PREETI × GAJENDRATHE VIDEHA LITERARY ATLAS
गजेन्द्र ठाकुर

सम्पूर्ण पोथी मार्गदर्शिका · 2026 संशोधित संस्करण

स्वप्न मे
मिज्झर होइत

पद्य संग्रह · सम्पूर्ण पोथी मार्गदर्शिका · गजेन्द्र ठाकुर

स्वप्न आ जागरणक मिज्झर देहरीसँ आरम्भ होइत ई विस्तृत पद्य-संग्रह काल, आत्मा, भाषा, लोकजीवन, समाज, ज्ञान, मुक्ति, इतिहास आ न्यायक प्रश्नसभक बीच चलैत अछि। घर, खेत, नदी, करघा, लोकधुन आ दैनन्दिन अनुभव दार्शनिक विचारक ठोस आधार बनैत छथि। पछिला खण्डसभ भाषा आ अनेक दार्शनिक परम्पराक असहमतिकेँ तुलना करैत छथि; अनुवाद-अनुलग्नक ‘त्वञ्चाहञ्च’ आ ‘असञ्जाति मन’क दीर्घ गीत-प्रबन्ध, तथा ‘Second Person Singular’ आमुखक मैथिली अनुवादसँ पोथीकेँ आगाँ बढ़बैत अछि।

447स्रोत-रेकर्ड
10मुख्य विभाग
11विस्तृत पठन
2दीर्घ अनुवाद-चक्र

स्रोत-पद्धति

सार, मूल पाठक बदला नहि

ई मार्गदर्शिका उपयोगकर्ताक देल 2026 संशोधित मैथिली संस्करणक पूर्ण स्रोत-पाठपर आधारित अछि। 447 रेकर्ड पोथीक अपन क्रम, विभाग, शीर्षक आ पृष्ठ-सूचकांक अनुसार राखल गेल अछि। विभाग-शीर्षककेँ कविता बना कऽ विस्तार नहि कएल गेल; प्रत्येक पद्य/अनुलग्नकक सार ओकर अपन स्रोत-खण्ड पढ़ि लिखल गेल अछि। खोज, विषय-चिन्ह आ विस्तृत पठन मूल रचनाक बदला नहि, मूल पाठ दिस घुरबाक सहायक बाट मात्र थिक।

विस्तृत पठन

प्रश्नसभक संग कने आरो ठहरू

विस्तृत पठन 01

तर्कसँ पहिने: मोन पड़ैत बड़द, खाली पिंजरा

प्रारम्भिक पद्य पाठककेँ दर्शनक कठिन शब्दावलीसँ पहिने स्मृति आ अनिश्चितताक अनुभवमे आनैत अछि। ‘अनचिन्हार आखर’मे हर, बड़द, साँझ आ स्वप्न एक संग अछि; स्वप्नमे स्पष्ट बुझायल बात जागलापर ठीक-ठीक कहल नहि जाइत। एतय प्रश्न केवल स्वप्न सत्य छल कि मिथ्या से नहि, बल्कि जागल स्मृतियो कतेक स्थिर अछि से अछि। खेतक साधारण दृश्य स्मरणक भरोसापर पहिल कसौटी बनैत अछि।

‘मृत्यु गीत (लोकगीत)’ पिंजरासँ उड़ैत सुग्गाक छविसँ देह, प्राण, स्नेह आ अस्थायित्वकेँ लोकस्वर दैत अछि। एहि गीतकेँ संग्रहमे राखल गेल अछि, मुदा लोकगीतक स्वरूप स्पष्ट रहबाक चाही; संग्रहमे उपस्थिति व्यक्तिगत रचनाकारित्वक प्रमाण नहि। दुनू आरम्भिक रचना मिलि प्रश्न खोलैत अछि—स्मृति ढीला पड़ला वा देह छूटला पाछाँ की बचैत अछि: नेह, स्मरण, कि कथा फेर कहबाक चाह?

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विस्तृत पठन 02

कालक पार देखब, मुदा संसारक दुःख नहि बिसरब

खण्ड १ काल, अनन्त, मुक्ति आ सत्यक प्रश्न उठबैत अछि, मुदा इतिहास आ देहधारी जीवनकेँ निरर्थक घोषित नहि करैत। घड़ी, परिवर्तन, मृत्यु, प्रकाश आ अनन्तक छविसँ अनुभवक सीमा जाँचल जाइत अछि; संगहि भूख, दुःख, अन्याय आ मानवीय कर्तव्य फेर धरतीपर घुरा आनैत अछि। कालातीत मुक्तिक कल्पना घायल मनुष्यक समयबद्ध पीड़ाकेँ मिटा नहि दैत।

‘प्रश्नक देहरीसँ मुक्तिक आकाश’ जेकाँ रचना प्रश्न करबाक अनुशासनपर जोर दैत अछि—विरोधी मतकेँ ओकर सबल रूपमे बुझब, शब्दक इतिहास देखब आ ज्ञानकेँ आचरणसँ जोड़ब। अर्थ आ कामक भौतिक आधारकेँ तुच्छ मानि मुक्ति खोजब एहि खण्डक पठनकेँ अधूरा करैत। एहि लेल खण्डक मुख्य तनाव अछि: आसक्ति ढीला करू, मुदा संसारक जिम्मेदारीसँ विमुख नहि होउ।

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विस्तृत पठन 03

दैनन्दिन जीवनक पाँतिमे स्वप्न आ विचार

खण्ड २ मे स्वप्न एकाकी दार्शनिक समस्या नहि रहैत; ओ घर, माय-बेटा, रोग, यात्रा, व्यवस्था आ आशंकाक बीच बसैत अछि। ‘नजरि लागि जाइ छै’मे मायक डर आ संरक्षणक कर्म प्रेमसँ अलग नहि कएल जा सकैत। रीतिक प्रभाव सिद्ध वा असिद्ध करब एहि दृश्यक मुख्य काज नहि; मुख्य बात अछि—कियो प्रिय व्यक्तिक रक्षा लेल किछु करैत अछि, कारण अनिश्चितता घरक भीतर रहैत अछि।

रोग, उपचार, सार्वजनिक व्यवस्था, भाग्य आ नव व्यवस्थाक प्रसंग विचारकेँ शरीर आ संस्थाक कसौटीपर रखैत अछि। ज्ञानक दावा तखन कठिन होइत अछि जखन मनुष्य प्रतीक्षा, पीड़ा, साधनक अभाव वा आनक सहयोगपर निर्भर अछि। एहि खण्डमे प्रश्नक गम्भीरता दैनन्दिन विडम्बना सँ कम नहि, बल्कि अधिक ठोस होइत अछि।

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विस्तृत पठन 04

घर जे ज्ञानक सीमा सिखबैत अछि

ओस, देहरी, अनचिन्ह घाट, चिरै आ मेघक पएर खण्ड ३ मे ज्ञानक प्रश्नकेँ घरेलू आ निकट रूप दैत अछि। जे देखल वा अनुभव कएल गेल, ओकरा अपन अधिकारक वस्तु मानि लेब उचित नहि। परिचित घर आत्मीयता दैत अछि, मुदा ओ पूरा यथार्थक मापदण्ड नहि बनि सकैत।

पत्रसँ आयल समाचार, आँखिसँ देखल दृश्य, जलमे प्रतिबिम्ब, बादलक चिन्ह आ आशा—सभ एके प्रकारक प्रमाण नहि। एहि भेदकेँ राखलासँ प्रेम वा सौन्दर्य घटैत नहि; उलटे शब्द कोना वर्णन, पुकार, चेतावनी वा इच्छा बनैत अछि से स्पष्ट होइत अछि। घर एतय ज्ञानक छोट पाठशाला बनैत अछि, जतय नेह आ सावधानी संग रहैत छथि।

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विस्तृत पठन 05

परम्पराकेँ हवा, श्रम आ बदलबाक जगह चाही

बीआ आ करघा खण्ड ४ मे परम्पराक व्यावहारिक रूपक बनैत अछि। दादीक बीआकेँ केवल बन्द पात्रमे सुरक्षित राखलासँ भविष्य नहि बनत; ओकरा माटि, हवा, पानी, परीक्षण आ खेती चाही। करघामे नव फूल पुरान बुनावटकेँ नष्ट नहि करैत, बल्कि जीवित हाथक कामसँ ओकरा आगाँ बढ़बैत अछि। निरन्तरता निष्क्रिय संरक्षण नहि, काज अछि।

‘दू बाटक बीच’ आ ‘रोटीक पाछाँक भूख’ भौतिक आवश्यकता आ भीतरक अर्थ-खोजकेँ एक-दोसरा विरुद्ध ठाढ़ नहि करैत। रोटी जरूरी अछि; मुदा रोटी मात्र मनुष्यक सभ प्रश्न समाप्त नहि करैत। अनेक लहरि एकहि जलमे रहि सकैत अछि, खाली पीढ़ी अनुपस्थितिक अर्थ देखाबैत अछि—अर्थात् साझा जगत भिन्न दृष्टिक लेल जगह राखि सकैत अछि, जँ भिन्नताकेँ मनमाना सत्य बनाओल नहि जाए।

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विस्तृत पठन 06

भाषाकेँ नव काज करबाक खेत दिअ

खण्ड ५ मे मातृभाषा केवल स्मृतिक घर नहि, कठिन विचारक कार्यक्षेत्र बनबाक माँग करैत अछि। विज्ञान, कानून, दर्शन, नव अनुभव आ अनुवाद लेल शब्द गढ़ब, उधार लिअ, पुरान शब्द फेर जागृत करू—ई सभ भाषिक श्रमक अंश अछि। मैथिलीकेँ सम्मानित राखि केवल औपचारिक गौरवमे सीमित करब भविष्य नहि बनबैत।

‘मैथिलीक नव खेत’ आ ‘विचार जखन अपन बोली पबैत अछि’ भाषा-स्वराजकेँ वास्तविक बौद्धिक कामसँ जोड़ैत अछि। पुरान अक्षरमे नव प्रश्न उठेनाइ परम्पराक अपमान नहि; जड़िसँ क्षितिज धरि बढ़बाक शर्त अछि। परिसरक मूल्य परीक्षा मात्रमे नहि, नव प्रश्न उत्पन्न करबाक क्षमतामे देखल जाइत अछि।

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विस्तृत पठन 07

परम्पराकेँ अपन बनाओल चित्रसँ असहमति करऽ दिअ

खण्ड ६ ‘भारतीय दर्शन’केँ एक स्थिर, केवल आध्यात्मिक, केवल मुक्तिमुखी चित्रमे बन्द करबाक विरोध करैत अछि। जखन पहिने सँ एक सार तय कऽ देल जाए, तखन परम्पराक भीतरक असहमति, ज्ञानमीमांसा, भाषा, पदार्थ, तर्क, समाज आ इतिहासक प्रश्न ओझराइ सकैत अछि। पद्य पाठककेँ तैयार चित्र छोड़ि वास्तविक प्रश्नसभक बहुलता दिस घुरबैत अछि।

मुक्ति महत्त्वपूर्ण मानवीय प्रयोजन भऽ सकैत अछि, मुदा सभ ज्ञानक एकमात्र हेतु नहि। श्रुति, सूत्र, भाष्य आ ऐतिहासिक स्तरकेँ एक आवाज मानि लेब सेहो जोखिम अछि। तुलना करबाक पहिने बुझबाक अछि—ककर स्वर, कोन प्रश्न, कोन प्रसंग, आ कोन बात पाठकक बनाओल फ्रेमक बाहर छूटि रहल अछि।

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विस्तृत पठन 08

तुलना ओतहि आरम्भ होइत अछि जतय बाट अलग होइत अछि

खण्ड ७ अनेक दार्शनिक दिशाकेँ एके निष्कर्षमे मिला देबाक बदला हुनकर आरम्भ-बिन्दु, प्रमाण आ प्रश्नक भिन्नता देखबैत अछि। प्रत्यक्ष, स्मृति, प्रत्यभिज्ञा, अनुमान, शब्द वा आन प्रमाणक भूमिका अलग होइत अछि; अनेक दृष्टि मानब कारणक माँग समाप्त नहि करैत। ‘अनेक दिशाक एक सत्य’क आकाश बहुलताक जगह खोलैत अछि, मुदा सभ मार्ग एकहि दावा करैत अछि—ई निष्कर्ष पद्य स्वतः नहि दैत।

कारण-सत्ता, आत्मा, देह, श्रम, वर्ग, भाषा आ मुक्तिक भिन्न प्रश्नसभ देखबैत अछि जे तुलना तखने सार्थक अछि जखन भिन्नताकेँ बचाओल जाए। ‘हेतुक दीप, आत्माक साक्षी’ तर्कक सूक्ष्म कसौटी रखैत अछि; ‘पदार्थक गति, मनुष्यक मुक्ति’ सामाजिक-भौतिक सम्बन्धक प्रश्न उठबैत अछि; ‘प्रमाणक छह दीप’ ज्ञानक अनेक साधन चिन्हैत अछि। साझा रूपकसभ दिशा दे सकैत अछि, मुदा अलग तर्ककेँ लुकाबय नहि।

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विस्तृत पठन 09

अनुशासित सन्देहसँ सुननिहार न्याय धरि

खण्ड ८ सन्देहकेँ केवल अविश्वास नहि बनबैत; ओ निश्चयक आधार जाँचबाक विधि अछि। कारणक अनुभव, आदत, तथ्य, इतिहासक चयन आ कथनक सीमासँ गुजरि पाठक बुझैत अछि जे उचित भरोसा आ पूर्ण निश्चितता एक बात नहि। इतिहासकारक दृष्टि रहैत अछि, मुदा स्रोत आ प्रतिप्रमाण ओकरा बाध्य करैत अछि; अपन स्थान स्वीकारब मनमानीक छूट नहि।

अन्तिम न्याय-पद्य नियमक औपचारिक समानता आ नैतिक पर्याप्ततामे भेद करैत अछि। समान परिस्थिति मे समान व्यवहार जरूरी अछि, मुदा ऐतिहासिक असमानता वा वास्तविक भिन्नता हो तँ कारण सुनबो जरूरी। ‘अक्षरक पार जे उजास’ न्यायकेँ मानवीय गरिमा, परिस्थिति आ उत्तरदायित्वसँ जोड़ैत अछि। सन्देहक नैतिक फल ई भऽ सकैत अछि—अपन दावा सीमित कऽ दोसरक प्रमाण सुनबाक योग्यता।

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विस्तृत पठन 10

त्वञ्चाहञ्च: अपनापनक भीतर महाकाव्यिक विवाद

स्रोत ‘त्वञ्चाहञ्च’केँ वेदव्यासक अठारह पर्वक संस्कृत महाभारतक अति-संक्षिप्त मैथिली अनुवाद-गीतप्रबन्ध रूपेँ चिन्हित करैत अछि। तें ई न सम्पूर्ण महाभारत अछि, न एहि प्रसंगसभक मौलिक रचनाकारित्वक दावा। आरम्भिक पुनर्कथन कथा चलबैत-चल बर्तमान सामाजिक प्रश्नो उठबैत अछि—वंश, जाति, प्रतिष्ठा, स्त्री, सत्ता आ कल्पनाक बीच पाठक अपन समाजक संकीर्णता देखय।

सभा-पर्वक चमक विजय, द्यूत, द्रौपदीक प्रश्न आ अपमानक संग ठाढ़ होइत अछि; स्त्री-पर्व विजयक पाछाँक शोक सुनबैत अछि। स्वर्गारोहणमे युधिष्ठिर अपन स्वजनकेँ छोड़ि पुरस्कार स्वीकार नहि करैत छथि। अन्तिम ‘त्वञ्चाहञ्च’ सम्बोधन केवल ‘तोँ-हम’क नेह नहि, विभाजनक रेखा सेहो अछि—कुल, धर्म, जाति आ अपन-परेबाक आसक्ति वर्तमान धरि महाकाव्यिक विवादकेँ जीवित रखैत अछि।

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विस्तृत पठन 11

असञ्जाति मन: जागरण पाछाँ स्मृति आ संप्रेषणक जिम्मेदारी

स्रोत-टिप्पणी ‘असञ्जाति मन’केँ अश्वघोष-सम्बद्ध बुद्धचरित परम्पराक 28-सर्गीय अति-संक्षिप्त मैथिली रूप कहैत अछि, तिब्बती संरक्षण आ पुनःसंस्कृत पाठक जटिल प्रसारण-इतिहासक उल्लेख सहित। एहि प्रसारण-दावाकेँ स्रोतक कथन रूपेँ राखब उचित अछि; स्वतंत्र रूपेँ प्रमाणित ग्रन्थसूची तथ्य मानि बढ़ेनाइ नहि। प्रारम्भिक सर्ग सिद्धार्थकेँ परिवार, राजकीय संरक्षण, जरा-व्याधि-मृत्यु आ गृहत्यागक प्रश्नमे रखैत अछि।

कठोर तपस्या छोड़ि शरीरकेँ फेर शक्ति देब जागरणक बाटमे देहक आवश्यकताकेँ जगह दैत अछि। मारक चुनौती पाछाँ बोधि निजी उपलब्धि बनि बन्द नहि रहैत; धर्मचक्र, संघ, यात्रा आ शिक्षामे बदलैत अछि। अन्तिम सर्गसभ फेर मृत्यु, शोक, अवशेष, अस्थि-विभाजन आ सामूहिक स्मरणक समस्या धरि घुरैत अछि।

द्रोण द्वारा अस्थि-विभाजन युद्ध रोकैत अछि; आनन्दक माध्यमेँ शिक्षा एकत्र होइत अछि; स्तूप स्मृतिक भौतिक आधार बनैत अछि। एतय जागरणक बाद असली प्रश्न संप्रेषणक अछि—वक्ता नहि रहला पाछाँ शिक्षा कोना बचत, समुदाय ओकरा कोना सँभारत, आ स्मृतिक वस्तु फेर संघर्षक कारण नहि बनय से कोना सम्भव होएत। ‘त्वञ्चाहञ्च’क विभाजन-संकट आ ‘असञ्जाति मन’क प्रसारण-संकट एक नहि, मुदा दुनू संग्रहक अन्तमे जिम्मेदारीक प्रश्न छोड़ैत अछि।

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447 / सम्पूर्ण स्रोत-सार

पोथीक अपन क्रममे पढ़ू

447 स्रोत-रेकर्ड

01 / विभाग

प्रारम्भिक पद्य

आरम्भिक रचनासभ स्वप्न, स्मृति आ मृत्युकेँ बिना भारी दार्शनिक शब्दावलीक सामने आनैत छथि। खेतक स्मरण, अनचिन्हार आखर आ लोक-मृत्युगीत देह, नेह, माया आ यादक अस्थिर सीमा खोलैत अछि।

4 स्रोत-रेकर्ड

प्रारम्भिक पद्य

आरम्भिक प्रविष्टिसभ स्वप्न, स्मृति आ मृत्यु केँ एकहि देहरी पर आनैत अछि। जागरण आ स्वप्नक भेद धुँधला होइत अछि, आ लोकगीत देह केँ अस्थायी मोकाम तथा जीवन केँ माया-सँ घेरल यात्रा रूपेँ देखैत अछि।

अनचिन्हार आखर

जोताइ, साँझ आ बड़दक स्मृतिसँ उठल दृश्य स्वप्न आ जागरणक सीमा मेटबैत अछि। वक्ता अनुभव केँ फेर कहल चाहैत छथि, मुदा स्मृति स्वयं अविश्वसनीय भऽ दुनू संसार केँ मिज्झर कऽ दैत अछि।

स्वप्न मे मिज्झर होइत…….

स्रोतमे ई शीर्षक-पंक्ति स्वतंत्र प्रविष्टि रूपेँ अछि; एकर बाद अलग पद्य-पाठ नहि देल अछि। तें एहि प्रविष्टिक अर्थ शीर्षक-स्तरक संक्रमण धरि सीमित राखल गेल अछि।

मृत्यु गीत (लोकगीत)

लोकगीत पोसल सुग्गाक पिंजरासँ उड़ि जेबाक बिम्ब द्वारा देहक अस्थायित्व आ प्राणक प्रस्थान केँ रूप दैत अछि। ‘कायागढ़’ आ ‘माया’क भाषासँ देहक मोकाम आ मोहक क्षणभंगुरता एक संग उभरैत अछि।

02 / विभाग

खण्ड १ — स्वप्नमे मिज्झर होइत

काल, अनन्त, सत्य, आत्मा, मुक्ति, तर्क आ मानवीय उत्तरदायित्वक विस्तृत प्रश्न-यात्रा। अनेक परम्परासँ संवाद होइत अछि, मुदा भिन्न मतकेँ एक सिद्धान्तमे मिला देबाक बदला प्रमाण, आचरण, दुःख आ जीवनक प्रयोजनक कसौटीपर रखल जाइत अछि।

17 स्रोत-रेकर्ड

खण्ड १ — स्वप्नमे मिज्झर होइत

ई खण्ड काल, परिवर्तन, ज्ञान, दुःख, आत्मबोध, तर्क, बहुलता, परम्परा आ मुक्ति पर विस्तृत दार्शनिक पद्य-चिन्तन रचैत अछि। नदी, आकाश, उजास, दर्पण, श्वास, धुँआ आ दुआरक बिम्ब बदलैत जगत केँ मानैत हुएँ ओकरा अन्तिम सत्य मानि लेबाक विरुद्ध सजगता जगबैत अछि।

कालक धार पार अनन्तक उजास

घड़ी, नदी, जन्म, वृद्धावस्था, साम्राज्य आ मृत्यु सभ केँ कालक एकहि धारमे राखि पद्य पूछैत अछि जे परिवर्तनक पार कोनो गहिर उजास अछि कि नहि। अन्तमे इतिहास केँ नकारल नहि जाइत; ओकर मानवीय मूल्य स्मृति, अनासक्ति आ मानवता प्रति उत्तरदायित्वसँ जुड़ैत अछि।

प्रश्नक देहरीसँ मुक्तिक आकाश

पद्य कोनो एक संस्कृति वा पद्धति केँ सत्यक मालिक मानबाक विरुद्ध प्रश्नक सार्वभौमिकता स्थापित करैत अछि। दोसर दृष्टि केँ ओकर अपन अर्थमे बुझब, बहस केँ अहिंसक रखब आ ज्ञान केँ जीवनक नैतिक चालसँ जोड़ब मुक्तिक खुलल आकाश दिस बाट बनबैत अछि।

हथेली भरि धरती, आँखि भरि सत्य

ओस, गन्ध, स्वाद, ताप आ देहक अनुभवसँ पद्य प्रत्यक्ष केँ प्रश्नक पहिल भूमि बनबैत अछि। अदृश्य दाबीसभ केँ प्रमाणक कसौटी पर राखैत हुएँ ई जीवनक गरिमा, विवेक, आनन्द आ दोसर मनुष्यक दुःख प्रति उत्तरदायित्व केँ धरतीसँ जुड़ल दृष्टि रूपेँ सामने आनैत अछि।

एक पात पर सात दिशाक ओस

एक पातक सात ओस-बूँदमे एक सूर्यक अलग-अलग रंग सत्यक बहुदिशात्मक दर्शनक बिम्ब बनैत अछि। आंशिक ज्ञानक विनम्रता अहिंसा, स्व-प्रयास आ अनासक्त मुक्ति सँ जुड़ि कहैत अछि जे सत्य ककरो एक मुट्ठीक कैदी नहि।

दुःखक गाँठ खोलैत भोर

रोग, वृद्धावस्था, मृत्यु, इच्छा आ खोएबाक भय केँ दुःखक अनेक गाँठ रूपेँ देखाओल गेल अछि। पद्य कारण देखबाक, मुट्ठी हलुक रखबाक, अहिंसक कर्म करबाक आ दोसरक पीड़ा नहि बढ़ेबाक अभ्यासमे मुक्तिक आरम्भ खोजैत अछि।

लौ बदलैत रहैत, उजास चलैत

नाम स्थिर लगैत अछि, मुदा वस्तु, देह आ जगत कारणबद्ध परिवर्तनक प्रवाहमे रहैत अछि। दीपक बदलैत लौ आ चलैत उजासक बिम्ब द्वारा पद्य निरन्तरता केँ कठोर स्थायित्व नहि, एक क्षणसँ दोसर क्षण धरि कारण आ प्रभावक जीवित सम्बन्ध रूपेँ देखैत अछि।

चार खिड़की आ एक खुलल आकाश

मुक्तिक भिन्न-भिन्न बाट अपन-अपन खिड़कीसँ एक विशाल आकाश दिस देखैत अछि। निजी साधना, करुणा, स्व-प्रयास आ शून्यताक प्रश्नसभक बीच पद्य सावधान करैत अछि जे कोनो मत स्वयं आकाश नहि; अपन किनार पाबि नाव फेर दोसर लेल घुमेनाइ करुणाक परीक्षा अछि।

मुट्ठीक भीतर जे घर नहि

बदलैत चेहरा, स्मृति, देह आ सम्बन्धक बीच ‘हम’क स्थिर घर खोजबाक चाह केँ पद्य प्रश्न करैत अछि। मुट्ठी कसि पहचान, वस्तु वा सम्बन्ध बचाएबासँ बदला दुआर खोलि परिवर्तन स्वीकारब, प्रेम केँ स्वामित्वसँ मुक्त करब आ सजग जीवन जीब मुक्तिक रूप लेत अछि।

दर्पणक पार जे देखैत अछि

बाहरक दृश्य आ भीतरक द्रष्टा केँ अलग ध्रुव रूपेँ राखि पद्य पूछैत अछि जे चेतना केँ साधारण वस्तु जकाँ बुझल जा सकैत अछि कि नहि। देह, इन्द्रिय, मन आ बदलैत प्रकृतिक नृत्यक बीच द्रष्टाक पहिचान, विवेक आ स्वतन्त्रताक प्रश्न दर्पणक पारक शान्त उजास दिस खुलैत अछि।

श्वासक भीतर एक स्थिर आकाश

देहक स्थिरता, श्वासक सजगता आ चञ्चल मन केँ फेर एक बिन्दु पर आनबाक अभ्यास भीतरक अवकाश खोलैत अछि। पद्य ध्यानक फल केँ निजी अनुभूति मात्र नहि मानि कम हिंसक वाणी, कम लोभ, अधिक करुणा आ स्पष्ट जीवन-चालमे परखैत अछि।

एक-एक कणक अपन चेहरा

घड़ा, पाथर, गन्ध, गति आ स्मृति जेकाँ उदाहरणसँ पद्य जगत केँ एकरूप वस्तु नहि, अनेक आधार, गुण, क्रिया, सम्बन्ध आ अनुपस्थितिक जटिल नगर रूपेँ देखैत अछि। ज्ञानक विनम्रता एतय भेद मेटेनाइ नहि, प्रत्येक अस्तित्व केँ ओकर अद्वितीयता आ सम्बन्धसहित स्पष्ट देखनाइ अछि।

धुँआक पार जे आगि अछि

धुँआसँ आगिक अनुमान पद्यक केन्द्र बनि तर्कक वैधता, प्रमाण आ निष्पक्ष बहसक अनुशासन खोलैत अछि। प्रतिपक्ष केँ बेठीक रूप नहि देब, अपन निष्कर्ष सुधारबाक साहस रखब आ सत्य केँ जीतसँ ऊपर राखब ज्ञानक नैतिकता रूपेँ उभरैत अछि।

अनेक नामक पाछाँ एक अनाम उजास

प्रकृति, भय, अन्न, प्रार्थना आ अनुष्ठानसँ जन्मल अनेक नाम धीरे-धीरे भीतरक सत्यक प्रश्न दिस मुड़ैत अछि। पद्य रूप आ परम्पराक सम्मान करैत हुएँ संकेत केँ लक्ष्य नहि मानबाक चेतावनी दैत अछि आ अनेक नामक पाछाँ अनाम रहस्यक उजास खोजैत अछि।

भीतरक आकाश, बाहरक आकाश

ऋतु, देह, पात आ नदीक परिवर्तनसँ उठल प्रश्न बाहरक बदलैत जगत आ भीतरक चेतनाक गहिर आधार केँ एक संग जाँचैत अछि। नाम आ रूपक पार जाएब वास्तविक जगत केँ नकारब नहि, बल्कि परिवर्तनक भीतर सम्बन्ध आ चेतनाक मौन उजासक सम्भावना देखब अछि।

तीन दुआर, एके अनन्तक दिस

तीन दुआर भेद, व्यापक एकता आ भिन्नताक वास्तविकताक अलग-अलग उत्तर सामने आनैत अछि। पद्य कोनो एक उत्तर केँ अन्तिम नहि ठहरबैत; एकता भिन्नता केँ नहि कुचलय, भिन्नता सम्बन्ध नहि तोड़य, आ ज्ञान प्रेम तथा विनम्रता सँ अलग नहि हो—ई ओकर साझा कसौटी बनैत अछि।

दू हवाक बीच जागैत नव भोर

दूर देशक सत्ता, व्यापार, भाषा, प्रार्थना आ विचारक हवा पुरान घर केँ अपने बारे फेर प्रश्न करबैत अछि। पद्य नकल वा जड़ अवशेष दुनू सँ अलग एहन नव भोरक कल्पना करैत अछि जतय परम्परा सजग रहैत हुएँ दोसर अनुभवसँ सीखैत, आ विज्ञान, आत्मबोध, न्याय तथा सामाजिक उत्तरदायित्व संवादमे आबैत अछि।

03 / विभाग

खण्ड २ — स्वप्न, जागरण आ मिज्झर समय

घर-परिवार, रोग, यात्रा, व्यवस्था, सामाजिक अनुभव आ स्वप्न एक-दोसरा भीतर प्रवेश करैत छथि। दैनन्दिन विडम्बना विचारक परीक्षा बनैत अछि; संरक्षण, निर्भरता, सार्वजनिक संस्था, आशा आ व्यवहारक बीच ज्ञानक भाषा बदलैत अछि।

84 स्रोत-रेकर्ड

खण्ड २ — स्वप्न, जागरण आ मिज्झर समय

ई खण्ड स्वप्न आ जागरणक मिज्झर सीमा केँ घर-परिवार, बीमारी, यात्रा, सामाजिक व्यवस्था, श्रम, लोककारीगरी, आकांक्षा आ मृत्यु धरि पसारैत अछि। दैनन्दिन दृश्य आ लोकशब्द दार्शनिक प्रश्नक संग रहैत छथि, जाहिसँ विचार जीवनक बाहर नहि, ओकर बीचहि सँ उठैत देखाइत अछि।

नजरि लागि जाइ छै

मायक स्नेह आ भय ‘नजरि’क लोकविश्वासमे एक संग बोलैत अछि। सरिसौ-तोरी आ मेरचाइ जराएब, सुरसुरीक प्रतीक्षा आ बेटाक प्रति चिन्ता द्वारा पद्य संरक्षणक घरेलू अनुष्ठान केँ कोमल हास्यसहित देखबैत अछि।

भाग्यशाली

हार, थकान, बैसाखी, संगतिक उत्साह आ बाहरी प्रशंसाक बीच पद्य ‘भाग्यशाली’ होएबाक अर्थ केँ उलट-पुलट करैत अछि। सहारा मनुष्य केँ फेर ठाढ़ करैत अछि, मुदा सहाराक पाछाँ अपन पएरपर कतेक दूर चलि पाओल गेल—ई प्रश्न खुलल रहैत अछि।

जाइत जाइत

वक्ता एहन दूर देश दिस बढ़ैत छथि जतयसँ घुरब कठिन, आ पाछाँक बाट धीरे-धीरे चिन्हविहीन होइत जाइत अछि। नव लोक, नव वातावरण आ प्रयोगक सम्भावना संग यात्रा वापसीक निश्चितता छोड़ि अनचिन्ह भविष्य स्वीकार करैत अछि।

बिलाइत आसक चेन्हासी

रस्ताक दुनू कातक गाछक घन छाहरि पहिने चेन्हासी गाढ़ करैत अछि, फेर ओही घनत्व अन्हार बनि आसक संकेत बिलबैत अछि। छोट पद्य परिचित चिन्हक स्वयं अनिश्चिततामे बदलि जाएब पकड़ैत अछि।

शामिल बाजाक दुन्दभी वादक

स्वर केँ देखब, चित्र केँ सुनब आ सागर-आकाशक असीमता नापबाक चाह इन्द्रिय आ विचारक सीमा उलटैत अछि। ‘शामिल बाजा’क ओ वादक जे बजबैत जकाँ देखाइत मुदा फूँक नहि मारैत, सहभागिताक अभिनय आ वास्तविक साधनाक भेदक तीक्ष्ण रूपक बनैत अछि।

मन्दाकिनी जे आकाश मध्य

बद्री-केदार, अलकनन्दा-मन्दाकिनीक मेल, हरहराइत धार, पर्वत, मेघ आ शीतल पवनक दृश्य प्रकृतिक विशालता सामने आनैत अछि। हिमालयी प्रवाह वक्ता केँ पृथ्वी केँ नव दृष्टिसँ देखबाक अनुभव दैत अछि।

नव व्यवस्था

स्रोतमे ई शीर्षक स्वतंत्र प्रविष्टि रूपेँ अछि; एकर बाद अलग पद्य-पाठ नहि देल अछि। तें एहि प्रविष्टिक सार शीर्षक-स्तरक संक्रमण धरि सीमित राखल गेल अछि।

नव व्यवस्थाक मनुक्ख

कम्पनी केँ ‘मनुक्ख’क दर्जा देनिहार अर्थव्यवस्थाक उलटा दृश्य पद्य असली मनुष्यक करुण दशासँ जोड़ैत अछि। राजनीति, धन, पर्यटन आ जातिक नव रूप आम्रपाली, शकुन्तला आ मृच्छकटिकक संकेतसभक संग सामाजिक विडम्बना रचैत अछि।

नव व्यवस्थाक दलित

चौबटियाक बत्ती लग शीसा पोछैत, अखबार बेचैत बच्चा, युवा भिखमंगनी आ धुँआमे करिया पड़ल श्रमिक नव व्यवस्थाक निचला चेहरा बनैत छथि। पद्य विकासक दृश्य पाछाँ देह, श्रम आ अपमानक असमानता देखबैत अछि।

नव व्यवस्थाक पुरहित

लघु उद्योगक मालिक सरकारी ऋण, कम्पनीक पृथक कानूनी अस्तित्व आ निदेशकक दूरीक लाभ उठबैत छथि, जखन घाटाक मारि श्रमिक पर पड़ैत अछि। कम्पनी केँ मनुष्य बनबैत व्यवस्था असली मनुष्य केँ रोअय छोड़ैत—ई पद्यक केन्द्रीय व्यंग्य अछि।

नव आ पुरान व्यवस्थाक हाट

दिल्ली-मुम्बइक श्रम-बजारमे जाति आ पेशाक सीमा ढीली पड़ैत अछि, मुदा गाम घुरिते पुरान पदानुक्रम फेर सक्रिय भऽ जाइत अछि। ट्रेन एहि नव-पुरान व्यवस्थाक मेल आ मनक द्वैधक साक्षी बनैत अछि।

जखन मशीन आ बिलाड़ि दुनू बुझैए हमरा मृत

भीष्मक इच्छा-मृत्यु, आधुनिक गणतांत्रिक सत्ता, मशीन, देह, योगिनी-मन्दिर आ ब्रह्माण्डीय स्वप्न एक अस्थिर काव्य-क्रममे मिज्झर होइत अछि। वक्ता मृत मानल जाएबाक अनुभूति सँ जीवन, कर्तव्य, तकनीक आ मृत्यु पर अपन ठाम खोजैत छथि।

हाइ रे कुमारिल!!

लेट ट्रेन आ सरकारी अस्पतालक प्रतीक्षा बीच रोगी ईश्वरक शरीर, इच्छा आ जगत-कारण पर प्रश्न करैत अछि। डॉक्टर केँ ‘छोट-छीन दुनियाँक भगवान’ कहैत पद्य दार्शनिक कारणवाद केँ चिकित्सा-व्यवस्थाक व्यंग्यपूर्ण यथार्थसँ जोड़ैत अछि।

बुद्धिक भरोसे गढ़ल नव सत्यक गढ़नि

स्रोतमे ई शीर्षक स्वतंत्र प्रविष्टि रूपेँ अछि; एकर बाद अलग पद्य-पाठ नहि देल अछि। तें एहि प्रविष्टिक सार शीर्षकमे उद्घाटित बुद्धि आ नव सत्यक संक्रमणात्मक संकेत धरि सीमित अछि।

आकांक्षाक अग्नि

आकांक्षा केँ आगि मानि पद्य ओकरा आँच देबाक, प्रज्वलित रखबाक आ पसाही सँ बचेबाक कठिनाइ पूछैत अछि। समर्पण, निरन्तरता, स्वाद, सौन्दर्य आ तीव्र भावनाक बीच इच्छा अपन दिशा खोजैत अछि।

अनुक्रमणिका आ विषय सूचीसँ आगाँ

रूइ, धुनकी, तकुरी, ताँति आ सूत बनबाक कारीगरीक शब्द लिखित अनुक्रमणिका सँ बाहरक जीवित ज्ञान देखबैत अछि। शिक्षा केवल पोथीक सूची नहि; परिवार, टोल, गाम आ लोकक सुख-दुःखमे चलैत व्यवहार सेहो ज्ञानक भंडार अछि।

व्यावहारिक आ सैद्धांतिक

मखान, भेड़, पाग, कपड़ा आ अनेक श्रम-कौशल सैद्धांतिक शिक्षक आ व्यावहारिक श्रमिकक दूरी केँ सामने आनैत अछि। पद्य दुनू ज्ञान केँ मिज्झर करबाक संग हेंजक निर्णयक विरुद्ध अपन बुद्धिसँ नैतिक सत्य चुनबाक सम्भावना पूछैत अछि।

हमर शरीरक भाथीमे पैसैत अछि वायु

लोहारक भाथीमे पैसैत वायु आ प्रज्वलित अग्निक बिम्ब शरीरक भीतरक आकांक्षासँ जुड़ैत अछि। कलम-छेनी लऽ वक्ता ईश्वर, आत्मा आ दुनूक सम्बन्ध गढ़बाक चाह केँ कारीगरीक श्रम जकाँ देखैत छथि।

कबिराहाक कनसीपर उठैत धुन

पित्तरि बासन, दीप, गहना आ कबिराहाक धुनक कारीगरी बीच वक्ता आत्मा-ईश्वरक विचार गढ़ि लेने होएबाक दावा करैत छथि। मुदा हेंजक व्यवहार, अभिनय आ संस्थागत सत्यसँ पार जाएब की सम्भव—आकांक्षाक अग्नि एहि सामाजिक प्रश्न पर टिकैत अछि।

भुजनाठीसँ लाड़ैत आकांक्षाक अग्नि

कनसारीक भुज्जा आ गरम बालु केँ भुजनाठीसँ लाड़बाक दृश्य भीतरक आकांक्षाक अग्निक रूपक बनैत अछि। स्वप्नमे जिअैत दोसर जीवन, भीतरक ‘परजीवी’ स्वर आ जागलापर धकधक करैत छाती आत्मक अनेकता आ भयक अधूर प्रश्न खोलैत अछि।

अतिखाइन

सोन्हगर मकइक मखानीक स्वाद अतिखाइन भऽ जाएबासँ पद्य आकांक्षाक अग्निक छोट मुदा तीक्ष्ण रूप प्रस्तुत करैत अछि। जे सुख स्वाद सँ आरम्भ होइत अछि, सीमा पार करिते अति बनि सकैत अछि।

भैसाठ

चाउर, मुरही, गुड़, मलीदा, दही आ तेल निकालबाक घरेलू प्रक्रियासभ स्वादक संग श्रमक पूरा संसार खोलैत अछि। एहि पदार्थगत लयक भीतर आकांक्षाक अग्नि लगातार जरैत रहैत अछि।

धेनुआर घानी

तेल निकालब, खरी, रेह, खारी, शोरा आ ओकर क्रमिक परिशोधनक लोक-तकनीक पद्यक मुख्य पदार्थ अछि। कच्चासँ ‘सुच्चा’ होएबाक प्रक्रिया आकांक्षाक अग्नि केँ श्रम, अवशेष आ परिशुद्धिक रूपकसँ जोड़ैत अछि।

मन्तुर पढ़ि छत्ता लग जायब

चिड़ै-शिकारक औजार, साँप आ बच्चाक रक्षक बिज्जीक दृश्य लोकमन्तुर आ जीव-जगतक ज्ञानसँ बनल अछि। वक्ता चाहैत छथि जे आकांक्षाक अग्नि मन्त्रक छत्ता जकाँ रक्षक बनि भयक बीच पहरा दैत रहय।

बकछुछरु खेलाइत भीखू संग

बँसकरमक भीखू, ओकर अधिकारी भाय आ अस्पतालक वार्डबॉय भायक अलग जीवन-पथ श्रम, गाम छोड़ब आ सामाजिक दूरीक कथा बनबैत अछि। अस्पतालमे अटकल उपचार लेल सहायता माँगबाक क्षणमे दया, आत्मतृप्ति आ आकांक्षाक अग्नि एक संग उपस्थित होइत अछि।

उजाहिमे उपलाइत हम आ माँछ

मछहर, जाल, कबइ माँछ आ इछाइन गन्धक बीच शिकारी वक्ता स्वयं जालमे बान्हल जकाँ अनुभव करैत छथि। पकड़निहार आ पकड़ायल, इच्छा आ नियति, दुनू भूमिका मिज्झर भऽ आकांक्षाक अग्निक बेचैनी बनैत अछि।

ठाढ़ लत्तीकेँ पढ़ैत छी

पानक जड़ि, लत्ती, पात, रोग, तोड़ाइ, बान्हाइ आ बजार धरि पूरा कृषिक्रममे वक्ता अपन जीवन पढ़ैत छथि। रोगग्रस्त पातक फेरफार कऽ मृत्यु किछु काल टारब आ अन्ततः समान बनि बजार जाएब आकांक्षाक अग्नि केँ नश्वर देहसँ जोड़ैत अछि।

श्राद्ध ने मरा जाय

एक मृत्यु पाछाँ श्राद्धावधिमे दोसर मृत्यु घटित होएब परिवार केँ विधि आ समयक जटिल प्रश्नमे फँसा दैत अछि। ‘पिताक श्राद्ध ने मरा जाय’क चिन्ता धार्मिक नियमक अमूर्तता केँ घरक तत्काल शोक आ असुरक्षासँ जोड़ैत अछि।

शलातुर गाम

तक्षशिला, शलातुर, पाणिनि, युआन च्वांग, खैबर आ बामियानक उल्लेखसँ पद्य इतिहासक घुमैत चक्रक बिम्ब बनबैत अछि। ‘टूटल अराड़ि’ फेर ठाढ़ होएबाक आशंका वक्ताकेँ विगत आ वर्तमानक सीमा-द्वारसभ दिस सजग रखैत अछि; समुद्र वा हिमालयकेँ स्थायी बेढ़ मानि निश्चिन्त भऽ जाएबक बदला इतिहासक बदलैत बाट बुझि तैयारी करबाक स्वर प्रधान अछि।

बड़का सड़क छह लेन बला

धानक खेत कात चमकैत छह-लेन सड़क, लाल कार, ए.सी. आ बाहरी निधिसँ बनल आधुनिक संरचना एक दिस अछि; दोसर दिस चिड़ै बेचैत बच्चा, माटि-फूसक घर आ कमाइ लेल दिल्ली-पैंजाब गेल गामक लोक छथि। वक्ता चमकैत ‘विकास’ केँ अपन गामक खाली पड़ैत जीवन आ पहिने सरकारी पाइ सँ बनल कमजोर घरक स्मृतिसँ तौलैत अछि, जाहिसँ सड़कक चिकनाइ आ जीवनक विषमता एकहि दृश्यमा आमने-सामने अबैत अछि।

पक्काक जाइठ

तबैत पोखरिक महार, लकड़ीक पुरान जाइठ आ नव पक्का-कंक्रीटक जाइठक तुलना पद्यक केन्द्र अछि। दोसर टोलक पोखरिक मान्यता, मालिकक ‘अद्विज’ होएबाक उल्लेख, यज्ञोपवीत आ यशक प्रश्न देखबैत अछि जे जल-संरचना सेहो सामाजिक प्रतिष्ठा आ जातिगत दृष्टिसँ अलग नहि अछि। अन्तमे कंक्रीटक दीर्घायु आ लकड़ीक छोट जीवन पुरातन चिह्न आ आधुनिक स्थायित्वक बीच तनाव उत्पन्न करैत अछि।

पता नै घुरि कऽ जायब आकि…

‘घुरि कऽ जायब’ आ ‘एत्तै मरि-खपि बिलायब’क बीच झूलैत वक्ता दिल्ली-पैंजाबक प्रवासी जीवनसँ गामक आँगन, गाय, आम, पोखरि, टिनही थारी आ मायक स्मृति दिस बेर-बेर घुरैत अछि। महानगरक प्रदूषण, तरेगणक अदृश्यता, ‘बिहारी’ कहबाक अनुभव आ चमकैत स्टीलक बरतन घरक साधारण वस्तुसभक स्वाद केँ आर तीक्ष्ण बनबैत अछि। पद्य घर-फेरबाक आकांक्षा केँ निश्चित निर्णय नहि, अधरमे अटकल जीवन-प्रश्न रूपेँ राखैत अछि।

गजल

मुतकारिब बहरमे रचल ई गजल जुआरी, उदासी, मदारी, उजड़ैत घर, भीतरक उपास आ बाहरक निराशाक बिम्बसँ अस्थिर जीवनक स्वर बनबैत अछि। अकाल, नचारी आ खटोली उठाबैत चलबाक पंक्तिसभमे रोजमर्रा असुरक्षा आ मृत्यु-बोध एक संग अबैत अछि। पद्य समाधान नहि दैत; ओकर लय निरर्थक दिखैत खेल, भूख आ अनिश्चित यात्राकेँ लगातार प्रश्न बनौने रखैत अछि।

प्रकृति, पुरुष

हाइकू, शेनर्यू, टनका आ हैबूनक मिज्झर रूपमे ई पद्य प्रकृतिकेँ घरक सजावट, चित्र, फुलवारी वा दूरसँ देखल सौन्दर्य बना देबाक प्रवृत्तिक प्रश्न करैत अछि। चौड़ा सड़क, मलिछोंह अकास, घटैत हरियरी आ शिखरसँ गाम फेर सुन्नर लगबाक अनुभव देखबैत अछि जे दूरी दृष्टि बदलैत अछि। प्रकृति एतय स्थिर वस्तु नहि; लोक, गाम, यात्रा आ तुलना बीच बदलैत अनुभव अछि, जतय विजयपर गर्व वा हारिपर निराशासँ बेसी लगातार चलब महत्त्वपूर्ण ठहरैत अछि।

हाइकू/ शेनर्यू/ टनका

अनेक लघु काव्यचित्र हरित-कञ्च, मरुद्यान, मेघ, हिम, चिड़ै, बाढ़ि, बिज्जी, सर्पिल बाट, क्षितिज आ पनिदुद्दुर जकाँ दृश्यसभ केँ तेज कटावमे रखैत अछि। बारम्बार दूर-लग, ऊपर-नीचाँ, जल-अकास आ वृत्त-अनन्तक सीमा बदलैत अछि; प्रकृति सौन्दर्य मात्र नहि, अस्थिरता आ संकट सेहो अछि। अन्तिम सौंसक सीटी आ ओकर समाप्ति जकाँ पंक्ति जीव-जगतक क्षय केँ छोट मुदा मार्मिक संकेत दैत अछि।

कुण्डलिया

कुण्डलिया छन्दक एहि क्रममे सत आ असतक भेद, होनीक लेख, भय, घोर अन्हार, हारि-विजय आ समयोचित वचनक प्रश्न एक संग अबैत अछि। पद्य विजयमे गर्व नहि, हारिमे घबराहट नहि आ झमेलाक बाद आगू बढ़बाक सीख दैत अछि। अन्तिम खण्ड बाजब आ गुम्म रहबाक उचित बेर पर जोर दैत, वचनकेँ अनमोल मानैत अछि—अर्थात् नैतिकता केवल विचारमे नहि, बोलीक संयममे सेहो परखाइत अछि।

मिथिलाक ध्वज गीत

रूषल, भूषल आ दूषल मातु मिथिलाक दृश्यसँ आरम्भ ई गीत अकुलाहटकेँ पुनरुत्थानक संकल्पमे बदलैत अछि। विद्याक कर्मभूमि, बुद्धि-चातुर्य, शौर्य आ अल्पप्राण मैथिलीक उल्लेखक बीच वक्ता सन्ततिक फेर आगू बढ़बाक भरोसा व्यक्त करैत छथि। ‘ध्वज खसत नै’ अन्तिम प्रतिज्ञा क्षेत्र, भाषा आ सांस्कृतिक आत्मविश्वासकेँ एकहि गीतात्मक प्रतीकमे जोड़ैत अछि।

जोति बड़द सोचमे पड़लौं

हल जोतैत-जोते साँझ भऽ जाएब, बड़द हराएल बुझाएब आ चारूकात ताकैत वक्ताक मोन भोथिआएब—ई छोट पद्य श्रम आ चेतनाक क्षणिक विचलन पकड़ैत अछि। ‘कहबै ककरा ई गप्प’क संकोच अनुभवकेँ एहन निजी उलझन बनबैत अछि जकरा सुनि आन लोक हँसि सकैत अछि। खण्डक एहि बिन्दुपर जागृत दिनचर्या धीरे-धीरे टुटैत-अबैत स्वप्नक सीमामे प्रवेश करैत देखाइत अछि।

बिसरलौं फेर- कर्णक मृत्युक छोट-छीन रूप

‘नै बिसरब आइ’क दृढ़ निश्चय काजक ठीक बेर टूटि जाइत अछि, आ वक्ता एहि साधारण विस्मरणकेँ ‘कर्णक मृत्युक छोट-छीन रूप’ कहि अनुभव करैत छथि। मोनमे चलैत गप्प, कृत्रिमताक ढहब आ आवश्यक क्षणमे स्मृति चुकि जाएबक बाद जे मसोस आ गुम्मी रहि जाइत अछि, से पद्यक मुख्य भाव अछि। महाभारतीय बिम्ब एतय विराट कथा बनबाक बदला दैनन्दिन स्मृति-विफलताक तीक्ष्ण उपमा बनैत अछि।

कटिहारी

कनकनाइत बसात, पोस्टमार्टम भेल देह, चिता-संस्कार आ घर घुरबाक क्रमसँ पद्य मृत्युकेँ विस्तृत सामाजिक दृश्य बनबैत अछि। डेढ़ मासक बच्चासहित विधवाक अवस्था, विधवा-विवाहक प्रश्न, पारिवारिक दबाव आ कुरीतिक बोझ समय बदललापर सेहो बनेल रहैत देखाओल गेल अछि। बादक बम-विस्फोट ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बनि शीघ्र पुरान भऽ जाइत अछि, मुदा मृत कमाइबला व्यक्तिक परिवारक जीवन पटरीपर फेर अबैत अछि कि नहि—ई प्रश्न कनकनीक आवर्ती बिम्बसँ दीर्घ सामाजिक पीड़ा बनि टिकैत अछि।

डैनियाही दुपहरिया

डैनियाही दुपहरियाक घाममे सहस्रबाढ़निक दानवाकार स्वप्न प्रेमी, प्रेयसी, पनिडुम्मी, मंत्र-तंत्र आ प्राणघातक संघर्षक तेज दृश्य बनबैत अछि। जागरण, धावन, पहलमानी, न्याय आ समझौताक बिम्ब बीच स्वप्न टुटैत-अबैत रहैत अछि, मुदा अन्ततः मित्रसभ निन्नमे ‘माहुर’ मिला ओकर सहज तृप्ति सेहो बिगाड़ि दैत छथि। पद्य निन्नकेँ विश्रामक सरल अवस्था नहि, बाहरी हस्तक्षेप आ भीतरी भय सँ बदलैत एक विचित्र जीवन मानैत अछि।

खाम्ह अदृढ़ताक ठाढ़

मोनक रंग-बिरंग अदृश्य देबाल ढहैत रहैत अछि, मुदा ‘खाम्ह अदृढ़ताक’ ठाढ़ रहि जाइत अछि—ई विरोधाभास पद्यक केन्द्र अछि। हिमाल-लकड़ीक मन्दिर, तुलसीक गाछ, इनार-पोखरिक महार आ स्विमिंगपूलक नील देबाल प्रतीकक भिन्न रूप बनि अबैत अछि; बाहरी संरचना सहृदयता वा स्थायित्वक प्रमाण नहि बनैत। आकांक्षासँ भरल भीतर आ ढहैत भावनाक देबाल बीच मनुष्यक अस्थिर आधार उजागर होइत अछि।

निन्नक ओहि पार

राति, निन्न, स्मृति-लोप, चलचित्रक स्थिर चित्र, देहक कोशिका, घड़ी, जीवसभक अलग गति आ स्वप्न-विहीन निन्न—ई सभ मिलि चेतना आ समयक नापपर दीर्घ प्रश्नोत्तर बनबैत अछि। वक्ता पूछैत छथि जे घड़ीक नापमे मनुष्य सम्पूर्ण अँटैत अछि कि नहि, आ चेतनाक लहरि, स्मृतिक प्रतिलिपि तथा वर्तमानक क्षणभंगुरताकेँ जीवन-मृत्युक सीमा सँ जोड़ैत छथि। कर्म, अनुभव, देह आ स्मृति पर प्रश्न उठैत रहैत अछि; पद्य कोनो अन्तिम सिद्धान्त नहि दैत, बल्कि अनुमानक भीतर अनुमान खुलैत रखैत अछि।

सङ गामक पोखरि कात

गामक पोखरि कात बंशी पाथि प्रतीक्षा करैत वक्ता आकांक्षा, सफलता, विश्वास आ विज्ञानकेँ एकहि शांत दृश्यमा रखैत छथि। छोट कीड़ाक हिलकोर आशा जगबैत अछि, मुदा पानि सौंस-काछु-हरकाछुसँ रिक्त भऽ जाइत अछि आ व्याधिक कारण निर्मितिक अन्तक बिम्ब उभरैत अछि। बीया-जीरा माछ रोपि फेर बंशी पाथबाक प्रयास मनुष्यक हियाउ देखबैत अछि, जबकि अनन्त अकासक बीच वाकहीन मन अन्ततः सूक्ष्म भावनाक हिलकोरसँ फेर विह्वल होइत अछि।

सङ सागर तटपर

महाबलीपुरमक समुद्र-तट, सूर्य-मन्दिर, पाण्डव-रथ, पल्लव स्मृति, अंकोरवाट आ दूरस्थ समुद्री अवशेषक उल्लेख इतिहासक टूटल तार आ विस्मरणक प्रश्न उठबैत अछि। वक्ता एहि विशाल ऐतिहासिक कल्पनासँ अचानक गामक बोरिंग-पम्पसेट आ बाहरी तकनीकक निर्भरता दिस घुरैत छथि, फेर हँसीमे दुःख आ महत्वाकांक्षा बहा देबाक अनुभव करैत छथि। सागरक लहरि जकाँ फिकिर हटला पर मोनक तट स्वच्छ होइत अछि, मुदा सम्भावना आ परिणामक संग विपरीत दिशा सेहो उपस्थित रहैत अछि।

सर्वज्ञाता

‘ज्ञान अपूर्ण’ आ ‘शंका सेहो अपूर्ण’ सँ आरम्भ पद्य सत्य, अनुभव, दृश्य-अदृश्य, अनुमान, शून्य, अणु, चेतना आ कर्मक प्रश्न एक-दोसरामे खोलैत अछि। सर्वज्ञता बारम्बार असम्भव ठहरैत अछि, किएक तँ देखनाइ-सुननाइ सेहो अनुमानक परतसँ मुक्त नहि अछि। पद्य गीताक कर्म-सिद्धान्तकेँ हानि नहि पहुँचाबयब, बन्धनमुक्ति आ सत्य-साक्षात्कारक नैतिक धरातलसँ जोड़ैत अछि, मुदा ब्रह्माण्ड, शून्य आ चेतनाक उत्पत्तिपर उठल प्रत्येक उत्तरकेँ फेर प्रश्न बनबैत कहैत अछि—‘ईहो तँ अछि अनुमान’।

घृणाक तरहरिमे

पद्य प्रेमक तरहरि बनबयबाक सरल कल्पनाकेँ नकारि घृणाक खूनल तरहरिमे प्रेम गारबाक कठिन रस्ता चुनैत अछि। जतेक श्रम घृणाक खाइ बनबयमे लगल, ततेकहि गहींर प्रेमक पोखरि काटबाक आग्रह अछि, जाहिमे बरखा-पानि भरि प्रेम हेलि सकय। उद्देश्य घृणा आ ईर्ष्याकेँ बलपूर्वक नष्ट करब नहि, बल्कि प्रेमक पानिमे ओकरा डुबा बहा देब अछि; एहि रूपकमे प्रतिरोध विनाशक बदला परिवर्तनकारी बनैत अछि।

जावत रहब

वक्ता जावत जीवित छथि, ‘प्रेमक पुत्र’ सुरक्षित बुझाइत अछि, मुदा चारूकात स्थूल-प्रेमक गिलेबासँ बनल घेराबा हुनकर वास्तविक चिन्ता अछि। अपन अनुपस्थितिक बाद वियोग नव पीढ़ीकेँ सक्कत आ तीव्र बनाओत, आ ओ घेराबा तोड़बाक प्रयास करत—एहि विश्वासमे मृत्यु व्यक्तिगत अन्त नहि, सीखक कठिन परिवर्तन बनैत अछि। ‘मारि देबै तँ मारि दियौ’क चुनौती संग पद्य चेतबैत अछि जे एक व्यक्तिक संग बहुत वस्तु मरि सकैत अछि, मुदा प्रेमक साधक युगल आ प्रयाण पूर्णतः रुकत नहि।

चतुरहस्त

पहिल युगल-नृत्यक चतुरहस्त, सनगोहिक चामसँ छारल डफ-खजुरी, डोरीक कम्पन आ ‘गुमकी’ ध्वनिसँ पद्य निर्णयक रंगमंच रचैत अछि। सत्य आ झूठक फैसला स्थिर तर्क-वाक्य रूपेँ नहि, हस्त-संचालन, ताल आ ध्वनिक बीच घटैत अछि। पहिल नृत्यक बाद रक्तबीजी सभक ‘शिखरहस्त’ आरम्भ होएबाक संकेत संघर्षकेँ अगिला, पैघ आ पर्वत-शिखर सन रूप दिस लऽ जाइत अछि।

बुढ़िया डाही

कमल-मृणालसँ भरल ‘बुढ़िया डाही’ पहिने प्रेमक कमलदह अछि, मुदा सर्जन रोकबाक धमकी, देह तोड़बाक हिंसा, ईर्ष्या आ अत्याचारी धारक बिम्ब धीरे-धीरे एकरा संघर्षक स्थल बनबैत अछि। पद्य हारि मानबाक बदला एहन हारिक कल्पना करैत अछि जे लोक देखय आ रक्तक प्रत्येक ठोप नव बीआ बनि उठय। अन्ततः घृणाक तरहरिमे सेहो कमल फुलैत अछि; जकरा ‘बुढ़िया डाही’ कहि तिरस्कृत कएल गेल, ओहि स्त्रीक मृत्यु-पाछाँ प्रेमक फूल ओकर नाम पुनः ग्रहण करैत अछि।

आ तखन, फैसला हेतै आब

लोक आ बोल दुनू छने-छन उनटि जाइत छथि; मधुर वाणी सेहो बिखाह बनि सकैत अछि। एहन बदलैत बोलीक बीच वक्ता स्मृतिकेँ ‘गोबरझार दऽ’ चमकाबय चाहैत छथि ताकि पुरान द्वेष फेर पहिचानल जा सकय। बुढ़िया डाही, रक्तबीज आ सहस्रबाढ़निक बिम्ब सँ पद्य ई चेतबैत अछि जे आक्रमण दमनकेँ समाप्त नहि, कतेको बेर ओकर बीआ बढ़ा सकैत अछि; फैसला तखन संकल्प आ इच्छाक धार रोकबाक हिस्सक पर टिकैत अछि।

जँ विश्वास कऽ ली अहाँपर, ऐ प्रकृतिपर

प्रकृतिपर पूर्ण विश्वास कऽ लेला पर सत्य ताकब सहज बुझाइत अछि, मुदा आश्वासन सीमा पार करिते शंका फेर घेरि लैत अछि। प्रश्न-प्रतिप्रश्नमे एक सत्य अनेक रूप धारण करैत अछि, आ ‘खोंइचा’ पर खोंइचा उघारला पर प्रत्येक स्पष्टता पाछाँ आर पातर परत उभरैत अछि। पुरान-नव दृश्य अपन-अपन अक्षपर बढ़ि काटैत-मिलैत नव सत्य जन्मबैत अछि; पद्य सत्यकेँ एक बेर भेटि जाएबला स्थिर वस्तु नहि, बदलैत दृष्टि आ निरन्तर अनावरणक प्रक्रिया बनबैत अछि।

घड़ी पूजा

घड़ी पाबनि, धर्मराजक भगवती घर, खीर-पूड़ीक पातरि, बालापीरक आँगन-पूजा, दरगाह, उर्स, कबीर-सतसंग आ व्रात्य-बिम्ब एकहि दीर्घ पद्यमे परस्पर लग राखल गेल अछि। वक्ता बारम्बार पूछैत छथि—‘घड़ी पूजा कोन पूजा?’—आ यज्ञ, योग, मीमांसा, तर्क, सांख्य, ब्राह्मण्य, बौद्ध, गुरु, देवता आ आत्म-जिम्माक भेद खोलैत छथि। पद्यक केन्द्र कोनो एक पूजा-पद्धतिक घोषणा नहि, अपन घर-गाममे सहअस्तित्व रखैत अनुष्ठानसभक कारण, परत आ रहस्य स्वयं ताकबाक जिज्ञासा अछि।

नाराशंसी

नाराशंसी एक दीर्घ, बहुपरत पद्य अछि जतय माटि, नदी, जाल, विलुप्त गाछी, कमलाक रेत, सूगाक स्वर, गायत्री, पाणिनि, विद्युत् आ शरीरक रक्त-नाड़ी एकहि प्रवाहमे मिज्झर होइत अछि। कविताक छन्द-रसकेँ विश्वदेव द्वारा रोकि राखबाक कल्पना फेर गायत्रीक चिड़ै-रूप, जागृत वाणी आ इला-सरस्वती-भारतीक बिम्बसँ खुलैत अछि। प्रकृति आ शरीर, मिथक आ अनुभव, काव्य आ ज्ञान—सभक धार परस्पर उगडुम करैत अछि; अन्तिम आवर्तन कविताक रसक ‘बलि’ आ नाराशंसी गानक विरोधाभासकेँ फेर सामने आनैत अछि।

निगदति कुसुमपुरेऽभ्यर्चितं ज्ञानम्

आर्यभटक कुसुमपुर, पृथ्वी-सूर्य-चन्द्रक नाप, गतिमान पृथ्वी आ ग्रहणकेँ छाह रूपेँ बुझबाक उल्लेख आधुनिक चन्द्रयान आ श्रीहरिकोटाक वैज्ञानिक प्रयत्नसँ जोड़ल गेल अछि। ‘पंद्रह सय साल पाछाँ सेहो तँ की’ कहि पद्य समयक दूरीकेँ ज्ञानक विच्छेद नहि, पुनःजुड़ाव रूपेँ देखैत अछि। प्राचीन गणितीय-सांस्कृतिक स्मृति आ आधुनिक अन्तरिक्ष-विज्ञान एकहि पंक्तिक दुई छोर बनैत अछि; स्रोत एहि तुलनाक काव्यात्मक रूप प्रस्तुत करैत अछि, बाहरी ऐतिहासिक सत्यापन नहि।

सपना

डरओन सपना निन्न तोड़ैत अछि, मुदा जागरणो प्रश्न समाप्त नहि करैत। जगत्‌क जन्म, प्रथम कारण, ईश्वरक शाश्वत स्वरूप आ ‘निर्माताक निर्माता’ जकाँ गिरह मोन-छातीक धकधकी बढ़बैत अछि। मनुष्य अपन काज स्वयं करैत रहितो भाग्यराजक कठपुतली कहैत अछि—ई विरोधाभास पद्यकेँ नियति आ जिम्मेवारीक बीच राखैत अछि। अन्तमे सपना सुन्दर वा भयावह कोनो निश्चित रूप नहि लैत; निन्न फेर अबैत अछि, मुदा प्रश्न अनुत्तरित रहैत अछि।

चुप्पीक अपन बोली

सत्य, आत्मा, संसार आ मोक्षक शब्द दोसरक पीड़ासँ न जुड़ला पर भीतरक गिट्ठऽ नहि खोलि पबैत—एहि बोधसँ वक्ता ‘बाजलो नहि गेल’ किछु सुनय चाहैत छथि। गहींर निन्नमे अपन नाम छूटि जाएब आ निराउ निन्नसँ खाली तरहत्थी घुरब अन्तक डरकेँ बदलैत अछि। जीवनक अन्त स्वयं चुनबाक प्रश्न उठैत अछि, मुदा पद्य स्पष्ट कहैत अछि जे प्रश्न उठब उत्तर भेटब नहि होइए; वर्तमान निष्कर्ष एतबे अछि जे जागल साँस अखन उपलब्ध अछि आ ओकरा सुनबाक लेल किछु काल चुप रहब।

स्मृति-भय

नगरक कोलाहलमे बिसरल स्मृतिसँ आरम्भ ई विस्तृत पद्य दर्शन, विज्ञान, सृष्टि, सप्तऋषि, दशावतार, आर्यभट्टीय, लीलावती, भामती, ग्रहण, चौपड़ आ गामक खेल धरि निरन्तर प्रश्न फैलाबैत अछि। वक्ता कर्ता-धर्ताक अन्तिम छोर खोजैत-खोजैत पबैत छथि जे दर्शन जतय अनुत्तरित अछि, विज्ञान किछु समाधान दैत अछि, आ विज्ञान जतय रुकैत अछि, दर्शन फेर प्रश्न खोलैत अछि। स्मृति-भय अन्ततः बन्द बुद्धि-विवेक खोलबाक प्रेरणा बनैत अछि: जे अज्ञात अछि ओकर खोज हो, मुदा जे ज्ञात अछि ओकर हिसाब सेहो हो—अनुत्तरित प्रश्नकेँ जबरदस्ती उत्तरमे बदलबाक आवश्यकता नहि।

वादक सम्बल अर्थहीन

विकराल जाड़क राति, गरजैत मेघ, इन्द्र, कवष ऐलूषक ऋक्, विद्युत्-रेख आ दू दिशामे उड़ैत सूगाक बिम्ब वाद-विवादक आरोह-अवरोह रचैत अछि। मुदा पद्यक निर्णायक मोड़ दार्शनिक अथवा मिथकीय उत्कर्ष नहि, ‘अर्थहीन सामाजिकता’ आ भूखक कठोर धरातल अछि। वादक सम्बल द्युलोक दिस जाए वा पृथ्वी दिस घुरि आबय, भोर-दर-भोर घटैत देह अन्ततः बिलाइत अछि; एहि प्रकार अमूर्त विवादक अर्थ सामाजिक भूख आ नश्वर जीवनक सोझाँ परखाइत अछि।

क्षणक अछोर

एखुनका बात लिखिते बीतल बनि जाइत अछि, विचार अनुभवक पाछाँ दौगैत रहैत अछि, आ रूपकेँ नाम देब तथा नाम लऽ फेर रूप ताकबक आवागमनमे किछु अनकहल बचि जाइत अछि। पवन खसल पातकेँ क्षणभरि ऊपर उठा दैत अछि; वक्ता ओकर उठबो आ खसबो देखैत छथि, मुदा तुरन्त निष्कर्ष नहि गढ़ैत। पद्य ज्ञानक सीमाकेँ असफलता नहि, सावधानीक कारण बनबैत अछि—अनुभव हिसाबसँ बाहर बचि सकैत अछि, तेँ देखल घटनाक बीच अपन निष्कर्ष रोकि लेब सेहो बोधक एक रूप अछि।

चमत्कारक पोथी

चेतना, इन्द्रिय, संख्या ‘एक’, जीवात्मा-परमात्मा, साक्षी आ मनक धारणा पर तर्क उठैत अछि, मुदा प्रत्येक विचारक पन्ना बाद एकटा अनुभव अखनो अपूर्ण रहि जाइत अछि। मंचक अद्भुत शक्तिपर भीड़ ताली बजबैत अछि, जबकि रोज आँखिक सोझाँ पल्लव फूटबाक चमत्कार अनदेखल रहैत अछि। रंग, गन्ध आ स्मृति एक-दोसराक बाट छुबैत अछि, तथापि वक्ता एहि अनुभवकेँ ‘समुच्चा जानि लेबाक प्रमाण’ नहि बनबैत। अन्तमे पोथी समेटि प्रश्न फेर अपन दिस घुरैत अछि, आ बच्चाक जीवित जिज्ञासा ज्ञानक विनम्र मर्यादा बनि रहैत अछि।

विचारक विराम

मनक बतकही थमिते दुःखक असल अबाज सुनाइ पड़ैत अछि; कविता कखनो सान्त्वना दैत अछि, कखनो सुतल चोट जगा दैत अछि। वक्ता मानैत छथि जे अपन बुझाइमे अपनहि छाह पड़ैत अछि, आ दूर ताराक पुरान उजास तथा पएर लग वर्तमान घासक कम्पन एकहि आँखिमे पैसि जाइत अछि। मुख, मुस्की, विचार आ ओकर जनम देनिहारकेँ अलग करबाक कठिनाइ सँ प्रश्न आत्मा आ काल धरि पहुँचैत अछि: जँ आत्मा कालातीत मानल जाए, तँ जन्मक गिनती ओकरापर कोना चलत? घड़ी देहक समय लिखैत रहैत अछि, मुदा भीतरक साक्षी खुलल प्रश्न बनल रहैत अछि।

भयक पकड़ ढील होइत

मृत्युक नाम सुनि भीतर सिकुड़ैत भय सँ भागबाक बदला वक्ता अपन अस्थिर देह स्वीकारि ओहि भयक संग किछु बेर बैसैत छथि। आत्मबोध केवल नव शब्द वा घोषणा रहला पर कम्पन शान्त नहि होयत; तेँ ओ एहन अनुभव खोजैत छथि जाहिमे मन अपनाकेँ देखय। देखनिहार आ देखल बातक बीच कने ठाम बनिते साँस खुजैत अछि। अन्तक तारीख अज्ञात रहैत अछि, मुदा ओकर कल्पनाक बन्हन कने ढील होइत अछि—पद्य मुक्ति घोषित नहि करैत, भयक पकड़ घटबाक सूक्ष्म अनुभव दर्ज करैत अछि।

कलहक अभ्यास

इतिहासक झगड़ा आ मनक भीतरक कलहसँ पद्य प्रश्न करैत अछि जे शान्ति केवल युद्ध रुकब अछि कि अपन दैनन्दिन कठोरता चिन्हब सेहो। आँगनक दाना पर चिड़ै, माटिक सूक्ष्म जीव आ अनजान पएरसँ उजड़ि सकैत छोट जीवन ‘पैघक सहज गति’ केँ दोसरक विपत्ति बनबैत देखबैत अछि। बुद्धक शान्त चित्र टाँगि देब पर्याप्त नहि; अगिला बेर अपन कठोर व्यवहार दोहराएब रोकबाक अभ्यास चाही। भिन्न रूप आ भिन्न प्राण-अभिलाषा बीच सम्बन्ध सीखब पद्यक नैतिक केन्द्र अछि।

अपन परिचयक खाली ठाम

नाम, पद आ घरक ठेकान हटला पाछाँ ‘हम के रहब’ प्रश्नसँ पद्य अपन परिचयक खाली कोठा खोलैत अछि। अनचिन्हारक पियास, अपमानक स्मृति, विजयक अर्थ, दोसराक सुख आ अपन दुखक माप शान्तिकेँ बाहरी युद्ध-विरामसँ आगू लऽ जाइत अछि। बादक विस्तारमे लोक देल उपाधि, प्रशंसा-निन्दा, इच्छा-विवेक, जाति, निकटता, देहक चाह, असहमति आ कब्जाक प्रश्न जुड़ैत अछि। प्रेम एतय दोसराकेँ अपन साँचे ढालब नहि; ओकर इच्छा, असहमति आ स्वतंत्र विस्तारकेँ ठाम देब तथा ओहि खुलापनक रोज देखभाल करब दायित्व बनैत अछि।

घड़ीक बाहरी किनार

घड़ीक टिक-टिक सुनि वक्ता पूछैत छथि जे समयक माप आरम्भ कतय भेल। घटना सँ घटना धरि तनल डोरीकेँ अवधि कहल जाइत अछि, मुदा मापनिहार स्वयं ओहि डोरीमे बान्हल अछि; समुच्चा समयकेँ बाहरसँ के देखत? पोथी आ ऋषि कालातीत अनुभवक अनेक नक्शा दैत छथि, पर ओकरा नापबाक यन्त्र नहि भेटैत। क्षण गनैत हाथ रुकिते ज्ञान अपन मापक मर्यादा देखैत अछि, आ असीमक प्रश्न फेर नव रूपेँ उठैत अछि।

एतहि खोज

पवित्र दिनक प्रतीक्षा करैत साधारण दिन गमाबयब बदला वक्ता आइक साधारण दिनमे जिम्मा नीकसँ निभेब, ककरो बात पूरा सुनब आ व्यवहारकेँ खोजक धरातल बनबैत छथि। गंभीर स्वरमे सुनाओल ‘परम सत्य’ केवल स्वरक वजनसँ मान्य नहि; प्रश्न ई जे खोजल सत्य अपन आचरणसँ कतेक दूर अछि। ईश्वरक उपस्थिति मानल जाए तँ लगक जीवित मनुष्यकेँ अनदेखल कोना कएल जा सकैत अछि? भीतरक करुणा आ बाहरक पुकार एके ठाम रोकैत अछि; स्वर्गक अर्थ एतहि व्यवहारमे कने-कने उतरैत अछि।

प्राणक गवाही

पशुकेँ यन्त्र मानबाक विचारक सोझाँ आँगनक घायल जीवक कष्ट ठाढ़ अछि, जकर उत्तर दार्शनिक परिभाषा नहि, सहायता माँगैत अछि। मनुष्य अपन विशेष अधिकार लिखि दोसर प्राणक अबाज छोट करैत अछि कि नहि—ई प्रश्न सेवा लेबाक उपयोगिताकेँ जीवनक ऊँच-नीच बनबासँ रोकैत अछि। कल्पना एखन नहि बनल वस्तुक रूप पहिने मनमे रचैत अछि, मुदा ओकरा साकार करबाक श्रम अलग अछि। आत्मन् आ ब्रह्मक विचार उठिते परिचित सीमापर फेर सन्देह होइत अछि: जकरा अछोर मानल गेल, ओकर अंश काटि अलग रखबाक दावेपर पद्य प्रश्न करैत अछि।

शब्दशास्त्रम्

बच्चा पहिल बेर नाम लैत अछि तखन घरक कोन चिन्हार बनैत अछि; अबाज सम्बन्ध जुड़िते बोल बनैत अछि। ‘सृष्टिक आरम्भमे वाणी’ आ शब्द-ब्रह्मक धारणा प्रश्न उठबैत अछि जे नाम जगत बनबैत अछि कि बनल जगतकेँ चिन्हबाक साधन अछि। ॐक उच्चार, श्वास आ मौनक गूँज भाषा केँ साधारण औजारसँ पैघ स्थान दैत अछि, मुदा पद्य अन्ततः ओहि अनुभवक अस्तित्वक प्रश्न बचा रखैत अछि जे बोलमे नहि अँटैत।

अपन दाबीक सोझाँ

अपन महिमाक कथा कहैत-कहैत अपन भूल दबा देबाक प्रवृत्तिपर ई छोट पद्य सीधा दृष्टि दैत अछि। एके हाथ सहारा देओ आ चोट सेहो पहुँचा सकैत अछि; एहि विरोधकेँ मानब लाज नहि, आत्मालोचनक आरम्भ अछि। अपन अज्ञान स्वीकारिते सुधारक पहिल ठाम खुलैत अछि—पद्य आत्म-प्रशंसाक बदला अपन दावीक सोझाँ स्वयंकेँ परखबाक आग्रह करैत अछि।

माया-अविद्या

आँखिक पर्दा केवल बाहरक दृश्य नहि, अपन लोभ आ दोसराक आवश्यकताकेँ बाधा बुझबाक वृत्तियो झाँपैत अछि। पर्दा कने हटिते दोसर मनुष्यक बच्चा, घर आ चिन्ता अपन जकाँ देखाइत अछि; तखन ओकर हारमे अपन लाभ खोजब कठिन होइत अछि। मतभेद आ क्रोध रहि सकैत अछि, मुदा नष्ट करबाक आग्रह छोड़ल जा सकैत अछि। पद्य शान्तिकेँ उत्सवक भाषण नहि, रोजक छोट निर्णयमे बसैत नैतिक अभ्यास बनबैत अछि।

चिन्तक

‘खालीपनक बदला ई भरल संसार किए’ प्रश्न लऽ वक्ता अनेक उत्तरदाता लग जाइत छथि, मुदा कथा आ पोथी समाप्त भेला पाछाँ प्रश्न रहि जाइत अछि। एक चिन्तक भेद खोलैत छथि: घटनाक पहिल तारीख जानब आ अपन एतय होएबाक अर्थ बुझब दुई भिन्न प्रश्न अछि, जिनका एकहि उत्तरमे दबाओल नहि जा सकैत। बाहरक क्रमक अपन खोज अछि, भीतरक अनुभवक अपन अभ्यास। उत्तरक हड़बड़ी घटिते अजाना चुपचाप उपस्थित रहि सकैत अछि, आ वक्ता प्रश्न संगहि जीवनक काजक बीच घुरैत छथि।

बीतैत दिनक संग

पुरान घरक बर्ख-निशान आ आइ खेलैत बच्चाक बीच पद्य कहैत अछि जे जीवन केवल आरम्भ-अन्तक तारीखक अन्तर नहि। स्मृति, बिसरनाइ, नाम, रस्ता आ परिचय बदलैत रहैत अछि; आत्मबोधमे कालक पकड़ छुटबाक सम्भावना खोज रूपेँ उपस्थित अछि, दावा रूपेँ नहि। जन्मक पहिनेक वा अन्तक पाछाँक प्रश्न एखनक साँस नहि छीनय—काज, सम्बन्ध आ क्षणक आनन्दकेँ पूरा जीब पद्यक व्यावहारिक उत्तर बनैत अछि।

देहक देहरी

धरतीक कठोरता, चामपर हवा, भुख, स्वाद आ चिन्ताक बदलैत अनुभव देहकेँ संसारक निरन्तर समाचारवाहक बनबैत अछि। मनुष्य प्रायः पीड़ा उठलापर मात्र देहक सुधि लैत अछि, मुदा पद्य विश्राम, भोजन, चलब आ स्नेहक छोट देखभालकेँ साधनाक विपरीत नहि मानैत। जागरण वा आत्मबोधक खोज सेहो एहि जीवित देहक आधारपर ठाढ़ अछि; तें देहक उपेक्षा आध्यात्मिक उन्नतिक आवश्यक शर्त नहि ठहरैत।

चिन्हब आ बुझब

वर्षक परिचय वा नाम-मुखक स्मृति ककरो चुप्पीक कारण बुझबाक समान नहि; एहि व्यक्तिगत उदाहरणसँ पद्य जगत्‌क ज्ञानपर पहुँचैत अछि। ‘एना पहिनेसँ चलि अबैए’ कहला मात्रसँ कोनो बात सत्य नहि भऽ जाइत, आ हाथक छोट पाथर सेहो अपन बनबाक अनेक अज्ञात कथा राखैत अछि। बीतल अनुभव आ अगिला अनुमान वर्तमान दृष्टिकेँ रंगैत अछि; ओहि रंगकेँ चिन्हब न्यायपूर्ण देखबाक आरम्भ अछि। अन्तिम पंक्ति मुक्ति केँ बाहरसँ देल वरदान नहि, अपन मान्यताक गाँठि स्वयं खोलबाक श्रम बनबैत अछि।

डीह

पुरखाक पएर, घरक चौखट, ग्रामदेवक दीप, अन्न, श्रम आ स्मृति एकहि डीहमे जुड़ैत अछि। धरतीकेँ भगवती कहि प्रणाम करब तखने जीवनमय अर्थ पबैत अछि जखन ओकर जल-माटिक सुधि सेहो लेल जाए। घराड़ी सँ समुच्चा पृथ्वी धरि सम्बन्ध निभेबाक आग्रह पूजा केँ केवल अनुष्ठान नहि, भूमि आ जीवनक देखभालक व्यवहार बनबैत अछि।

मनुक्ख

एक स्वर मनुष्यसँ प्रश्न करैत अछि जे ओ अपन लेल सर्वोच्च आसन राखि आन प्राणकेँ नीचाँ किएक बैसाबैत अछि। भाषा भिन्न होइतहुँ भुख, भय आ आरामक अनुभव साझा अछि, आ जीवनक प्रमाण मनुष्यक पोथीमे लिखल होएब जरूरी नहि। जन्म, धन, विद्या, बल आ निरोग देह सुखक साधन भऽ सकैत अछि, मुदा सम्पूर्ण सुख नहि; उपलब्धि केवल अपने धरि घेरल रहला पर ओकर रक्षा भय बनैत अछि। आनक जीवन नीक भेला पर आनन्द अपन सीमासँ बाहर फैलैत अछि, आ जीतक अर्थ दमनसँ हलुकपन दिस बदलैत अछि।

अन्तक प्रश्न, आइक दिन

कलेन्डरक पन्ना पलटैत रहत आ एक दिन ओकरा पलटाबय वाला हाथ नहि रहत—मुदा मृत्यु-बोध आइक उत्तरदायित्वकेँ समाप्त नहि करैत। अपन असल स्वरूपकेँ कालातीत मानबाक विचार मृत्यु दिस देखबाक दोसर दृष्टि दैत अछि, पर वर्तमान जीवनसँ मुँह मोड़बाक बहाना नहि। दिन सीमित अछि, आ एहि सीमित दिनमे व्यवहारक अर्थ चुनल जा सकैत अछि; पद्य अन्तक प्रश्नकेँ आइक काज आ प्रभावक जिम्मासँ जोड़ि समाप्त होइत अछि।

स्वप्नमे मिज्झर होइत

स्वप्न आ जागृत अनुभव एतेक मिज्झर होइत अछि जे घटनामे के छल, कोन अवस्था ‘जागल’ छल आ दृष्टिक अक्ष एक-दोसराकेँ कतय काटैत अछि—सभ प्रश्न बनि जाइत अछि। एहि अनुभव-पहेली पाछाँ पद्य हरिश्चन्द्र, वरुण, रोहित, अजीगर्त, शुनःशेप, विश्वामित्र आ यज्ञक विस्तृत आख्यान खोलैत अछि। आख्यानक उद्देश्य केवल कथा सुनाएब नहि; वक्ता ‘प्राश्निक’ बनि श्रोता सँ पूछैत छथि—शुनःशेपकेँ देल गेल बात मृत्युदण्ड छल कि बलि? एहि प्रश्नसँ भाषा, प्रसंग, हिंसा आ व्याख्याक भेद परखल जाइत अछि। स्रोत एहि आख्यानकेँ पद्यक भीतर परीक्षा-सामग्री रूपेँ मंचित करैत अछि; तें सारांश बाहरी ऐतिहासिक निष्कर्ष नहि जोड़ैत, कविताक अपन प्रश्न खुलल रखैत अछि।

स्थितप्रज्ञतामे लिबैत सत्य!

वक्ता पुलसँ पानिमे खसि मरल मजूरसभक स्मृति उठबैत छथि: स्रोतक पद्यमे पचास मृत्यु, केवल दसक रिपोर्ट आ चालीसक क्षतिपूर्ति नेता-ठेकेदार-अफसरक गठजोड़मे खाइ जाएबाक आरोप अछि। एहि अन्यायक सोझाँ सत्य, कर्तव्य, स्वतन्त्रता आ समृद्धिक अर्थ पर प्रश्न उठैत अछि—स्वार्थक आगाँ शिक्षा बदलि देब कि जिद्दीसँ सत्यक बाटे चलब? खलनायकक महिमामण्डन देखितो वक्ता बाट छोड़बाक बदला कार्य जारी रखबाक निर्णय करैत छथि। अन्तिम आत्म-संशोधन महत्त्वपूर्ण अछि: जेकरा पहिने स्थितप्रज्ञतामे ‘लिबनाइ’ बुझल गेल छल, ओकरा आब नम्रता रूपेँ चिन्हल जाइत अछि।

ई जिनगी कोनो बेजाय नै अछि

कागचक पन्नापर नव राग आ विलम्बक पाछाँक हृदय-संग्रामसँ पद्य बिनु तारतम्य चलैत जीवनमे फेर सुर भेटबाक क्षण पकड़ैत अछि। हारलापर पाछाँ घुरि देखनिहार स्वर बुझैत अछि जे ई जीवन ‘कोनो बेजाय’ नहि—दुत्कारल कुकुड़केँ सेहो ऐंठ-कूठ किछु भेटैत रहबाक घरेलू बिम्ब एहि स्वीकारकेँ अलंकृत आदर्श नहि, साधारण जीवट बनबैत अछि। पद्य पराजय नकारैत नहि; ओकर भीतर सेहो जीवनक चलैत राग सुनबाक सम्भावना देखैत अछि।

महत्वाकांक्षा

आकाशमे उड़ैत गुड्डी महत्वाकांक्षाक बिम्ब अछि, जबकि शीस बूकल मंझा प्रतियोगिताक धार बनैत अछि। दोसर चित्रपतङ्ग कटिते वास्तविक धरती फेर सामने अबैत अछि: उड़ान जतयसँ शुरू भेल, अन्ततः ओतहि खतम भऽ सकैत अछि। पद्य उड़बाक स्मृति आ उठैत क्षणक संग एक छोट मुदा अनुत्तरित प्रश्न छोड़ैत अछि—खसैत कालक स्मृति केहन? महत्वाकांक्षा एतय केवल ऊँचाइ नहि, प्रतिस्पर्धा, कटान आ अवरोहक अनुभव सेहो अछि।

ओकरा हँसैत देखि जे आबि जाइ छौ तोरा नोर

जे व्यक्ति हारलापर सेहो हँसि आगू बढ़ि रहल अछि, ओकर हँसी देखि दोसराक आँखि नोरा जाइत अछि। पद्य स्पष्ट करैत अछि जे पराजित व्यक्तिक प्रयास अधूर वा बेइमान नहि छल; ओ हारि गेल, मुदा हँसी अपन दुःख नुकाबय मात्र नहि, दोसराकेँ अपराध-बोधसँ मुक्त करबाक उपहार सेहो बनैत अछि। ‘तोरा दुआरे ओकर हारि नै भेलै’ कहि दोषक भार हटाओल जाइत अछि, आ अन्तमे पहिने गप काटैत रहनिहारकेँ आब बिना बाधा सुनबाक कठिन अभ्यास देल जाइत अछि। हारि, स्वतन्त्रता आ सुननाइ एकहि भावनात्मक परिवर्तनमे जुड़ैत अछि।

04 / विभाग

खण्ड ३ — ओस, देहरी आ घरक नेह

ओस, देहरी, घाट, चिरै, बादल, बच्चाक रेखा आ घरेलू वस्तुसँ ज्ञानमीमांसाक सूक्ष्म प्रश्न उठैत अछि। देखब, सुनब, स्मरण, आशा, चिन्ह, प्रतिबिम्ब आ शब्दक अलग-अलग बल पहिचानल जाइत अछि, नेहकेँ प्रमाणक बदला बनौने बिना।

25 स्रोत-रेकर्ड

खण्ड ३ — ओस, देहरी आ घरक नेह

एहि खण्डमे ओस, देहरी, आँगन, माटि, चिट्ठी, बच्चाक चित्र, बोली, पानि, मेघ, गीत आ घरक साधारण वस्तुसभ ज्ञान आ नेहक कसौटी बनैत अछि। अनुभवकेँ अपन मनक भावसँ जबरदस्ती एक नहि मानि, देखल-सुनल-छुअल बातक सीमा चिन्हबाक प्रवृत्ति बारम्बार लौटैत अछि। घर एतय बन्द सीमा नहि; दूरी, अनचिन्ह ठाम, दोसर दृष्टि आ भाषा भीतर प्रवेश करैत अछि, जबकि देहरी अपन जड़ि, स्मृति आ सम्बन्धक पुनःचिन्हान बनल रहैत अछि। खण्डक गति घरेलू आत्मीयताकेँ बौद्धिक सावधानीक संग जोड़ैत अछि।

देहरीक ओहि पार

भोरक ओससँ भीजल देहरी, दूब, माटि, हवा आ फूलक लाली वक्ताकेँ ई अनुभव दैत अछि जे प्रकृति हुनकर सपना वा दृष्टिक प्रतीक्षामे नहि रहैत—आँखि मूनला पर गाछ नुका नहि जाइत, केवल देखब थम्हैत अछि। फूलक लाली आ मनक हुलास एक-दोसर लग रहि सकैत अछि, मुदा दुनू एक नहि। दूर गेल प्रिय व्यक्तिक संग दूरीक डोरीमे नेहक गाँठि अछि; दिनक अन्तमे धूरा लागल पएर फेर देहरी छुबैत अछि, आ एक मुट्ठी माटिक ठोसपन अनुत्तरित प्रश्नसभक बीच घरक मौन सङ्ग बनैत अछि।

अनचिन्ह घाटक नेह

प्रिय व्यक्तिक चिट्ठी दूरक एहन घाट मनमे खोलैत अछि जतय वक्ताक पएर कहियो नहि पड़ल, जबकि अपन पोखरिक पानि हथेलीपर प्रत्यक्ष शीतलता दैत अछि। पानिक चमककेँ चान बुझबाक भूल देखबैत अछि जे पानि साँच रहि सकैत अछि, जोड़ल निष्कर्ष गलत होइत अछि। काल्हुक हिलकोरि फेर आबत कि नहि, पोखरि कोनो बचन नहि दैत; तें वक्ता आसक नाव खोलैत छथि, मुदा शंकाक बाँस किनारपर रखैत छथि। प्रत्यक्ष छुअन आ चिट्ठीक बोल अलग बाट होइतहुँ दुनू नेहक एक सम्बन्ध बनबैत अछि।

बोलीक चिरै

नन्हका बच्चाक भीतपर बनाओल नाव, नील धार आ घर अनभेल यात्राकेँ चित्रमे सम्भव बनबैत अछि; वास्तविक नाव डूबल नहि, घर भीजल नहि, मुदा मनमे हिलकोरि उठैत अछि। आँगनमे ‘आउ’ एक बेर पाहुनक निमन्त्रण, दोसर बेर मायक सटेब, खेलमे पुकार वा साँझक विनती बनैत अछि; ‘पानि’ सेहो माँग वा चेतावनी भऽ सकैत अछि। अर्थ शब्दक ओठपर स्थिर नहि, प्रसंग आ हाथ-दर-हाथ सम्बन्धमे चलैत अछि। अन्तमे सुतल बच्चाक माथपर हथेली रखबाक लेल कोनो वाक्य आवश्यक नहि—बोलीक चिरै पाँखि समेटैत अछि, नेह जागल रहैत अछि।

मेघक पएरक चिन्ह

भोरक काँच माटिमे बूँदक गड़हा, पातपर अटकल पानि आ टपकैत छप्पर रातिक बरखाक चिन्ह दैत अछि; मेघक पएर प्रत्यक्ष नहि देखल गेल, मुदा ओकर बीतल बाट चिन्हसँ अनुमानित होइत अछि। जतय चिन्ह नहि, ओतय वक्ता अनुमान रोकि लैत छथि, आ पुरबा बहलासँ अगिला बरखाक निश्चय नहि करैत। बच्चाक ‘सुन्नर!’ कहब बूँदक गिनती नहि, मनक उमाह अछि; काँपैत चिड़ै देखि ‘बचाउ’ तथ्य-वचन नहि, करुण पुकार अछि। पद्य जाँचल बातक उजास आ भावात्मक वचनक गरमी दुनूक अलग कार्य चिन्हैत अछि।

अँगुरीमे बसल गीत

माए सिक्कीक डलिया बुनैत छथि, आ बच्चा हुनकर मन कतय अछि से खोजैत-खोजैत जतन, टेढ़ किनार सोझराएब आ छुटल तिनका फेर सटेबाक अँगुरीमे मनक रूप देखैत अछि। सिक्की कतय उगैत-कटैत अछि जानलापर सेहो बुनबाक पहिल घेरा हाथसँ छूटैत अछि; दू दिन लग बैसलाक बाद अँगुरी बाट पकड़ैत अछि। सीख पहिने पूरा गप्प बनि माथमे नहि बसैत, अभ्याससँ देहमे जड़ि पसरैत अछि। आइ माए लग नहि छथि, मुदा बच्चा तिनका छिटकबैत अछि तखन वक्ता हँसि फेर बटोरैत छथि—मायक मन बाहरी कोठरीमे नहि, अपन धीरज आ हाथक गीतमे जीवित भेटैत अछि।

पलकक ओहि पार

राति चलि गेलापर सेहो आँखिक कोनमे डर भोर संग नहि उठैत; वक्ता ओकरा सँ भागबाक बदला लग बैसि देखैत छथि। कतेक दोसराक कहल बात अपन नामसँ दोहराओल, कतेक पुरान आहटिक पाछाँ बिनु देखनहि दौड़ल—ई आत्मपरीक्षण प्रश्न उठबैत अछि जे काँपैत पएर आखिर ककर। सपनामे डूबल गाम जागलापर आँगनमे सुरक्षित अछि, आ दिनक भार निन्नमे कतय गेल से सेहो अनुत्तरित अछि। कोनो विराट उत्तर नहि अबैत; केवल कसि पकड़ल एक गाँठि अँगुरीक भीतर ढील होइत अछि, आ बाहर तकिते देहरी पहिनहिसँ खुलल देखाइत अछि।

अँजुरीसँ आगाँ

पोखरिक कात नेना अँजुरीमे अकास उठबैत अछि, मुदा घर लऽ जाइत पानि अँगुरीसँ चुबि जाइत अछि; हाथ पसारिते अकास ओतहि भरल भेटैत अछि। वक्ता दिनक हिसाब, तारा आ भण्डार भरैत छथि, मुदा भरलापनक संग नव भूख जागैत अछि—तृप्ति कतय? दूर प्रिय स्वर खोजैत-खोजैत अपन कठोरता बिसरबाक अनुभव हुनका ‘सभ जनैत छी’क दावा छोड़बैत अछि। जतय बुझब ठमकि जाए, ओतय अनचिन्हकेँ भगाएब नहि, सिनेहक आसन देब; खाली अँजुरी अभाव नहि, भोर उतरबाक खुलल ठाम बनैत अछि।

पएरक अपन बाट

बाबाक पुरान जुत्ता पहिरि परिचित बाटपर निकलल वक्ताक एड़ी छिलैत अछि; जुत्ता उतारि हाथमे लेते माटि अपन पएरक नाप बुझैत अछि। चौकपर सभ जइ दिशा चलय कहैत अछि, मुदा बीच सड़क घायल चिड़ै देखि हुनकर बाट ओतहि मुड़ि जाइत अछि आ हथेली घोसला बनैत अछि। दूरक पानि लग पहुँचला पर बालू भेटैत, पियास आ थकान सच रहैत अछि; आँखि सेहो यात्रामे सीखैत अछि। साँझ धरि ने झण्डा अछि ने विजय-घोषणा—चिड़ै उड़ि गेल, पएरमे माटि अछि, आ घर घुरि बुझाइत अछि जे बाट बाहरहि नहि, भीतर सेहो खुलैत अछि।

बोलक भीतर बसात

मायक दूरक ‘आउ’ शब्दमे भातक गमक, अँचराक गरमी आ दिनभरिक प्रतीक्षा एकहि बेर घरकेँ छातीमे उतारैत अछि—अक्षर गननाइ ओकर पूरा अर्थ नहि पकड़ि सकैत। टूटल बाँसक अलग फाँकमे गीत नहि, मुदा साँस छुलिते खाली ठामसभ मिलि सुर बनैत अछि। अन्हारमे मनुष्य बुझल आकृति लग जा भीजल कपड़ा भेटैत अछि आ डरक चेहरा झरि पड़ैत अछि। एहि अनुभव पाछाँ वक्ता बोलबाक पहिने ठहरैत छथि, जे वाक्यमे नहि अँटैत ओकरो ठाम छोड़ैत छथि; प्रिय आँखि चुप्पीक बचल गमक बुझि लैत अछि।

सभक लेल पाँति

भोजक पाँति आँगनमे बिछल अछि, मुदा देहरी लग भूखल व्यक्ति ठाढ़ रहि जाइत; वक्ता अपन पात समेटि पाँति देहरी धरि बढ़बैत छथि। भात-पानि हथेलीक रंग वा कुलक ऊँचाई नहि पूछैत, आ साझा भोजनसँ आँगनक सामाजिक चेहरा बदलैत अछि। बादमे कातक घरक चूअैत छप्पर देखि अपन सुखायल ओछाओन छोड़ि बाँस पकड़य जाएब विचारकेँ कर्ममे उतारैत अछि। भोरक फफोला आ भीजल खाम्ह ओ बात कहैत अछि जे भाषणमे नहि बनल—सभक लेल ठाम बचल तखने अपन घर सेहो सम्पूर्ण होइत अछि।

कुहेसाक बनल घर

नदीक कात भोरमे उठल उज्जर महल बसात चलिते छत-देबाल गमा दैत अछि, आ स्वप्नक राजा-गाम जागरणमे टिकैत नहि; तैयो आँखिक कोरक दुख वास्तविक रहैत अछि। पद्य देखबैत अछि जे किछुओ एकसर ठाढ़ नहि—छप्पर बाँसपर, बाँस धरतीक नमीपर, धरती मेघक बाटपर आ साँस अनेक अनदेखल सम्बन्धपर निर्भर अछि। महल आ राज गेलापर नदी आ भोर रहि जाइत अछि; ‘अपन’ कहि कसि पकड़ल वस्तुपर पकड़ ढील होइत अछि, आ खालीपनक बीच लगसँ बहैत अनेक जीवन सुनाइ पड़ैत अछि।

एक नामक कतेक पात

नेना दस पातकेँ एकहि नाम दैत अछि, मुदा प्रत्येक पातक कटल किनार, कीड़ाक घर आ नसक कथा अलग अछि। ‘गाछ’ शब्द एक साझा छाँह दैत अछि, पर आमक मिठास, नीमक तीत सिनेह आ ऋतुक भेद ओहि एक नाम भीतर बचल रहैत अछि। वक्ता अपन बात मनबय लेल दोसरक बात काटैत काल कोमल पात हथेलीपर पाबैत छथि, जकर हरियरी तर्कक तेज नोकपर काँपैत अछि। निष्कर्ष ई नहि जे सभ एक वा सभ अलग—मेल देखितो रूप नहि मेटाउ, भेद गनितो दूरी नहि बनाउ।

फेर चिन्हल देहरी

बरख बाद गाम घुरल वक्ताकेँ पोखरि छोट, पुरान डरावन गाछ झुकल आ देहरी प्रश्न करैत बुझाइत अछि—बाट सिमटल कि स्वयं पैघ भेलहुँ? भीतरक परिचित खोंखी बदलल कंठ, सुखायल केश आ वैह आँखिक पानि संग समयक परिवर्तन देखबैत अछि; नाम मात्रसँ चिन्हान पूरा नहि, हाथ बढ़िते दूरी गलैत अछि। यादिक घर आ वर्तमान आँगन एक-दोसरासँ भेंट करैत अछि। माटि माथ लगिते भीतरक नेना पहिने घर दौड़ैत अछि, आ बाहरी वापसी आत्माकेँ फेर चिन्हबाक यात्रा बनैत अछि।

आधखुलल किवाड़

एक किवाड़ पाछाँ दोसर आँगन, ओकर पाछाँ गल्ली—बुझल संसारक नक्सा रोज किनार बढ़बैत अछि। जे नहि देखल से अस्तित्वहीन नहि, आ जे देखल ओकर चारूकात सेहो अनदेखल बचल; पातक ओस गनितो जड़िक पियास अनगनल रहि सकैत अछि। एके सुरुज अलग ठामसँ अलग रूपेँ देखाइत अछि, आ ठाम बदलिते अपन ‘सम्पूर्ण अकास’क दावापर हँसी अबैत अछि। पद्य प्रश्नक हाथ पकड़ि धीरे चलबाक, चुप्पी भेटला पर बैसबाक आ खाली ठाम भरबाक लेल झूठ उत्तर नहि गढ़बाक संकल्पपर समाप्त होइत अछि।

आँगनक खुलल दिशा

आँगनक खुलल दिशा चारू दिशासँ आबैत भिन्न धुन, भेष, प्रार्थना आ स्मृतिकेँ एकहि साझा छाँहमे स्थान दैत अछि। पद्यक मर्यादा स्पष्ट अछि—अपन दीप आ सुर बचाउ, मुदा पड़ोसीक निन्नमे अँगार नहि फेकू; साझी पानि, रोटी आ आश्रयसँ आँगन अकास जकाँ विस्तृत होइत अछि।

नेनाक बोलीमे भोर

नेनाक सहज प्रश्न घरक जड़ता तोड़ि सभकेँ संवादमे अनैत अछि। बजार, बाँध आ पड़ोसीक संकट देखबैत अछि जे बन्द दुआर चिन्ता रोकि नहि सकैत; परस्पर खाम्ह उठेबाक वचनसँ ज्ञान, सहयोग आ सामुदायिक जीवन एकहि भोरमे जुड़ैत अछि।

खाली खूँटीक छाँह

खाली खूँटी अनुपस्थित ओढ़नीक स्मृति भरि नहि, ‘नहि’ शब्दक भीतर बचल ठामक रूपक बनैत अछि। दिन-राति, उपस्थित-अनुपस्थित आ बिछोह-भेटक बीच पद्य किवाड़मे एक फाँक खुलल राखैत अछि, जतय अभाव स्वयं अर्थ आ सम्भावना जनबैत अछि।

दोसर आँखिक ठाम

दू आँखि एकहि खेतकेँ अलग रूपेँ देखैत अछि; अपन निराशाक शोर घटेलापर दोसरक मेघ, बीआ आ नहरि देखाइ पड़ैत अछि। पिपरीक पाँति धरि ध्यान देत पद्य न्यायपूर्ण दृष्टिकेँ दोसरक पीड़ा सुनब, स्वर नहि दबेब आ किछु दूर एक-दोसरक आँखिसँ देखबाक अभ्यास बनबैत अछि।

माटिक भीतर पाँखि

करिया बीआक भीतर सिमटल हरियर पाँखि अन्हारमे सेहो जीवनक तैयारी देखबैत अछि। जड़ि नीचे आ पात ऊपर बढ़ैत अछि, घावकेँ फूल कहि झुठलाओल नहि जाइत, मुदा घावक कात नव कोपड़ फूटैत अछि; आधा दृष्टिसँ बाहर आबि साझा छत बनाबय पद्य आग्रह करैत अछि।

रंगक अनकहल स्वर

अरिपनक टेढ़ बिन्दु नेनाक हाथमे चिड़ै बनि उड़ैत अछि, आ कथित भूल नव रूपक पाँखि बनैत अछि। रंग, गीत, थकान आ अनकहल पीड़ाक संगम देखबैत अछि जे सुन्नरता केवल सजावट नहि, दोसरक मोन दिस बढ़ल संवेदनशील हाथ सेहो अछि।

भीतरक अचल ठाम

वस्तु सभकेँ आकार आ अवस्थासँ वर्गीकृत कएल जा सकैत अछि, मुदा ‘देखनिहार कतऽ बैसत?’ प्रश्न वर्गीकरणक सीमा खोलैत अछि। क्रोध, दुख, हँसी आ डर आबि-जाइत रहैत अछि; तकर पाछाँ बचल अचल देखबाक ठाम पद्य आत्म-चेतना आ साक्षीभाव रूपेँ खोजैत अछि।

निन्नक पाछाँ सेहो जागल

सपनाक नाव आ जागरणक भोर दू अलग साँच अनुभव करबैत अछि। पद्य न सपनाक डरकेँ हँसीसँ रद्द करैत अछि, न जागल अवस्थाकेँ अन्तिम सत्य मानैत; जे देखल गेल तकर जाँच करब, मुदा देखबाक ठाम नहि बेचब—एहि संयममे दुनू पलकक जगत जुड़ैत अछि।

टेढ़ बाटक हरियरी

कागजक सीध बाट धरतीपर पोखरि, बाँस, कादो आ मोड़ भेटिते बदलि जाइत अछि। पुरान प्रश्न नव भूख धारण करैत, छूटल औजार आगाँक काजमे फेर उपयोगी होइत; पद्य जीवनक टेढ़ बाटकेँ विलम्ब नहि, साझा स्वर, छाँह आ सीखसँ पैघ भेल यात्रा मानैत अछि।

कंठसँ उड़ल चिड़ै

दादीक कंठसँ निकसल गीत कागजपर उतरबाक पहिने घर-घर उड़ैत रहैत अछि। लिखल शब्द स्वरकेँ रोकैत नहि, नव कंठमे फेर बसात दैत अछि; पोथीक संग अनलिखल जीवनक ध्वनि बचब आवश्यक अछि, ताकि परम्परा बान्हल नहि, नव उड़ान पाबय।

05 / विभाग

खण्ड ४ — अर्थ, भाषा आ लोकजीवनक अँजोर

बीआ, करघा, रोटी, जल, बाट, पीढ़ी आ लोककाज परम्परा आ परिवर्तनक व्यावहारिक व्याकरण बनैत अछि। भौतिक आवश्यकता आ भीतरक अर्थ-खोज, साझा संसार आ अलग दृष्टि, जड़ि आ नव पात—सभकेँ एक-दोसरा काटि नहि, तनाव सहित पढ़ल जाइत अछि।

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खण्ड ४ — अर्थ, भाषा आ लोकजीवनक अँजोर

खण्ड ४ ‘अर्थ, भाषा आ लोकजीवनक अँजोर’ पद्य-संग्रहकेँ घर-आँगनक आत्मीय अनुभवसँ भाषा, अर्थ, परम्परा, श्रम आ लोकजीवनक व्यापक प्रश्न दिस लऽ जाइत अछि। आगाँक पद्य पुरान धरोहरकेँ जड़ नहि बनबैत, ओकर भीतर नव पात, नव प्रयोग आ साझा अर्थक सम्भावना खोजैत अछि।

जड़िक नव पात

पुरान गाछक दरारमे ओसक बूँद एकहि बेर नोर आ नव भोर दुनू बनि सकैत अछि। जड़ि अतीतक कथा सुनैत अछि, फुनगी दूरक हवा; झरल पात माटि बनैत आ नव पात गीत। पद्यक निष्कर्ष—रक्षा तखनहि सार्थक अछि जखन बढ़बाक ठाम बचल रहय।

काल्हिक बीआ

दादीक मुठ्ठी भरि धान धरोहर अछि, मुदा ओकर भविष्य बन्द कोठीमे नहि, सही समय खेतमे छिटबाक श्रममे अछि। आन गामक बीआसँ सीखैत अपन माटिक गन्ध नहि बिसरब, पुरान थातीकेँ सड़ायब नहि, आ नव ऋतुक लेल परखब—एहि जिम्मेदारीमे उत्तराधिकारक अर्थ खुलैत अछि।

दू बाटक बीच

एक बाट खेत आ भूखक तात्कालिक श्रम दिस, दोसर वन आ भीतरक जाल दिस बजबैत अछि। पद्य दुनूमे सँ एककेँ सम्पूर्ण नहि मानैत; मेड़पर ठाढ़ भऽ दुनू स्वर सुनला पर साँझमे अन्न आ शीतल हवा एकहि आँगनमे पहुँचैत अछि, भिन्न साधनाक लेल साझा चौखट बनैत अछि।

एक जल, अनेक लहरि

पोखरिमे एक चान सय काँपैत टुकड़ी जकाँ देखाइत अछि; भेद करब आवश्यको अछि, मुदा भेदक धार अन्तिम सत्य नहि। अलग घास, साझा हवा, एक जलक अनेक लहरि आ जल-चानक पारस्परिक उजास पद्यकेँ एकता आ भिन्नताक बीच सन्तुलित चिन्तन धरि लऽ जाइत अछि।

खाली पीढ़ी

दुआरपर खाली पीढ़ी अनुपस्थित व्यक्तिक ठोस स्मृति बनि ठाढ़ अछि। घर नामक चारू कात अनकहल आ नहि-कहल अर्थ बसैत अछि; उत्तर-दक्खिनसँ दृश्य बदलैत रहितो एक दृष्टि सभ नहि समेटि सकैत। पद्य ‘नहि रहब’केँ रिक्तता नहि, अर्थवान उपस्थिति मानैत अछि।

पयरसँ आगाँ प्रश्न

बाट पएरकेँ चलय कहैत अछि, मुदा मन हर निर्णयकेँ आधा-आधा बाँटि संशयमे रोकैत अछि। देह यात्रा करैत रहैत अछि जखन कागजपर यात्रा ठमकल; गन्तव्यक लोभसँ परे प्रश्न आ अनुभवक खींचतान अन्ततः एक नव बाट खोलैत अछि।

मोनक दूर किनार

दिनक देहगत काज समाप्त भेलापर मोनक दोसर आगि उठैत अछि। ओछाओन, पानि आ छाँह पर्याप्त रहितो भीतर ‘केकर खोज’क प्रश्न जागैत अछि; पुरान गीत नव प्रश्न बनि अगिला जीवनक पदचाप सुनबैत अछि। पद्य घर छोड़े बिना भीतरक दूर किनार दिस नाव खोलैत अछि।

रोटीक पाछाँक भूख

रोटी देह आ थाकल श्रमकेँ तृप्त करैत अछि, मुदा तेसर कौरपर एक एहन भूख उठैत अछि जकर माप खेत, धान वा कमाइ जकाँ नहि होइत। थारी धोएलाक बाद जलमे अपन मुख देखैत वक्ता भरि पेटक शान्तिक किनारपर अस्तित्वक अगम पियास सुनैत छथि।

करघाक नव फूल

मायक पुरान करघा-नमूना जसक तस नकल नहि होइत; बरखाक नव लय बानामे उतरि पातक मोड़ बदलैत अछि। पुरान फूलक पाँति आ गामक गन्ध बचैत अछि, मुदा नव ऋतुक रंग सेहो जुड़ैत अछि। मायक मुस्की एहि भीतर-नव पहिचानकेँ स्वीकृति दैत अछि।

फेर अँकुरायब

पतझड़मे झरल पात माटिक आहार बनि फेर अँकुरक सम्भावना खोलैत अछि। पद्य कर्मक फलकेँ केवल अपन चाहक चक्रमे नहि बाँधैत; कठोर बोलक काँटा आ चुप्पे देल दयाक छाँहक स्मरणसँ पुनर्जन्मक अर्थ दोसरक दुःख हलुक करबाक नैतिक संकल्पमे बदलैत अछि।

भोरक खुलल आँखि

सपनामे बहल घर जागरणमे जसक तस भेटैत अछि, मुदा तकियाक नोर देखबैत अछि जे असत्य अनुभव सेहो हृदय हिला सकैत अछि। भोरक उजास घरकेँ मेटैत नहि, डरक परदा ढीला करैत अछि; पद्य देखबाक सुखक भीतर अपन नजरिक छाप चिन्हि जीवनमे नव ठाम बनबैत अछि।

बोलैत आँगन

घर, दुआर, पोखरि आ लोटा वस्तु मात्र नहि रहैत; सम्बोधन, प्रतीक्षा, बितल दुपहरि आ गामक गन्ध हुनका अर्थ दैत अछि। दू जनक बीचक विराम, सुनब आ नाम देबासँ नव संसार आकार लैत अछि; एकल जियबक आँगन सामूहिक आवाजसँ भरि उठैत अछि।

छुबैत धरती

नक्शामे छोट पोखरि अङ्क आ परिमाण बनैत अछि, मुदा किनारपर पयर धरिते बालपन, डर, नाव आ अपरिचित हाथक भरोस जागैत अछि। पद्य मापक उपयोग नकारैत नहि, केवल ओकर सीमा चिन्हैत अछि; जियबासँ पवित्र भेल ठामक रक्षा हाथक जिम्मेदारी बनैत अछि।

नक्शाक बाहर

नक्शामे देबाल आ बाट भेटैत अछि, मायक हँसी नहि; नाम लिखलासँ रूप उभरैत अछि, मुदा स्वरक गरमी अबहियो नक्शाक बाहर रहैत अछि। जे कागज घरक दिशा देखबैत अछि, चौखट पार करिते ओहि अनचित्रित जीवनसँ भेट करबैत अछि जकरा केवल नाप वा रेखासँ धरा नहि जा सकैत।

चाहक आकार

मनक अनेक कोठरीमे अन्न, गान आ दोसरक दुःख लेल ठाम अछि; रूपहीन चाह धीरे-धीरे घरक आकार लैत अछि। पद्य सुखक भिन्न स्तर देखबैत अछि—किछु सुख बाँटलापर पैघ होइत अछि; अपन लेल जराओल दीप पड़ोसी धरि उजास पहुँचेब तखन चाहक भीतरक चाह सुधरैत अछि।

आवाजक पुल

‘पानी चाही’ जकाँ साधारण सम्बोधन दू एकान्त किनारक बीच पुल बनैत अछि। पियास दोसर पी नहि सकैत, मुदा स्वरक काँप सुनि हाथ बढ़ा सकैत अछि; वस्तुक नामक संग आग्रहक ताप, नजरि आ अनकहल अर्थ सेहो चलैत अछि। भाषा एतय केवल सूचना नहि, सम्बन्ध खोलबाक क्रिया अछि।

सुखक सीढ़ी

मिठाइक छोट टुकड़ामे आरम्भिक सुख बसैत अछि, मुदा बहिनिसँ आधा बाँटलापर मुँहक मिठास घटि मोनक मिठास बढ़ैत अछि। बादमे ठोकर खसल जनक हाथ पकड़ब बिना वस्तु पाओल अनमोल सुख दैत; पद्य अपन हँसीसँ आगाँ दोसरक हँसीमे घर खोजैत अछि।

अलपनाक दुआर

दादीक अङ्गुरीसँ बनल अलपना चाउरक लेपसँ आगाँ स्वागत, प्रतीक्षा आ अनदेखल सम्बन्धक रूप धारण करैत अछि। रेखा बाहर नेनाक चिड़ै-पयर आ एखन नहि आयल पाहुन लेल खुलल ठाम देखबैत अछि जे कला घरक चाहकेँ दृश्य बना अनागत सम्बन्धक दुआर खोलैत अछि।

बराबरक थारी

भोजक पाँतिमे ‘ककरा पहिने’ प्रश्न केवल अन्न-वितरणक नहि, मानक प्रश्न बनैत अछि। पाँतिक बाहरक लोककेँ बजा एक धरतीपर बैसब, थारी दैत आँखि मिलायब आ हाथ नीचाँ नहि करब—पद्य न्यायकेँ मात्र बराबर माप नहि, गरिमा आ मानक भूख तृप्त करबाक आचार बनबैत अछि।

जियबाक कारीगरी

मनुष्य सम्पूर्ण बनल रूपमे नहि, काँच माटि जकाँ जन्मैत अछि आ भूख, भरोस, भूल, लोभ, नेह आ चुनावसँ आकार पबैत अछि। घरक सुख बाहर आ गामक दुःख भीतर अबैत अछि; चाक घूमिते रहैत, जियबाक अर्थ बनल वस्तु नहि, निरन्तर गढ़ाइ बनैत अछि।

आँखि आ हथेली

आँखि फूलक सुन्नरता देखि हाथकेँ तोड़य बढ़बैत अछि, मुदा काँपल डाढ़ि आ झरल पराग इच्छा रोकैत अछि। रंगक मोह छोड़ल नहि जाइत, मुठ्ठी मात्र खुलैत अछि; फूलकेँ डाढ़िसँ जुड़ल देखबाक दोसर सुख पद्यकेँ सौन्दर्य, अधिकार आ संयमक सम्बन्ध बुझबैत अछि।

देखि रहल छी

देबालक धूप, देहक गरमी आ छतपर चिड़ै देखैत-देखैत वक्ता अचानक अपन ‘देखब’केँ देखय लगैत छथि। वस्तु नहि छुटैत, मुदा नजरि स्वयं अनुभूतिक विषय बनैत अछि; एहि आत्म-जागरूक अचरजमे भीतर दोसर उजास उगैत अछि आ वक्ता अपन लग फेर पहुँचैत छथि।

हमरा नीक लगैत अछि

एकहि साँझकेँ दू जन भिन्न रूपेँ अनुभव करैत छथि—केओ धूसर किनार, केओ लालिमाक धार प्रिय मानैत अछि। पहिल कथन आँखिसँ जाँचल जाइत, दोसर मोनक रुचि खोलैत; पद्य बिना डाँट भिन्न पसन्दकेँ एकहि विस्तृत साँझक भीतर ठाम दैत अछि।

अवश्य होयत?

हर बरखक बरखा अनुभव आशा दैत अछि, मुदा मेघक आगमन दू आ दू चारि जकाँ निश्चित नहि। चाहक जोर सत्यक माप नहि बढ़बैत; पद्य जकर ज्ञान अछि ओकरा सँभारब, जकर नहि अछि तकरा स्पष्ट कहब, बीआ राखब आ पानिक वैकल्पिक जुगुत करब—एहि व्यावहारिक अनिश्चिततामे बुद्धि देखैत अछि।

अनमोलक छाँह

हाटमे पीतल, माटिक बरतन आ वस्तुक दाम तय होइत अछि, मुदा बूढ़ियाक गीत आ थाकल माथ सहलाबयवला नेहक मोल पुछिते हिसाब ठमकि जाइत अछि। पद्य उपयोगिता, प्रियता आ पीड़ा कम करबाक कर्मक बीच ‘अनमोल’क क्षेत्र खोलैत अछि, जे बिना दामो घर धरि संग चलैत अछि।

मेहनतिक रंग

भट्ठीक धूरि आ कारीगरक अङ्गुरी बरतनक चमक पाछाँ नुकाएल श्रम देखबैत अछि। सुन्दरता किननिहारक वस्तु भरि नहि; दिनभरि बोझ उठबैत हाथो रंगक सपना देखैत अछि। पद्य रूपकेँ तखनहि सम्पूर्ण मानैत अछि जखन कारीगरक श्रम आ मान सेहो रूपक भीतर दृश्यमान रहय।

नामक ओहि पार

नेना ‘आम’ नाम सिखैत अछि, मुदा नामक एक डालीपर खट्टा, मीठ, काँच, पाकल, गन्ध, स्वाद आ छुअनक सम्पूर्ण अनुभव नहि अँटैत। आँखि, जीह आ हाथ अलग बाटसँ एक फल लग पहुँचैत; भाषा संग चलैत अछि, मुदा जीवन स्वयं अर्थक धीम शिक्षक बनल रहैत अछि।

बजबाक पहिल दिन

नेना लोटा, पानी आ इशारा संग शब्द सीखैत अछि; ध्वनि वस्तुक नाम मात्र नहि, पीबक क्रिया, पियास आ साझा व्यवहारक सम्बन्ध सेहो जोड़ैत अछि। वस्तु हटितो नाम बचि सकैत, अनुपस्थित जलक स्मरण पियासक स्वर उठा सकैत; बोलब संग-जियबक अर्थक बाट बनैत अछि।

फेरसँ ताकू

दूरक उज्जर चमककेँ पानी बुझल भ्रम लग जा बालु निकलैत अछि। पद्य भ्रमक कारणेँ देखब छोड़ैत नहि; ठाम बदलि, हाथ लगा, फेर देखि पहिल बुझाइ सुधारैत अछि। विश्वास अन्हर पकड़ नहि, जाँच सभटा नकार नहि—त्रुटि सुधारि आगाँ देखब एहि पद्यक ज्ञान-अनुशासन अछि।

हरेक पातक अपन हरियरी

सभकेँ ‘पात’ कहला पर सेहो कीड़ाक चिन्ह, ओस, धार, देह आ स्पर्श अलग-अलग कथा राखैत अछि। पद्य समान नामक उपयोगिता नकारैत नहि, मुदा वर्गक छाँह नीचे प्रत्येक वस्तुक अनन्य अनुभव बचबैत अछि; सामान्य नाम आ विशिष्ट देहक बीच एहि दूरीमे अर्थक हरियरी उगैत अछि।

रंगक सङ्ग रूप

‘गहिर नीला’ वा ‘कठोर’ जकाँ एक शब्द आकाश, आँचर, पोखरि, पाथर वा बोलीमे अलग अनुभूति दैत अछि। पद्य रंग आ गुणकेँ वस्तुसँ काटि स्थिर अर्थ नहि मानैत; रूप, प्रसंग आ अनुभवक संग शब्दक अर्थ बदलैत अछि, तेँ भाषा बुझब लेल ककर नील, ककर कठोर—ई प्रश्न आवश्यक अछि।

गाँठिक भीतर बाट

सुतरीक गाँठि बलपूर्वक खींचिते आर कसायल, मुदा लग बैसि एक-एक मोड़ देखला पर ओकर भीतर बाट खुलैत अछि। एक छोर बुझिते दोसर छोरक अर्थ बदलैत रहैत; पद्य जटिल प्रश्न आ सम्बन्धकेँ बलसँ नहि, धैर्य, क्रमिक निरीक्षण आ पुरान पकड़ पहचानबाक प्रक्रियासँ खोलबाक रूपक बनबैत अछि।

किएकक अनेक रंग

नेनाक ‘किएक’ पहिने पात झरबाक कारण पुछैत अछि, फेर मोन कानबाक; पहिल सहज उत्तर दोसर प्रश्नपर ठमकि जाइत अछि। पद्य प्राकृतिक कारण आ भावगत कथा एक नहि होएबाक भेद खोलैत, आ एकहि ‘किएक’क भीतर अलग स्तरक उत्तर होइ सकबाक विनम्रता सिखबैत अछि।

अञ्जुरीक उजास

भोरमे धरतीपर एक चुटकी जल देब आ अञ्जुरी जोड़ब सूरज नापबाक वा सिद्ध करबाक क्रिया नहि, कृतज्ञताक देहगत भाषा अछि। झुकबामे थकान आ उठबामे आशा समायल रहैत; पद्य छोट अनुष्ठानकेँ भय वा दावाक बदला जीवनप्रति सजग धन्यवादक उजास बनबैत अछि।

प्रश्नक पाछाँक शान्ति

तारा गनब आ रातिक विस्तार नापब सम्भव भेलो अपन एकान्त उदासी तत्काल बुझाइ नहि पड़ैत अछि। सिरान लग बहुत उत्तर आ विचार रहितो प्रश्नक पाछाँ एक नीरव ठाम बचैत अछि; पद्य ज्ञानक विस्तारक संग भीतरक अनुत्तरित अनुभव स्वीकार करबाक शान्ति खोजैत अछि।

कहलासँ बचल

दीर्घ विरह पाछाँ सोचल अनेक वाक्य भेटक क्षणमे गायब भऽ जाइत अछि। आँखि आ हथेलीक निकटता चुप्पीमे जे गरमी पसरबैत अछि, से कहल शब्दक बाहर सम्बन्धक अर्थ खोलैत; पद्य मौनकेँ रिक्तता नहि, कतेको बेर भाषासँ बचल आत्मीय अर्थक घर मानैत अछि।

खेलक बोली

घर-घर खेलमे पाथर चुल्हि, दोसर दिन मैदानमे राजा बनि जाइत अछि; वस्तु ओएह रहितो नाम बदलला पर व्यवहार बदलैत अछि। नेनाक खेल पद्यकेँ देखबैत अछि जे अर्थ वस्तुक पदार्थमे मात्र नहि, साझा नियम, भूमिका आ सामाजिक सहमतिमे सेहो बनैत-बदलैत अछि।

भीतरक नीरव घर

दिन आँखिक खिड़कीसँ रंगक पाहुन भीतर अनैत अछि, राति सपनाक मेला; दुनू उठि गेलापर एक गहिर नीरव घर बचैत अछि। पद्य अनुभूतिक आगमन-प्रस्थानक पाछाँ मनक एहन ठामक बोध करबैत अछि जे प्रत्येक दृश्यकेँ आसन दैत, मुदा कोनो एक दृश्य बनि नहि रहैत।

कारणक सीढ़ी

धुआँ देखि आगिक अनुमान सहज अछि, मुदा ‘धुआँ सदिखन एकहि कारणसँ?’ प्रश्न पहिल निष्कर्षकेँ फेर जाँचय कहैत अछि। एक प्रश्नपर दोसर प्रश्न रखैत पद्य कारण-बोधकेँ जल्दबाजी नहि, धैर्यसँ बनल सीढ़ी बनबैत अछि—जहाँ बुद्धि अपन पहिल बुझाइ सेहो परखैत आगू बढ़ैत अछि।

ओझरायल उजास

उजास भरल कोठरीमे अपनहि छाँहसँ डर आ बनाओल रूपमे अपन असल अस्तित्व बिसरब पद्यक आरम्भिक द्वन्द्व अछि। ‘जँ भीतर दीप जरैत अछि तँ अन्हार कतयसँ?’ आ ‘जँ अन्हारे सभटा छल तँ अन्हारक बोध कोना?’ प्रश्नसँ कविता आत्म-छवि आ आत्मबोधक बीच ओझरायल उजास खोजैत अछि।

नजरिक मिलन

बाटपर फूल आँखिक सोझाँ रहितो मोन आन ठाम रहला कारण देखाइ नहि पड़ैत। ध्यानक धार घुरिते रंग, आकार आ सुगन्ध एक मिलनमे प्रकट होइत अछि; पद्य देखबकेँ आँखिक यांत्रिक क्रिया नहि, वस्तु आ सजग ध्यानक भेट बनबैत अछि।

सपनो जखन सुतल

राति चित्र समेटैत अछि, स्वप्नक अन्तिम रंग मिझाइत अछि, आ बाट, यात्री तथा मनक दौड़ो शान्त भऽ जाइत अछि। भोरक हाँकपर आँखि खुलैत अछि; पद्य स्वप्न-विहीन गहिर निन्नक नीरव अन्तरालकेँ जागरणक स्पष्ट अनुभवक कात रखि चेतनाक अवस्थासभक भेद अनुभव करबैत अछि।

निन्नक तीन किनार

जागल दिनमे खाली ओसारा अनुपस्थिति जनबैत, सपनामे प्रियक आगमन भेलो वियोगक दुख बचैत, मुदा गहिर निन्नमे ओसारा, आयब-जायब आ कमी पूछनिहारो शान्त भऽ जाइत अछि। पद्य तीन अनुभव-अवस्थाकेँ एक-दोसरासँ अलग राखि वियोगक अनुभूति चेतनाक दशासँ कोना बदलैत अछि, से देखबैत अछि।

डगमग धरतीपर

काठक पुलपर पहिल पयर पड़िते आवाज उठैत, नदी बहैत रहैत, डर अस्थिरताक चेतावनी दैत आ आशा पार चलबाक आग्रह करैत अछि। कविता दुनूमे सँ कोनो स्वर दबबैत नहि; जाँचि, सुनि आ धीरे पयर धरब अनिश्चित धरतीपर जिम्मेदार साहसक रूप बनैत अछि।

काल्हिक भोर

आइक लाल पूब आ उड़ैत चिड़ै कल्हुक काज सोचैत मनकेँ अनेक पूर्व भोरक स्मृति दैत अछि। पुनरावृत्त अनुभव आशाकेँ पुष्ट करैत, मुदा भविष्यक भोरकेँ गणितीय निश्चय नहि बनबैत; पद्य स्मृतिसँ जन्मल उचित भरोस आ अनिश्चित काल्हि बीच सूक्ष्म दूरी राखैत अछि।

सम्भवक खिड़की

मनमे हरियर चान बनबैत कल्पना आकाश बदलि सकैत अछि, मुदा कहलासँ कल्पित बात सत्य नहि बनैत। गोलो रहय आ गोल नहि हो—एहन रूप गढ़बाक प्रयासमे भाषा अटकैत, अर्थ अपन सीमा देखबैत अछि; पद्य सम्भवक खिड़की खोलैत अछि, सत्य आ कल्पनाक भेद मेटबैत नहि।

एहि क्षणक ताप

अन्हारमे आगि स्पष्ट नहि देखाइत, मुदा हथेली लग तपनक अनुभव अस्वीकार करब कठिन अछि। कारणक नाम गलत हो सकैत, पहिचान चूक सकैत, तथापि वर्तमान ताप अनुभवक तथ्य बनल रहैत; पद्य अनुभूति आ ओकर कारण-व्याख्याक बीच आवश्यक भेद राखैत अछि।

जागल की सपना?

सपनामे साफ अक्षरवला पत्र पढ़ल जाइत, जागलापर हाथ रिक्त रहैत, मुदा भावक ताप बचल रहैत अछि। एहि एक भ्रमक अनुभवसँ कविता प्रश्न करैत अछि—आबक खिड़की खोलब जागरण अछि, ई कोना चिन्हब? सन्देह सभ अनुभव नकारबाक आदेश नहि, जाँचक कसौटी खोजबाक प्रेरणा बनैत अछि।

पहिने ककर पहिचान

मुख देखबासँ पहिने अन्हार गलीमे परिचित पदचाप व्यक्तिक पहिचानक संकेत दैत अछि; दिनमे मुख देखला पर ओ अनुमान नामक घर पबैत अछि। पद्य पहिचानकेँ केवल दृश्य चेहरासँ नहि, पुनरावृत्त ध्वनि, स्मृति आ बादक पुष्टिसँ बनैत बहु-चरणीय अनुभव रूपेँ देखबैत अछि।

चाहीक स्वर

एक हाथ दोसराकेँ धक्का देलक—ई देखल घटना एक बात अछि; ‘एना नहि करू’ कहब दोसर प्रकारक कथन। पद्य जे भेल आ जे होयबाक चाही, एहि दुनू स्तरकेँ अलग करैत अछि; मूल्यक स्वर तथ्यक नकल नहि, मानवीय आग्रहक जागरण अछि।

अहाँक पीड़ा

दोसरक भीतरक ठेस अपन देहमे हूबहू अनुभव कएल नहि जा सकैत, मुदा थाकल नजरि, टूटल बोल आ चुप्पे सहबाक कँपनी मोन धरि पहुँचैत अछि। कविता सहानुभूतिकेँ ‘हम अहाँक पीड़ा पूर्ण जानैत छी’क दावा नहि, सीमाबोध सहित लग बैसब, जल बढ़ेब आ संकेत सुनबाक उत्तरदायित्व बनबैत अछि।

बोलक बसात

भोरक हाँकसँ गाम जगैत, हाट सम्बोधनसँ खुलैत, आ मान-मनुहार-उलाहन एक मुँहसँ दोसर मुँह चलैत अछि। बोल खेत बाँटि सकैत, हाथ मिला सकैत, दूर यात्रीकेँ वचनक भरोसपर घर घुरा सकैत; पद्य भाषा केँ वस्तुक नाम मात्र नहि, सामाजिक सम्बन्ध बनबैत-तोड़ैत बसात मानैत अछि।

शब्दक घरमे

न्याय हाटमे थारी जकाँ नहि भेटैत आ समय खेतक गाँछपर नहि लागैत; तथापि बँटबाराक व्यवहारमे न्याय आ बीआ छिटबाक ऋतुमे समय अर्थवान होइत अछि। कविता अमूर्त शब्दकेँ अलग वस्तु बनि खोजबाक बदला मानवीय क्रिया, प्रसंग आ सम्बन्धक घरमे ओकर अर्थ पहिचानय कहैत अछि।

सीखल स्वर

नवजात कोनो तैयार भाषा बाँधि कऽ नहि अनैत; रोदन, हँसी, सुनब, मायक बोली, दादीक सम्बोधन आ हाटक ध्वनि धीरे-धीरे ओकर स्वर गढ़ैत अछि। पद्य भाषा केँ जन्मजात पूरा पोथी नहि, साझा जीवनमे सुनि-बाजि अर्जित सामाजिक कारीगरी रूपेँ देखबैत अछि।

सभक चौक

अपन मनमे राखल गोपनीय चिन्हक अर्थ केवल एक व्यक्ति जनैत अछि, मुदा काल्हि फेर देखला पर अर्थ बदलल कि स्मृति चूकल—ई जाँच कठिन होइत अछि। पद्य अकेला निजी अर्थक सीमाकेँ प्रश्न करैत, साझा चौक, पुनरावृत्ति वा बाहरी कसौटीक आवश्यकता संकेत करैत अछि।

फूल आ फीता

दर्जी कपड़ा फीता सँ नपैत अछि, मुदा मायक आँचरक घेरक माप अलग अछि। किछु प्रसंगमे एक शब्दक साफ एकार्थकता जरूरी, दोसरमे अनेक छायाक भीतर नेहक गरमी बसैत; पद्य तकनीकी माप आ जीवित अर्थकेँ विरोधी नहि, प्रसंगानुसार अलग साधन मानैत अछि।

अपन पयरक भार

बाटक मोड़पर कोनो दोसर व्यक्ति वक्ताक बदला पयर नहि धरि सकैत। दुनू दिशा सम्भावना बजबैत, डर अनेक नाम आ बहाना गढ़ैत; अन्ततः चुनावक भार अपन पयरमे लऽ चलब पड़ैत अछि। कविता स्वतन्त्रताकेँ हलुक अधिकार नहि, निर्णयक जिम्मेदारी सहित बोझ मानैत अछि।

साँचासँ बाहर

लोक पहिनेसँ ‘अहाँ एहन होयब’ कहि रूपक घेरा खिंचैत अछि, मुदा ओकर भीतर साँस तंग पड़ैत अछि। वक्ता स्वयंकेँ केवल जातिक नाम वा काजक चादर मानय सँ इनकार करैत छथि; पद्य सामाजिक पहिचानक वास्तविकता नकारैत नहि, मनुष्यकेँ ओकर एकल साँचा भरि मानबाक हिंसा तोड़ैत अछि।

खुलल आकाशक नीचाँ

ऊपर मौन आकाश आ नीचाँ दृश्य भूखक बीच वक्ता अपन निर्णयक जिम्मेदारी भेटैत छथि। आकाश चुप अछि, तें ओकर सभ रहस्य जानल नहि; भूख देखाइत अछि, तें ओकर प्रति कर्म टारल नहि जा सकैत। पद्य परम उत्तरक अभावकेँ नैतिक निष्क्रियताक बहाना बनबैत नहि।

देहक घेरसँ

पोखरिक जलमे बाहरक मुख आ आँखि मुँदला पर भीतर जीअल साँस—दुनू देहक अलग अनुभूति दैत अछि। ध्यान ठमकिते देहक घेरा हलुक पड़ैत; पद्य देह नकारैत नहि, मुदा दृश्य प्रतिबिम्ब, भीतरक स्पन्दन आ सजग ध्यानक बीच ‘हम’क सीमा प्रश्न करैत अछि।

जगतक सङ्ग जागब

आँखिसँ संसार भीतर अबैत अछि आ बाहरी संसार देहकेँ घेरने रहैत; एहि भीतर-बाहर मिलनमे सोच आकार पबैत अछि। केवल मोनक खेल कहला पर पाथरक ठोकर बचैत नहि, केवल पाथर कहला पर पीड़ाक अर्थ खुलैत नहि; कविता अनुभवकेँ मन आ जगतक परस्पर सम्बन्धमे राखैत अछि।

हथेलीक पाथर

हथेलीपर पाथरक ठण्ढक, भार आ आँखिमे रंग अनुभवक भीतर प्रवेश करैत अछि। जे जानल गेल से अनुभवित, मुदा पाथर केवल मनक कल्पना बनि नहि जाइत; पद्य ज्ञाता आ बाहरी वस्तुक भेटकेँ ज्ञानक आधार बनबैत, दुनूकेँ एकमे विलीन नहि करैत अछि।

एकलसँ सङ्ग

अपन बाट चुनबाक साहस रहितो बाढ़िक सोझाँ एकल व्यक्ति लग नाव नहि अछि। दोसर लोक सेहो ओहि बाधासँ जूझैत आबैत छथि; साझा संकट एकल संकल्पकेँ सहयोगमे बदलैत अछि। पद्य स्वतन्त्र इच्छाकेँ नकारैत नहि, ओकर व्यावहारिक पूर्णता हेतु सङ्ग, साधन आ पारस्परिकता आवश्यक देखबैत अछि।

समयक पायल

पुरान धुन नब स्वरमे बाजैत अछि, स्थिर पाथरक मूरत रहितो देखनिहारक आँखि बदलैत अछि। केओ पुरान दिनक वापसी सुनैत, केओ अनदेखल भोर; पद्य समयकेँ वस्तुक मात्र क्षय नहि, बदलैत दृष्टि आ पुनर्पाठक नदी बनबैत अछि, जतय पुरान रूप नव अर्थ धारण करैत अछि।

अनगिन ढङ्गक फूल

गीत कानमे, रंग आँखिमे आ नाच देहक गतिमे अलग-अलग अर्थ फुलबैत अछि। सभकेँ एकहि डोरीसँ बाँधला पर कोमल भेद टूटैत, पूर्णतः अलग कएलापर साझा उमङ्ग छुटैत; कविता कलारूपसभक समान सौन्दर्य-क्षेत्र आ विशिष्ट माध्यम दुनूकेँ संग बचबैत अछि।

कसौटीक उजास

बात जाँचबाक लेल हाथमे कसौटी लैत वक्ताकेँ स्वयं कसौटी प्रश्न करैत अछि—‘हमर भरोस कतयसँ?’ एक प्रमाणक पाछाँ दोसर प्रमाण, फेर ओकर आधारक प्रश्न उठैत; पद्य जाँचक आवश्यकता छोड़ैत नहि, मुदा कसौटी स्वयं प्रश्नातीत मानि लेबाक सुविधा तोड़ैत अछि।

माप आ मापल

धान तौलय लाओल तराजूक पलड़ा सेहो जाँचबाक आवश्यकता पड़ैत अछि। जे एक क्षण मापक छल, अगिला क्षण मापल वस्तु बनि सकैत; पद्य मानककेँ अदृश्य निष्पक्ष सत्ता नहि, जाँचयोग्य साधन मानैत अछि। मापल वस्तु आ मापयवला दुनू सम्बन्धमे अपन अर्थ पबैत अछि।

भेटक अनेक बाट

पाकल कटहर धरि नाक गन्ध, आँखि रंग आ हाथ नरमीक अलग गवाही अनैत अछि। एक वस्तु लग तीन बाट पहुँचैत; जतय गवाही मिलैत भरोस बढ़ैत, जतय भेद होइत नव प्रश्न उठैत। कविता अनेक इन्द्रिय-स्रोतकेँ प्रतिद्वन्द्वी नहि, परस्पर जाँच करैत ज्ञानक सहयोगी बनबैत अछि।

सभ चाबी एक नहि

लोहाक बनल सभ चाबी समान पदार्थक होइतहुँ प्रत्येक ताला एकहि चाबी सँ नहि खुलैत। पहिल सफलता देखिकऽ एक विधिकेँ सर्वत्र पर्याप्त मानल दोसर दुआरपर अटकैत अछि; पद्य समस्या अनुसार उचित साधन चुनबाक बहुलतावादी बुद्धि सिखबैत अछि।

अपनहि प्रकाश

दीप देबालकेँ उजियार करैत-करैत अपनहु प्रकाश प्रकट करैत अछि; एहि बिम्बसँ पद्य चेतना लेल अनन्त दोसर चेतनाक आवश्यकता नकारैत अछि। विचार आ विचारक बोध एक संग उभरि सकैत अछि, तें प्रत्येक प्रकाशकेँ देखबाक लेल फेर नव प्रकाशक श्रृंखला जरूरी नहि। ज्ञान आ अपन ज्ञानक जागरूकता सहउदित अनुभव रूपेँ खुलैत अछि।

खुलल बैसार

एक आँगनक चारि आसनपर अलग-अलग स्वर प्रश्नक दीपक चारूकात बैसैत अछि—केओ वाणी विश्लेषण करैत, केओ वाणीपार देखैत, केओ व्यवहारक धरातल पर, केओ भीतरक शान्तिमे। असहमति दबाओल नहि जाइत; सुननाइ प्रत्येक दृष्टिक सीमा खोलैत अछि। बैसार समाप्त होइत अछि, मुदा प्रश्न रूपान्तरित भऽ सभक संग घर जाइत अछि।

प्रश्नकेँ खोलू

‘ई घर अछि?’ प्रश्न सुनि वक्ता देबाल मात्र नहि, देहरी, अपनापन, आश्रय आ स्मृतिक सम्भावित अर्थ सभ देखैत छथि। एकहि प्रश्न अलग ढङ्गसँ खुलि उत्तरक अलग बाट बना सकैत अछि। पद्यक आग्रह अछि जे उत्तर दिस दौड़बाक पहिने प्रश्नक गाँठ खोलू; दुआर चिन्हनाइ आ भीतर पहुँचनाइ एक बात नहि।

धीरे सुलझल डोर

एक शब्दक अनेक सिरा—अनुरोध, सूचना, वचन—एक-दोसरामे उलझि मोनमे भय रचैत अछि। लोक बीच ओकर वास्तविक प्रयोग देखला पर बुझाइत अछि जे कोनो अदृश्य दैत्य नहि, सम्बन्धक गड़बड़ी छल। वाणीकेँ उचित ठाम राखिते गाँठ धीरे खुलैत अछि; छोट भाषिक स्पष्टीकरण आगाँक समझ लेल बाट बनबैत अछि।

नाव आ किनार

नावक डोरी, पाल, पतवार आ टूटल अंश जाँचि मरम्मत कएल जाइत अछि; मुदा सुरक्षित नाव आ शान्त पानि रहितो यात्रा नहि शुरू होइत, कारण इच्छित किनार एखन कहल नहि गेल। पद्य साधनक आवश्यकता स्वीकारैत अछि, पर ओकर पर्याप्तता नहि। समझक औजारक संग ‘कतय जाएब?’ प्रश्न जुड़लापरहि दूर हरियर किनार दिस साँच यात्रा खुलैत अछि।

अर्थक खुलल वन

वाणीक वनमे वैज्ञानिक बाट, स्नेहक पगडंडी, भीतरक मौन, न्यायक पुकार आ रूपकक रंग अलग-अलग काज करैत अछि। सभकेँ एकहि नापसँ मापलासँ अर्थक विविधता नष्ट होएत। पद्य अनुशासन आ बहुलता दुनू बचबैत अछि—स्पष्टता आ आत्म-अन्वेषण बीच किवाड़ बन्द नहि, आवाजाही खुलल रहय।

बातक भरोस

यात्री दूरक पोखरि सुखाएबाक बात कहैत अछि; अर्थ बुझाइत अछि, मुदा सत्य जाँचबाक प्रश्न बचल रहैत अछि—के देखलक, कखन धरती फाटल? ओहि बातक अगिला रूप ‘गाम बचाउ’ आग्रह बनैत अछि, जकर काज तथ्य-वर्णनसँ भिन्न अछि। पद्य अर्थ-बोध, सत्यापन आ वाणीपर काज करबाक दायित्वकेँ अलग-अलग चिन्हैत अछि।

जाँचक दुआर

‘कुआँमे पानि अछि’ दाबीपर डोल उतारल जाइत अछि; खाली डोल घुरला पर दाबी मिथ्या सिद्ध होइत अछि, मुदा वाक्यक अर्थ मेटैत नहि। पद्य विश्वासक पहिने पूछैत अछि—कोन अनुभव दाबीकेँ पुष्ट वा खण्डित करत? परीक्षणक दुआर खोलब ज्ञानकेँ कठोर बनबैत अछि, अर्थकेँ नष्ट नहि।

अर्थक बाँचल ठाम

वर्षा विषयक ज्ञानक मात्रा अलग-अलग होइतहुँ लोक एक-दोसराक कथन बुझि सकैत अछि। नव परीक्षण प्रत्येक बेर शब्दक अर्थ बदलए लेल बाध्य नहि करैत; आइक परीक्षा अन्तिम नहि, काल्हि नव संकेत भेटि सकैत अछि। पद्य दाबीकेँ संशोधन लेल खुलल राखैत अछि, मुदा साझा अर्थक ठाम बचबैत अछि आ अज्ञात लेल सेहो जगह छोड़ैत अछि।

सभ उजासक अपन दिशा

आँखि तारा देखैत अछि, यन्त्र दूरी नापैत अछि; मुदा अकेलापन देखबाक नाप अलग अछि, जतय ककरो लग बैसबाक हाथ चाही। प्रेम, न्याय आ ज्ञानक अपन-अपन उजास अछि; एक साधन सभ प्रश्न नहि सुलझा सकैत। पद्य सभ खिड़की खुलल रखि मापनक कठोरता केँ करुणाक निकटतासँ जोड़बाक आग्रह करैत अछि।

06 / विभाग

खण्ड ५ — भाषा

मातृभाषा स्मृतिक घरसँ आगाँ विज्ञान, कानून, दर्शन, अनुवाद आ नव विचारक काजक भाषा बनबाक माँग करैत अछि। मैथिलीक नव खेत, विचारक अपन बोली, पुरान अक्षरमे नव प्रश्न, बौद्धिक स्वराज आ परिसरक प्रश्नोत्पादक भूमिका एहि विभागक केन्द्र अछि।

32 स्रोत-रेकर्ड

खण्ड ५ — भाषा

एहि खण्डमे संग्रह ज्ञानक सामान्य प्रश्नसँ भाषा, मातृभाषा आ बौद्धिक स्वराजक विशेष प्रश्न दिस मुड़ैत अछि। मैथिलीमे जटिल विचारक अभिव्यक्ति, भारतीय भाषासभक पारस्परिक संवाद, अनुवाद, पारिभाषिक शब्द-निर्माण, संस्कृतक जीवित पुनर्पाठ, विश्वविद्यालय आ समाजक बीच विचारक आवाजाही—ई सभ आगामी पद्यसभक साझा धरातल बनैत अछि।

भाषा जे भीतर घर करैत अछि

सीमा, राजचिह्न आ शासक बदलैत रहैत अछि, मुदा भीतर घर कएल भाषा पीढ़ीक स्मृति, माटिक गन्ध, दादीक कथा आ पहिल प्रश्न सँ जुड़ल रहैत अछि। पद्य चाहैत अछि जे दर्शनक बीआ अपन भाषाक माटिसँ रस लय; संगहि अनुवाद आ अन्तर-भाषिक संवादक दुआर खुलल रहय। भाषा कैद नहि, अनुभवक निकट पहुँचबाक घर आ विश्व-संवादक आधार बनैत अछि।

मैथिलीक नव खेत

मैथिलीक उन्नयन दोसर भाषाक स्वर दबेनाइ नहि, खेतक हरियरपन जकाँ नव बीआ, पुरान स्मृति आ पड़ोसीक पराग लेल जगह बनेनाइ अछि। भाषा न्यायालय, प्रयोगशाला, विद्यालय, अस्पताल, विज्ञान, दर्शन आ समाज-विमर्शक कठिन काज करए; जतय शब्द नहि, नव शब्द रचल जाए, जतय उपयुक्त बाहरी शब्द अछि, सम्मानसँ ग्रहण हो। साँच विकासक कसौटी पाठक-संख्या नहि, जटिल विचार, आलोचना, शोध, अनुवाद आ असहमतिक सम्मान सँभारबाक सामर्थ्य अछि।

विचार जखन अपन बोली पबैत अछि

विचार सूत्र, भाष्य, मठ, गीत, लोककथा आ आधुनिक पाठकक भाषा पार करैत जीवित रहैत अछि। मैथिली जखन न्याय, वेदान्त, जैन-बौद्ध, नाथ, सन्त, भक्ति, सूफी, आधुनिक सामाजिक संघर्ष आ पश्चिमी प्रश्नसभक संग संवाद करैत अछि, तखन अनुवाद मात्र प्रतिलिपि नहि, अपन प्रश्न रचबाक पुल बनैत अछि। पद्य भाषा-विकासकेँ बौद्धिक उत्तरदायित्व मानैत अछि: सूक्ष्म भेद सँभारू, परम्पराकेँ जाँचू, बाहरक ज्ञान स्वीकारू, मुदा नव पीढ़ीकेँ अपन बाट स्वयं बनेबाक स्वतन्त्रता दिअ।

पुरान अक्षरमे नव प्रश्न

संस्कृतकेँ केवल अतीतक काँच-पेटीमे राखल स्मृति नहि, नव प्रश्नक कार्यशाला रूपेँ देखल गेल अछि। प्रमाण, आत्मा, जगत, कारण, चेतना, मुक्ति आ ईश्वरक पुरान प्रश्न प्रत्येक पीढ़ीक अनुभवमे फेर तपैत अछि; विज्ञान, इतिहास, असमानता, स्वतन्त्रता आ राजनीति नव कसौटी आनैत अछि। पद्यक आग्रह अछि—परम्पराक आदर जिज्ञासा रोकय नहि; शास्त्र शास्त्रार्थ बनय, पुरान सूत्रक लग नव पीढ़ीक प्रश्न लेल खाली पन्ना रहय।

जड़िसँ क्षितिज धरि

भारतीय दर्शनकेँ एकरूप मार्ग नहि, अनेक डारिवला वृक्ष रूपेँ देखल गेल अछि। केवल प्रशंसा वा केवल उपहास आधा पाठ अछि; श्रद्धा आ संशय संग चलथि। पुरान ग्रन्थ प्रश्न-भट्ठी बनथि, अनुवाद स्रोतक गन्ध आ नव पाठकक साँस दुनू बचाबय, विश्वविद्यालय प्रश्न-घर बनय। यन्त्र-बुद्धि, पर्यावरण, असमानता, पहचान आ विज्ञानक सीमा जकाँ नव प्रश्नसभ जड़िसँ क्षितिज धरि संवाद माँगैत अछि।

स्वराजक भीतर विचारक स्वराज

राजनीतिक स्वाधीनता भविष्य अपन नामसँ लिखबाक अधिकार दैत अछि, मुदा विचारक स्वराज मानसिक जंजीर खोलबाक दोसर अध्याय अछि। परम्परागत आत्मा-मुक्तिक प्रश्नक संग भूख, विभाजन, श्रम, समानता, विज्ञान, लोकतन्त्र, स्त्री, दलित अपमान आ युवकक संशय सेहो दर्शनक विषय बनथि। बाहरी सिद्धान्त अपन अनुभवक माटिपर जाँचल जाए, विश्वविद्यालय प्रश्नक छोट संसद बनय, आ अपन भाषा, उदाहरण आ तर्कमे विचार करब बौद्धिक स्वराजक अधूरा काज बनि रहय।

अपन धरती, खुलल आकाश

स्वाधीनताक बाद दिशा चुनबाक प्रश्न अपन चेहरा बचबैत विश्वक संग चलबाक प्रश्न बनैत अछि। ‘भारतीय’ केवल प्राचीन ग्रन्थ वा धर्म नहि—गाम, शहर, जंगल, कारखाना, मन्दिर, मस्जिद, विहार, संसद, स्त्रीक मौन, दलित प्रतिरोध, श्रम आ विज्ञान सभ एहिमे अछि। विदेशी विचार न स्वामी, न शत्रु—अतिथि अछि। पद्य जड़ि, खुलल आकाश, कठोर तर्क, संवेदना आ विश्व-संवादकेँ एक संग रखैत अछि।

प्रश्नक परिसर

विश्वविद्यालयकेँ पीढ़ीसभक प्रश्न-परिसर रूपेँ कल्पित कएल गेल अछि, जतय मित्रता गुटबन्दी नहि, परम्परा वंशाधिकार नहि, असहमति बहिष्कार नहि बनय। मौलिकता उद्धरणक संख्या नहि, गहींर अध्ययन, उचित प्रश्न, धैर्यवान संशय आ अनुभव-तर्कक घर्षणसँ जन्मैत अछि। अंग्रेजी विश्व-संवाद लेल उपयोगी रहैतहुँ भारतीय भाषामे शोध, शब्दावली, अनुवाद आ शिक्षण जरूरी अछि; दर्शन भ्रष्टाचार, जाति, लैंगिक असमानता, पर्यावरण, प्रौद्योगिकी आ विकासक मूल्य पर प्रश्न करय।

जे प्रश्न अखनो उत्तर माँगैत अछि

स्वाधीनता, विश्वविद्यालय आ शोधक बादो अनेक प्रश्न उत्तर माँगैत रहैत अछि। दर्शन जँ जीवित अछि तँ आत्मा-मुक्तिक संग अधिकार, भूख, शोषण, भाषा, शिक्षा, विज्ञान आ प्रौद्योगिकीक नैतिक प्रश्न सेहो अपन मानत। विज्ञान ‘सम्भव’ आ अर्थशास्त्र ‘लाभकारी’ कहि सकैत अछि; दर्शन ‘उचित आ न्यायपूर्ण?’ पूछैत अछि। पद्य भविष्यकेँ खाली पन्ना बनबैत अछि—तथ्य आ मूल्य, निष्पक्ष तर्क, खुलल भाषा, ईमानदार शोध आ मानवीय पीड़ाक प्रति उत्तरदायित्वसँ भरबाक लेल।

अनुभवक कसौटी

रंग, ध्वनि, स्पर्श आ पीड़ासँ ज्ञानक बीआ पड़ैत अछि, मुदा अनुभव अकेले सम्पूर्ण सत्य नहि बनैत; स्मृति, तर्क, भाषा आ सांस्कृतिक सन्दर्भ ओकर अर्थ गढ़ैत अछि। पद्य अनुभववादकेँ विचार-विरोध नहि, विचारकेँ धरतीपर चलबाक अनुशासन बनबैत अछि—जीवित दुःख सुनू, दाबी जाँचू, तथ्य चुनबाक आधार स्पष्ट करू। अनुभव अन्धविश्वास नहि आ तर्क जीवन-विहीन गणना नहि बनय; दुनू मिलि ‘ई बात आरो जाँच सहि सकैत अछि?’ प्रश्न खुलल रखैत अछि।

पाँच दशकक देहरी

राजनीतिक स्वाधीनता एक दिनक घटना रहितो विचारक स्वाधीनता दीर्घ श्रम माँगैत अछि। परभाषाक माध्यमसँ ज्ञान ग्रहण करैत देश धीरे-धीरे मैथिली आ अन्य भारतीय भाषामे दर्शन, अनुवाद, व्याख्या, शब्दावली, शोध आ मूल लेखनक घर बनबैत अछि। पद्य पुस्तकक संख्या नहि, स्वतन्त्र प्रश्नक गुणवत्ता केँ उपलब्धिक कसौटी मानैत अछि; पाँच दशक पूर्णविराम नहि, भाषा, संस्था, संवाद आ विवेकक अगिला श्रमक देहरी अछि।

दृश्यक पाछाँ जे प्रश्न अछि

जे देखाइत अछि से महत्त्वपूर्ण, मुदा ‘अछि’ केर अर्थ आ दृश्यक पाछाँक आधारक प्रश्न ओतहि समाप्त नहि होइत। पद्य प्रयोग, नाप आ प्रमाणक अनुशासन स्वीकारैत अछि, संगहि चेतबैत अछि जे ओकरा पूर्ण निषेध बनौला पर अस्तित्व, चेतना, अनुभव आ अर्थक आकाश बन्द भऽ सकैत अछि। तत्त्वमीमांसा अन्ध परम्परा वा बिनु प्रमाणक कल्पना नहि, तर्क, अनुभव, आत्मपरीक्षण आ विनम्र जिज्ञासाक बीच जीवित प्रश्न बनि उभरैत अछि।

सृजनक भीतर मनुष्य

मनुष्य केवल जैविक देह वा समाजक अंक नहि; ओ भेटल संसारकेँ अर्थ देब, रूप बदलाब आ नव सम्भावना रचबाक क्षमता सेहो अछि। खेत, गीत, मूर्ति, स्मारक आ मूल्य प्रकृतिपर मानव अर्थक नव परत बनबैत अछि। पद्य शक्ति, राज्य, धन, धर्म आ बहुमतकेँ मानव गरिमाक कसौटीपर जाँचैत अछि: व्यवस्था व्यक्ति केँ भयमुक्त सृजनक जगह दैत अछि कि चुप करैत? मनुष्य पूर्ण लिखल पुस्तक नहि, चलैत पाण्डुलिपि अछि; एहि अपूर्णतामे परिवर्तनक आशा बसैत अछि।

मूल्यक भीतर संस्कृति

संस्कृति भवन, उत्सव वा संग्रहालयक वस्तु भरि नहि; ओ ‘हम कोना जीबू?’ प्रश्नक भीतर जागल मूल्य-बोध अछि। भूख प्राकृतिक, मुदा भोजन बाँटबाक रीति; भय सहज, मुदा निर्बलकेँ बचेबाक निर्णय; शक्ति सम्भव, मुदा संयम मूल्य अछि। पद्य विविध भाषा, धर्म, लोक-अनुभव, श्रमण, भक्ति, सूफी, आधुनिक लोकतन्त्र आदिक भिन्नता मेटाए बिना साझा मानव गरिमाक आधार खोजैत अछि। जीवित संस्कृति प्रत्येक पीढ़ीमे मूल्यक पुनर्चयनसँ फेर लिखाइत अछि।

व्यक्ति आ समाजक बीच खुलल प्रश्न

व्यक्ति समाजसँ भाषा, नाम, नियम आ संस्कार पबैत अछि, मुदा एक दिन ओही उत्तराधिकारकेँ ‘ई उचित अछि?’ कहि प्रश्न करैत अछि। समाज व्यक्ति बिनु नहि आ व्यक्ति सम्बन्ध-विहीन द्वीप नहि; दुनू सम्बन्ध, संघर्ष आ उत्तरदायित्वक नदीक दू किनार बनैत अछि। पद्य लोकतन्त्रकेँ मतपत्रसँ आगाँ दैनिक अभ्यास मानैत अछि—असहमति सुनब, अल्पमतक अधिकार बचाउ, सत्ता केँ प्रश्न करू, प्रेमक नामपर दोष नहि लुकाउ। समाजक नामपर मनुष्य वा स्वतन्त्रताक नामपर दोसर मनुष्य केँ बिसरब दुनू भूल अछि।

ज्ञानक तलघरमे दीप

वस्तु देखनाइ ज्ञानक पहिल देहरी अछि; अगिला घरमे ज्ञान स्वयं अपन आधार, सीमा आ ज्ञाताकेँ प्रश्न करैत अछि। अपन विचारक उपस्थिति जानब आ ओ विचार सत्य वा उचित अछि, ई दू अलग बात अछि; ‘हमरा नहि मालूम’ सेहो अज्ञानक आत्मबोध रूपेँ ज्ञानक एक रूप बनैत अछि। पद्य बाह्य वस्तु, चेतना, स्मृति, प्रमाण आ आत्मप्रकाशक सीमा जाँचैत अन्तमे पूछैत अछि—संसार जानबाक आकांक्षी ‘हम’ स्वयं केतेक गहींर जानल गेल? एहि प्रश्नसँ ज्ञानक तलघरमे दीप जरैत अछि।

देहक भीतर “हम”

‘ई हमर शरीर’ वाक्यक ‘हमर’ शब्द पद्यकेँ प्रश्न करबैत अछि—हम देहसँ अलग कोनो यात्री छी, कि देहक जागल प्रवाहमे ‘हम’ उभरैत अछि? पारम्परिक आत्मा-कल्पनाक संग देहक भीतरसँ अनुभव बुझबाक सम्भावना जाँचल जाइत अछि। आलिंगन, श्रम, आँसू, स्वाद, रोग, थकान आ साझा नश्वरता देहकेँ निम्न वस्तु नहि, जीवनक प्रत्यक्ष धरातल बनबैत अछि। मृत्यु-पाछाँक जल्दी उत्तरसँ पहिने पद्य जीवित देहमे ‘हम’ कहल अनुभवक विलक्षणता बुझबाक आग्रह करैत अछि।

सुन्दरक सीमा सँ पार कला

फूल, गीत वा चित्र ‘सुन्दर’ कहब सहज अछि, मुदा पद्य पूछैत अछि सुन्दरता वस्तुमे, मनमे, संस्कारमे कि भेटक क्षणमे जन्मैत सम्बन्धमे अछि। करुण नाटक दुःख देइतहुँ ‘अद्भुत’ किएक लगैत, रुचि शिक्षासँ किएक बदलैत—एहि प्रश्नसँ सौन्दर्य पूर्ण वस्तुगत वा मनमाना आत्मगत दुनूसँ बचैत साझा क्षेत्र बनैत अछि। कला केवल सुखक पात्र नहि; ओ अनुभवकेँ नव रूप देब, कुरूपता, मौन, विद्रोह आ करुणाकेँ सेहो अर्थ देब, आ प्रश्नकेँ जल्दी समाप्त नहि करबाक भाषा अछि।

अखंड आकाशक बाट

मनुष्य बुद्धि, इच्छा, भय, प्रेम, देह, संशय आ भीतरक पुकारक खण्डसभमे जीबैत अछि; पद्य ओहि खण्डकेँ मिटाए बिना जोड़यवला सूक्ष्म धागा खोजैत अछि। योग, स्मृति, सजगता वा आत्म-मिलन एहि धागाक सम्भावित नाम बनैत अछि। सफेद उजासमे सात रंग जकाँ अलग प्रार्थना, मन्त्र, मौन आ मार्ग भिन्नता बचबैत एक समग्र आकाश बना सकैत अछि। समन्वय समानता नहि; सुननाइ, भेदक सम्मान आ सम्बन्धक जागरूकतासँ खण्ड अपन ठाम पहचानैत अखंडतामे प्रवेश करैत अछि।

ध्वनिक पार अर्थक उजास

अक्षर क्रमशः ध्वनि बनि क्षणमे विलीन होइत अछि, मुदा अर्थ मनमे एक संग पूरा दुआर खोलि सकैत अछि। पद्य वाक्य, व्याकरण, प्रसंग, स्मृति आ साझा जीवनक सहायतासँ अर्थक निर्माण देखबैत अछि। ‘सत्य’, ‘न्याय’, ‘धर्म’, ‘स्वतन्त्रता’ जकाँ पैघ शब्द अधिक जिम्मेदारी माँगैत अछि; अस्पष्टता सँ लाभ उठाएब संवाद नहि। भाषा ध्वनिक जोड़ मात्र नहि, मनुष्यसँ मनुष्य धरि अर्थ साझा करबाक प्राचीन आ अधूर यात्रा अछि।

भीतरक दरबज्जा पर उजास

घर, समाज, शास्त्र, भीड़ आ भयक अनेक वाक्य भीतर अपन सत्य जकाँ बसि जाइत अछि; मौन एक दिन पूछैत अछि—ई अहाँ देखलहुँ कि केवल सुनलहुँ? पद्य उधारक दीपकेँ अपन चेतनाक बातीपर जाँचबाक आग्रह करैत अछि। लोभ, भय, क्रोध वा पहिचानकेँ देखब ओकरा पूरा आकाश मानब नहि। देहक भूख आ आत्मिक खोज दुनू केँ एक जीवनक भिन्न उजास मानि भीतरक दुआर खुलैत अछि; संसार ओही रहैत, मुदा देखनिहार नव भऽ जाइत अछि।

मनुखताक आँगनमे नव भोर

भोर आकाशसँ पहिने मनुष्यक भीतर उगैत अछि, जखन अपन सुख दोसरक दुःखपर किएक टिकल रहय—ई प्रश्न उठैत अछि। समाज भीड़ नहि, सम्बन्ध, श्रम, भाषा, देखभाल आ उत्तरदायित्वक जीवित बुनावट अछि। लोकतन्त्र दैनिक नागरिकता बनैत अछि: तथ्य जानू, प्रश्न करू, असहमति सुनू, सार्वजनिक धन सहेजू। पद्यक नव समाज एहन चार वाक्यपर घर बनबैत अछि—हम असगर नहि, भिन्न छी मुदा कम नहि, स्वतन्त्र छी मुदा उत्तरदायित्वहीन नहि, अपन छी मुदा दोसरक दुःखसँ अपरिचित नहि।

जतय मनुख मनुखक उजास

घर देबालसँ नहि, बच्चाक हँसी, वृद्धक खाँसी, श्रमक ताप आ परस्पर खुलल खिड़कीसँ बनैत अछि; समाजो एहनहि साझा घर अछि। पद्य अन्न, भाषा, श्वास आ श्रमक अदृश्य साझेदारी देखबैत व्यक्ति केँ सम्बन्धमे राखैत अछि। स्त्री-पुरुष दुनू पर थोपल कठोर भूमिका, आँसू वा कोमलताक लिंग-विभाजन आ अवसरक पूर्वनिर्धारण प्रश्नक विषय बनैत अछि। मनुष्य संस्था, लाभ आ प्रतिष्ठासँ पहिने अछि; समाजक असली घर ओतय बनैत अछि जतय मनुख दोसर मनुखक अन्हार नहि, उजास हो।

अदृश्य तराजूक उजास

मनक भीतर अदृश्य तराजू निरन्तर पूछैत अछि—ककरा चुनू, ककरा लेल सुविधा छोड़ू, कोन वस्तु सचमुच भारी? रोटी भूखक समय सर्वोच्च, मुदा भूख मिटलापर सम्मान, स्वतन्त्रता, न्याय आ सम्बन्धक मूल्य उठैत अछि। आदर्श जीवनसँ कटि चित्र नहि बनय; अपूर्ण मनुष्य कारण बुझि चयन आ फल स्वीकारैत परिपक्व हो। पद्य एहन स्वतन्त्रता, विकास, धर्म आ ज्ञान चाहैत अछि जे दोसरक साँस, पृथ्वी वा गरिमा नहि छीनय; तराजू पूर्ण स्थिर नहि, मुदा ओकर काँटा मानवता दिस मुड़य।

टूटल आइना मे अनेक आकाश

एक केन्द्र, एक इतिहास आ एक अन्तिम आवाजक आइना टूटला पर चेहरा मेटैत नहि; अनेक टुकड़ामे अलग कोणसँ देखाइत अछि। पद्य घटना, स्मृति, शब्द, पहिचान आ ज्ञानक बहुदृष्टि स्वीकारैतहुँ ‘सभ बराबर सत्य’क सरल निष्कर्ष नहि लैत—लाख बेर साझा झूठ सेहो झूठ रहि सकैत अछि। विशेषज्ञ उत्तरदायी आ जनता जिज्ञासु रहय; नाम, वर्ग आ मापदण्ड बनएबो सत्ता अछि। अन्तिम मुद्रा घोषणा नहि, चार अभ्यास अछि—आरो देखू, आरो सुनू, फेर जाँचू, फेर रचू।

निर्णयक धधकैत देहरी

नैतिकता साफ सिद्धान्त-कक्षामे नहि, अस्पतालक मशीन, गर्भक सम्भावना, जंगलक कुल्हाड़ी, घरक हिंसा, विकासक लाभ आ मानवीय सम्बन्धक कठिन क्षणमे भेटैत अछि। नियम आवश्यक, मुदा करुणा ओकर मानवीय अर्थ बचबैत अछि; समता एकरूपता नहि, अवसरक दुआर पूर्वनिर्धारित लिंग वा पहचानसँ बन्द नहि हो। पद्य प्रत्येक कठिन चयनक पहिने ‘एहि निर्णयमे ककर जीवन छिपल अछि?’ प्रश्न रखैत अछि। ओहि विराममे पुस्तकक नैतिकता श्वास बनि मनुष्यकेँ अधिक मनुष्य होएबाक सम्भावना दैत अछि।

माटिक नाड़ीमे हमर श्वास

हमर श्वास अकेला देहक सम्पत्ति नहि—पात, वन, नदी, बादल, माटि आ असंख्य जीवक चक्र एहि भीतर बसैत अछि। पद्य पर्यावरणकेँ बाहरी विषय नहि, शरीरक विस्तृत सम्बन्ध मानैत अछि। तालाब, फसल-पर्व, भक्ति आ परम्परा पारिस्थितिक स्मृति बचा सकैत अछि, मुदा प्लास्टिक, प्रदूषण वा असन्तुलित विकास ओहि पुलकेँ तोड़ि सकैत अछि। बढ़ू, मुदा सन्तुलन नहि तोड़ू; जीऊ, मुदा दोसर जीवन लेल ठाम छोड़ू—अन्तिम श्वास फेर माटिक नाड़ीमे नव पात बनि लौटय।

अपन आँखिसँ भोर

भोर तखन अपन होइत अछि जखन उधारक चश्मा उतारि धरती, भाषा आ प्रश्नकेँ अपन आँखिसँ देखल जाए। पद्य बाहरी ज्ञान अस्वीकार नहि करैत; ओकर आग्रह अछि जे नक्शा, मापदण्ड आ सिद्धान्त अपन अनुभवपर जाँचल जाए, नव प्रश्न, नव शब्द आ नव पद्धति रचल जाए। केवल विदेशी नाम उद्धृत करब बौद्धिक स्वतन्त्रता नहि। साँच स्वराज प्रतिदिन अपन दृष्टि फेर जाँचैत अछि—‘आइ हम ककर आँखिसँ दुनिया देखलहुँ?’ उत्तर हो: अपन, मुदा खुलल आँखिसँ।

पुरान नदीमे नव धार

पुरान नदीमे हरेक भोर नव जल उतरैत अछि; स्मृति गहराई दैत अछि, मुदा प्रवाह रोकलासँ बाँध बनि सकैत अछि। परम्परा प्रश्न रोकय तँ देबाल, प्रश्न सहय तँ जीवित नदी। पद्य भाषा, तर्क, पुनर्पाठ, नैतिकता, समाज आ विश्वविद्यालयक अनेक भावी धारकेँ एकहि नदीक अलग प्रवाह मानैत अछि। नवता पुरानकेँ मेटब नहि, पुरान नवताकेँ रोकब नहि। नदीक उत्तर स्पष्ट अछि—हम पुरान छी मुदा रुकल नहि; गहराई स्मृतिसँ, दिशा प्रश्नसँ, प्रवाह सृजनसँ, समुद्र एखन आगाँ अछि।

दीपक पाछाँक अनाम उजास

मंचपर चमकैत एक दीप वा हाथमे हलुक पुस्तकक पाछाँ अनगिन राति, पाठक, शिक्षक, अनुवादक, सम्पादक, असहमति आ मौन श्रम जमा रहैत अछि। पद्य विद्वत्ताकेँ एकल नामक विजय नहि, पीढ़ीगत साझा उजास मानैत अछि। अतीतकेँ श्रद्धासँ पढ़ू, मुदा आइक प्रश्न समक्ष जाँचू; अपन पुरान वाक्य संशोधित करब कमजोरी नहि, जीवित बुद्धि अछि। खुलापनक संग गुणवत्ता, पाठकक जिम्मेदारी आ प्रमाणक कठोरता बचल रहय; अन्तिम दीप वा अन्तिम यात्री कियो नहि, नव पीढ़ीक पहिल प्रश्नसँ यात्रा फेर आरम्भ होइत अछि।

दिशा-दिशासँ आबैत दीप

गामक बालकक पहिल ‘किएक?’ सँ विश्वविद्यालय, पुस्तकालय, शिक्षक, अलग पद्धति आ दूर-दूरक विचारधारा धरि ज्ञानक दीप दिशा-दिशासँ अबैत अछि। सौन्दर्य धर्म छू सकैत, भाषा राजनीति, चेतना विज्ञान, नैतिकता कानून—ज्ञानक सीमा प्रशासनिक रेखा जकाँ कठोर नहि। पद्य महानगरसँ बाहर छोट महाविद्यालय, क्षेत्रीय भाषा, अनुवाद, असहमति आ नव लेखककेँ ज्ञानक भविष्यक सहभागी बनबैत अछि। खुलापन अनुशासन-विहीन नहि; प्रत्येक पुस्तक अगिला पुस्तकक सीढ़ी, सिद्धान्त संशोधनक माटि आ प्रश्न नव खोजक दुआर अछि।

07 / विभाग

खण्ड ६ — प्रश्न

‘भारतीय दर्शन’क स्थिर चित्र, मुक्तिक एकधुरी व्याख्या, श्रुतिक एकस्वरता आ परम्पराक सरल सारसभ प्रश्नक घेरेमे अबैत अछि। विभाग तुलना सँ पहिने भिन्नता, पाठ-स्तर, प्रमाण, ऐतिहासिक प्रसंग आ असहमतिक वास्तविक जगह चिन्हबाक आग्रह करैत अछि।

35 स्रोत-रेकर्ड

खण्ड ६ — प्रश्न

एहि खण्डमे संग्रह विचारक इतिहासकेँ तैयार उत्तरक सूची रूपेँ नहि, जीवित प्रश्नक नदी रूपेँ पढ़ैत अछि। मुक्ति, श्रुति, सूत्र, साक्षी, प्रकृति, अभेद, कर्म, पुरुषार्थ, तर्क, पदार्थ, इन्द्रिय, भाषा आ शासन—सभ विषय परम्परागत नामक भीतरक असहमति, पाठ-इतिहास, प्रमाणक सीमा आ नव पुनर्पाठक माँग संग खुलैत अछि।

जड़ चित्रक पाछाँ बहैत प्रश्न

पुरान चिन्तनकेँ आत्मामात्र, प्रश्न-विहीन वचन वा सदिखन एके रूपमे जमल मतक जड़ चित्र बनबैत धारणासभ पद्य प्रश्नित करैत अछि। पदार्थ, देह, तर्क, असहमति आ ऐतिहासिक परिवर्तन परम्पराक भीतरहि बहैत रहल अछि। श्रद्धा आँखि मूँदब नहि; जीवित विरासत अपन छविपर संशय करैत, पुरान धारणाकेँ फेर जाँचैत, संवाद आ प्रतिवादक आगि सँ भविष्यक संग जागैत अछि।

मुक्तिक धुरीसँ बाहर विचारक आकाश

मुक्ति दर्शनक महत्त्वपूर्ण दिशा हो सकैत अछि, मुदा सभ प्रश्नकेँ एकहि लक्ष्यक चारूकात घुमाएब विचारक आकाश छोट करैत अछि। संख्या, भाषा, कारण, पदार्थ, समाज वा केवल जानबाक आनन्द सेहो स्वतन्त्र जिज्ञासा अछि। पद्य साधना आ चिन्तनकेँ भेटब दैत अछि, मुदा एक-दोसराकेँ निगलए नहि दैत; विचार प्रमाण माँगय, प्रिय लक्ष्यकेँ सेहो जाँचय, आ मुक्तिक एक घाटकेँ पूरा समुद्र नहि मानय।

मुक्ति एक प्रश्न, चिन्तन अनेक बाट

मुक्ति एक गहींर प्रश्न अछि, मुदा आत्मा, जगत, कर्म, ज्ञान, न्याय, भाषा आ सत्यक सभ जिज्ञासा ओकर एकल पहरेदार नहि। पद्य सत्ता-विषयक प्रश्न—जगत केहन अछि—आ मूल्य-विषयक प्रश्न—जीवनमे की चाही—केँ अलग करैत अछि। निर्वाण, सर्वज्ञता, आत्मबोध वा सम्बन्धक नव रूप जकाँ भिन्न मुक्तिछवि एकहि शब्दमे समाएल अछि; तें चिन्तनक गरिमा अपन प्रिय आदर्शपर सेहो तर्कक निर्मम दीप जराएबामे अछि।

श्रुतिक वनमे ककर स्वर मूल

मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक आ उपनिषदक भिन्न स्वरकेँ एकहि समयक एकरूप विधान मानबाक सरलता पद्य खोलैत अछि। ककरा ‘मूल’ आ ककरा पछाति कहल गेल, कोन पाठ प्रधान बनल, कोन छाहमे रहल—ई चयन स्वयं इतिहासक प्रश्न अछि। ग्रन्थक देहपर समयक छाप देखब श्रद्धाक अपमान नहि; वनक सम्मान प्रत्येक गाछक रूप देखबामे अछि, एक नामक छाँहमे भिन्नता मेटाएबामे नहि।

सीमाहीन कथनक भीतर मौन प्रश्न

एकहि ग्रन्थ-परम्पराक भीतर जगत, आत्मा, उत्पत्ति आ प्रश्नक भिन्न कथन रहैत अछि; पछातिक व्याख्या कखनो बहुवचनकेँ एकवचन बना दैत अछि। पद्य मौन, अनुपस्थिति आ नहि-कहल अंशकेँ स्वतः भरबाक विरुद्ध सावधानी रखैत अछि। ‘अन्तिम शिक्षा’ कहला मात्रसँ इतिहास समाप्त नहि; एकरूपताक दावा प्रमाण माँगैत अछि। जीवित ग्रन्थ ओतय अछि जतय अर्थक दुआर संवाद लेल खुलल रहय।

सूत्रक देह पर समयक अनेक लेख

छोट सूत्रक पाठ अलग युगमे जोड़, काट, नकार, विभाजन वा मिलानसँ बदलि सकैत अछि; एक सूक्ष्म शब्दभेद सम्पूर्ण तर्कक दिशा फेरि सकैत अछि। भाष्य महत्त्वपूर्ण साक्ष्य अछि, मुदा ओकरो अपन इतिहास अछि। पद्य पाठ-शुद्धिकेँ पूजा नहि, तर्कक पहिल अनुशासन मानैत अछि—पुरान कहि मानि लेब पर्याप्त नहि। ग्रन्थक प्रेम प्रश्न रोकब नहि; नम्र संशय, पाठ-साक्ष्य आ प्रमाणक कठोरता आवश्यक अछि।

साक्षी आ प्रकृतिक बीच अन्तिम दूरी

चेतन साक्षी आ बदलैत प्रकृतिक भेदकेँ बन्धन-मुक्तिक आधार मानलापर अगिला प्रश्न उठैत अछि—मुक्ति पाछाँ साक्षी प्रकृतिको देखत कि दृश्यक सम्बन्ध समाप्त होएत? जीवनमे विवेक जागि सकैत अछि, पुरान गति चाक जकाँ चलितो पहचान नहि भुलैत। पद्य कैवल्यकेँ सहज शून्यता नहि मानैत; भेदक पूर्ण बोध, सम्बन्धक अन्त वा स्वच्छ दृष्टि—एहि तनावकेँ खुलल रखैत अन्तिम स्वतन्त्रताक किनारपर ज्ञान आ मौनक प्रश्न छोड़ैत अछि।

भ्रमक गाँठिसँ अभेदक निस्तब्धता

‘हम’ आ ‘ई’क कठोर भेद जँ मूल भ्रम अछि, तँ अभिन्न सत्यक भीतर भ्रमक पहिल बीआ कोना जन्मल—पद्य एहि कठिन प्रश्नसँ अभेदक सरल जयघोष रोकैत अछि। ज्ञाता-ज्ञेय, सुख-दुःख आ अर्थ-अनर्थक द्वैत ज्ञानसँ गलि सकैत अछि, मुदा अनुभवक जगकेँ ‘छाया’ कहि टारब पर्याप्त नहि। गाँठि खोलबाक संग गाँठि बनल कोना, से पूछब जरूरी अछि; नहि तँ निस्तब्ध अभेद स्वयं नव भ्रम बनि सकैत अछि।

एक नामक भीतर अनेक विपरीत दिशा

एक विशाल दार्शनिक नामक छाँहमे अभेद, भेद, जगतक सत्य-असत्य, आत्मा-परम सम्बन्ध जकाँ विपरीत मत ठाढ़ रहैत अछि। पद्य पूछैत अछि—जँ दर्शन स्पष्ट स्थिति अछि तँ एकहि नाममे एतेक विरोधक सीमा कोना तय हो? केवल प्राचीन पाठ स्वीकारब दार्शनिक परिभाषा नहि, मुदा अत्यधिक विस्तार नामक अर्थो गमा सकैत अछि। परम्पराकेँ प्रेमसँ ओकर वास्तविक केन्द्र पूछू; उत्तर अनेक हो तँ स्वीकारू, अस्पष्टताकेँ सत्यक नाम नहि दिअ।

अग्निक अर्घ्य आ कर्मक एकल लेखा

अग्निक अर्घ्य साझा विनिमय, अन्न, वृष्टि, श्रम आ समुदायक परस्परता देखबैत अछि; दोसर धार प्रत्येक कर्मक फल कर्ताक निज लेखामे लिखैत अछि। पद्य एहि तनावकेँ सोझाँ रखैत अछि—जगत जुड़ल अछि तँ कर्म केवल ‘हमर’ कोना, मुदा सभ परिणाम साझे भेल तँ व्यक्तिगत उत्तरदायित्व कतय? कारणक धारा आ नैतिक मूल्य एक नहि, तैयो जुड़ल अछि। अनासक्ति जिम्मेदारी मेटब नहि; अपन कर्मक स्वामी हम छी, मुदा ओकर फल जगो सहैत अछि।

चारि लक्ष्यक चौखटिसँ बाहर जीवन

नीति, सम्पत्ति, चाह आ मुक्ति जीवनक उपयोगी पुरान चौखटि अछि, मुदा कलाकारक सृजन, निष्काम ज्ञान-जिज्ञासा, खेल, खोज, प्रेम आ नव अनुभव सभ कोन घरमे समाएत? पद्य चारू लक्ष्यक आपसी क्रम, इच्छाक भूमिका आ मुक्तिक सर्वोच्चता प्रश्नित करैत अछि। पुरान मानचित्र धरतीसँ छोट भऽ सकैत अछि; मानव जीवन बहु-आकांक्षी अछि, तें नव अनुभव नव लक्ष्य जन्मा सकैत अछि। सूची उपयोगी रहय, जीवन ओकर भीतमे बन्द नहि हो।

सूचीक भीत नहि, प्रश्नक जीवित नदी

मत आ नामक सूची बनि सकैत अछि, मुदा चिन्तनक इतिहास खाँचामे पूरा नहि समाइत। आत्मा, कर्म, शब्द, समाज वा प्रमाणक प्रश्न शताब्दी पारि नव बोलीमे फेर उठैत, एक उत्तर दोसर प्रतिवादक बीआ बनैत अछि। लिखित पाठ न बाँचल ठाम संकेतसँ सावधानीपूर्वक इतिहास पढ़ब पड़ैत; सभ सांस्कृतिक वस्तुकेँ दर्शन कहि देबो भेद मेटा सकैत अछि। जीवित परम्परा समस्या, तर्क आ प्रतिवादसँ चिन्हल जाए; बीतल विचार आइक प्रश्नसँ जुड़ि नदी जकाँ बहैत रहय।

यज्ञक धुँआसँ तर्कक पहिल उजास

यज्ञक अग्निक चारूकात समाज, अन्न, ऋतु, वचन आ कर्तव्यक क्रम अछि; ओही क्रमक भीतर ‘की उचित, किएक, के कहैत?’ प्रश्न जन्मैत अछि। विधिक ‘करू’ पाछाँ कारण, मन्त्रक भाषा पाछाँ शब्द-अर्थ, आ कारीगर-वैद्य-कृषकक व्यवहारमे मौन प्रयोगशाला उभरैत अछि। स्थिर आत्मा, सामान्य, शाश्वत वस्तु आदिपर संशय सेहो एहि सभ्यताक भीतरहि उठैत अछि। पद्य श्रद्धा आ संशयकेँ विरोधी नहि मानैत—अनुष्ठानक धुँआ पारि कारण पूछिते तर्कक नव उजास पसरैत अछि।

वस्तुक सात दुआर, साक्षीक एक नेत्र

द्रव्य, गुण, गति, सामान्य, विशेष, सम्बन्ध आ अभाव जकाँ दुआरसँ बाहरी वस्तु वर्गीकृत कएल जा सकैत अछि; लालिमा, फूलपन, भिन्नता आ रिक्तताक अर्थ एहि वर्गसभकेँ प्रश्न करैत अछि। मुदा सभ वस्तु जानयवला चेतना अपने कोन वर्गमे आएत? जँ साक्षी दृश्य वस्तु जकाँ हो तँ ओकरा फेर देखनिहार चाही। पद्य बाहरी श्रेणीकरणक संग ज्ञाताक स्वरूप पूछैत अछि; जगत आ साक्षीक रहस्य एक-दोसराकेँ जाँचैत अछि।

इन्द्रियक पवन थमलापर अन्तर आकाश

आँखि, कान, स्पर्श, इच्छा आ स्मृति निरन्तर बाहर दौड़ैत अछि; पद्य अनुशासनकेँ दमन नहि, ऊर्जा भीतर मोड़बाक अभ्यास मानैत अछि। देह, श्वास आ ध्यानक क्रममे साधक इच्छा-स्मृति-कल्पनाक तरंग देखैत अछि, मुदा प्रत्येक संग बहि नहि जाइत। स्वप्न आ जागरण दुनू चेतनाक पटल; शान्त मनमे दृश्य-दर्शकक भेद अधिक स्पष्ट हो सकैत अछि। स्वतन्त्रता संसारसँ भागब नहि, अपन प्रतिक्रियापर जागल नियन्त्रण अछि; मौन निष्क्रियता नहि, भीतरक स्वाधीन चाल।

शब्दक बीजसँ कल्पनाक वन

शब्द ध्वनि कि अर्थक बीआ—पद्य एहि प्रश्नसँ धातु, रूप, वाक्य, प्रसंग आ संकेतक संसार खोलैत अछि। वाक्यक अर्थ टुकड़ा जोड़लासँ मात्र नहि, कखनो समग्र स्वर रूपेँ मनमे फूटैत अछि; नहि-कहल बात लय वा प्रसंगमे जागि सकैत अछि। कविक एक पंक्ति पाठक भीतर पूरा वन खोलैत, नाटकक काल्पनिक रोदन वास्तविक नोर जगा सकैत अछि। भाषा सूचना मात्र नहि, नव अनुभव आ सम्भावना रचबाक आधार अछि; शब्द वन उगबैत, वन फेर नव शब्द जन्मबैत अछि।

राजदण्ड, श्रम आ साझा घर

समाज अनेक काजक साझा घर अछि—अन्न, रक्षा, ज्ञान, कौशल, शासन—मुदा उपयोगी श्रम-विभाजन जन्मक कठोर कैद किएक बनय, पद्य ई प्रश्न उठबैत अछि। कौशल, जोखिम आ समयक मोल अलग हो सकैत, पर मजदूरीक भेद मनुष्यक दर्जा नहि बने। राजदण्ड राजा क निजी देह नहि; जन-सुरक्षा, अन्न, शान्ति आ जनहित ओकर कसौटी। नीति परिस्थिति बुझय, शक्ति सेवा बनय, परम्परा अन्यायकेँ वैध नहि करय। साझा घरक देबाल मजबूत हो, मुदा दुआर सभ लेल खुलल रहय।

क्षणक धार आ अनेक दृष्टिक किनार

पद्य दू चुनौती एक संग रखैत अछि—क्षणिक प्रवाह स्थिर वस्तु वा आत्माक दावापर प्रश्न उठबैत अछि, आ अनेक दृष्टिक अनुशासन एकही कोणकेँ सम्पूर्ण सत्य मानबासँ रोकैत अछि। सामान्य रूप बुद्धिक निर्माण, कारण घटनाक क्रम, तथा ‘अछि/नहि अछि’ कथनक प्रसंग-निर्भरता मार्फत कविता नम्र विश्लेषणक आग्रह करैत अछि। शून्यता एतय निरर्थक रिक्ति नहि, स्थिर सारपर प्रश्न; अनेकान्त अराजकता नहि, सीमा-बोधक पद्धति बनैत अछि।

मतक भीत पारि प्रश्नक भूगोल

इतिहासकेँ मत, ग्रन्थ आ नामक सूची तक सीमित नहि रखि कविता प्रश्नसभक परस्पर यात्रा देखबाक आग्रह करैत अछि। एकहि समस्या भिन्न परम्परामे अलग शब्द पाबि सकैत अछि; लेखक सेहो एक स्कूलक बन्द घर नहि, अनेक धारासँ प्रभावित होइत अछि। कालक्रम उपयोगी अछि, मुदा प्रभाव, विवाद, हरायल ग्रन्थ आ मौन अन्तराल सभकेँ जोड़ने बिना इतिहासक धड़कन नहि पकड़ा सकैत। तें अतिशय निश्चितताक बदला समस्या-केन्द्रित, संवादात्मक भूगोलक प्रस्ताव अछि।

शब्द, शून्य आ अभेदक पूर्वराग

शब्द, अर्थ, शून्यता, अभेद, देह, चेतना आ साक्षीक प्रश्न एक-दोसरामे प्रवेश करैत छथि। पद्य स्वीकार करैत अछि जे विरोधी परम्परासभ सेहो परस्पर तत्त्व ग्रहण करैत छथि, मुदा संश्लेषक अर्थ भेद मिटाएब नहि। ‘यदि शब्द खण्डित, अर्थ समग्र कोना?’ जेकाँ प्रश्न भाषा आ चेतनाक सीमा खोलैत अछि। अन्ततः ई रचना आगाँक पैघ दार्शनिक बहसक पूर्वराग बनि बहु स्वरक बीच अभेदक सम्भावना सुनैत अछि।

सम्बन्धक सूक्ष्म जालमे ज्ञानक दीप

एक सरल वाक्य—‘गुलाब लाल अछि’—सँ कविता विषय, गुण, सम्बन्ध, ज्ञाता आ ज्ञानक जटिल जाल खोलैत अछि। संकेत, समय, स्थान, अभाव, अनुमान आ व्याप्तिक सूक्ष्मता देखबैत रचना पूछैत अछि जे सम्बन्ध वस्तुसमान अछि कि बुद्धिक रेखा। नव दार्शनिक भाषा महीन भेद पकड़बाक औजार बनैत अछि, मुदा चेतावनी सेहो अछि—सूक्ष्मता जीवनसँ कटि तकनीकी कौशल मात्र नहि बनय। स्पष्टता आ जीवित प्रसंग दुनू संग रहबाक चाही।

एक आ अनेकक अनन्त बहस

एक आ अनेकक प्रश्न अनेक रूपेँ लौटैत अछि—मूल एक हो तँ भ्रम ककर, जीव अलग हो तँ सम्बन्ध केहन, जगत आ परम दुनू सत्य हो तँ निर्भरता कोना बुझब। माया, अज्ञान, अंश, भक्ति आ प्रेमक भाषा तर्कक प्रश्नकेँ समाप्त नहि, नव रूप दैत अछि। पद्यक बल जीतपर नहि, विरोधी मतक प्रश्नसँ अपन सीमा पहचानबापर अछि। संवाद तखन मूल्यवान होइत अछि जखन एकता भेदकेँ नष्ट नहि करय आ भेद समग्रताकेँ असम्भव नहि मानय।

प्रेमक पाँचम दिशा

चार पुरुषार्थक पार प्रेमकेँ ‘पाँचम दिशा’ रूपेँ रखैत कविता चाह, लाभ वा अकेला मोक्षसँ भिन्न सम्बन्धक चरम मूल्य खोजैत अछि। सेवा, समर्पण, मित्रता, मातृस्नेह, प्रियता, स्पर्श, ध्वनि, मन्त्र आ दैनिक क्रिया सभ साधनाक भाषा बनैत छथि। हृदय आ बुद्धिक मेल भावना केँ अन्हार नहि, सत्य-अनुभवक एक विधि बनबैत अछि। मुक्ति एतय केवल अलगाव नहि; सम्बन्धमे आत्मीयता, स्वाधीनता आ प्रश्नक नव भाषा सेहो अछि।

सूक्ष्म भेदक नोक पर अर्थ

ज्ञानक एक क्षणमे वस्तु, गुण, सम्बन्ध, ज्ञाता, संकेत, स्थान, काल आ अभाव कतेक तहमे उपस्थित रहैत अछि—कविता एहि महीन संरचनाक पीछा करैत अछि। नव परिभाषा आ तकनीकी भाषा धुँधला भेद स्पष्ट करैत अछि, मुदा अनन्त विश्लेषणक सीढ़ी रोकबाक कसौटी सेहो चाही। तर्कक नोक भ्रम खोलय, अनुभवक देह नहि काटय—ई पद्यक संतुलन अछि। सूक्ष्म अर्थ काँचक बून्द जकाँ चमकैत अछि, जकर एक सावधान स्पर्श पूरा दृश्य बदलि सकैत अछि।

पुरान श्रुति आ नव आगमक संगम

पुरान श्रुति आ नव आगमक अधिकारक प्रश्न पद्यक केन्द्र अछि। मन्दिर, मन्त्र, भक्ति, तन्त्र, देह, पूजा, ध्यान आ जीवित अनुभवसभ नव धार्मिक-दार्शनिक वाणी बनबैत छथि, मुदा न पुरान वचन स्वतः अन्तिम प्रमाण अछि, न नव अनुभव। कविता संघर्षक बदला संवाद चाहैत अछि—अधिकारक प्रश्न दबाओल नहि जाए, पवित्रता स्थिर मोहर नहि मानल जाए, आ पुरान स्मृति तथा वर्तमान अनुभव दुनू प्रमाणक कसौटीपर सुनल जाए।

परम्पराक भीतमे विद्रोही खिड़की

परम्पराक घर भीतर उठल प्रश्न जब स्थापित श्रेणी, कारण, अभाव, सामान्य वा सम्बन्धक सीमा जाँचैत अछि, तखन सुधार विद्रोह बनि सकैत अछि। कविता कहैत अछि—प्राचीनता अपने-आप प्रमाण नहि; अनुभव वा तर्क सीमा देखाबय तँ नव भेद जोड़नाइ परम्परा त्याग नहि, ओकर जीवनरक्षा होइत अछि। इतिहास प्रसिद्ध मतक संग दबायल विकल्पो राखैत अछि। खिड़की असुविधा आनैत अछि, मुदा बन्द घर सुरक्षित रहिते श्वास गमा सकैत अछि।

लोकक कण्ठमे उतरैत चिन्तन

दार्शनिक चिन्तन मठ वा पाठशाला तक सीमित नहि; गीत, कहबी, माताक स्वर, साधुक पद, कारीगरक रूपक आ किसानक अनुभवमे सेहो उतरैत अछि। लोकभाषा कठिन विचारकेँ दैनिक साँसमे लबैत, भक्ति, निर्गुण, जाति, देह, आत्मा आ सम्बन्धक प्रश्नकेँ नव रूप दैत अछि। मुदा लोकप्रियता सत्यक अन्तिम प्रमाण नहि, कारण लोकस्वरमे पूर्वाग्रह सेहो रहि सकैत अछि। ज्ञान ऊपरसँ नीचाँ एकतरफा नहि, दुनू दिशि बहैत संवाद अछि।

दू भाषाक बीच टूटल सेतु

नव शिक्षाभाषा आ पुरान पाठपरम्परा अलग किनार बनिते केवल शब्द नहि, प्रश्नक वंशावली सेहो टूटैत अछि। एक वर्ग पश्चिमी ग्रन्थ-विज्ञान पढ़ैत, दोसर पुरान सूत्र बचबैत, मुदा साझा कक्ष कम होइत अछि। मुद्रण, विश्वविद्यालय आ पाठ्यक्रम अवसर आनैत छथि, संगहि चयनक सत्ता आ ‘पुरातन/वर्तमान’ विभाजनक प्रश्नो उठैत अछि। कविता अनुवादकेँ सेतु तखन मानैत अछि जखन दुनू किनार बराबर सम्मान पाबय आ अपन प्रश्नक इतिहास नव विश्वसँ संवाद करय।

टूटल परम्परासँ नव संश्लेषक पथ

टूटल परम्परापाछाँ सेहो किछु विचारक पुरान आ नव दुनू किनार देखैत सृजनात्मक संश्लेष खोजैत छथि। चेतना, पदार्थ, आत्मा, विकास, विज्ञान आ तत्त्वक प्रश्न नव शब्द पबैत अछि, मुदा कविता शब्द-मिश्रणकेँ संश्लेष नहि मानैत। परम्परा बचेनाइ प्रत्येक वचन अक्षुण्ण राखब नहि; प्रमाणक विरोध हो तँ पुनर्रचना आवश्यक। आधुनिकता वा पुरातनता ककरो स्वतः अन्तिम सत्य नहि—दुनू पर समान आलोचनाक दीप जरबाक चाही।

अजन्म मौनसँ जगक आवागमन

सृष्टिक आरम्भ मौन, कम्पन, इच्छा, प्रकृति, चेतना वा नाम-रूप—कुन रूपेँ बुझल जाए, पद्य एहि अनुत्तरित प्रश्नसभक ब्रह्माण्ड खोलैत अछि। सत्त्व-रज-तम, प्रकट-अप्रकट चक्र, सूक्ष्म जग, माया, जन्म-पुनर्जन्म आ कर्मक धागा सम्भावित रूप दैत छथि। मुदा ‘पहिल गति किएक उठल?’ प्रश्न अन्तमे मौन रहैत अछि। कविता उत्तर घोषित नहि करैत; क्षणभंगुर मनुष्यक सोझाँ अनन्त आवागमनक विस्मय टिकबैत अछि।

दुःखक प्रश्न पर नैतिक आकाश

दुःख आ नैतिक न्यायक प्रश्न कर्म-सिद्धान्तक सोझाँ कठिन आपत्ति रूपेँ राखल गेल अछि—स्मृति बिनु दण्डक अर्थ की, पुनर्जन्ममे ‘हम’ ककर, आ वर्तमान अन्यायकेँ केवल पूर्वकर्म कहि देब उचित की? कविता संयोग, प्रकृति, समाज आ आन लोकक कर्म सहित बहु कारण स्वीकार करैत अछि। करुणा तर्कसँ पहिने पीड़ितक कात हाथ बढ़बैत अछि। कर्म उत्तरदायित्वक संकेत दे सकैत अछि, मुदा नैतिक जग वर्तमान हस्तक्षेप, दया आ न्यायसँ सेहो बनैत अछि।

श्रम, शक्ति आ सीमाक नगर

नगर अनेक हाथ, ज्ञान, धन, श्रम, शासन आ सुरक्षाक मेलसँ बनैत अछि, मुदा कार्य-विभाजन जखन जन्माधारित दर्जाक सीढ़ी बनि जाए तखन कविता प्रश्न उठबैत अछि। राज्य, मन्त्री, कोष, सेना, भूमि, मित्र आ पड़ोसी शक्तिक जाल बनबैत छथि, पर विजय वा दण्ड जनकल्याण बिनु रिक्त अछि। व्यक्ति समग्र समाजक पुर्जा मात्र नहि। श्रमक सम्मान, अवसरक खुलापन आ शक्तिपर उत्तरदायित्वक बाँध बिना व्यवस्था न्यायपूर्ण नहि ठहरैत।

रसक क्षणमे जगत आनन्द बनल

मंचपर शोक देखिते दर्शक आनन्द किएक अनुभव करैत अछि—पद्य रसक एहि विरोधाभाससँ आरम्भ होइत अछि। निजी भाव कला, अभिनय, स्मृति, लय आ कल्पनासँ साझा अनुभूति बनैत अछि; दूरी रहितो अनुभव झूठ नहि होइत। रस मनोरंजन मात्र नहि, संकुचित ‘हम’क विस्तारक क्षण अछि। भक्ति, संगीत, नृत्य, देह आ तान्त्रिक पवित्रताक संकेत मिलि सौन्दर्य, साधना आ सम्बन्धक सीमा कखन-कखन एक आकाशमे भेटैत अछि।

समयक धूलिमे पदचिह्न खोजैत मन

इतिहासक धूलिमे बचल ग्रन्थ, हरायल पाठ, अनिश्चित तिथि, एक नामक अनेक व्यक्ति, पाण्डुलिपिक पछिला प्रति आ परम्परागत वंशावली सभ प्रमाणकेँ अपूर्ण बनबैत छथि। कविता सावधान इतिहासलेखनक आग्रह करैत अछि—जतय आधार अनुमान अछि, ओतय ‘कदाचित्’ कहब कमजोरी नहि; रिक्त स्थान कल्पनासँ भरब अनुचित। तिथि मात्र नहि, प्रश्न, प्रभाव आ विचारक गति देखबाक चाही। सम्पूर्ण चित्रक दावा छोड़ि बचल रेखासँ नम्र अर्थ बनबैत इतिहास विश्वसनीय होइत अछि।

08 / विभाग

खण्ड ७ — अनेक दिशाक दार्शनिक आकाश

अनेक दार्शनिक परम्परा, प्रमाण-पद्धति, सत्ता-दृष्टि, देह, आत्मा, भाषा, श्रम, नैतिकता आ मुक्तिक अवधारणा एक विशाल तुलनात्मक आकाशमे रखल गेल अछि। साझा रूपक रहितो अलग तर्कक भेद बचाओल जाइत अछि; तुलना ओतहि फलदायी अछि जतय बाट अलग होइत अछि।

98 स्रोत-रेकर्ड

खण्ड ७ — अनेक दिशाक दार्शनिक आकाश

ई केवल संरचनात्मक खण्ड-शीर्षक अछि; स्रोतमे एहि शीर्षकक स्वतंत्र पद्य-पाठ नहि अछि। ‘अनेक दिशाक दार्शनिक आकाश’ नामक एहि खण्डक बादक पद्यसभ विभिन्न दार्शनिक दिशाकेँ एकहि प्रश्न-आकाशमे राखि तुलना, संवाद आ सीमा-बोधक क्रम खोलैत छथि।

अनेक दिशाक एक सत्य

एक दीपकेँ अनेक कोणसँ देखबाक रूपकसँ पद्य सत्यक बहुदृष्टि खोलैत अछि। वस्तु अनेक गुण, सम्बन्ध आ काल समेटने रहैत अछि; तें एक वचनमे सम्पूर्णता बाँधब कठिन। प्रत्यक्ष, स्मृति, पहचान, अनुमान, शब्द आ तर्क ज्ञानक अलग बाट बनैत छथि, प्रत्येकक कसौटी आवश्यक। कविता सत्यपर अधिकारक बदला संवाद, ज्ञानपर अभिमानक बदला अनुशासन, आ मतभेदकेँ सत्यक राह खोलबला सम्भावना रूपेँ देखैत अछि।

कारणक सीढ़ी, सत्ताक ज्योति

विश्वास आ बुद्धिकेँ शत्रु नहि, सत्यक दू सहयात्री मानि पद्य कारण, सत्ता, सम्भावना-क्रिया, देह-आत्मा, सद्गुण, विधि, राज्य आ परम सत्यक प्रश्न जोड़ैत अछि। परिवर्तन पाछाँ कारण खोजैत बुद्धि अनिवार्य आधारक कल्पना धरि पहुँचैत अछि, मुदा कविता तर्ककेँ सम्पूर्ण स्वर्ग घोषित नहि करैत। विश्वास सत्यसँ जन्मल हो तँ तर्कसँ भय किएक, तर्क सत्यक सेवक हो तँ अहंकार किएक—एहि प्रश्नसँ अन्तिम स्वर नम्रता, सीमा-बोध आ दीर्घ उजासक बनैत अछि।

अपनहि उजासक प्रत्यभिज्ञा

चेतना, तर्क, व्याकरण, काव्य, तन्त्र, अनुभव आ साधनाक अनेक धारा एकहि आकाशमे मिलैत अछि। पद्य जगतकेँ मिथ्या छाया मानि टारबाक बदला चेतन मूलक बहुरूप अभिव्यक्ति रूपेँ देखैत अछि; प्रकाशक संग ‘विमर्श’ जुड़िते चेतना अपनहि स्वरूप पहचानैत अछि। मुक्ति दूरक वस्तु नहि, भुलायल आत्म-चिन्हक पुनः प्रत्यभिज्ञा अछि। रचना तर्क आ अनुभव, काव्य आ दर्शन, रूप आ अरूप बीच विरोधक भीत नहि, संवादक सेतु बनबैत अछि।

माटिसँ अतिमानस धरि

माटिक जड़ पदार्थसँ जीवन, जीवनसँ मन आ मनसँ व्यापक चेतना धरि विकासक क्रम पद्यक मुख्य रूपक अछि। मानव अन्तिम पड़ाव नहि, बीचक दुआर अछि; आरोहणक संग ऊर्ध्व चेतनाक अवतरण सेहो आवश्यक मानल गेल अछि। धरती छोड़ि मुक्ति नहि, धरतीमे दिव्य सम्भावना उतारब लक्ष्य बनैत अछि। अतिमानस चमत्कारक पलायन नहि, विभक्त चेतनाक गाँठ खोलि ज्ञान, कर्म आ प्रेमकेँ एकत्वक व्यापक अनुभवमे रूपान्तरित करबाक संकेत अछि।

रूप, कारण आ मध्यम मार्ग

रूप, पदार्थ, कारण, संभावना, कर्म, सद्गुण, समाज आ कलाकेँ एकहि धरतीपर रखि पद्य पूछैत अछि—जे अछि, ओकर अर्थ की, आ मनुष्य श्रेष्ठ जीवन कोना गढ़य। बीजमे वृक्षक संभावना आ कारणक गर्भमे कार्यक रूपक परिवर्तनकेँ क्रमबद्ध बनबैत अछि। इन्द्रियक तथ्य बुद्धिक सामान्य अर्थसँ जुड़ैत अछि; तर्क जीतक हथियार नहि, सम्बन्ध स्पष्ट करबाक अनुशासन अछि। नैतिक जीवन अति-न्यूनक बीच विवेकपूर्ण मध्य, विकसित क्षमता आ समुदायिक लोकहितसँ बनैत अछि।

सन्देहक रातिसँ विश्वासक भोर

सन्देह एहि पद्यमे विश्वासक शत्रु नहि, झूठ भरोसाक धूल हटाबयबला सफाईक धार अछि। इन्द्रिय, स्वप्न, तर्क, प्रतिष्ठा आ बाहरी यश सभकेँ परखैत मन अन्ततः बुझैत अछि जे ज्ञान माथक संग्रह मात्र नहि, आचरण आ आत्मनिरीक्षणक रूपान्तरण सेहो चाहैत अछि। बुद्धिक सीमा स्वीकारब कमजोरी नहि, नम्रता अछि; विश्वास अन्हर समर्पण नहि, अनुभवक एक आरो खिड़की। रातिक संशयक बाद जे भरोसा उगैत अछि, से प्रश्न आ प्रकाश दुनूकेँ संग लऽ चलैत अछि।

भीतरक प्रकाश आ दू नगर

बाहरी सुखक पीछाँ दौड़ैत मन भीतरक रिक्ततासँ जूझि स्थिर अर्थ खोजैत अछि। दृश्य जग बदलैत रहैत अछि, मुदा सत्य मापबाक बुद्धिगत उजास, नैतिक क्रम आ परम आधारक प्रश्न उठैत रहैत अछि। अशुभ स्वतन्त्र सत्ता नहि, भलाइ घटबाक अभाव आ भटकल इच्छाक रूपेँ देखाओल गेल अछि; स्वतन्त्रता संग जिम्मेदारी अनिवार्य अछि। व्यक्ति आ समाजक ‘दू नगर’ इच्छाक भिन्न दिशासँ बनैत छथि, आ दर्शनक परीक्षा अन्ततः हृदयक क्रम, प्रेम, चरित्र आ न्यायमे होइत अछि।

शब्दक पार जे स्वर जागय

कविता वाच्यार्थक पार अनकहल अर्थक कम्पन खोजैत अछि। अभिधा सोझ अर्थ दैत अछि, लक्षणा सन्दर्भमे सीमा बढ़बैत अछि, आ व्यञ्जना ओहि सूक्ष्म भावकेँ जगबैत अछि जे उच्चरित शब्दसँ पैघ होइत अछि। रस लेखक वा पात्रक निजी भाव नहि रहि सहृदय पाठकक साझा अनुभव बनैत अछि। आलोचना अलंकार गिनती नहि, कहल-अनकहल अर्थक तह खोलबाक धैर्यपूर्ण अभ्यास होइत अछि; पाँति समाप्त भेला पाछाँ हृदयमे जे अर्थ जीवित रहैत अछि, से काव्यक प्राण बनैत अछि।

कहबो एकटा काज अछि

भाषा वर्णन मात्र नहि, कर्म सेहो करैत अछि—वचन देब, नामकरण, आदेश, अनुरोध वा क्षमा कहिते सामाजिक घटना घटि सकैत अछि। पद्य कथनक देह, वक्ताक उद्देश्य आ श्रोता पर पड़ल प्रभावक अलग तह चिन्हैत अछि। एकहि वाक्य प्रसंग अनुसार खबर वा अनुरोध बनि सकैत अछि; अर्थ शब्दमे बन्द नहि, प्रयोग, व्यक्ति, समय आ परिस्थितिसँ बनैत अछि। कहल बातक भार उठेनाइ नैतिक जिम्मेदारी अछि, तें ‘कहबो एकटा काज’ बनैत अछि।

एकहि उजासक अनेक दुआर

अनेक धर्म, भाषा, प्रतीक, साधना आ अनुभवक दुआर एकहि गहिर सत्य-पिपासाक दिशि खुलि सकैत छथि। पद्य एकत्वकेँ भेद मेटेबाक आदेश नहि मानैत, आ अनेकत्वकेँ मूल सम्बन्ध भुलाबयबला विखण्डन नहि बनबैत। ज्ञानक संग प्रेम आ अन्तरानुभवक मूल्य अछि, मुदा कट्टर दावा जे सत्य केवल हमर अछि, ओकर विरोध कएल गेल अछि। भिन्न विश्वासमे पहिने मनुष्यता देखब, करुणा आ विनम्रता संग सीमा पार करब—एहि रूपेँ एक उजास अनेक दुआर पबैत अछि।

प्रकृति नाचय, पुरुष देखय

प्रकृति परिवर्तनशील नर्तकी आ पुरुष नीरव साक्षी रूपेँ पद्यक मूल द्वैत बनैत अछि। कारणमे कार्यक संभावना, तीन गुणक असंतुलन, बुद्धि-अहंकार-मन-इन्द्रियक क्रम आ सूक्ष्मसँ स्थूल जगतक विकास समझाओल गेल अछि। बन्धन प्रकृतिक क्रियाकेँ साक्षीक अपन क्रिया बुझबाक भ्रमसँ जन्मैत अछि। प्रत्यक्ष, अनुमान आ विश्वसनीय वचन ज्ञानक बाट छथि; मुक्ति जग छोड़ब नहि, बदलैत प्रकृति आ देखनिहार चेतनाक विवेकपूर्ण भेद पहचानब अछि।

तर्कक फूलसँ सत्यक अर्घ्य

तर्क आ श्रद्धाकेँ विरोधी नबना कऽ पद्य दावाकेँ प्रमाण, हेतु, व्याप्ति आ सम्बन्धक कसौटीपर राखैत अछि। देखल चिह्नसँ अदृश्य कारण धरि अनुमान अन्ध छलाँग नहि, अनुशासित प्रक्रिया अछि; आत्मा, जगत वा ईश्वरक प्रश्नो प्रमाणक सीमा बिनु निष्कर्ष नहि पबैत। विरोधी मत सम्पूर्ण सुनब आ तीक्ष्ण आपत्तिपर अपन आधार फेर जाँचब दार्शनिक जीवितताक शर्त अछि। ज्ञानक फूल अहंकार बनि नष्ट नहि हो, तें तर्कक अर्घ्य नम्रता संग सत्यक दुआरपर चढ़ैत अछि।

हेतुक दीप, आत्माक साक्षी

पुरान सूत्रपर उठल कठोर आपत्तिक उत्तरमे हेतु, पक्ष, सपक्ष, विपक्ष, परामर्श आ हेत्वाभासक सूक्ष्म अनुशासन विकसित होइत अछि। प्रत्यक्षो साधारण ‘देखब’ नहि—वस्तु, गुण, जाति, सम्बन्ध आ माध्यमक प्रश्न ओकर भीतर अछि। आत्माक स्थायित्व स्मृति, भाषा आ ‘हम’क निरन्तर प्रत्ययक आधारपर जाँचल जाइत अछि, मुदा विरोधी मतकेँ चुप नहि कराओल जाइत। पद्य परम्पराकेँ जड़ि नहि, परीक्षण-सहिष्णु विचारक अभ्यास बनबैत अछि।

पदार्थक गति, मनुष्यक मुक्ति

कारखानाक धुँआ, श्रमिकक हथेली, उत्पादन, पूँजी, जमीन आ वर्ग-संघर्षक दृश्य भौतिक परिस्थिति आ विचारक सम्बन्ध खोलैत अछि। इतिहास राजाक सूची नहि, श्रमक घामो अछि; समाज स्थिर पाषाण नहि, विरोध आ परिवर्तनक गतिशील रचना अछि। श्रमिक अपन सृजन, समय आ वस्तुसँ पराया होएत तँ मुक्ति केवल रोटी वा शासन-परिवर्तनसँ पूरा नहि होइत। विज्ञान, संगठन, साझा विवेक आ समान अवसरक धरतीपर मानवीय क्षमता फुलब—पद्यक सामाजिक मुक्ति एहि दिशि देखैत अछि।

अर्थक कसौटी

‘अहाँ कहैत छी, जाँचब कोना?’—पद्य अर्थक मुख्य कसौटी एहि प्रश्नमे रखैत अछि। तार्किक/गणितीय कथन अपन संरचनासँ अर्थ पबैत अछि, अनुभवजन्य कथन परीक्षणक सम्भावित बाट माँगैत अछि, आ प्रमाणसँ सर्वथा कटि गेल विराट तत्त्वमीमांसक शब्द प्रश्नक घेरेमे अबैत अछि। नैतिक आ सौन्दर्य-वाक्य तथ्य-जाँचक समान धरातलपर नहि रहैत। भाषा-विश्लेषणक अनुशासन दावा, परिभाषा, प्रमाण आ मूल्यक भेद स्पष्ट करैत अछि।

कण-कणमे भेदक व्याकरण

द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय आ अभावक माध्यमेँ पद्य जगतक ‘भेदक व्याकरण’ रचैत अछि। पृथ्वी-जलक स्थूल रूपसँ मन-आत्मा आ परमाणुक सूक्ष्म आधार धरि वर्गीकरण नामक खेल नहि, वस्तु कोना चिन्हल जाए तकर विधि अछि। गति स्थिरता केँ भंग करैत, सामान्य अनेककेँ जोड़ैत, विशेष भिन्नता बचबैत, आ अभाव अनुपस्थितियो ज्ञानक अंश बनबैत अछि। प्रत्यक्ष-अनुमानक अनुशासन कल्पना आ प्रमाणक सीमा राखैत अछि।

अपन आचरणसँ राज्य सँवारू

राज्यक सुधार मनुष्यक आचरणसँ आरम्भ होइत अछि—व्यक्ति, परिवार आ शासनक क्रम एहि पद्यमे नैतिक सम्बन्धक जाल बनबैत अछि। मनुष्यता, पारस्परिकता, मर्यादा, शिक्षा, नम्रता आ उदाहरणक शक्ति राजदण्डसँ पैघ मानल गेल अछि। दोसरा पर ओ नहि करू जे अपने सहब नहि चाही—एहि सरल कसौटीसँ अधिकार आ कर्तव्य जुड़ैत अछि। परम्पराक आदर अन्ध अनुकरण नहि; जीवित सद्गुण व्यवहारमे उतरिते समाजक भविष्य सँवरैत अछि।

अनुभवक साँचा, कर्तव्यक दीप

ज्ञान बाहरी अनुभवक नकल मात्र नहि, न मनक अकेला कल्पना; स्थान-कालक चौकट, बुद्धिक श्रेणी आ अनुभूतिक सामग्री मिलि प्रपञ्चक बोध बनबैत अछि। वस्तु अपनेमे की अछि, ओहि सीमापर बुद्धि नम्र होइत अछि। ज्ञानक प्रश्नक संग नैतिक कर्तव्य जुड़ैत अछि—मनुष्य साधन मात्र नहि, स्वयं उद्देश्य; स्वतन्त्रता मनमानी नहि, स्वीकृत सार्वभौम नियमक उत्तरदायित्व अछि। समान नागरिक स्वाधीनता आ न्यायसँ स्थायी शान्तिक सम्भावना जुड़ैत अछि।

अर्थक नक्शा, भाषाक अनुशासन

शब्दक अर्थ स्पष्ट करबाक लेल पद्य अनुभव, सत्यापन/पुष्टि, प्रेक्षण-वाक्य, तार्किक संरचना आ वैज्ञानिक कथनक सम्बन्ध जाँचैत अछि। आरम्भिक कठोर ‘जाँच नहि तँ अर्थ नहि’ दृष्टिक सीमा स्वीकारि आंशिक पुष्टि आ सिद्धान्त-प्रेक्षण सेतु लेल ठाम बनाओल गेल अछि। तर्क, गणित, तथ्य-वाक्य आ विराट तत्त्वमीमांसक दावाक भिन्न काम चिन्हल जाइत अछि। दर्शन अन्तिम आदेश नहि, भाषा-विचारक गाँठ खोलबाक अनुशासन बनैत अछि।

प्रतीकक जग, मनुष्यक अर्थ

मनुष्य बाहरक जगक नकल मात्र नहि करैत; भाषा, संख्या, विज्ञान, मिथक, कला, धर्म आ इतिहासक प्रतीक-रूपसँ अनुभवकेँ अर्थ दैत अछि। प्रत्येक प्रतीक-व्यवस्थाक अपन नियम अछि, तें विज्ञान एकमात्र मानवीय भाषा नहि, मिथको तथ्यक स्वतः प्रमाण नहि। भाषा अनाम भावकेँ नाम दैत, कला साधारण दृष्टिसँ छुटल अर्थ देखबैत, मिथक प्राचीन मानसिक लय सँभारैत अछि। प्रतीकक शक्ति मुक्ति सेहो दे सकैत अछि, राजनीतिक भयक औजारो बनि सकैत; विवेक ओकर पहरा अछि।

चुनावक क्षण, आस्थाक छलाँग

व्यक्ति भीड़, व्यवस्था वा तैयार दार्शनिक प्रणालीक भीतर गुम नहि हो; जीवनक निर्णायक क्षणमे अपन चुनावक जिम्मेदारी स्वीकारय—पद्यक केन्द्र एहि अस्तित्वगत आग्रहमे अछि। स्वतन्त्रता संग चिन्ता अबैत अछि, चुनाव टारबो चुनाव बनि जाइत अछि। क्षणिक सौन्दर्यक जीवनसँ नैतिक प्रतिबद्धता आ तकर पार व्यक्तिगत आस्थाक सम्बन्ध धरि तीन स्तर खुलैत छथि। विश्वास गणितीय निष्कर्ष नहि; अनिश्चितताक सीमा पर सम्पूर्ण अस्तित्वसँ स्वीकारल छलाँग अछि।

प्रमाणक छह दीप

ज्ञानक छह दीप—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति आ अनुपलब्धि—पद्यक संरचना बनबैत छथि। जग बाहरी यथार्थ रूपेँ स्वीकारल गेल अछि; द्रव्य-गुण-सामान्य-विशेषक अनेकता ज्ञानक विषय बनैत अछि। प्रत्यक्ष इन्द्रिय-दुआर, अनुमान चिह्न-संबन्ध, उपमान समानता, शब्द विश्वसनीय वाणी, अर्थापत्ति असम्भवता सुलझाबयबला अनकहल शर्त, आ अनुपलब्धि अभावक बोध दैत अछि। एकहि दुआरसँ सत्य नहि पढ़ि, अनेक प्रमाणक अनुशासनसँ अर्थ पकड़बाक आग्रह अछि।

अनुभवक धरती पर समाजक विज्ञान

उथल-पुथल समयमे ज्ञानक ठोस आधार अनुभव, निरीक्षण, तुलना आ परीक्षणमे खोजल जाइत अछि। पद्य अन्तिम रहस्यक दम्भ छोड़ि घटनाक ‘कोना’ आ नियमबद्ध सम्बन्ध बुझबाक आग्रह करैत, विज्ञानसभक सरलसँ जटिल क्रममे समाज-विज्ञानक विशेष कठिनाइ देखबैत अछि। सामाजिक व्यवस्था आ परिवर्तन दुनूकेँ पढ़ैत ओ ज्ञानकेँ केवल जानबाक साधन नहि, उत्तरदायी लोककल्याण आ प्रगतिक संग जुड़ल अभ्यास बनबैत अछि।

राज्यक मूल प्रजाक हित

राज्यकेँ मुकुट वा राजदण्ड नहि, कृषि, बजार, कोष, सेना, न्याय, प्रशासन आ लोकजीवनक परस्पर जुड़ल देह रूपेँ पढ़ल गेल अछि। पद्य अधिकारीक लेखा-जाँच, भ्रष्ट लोभपर पहरा, उत्पादन-व्यापार-करक संतुलन आ विविध सामाजिक वृत्तिक ठामक प्रश्न उठबैत अछि। सत्ता, नीति आ अर्थ तखनहि सार्थक बनैत अछि जखन प्रजाहित, दूरदृष्टि, न्याय आ उत्तरदायित्व ओकर मूल मान बनय।

अनुभूतिक रूप, इतिहासक स्वतन्त्रता

चेतना निष्क्रिय दर्पण नहि; बाह्य जग आ भीतरक जीवित क्रिया मिलि अनुभवकेँ रूप आ अर्थ दैत अछि। पद्य कला, अवधारणा, व्यावहारिक बुद्धि आ इतिहासकेँ एहि सक्रिय अनुभूतिक अलग-अलग विस्तार रूपेँ जोड़ैत अछि। इतिहास मृत तिथिक ढेरी नहि, वर्तमान प्रश्नसँ जागल स्मृति बनैत अछि; स्वतन्त्रता सेहो अमूर्त राजनीतिक शब्द नहि, दमनक विरुद्ध मानवीय गरिमा फेर-फेर खोजबाक नैतिक धार बनि उभरैत अछि।

अनुभवक किनार पर विश्वासक जाल

ज्ञानकेँ अचल किला नहि, परस्पर बान्हल विश्वासक जाल रूपेँ देखाओल गेल अछि, जाहिमे किनारपर अबैत नव अनुभव सम्पूर्ण बुनावटकेँ धीरे-धीरे बदलि सकैत अछि। कोनो विश्वास सदा लेल अभेद्य नहि; ज्ञानक गरिमा अपन भूल सुधारबाक सामर्थ्यमे अछि। अनुभव बिनु जाल अन्हर आ जाल बिनु अनुभव बिखरल रहैत, तें सत्यक जीवित खोज निरन्तर परीक्षण, पुनर्विचार आ संशोधनक लेल खुलल रहबाक माँग करैत अछि।

ज्ञानक चारि दुआर

पद्य ज्ञानक चारि दुआर—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आ विश्वसनीय शब्द—केँ अलग बल आ सीमा सहित खोलैत अछि। देखल मात्र सत्य नहि, अनुमान हेतु माँगैत, तुलना अपरिचितकेँ परिचित संकेतसँ चिन्हबैत, आ वाणी तखने प्रमाण बनैत अछि जखन स्रोत आ अर्थ विश्वसनीय हो। कोनो एक बाट सर्वस्व नहि; विवेक, प्रसंग आ प्रमाणक अनुशासन चारूकेँ जोड़ैत अछि, आ प्रत्येक उत्तरक भीतर नव प्रश्नक जन्म जारी रहैत अछि।

सत्यक धागा, करुणाक करघा

सत्यकेँ दैनिक बोली, कर्म आ मनक एकरूपता रूपेँ, करुणाकेँ निर्बल कोमलता नहि बल्कि अन्यायक सामने निर्भय नैतिक शक्ति रूपेँ रचल गेल अछि। श्रम, स्वदेशी, संयम, अभय आ भिन्न विश्वासक समभाव एहि करघापर एक संग बुनाइत छथि। कठोर नियम जँ मनुष्यपर बोझ बनय तँ विवेक आ करुणासँ ओकर प्रयोजन फेर जाँचल जाए; भीतरक परिवर्तन आ बाहरी लोककल्याण एक-दोसरसँ अलग नहि रहय।

निद्राक चारि घाट पारि अजन्म उजास

जागरण आ स्वप्न दुनू अपन समयमे सत्य-जकाँ ठोस अनुभव देत, मुदा एक-दोसरक आगमनमे ओकर स्थायित्वक दावा हिलि जाइत अछि। गाढ़ निद्रामे भेदक कोलाहल शान्त होइतहुँ अज्ञानक बीज रहैत, आ चौठम अवस्था भाषा द्वारा सहज पकड़मे नहि अबैत। पद्य चारि घाट पारि चेतनाक एहन अखण्ड उजासक संकेत करैत अछि जतय अनुभवक भिन्न रूप देखल जाइत अछि, मुदा ककरो एक रूपकेँ अन्तिम सम्पूर्ण सत्य नहि मानल जाइत।

संशयसँ निर्णय धरि

संशयसँ निर्णय धरि यात्रा एक छलाँग वा अन्ध विश्वास नहि, प्रश्न, प्रमाण, तर्क आ परीक्षणक क्रमिक साधना अछि। प्रत्यक्ष, अनुमान, तुलना आ विश्वसनीय वाणी अपन-अपन सीमा सहित जाँचल जाइत छथि; अधिकारक भारी स्वर मात्र सत्यक मुहर नहि पबैत। बेठीक बोधसँ इच्छा आ कर्मक जाल बनैत अछि, तें यथार्थ ज्ञान भ्रमक गाँठ खोलैत अछि। पद्य प्रत्येक मान्यताक आधार स्पष्ट राखि नव प्रश्नक स्वागत करबाक आग्रह करैत अछि।

प्रेमक नाममे खुलैत अनन्त

एक सत्यक अनेक रूप, जीव-जगतक भिन्नता आ मूलसँ ओकर अखण्ड सम्बन्ध पद्यक केन्द्र अछि। प्रेम आ भक्ति सूखल नियम नहि, श्रवण, स्मरण, सेवा, सख्य, आत्मनिवेदन आ अनेक भावक जीवित सम्बन्ध बनैत अछि। जाति, कुल, धन वा शास्त्रक गर्व प्रेमक आगाँ गौण ठहरैत; मिलनमे भेद पूर्ण मेटैत नहि, मुदा दूरी गलैत अछि। एहि अचिन्त्य संगतिक भीतर बुद्धिक सीमा आ हृदयक सेतु एक संग खुलैत अछि।

कर्मक पाछाँ अनदेखल सेतु

धर्मकेँ कर्मक भीतरक अनुशासन रूपेँ पढ़ैत पद्य वाणीमे आदेश, निषेध, स्तुति, नाम आ संकेतक अलग कार्य चिन्हैत अछि। फल तुरन्त नहि भेटलासँ कर्म व्यर्थ नहि; बीज जकाँ अदृश्य सम्बन्ध समय पारि असर राखि सकैत अछि। कर्मक मोल लाभ मात्र नहि, कर्तव्यक अपन मान सेहो अछि। ज्ञान कर्मकेँ दिशा दैत आ कर्म ज्ञानकेँ देह, तें वचन, काज, फल आ जिम्मेदारीक बीचक अदृश्य सेतु सजग रहबाक माँग करैत अछि।

समस्या सँ अनुभवक नव बिहान

जगत आ मन अलग-अलग बन्द घर नहि; देह, परिवेश, क्रिया आ चेतनाक भेटमे अनुभव निरन्तर बनैत अछि। स्थिर निश्चय विकास रोकि सकैत आ दिशाहीन संशय कर्म हरबा सकैत, तें अनुसन्धान, परीक्षण आ पुनर्विचार दुनूक बीचक बाट बनैत अछि। नैतिक मूल्य सेहो जीवनक परिणाम, दुःख आ फुलबाक सम्भावनासँ जाँचल जाए। पद्य कोनो निष्कर्षकेँ अन्तिम सिंहासन नहि दैत; बदलैत जगमे बुद्धिक बदलि सकबाक सामर्थ्य ज्ञानक जीवितता अछि।

क्षणक रूप, निषेधक भाषा

पहिल क्षणक प्रत्यक्षमे रूप नाम, जाति आ अवधारणासँ पहिने अपन अद्वितीय उजासमे प्रकट होइत; पाछाँ भाषा ओकरा परिचित वर्ग आ सम्बन्धमे राखैत अछि। अनुमान सामान्य चिन्हक बाट चलैत, जखन कि प्रत्यक्ष विशेष क्षणक उपस्थिति धरैत अछि। शब्दक अर्थ ‘ई नहि, ओ नहि’क निषेध-घेरासँ सेहो उभरैत अछि। पद्य सोझ अनुभूति, कल्पना आ अनुमानक सीमा अलग राखि ज्ञानमे भ्रमक गाँठ खोलबाक अनुशासन सिखबैत अछि।

संशयक राखिमे निश्चित स्वर

पद्य पुरान विश्वासकेँ मूल धरि परखबाक कठोर संशय सँ आरम्भ होइत अछि: इन्द्रिय धोखा दऽ सकैत, जागरण-स्वप्नक सीमा धुँधला भऽ सकैत, गणना धरि प्रश्नक घेरामे आनि सकैत अछि। मुदा संशयक क्रिया स्वयं संशय करनिहारक उपस्थितिक एक निश्चित स्वर छोड़ैत अछि—सोच चलैत अछि तँ ‘हम छी’क बोध मेटैत नहि। एहि आधारसँ ज्ञान फेर क्रमशः बनैत अछि, बिना एहि दावाक जे आरम्भिक इन्द्रिय-अनुभव अपनेमे अन्तिम निश्चय छल।

क्षणक उजास, हेतुक पाँखि

ज्ञानक मुख्य दू पाँखि रूपेँ प्रत्यक्ष आ अनुमान अलग-अलग कार्य करैत छथि। प्रत्यक्ष कल्पना-विहीन निकट बोधक क्षणिक उजास अछि; अनुमान नियमित चिन्ह आ कारण-सम्बन्धक आधारपर दूरक अर्थ खोलैत अछि। क्षण उदय संगहि क्षयक संकेत धरैत, मुदा कारण-कार्यक क्रम निरन्तरता बनबैत अछि। त्रिरूप हेतु मनमानी उड़ान रोकैत; पद्य ‘जे देखल तकर सीमा’ आ ‘जे सोचल तकर कारण’ स्पष्ट राखबाक परीक्षणशील अनुशासनपर बल दैत अछि।

शून्यक बीच सम्बन्धक ज्योति

शून्यकेँ अन्हार वा सभक नाश नहि, वस्तुक स्वतन्त्र अचल स्वभाव नहि होएबाक बोध रूपेँ प्रस्तुत कएल गेल अछि। फूल, श्वास, कारण आ फल सभ परस्पर निर्भर सम्बन्धमे बनैत-बदलैत छथि। व्यवहारक दैनिक सत्य आ गहिर स्वभाव-शून्य दृष्टि विरोधी नहि, एक-दोसरक दुआर बनैत अछि। पकड़ ढील भेलापर संसार छोड़ि भागब नहि, आसक्ति घटब मुक्ति बनैत; मध्य पथ नित्यताक पत्थर आ पूर्ण नाशक खाई दुनूसँ बचैत करुणाक बाट खोलैत अछि।

भेदक भीतर अभेदक राग

एकहि मूलसँ जग फूटितो प्रत्येक जीव आ रूपक अपन पहचान बचल रहैत अछि; भेद आ अभेद दुनू एक संग सत्यक राग बनैत छथि। जगत झूठक पर्दा नहि, शक्ति-विस्तार अछि; जीव सीमित चेतन ज्योति, कर्म आ अहंकारसँ बान्हल। ज्ञान आ कर्म आवश्यक, मुदा प्रेम-सम्मिलन बिना सूखल पड़ि सकैत अछि। समर्पण अहंकारक भार घटबैत, सेवा आ स्मरण सम्बन्ध गहिरबैत; मुक्तिमे स्वत्व नष्ट नहि, दूरी गलि मूलसँ आनन्दमय निकटता बढ़ैत अछि।

पुरान मूल्यक राखसँ नव अगिनि

जीवनकेँ दूरसँ निहारबाक बदला दुःख-उल्लास सहित भीतर उतरि अर्थ गढ़बाक आग्रह अछि। भयजनित पुरान मूल्य, दीनता वा अन्ध आज्ञाकारिताकेँ प्रश्नक कसौटी पर राखि स्वाभिमान, साहस आ आत्म-विजयक नव मूल्य रचल जाइत अछि। बाहरी अन्तिम आदेश मौन भेलापर जिम्मेदारी घटैत नहि, आरो गहिर होइत अछि। पुनरागमनक कल्पना प्रत्येक निर्णयकेँ एहन कसौटी बनबैत अछि—की एहि जीवनकेँ फेरो स्वीकारि सकब? राखसँ उठल नव अगिनि दहन नहि, सृजनशील उत्तरदायित्वक उजास बनय।

शब्दक देहमे अर्थक धड़कन

ध्वनि क्षणिक होइतहुँ अर्थ कोना टिकैत—पद्य एहि प्रश्नसँ वर्ण, शब्द, जाति, व्यक्ति, गुण, क्रिया आ वाक्यक सम्बन्ध खोलैत अछि। वाक्य ईंटक ढेरी नहि; अपेक्षा, संगति आ प्रसंगसँ समूचा बोध बनैत अछि। विश्वसनीय वाणी दूरक अनुभव सेहो ज्ञानक बाट बना सकैत, मुदा प्रत्येक आवाज प्रमाण नहि। भाषा सामाजिक स्मृति, चिन्हारि आ जिम्मेदारीक क्षेत्र अछि; बेठीक शब्द जकाँ बेठीक भावो अर्थ बिगाड़ि सकैत, तें भाषाक साधना अन्ततः चेतनाक सजग साधना बनैत अछि।

चित्तक तरंग थमल तखन

चित्तक तरंग स्मृति, कल्पना, निद्रा, भ्रम आ प्रमाणक अनेक रूपमे उठैत अछि; ओकर निरोध बलपूर्वक पत्थर बनब नहि, अभ्यास आ वैराग्यसँ पकड़ ढील करब अछि। श्वास, आसन, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान आ समाधि क्रमशः भीतरक दर्पण साफ करैत, मुदा नैतिक अनुशासन बिना ऊँच ध्यान-महल कमजोर रहैत। अहंकार, राग, द्वेष आ भयक जड़ि विवेकसँ खुलैत अछि। सिद्धि बाटक आकर्षण मात्र; लक्ष्य द्रष्टाक निर्मल स्वतन्त्रता अछि, जग वा जीवनक समाप्ति नहि।

संशयक चुभन, कर्मक अर्थ

विचारक अर्थ ओकर सम्भव व्यवहार आ परिणाममे देह धरैत अछि; कर्मकेँ किछु नहि बदलनिहार धारणा मात्र शब्दक धुँध बनि सकैत अछि। विश्वास निजी जिद्द वा सत्ताक आदेशसँ स्थायी सत्य नहि बनैत; संशय पुरान भरोसामे दरार खोलि खोज शुरू करैत अछि। निरीक्षण, परीक्षण, पुनरावृत्ति आ साझा जाँच भूलक सम्भावना स्वीकारितो ज्ञानकेँ दृढ़ बनबैत अछि। पद्य निष्कर्ष, सामान्यीकरण आ सम्भव कारणक अनुमानक अलग तर्क-चाल चिन्हैत साझा खोजकेँ सत्यक खुलल राह बनबैत अछि।

सूत्रक दाना, भाषाक अनन्त वन

छोट सूत्रक भीतर विशाल भाषिक व्यवस्था सघन रूपेँ राखल गेल अछि। धातु-प्रत्यय, रूप-विन्यास, जाति-व्यक्ति आ प्रसंगक फेरसँ अर्थ बदलैत अछि, तें नियमकेँ जीवित लोकवाणी सँ काटि नहि पढ़ल जा सकैत। पद्य शास्त्रीय अनुशासन आ व्यवहारिक भाषाक संवाद माँगैत अछि: सामान्य सूत्र दिशा देखाबय, अपवाद सीमा बताबय, आ शुद्धता पुरान रूपक जड़ आग्रह नहि बल्कि संचारक जीवित धड़कन बुझबाक काज बनय।

एक प्रतिवादक दीप

सत्यक घरक खिड़की खुलल रहबाक चाही—एहि बिम्बसँ पद्य प्रिय विचारकेँ कठोर प्रतिवादक सामने राखबाक आग्रह करैत अछि। हजार पुष्टि सेहो नियमकेँ अमर नहि बनबैत; एक साँच विरोधी उदाहरण पुरान भरोसा हिला सकैत अछि। कल्पना, अनुमान, परीक्षण, आलोचना आ फेर परीक्षण ज्ञानक खुलल क्रम अछि। इतिहासो पहिने लिखल पटरी नहि; मानव निर्णय, भूल आ संयोगक ठाम बचल रहैत अछि। अपन भूल स्वीकारब स्वयं ज्ञानक नैतिक शक्ति बनैत अछि।

कणसँ ध्वनि धरि जगक जाल

जगतकेँ द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष आ समवायक अनेक कोठरीमे पढ़ैत पद्य कणसँ ध्वनि धरि सूक्ष्म सम्बन्धक जाल खोलैत अछि। सामान्य दूरक वस्तुसभकेँ जोड़ैत अछि, विशेष ओकर अलग चिन्ह बचबैत, आ कारणक सूत जन्म-मरणक क्रम सँ जोड़ैत अछि। सूक्ष्म कण, गति, अदृष्ट आ कर्मक छाप एहि रचनामे जगतक अनुशासित बहुलता देखबैत अछि। अन्तिम बल एहि बातपर अछि जे छोट भेदो गहिर विचारक दुआर खोलि सकैत अछि।

वाक्यक संगति, ज्ञानक अपन उजास

ज्ञान जन्मिते ज्ञाता, ज्ञान आ ज्ञेयकेँ एक संग उजागर करैत अछि; प्रत्येक बोधकेँ फेर दोसर प्रमाणक मोहर आवश्यक नहि—पद्य एहि स्वप्रकाशक विचारसँ आरम्भ होइत अछि। भ्रम शून्यसँ बनल झूठ नहि, सही अनुभूति आ स्मृतिक भेद न चिन्हबाक मिश्रणसँ उपजैत अछि। शुक्ति-चाँदीक उदाहरणसँ भेद-अनपलब्धि खोलल जाइत अछि। शब्द अकेला पर्याप्त नहि; पदसभक परस्पर संगति, अपेक्षा आ वाक्यक अखण्ड अर्थ ज्ञानक सही स्वरूप बनबैत अछि।

छायाक गुफासँ रूपक सूर्य

गुफाक छाया सँ बाहरक सूर्य धरि यात्रा ज्ञानक कठिन मोड़ बनैत अछि: पुरान परिचित आभास सहज लगैत, नव उजास पहिने आँखि दुखबैत अछि। बदलैत दृश्य वस्तुक पाछाँ सुन्दरता वा सामान्य रूपक प्रश्न उठैत अछि, आ बुद्धि विशेषसँ व्यापक स्वरूप दिस बढ़ैत अछि। शिक्षा बाहरसँ सूचना भरब मात्र नहि, भीतर सुप्त समझ जगब सेहो अछि। संवाद आ प्रश्न चेतनाकेँ छायाक निश्चिततासँ रूपक गहिर आधार दिस मोड़ैत छथि।

देखल जगक मौन उजास

जगत रंग, आकार, स्पर्श आ ध्वनिक अनुभूति द्वारा खुलैत अछि; ज्ञात वस्तु अनुभूतिक दुआर पारि चेतनामे अर्थ पबैत अछि। पद्य अदृश्य पदार्थक कल्पित आधारक बदला अनुभवक प्रत्यक्ष संरचना, सक्रिय मन, स्मृति आ इच्छाक भूमिकापर बल दैत अछि। अपने केँ बाहरी चित्र जकाँ न देखितो मनुष्य कर्म, चाह आ स्मरणमे अपन जीवित सत्ता चिन्हैत अछि। देखल जगक मौन उजास मन, अनुभूति आ नियमक सेतु बनैत अछि।

सूत्रक गाँठिमे अनन्तक स्वर

छोट सूत्रक गाँठि जगतक जन्म, धारण आ लयक मूल प्रश्न खोलैत अछि। दृश्य जग अनेक तरंग होइतहुँ मूल समुद्रक खोज जिज्ञासाकेँ बाहरी सूचना सँ भीतरक आत्मबोध धरि लऽ जाइत अछि। सुनल बात ज्ञानक अन्तिम रूप नहि; मनन, परीक्षण आ अपन अनुभवमे मूलक चिन्हारि आवश्यक अछि। पद्य सूत्रकेँ जड़ आदेश नहि, प्रश्नक संक्षिप्त बीज मानैत अछि जाहिसँ अनन्त विचारक वन फूटि सकैत अछि।

सुखक तराजू, समाजक प्रश्न

कर्म आ नियमक मोल लोकक सुख-दुःख आ दूरगामी परिणामक तराजूपर जाँचल जाइत अछि। अपन लाभ भरि नहि, निर्णयक तरंग कतेक लोकक जीवन छूअैत अछि से नैतिक प्रश्न बनैत अछि। शिक्षा विशेष जनक बन्द दीप नहि, सामूहिक अवसरक जलधार बनबाक चाही। पद्य पीड़ा घटेब, अवसर बढ़ेब आ न्यायकेँ लोककल्याणसँ जोड़बाक आग्रह करैत, समाजक व्यवस्था केँ अपन परिणामक आधारपर निरन्तर सुधारबाक कसौटी दैत अछि।

घड़ीक पारि बहैत जीवन

घड़ी समयकेँ समान खाँचामे काटैत अछि, मुदा जीवित अनुभवक अवधि टुकड़ा-टुकड़ा नहि; बीतल क्षण वर्तमानमे स्मृति रूपेँ बन्हल रहैत अछि। पद्य बुद्धिक विश्लेषण आ सहज अनुभूतिक भीतर-प्रवेश दुनूक अलग उपयोग चिन्हैत अछि। एक औजार बनबैत आ रूप नापैत, दोसर जीवनक प्रवाह भीतरसँ छूअैत अछि। समय केवल गिनती नहि, निरन्तर बदलैत बहाव अछि जाहिमे प्रत्येक क्षण नव होइतहुँ अतीतक छाप संग लैत अछि।

टुकड़ाक पारि अखण्ड उजास

जगत टुकड़ा-टुकड़ा देखाइतहुँ प्रत्येक अंश दोसरा पर निर्भर साँस लैत अछि। व्यक्ति, संस्था आ विचार अपन सीमा राखैत, मुदा चेतना बारम्बार अधिक व्यापक सामंजस्य खोजैत अछि। विरोधकेँ केवल टूटन नहि, नूतन मेलक सम्भावना रूपेँ पढ़ल जाइत अछि। पद्य अपूर्ण सत्यकेँ फेकि नहि दैत; ओकर हाथ पकड़ि समग्र दिशि बढ़बाक आग्रह करैत अछि, जतय सम्बन्धक जाल अनुभवकेँ अखण्ड उजासक रूप दैत अछि।

नकारक सीढ़ी सँ स्वतन्त्र आत्मबोध

चेतना वस्तुक निष्क्रिय दर्पण नहि; ‘ई’ आ ‘नहि’क माध्यमेँ दूरी आ सीमा बनबैत ओ विचारक आकार रचैत अछि। प्रत्येक निर्धारणक भीतर किछु शेष रहैत अछि, जाहिसँ अगिला प्रश्न जन्मैत अछि। ध्यान विषयसँ अपने दिस मुड़िते ‘हम जानैत छी’क आत्मबोध उभरैत, मुदा आत्मा वस्तु जकाँ पूर्ण पकड़ा नहि जाइत। नकारक सीढ़ी एहि स्वतंत्र केन्द्रकेँ उघारैत अछि—ज्ञानक प्रक्रिया अपने ज्ञातासँ लगातार अधिक गहिर प्रश्न करैत रहैत अछि।

शब्दक भीतर अखण्ड ज्योति

ध्वनि क्रमशः उठि विलीन होइतहुँ अर्थ किएक अखण्ड झलकैत—पद्य एहि प्रश्नसँ वर्ण, पद आ वाक्यक सम्बन्ध खोलैत अछि। अर्थ केवल अलग-अलग ध्वनिक जोड़ नहि; वाक्यक सम्पूर्णता पदसभकेँ सेहो अपन स्थान आ मान दैत अछि। खण्ड आ अखण्ड एक-दोसरकेँ बुझबैत छथि। कहब, सुनब आ बुझब चेतनाक भिन्न क्रिया होइतहुँ भाषाक एकहि जीवित क्षेत्रमे मिलैत अछि, जतय क्षणिक स्वरक पाछाँ स्थायी अर्थ-संरचनाक खोज चलैत अछि।

पाँच भेदक बीच समर्पणक दीप

जगत, जीव आ मूल सत्ता सभ वास्तविक मानल गेल अछि; निर्भरता अस्तित्व मेटब नहि, सम्बन्धक रूप स्पष्ट करैत अछि। पाँच प्रकारक भेद परिचयक संरचना बनैत अछि, दूरी वा घृणाक कारण नहि। भक्ति केवल गीत वा भावुकता नहि, स्मरण, सेवा, सत्य-वचन, दया, रक्षा आ लोभ घटेबाक व्यवहार बनैत अछि। ज्ञानक संग समर्पण जुड़िते अहंकार गलैत, मुदा स्वत्व बचल रहैत; प्रेम भेदकेँ नष्ट नहि, अर्थपूर्ण सम्बन्धमे बदलैत अछि।

देहक आँखिसँ खुलैत संसार

जगत सिद्धान्तसँ पहिने देहक जीवित स्पर्शमे खुलैत अछि। पाँव, आँखि, हाथ, दिशा, दूरी आ औजारक उपयोग शरीरक मौन कुशलतासँ अर्थ पबैत; आदत मनक स्मृति मात्र नहि, देहक सीखनाइ सेहो अछि। अन्ह व्यक्तिक लाठी शरीरक अनुभूतिक सीमा बढ़बैत, आ इन्द्रियसभ अलग खिड़की नहि बल्कि एक देहमे संगति करैत छथि। वस्तु एक बेरमे पूर्ण नहि देखाइत; ओझरायल पक्षक सम्भावना अनुभवकेँ खुलल राखैत अछि।

ज्ञानक दर्पण, हेतुक डोरी

निश्चित बोध अपने प्रकाशमे वस्तुक रूप खोलैत अछि, मुदा प्रत्यक्ष-परोक्षक अनेक ज्ञान-बाटक भेद बचल रहैत अछि। स्मृति, पहिचान, वाणी आ अनुमान अलग भूमिका निभबैत छथि। अनुमानक प्राण केवल औपचारिक तीन खाँचा नहि, हेतु आ साध्यक अटूट अविनाभावक ठीक पहचान अछि। सामान्य-विशेषक सम्बन्ध आ हित-अहितक फल जाँचैत पद्य ज्ञानकेँ जीवनक सजग निर्णयसँ जोड़ैत अछि; कारणक डोरी कमजोर भेल तँ निष्कर्षक उजासो धुँधला होइत अछि।

श्रमक हाथ, बदलैत जग

जगत जमल पत्थर नहि; रूप, सम्बन्ध आ उत्पादनक ढाँचा बदलैत अछि, आ विरोध स्वयं परिवर्तनक गुप्त पुकार बनि सकैत अछि। श्रम मानव जग रचैत अछि, मुदा श्रमिक अपन सृजनसँ पराया भेलापर सम्बन्ध विकृत होइत अछि। नव उत्पादन-शक्ति पुरान व्यवस्था सँ टकराइत सामाजिक फेरबदल सम्भव बनबैत अछि। पद्यक मुक्ति एहन साझा श्रमक दिशि अछि जतय मनुष्य साधन नहि, स्वयं जीवनक लक्ष्य बनि अपन सृजनपर फेर अधिकार पबैत अछि।

रहस्यक दुआर पर खुलल हाथ

जीवनक सभ प्रश्न समान प्रकारक समस्या नहि; किछु बाहरी समाधान माँगैत, किछुमे हम स्वयं समायल रहैत छी आ ओ ‘रहस्य’ बनैत अछि। एहन अनुभवकेँ मापि समाप्त करबाक अहंकारक बदला खुलल उपस्थिति, प्रेम, सुनब, ठहरब आ निष्ठा आवश्यक अछि। सम्बन्ध क्षणिक भाव नहि, समय पारि निभाओल वचन अछि। पद्य जकरा पूर्ण बुझि समाप्त नहि कएल जा सकय, ओकरा संग सजग भऽ जीब सीखबाक मानवीय कला पर बल दैत अछि।

स्वतन्त्र स्वर, सुखक गहिर माप

अनुभव आ प्रमाणक सीमा मानैत पद्य अन्तिम सत्यक दम्भसँ दूरी राखैत अछि। स्वतन्त्र विचारक मूल्य एहि मे अछि जे चुप कराओल विरोधी स्वर साँचो हो सकैत, आ बेठीक होइतहुँ सत्यकेँ भिड़न्तमे तेज करि सकैत अछि। व्यक्तिक स्वातंत्र्य पूर्ण मनमानी नहि; दोसरा केँ हानि पहुँचेनाइ सीमा बनैत अछि। उच्चतर सुख, गरिमा, लोककल्याण आ खुलल बहसक संग पद्य एहन समाजक कल्पना करैत अछि जतय विचार जीवित रहय।

‘नीक’ केर अनिर्वचनीय उजास

दार्शनिक गाँठ खोलबाक पहिल काज शब्दक अर्थ साफ करब अछि। पद्य सामान्य अनुभवक बाहरी जग, देह, हाथ आ कालकेँ केवल संशयक नामपर मेटेनाइ उचित नहि मानैत अछि। नैतिक ‘नीक’ केँ सुख, इच्छा, विकास वा उपयोगक कोनो एक प्राकृतिक गुणमे पूर्ण घोलल नहि जा सकैत—‘सुख नीक अछि?’ प्रश्न बचल रहिते दुनू अर्थक भेद स्पष्ट होइत अछि। विश्लेषण मूल्यक एहि अनिर्वचनीय उजासकेँ झूठी सरल परिभाषासँ बचबैत अछि।

करुणाक अंकुर, जनक राज

बालक संकटमे पड़िते लाभ-हानिक हिसाबसँ पहिने उठैत सहायता-हाथ करुणाक सहज अंकुर बनैत अछि। पद्य एहि मानवीय संवेदनाकेँ शासन धरि विस्तार दैत अछि: भयक बल जमीन जीत सकैत, हृदय नहि; टिकाउ राजक आधार सम्मान, न्याय, विवेक आ जनक विश्वास अछि। पद पदवीसँ पैघ नहि, सेवा जनसँ शुरू होइत अछि। करुणामय शासन लोकक गरिमा केँ केन्द्रमे राखिते शक्ति जनहितक साधन बनि सकैत अछि।

नेति-नेतिक पारि अन्तरतम साक्षी

धन, नाम, रूप आ सम्बन्धक प्रियता अन्ततः ककरा लेल—पद्य एहि प्रश्नसँ भीतरक आत्मप्रियताक स्रोत दिस मुड़ैत अछि। ‘ई नहि, ओ नहि’ कहैत नाम-रूपक खोल हटाओल जाइत अछि, कारण अन्तरतम साक्षी स्वयं देखल वा सुनल वस्तु जकाँ पकड़मे नहि अबैत। बाहरी चाहक पाछाँ चेतनाक स्पर्श अछि; तें आत्मबोध वस्तु-संग्रहक वृद्धि नहि, देखनिहारक स्रोत दिस ध्यान घुमेबाक साधना बनैत अछि।

सीमारेखाक आगिमे आत्मक उजास

विज्ञान जगतक तारा, देह आ पदार्थक नियम दूर धरि नापि सकैत, मुदा ‘हम के छी’ आ ‘किएक जिअैत’ जेकाँ प्रश्न केवल मापन-पत्रमे नहि समाय। मृत्यु, दोष, पीड़ा आ सीमितता मनुष्यकेँ अपन चुनाव आ जिम्मेदारीक सामने ठाढ़ करैत अछि। दुःख सभ मिटत नहि; किछु घावक बीच अर्थ सहनशील जागरणसँ बनैत अछि। पद्य संख्या बनि रहबाक बदला संवाद, स्वतन्त्रता आ पारगमनक बाटेँ सीमित जीवनकेँ अनन्त दिशि खुलल राखैत अछि।

तर्कक कण, भाषाक पारदर्शी आकाश

जटिल विचारक वनमे तर्क भाषाक गाँठ खोलि कथनक भीतरी ढाँचा स्पष्ट करैत अछि। अनावश्यक भार काटि तथ्य, सम्बन्ध, संख्या आ अनुभवक अलग स्थान चिन्हल जाइत अछि। विज्ञानक निष्कर्ष स्थायी सिंहासन नहि; नव तथ्य पुरान सीमा बदलि सकैत अछि। तर्क दिशा दैत, अनुभव जाँच करैत, आ दुनू मिलि निश्चयक गर्व घटबैत छथि। पद्य जे कहल जाए ओकर रूप परखबाक आ जे मानल जाए ओकर संग प्रश्नक दुआर खुलल रखबाक आग्रह करैत अछि।

भाषाक गाँठि, मनक अदृश्य चाल

कतेको दार्शनिक उलझन जगतमे कम, शब्दकेँ बेठीक श्रेणीमे राखलासँ बेसी जन्मैत अछि। क्रोधकेँ भीतर राखल वस्तु नहि, व्यवहारिक प्रवृत्ति रूपेँ; टूटनशीलताकेँ हर क्षण टूटब नहि, सम्भावना रूपेँ बुझल जाइत अछि। कौशल, मन, प्रवृत्ति आ क्रियाक अलग व्याकरण चिन्हित करिते अदृश्य भूत-जेकाँ अनावश्यक सत्ता खोजबाक जरूरत घटैत अछि। पद्य भाषिक श्रेणीक धुँध हटाकऽ जीवित व्यवहार दिस विचारकेँ फेरबैत अछि।

पूब-पश्चिमक बीच एकहि उजास

दिशा आ भाषा भिन्न होइतहुँ मानवक मूल प्रश्न अनेक परम्परामे एक-दोसरा छूअैत अछि। इन्द्रिय, विवेकी बुद्धि आ गहिर अनुभूति ज्ञानक अलग स्तर बनैत छथि; विज्ञान, धर्म आ दर्शनक काज एक-दोसरपर विजय नहि, अपन सीमाक पहचान आ संवाद हो। जखन जाननिहार स्वयं अनुभवमे बदलैत अछि, प्रज्ञा केवल बाहरी प्रमाणक सूची नहि रहैत। पद्य मानव-मर्यादाकेँ साझा धरातल बनाकऽ पूब-पश्चिमक अनेक आवाजकेँ विशाल संगीतमे मिलबाक सम्भावना देखबैत अछि।

अनेक रूपमे एकहि आश्रय

जगतकेँ छलना आ जीवकेँ व्यर्थ मानबाक बदला पद्य रूप, देह, इच्छा, श्रम आ सम्बन्धक वास्तविकता स्वीकारैत अछि। मूल आश्रय एक होइतहुँ अनेक रूप ओकरासँ पूर्णतः अलग नहि; जीव सीमित ज्ञान, कर्म आ भोगक धारक रहैत अछि। अज्ञान आ कर्मक आवरण हटिते आत्मप्रकाश बढ़ैत अछि। जग छोड़ब वा स्वत्वक घमण्ड—दुनू छोरक बदला आश्रित सत्यता, प्रेम आ सम्बन्धक बाटेँ अपन घर पहिचानबाक विचार उभरैत अछि।

मनुष्यक हाथमे स्वतन्त्र भोर

धरती, देह, तारा आ चेतनाक प्रश्नकेँ अदृश्य भयक सिंहासनपर नहि छोड़ि प्रकृति, तर्क आ मानवीय बुद्धिसँ बुझबाक आग्रह अछि। दल, पंथ, सत्ता वा झण्डा व्यक्तिक स्वतन्त्र चेतनाकेँ छाया नहि बनाबय; सहमतिक संग असहमतिको समाजमे ठाम रहय। पद्य तर्ककेँ करुणासँ जोड़ैत अछि, ताकि स्वतन्त्र व्यक्ति आ न्यायी समाज एक-दोसरक विरोधी नहि बनय। मानवता अपन जिम्मेदार बुद्धि आ साझा विश्व-बोधसँ भविष्यक दुआर खोलय।

वनक स्वतन्त्र साँससँ जन-इच्छाक नगर

मनुष्य जन्मसँ बेड़ीबद्ध नहि; सरल आवश्यकता आ सहज दया प्रकृतिक मुक्त साँससँ जुड़ल अछि। तुलना, प्रतिष्ठा, सम्पत्ति आ ‘ई भूमि हमर’क रेखासँ धीरे-धीरे असमानता आ सत्ता उभरैत अछि। कानून समान कहाइतहुँ धन-शक्ति ओकर रूप बिगाड़ि सकैत अछि। पद्य व्यक्तिगत स्वतन्त्रताकेँ सामूहिक जन-इच्छाक नगरसँ जोड़ैत, एहन राजनीतिक व्यवस्था खोजैत अछि जतय मनुष्य अपनहि बनाओल बेड़ीकेँ फेर पहचानि बदलि सकय।

निःशब्द धाराक सहज बाट

मूल धारा नामक पारि अछि; शब्द ओकरा पूरा बाँधि नहि सकैत, तें मौन कतेको बेर अधिक गहिर कथन बनैत अछि। अधिक चाह, संचय आ हस्तक्षेप मनकेँ बान्हैत, जखन कि कममे सन्तोष, सरलता आ प्रकृतिक लय निश्चिन्तता खोलैत अछि। निष्क्रियता अकर्मण्यता नहि, अनावश्यक जोर घटेबाक सहज काज होइत अछि। पद्य विपरीत स्वरकेँ संग राखि, लोभ आ हिंसा घटाकऽ जीवनकेँ निःशब्द मूलधारा दिस मोड़बाक बाट देखबैत अछि।

अदृश्य केन्द्रसभक एक सुर

जगत बाहरी पसार मात्र नहि, अनेक अदृश्य जीवित केन्द्रक संगति अछि; प्रत्येक अपन ढंगसँ समूचा जगक छवि धरैत अछि। घटना ‘भेल’ कहि छोड़ब पर्याप्त नहि—बुद्धि कारण आ पर्याप्त हेतु खोजैत अछि। धुँधल अनुभूति सँ स्पष्ट आत्मबोध धरि स्तर-स्तर खुलैत चेतना, तर्क, अनुभव आ सामञ्जस्यकेँ जोड़ल गेल अछि। पद्य अनेक स्वतन्त्र केन्द्रसभकेँ टूटल टुकड़ा नहि, एक व्यापक विश्व-संगीतक अलग स्वर रूपेँ देखैत अछि।

अनुभवक कोरा पात पर स्वतन्त्र हस्ताक्षर

मन जन्मसँ लिखल पोथी नहि; बाहरक स्पर्श आ भीतरक क्रिया—देखब, सुनब, चाहब, सोचब—मिलि अनुभवक कोरा पात भरैत अछि। ज्ञान सीमित अछि, तें संशयक दीप संग राखल जाए। नैतिक नियम आ सामाजिक भेदो सीखल इतिहास धरैत छथि; सुख-दुःख, दैवी, सामाजिक आ नागरिक माप व्यवहारक दिशा बनबैत अछि। पद्य स्वतन्त्र हस्ताक्षरकेँ मनमानी नहि, अधिकारक संग उत्तरदायित्व आ खुलल समाजक मानवीय गरिमासँ जोड़ैत अछि।

विश्वासक आगि, अन्तरात्माक मुक्त स्वर

पाप-मोचनक बजारू लेन-देनपर अन्तरात्मा प्रश्न उठबैत अछि: साँच पश्चात्ताप आ कृपा सिक्कासँ किनल नहि जा सकैत। प्रत्येक विश्वासी भीतर प्रार्थनाक सोझ दुआर धरैत, जन्माधारित विशेषाधिकार वा अनिवार्य मध्यस्थता आवश्यक नहि। पढ़ब, सोचब, प्रश्न उठेब आ प्रेमक कर्म करब विश्वासक जीवित अभ्यास बनैत अछि। पद्य सेवाकेँ सत्ता नहि बनबाक चेतावनी दैत, आत्म-मर्यादा आ समानतासँ जुड़ल मुक्त अन्तर-स्वरकेँ धर्मक गहिर आगि रूपेँ रखैत अछि।

श्रमक मुक्ति, बदलैत धरतीक गीत

धरती आ समाज स्थिर नहि; विरोधक भीतर नव रूपक सम्भावना जन्मैत अछि। उत्पादन, सम्बन्ध आ वर्गक ढाँचा बदलैत इतिहासक गति बनैत, मुदा मुक्ति केवल रूप-बदलाव नहि—श्रमक मान, अवसर, अधिकार, सुरक्षा आ गरिमाक साझा धरातल चाही। समानता एकरूपता नहि; जन्म, लिंग वा वर्ग मनुष्यक मोल तय नहि करय। पद्य समाजक फल समाजमे बहबाक, श्रम करनिहारकेँ सम्मान पाबबाक आ न्यायपूर्ण भविष्य सामूहिक रूपेँ रचबाक गीत अछि।

सत्य जगत पर कृपाक मधुर धारा

जगत झूठक पर्दा नहि; अनेक रूप एकहि मूल उजासक शक्ति-विस्तार छथि। लहरि अनेक होइतहुँ समुद्र अपन गहिराइ नहि हारैत, तेनहि जीव-जगतक सत्य मूलसँ सम्बन्धित रहैत अछि। कर्म अनुशासन दैत, ज्ञान भ्रम काटैत, मुदा प्रेम आ कृपा हृदयक कठोरता गलाबैत अछि। मुक्ति केवल ‘जानलहुँ’क बौद्धिक दावा नहि, मूलक प्रियता जागब आ सेवा-सम्मिलित समर्पण अछि; जग छोड़बाक बदला जीवनमे घर पहिचानबाक प्रक्रिया बनैत अछि।

चेतनाक धारामे रूपक स्वप्न

जगत क्षण-क्षण बदलैत अछि; स्थिर आत्माक गाढ़ छाप खोजलासँ अधिक कारण-क्रम, कर्मफल आ चेतनाक निरन्तर धारा सोझाँ अबैत अछि। दू चन्द्रक भ्रम देखबैत अछि जे अनुभव साँच रूपेँ घटि सकैत, मुदा बाह्य वस्तु ताहि अनुरूप आवश्यक नहि। ज्ञाता-विषयक भेदो चेतनाक रचनामे जाँचल जाइत अछि। स्थिर ‘हम’क पकड़ ढील भेलापर भय घटैत, निर्भरता आ क्षणिकता करुणामय जागरणक दुआर खोलैत अछि।

अनेक बाटक बीच विवेकक सेतु

ज्ञानक वनमे अनेक बाट—तर्क, शब्द, ध्यान, अभाव, अनुमान, प्रकृति-चेतना भेद—अपन-अपन दिशा देखबैत छथि। एक पथ दोसराकेँ पूर्ण नकारिते सत्यक आकाश छोट भऽ जाइत; विवेक सेतु बनि भिन्न दृष्टिक सीमा आ उपयोग चिन्हैत अछि। प्रकृति गतिशील गुणधारा आ चेतन साक्षी भिन्न प्रकाश रूपेँ उभरैत छथि; बेठीक पहिचान टूटिते स्वतन्त्रता सम्भव होइत अछि। मतभेद वैर नहि, विशाल सत्य-खोजक अलग खिड़की बनैत अछि।

प्रमाणक चारि दुआर, मुक्तिक एक बाट

ज्ञान तखने जीवनक अन्हार घटबैत अछि जखन भ्रमक गाँठ खोलि दुःखक कारण चिन्हबैत अछि। प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आ शब्द चारि प्रमाण-दुआर रूपेँ अलग काम करैत छथि; कारण, उदाहरण, सम्बन्ध आ निष्कर्षक खुलल क्रम बहसमे स्पष्टता अनैत अछि। हेतुक शुद्धि आ वाणीक विश्वसनीयता अनिवार्य अछि। पद्य ज्ञानकेँ संग्रह नहि, मुक्तिक व्यावहारिक दिशा बनबैत अछि—ठीक बोध जतेक गहिर, बेठीक आसक्ति आ भ्रम ततेक ढील।

शब्दक खेलमे जगक सीमा

वाक्य कखनो जगक वस्तु-स्थितिक चित्र जकाँ काम करैत अछि, मुदा भाषा एहि एक रूपमे सीमित नहि। ‘खेल’ जेकाँ शब्दक सभ उदाहरणमे एकहि साझा गुण नहि भेटितो परिवार-जकाँ आंशिक समानता जोड़ि राखैत अछि। अर्थ जीवित व्यवहार, नियम आ प्रयोगमे बनैत; शब्दक काम ओकर संदर्भसँ बदलैत अछि। पद्य भाषाक सीमा बुझैत मौनक ठामो स्वीकारैत, विचारक उलझनकेँ शब्दक वास्तविक उपयोग दिस फेरि खोलबाक आग्रह करैत अछि।

नियमक जालमे अर्थ खोजैत मनुष्य

समाज भीड़क गणना नहि; कर्ताक आशय बुझल बिना बाहरी चालक अर्थ अधूर रहैत अछि। धर्म, अर्थव्यवस्था, सत्ता, संस्था आ दैनिक क्रियाक अलग प्रेरणा सामाजिक जाल बनबैत अछि। आधुनिक कार्यालय, लेखा, योग्यता आ नियम व्यक्तिगत कृपाक बदला निर्वैयक्तिक व्यवस्था अनैत, मुदा तर्कीकरण अपन संग कठोर बन्धनो बना सकैत अछि। पद्य लाभ आ बन्धन दुनू देखबाक, आ जटिल समाजकेँ कोनो एक सूत्रमे कैद नहि करबाक चेतावनी दैत अछि।

क्षणक गर्भमे सृष्टिक अनन्त बहाव

जगत स्थिर पदार्थक ढेर नहि, घटना-घटनाक निरन्तर जन्म अछि। प्रत्येक वर्तमान बीतल जगक प्रभाव ग्रहण करैत, चयन करैत आ भविष्य दिशि नव निर्माण छोड़ैत अछि। देह, वनस्पति, समुदाय आ तारा स्थायित्व पबैत छथि कारण सम्बन्धक किछु लय दोहराइत अछि, परिवर्तन रुकलासँ नहि। पद्य हरेक क्षणकेँ सृष्टिक गर्भ मानैत अछि—अतीत वर्तमानमे रूप बदलि आबैत, वर्तमान भविष्य लेल नव बीज उछारैत रहैत अछि।

तीन परत पारि एकहि उजास

बदलैत नाम-रूपक पाछाँ अपरिवर्तित साक्षी-चेतनाक खोज एहि पद्यक केन्द्र अछि। जागरण, स्वप्न आ निद्राक तीन परत बदलितो जे उजास अनुभवक आधार बनैत, ओकरा वस्तु-जकाँ घटैत-बढ़ैत नहि देखाओल गेल। कर्म मनकेँ निर्मल आ उपासना एकाग्र करि सकैत, मुदा मूल अज्ञान विवेक-ज्ञानसँ कटैत अछि। भ्रमक साँप-डोरक भेद खुलिते मुक्ति नूतन वस्तु प्राप्ति नहि, पहिनेसँ उपस्थित सत्यक पहचान बनैत अछि।

वचनक विधिमे कर्तव्यक अदृश्य बीज

‘की करबाक अछि’क उत्तर रंग-स्पर्श जेकाँ प्रत्यक्ष वस्तुसँ नहि, कर्तव्यसूचक वचनक विधिसँ उभरैत अछि। शब्द एतय सूचना मात्र नहि, अगिला कर्मक दिशा जगबैत अछि। धर्म आकारवाला पदार्थ नहि, व्यवहारमे ‘करू’ आ ‘नहि करू’क अर्थसँ चिन्हल कर्तव्य अछि। पद्य वचन, अर्थ, विधि आ फलकेँ जोड़ैत ई देखबैत अछि जे अदृश्य नैतिक बीज जीवनक क्रियामे देह धारण करैत अछि।

भेदक सूक्ष्म रेखा, सम्बन्धक मौन सूत्र

वस्तुक भेद बुझबाक लेल अनावश्यक सत्ता बढ़ेबाक बदला जे बिना मानलासँ काज चलि सकय ओकर बोझ घटेबाक आग्रह अछि। काल, कारण, फल, शक्ति आ अनुपस्थितिक नाम तभी अर्थपूर्ण छथि जखन वास्तविक सम्बन्ध स्पष्ट करथि। ‘शक्ति’ खाली शब्द नहि, विशेष दशामे विशेष फल देबाक क्षमता रूपेँ पढ़ल जाइत अछि। पद्य कम कल्पना, स्पष्ट प्रमाण आ सम्बन्धक सूक्ष्म रेखासँ बुद्धिक भार हलुक करैत अछि।

सन्देहक पारि विश्वासक चारि आकाश

सन्देह अनुभूति आ स्मृति धरि प्रश्न लऽ जाइत, मुदा यदि सभ किछु अनन्त संशय बनि जाए तँ जीवनक पग रुकि सकैत अछि। तें सहज विश्वास पूर्ण अन्धता नहि, व्यवहारक आरम्भिक धरती बनैत अछि। पद्य रूप, पदार्थ, सत्य आ चेतनाक चारि ‘आकाश’ अलग ढंगसँ जगक अर्थ खोलैत देखबैत अछि। कला, नीति, इच्छा आ बुद्धि एहि बहुस्तरीय जगमे मनुष्यकेँ केवल तथ्य नहि, मूल्य आ जीवन-रूप सेहो गढ़बाक सामर्थ्य दैत अछि।

अपनेक निर्माणक खुलल आकाश

मनुष्य पहिने जगमे आबैत अछि, पाछाँ अपन कर्म आ चुनावसँ पहचान गढ़ैत—कोनो तैयार सार पहिनेसँ लिखल नहि। स्वतन्त्रता सुखद खाली आकाश मात्र नहि; प्रत्येक निर्णय जिम्मेदारीक भार अनैत अछि। दोसरा आँखिक उपस्थितिसँ हम अपने केँ वस्तु-जकाँ देखल अनुभव करैत, लाज आ सम्बन्धक नव तनाव जन्मैत अछि। पद्य बहाना छोड़ि सीमा बुझैत स्वतन्त्र कर्मक हस्ताक्षर करबाक आग्रह करैत अछि।

इन्द्रियक शोर आ अन्तरक दीप

मानव-संस्कृति कखनो बाहरी स्पर्श्य वस्तु आ भोगक दिशि झुकैत, कखनो अन्तरक अदृश्य मूल्यकेँ सर्वोच्च मानैत अछि। पद्य दुनू छोरक एकांगीपन जाँचैत अछि। इच्छा मात्रक स्वतन्त्रता जल्दी इच्छाक दासता बनि सकैत; जगत्याग सेहो जीवनक ठोस धरती गमा सकैत अछि। पदार्थक वास्तविकता आ अन्तरक मूल्यक दीप बीच संतुलन बनिते संस्कृति मनुष्यकेँ भोग-विरक्ति दुनू अतिसँ बचाकऽ गहिर संगीत दैत अछि।

पहिचानक धरती, वाक्यक मौन पूर्वशर्त

दार्शनिक काज सदिखन नव महल गढ़ब नहि; कखनो दैनिक बोधक पहिनेसँ चलैत ढाँचाकेँ साफ देखब आवश्यक अछि। व्यक्ति-चिन्हारि, प्रसंग आ वाक्यक अर्थ कतेको मौन पूर्वशर्तपर ठाढ़ रहैत अछि। जे बात स्पष्ट कहल नहि गेल, ताहि पर कथन पएर राखि सकैत अछि; आधार टूटिते साधारण सत्य-असत्य मूल्यांकन सेहो डोलि जाइत। पद्य औपचारिक तर्क आ जीवित भाषाक बीच एहि मौन धरतीकेँ सजग विवेकसँ पढ़बैत अछि।

एकहि अनन्त धारा, अनिवार्य जग

एक अनन्त, अपने कारण सत्ता अनेक गुण आ रूपमे प्रकट होइत अछि; विचार आ विस्तार ओकर अलग आयाम छथि, एक-दोसरा केँ धक्का देनिहार दू राज्य नहि। देहक क्रम देहक कारणसँ, विचारक क्रम विचारक कारणसँ चलैतहुँ दुनू एकहि मूलक समान अभिव्यक्ति छथि। पद्य जगकेँ आकस्मिक बाहरी जोड़ नहि, अनिवार्य धाराक रूप मानैत अछि; स्वतन्त्रता कारणहीन मनमानी नहि, आवश्यकता बुझि ओकर भीतर सजग होएब बनैत अछि।

सरल बीजसँ बहुरंगी जग

एक सरल बीजसँ भेद, समन्वय आ जटिलता क्रमशः फूटैत अछि। पदार्थ, जीवन, समाज आ विचार सभ परिवर्तनक धारा भीतर नूतन संरचना बनबैत छथि। नैतिकता आकाशसँ तैयार सूची बनि नहि उतरैत; दीर्घ सामाजिक अनुभवमे जीवन बचेब, मेल, सुख आ विकास बढ़ेबाक व्यवहार धीरे-धीरे मानक बनैत अछि। पद्य प्रकट नियमक संग अप्रकट रहस्यक ठाम बचबैत विकासकेँ एकरेखीय नारा नहि, बहुरंगी संगतिक प्रक्रिया बनबैत अछि।

फेंकल क्षणसँ मृत्यु-दिशि खुलल समय

मनुष्य जगकेँ बाहरसँ निहारनिहार अलग दर्शक नहि; ओ पहिनेसँ सम्बन्धक बीच ‘फेंकल’ अवस्था मे अछि। अपन जन्मक प्रारम्भ चुनल नहि गेल, मुदा एहि प्राप्त परिस्थिति भीतर सम्भावना आ निर्णय खुलैत छथि। समय घड़ीक क्रम मात्र नहि, भविष्य दिशि प्रक्षेप, अतीतक भार आ वर्तमानक काजक एकता अछि। मृत्यु निश्चित सीमा बनि जीवनकेँ व्यक्तिगत गम्भीरता दैत; अपन मृत्यु-बोध मनुष्यकेँ भीड़क अनाम चालसँ अलग प्रामाणिक चुनाव दिस धकेलैत अछि।

भयक मैदान सँ अनुबन्धक नगर

ज्ञान बाहरी स्पर्शक छापसँ आरम्भ होइत, स्मृति आ कल्पना ओकर फीका प्रतिरूप सँ बनैत छथि; मन देहसँ काटल रहस्यमय प्रदेश नहि। जगत गति, कारण आ प्रभावक नियममे पढ़ल जाइत अछि। मनुष्यक भय—विशेषतः असुरक्षित मृत्यु आ संघर्षक भय—सामूहिक अनुबन्धक आवश्यकता जन्मबैत अछि। पद्य प्राकृतिक असुरक्षासँ नियमबद्ध नगर दिस यात्रा देखबैत, शान्ति लेल साझा सत्ता किएक गढ़ल जाइत अछि से अनुभववादी धरातलपर पूछैत अछि।

छापक आगिसँ आदतक कारण

तीख प्रत्यक्ष अनुभूति पहिल ‘छाप’ अछि; स्मृति आ विचार ओकर अपेक्षाकृत फीका प्रतिरूप। जटिल कल्पना सेहो सरल अनुभूतिक सामग्री जोड़ि-काटि बनैत अछि। विचार एक-दोसरा दिस सादृश्य, निकटता आ कारण-फल जेकाँ सहज सम्बन्धसँ सरैत छथि। बारम्बार अनुक्रम देखिते मन आदत बनबैत, आ ‘आवश्यक कारण’क अनुभूति एहि अपेक्षासँ उभरैत अछि। पद्य निश्चितता घटाकऽ अनुभव, आदत आ मानवीय अपेक्षाक भूमिकाकेँ सामने अनैत अछि।

चेतनाक दुआर पर वस्तुक उजास

जगतकेँ नकारल नहि जाइत; पहिनेसँ मानल अस्तित्व-दावाकेँ क्षण भरि कोष्ठकमे राखि वस्तु चेतनामे कोना प्रकट होइत अछि से देखल जाइत अछि। चेतना खाली पात्र नहि, सदिखन किछु दिशि खुलल—देखब, सोचब, स्मरण, प्रेम वा भय प्रत्येकक अपन विषय अछि। एहि अभिप्रायात्मक सम्बन्धकेँ सूक्ष्म वर्णन करैत पद्य वस्तु आ ज्ञाताक जीवित मिलनपर ध्यान दैत अछि, ताकि पूर्वधारणाक शोर घटि अनुभवक उजास स्पष्ट हो।

सात भंगीक खिड़की सँ अहिंसक सत्य

सत्यक घर एक दुआर नहि; समय, स्थान, रूप आ अपेक्षा बदलिते ‘अछि’, ‘नहि अछि’, ‘अछि आ नहि अछि’ जेकाँ कथन अलग प्रसंगमे उचित भऽ सकैत अछि। सात भंगीक विनम्र भाषा एक वचनसँ अनन्त वस्तुकेँ पूरा बाँधबाक दम्भ रोकैत अछि। अनेक दृष्टिक सीमित सत्य मानिते वैचारिक अहिंसा जन्मैत अछि—विरोधी मतकेँ तुरन्त झूठ कहबाक बदला ओकर नय, प्रसंग आ सीमा बुझबाक अभ्यास बनैत अछि।

विरोधक गर्भसँ पूर्णताक यात्रा

आरम्भक अनिर्धारित ‘अछि’ अपनहि भीतर अभावक छाया धारण करैत, आ दुनूक तनावसँ ‘बनैत रहब’क गति जन्मैत अछि। प्रत्येक निश्चित रूप अपन सीमा भीतर राखैत अछि; नकार केवल मिटेनाइ नहि, पुरानक सत्यांश नव रूपमे सँभारि आगाँ बढ़ेनाइ सेहो अछि। एहि द्वंद्वात्मक सीढ़ीपर विरोध विकासक शत्रु नहि, नूतन स्तरक गर्भ बनैत अछि। पूर्णता जड़ अन्तिम बिन्दु नहि, अपने विरोधसभकेँ रूपान्तरित करैत चेतनाक यात्रा बनैत अछि।

09 / विभाग

खण्ड ८ — सन्देह, अनुभव, इतिहास आ न्याय

सन्देह, अनुभव, भाषिक प्रयोग, विज्ञान, चेतना, धर्म, इतिहास, कानून आ न्यायक प्रश्न संग्रहकेँ अन्तिम मूल खण्ड धरि लऽ जाइत अछि। निश्चयक सीमा, प्रमाणक अनुशासन, इतिहासकारक दृष्टि आ मानवीय गरिमाकेँ सुननिहार न्याय एक साझा नैतिक जिम्मेदारी दिस संकेत करैत अछि।

20 स्रोत-रेकर्ड

खण्ड ८ — सन्देह, अनुभव, इतिहास आ न्याय

ई स्वतंत्र पद्य नहि, पोथीक वास्तविक संरचनात्मक सीमा अछि। ‘खण्ड ८ — सन्देह, अनुभव, इतिहास आ न्याय’ अगिला रचनासमूहकेँ एक नव वैचारिक धरातल दैत अछि, जतय संशय, अनुभूति, ऐतिहासिक चेतना आ न्यायक प्रश्न परस्पर जोड़ल रूपेँ आगाँ बढ़त। तें एहि रेकर्डमे कविता गढ़ल नहि गेल; मूल शीर्षकक संगठनात्मक भूमिका मात्र सुरक्षित राखल गेल अछि।

सन्देहक दीप सँ निश्चयक आकाश धरि

पुरान विश्वासक नींव एक-एक कऽ जाँचबाक पद्धतिगत संशयसँ पद्य आरम्भ होइत अछि। इन्द्रिय, स्वप्न, देह आ गणना धरि प्रश्न उठैत, मुदा संशय करैत चेतन अस्तित्व स्वयं पूर्ण नकारल नहि जा सकैत। भीतरक एहि निश्चयसँ बाहरी जग फेर क्रमशः बुद्धिक अनुशासनमे बनैत अछि। पदार्थक माप, गणितीय संगति आ कारणक नियम ज्ञानक ढाँचा बनबैत, मुदा शंका साधन अछि—अन्ध संशयमे स्थायी निवास नहि।

अनुभवक धार पर कारणक प्रश्न

ज्ञानक बीज अमूर्त महलसँ नहि, देखल-सुनल-अनुभूत क्षणसँ फूटैत अछि। प्रत्येक जटिल विचारक ‘वंशावली’ सरल अनुभूति धरि खोजल जाइत; ईश्वर, आत्मा वा द्रव्यक अवधारणासभ सेहो एहि कसौटीसँ बचैत नहि। कारणक आवश्यक बन्धन सीधे अनुभूत नहि, बारम्बार अनुक्रमसँ मनमे बनल अपेक्षा रूपेँ प्रश्नांकित होइत अछि। पद्य मनुष्यकेँ ज्ञानक स्वामी नहि, आदत, स्मृति आ अनुभवक बीच विनम्र साधक बनबैत अछि।

रूपक परदा सँ अखण्ड यथार्थ धरि

जे देखाइत अछि से अन्तिम सत्य नहि, मुदा देखाइत जगकेँ मात्र भ्रम कहि फेकि देबो उचित नहि—पद्य एहि दुनू छोरक बीच यथार्थक अखण्ड धड़कन खोजैत अछि। आत्मा देह, स्मृति, इच्छा आ अनुभूतिक सातत्यक प्रश्नसँ जाँचल जाइत अछि। बदलैत रूप आ टूटैत सम्बन्धक भीतर समग्रता कोना बचैत अछि, से तत्त्वमीमांसक यात्रा बनैत अछि। अन्ततः ‘हम’ अपन सीमित रूपसँ पैघ यथार्थ-संगीतमे पुनः समझल जाइत अछि।

शब्दक गाँठ सँ तथ्यक उजास धरि

दार्शनिक कुहासामे विश्लेषण पैघ छुरा नहि, शब्द, विचार, तथ्य आ अनुभवक सूक्ष्म गाँठ खोलबाक साधन बनैत अछि। परिचय, विवरण, प्रतिज्ञप्ति, कारण आ ‘निष्पक्ष’ तत्वक कल्पना अलग-अलग जाँचल जाइत छथि; मन-पदार्थक फाँक घटेबाक प्रयासो अन्तिम समाधान घोषित नहि। पद्य शब्दे केँ जगत नहि मानबाक आ प्रत्येक सिद्धान्तकेँ अन्तिम सत्य नहि बनाबक चेतावनी दैत अछि। स्पष्टता लक्ष्यसँ अधिक साधन अछि, ताकि प्रश्नक स्वतन्त्र अगिनि जरैत रहय।

हाथक प्रमाण सँ विश्लेषणक सीमा धरि

विश्लेषणक इतिहासक भीतर पद्य तर्ककेँ फेर तर्कसँ जाँचैत अछि—कतय स्पष्टता भेटैत, कतय सरलता जटिल अनुभवकेँ काटि छोट करैत। हाथक ठोस उपस्थिति, बाह्य जगक सहज भरोसा, सामान्य पद आ अमूर्त वर्गक प्रश्न एक संग उठैत छथि। दर्शन केवल शब्द खोलबाक काज नहि, नहि सिद्धान्तक बलपर सत्य-मूल्य बाँटबाक हुकुम। विश्लेषण तखने निर्मल अछि जखन अपन सीमा स्वीकारि अवधारणाक सम्बन्ध स्पष्ट करैत, मुदा जटिलता मेटबैत नहि।

प्रयोगक बाट पर अर्थक नगर

भाषाकेँ जगतक एकल चित्र मानबाक पहिल धारणा धीरे-धीरे दैनिक प्रयोगक बहुलतासँ बदलैत अछि। नाम, आदेश, प्रश्न, खेल, गणना आ व्यवहारमे शब्द अलग-अलग काज करैत; अर्थ कोनो अदृश्य वस्तु नहि, उपयोगक जीवित नगरमे उभरैत अछि। एक शब्दक सभ प्रयोगमे एक समान गुण जरूरी नहि—परिवारक मुख-जेकाँ आंशिक सादृश्य पर्याप्त भऽ सकैत अछि। पद्य अर्थ बुझबाक लेल शब्दकेँ जीवन, नियम आ प्रसंगसँ अलग नहि करबाक सीख दैत अछि।

एकाकी संकेत सँ साझा कसौटी धरि

दर्द वा स्वाद जेकाँ निजी अनुभूति लेल केवल अपने बुझनिहार संकेत बनि सकैत अछि की—पद्य एहि प्रश्नकेँ नियम आ स्मृतिक कसौटी धरि लऽ जाइत अछि। यदि ‘ठीक प्रयोग’क जाँच केवल ओहि व्यक्तिक स्मृतिपर निर्भर रहय, तँ भूल आ सहीक भेद गोल चक्करमे फँसि जाइत अछि। निजी अनुभूतिक गरिमा बचैत अछि, मुदा ओकर भाषिक अर्थ साझा व्यवहारक माटि सँ पोषण पबैत। पद्य एकाकी संकेतसँ सामूहिक नियमक देहरी धरि अर्थक सामाजिक आधार खोलैत अछि।

अनुभवक धरती सँ नियमक कसौटी धरि

विज्ञान तथ्यक गठरी नहि; घटना किएक भेल, नियम कोना काम करैत, व्याख्या आ प्रमाण कतेक दृढ़—एहि प्रश्नक अनुशासित खोज अछि। अवघटनात्मक व्याख्या जटिल वस्तुकेँ अंशमे खोलैत, मुदा समष्टिक नव गुण केवल अंश जोड़लासँ सदिखन नहि भेटैत। सिद्धान्त अनुभव, गणित, परीक्षण आ पुष्टिकरणसँ जाँचल जाइत, तइयो अंतिम पुस्तक नहि बनैत। पद्य दर्शनकेँ विज्ञानक दर्पण बनबैत अछि, जतय ज्ञान अपन शक्ति, विधि, सीमा आ संशोधनशीलता देखैत अछि।

वस्तुक आभास सँ चेतनाक अन्तराल धरि

वस्तु जेना चेतनामे प्रकट होइत अछि, ओहि अनुभवक संरचना केँ पहिने ध्यानसँ देखबाक आग्रह अछि। पूर्वमान्यताकेँ अस्थायी कोष्ठकमे राखि रंग, रूप, स्मृति, अपेक्षा आ दृष्टिक अभिमुखताकेँ पढ़ल जाइत अछि। समय घड़ीक काँटा नहि; गेल स्वरक अवशेष, एखनक स्पर्श आ आबयवला सुरक अपेक्षा एक संग वर्तमान बनबैत छथि। जग बाहर आ चेतना भीतरक कठोर दीवारक बदला अर्थ दुनूक जीवित भेटमे जन्मैत अछि।

अभिमुख चेतना सँ स्वतन्त्र अस्तित्व धरि

चेतना सदिखन ‘किछु’क चेतना अछि—विचार, चाह, स्मृति वा निर्णय रिक्त नहि। एहि अभिमुख सम्बन्धसँ पद्य अस्तित्वक प्रश्न दिस बढ़ैत अछि: मनुष्य केवल वस्तु नहि, मुदा जगतसँ काटल आत्मो नहि। जीवन पूर्वलिखित नक्शा नहि; अतीत आकार दैत अछि, पर भविष्यक निर्णय पूर्ण तय नहि करैत। स्वतन्त्रता कर्ममे मूल्य पबैत आ प्रत्येक चुनाव जिम्मेदारी जोड़ैत अछि। अनुभवक वर्णन मनुष्यकेँ अपन स्थिति, दूरी आ सम्भावना चिन्हबाक साधन बनैत अछि।

वाक्यक अर्थ सँ तार्किक सत्य धरि

वाक्यक अर्थक पाछाँ स्वतंत्र अमूर्त प्रतिज्ञप्ति सहज मानबाक बदला पद्य भाषा, संदर्भ, सत्य आ तर्कक वास्तविक संरचना जाँचैत अछि। वर्ग, सदस्यता आ परिमाणनक प्रश्न सत्तामीमांसक प्रतिबद्धता खोलैत—ककरा ‘अछि’ मानल जा रहल अछि, से तर्कक रूपसँ स्पष्ट होइत अछि। कम अनावश्यक सत्ता मानब सरलताक लाभ देत, मुदा भाषाक जटिलता मेटेनाइ नहि। ज्ञानक जाल बदलि सकैत अछि; एहि विनम्रतासँ तार्किक उजास जीवित रहैत अछि।

विश्वासक प्रश्न सँ अशुभक अन्हार धरि

विश्वास आ तर्ककेँ शत्रु बनबाए बिना पद्य ईश्वर, व्यवस्था, प्रयोजन, अनुभव आ अशुभक प्रश्न एक संग रखैत अछि। विश्वक सामञ्जस्य ककरो लेल नियोजक बुद्धिक संकेत हो सकैत, मुदा प्रकृतिक नियम वा आन व्याख्याकेँ बिना जाँच हटाओल नहि जाइत। विशेषतः दुःख आ अशुभ विश्वासक सरल उत्तरकेँ कठिन बनबैत अछि। पद्य न जल्दी निर्णय, न प्रश्नक अपमान—एहि बौद्धिक मर्यादासँ धर्मक दावाकेँ आलोचना आ अनुभवक उजासमे परखबाक आग्रह करैत अछि।

कालक धार सँ धर्मक सत्य धरि

काल केवल घड़ीक माप की यथार्थक भीतर बहैत जीवित धारा—पद्य एहि प्रश्नसँ भूत, वर्तमान, भविष्य, मूल्य आ धर्मक सम्बन्ध खोलैत अछि। जगतक व्यवस्था आ सामञ्जस्यसँ नियोजक धरि पहुँचबाक प्रयोजनवादी तर्कक सम्भावना आ सीमा दुनू जाँचल जाइत अछि। कारणक आन व्याख्या सम्भव भेलासँ छलाँग सावधानी माँगैत अछि। अन्ततः धर्मक सत्य जड़ विश्वास नहि; इतिहास, अनुभव, तर्क, मूल्य आ आचरणक बदलैत संवादमे जीवित विवेक बनैत अछि।

पवित्रताक आकाश सँ लौकिक जीवन धरि

सुधार, नवजागरण आ विज्ञानक उजासमे धर्मक पुरान केन्द्र बदलैत अछि; देवालयक भीतरक प्रश्न सड़क, समाज आ इतिहासपर आबि ठाढ़ होइत अछि। मुक्ति स्वर्गक दूर प्रदेश मात्र नहि, दोसरा लेल जिम्मेदार जीवनो बनि सकैत अछि। विश्वासक ऐतिहासिक रूप, चमत्कार, पुनरुत्थान आ ईश्वर-दावापर प्रश्न बचल रहैत अछि। पद्य धर्मकेँ इतिहास, विज्ञान आ सामाजिक न्यायसँ संवाद करबाक, आ लौकिक जीवनकेँ मूल्यक गहराइ हलुक नहि मानबाक संतुलित आग्रह दैत अछि।

अनेक पथक संगममे एक सत्यक खोज

अनेक धर्म प्रेम, ज्ञान, सेवा वा साधनाक अलग बाट धरैत, मुदा दुःख, सत्य, मुक्ति आ करुणाक मानवीय प्रश्न कतेको ठाम साझा अछि। दोसरा परम्पराकेँ भीतरसँ बुझबाक प्रयास आलोचना छोड़ब नहि; सम्मान आ विवेक दुनू संवादक पुल बनबैत छथि। अपन धर्मसँ प्रेम दोसरा सँ सीखबाक साहसक विरोधी नहि। पद्य एक अन्तिम सूत्र घोषित नहि करैत, बल्कि प्रश्न जीवित राखि मानवताकेँ साझा धरती मानैत सत्यक उजास बाँटबाक यात्रा प्रस्तावित करैत अछि।

‘शुभ’क अर्थ सँ कर्तव्यक कसौटी धरि

‘शुभ’, ‘उचित’, ‘कर्तव्य’ जेकाँ शब्द केवल वस्तु-वर्णन नहि, आचरणक दिशा आ निर्णयक आह्वान सेहो करैत छथि। पद्य कारण, नियम, समानता आ परिणामक अनेक कसौटी जाँचैत अछि। उपयोगितावादी माप सभ प्रभावित जीवनक सुख-दुःख गिनबाक आग्रह करैत, मुदा नैतिक प्रश्न निजी लाभसँ पैघ अछि। कोनो एक सूत्र यात्रा समाप्त नहि करैत; नव परिस्थिति फेर न्याय, भलाइ आ कर्तव्य पूछैत अछि। मानवीय गरिमा निर्णयक साझा केन्द्र बनैत अछि।

घटनाक क्रम सँ ऐतिहासिक बोध धरि

इतिहास तिथि-पत्रक धूलि नहि; घटना, क्रम, संस्था, आकस्मिकता, लक्ष्य, आशा आ भयक मानवीय अर्थ पढ़बाक काज अछि। इतिहासकारक दृष्टिकोण रहैत अछि, मुदा तथ्यक प्रतिरोधो वास्तविक; स्रोत सिद्धान्तक उलटा बोलय तँ सिद्धान्त बदलबाक साहस चाही। वस्तुनिष्ठता निर्जीव निष्पक्षता नहि, अपन पूर्वमान्यता पहचानि विरोधी प्रमाणकेँ न्याय देबाक अनुशासन अछि। पद्य नियम मात्र वा इच्छा मात्र सँ इतिहासकेँ बाँधेनाइ अस्वीकारैत बहुस्तरीय बोध बनबैत अछि।

कानूनक अक्षर सँ न्यायबोधक अन्तःस्वर धरि

न्यायक अनेक अर्थ—सत्य, देय, अधिकार, नियम, आत्मसंयम—एकहि शब्दमे मिलैत, मुदा ककरो एक रूप पूर्ण नहि। समान परिस्थिति मे समान निर्णय आ भिन्नता हो तँ स्पष्ट कारण देब निष्पक्षताक मूल कसौटी बनैत अछि। कानून बनब, लागू करब आ न्यायिक निर्णय—सभ शक्ति पर कारणक पहरा चाहैत अछि। कमजोरक हित आ समान मान बिना अक्षर न्याय नहि बनैत; पद्य कानूनसँ अन्तरात्माक न्यायबोध धरि विवेकक निरन्तर यात्रा देखबैत अछि।

अक्षरक पार जे उजास

कागजक अक्षर जीवनक देहरीपर उतरिते ककरो छत बचबैत, ककरो बाट रोकैत, ककरो मौनकेँ आवाज दैत—पद्य कानूनक वास्तविक असर एहि रूपमे देखबैत अछि। समान तराजू मात्र न्याय नहि जखन हथेलीसभ पहिनेसँ असमान भरल-खाली हो। अधिकार दोसरा प्रति उत्तरदायित्व संग जुड़ैत, आ अन्ध न्याय बहिरो नहि हो—पीड़क, पीड़ित आ ऐतिहासिक जमीनक स्वर सुनय। अक्षरक पारक उजास एहन न्याय अछि जतय नियम मानवी, स्वतन्त्रता उत्तरदायी आ शक्ति विवेकक सीमा मानैत अछि।

10 / विभाग

अनुलग्नक — अनुवाद खण्ड

ई स्वतंत्र मूल कविता-विभाग नहि, अनुवाद-अनुलग्नकक संरचनात्मक भाग अछि। ‘त्वञ्चाहञ्च’ महाभारतक अठारह पर्वक अति-संक्षिप्त मैथिली गीत-प्रबन्ध, ‘असञ्जाति मन’ बुद्धचरित-सम्बद्ध 28-सर्गीय संक्षिप्त रूप, आ अन्तमे ‘Second Person Singular’ आमुखक मैथिली अनुवाद प्रस्तुत करैत अछि; स्रोत-श्रेय आ प्रसारण-सीमा यथास्थान बचाओल गेल अछि।

52 स्रोत-रेकर्ड

अनुलग्नक — अनुवाद खण्ड

ई स्वतंत्र कविता नहि, पोथीक वास्तविक ‘अनुलग्नक — अनुवाद खण्ड’क संरचनात्मक दुआर अछि। एहि बिन्दुसँ मूल दार्शनिक कविता-क्रम समाप्त भऽ अनूदित गीत-प्रबन्धसभक अलग भाग आरम्भ होइत अछि। तें एहि रेकर्डमे कोनो नव काव्य-वस्तु गढ़ल नहि गेल; केवल स्रोतक विभाग-परिवर्तन, ओकर अनुवाद-स्वरूप आ आगाँक अनुलग्नकसभ लेल संगठनात्मक भूमिका सुरक्षित राखल गेल अछि।

त्वञ्चाहञ्च

‘त्वञ्चाहञ्च’ स्वतंत्र पर्व नहि, अनुलग्नक १क गीत-प्रबन्धक शीर्षक अछि। स्रोत एकरा वेदव्यासक अठारह पर्वक संस्कृत महाभारतक अति संक्षिप्त मैथिली अनुवाद रूपेँ चिन्हित करैत अछि। शीर्षकक तुरन्त पाछाँ ‘आन-आन पर्व’ सँ कथात्मक क्रम खुलैत अछि। एहि रेकर्डमे तें अलग कथा आविष्कृत नहि कएल गेल; सम्पूर्ण आगाँक पर्व-श्रृंखलाकेँ धारण करनिहार अनुवाद-रचनाक शीर्षकीय भूमिका मात्र दर्ज अछि।

आन-आन पर्व

‘आन-आन पर्व’ दीर्घ गीतात्मक संक्षेपमे भारत-कथाक आरम्भिक विशाल पृष्ठभूमि खोलैत अछि—व्यास-गणेशक लेखन-कथा, शान्तनु-गंगा, कुरुवंश, पाण्डव-कौरव संघर्ष, द्रौपदी, खाण्डवप्रस्थ आ इन्द्रप्रस्थ धरि अनेक प्रसंग तेज कथात्मक लयमे जुड़ैत छथि। स्रोत स्वयं कल्पना, क्षेपक, असमानता आ धर्मग्रंथ-जकाँ ग्रहण करबाक प्रश्नो उठबैत अछि। अन्तमे खाण्डव-दाह पाछाँ मय दानव अनुपम सभा भवन बनएबाक सेवा स्वीकारैत, जतयसँ ‘सभा पर्व’क अगिला रेकर्ड खुलैत अछि।

सभा पर्व

‘सभा पर्व’ मयक निर्मित सभा भवनसँ आरम्भ भऽ राजसूयक योजना, जरासंध-वध, दिग्विजय, अग्रपूजा आ शिशुपाल प्रसंगक बाद द्यूतसभाक विनाशकारी मोड़ धरि पहुँचैत अछि। शकुनिक पासा, युधिष्ठिरक हार, द्रौपदीक प्रश्न आ अपमान, धृतराष्ट्रक हस्तक्षेप आ पुनः द्यूत वनवासक बाट खोलैत छथि। गीत-प्रबन्ध घटनाकेँ संक्षिप्त तीव्र क्रममे रखैत, सत्ता, जुआ, धर्म, मौन आ स्त्री-अधिकारक संकटकेँ सभा-भवनक चमकक भीतर उजागर करैत अछि।

वन पर्व

‘वन पर्व’ द्यूतक हार पाछाँ पाण्डवसभक वनवाससँ शुरू होइत अछि। कुन्ती विदुरक घर रहैत छथि, द्रौपदी आ चारू भाय धर्मराजक संग वन जाइत, सूर्यक अक्षय पात्र, काम्यक वन, ऋषि-मुनिक सत्संग, नल-दमयन्ती आ आन कथासरितासभ यात्रा भरि जुड़ैत छथि। युद्धक भविष्यक तैयारी, अर्जुनक अस्त्र-साधना, तीर्थ-यात्रा आ द्रौपदीक दुःखक बीच वन केवल निर्वासन नहि, शिक्षा, परीक्षा, स्मृति आ आगामी संघर्षक दीर्घ अन्तराल बनैत अछि।

विराट पर्व

बारह वर्षक वनवास पाछाँ पाण्डवसभ विराटनगरमे भिन्न-भिन्न छद्म रूप धारण करैत छथि—युधिष्ठिर कंक, भीम वल्लभ, अर्जुन वृहन्नला, नकुल ग्रंथिक, सहदेव तंत्रिपाल आ द्रौपदी सैरन्ध्री। कीचकक उत्पीड़नक उत्तर भीमक हाथेँ होइत अछि; कौरवक गौ-हरणक समय अर्जुन शमी-वृक्षसँ अस्त्र निकालि विराटपुत्रक संग युद्ध करैत छथि। अज्ञातवास पूर्ण भेलापर परिचय खुलैत अछि आ उत्तराक विवाह अर्जुनसँ नहि, हुनक पुत्र अभिमन्युसँ होइत अछि।

उद्योग पर्व

अभिमन्युक विवाहक बाद सभा युद्ध टारबाक उपाय खोजैत अछि। कृष्ण शस्त्र न उठेबाक वचनसँ अर्जुनक पक्ष चुनैत छथि, दुर्योधन नारायणी सेना लैत अछि; पाँच गामक प्रस्तावो दुर्योधन अस्वीकार करैत अछि। कुन्ती कर्णकेँ जन्म-सत्य कहैत छथि, मुदा कर्ण दुर्योधनक संग रहबाक प्रण नहि छोड़ैत। अन्ततः दुनू पक्ष अक्षौहिणी सेना सजबैत अछि आ व्यास संजयकेँ दिव्यदृष्टि दैत छथि, जाहिसँ युद्धक वृत्तान्त धृतराष्ट्र सुनि सकथि।

भीष्म पर्व

कुरुक्षेत्रक आरम्भमे स्वजन-वधक शंका सँ अर्जुन विचलित होइत छथि; कृष्ण कर्म, आत्मा आ विराटरूपक उपदेशसँ हुनका युद्धक निर्णय धरि आनैत छथि। पहिल दस दिन भीष्मक प्रचण्ड युद्ध, अनेक वीरक मृत्यु आ पाण्डवक संकटसँ भरल अछि। शिखण्डीकेँ आगाँ राखि अर्जुन भीष्मपर बाण-वृष्टि करैत छथि, आ भीष्म शरशय्यापर पड़ि युद्धक नेतृत्व सँ बाहर होइत छथि।

द्रोण पर्व

भीष्म पाछाँ द्रोण सेनापति बनि युधिष्ठिरकेँ पकड़बाक लक्ष्य लैत छथि। युद्ध चक्रव्यूह, अभिमन्युक मृत्यु, अर्जुनक जयद्रथ-वधक प्रण, घटोत्कचक रात्रि-युद्ध आ कर्णक अमोघ अस्त्रक प्रयोग धरि बढ़ैत अछि। द्रोणकेँ शस्त्र छोड़ाबय ‘अश्वत्थामा मरल’क आधा-सत्य कहल जाइत अछि; ध्यानमग्न द्रोणक वध धृष्टद्युम्न करैत छथि, आ अश्वत्थामा प्रतिशोधमे दिव्यास्त्र उठबैत अछि।

कर्ण पर्व

कर्ण सोलहम दिन सेनापति बनैत छथि आ कुन्तीकेँ देल वचन अनुसार नकुलकेँ प्राणदान दैत छथि। सत्रहम दिन भीम दुःशासनक वध करि अपन प्रण पूरा करैत छथि; अर्जुन-कर्णक निर्णायक युद्धमे कर्णक रथक पहिया धँसैत अछि। कर्ण धर्मयुद्धक विराम माँगैत छथि, मुदा अर्जुन अभिमन्यु आ विराट-गौ प्रसंग स्मरण करा बाण चलबैत छथि; कर्णक मृत्यु पाछाँ शल्य अंतिम सेनापति बनैत छथि।

शल्य पर्व

अठारहम दिन युधिष्ठिर शल्यक वध करैत छथि आ सहदेव शकुनि तथा उलूककेँ मारैत छथि। दुर्योधन युद्धक्षेत्र छोड़ि जलाशयमे नुकाइत अछि, मुदा ग्रामीणक सूचनासँ पाण्डव ओतय पहुँचैत छथि। भीम-दुर्योधन गदा-युद्धमे कृष्णक संकेतपर भीम जाँघपर प्रहार करैत छथि; बलराम एहि प्रहारसँ कुपित होइत छथि, मुदा द्रौपदीक अपमान आ भीमक प्रण स्मरण कराओल जाइत अछि।

सौप्तिक पर्व

दुर्योधनक पतन देखि अश्वत्थामा कृपाचार्य आ कृतवर्माक संग रात्रिमे पाण्डव-शिविरपर आक्रमण करैत अछि। धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, पाँचाल वीर आ द्रौपदीक पाँच पुत्र मारल जाइत छथि; दुर्योधन एहि समाचारक बाद प्राण छोड़ैत अछि। पाछाँ अश्वत्थामा ब्रह्मशिरा छोड़ैत अछि, अर्जुन प्रतिअस्त्र उठबैत छथि, आ व्यास-नारद विनाश रोकैत छथि; अश्वत्थामा अस्त्र वापस नहि लऽ सकैत अछि आ उत्तराक गर्भ दिस मोड़ैत, मणि सौंपि निर्बल तपस्वी बनैत अछि।

स्त्री पर्व

युद्धक बाद स्त्रीसभक विलाप, धृतराष्ट्रक शोक आ कुरुक्षेत्रक मृतकसभक दाह-संस्कार केन्द्रमे अछि। धृतराष्ट्र भीमकेँ आलिंगनमे कुचलबाक आवेगमे लौह-प्रतिमा तोड़ि दैत छथि; कृष्ण वास्तविक भीमकेँ बचबैत छथि। गांधारी कृष्णकेँ अपन वंश-विनाशक प्रतिफल रूपेँ यादव कुलक नाशक शाप दैत छथि।

शान्ति पर्व

युधिष्ठिर युद्ध-पाछाँ राज्य छोड़बाक विचार करैत छथि, मुदा व्यास पलायन नहि, उत्तरदायित्वक मार्ग सुझबैत छथि। राजतिलक पाछाँ युधिष्ठिर भीष्मक शरशय्यापर पहुँचि राजधर्म, लोकधर्म, मोक्षधर्म आ प्रजापालनक शिक्षा लैत छथि। पद्य राजाक व्रतकेँ जाति-प्रदेशक संकीर्णता सँ ऊपर लोक-कल्याणक अनुशासन रूपेँ रखैत अछि।

अनुशासन पर्व

उत्तरायण आबिते युधिष्ठिर, गांधारी, कुन्ती, धृतराष्ट्र आ आन परिजन भीष्मक लग पहुँचैत छथि। दीर्घ शरशय्या आ अन्तिम उपदेशक बाद भीष्म देह त्याग करैत छथि। युधिष्ठिर चन्दनक चितापर अग्नि दैत छथि, आ युद्धक एक महत्त्वपूर्ण नैतिक-साक्षी विदा होइत छथि।

आश्वमेधिक पर्व

उत्तराक मृत शिशुकेँ कृष्ण सत्यक प्रतिज्ञासँ जीवन दैत छथि; बालकक नाम परीक्षित पड़ैत अछि। राज्य स्थिर भेलापर युधिष्ठिर अश्वमेध करैत छथि, स्वर्णपत्र-बद्ध अश्व राज्य-सीमा पार करैत अछि आ विरोधक अवसर दैत अछि। अश्व निर्विघ्न घुरि अबैत अछि आ यज्ञ पूर्ण होइत अछि।

आश्रमवासिक पर्व

पन्द्रह वर्ष पाछाँ धृतराष्ट्र वानप्रस्थक बाट पकड़ैत छथि; गांधारी, कुन्ती, विदुर आ संजय हुनकर संग वन दिस जाइत छथि। विदुर वनमे समाधि लैत छथि। शेष वृद्ध परिजन दावाग्निमे प्राण त्यागैत छथि, जाहिसँ राजदरबारक पुरान पीढ़ीक अन्त होइत अछि।

मौसल पर्व

द्वारकामे यादव कुमारसभक अविवेक आ परस्पर हिंसासँ कुल-विनाशक क्रम चलैत अछि। बलराम प्रभासतीर्थमे समाधि लैत छथि; कृष्ण जंगलमे विश्रामक समय जरा नामक व्याधक बाणसँ विदा होइत छथि। एहि समाचारक बाद वसुदेवो देह त्याग करैत छथि।

महाप्रास्थानिक पर्व

कृष्णक मृत्यु पाछाँ युधिष्ठिर परीक्षितकेँ राज्य सौंपि पाँचू भाइ आ द्रौपदीक संग महाप्रस्थान करैत छथि। हिमालयी यात्रामे द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन आ भीम क्रमशः खसैत जाइत छथि; केवल युधिष्ठिर आ संग चलैत कुकुर बचैत छथि। इन्द्र स्वर्ग-रथमे कुकुर छोड़बाक शर्त रखैत छथि, मुदा युधिष्ठिर अस्वीकार करैत छथि; कुकुर स्वयं यम/धर्म रूपमे प्रकट होइत अछि।

स्वर्गारोहण पर्व

स्वर्गमे कौरवसभकेँ देखि युधिष्ठिर अपन भाइ-द्रौपदीक खोज करैत नर्कक द्वार धरि जाइत छथि आ हुनका छोड़ि स्वर्ग जाएब अस्वीकार करैत छथि। यम बतबैत छथि जे यक्ष-प्रश्न, कुकुर आ ई नर्क-दर्शन तीन परीक्षा छल; युधिष्ठिर दैवी रूप पबैत छथि आ कर्ण सहित स्वजनकेँ देखैत छथि। गीत-प्रबन्ध अन्तमे महाभारतक संघर्षकेँ ‘त्वञ्चाहञ्च’—हम-तोहर, कुल-मोह आ प्रतिभा-दमनक निरन्तर रोग—रूपेँ वर्तमान धरि बढ़बैत अछि।

असञ्जाति मन

ई स्वतंत्र सर्ग नहि, ‘असञ्जाति मन’ गीत-प्रबन्धक शीर्षकीय रेकर्ड अछि। स्रोतक टिप्पणी एकरा अश्वघोष-सम्बद्ध २८-सर्गीय बुद्धचरित परम्पराक तिब्बती-संरक्षित/पुनःसंस्कृत रूपक अति-संक्षिप्त मैथिली अनुवाद रूपेँ प्रस्तुत करैत अछि। तें एहि ठाम कोनो अलग कथा गढ़ल नहि गेल; आगाँक सर्ग १–२८ लेल संरचनात्मक दुआर मात्र सुरक्षित अछि।

सर्ग १

भरतदेशक शाक्य राजा शुद्धोधन आ रानी मायाक प्रसंगसँ गीत-प्रबन्ध आरम्भ होइत अछि। मायाक श्वेत हाथीक स्वप्न, गर्भधारण, शुभ संकेत आ सिद्धार्थक जन्मक कथा क्रमशः खुलैत अछि। राजपरिवार उत्सव, दान आ वैदिक कर्मक संग बालकक आगमन स्वीकारैत अछि; आरम्भेँ भविष्यक असाधारण जीवनक संकेत उपस्थित अछि।

सर्ग २

सिद्धार्थक जन्मसँ राज्य समृद्ध होइत अछि, मुदा मायाक शीघ्र मृत्यु आनन्दमे विरह जोड़ैत अछि। शुद्धोधनकेँ तपस्वी-असितक भविष्यवाणी मोन रहैत अछि, जे बालकक संन्यासक सम्भावना देखबैत अछि। राजपरिवार सिद्धार्थक गृहस्थ जीवन दृढ़ करबाक प्रयासमे यशोधरासँ विवाह करबैत अछि, आ समयक संग राहुलक जन्म होइत अछि।

सर्ग ३

राजा सिद्धार्थक उद्यान-यात्राकेँ केवल सुखद बनाबय चाहैत छथि, मुदा बाटमे वृद्ध, रोगी आ जीवनक क्षयक दृश्य रोकल नहि जाइत। सारथीसँ प्रश्न करैत सिद्धार्थ बुझैत छथि जे जरा आ व्याधि ककरो छोड़ैत नहि। प्रत्येक यात्रा आमोदक आकर्षण घटबैत आ अनित्यताक भय/प्रश्न बढ़बैत अछि, जाहिसँ महल भीतरक सुरक्षित संसार दरकैत अछि।

सर्ग ४

नव सारथी सिद्धार्थकेँ पद्म-उद्यान धरि लऽ जाइत अछि, जतय युवतीसभ हुनका आमोद-प्रमोदमे बाँधबाक प्रयास करैत छथि। उदायी सेहो भोगक पक्ष रखैत छथि, मुदा सिद्धार्थ आयुक क्षणभंगुरता देखैत अनासक्त रहैत छथि। सूर्यास्तक दृश्य संसारक अनित्यताक बोध गाढ़ करैत अछि आ ओ चिन्तामग्न घर घुरैत छथि।

सर्ग ५

खेत-पथारमे हलक कारण मरैत कीट-पतंग देखि सिद्धार्थ दुखित होइत छथि आ ध्यानमे शान्ति पबैत छथि। संन्यासीसँ भेट आ जन्म-मृत्यु प्रश्न हुनका गृहत्याग दिस लऽ जाइत अछि; शुद्धोधन गृहस्थ धर्मक आग्रह करैत छथि, तखन सिद्धार्थ मृत्यु, रोग आ वृद्धावस्थासँ मुक्तिक असम्भव शर्त रखैत छथि। अन्ततः रातिमे कंथकपर चढ़ि नगर छोड़ैत, कपिलवस्तुकेँ प्रणाम करैत जन्म-मृत्युक भेद जानि फेर घुरबाक संकल्प करैत छथि।

सर्ग ६

नगर सँ दूर सिद्धार्थ राजसी केश काटैत, मुकुट-आभूषण छंदककेँ सौंपैत आ ओकरा वापस पठबैत छथि। छंदक आ कंथक दुनूक विरह स्रोतमे करुण दृश्य बनैत अछि। एक व्याधक कषाय-वस्त्र अपन शुभ्र वस्त्रक बदला लऽ सिद्धार्थ बाह्य रूपेँ सेहो राजकुमार सँ साधक बनबाक संक्रमण पूरा करैत छथि।

सर्ग ७

सिद्धार्थ अनेक कठोर तपस्या, अग्निहोत्र आ यज्ञ-विधि देखैत छथि, मुदा केवल स्वर्ग-प्राप्तिक लक्ष्यसँ संतुष्ट नहि होइत। हुनकर खोज मोक्षक अछि, तें ओ आश्रम छोड़ि अराड मुनिक दिशा पकड़ैत छथि। सर्ग यातना वा कर्मक बाह्य कठोरताकेँ अन्तिम उत्तर मानबाक बदला ज्ञानक आगाँक खोज खोलैत अछि।

सर्ग ८

छंदक कंथकक संग कठिन यात्रा करि कपिलवस्तु घुरैत अछि आ सिद्धार्थक कषाय-वस्त्र धारणक समाचार दैत अछि। गौतमी, यशोधरा आ शुद्धोधन गहन वियोगमे डूबैत छथि। राजा पुरोहित आ मंत्रीकेँ सिद्धार्थक खोजमे पठबैत छथि, जाहिसँ महल आ वनक बीच संवाद फेर जुड़ैत अछि।

सर्ग ९

पुरोहित आ मंत्री सिद्धार्थकेँ अराडक बाटपर गाछक नीचाँ पबैत छथि आ गृहस्थ रहितो मोक्ष पाबयवला राजाक उदाहरण दऽ घुरबाक आग्रह करैत छथि। सिद्धार्थ अपन प्रण नहि तोड़ैत; हुनका लेल उत्तर उधारक उदाहरणमे नहि, स्वयं ज्ञान पाबयमे अछि। दुनू दूत गुप्त निगरानीक व्यवस्था कऽ घुरैत छथि, आ सिद्धार्थक खोज आगाँ बढ़ैत अछि।

सर्ग १०

सिद्धार्थ गंगा पार कऽ राजगृह पहुँचैत छथि, भिक्षा ग्रहण करैत पाण्डव-पर्वतपर बैसैत छथि। मगधराज बिम्बसार हुनका पहचानि गृह/राजसी जीवनक दिशामे घुरेबाक प्रयास करैत छथि। सर्ग छोट अछि, मुदा राजसत्ता आ संन्यासक मार्गक पहिल प्रत्यक्ष संवाद खोलैत अछि।

सर्ग ११

सिद्धार्थ बिम्बसारक प्रस्तावक उत्तरमे पूछैत छथि जे मोह छोड़ि फेर कतय घुरल जाए। राजा आ दास दुनू सुख-दुःखक अधीन छथि; अतः सत्ता दुःखक प्रश्नक समाधान नहि। ओ बिम्बसारकेँ प्रजाक संग अपन रक्षा/धर्म निभेबाक सलाह दऽ वैश्वंतर आश्रम दिस बढ़ैत छथि।

सर्ग १२

अराड अविद्या, मोह, क्रोध, आलस्य आ मोक्षक मार्गपर शिक्षा दैत छथि, मुदा सिद्धार्थ आत्मा-अहंकारक प्रश्नपर असंतुष्ट रहैत उद्रकक आश्रम दिस बढ़ैत छथि। दीर्घ कठोर तपस्यो प्रश्नक समाधान नहि करैत; शरीर दुर्बल भेलापर ओ स्वस्थ तनमे ज्ञान खोजबाक निर्णय लैत छथि। निरंजना-स्नान आ नन्दबालाक पायस हुनका शक्ति दैत अछि, पाँच साथी छोड़ि जाइत छथि, मुदा सिद्धार्थ बोधि-प्राप्तिक संकल्पपर स्थिर रहैत छथि।

सर्ग १३

बोधि-आसनपर सिद्धार्थक संकल्प देखि मार कामना, भय, दर्प आ हिंसक रूपसभक संग हुनका डिगेबाक प्रयास करैत अछि। प्रलोभन, शस्त्र, अन्हार आ विकराल सेनाक बीच साधक स्थिर रहैत छथि। अन्ततः मार पराजित होइत अछि; बोधिवृक्षक स्थान ज्ञान-प्राप्तिक आसन्न केन्द्र रूपेँ उजागर होइत अछि।

सर्ग १४

रातिक अलग-अलग पहरमे सिद्धार्थ पूर्वजन्म-स्मृति, दिव्यचक्षु, कर्मफल, जन्म-जरा-मृत्युक चक्र आ अन्ततः बोधि पबैत छथि। शान्ति प्राप्त भेलापर ओ बुद्ध बनैत छथि आ किछु दिन बोधिवृक्षक निकट रहैत छथि। देवतासभ लोककल्याण लेल उपदेशक आग्रह करैत छथि; अराड-उद्रकक मृत्यु जानि बुद्ध वाराणसीक पाँच पूर्वसंगी दिस चलबाक निश्चय करैत छथि।

सर्ग १५

मार्गमे एक भिक्षु बुद्धक तेज देखि गुरु पूछैत अछि; बुद्ध अपन निर्वाण-प्राप्ति बतबैत काशी दिस बढ़ैत छथि। मृगदावमे पाँच पुरान साथी पहिने उपेक्षा करबाक ठानैत छथि, मुदा सामने आबिते भाव बदलैत अछि। कठोर तप छोड़बाक आरोपक उत्तर बुद्ध घोर तप आ भोग—दुनू आसक्ति छोड़ि मध्य मार्गसँ बोधि पाबयबाक बात कहैत छथि।

सर्ग १६

सम्यक दृष्टि, संकल्प, आचरण, आजीविका, व्यायाम, स्मृति आ समाधि आदिक संग अष्टांग मार्गक काव्यात्मक रूप खुलैत अछि। दुःख, ओकर कारण, निरोध आ निरोधक उपाय—चारि ध्रुव सत्य रूपेँ रखल गेल अछि। मृगदावमे धर्मचक्र प्रवर्तनक बाद पाँच भिक्षु, यश आ अनेक गृहस्थ दीक्षित होइत छथि; गृहस्थ रहितो अनासक्ति सम्भव बताओल जाइत अछि।

सर्ग १७

राजगृहमे बिम्बसार काश्यपकेँ बुद्धक शिष्य रूपमे देखैत छथि; काश्यप अग्नि-उपासना छोड़बाक कारण कहैत छथि। बुद्ध चेतना, इन्द्रिय, शरीर आ अनात्म-संबंधी शिक्षा दैत छथि, आ बिम्बसार वेणुवन दान करैत छथि। अश्वजितक माध्यमेँ उपतिष्य आ मौद्गल्यायन धर्म दिस आकर्षित होइत छथि, पाछाँ महाकाश्यप सेहो संघमे प्रवेश करैत छथि।

सर्ग १८

श्रावस्तीक धनिक सुदत्त वेणुवनमे तत्वज्ञान पाबि जेतवनमे विहार बनाबय ठानैत छथि। वनक मालिक आरम्भमे भारी मूल्य माँगैत अछि, मुदा सुदत्तक समर्पण देखि ओकर हृदय बदलैत अछि आ वन विहार लेल देल जाइत अछि। उपतिष्यक संरक्षकत्वमे जेतवन शीघ्र संघक केन्द्र बनैत अछि।

सर्ग १९

बुद्ध कपिलवस्तु घुरि पिता शुद्धोधनकेँ कर्म, जन्म-मृत्यु आ दुःखसँ फराक बाटक शिक्षा दैत छथि। आनन्द, नन्द, अनुरुद्ध, देवदत्त, उदायि, उपालि सहित अनेक जन गृह छोड़ि दीक्षा लैत छथि। शुद्धोधन राजकाज हस्तांतरित कऽ राजर्षि-जेकाँ जीवन स्वीकारैत छथि, आ बुद्ध पुनः लोककल्याणक चिन्तनमे लगैत छथि।

सर्ग २०

बुद्ध कोसलक जेतवन पहुँचैत छथि, जतय सुदत्त स्वागत करि विहार हुनकर चरणमे समर्पित करैत छथि। राजा प्रसेनजित धर्ममे दीक्षित होइत छथि, आ अनेक साधुक शंका बुद्ध समाधान करैत छथि। सर्ग धर्मोपदेशक विस्तारकेँ राजदरबार, साधु-संघ आ देवलोक धरि फैलल रूपमे प्रस्तुत करैत अछि।

सर्ग २१

बुद्ध राजगृहसँ गंधार, जीवकक आम्रवन आ अनेक स्थान घूमि विभिन्न जनकेँ संघमे आनैत छथि। अंगुलीमाल तस्कर प्रेमक धर्ममे दीक्षित होइत अछि, जबकि देवदत्त ईर्ष्यावश संघमे कलह पसारय चाहैत अछि। हिंसक हाथीक प्रसंगमे बुद्धक शान्त उपस्थिति गजराजकेँ थामैत अछि, आ ई दृश्य देखि अजातशत्रुओ शिष्य बनैत अछि।

सर्ग २२

बुद्ध पाटलिपुत्रक उभरैत दुर्ग/नगरक भविष्यक प्रसिद्धिक संकेत दैत गंगा पार करैत छथि। नन्दिग्रामक मृत्यु-दुःखमे सांत्वना दऽ वैशाली पहुँचैत, आम्रपालीक उद्यानमे निवास करैत छथि। शिष्यसभकेँ संयम आ स्थिरज्ञानक शिक्षा दैत ओ लोक-संपर्कक अगिला चरण खोलैत छथि।

सर्ग २३

लिच्छवीगण बुद्धकेँ भिक्षाक आमन्त्रण दैत छथि, मुदा बुद्ध पहिने देल वचन निभबैत आम्रपालीक घर भिक्षा ग्रहण करैत छथि। वर्षावासक बाद मार हुनका निर्वाणक पुरान संकल्प स्मरण करबैत अछि। बुद्ध तीन मास पाछाँ देह त्यागक संकेत दैत समाधिमे प्रवेश करैत छथि, आ धरती-आकाशक कम्पन आसन्न महापरिनिर्वाणक प्रतीक बनैत अछि।

सर्ग २४

आनन्द पृथ्वी-आकाशक विचलनक कारण पूछैत छथि; बुद्ध स्पष्ट करैत छथि जे केवल तीन मास बाद ओ देह छोड़ता। आनन्द आ लिच्छवीगण विलाप करैत छथि। बुद्ध हुनका बुझा-सुझा वैशालीक उत्तर दिशा दिस चलैत छथि, जाहिसँ अन्तिम यात्राक भाव गाढ़ होइत अछि।

सर्ग २५

भोगवतीमे बुद्ध कहैत छथि जे विनय-विहीन वचन धर्म नहि। पापुरमे चुन्दक घर भोजन ग्रहण कऽ ओ कुशीनगर दिस चलैत, हिरण्यवतीमे स्नान करैत आ जुड़ल शाल-वृक्षक बीच अन्तिम शयनक स्थान चुनैत छथि। आनन्दकेँ मल्लगणकेँ बजाबय कहल जाइत अछि, कारण उत्तर पहर निर्वाणक समय समीप अछि।

सर्ग २६

त्रिदण्डी सुभद्र बुद्धक लग आबि अष्टांग मार्गक शिक्षा पबैत छथि आ स्वयं निर्वाणक इच्छा व्यक्त करैत छथि। ओ बुद्धक अन्तिम शिष्य बनि देह त्याग करैत छथि। बुद्ध अन्तिम संस्कारक निर्देश दैत, शिष्यसभक शंका पूछबैत आ ध्यानक क्रमिक अवस्थामे प्रवेश कऽ शान्ति ग्रहण करैत छथि।

सर्ग २७

महापरिनिर्वाणक बाद मल्लगण बुद्धक देह स्वर्ण-शिविकामे लऽ हिरण्यवती पार करैत चन्दन-चितापर राखैत छथि। काश्यपक आगमन धरि अग्नि नहि पकड़ैत; हुनका पहुँचला पाछाँ चिता प्रज्वलित होइत अछि। अस्थि स्वर्णकलशमे सँभारि नगरक पूजा-भवनमे प्रतिष्ठित कएल जाइत अछि।

सर्ग २८

सात देशक दूत बुद्धक अस्थि माँगैत छथि; मल्लगणक अस्वीकारसँ युद्धक स्थिति बनैत अछि, मुदा द्रोण ब्राह्मण अस्थिकेँ आठ भागमे बाँटि विवाद रोकैत छथि। अस्थि, मूल घट आ छाउरक आधारपर स्तूप बनैत छथि; पाछाँ पाँच सय भिक्षु आनन्दक माध्यमेँ बुद्धक शिक्षा एकत्र करैत छथि। स्रोत कालान्तरमे अशोक द्वारा धातु-वितरण आ अनेक स्तूपक निर्माणक स्मृति जोड़ैत ‘असञ्जाति मन’क गीत-प्रबन्ध बुद्धकेँ प्रणामसँ समाप्त करैत अछि।

आरम्भ करैत

ई स्वतंत्र अनुच्छेद नहि, अनुलग्नक ३ मे ‘Second Person Singular’ केर अंग्रेजी आमुखक मैथिली अनुवादक शीर्षकीय दुआर अछि। स्रोत पहिने स्पष्ट करैत अछि जे उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’क ‘मध्यमपुरुष एकवचन’क अंग्रेजी अनुवादक आमुखकेँ गजेन्द्र ठाकुर मैथिलीमे अनूदित कऽ प्रस्तुत करैत छथि। तें एहि रेकर्डक काज आगाँक ‘१’ आ ‘२’ खण्डक संरचना चिन्हित करब अछि।

१

आमुखक पहिल खण्ड बहुभाषिक भारतमे ‘के बाजि रहल अछि’ प्रश्नसँ आरम्भ होइत अछि। व्याकरण आ कवित्वक तनाव, संदर्भ-निर्भर अर्थ, मैथिलीक ऐतिहासिक साहित्यिक परम्परा आ सीमित अन्तरराष्ट्रीय पहुँच, तथा उत्तर-आधुनिक सिद्धान्तक उपयोग/सीमा पर विचार करैत लेखक अपन मैथिली-बांग्ला-हिन्दी-अंग्रेजी बहुभाषिक पृष्ठभूमि खोलैत छथि। ‘मध्यमपुरुष एकवचन’क अनुवाद एहि भाषायी यात्राक फल रूपेँ रखल गेल अछि।

२

दोसर खण्ड स्वयंकेँ तीन भूमिकामे पढ़ैत अछि—लेखक, अनुवादक आ भाषाविज्ञानी। लेखक ‘हम’केँ पृष्ठभूमिमे धकेलि सामाजिक भाष्य आ ‘तोरा’क संवाद केन्द्रमे आनय चाहैत छथि; अनुवादक मात्र निष्क्रिय प्रतिध्वनि नहि, पाठकसँ सक्रिय सह-रचनाकार बनैत अछि। भाषाविज्ञान वस्तुनिष्ठता माँगैत अछि, मुदा देशज सहजज्ञानो प्रश्न उठबैत अछि। अन्ततः अनुवाद मूल पाठकेँ अक्षत प्रतिलिपि नहि राखैत—भाषा-संस्कृतिक परिवर्तन करैत अछि—आ एहि परिवर्तनक दृश्य-सहचर रूपेँ संजय भट्टाचार्यक चित्रांकन स्मरण कएल गेल अछि।

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