि धर्मेन्द्र विह्वल टंका, शेनर्यू, हैबून, हैगा, वाका एहि विधाकेँ मैथिलीमे अनने होथि। सभसँ बड़का मजाक तऽ ई भेल छै जे डा. रमानंद झा 'रमण' भूमिकामे टंका आदिक नियम सेहो बखानैत छथि सेहो बिना गजेन्द्र ठाकुरक रेफरेंस देने। हुनकर ई भूमिका हुनके फेसबुपर हम पढ़लहुँ जकरा अहाँ सभ एहि लिंकपर पढ़ि सकैत छी- विह्वलक जापानी पञ्चपदी : टांका।
धर्मेन्द्र विह्वल ओ धीरेन्द्र प्रेमर्षि दूनू भाए विदेहक फेसबुकसँ लऽ कऽ विदेहक साइट धरि जुड़ल छथि से के ने जनै छै। आ ई सभ लेल सार्वजनिक छै बिना रोक-टोककेँ।
धर्मेन्द्र विह्वलक पोथी प्रकाशित भेलाक बाद दिलीप कुमार झाक एक पोस्टपर हम अपन आपत्ति दर्ज केने रही जकर उत्तर दैत धर्मेन्द्र विह्वल साफ केलथि जे हुनकासँ पहिने मैथिलीमे टंका, शेनर्यू, हैबून, हैगा, वाका रहै मुदा एकछाहा टंकाक ई पहिल पोथी अछि। ताहिपर हम हुनका उत्तर देने रहियनि जे एकछाहा पोथीक प्रकाशन इतिहासमे बहुत बादक घटना भेलै, अहाँक पोथीमे तथ्यकेँ तोड़ल गेल अछि, ताहिपर धर्मेन्द्र विह्वल चुप रहि गेलाह। धर्मेन्द्र विह्वल अपन अंतिम कमेंट एना लिखलनि जाहिसँ भारत-नेपालक राजनीतिक द्वंद हो, एकर बाद हम कमेंट नहि केलियनि।
हमर टिप्पणी आ धर्मेन्द्र विह्वलक टिप्पणीक स्कीन शाट पाठक अही आलेखक अंतमे पढ़ि सकै छथि।
5
कथित रूपसँ एकछाहा टंकाक पोथी लीखऽ बला जखन मानि रहल छथि जे ई विधा सभ हुनकासँ पहिने छै तऽ ओकर नाम लेबासँ परहेज किए कऽ रहल छथि। टंका आदिक नियम मैथिलीमे गजेन्द्र ठाकुरक देन छनि तऽ ओकर रेफरेंस देबाक बेगरता किएक ने भेलनि।
अइ पोथीक भूमिका लेखकक रूपमे डा. रमानंद झा 'रमण' इतिहासबोध धरि बिसरि गेल छथि। हुनका गजेन्द्र ठाकुरपर तामस छनि तँइ गजेन्द्र ठाकुरक नाम मिटा देबाक सभसँ सरल उपाय इएह बुझेलनि जे गजेन्द्र ठाकुरक नाम नहि ली मुदा चोरा-नुका कऽ गजेन्द्रे ठाकुरक आलेखकेँ अपना नामसँ कऽ ली। से बेस केने छथि रमानंद झा 'रमण' जी।
यदि रमानंद झा 'रमण', धर्मेन्द्र विह्वल वा किनको ई बुझाइत छनि जे गजेन्द्र ठाकुरसँ पहिने मैथिलीमे टंका, शेनर्यू, हैबून, हैगा, वाका छलै, ओकर नियमपर चर्चा भेल छै तऽ सेहो सामने आनथु। इतिहासशुद्धि करथु। हमहूँ हुनकर मेहनति लेल सलाम करबनि।
6
जखन आधुनिक कालमे सभ तथ्य सार्वजनिक रहितो मुख्यधाराक आलोचक-इतिहासकार सभ बैमानी कऽ लैत छथि, केकरो हिस्साक मेहनति अपना नामे वा अपन प्रियक नामे कऽ दैत छथि तखन ओहि कालखंड सभहक बात सोचियौ जहिया ई साधन सभ नै रहै, तहिया ई सभ कतेक बैमानी केने हेथिन? तहिया कतेक उत्फाल मचेने हेथिन ई सभ?
तँइ हम मैथिलीक मुख्यधारामे लिखल अधिकांश इतिहासपर विश्वास नै करैत छी।
हमरा मुख्यधाराक कोनो लेखक, कोनो इतिहासकारसँ प्रश्न नहि अछि। हमर प्रश्न मैथिलीक सामान्य पाठकसँ अछि जे दुर्भावनासँ भरल मैथिलीक मुख्यधाराकेँ स्वस्थ आ हितकारी बनेबाक लेल कोन-कोन आ की-की उपाय कएल जेबाक चाही?
परिशिष्ट-
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।