wdm-278PDF 614विभाग-चिन्ह
खण्ड ७ — अनेक दिशाक दार्शनिक आकाश
ई केवल संरचनात्मक खण्ड-शीर्षक अछि; स्रोतमे एहि शीर्षकक स्वतंत्र पद्य-पाठ नहि अछि। ‘अनेक दिशाक दार्शनिक आकाश’ नामक एहि खण्डक बादक पद्यसभ विभिन्न दार्शनिक दिशाकेँ एकहि प्रश्न-आकाशमे राखि तुलना, संवाद आ सीमा-बोधक क्रम खोलैत छथि।
wdm-279PDF 615बहुदृष्टि · प्रत्यक्ष · अनुमान
अनेक दिशाक एक सत्य
एक दीपकेँ अनेक कोणसँ देखबाक रूपकसँ पद्य सत्यक बहुदृष्टि खोलैत अछि। वस्तु अनेक गुण, सम्बन्ध आ काल समेटने रहैत अछि; तें एक वचनमे सम्पूर्णता बाँधब कठिन। प्रत्यक्ष, स्मृति, पहचान, अनुमान, शब्द आ तर्क ज्ञानक अलग बाट बनैत छथि, प्रत्येकक कसौटी आवश्यक। कविता सत्यपर अधिकारक बदला संवाद, ज्ञानपर अभिमानक बदला अनुशासन, आ मतभेदकेँ सत्यक राह खोलबला सम्भावना रूपेँ देखैत अछि।
wdm-280PDF 617कारण · सत्ता · विश्वास
कारणक सीढ़ी, सत्ताक ज्योति
विश्वास आ बुद्धिकेँ शत्रु नहि, सत्यक दू सहयात्री मानि पद्य कारण, सत्ता, सम्भावना-क्रिया, देह-आत्मा, सद्गुण, विधि, राज्य आ परम सत्यक प्रश्न जोड़ैत अछि। परिवर्तन पाछाँ कारण खोजैत बुद्धि अनिवार्य आधारक कल्पना धरि पहुँचैत अछि, मुदा कविता तर्ककेँ सम्पूर्ण स्वर्ग घोषित नहि करैत। विश्वास सत्यसँ जन्मल हो तँ तर्कसँ भय किएक, तर्क सत्यक सेवक हो तँ अहंकार किएक—एहि प्रश्नसँ अन्तिम स्वर नम्रता, सीमा-बोध आ दीर्घ उजासक बनैत अछि।
wdm-281PDF 620प्रत्यभिज्ञा · चेतना · संवाद
अपनहि उजासक प्रत्यभिज्ञा
चेतना, तर्क, व्याकरण, काव्य, तन्त्र, अनुभव आ साधनाक अनेक धारा एकहि आकाशमे मिलैत अछि। पद्य जगतकेँ मिथ्या छाया मानि टारबाक बदला चेतन मूलक बहुरूप अभिव्यक्ति रूपेँ देखैत अछि; प्रकाशक संग ‘विमर्श’ जुड़िते चेतना अपनहि स्वरूप पहचानैत अछि। मुक्ति दूरक वस्तु नहि, भुलायल आत्म-चिन्हक पुनः प्रत्यभिज्ञा अछि। रचना तर्क आ अनुभव, काव्य आ दर्शन, रूप आ अरूप बीच विरोधक भीत नहि, संवादक सेतु बनबैत अछि।
wdm-282PDF 622विकास · अतिमानस · धरती
माटिसँ अतिमानस धरि
माटिक जड़ पदार्थसँ जीवन, जीवनसँ मन आ मनसँ व्यापक चेतना धरि विकासक क्रम पद्यक मुख्य रूपक अछि। मानव अन्तिम पड़ाव नहि, बीचक दुआर अछि; आरोहणक संग ऊर्ध्व चेतनाक अवतरण सेहो आवश्यक मानल गेल अछि। धरती छोड़ि मुक्ति नहि, धरतीमे दिव्य सम्भावना उतारब लक्ष्य बनैत अछि। अतिमानस चमत्कारक पलायन नहि, विभक्त चेतनाक गाँठ खोलि ज्ञान, कर्म आ प्रेमकेँ एकत्वक व्यापक अनुभवमे रूपान्तरित करबाक संकेत अछि।
wdm-283PDF 624रूप-कारण · मध्यम मार्ग · सद्गुण
रूप, कारण आ मध्यम मार्ग
रूप, पदार्थ, कारण, संभावना, कर्म, सद्गुण, समाज आ कलाकेँ एकहि धरतीपर रखि पद्य पूछैत अछि—जे अछि, ओकर अर्थ की, आ मनुष्य श्रेष्ठ जीवन कोना गढ़य। बीजमे वृक्षक संभावना आ कारणक गर्भमे कार्यक रूपक परिवर्तनकेँ क्रमबद्ध बनबैत अछि। इन्द्रियक तथ्य बुद्धिक सामान्य अर्थसँ जुड़ैत अछि; तर्क जीतक हथियार नहि, सम्बन्ध स्पष्ट करबाक अनुशासन अछि। नैतिक जीवन अति-न्यूनक बीच विवेकपूर्ण मध्य, विकसित क्षमता आ समुदायिक लोकहितसँ बनैत अछि।
wdm-284PDF 626सन्देह · विश्वास · आत्मनिरीक्षण
सन्देहक रातिसँ विश्वासक भोर
सन्देह एहि पद्यमे विश्वासक शत्रु नहि, झूठ भरोसाक धूल हटाबयबला सफाईक धार अछि। इन्द्रिय, स्वप्न, तर्क, प्रतिष्ठा आ बाहरी यश सभकेँ परखैत मन अन्ततः बुझैत अछि जे ज्ञान माथक संग्रह मात्र नहि, आचरण आ आत्मनिरीक्षणक रूपान्तरण सेहो चाहैत अछि। बुद्धिक सीमा स्वीकारब कमजोरी नहि, नम्रता अछि; विश्वास अन्हर समर्पण नहि, अनुभवक एक आरो खिड़की। रातिक संशयक बाद जे भरोसा उगैत अछि, से प्रश्न आ प्रकाश दुनूकेँ संग लऽ चलैत अछि।
wdm-285PDF 629भीतरक प्रकाश · स्वतन्त्र इच्छा · दू नगर
भीतरक प्रकाश आ दू नगर
बाहरी सुखक पीछाँ दौड़ैत मन भीतरक रिक्ततासँ जूझि स्थिर अर्थ खोजैत अछि। दृश्य जग बदलैत रहैत अछि, मुदा सत्य मापबाक बुद्धिगत उजास, नैतिक क्रम आ परम आधारक प्रश्न उठैत रहैत अछि। अशुभ स्वतन्त्र सत्ता नहि, भलाइ घटबाक अभाव आ भटकल इच्छाक रूपेँ देखाओल गेल अछि; स्वतन्त्रता संग जिम्मेदारी अनिवार्य अछि। व्यक्ति आ समाजक ‘दू नगर’ इच्छाक भिन्न दिशासँ बनैत छथि, आ दर्शनक परीक्षा अन्ततः हृदयक क्रम, प्रेम, चरित्र आ न्यायमे होइत अछि।
wdm-286PDF 632ध्वनि · व्यञ्जना · रस
शब्दक पार जे स्वर जागय
कविता वाच्यार्थक पार अनकहल अर्थक कम्पन खोजैत अछि। अभिधा सोझ अर्थ दैत अछि, लक्षणा सन्दर्भमे सीमा बढ़बैत अछि, आ व्यञ्जना ओहि सूक्ष्म भावकेँ जगबैत अछि जे उच्चरित शब्दसँ पैघ होइत अछि। रस लेखक वा पात्रक निजी भाव नहि रहि सहृदय पाठकक साझा अनुभव बनैत अछि। आलोचना अलंकार गिनती नहि, कहल-अनकहल अर्थक तह खोलबाक धैर्यपूर्ण अभ्यास होइत अछि; पाँति समाप्त भेला पाछाँ हृदयमे जे अर्थ जीवित रहैत अछि, से काव्यक प्राण बनैत अछि।
wdm-287PDF 634भाषा-कर्म · प्रसंग · वचन
कहबो एकटा काज अछि
भाषा वर्णन मात्र नहि, कर्म सेहो करैत अछि—वचन देब, नामकरण, आदेश, अनुरोध वा क्षमा कहिते सामाजिक घटना घटि सकैत अछि। पद्य कथनक देह, वक्ताक उद्देश्य आ श्रोता पर पड़ल प्रभावक अलग तह चिन्हैत अछि। एकहि वाक्य प्रसंग अनुसार खबर वा अनुरोध बनि सकैत अछि; अर्थ शब्दमे बन्द नहि, प्रयोग, व्यक्ति, समय आ परिस्थितिसँ बनैत अछि। कहल बातक भार उठेनाइ नैतिक जिम्मेदारी अछि, तें ‘कहबो एकटा काज’ बनैत अछि।
wdm-288PDF 636एकत्व · बहुधर्म · प्रेम
एकहि उजासक अनेक दुआर
अनेक धर्म, भाषा, प्रतीक, साधना आ अनुभवक दुआर एकहि गहिर सत्य-पिपासाक दिशि खुलि सकैत छथि। पद्य एकत्वकेँ भेद मेटेबाक आदेश नहि मानैत, आ अनेकत्वकेँ मूल सम्बन्ध भुलाबयबला विखण्डन नहि बनबैत। ज्ञानक संग प्रेम आ अन्तरानुभवक मूल्य अछि, मुदा कट्टर दावा जे सत्य केवल हमर अछि, ओकर विरोध कएल गेल अछि। भिन्न विश्वासमे पहिने मनुष्यता देखब, करुणा आ विनम्रता संग सीमा पार करब—एहि रूपेँ एक उजास अनेक दुआर पबैत अछि।
wdm-289PDF 638प्रकृति-पुरुष · विवेक · मुक्ति
प्रकृति नाचय, पुरुष देखय
प्रकृति परिवर्तनशील नर्तकी आ पुरुष नीरव साक्षी रूपेँ पद्यक मूल द्वैत बनैत अछि। कारणमे कार्यक संभावना, तीन गुणक असंतुलन, बुद्धि-अहंकार-मन-इन्द्रियक क्रम आ सूक्ष्मसँ स्थूल जगतक विकास समझाओल गेल अछि। बन्धन प्रकृतिक क्रियाकेँ साक्षीक अपन क्रिया बुझबाक भ्रमसँ जन्मैत अछि। प्रत्यक्ष, अनुमान आ विश्वसनीय वचन ज्ञानक बाट छथि; मुक्ति जग छोड़ब नहि, बदलैत प्रकृति आ देखनिहार चेतनाक विवेकपूर्ण भेद पहचानब अछि।
wdm-290PDF 641तर्क · प्रमाण · श्रद्धा
तर्कक फूलसँ सत्यक अर्घ्य
तर्क आ श्रद्धाकेँ विरोधी नबना कऽ पद्य दावाकेँ प्रमाण, हेतु, व्याप्ति आ सम्बन्धक कसौटीपर राखैत अछि। देखल चिह्नसँ अदृश्य कारण धरि अनुमान अन्ध छलाँग नहि, अनुशासित प्रक्रिया अछि; आत्मा, जगत वा ईश्वरक प्रश्नो प्रमाणक सीमा बिनु निष्कर्ष नहि पबैत। विरोधी मत सम्पूर्ण सुनब आ तीक्ष्ण आपत्तिपर अपन आधार फेर जाँचब दार्शनिक जीवितताक शर्त अछि। ज्ञानक फूल अहंकार बनि नष्ट नहि हो, तें तर्कक अर्घ्य नम्रता संग सत्यक दुआरपर चढ़ैत अछि।
wdm-291PDF 643हेतु · अनुमान · आत्मा
हेतुक दीप, आत्माक साक्षी
पुरान सूत्रपर उठल कठोर आपत्तिक उत्तरमे हेतु, पक्ष, सपक्ष, विपक्ष, परामर्श आ हेत्वाभासक सूक्ष्म अनुशासन विकसित होइत अछि। प्रत्यक्षो साधारण ‘देखब’ नहि—वस्तु, गुण, जाति, सम्बन्ध आ माध्यमक प्रश्न ओकर भीतर अछि। आत्माक स्थायित्व स्मृति, भाषा आ ‘हम’क निरन्तर प्रत्ययक आधारपर जाँचल जाइत अछि, मुदा विरोधी मतकेँ चुप नहि कराओल जाइत। पद्य परम्पराकेँ जड़ि नहि, परीक्षण-सहिष्णु विचारक अभ्यास बनबैत अछि।
wdm-292PDF 645श्रम · भौतिकता · मुक्ति
पदार्थक गति, मनुष्यक मुक्ति
कारखानाक धुँआ, श्रमिकक हथेली, उत्पादन, पूँजी, जमीन आ वर्ग-संघर्षक दृश्य भौतिक परिस्थिति आ विचारक सम्बन्ध खोलैत अछि। इतिहास राजाक सूची नहि, श्रमक घामो अछि; समाज स्थिर पाषाण नहि, विरोध आ परिवर्तनक गतिशील रचना अछि। श्रमिक अपन सृजन, समय आ वस्तुसँ पराया होएत तँ मुक्ति केवल रोटी वा शासन-परिवर्तनसँ पूरा नहि होइत। विज्ञान, संगठन, साझा विवेक आ समान अवसरक धरतीपर मानवीय क्षमता फुलब—पद्यक सामाजिक मुक्ति एहि दिशि देखैत अछि।
wdm-293PDF 648अर्थ · सत्यापन · भाषा
अर्थक कसौटी
‘अहाँ कहैत छी, जाँचब कोना?’—पद्य अर्थक मुख्य कसौटी एहि प्रश्नमे रखैत अछि। तार्किक/गणितीय कथन अपन संरचनासँ अर्थ पबैत अछि, अनुभवजन्य कथन परीक्षणक सम्भावित बाट माँगैत अछि, आ प्रमाणसँ सर्वथा कटि गेल विराट तत्त्वमीमांसक शब्द प्रश्नक घेरेमे अबैत अछि। नैतिक आ सौन्दर्य-वाक्य तथ्य-जाँचक समान धरातलपर नहि रहैत। भाषा-विश्लेषणक अनुशासन दावा, परिभाषा, प्रमाण आ मूल्यक भेद स्पष्ट करैत अछि।
wdm-294PDF 650वैशेषिक · द्रव्य-गुण · भेद
कण-कणमे भेदक व्याकरण
द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय आ अभावक माध्यमेँ पद्य जगतक ‘भेदक व्याकरण’ रचैत अछि। पृथ्वी-जलक स्थूल रूपसँ मन-आत्मा आ परमाणुक सूक्ष्म आधार धरि वर्गीकरण नामक खेल नहि, वस्तु कोना चिन्हल जाए तकर विधि अछि। गति स्थिरता केँ भंग करैत, सामान्य अनेककेँ जोड़ैत, विशेष भिन्नता बचबैत, आ अभाव अनुपस्थितियो ज्ञानक अंश बनबैत अछि। प्रत्यक्ष-अनुमानक अनुशासन कल्पना आ प्रमाणक सीमा राखैत अछि।
wdm-295PDF 653आचरण · राज्य · मनुष्यता
अपन आचरणसँ राज्य सँवारू
राज्यक सुधार मनुष्यक आचरणसँ आरम्भ होइत अछि—व्यक्ति, परिवार आ शासनक क्रम एहि पद्यमे नैतिक सम्बन्धक जाल बनबैत अछि। मनुष्यता, पारस्परिकता, मर्यादा, शिक्षा, नम्रता आ उदाहरणक शक्ति राजदण्डसँ पैघ मानल गेल अछि। दोसरा पर ओ नहि करू जे अपने सहब नहि चाही—एहि सरल कसौटीसँ अधिकार आ कर्तव्य जुड़ैत अछि। परम्पराक आदर अन्ध अनुकरण नहि; जीवित सद्गुण व्यवहारमे उतरिते समाजक भविष्य सँवरैत अछि।
wdm-296PDF 655अनुभव · कर्तव्य · स्वतन्त्रता
अनुभवक साँचा, कर्तव्यक दीप
ज्ञान बाहरी अनुभवक नकल मात्र नहि, न मनक अकेला कल्पना; स्थान-कालक चौकट, बुद्धिक श्रेणी आ अनुभूतिक सामग्री मिलि प्रपञ्चक बोध बनबैत अछि। वस्तु अपनेमे की अछि, ओहि सीमापर बुद्धि नम्र होइत अछि। ज्ञानक प्रश्नक संग नैतिक कर्तव्य जुड़ैत अछि—मनुष्य साधन मात्र नहि, स्वयं उद्देश्य; स्वतन्त्रता मनमानी नहि, स्वीकृत सार्वभौम नियमक उत्तरदायित्व अछि। समान नागरिक स्वाधीनता आ न्यायसँ स्थायी शान्तिक सम्भावना जुड़ैत अछि।
wdm-297PDF 658भाषा-विश्लेषण · पुष्टि · वैज्ञानिकता
अर्थक नक्शा, भाषाक अनुशासन
शब्दक अर्थ स्पष्ट करबाक लेल पद्य अनुभव, सत्यापन/पुष्टि, प्रेक्षण-वाक्य, तार्किक संरचना आ वैज्ञानिक कथनक सम्बन्ध जाँचैत अछि। आरम्भिक कठोर ‘जाँच नहि तँ अर्थ नहि’ दृष्टिक सीमा स्वीकारि आंशिक पुष्टि आ सिद्धान्त-प्रेक्षण सेतु लेल ठाम बनाओल गेल अछि। तर्क, गणित, तथ्य-वाक्य आ विराट तत्त्वमीमांसक दावाक भिन्न काम चिन्हल जाइत अछि। दर्शन अन्तिम आदेश नहि, भाषा-विचारक गाँठ खोलबाक अनुशासन बनैत अछि।
wdm-298PDF 660प्रतीक · भाषा · संस्कृति
प्रतीकक जग, मनुष्यक अर्थ
मनुष्य बाहरक जगक नकल मात्र नहि करैत; भाषा, संख्या, विज्ञान, मिथक, कला, धर्म आ इतिहासक प्रतीक-रूपसँ अनुभवकेँ अर्थ दैत अछि। प्रत्येक प्रतीक-व्यवस्थाक अपन नियम अछि, तें विज्ञान एकमात्र मानवीय भाषा नहि, मिथको तथ्यक स्वतः प्रमाण नहि। भाषा अनाम भावकेँ नाम दैत, कला साधारण दृष्टिसँ छुटल अर्थ देखबैत, मिथक प्राचीन मानसिक लय सँभारैत अछि। प्रतीकक शक्ति मुक्ति सेहो दे सकैत अछि, राजनीतिक भयक औजारो बनि सकैत; विवेक ओकर पहरा अछि।
wdm-299PDF 663चुनाव · अस्तित्व · आस्था
चुनावक क्षण, आस्थाक छलाँग
व्यक्ति भीड़, व्यवस्था वा तैयार दार्शनिक प्रणालीक भीतर गुम नहि हो; जीवनक निर्णायक क्षणमे अपन चुनावक जिम्मेदारी स्वीकारय—पद्यक केन्द्र एहि अस्तित्वगत आग्रहमे अछि। स्वतन्त्रता संग चिन्ता अबैत अछि, चुनाव टारबो चुनाव बनि जाइत अछि। क्षणिक सौन्दर्यक जीवनसँ नैतिक प्रतिबद्धता आ तकर पार व्यक्तिगत आस्थाक सम्बन्ध धरि तीन स्तर खुलैत छथि। विश्वास गणितीय निष्कर्ष नहि; अनिश्चितताक सीमा पर सम्पूर्ण अस्तित्वसँ स्वीकारल छलाँग अछि।
wdm-300PDF 665छह प्रमाण · ज्ञान · यथार्थ
प्रमाणक छह दीप
ज्ञानक छह दीप—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति आ अनुपलब्धि—पद्यक संरचना बनबैत छथि। जग बाहरी यथार्थ रूपेँ स्वीकारल गेल अछि; द्रव्य-गुण-सामान्य-विशेषक अनेकता ज्ञानक विषय बनैत अछि। प्रत्यक्ष इन्द्रिय-दुआर, अनुमान चिह्न-संबन्ध, उपमान समानता, शब्द विश्वसनीय वाणी, अर्थापत्ति असम्भवता सुलझाबयबला अनकहल शर्त, आ अनुपलब्धि अभावक बोध दैत अछि। एकहि दुआरसँ सत्य नहि पढ़ि, अनेक प्रमाणक अनुशासनसँ अर्थ पकड़बाक आग्रह अछि।
wdm-301PDF 668प्रत्यक्षवाद · समाज-विज्ञान · अनुभव
अनुभवक धरती पर समाजक विज्ञान
उथल-पुथल समयमे ज्ञानक ठोस आधार अनुभव, निरीक्षण, तुलना आ परीक्षणमे खोजल जाइत अछि। पद्य अन्तिम रहस्यक दम्भ छोड़ि घटनाक ‘कोना’ आ नियमबद्ध सम्बन्ध बुझबाक आग्रह करैत, विज्ञानसभक सरलसँ जटिल क्रममे समाज-विज्ञानक विशेष कठिनाइ देखबैत अछि। सामाजिक व्यवस्था आ परिवर्तन दुनूकेँ पढ़ैत ओ ज्ञानकेँ केवल जानबाक साधन नहि, उत्तरदायी लोककल्याण आ प्रगतिक संग जुड़ल अभ्यास बनबैत अछि।
wdm-302PDF 670राज्य · प्रजाहित · अर्थ
राज्यक मूल प्रजाक हित
राज्यकेँ मुकुट वा राजदण्ड नहि, कृषि, बजार, कोष, सेना, न्याय, प्रशासन आ लोकजीवनक परस्पर जुड़ल देह रूपेँ पढ़ल गेल अछि। पद्य अधिकारीक लेखा-जाँच, भ्रष्ट लोभपर पहरा, उत्पादन-व्यापार-करक संतुलन आ विविध सामाजिक वृत्तिक ठामक प्रश्न उठबैत अछि। सत्ता, नीति आ अर्थ तखनहि सार्थक बनैत अछि जखन प्रजाहित, दूरदृष्टि, न्याय आ उत्तरदायित्व ओकर मूल मान बनय।
wdm-303PDF 673अनुभव · चेतना · इतिहास
अनुभूतिक रूप, इतिहासक स्वतन्त्रता
चेतना निष्क्रिय दर्पण नहि; बाह्य जग आ भीतरक जीवित क्रिया मिलि अनुभवकेँ रूप आ अर्थ दैत अछि। पद्य कला, अवधारणा, व्यावहारिक बुद्धि आ इतिहासकेँ एहि सक्रिय अनुभूतिक अलग-अलग विस्तार रूपेँ जोड़ैत अछि। इतिहास मृत तिथिक ढेरी नहि, वर्तमान प्रश्नसँ जागल स्मृति बनैत अछि; स्वतन्त्रता सेहो अमूर्त राजनीतिक शब्द नहि, दमनक विरुद्ध मानवीय गरिमा फेर-फेर खोजबाक नैतिक धार बनि उभरैत अछि।
wdm-304PDF 675विश्वास-जाल · अनुभव · संशोधन
अनुभवक किनार पर विश्वासक जाल
ज्ञानकेँ अचल किला नहि, परस्पर बान्हल विश्वासक जाल रूपेँ देखाओल गेल अछि, जाहिमे किनारपर अबैत नव अनुभव सम्पूर्ण बुनावटकेँ धीरे-धीरे बदलि सकैत अछि। कोनो विश्वास सदा लेल अभेद्य नहि; ज्ञानक गरिमा अपन भूल सुधारबाक सामर्थ्यमे अछि। अनुभव बिनु जाल अन्हर आ जाल बिनु अनुभव बिखरल रहैत, तें सत्यक जीवित खोज निरन्तर परीक्षण, पुनर्विचार आ संशोधनक लेल खुलल रहबाक माँग करैत अछि।
wdm-305PDF 678प्रत्यक्ष · अनुमान · उपमान
ज्ञानक चारि दुआर
पद्य ज्ञानक चारि दुआर—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आ विश्वसनीय शब्द—केँ अलग बल आ सीमा सहित खोलैत अछि। देखल मात्र सत्य नहि, अनुमान हेतु माँगैत, तुलना अपरिचितकेँ परिचित संकेतसँ चिन्हबैत, आ वाणी तखने प्रमाण बनैत अछि जखन स्रोत आ अर्थ विश्वसनीय हो। कोनो एक बाट सर्वस्व नहि; विवेक, प्रसंग आ प्रमाणक अनुशासन चारूकेँ जोड़ैत अछि, आ प्रत्येक उत्तरक भीतर नव प्रश्नक जन्म जारी रहैत अछि।
wdm-306PDF 680सत्य · करुणा · अहिंसा
सत्यक धागा, करुणाक करघा
सत्यकेँ दैनिक बोली, कर्म आ मनक एकरूपता रूपेँ, करुणाकेँ निर्बल कोमलता नहि बल्कि अन्यायक सामने निर्भय नैतिक शक्ति रूपेँ रचल गेल अछि। श्रम, स्वदेशी, संयम, अभय आ भिन्न विश्वासक समभाव एहि करघापर एक संग बुनाइत छथि। कठोर नियम जँ मनुष्यपर बोझ बनय तँ विवेक आ करुणासँ ओकर प्रयोजन फेर जाँचल जाए; भीतरक परिवर्तन आ बाहरी लोककल्याण एक-दोसरसँ अलग नहि रहय।
wdm-307PDF 683जागरण · स्वप्न · सुषुप्ति
निद्राक चारि घाट पारि अजन्म उजास
जागरण आ स्वप्न दुनू अपन समयमे सत्य-जकाँ ठोस अनुभव देत, मुदा एक-दोसरक आगमनमे ओकर स्थायित्वक दावा हिलि जाइत अछि। गाढ़ निद्रामे भेदक कोलाहल शान्त होइतहुँ अज्ञानक बीज रहैत, आ चौठम अवस्था भाषा द्वारा सहज पकड़मे नहि अबैत। पद्य चारि घाट पारि चेतनाक एहन अखण्ड उजासक संकेत करैत अछि जतय अनुभवक भिन्न रूप देखल जाइत अछि, मुदा ककरो एक रूपकेँ अन्तिम सम्पूर्ण सत्य नहि मानल जाइत।
wdm-308PDF 685संशय · प्रमाण · तर्क
संशयसँ निर्णय धरि
संशयसँ निर्णय धरि यात्रा एक छलाँग वा अन्ध विश्वास नहि, प्रश्न, प्रमाण, तर्क आ परीक्षणक क्रमिक साधना अछि। प्रत्यक्ष, अनुमान, तुलना आ विश्वसनीय वाणी अपन-अपन सीमा सहित जाँचल जाइत छथि; अधिकारक भारी स्वर मात्र सत्यक मुहर नहि पबैत। बेठीक बोधसँ इच्छा आ कर्मक जाल बनैत अछि, तें यथार्थ ज्ञान भ्रमक गाँठ खोलैत अछि। पद्य प्रत्येक मान्यताक आधार स्पष्ट राखि नव प्रश्नक स्वागत करबाक आग्रह करैत अछि।
wdm-309PDF 687भक्ति · भेद-अभेद · प्रेम
प्रेमक नाममे खुलैत अनन्त
एक सत्यक अनेक रूप, जीव-जगतक भिन्नता आ मूलसँ ओकर अखण्ड सम्बन्ध पद्यक केन्द्र अछि। प्रेम आ भक्ति सूखल नियम नहि, श्रवण, स्मरण, सेवा, सख्य, आत्मनिवेदन आ अनेक भावक जीवित सम्बन्ध बनैत अछि। जाति, कुल, धन वा शास्त्रक गर्व प्रेमक आगाँ गौण ठहरैत; मिलनमे भेद पूर्ण मेटैत नहि, मुदा दूरी गलैत अछि। एहि अचिन्त्य संगतिक भीतर बुद्धिक सीमा आ हृदयक सेतु एक संग खुलैत अछि।
wdm-310PDF 690कर्म · कर्तव्य · वाणी
कर्मक पाछाँ अनदेखल सेतु
धर्मकेँ कर्मक भीतरक अनुशासन रूपेँ पढ़ैत पद्य वाणीमे आदेश, निषेध, स्तुति, नाम आ संकेतक अलग कार्य चिन्हैत अछि। फल तुरन्त नहि भेटलासँ कर्म व्यर्थ नहि; बीज जकाँ अदृश्य सम्बन्ध समय पारि असर राखि सकैत अछि। कर्मक मोल लाभ मात्र नहि, कर्तव्यक अपन मान सेहो अछि। ज्ञान कर्मकेँ दिशा दैत आ कर्म ज्ञानकेँ देह, तें वचन, काज, फल आ जिम्मेदारीक बीचक अदृश्य सेतु सजग रहबाक माँग करैत अछि।
wdm-311PDF 693अनुभव · समस्या · परिणाम
समस्या सँ अनुभवक नव बिहान
जगत आ मन अलग-अलग बन्द घर नहि; देह, परिवेश, क्रिया आ चेतनाक भेटमे अनुभव निरन्तर बनैत अछि। स्थिर निश्चय विकास रोकि सकैत आ दिशाहीन संशय कर्म हरबा सकैत, तें अनुसन्धान, परीक्षण आ पुनर्विचार दुनूक बीचक बाट बनैत अछि। नैतिक मूल्य सेहो जीवनक परिणाम, दुःख आ फुलबाक सम्भावनासँ जाँचल जाए। पद्य कोनो निष्कर्षकेँ अन्तिम सिंहासन नहि दैत; बदलैत जगमे बुद्धिक बदलि सकबाक सामर्थ्य ज्ञानक जीवितता अछि।
wdm-312PDF 695निर्विकल्प प्रत्यक्ष · कल्पना · निषेध
क्षणक रूप, निषेधक भाषा
पहिल क्षणक प्रत्यक्षमे रूप नाम, जाति आ अवधारणासँ पहिने अपन अद्वितीय उजासमे प्रकट होइत; पाछाँ भाषा ओकरा परिचित वर्ग आ सम्बन्धमे राखैत अछि। अनुमान सामान्य चिन्हक बाट चलैत, जखन कि प्रत्यक्ष विशेष क्षणक उपस्थिति धरैत अछि। शब्दक अर्थ ‘ई नहि, ओ नहि’क निषेध-घेरासँ सेहो उभरैत अछि। पद्य सोझ अनुभूति, कल्पना आ अनुमानक सीमा अलग राखि ज्ञानमे भ्रमक गाँठ खोलबाक अनुशासन सिखबैत अछि।
wdm-313PDF 698पद्धतिगत संशय · स्व-बोध · इन्द्रिय
संशयक राखिमे निश्चित स्वर
पद्य पुरान विश्वासकेँ मूल धरि परखबाक कठोर संशय सँ आरम्भ होइत अछि: इन्द्रिय धोखा दऽ सकैत, जागरण-स्वप्नक सीमा धुँधला भऽ सकैत, गणना धरि प्रश्नक घेरामे आनि सकैत अछि। मुदा संशयक क्रिया स्वयं संशय करनिहारक उपस्थितिक एक निश्चित स्वर छोड़ैत अछि—सोच चलैत अछि तँ ‘हम छी’क बोध मेटैत नहि। एहि आधारसँ ज्ञान फेर क्रमशः बनैत अछि, बिना एहि दावाक जे आरम्भिक इन्द्रिय-अनुभव अपनेमे अन्तिम निश्चय छल।
wdm-314PDF 700प्रत्यक्ष · अनुमान · क्षण
क्षणक उजास, हेतुक पाँखि
ज्ञानक मुख्य दू पाँखि रूपेँ प्रत्यक्ष आ अनुमान अलग-अलग कार्य करैत छथि। प्रत्यक्ष कल्पना-विहीन निकट बोधक क्षणिक उजास अछि; अनुमान नियमित चिन्ह आ कारण-सम्बन्धक आधारपर दूरक अर्थ खोलैत अछि। क्षण उदय संगहि क्षयक संकेत धरैत, मुदा कारण-कार्यक क्रम निरन्तरता बनबैत अछि। त्रिरूप हेतु मनमानी उड़ान रोकैत; पद्य ‘जे देखल तकर सीमा’ आ ‘जे सोचल तकर कारण’ स्पष्ट राखबाक परीक्षणशील अनुशासनपर बल दैत अछि।
wdm-315PDF 702शून्यता · परस्परता · दू सत्य
शून्यक बीच सम्बन्धक ज्योति
शून्यकेँ अन्हार वा सभक नाश नहि, वस्तुक स्वतन्त्र अचल स्वभाव नहि होएबाक बोध रूपेँ प्रस्तुत कएल गेल अछि। फूल, श्वास, कारण आ फल सभ परस्पर निर्भर सम्बन्धमे बनैत-बदलैत छथि। व्यवहारक दैनिक सत्य आ गहिर स्वभाव-शून्य दृष्टि विरोधी नहि, एक-दोसरक दुआर बनैत अछि। पकड़ ढील भेलापर संसार छोड़ि भागब नहि, आसक्ति घटब मुक्ति बनैत; मध्य पथ नित्यताक पत्थर आ पूर्ण नाशक खाई दुनूसँ बचैत करुणाक बाट खोलैत अछि।
wdm-316PDF 705भेद-अभेद · जीव-जगत · भक्ति
भेदक भीतर अभेदक राग
एकहि मूलसँ जग फूटितो प्रत्येक जीव आ रूपक अपन पहचान बचल रहैत अछि; भेद आ अभेद दुनू एक संग सत्यक राग बनैत छथि। जगत झूठक पर्दा नहि, शक्ति-विस्तार अछि; जीव सीमित चेतन ज्योति, कर्म आ अहंकारसँ बान्हल। ज्ञान आ कर्म आवश्यक, मुदा प्रेम-सम्मिलन बिना सूखल पड़ि सकैत अछि। समर्पण अहंकारक भार घटबैत, सेवा आ स्मरण सम्बन्ध गहिरबैत; मुक्तिमे स्वत्व नष्ट नहि, दूरी गलि मूलसँ आनन्दमय निकटता बढ़ैत अछि।
wdm-317PDF 708मूल्य-पुनर्मूल्यांकन · आत्म-विजय · सृजन
पुरान मूल्यक राखसँ नव अगिनि
जीवनकेँ दूरसँ निहारबाक बदला दुःख-उल्लास सहित भीतर उतरि अर्थ गढ़बाक आग्रह अछि। भयजनित पुरान मूल्य, दीनता वा अन्ध आज्ञाकारिताकेँ प्रश्नक कसौटी पर राखि स्वाभिमान, साहस आ आत्म-विजयक नव मूल्य रचल जाइत अछि। बाहरी अन्तिम आदेश मौन भेलापर जिम्मेदारी घटैत नहि, आरो गहिर होइत अछि। पुनरागमनक कल्पना प्रत्येक निर्णयकेँ एहन कसौटी बनबैत अछि—की एहि जीवनकेँ फेरो स्वीकारि सकब? राखसँ उठल नव अगिनि दहन नहि, सृजनशील उत्तरदायित्वक उजास बनय।
wdm-318PDF 711शब्द · अर्थ · वाक्य
शब्दक देहमे अर्थक धड़कन
ध्वनि क्षणिक होइतहुँ अर्थ कोना टिकैत—पद्य एहि प्रश्नसँ वर्ण, शब्द, जाति, व्यक्ति, गुण, क्रिया आ वाक्यक सम्बन्ध खोलैत अछि। वाक्य ईंटक ढेरी नहि; अपेक्षा, संगति आ प्रसंगसँ समूचा बोध बनैत अछि। विश्वसनीय वाणी दूरक अनुभव सेहो ज्ञानक बाट बना सकैत, मुदा प्रत्येक आवाज प्रमाण नहि। भाषा सामाजिक स्मृति, चिन्हारि आ जिम्मेदारीक क्षेत्र अछि; बेठीक शब्द जकाँ बेठीक भावो अर्थ बिगाड़ि सकैत, तें भाषाक साधना अन्ततः चेतनाक सजग साधना बनैत अछि।
wdm-319PDF 713चित्तवृत्ति · अभ्यास · वैराग्य
चित्तक तरंग थमल तखन
चित्तक तरंग स्मृति, कल्पना, निद्रा, भ्रम आ प्रमाणक अनेक रूपमे उठैत अछि; ओकर निरोध बलपूर्वक पत्थर बनब नहि, अभ्यास आ वैराग्यसँ पकड़ ढील करब अछि। श्वास, आसन, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान आ समाधि क्रमशः भीतरक दर्पण साफ करैत, मुदा नैतिक अनुशासन बिना ऊँच ध्यान-महल कमजोर रहैत। अहंकार, राग, द्वेष आ भयक जड़ि विवेकसँ खुलैत अछि। सिद्धि बाटक आकर्षण मात्र; लक्ष्य द्रष्टाक निर्मल स्वतन्त्रता अछि, जग वा जीवनक समाप्ति नहि।
wdm-320PDF 716व्यवहारवाद · संशय · परीक्षण
संशयक चुभन, कर्मक अर्थ
विचारक अर्थ ओकर सम्भव व्यवहार आ परिणाममे देह धरैत अछि; कर्मकेँ किछु नहि बदलनिहार धारणा मात्र शब्दक धुँध बनि सकैत अछि। विश्वास निजी जिद्द वा सत्ताक आदेशसँ स्थायी सत्य नहि बनैत; संशय पुरान भरोसामे दरार खोलि खोज शुरू करैत अछि। निरीक्षण, परीक्षण, पुनरावृत्ति आ साझा जाँच भूलक सम्भावना स्वीकारितो ज्ञानकेँ दृढ़ बनबैत अछि। पद्य निष्कर्ष, सामान्यीकरण आ सम्भव कारणक अनुमानक अलग तर्क-चाल चिन्हैत साझा खोजकेँ सत्यक खुलल राह बनबैत अछि।
wdm-321PDF 719सूत्र · व्याकरण · लोकवाणी
सूत्रक दाना, भाषाक अनन्त वन
छोट सूत्रक भीतर विशाल भाषिक व्यवस्था सघन रूपेँ राखल गेल अछि। धातु-प्रत्यय, रूप-विन्यास, जाति-व्यक्ति आ प्रसंगक फेरसँ अर्थ बदलैत अछि, तें नियमकेँ जीवित लोकवाणी सँ काटि नहि पढ़ल जा सकैत। पद्य शास्त्रीय अनुशासन आ व्यवहारिक भाषाक संवाद माँगैत अछि: सामान्य सूत्र दिशा देखाबय, अपवाद सीमा बताबय, आ शुद्धता पुरान रूपक जड़ आग्रह नहि बल्कि संचारक जीवित धड़कन बुझबाक काज बनय।
wdm-322PDF 722प्रतिवाद · विज्ञान · परीक्षण
एक प्रतिवादक दीप
सत्यक घरक खिड़की खुलल रहबाक चाही—एहि बिम्बसँ पद्य प्रिय विचारकेँ कठोर प्रतिवादक सामने राखबाक आग्रह करैत अछि। हजार पुष्टि सेहो नियमकेँ अमर नहि बनबैत; एक साँच विरोधी उदाहरण पुरान भरोसा हिला सकैत अछि। कल्पना, अनुमान, परीक्षण, आलोचना आ फेर परीक्षण ज्ञानक खुलल क्रम अछि। इतिहासो पहिने लिखल पटरी नहि; मानव निर्णय, भूल आ संयोगक ठाम बचल रहैत अछि। अपन भूल स्वीकारब स्वयं ज्ञानक नैतिक शक्ति बनैत अछि।
wdm-323PDF 724वैशेषिक · द्रव्य-गुण · परमाणु
कणसँ ध्वनि धरि जगक जाल
जगतकेँ द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष आ समवायक अनेक कोठरीमे पढ़ैत पद्य कणसँ ध्वनि धरि सूक्ष्म सम्बन्धक जाल खोलैत अछि। सामान्य दूरक वस्तुसभकेँ जोड़ैत अछि, विशेष ओकर अलग चिन्ह बचबैत, आ कारणक सूत जन्म-मरणक क्रम सँ जोड़ैत अछि। सूक्ष्म कण, गति, अदृष्ट आ कर्मक छाप एहि रचनामे जगतक अनुशासित बहुलता देखबैत अछि। अन्तिम बल एहि बातपर अछि जे छोट भेदो गहिर विचारक दुआर खोलि सकैत अछि।
wdm-324PDF 727स्वप्रकाश ज्ञान · भ्रम · वाक्यार्थ
वाक्यक संगति, ज्ञानक अपन उजास
ज्ञान जन्मिते ज्ञाता, ज्ञान आ ज्ञेयकेँ एक संग उजागर करैत अछि; प्रत्येक बोधकेँ फेर दोसर प्रमाणक मोहर आवश्यक नहि—पद्य एहि स्वप्रकाशक विचारसँ आरम्भ होइत अछि। भ्रम शून्यसँ बनल झूठ नहि, सही अनुभूति आ स्मृतिक भेद न चिन्हबाक मिश्रणसँ उपजैत अछि। शुक्ति-चाँदीक उदाहरणसँ भेद-अनपलब्धि खोलल जाइत अछि। शब्द अकेला पर्याप्त नहि; पदसभक परस्पर संगति, अपेक्षा आ वाक्यक अखण्ड अर्थ ज्ञानक सही स्वरूप बनबैत अछि।
wdm-325PDF 729गुफा · रूप · ज्ञान
छायाक गुफासँ रूपक सूर्य
गुफाक छाया सँ बाहरक सूर्य धरि यात्रा ज्ञानक कठिन मोड़ बनैत अछि: पुरान परिचित आभास सहज लगैत, नव उजास पहिने आँखि दुखबैत अछि। बदलैत दृश्य वस्तुक पाछाँ सुन्दरता वा सामान्य रूपक प्रश्न उठैत अछि, आ बुद्धि विशेषसँ व्यापक स्वरूप दिस बढ़ैत अछि। शिक्षा बाहरसँ सूचना भरब मात्र नहि, भीतर सुप्त समझ जगब सेहो अछि। संवाद आ प्रश्न चेतनाकेँ छायाक निश्चिततासँ रूपक गहिर आधार दिस मोड़ैत छथि।
wdm-326PDF 731अनुभूति · मन · जगत
देखल जगक मौन उजास
जगत रंग, आकार, स्पर्श आ ध्वनिक अनुभूति द्वारा खुलैत अछि; ज्ञात वस्तु अनुभूतिक दुआर पारि चेतनामे अर्थ पबैत अछि। पद्य अदृश्य पदार्थक कल्पित आधारक बदला अनुभवक प्रत्यक्ष संरचना, सक्रिय मन, स्मृति आ इच्छाक भूमिकापर बल दैत अछि। अपने केँ बाहरी चित्र जकाँ न देखितो मनुष्य कर्म, चाह आ स्मरणमे अपन जीवित सत्ता चिन्हैत अछि। देखल जगक मौन उजास मन, अनुभूति आ नियमक सेतु बनैत अछि।
wdm-327PDF 733सूत्र · ब्रह्म-जिज्ञासा · आत्मबोध
सूत्रक गाँठिमे अनन्तक स्वर
छोट सूत्रक गाँठि जगतक जन्म, धारण आ लयक मूल प्रश्न खोलैत अछि। दृश्य जग अनेक तरंग होइतहुँ मूल समुद्रक खोज जिज्ञासाकेँ बाहरी सूचना सँ भीतरक आत्मबोध धरि लऽ जाइत अछि। सुनल बात ज्ञानक अन्तिम रूप नहि; मनन, परीक्षण आ अपन अनुभवमे मूलक चिन्हारि आवश्यक अछि। पद्य सूत्रकेँ जड़ आदेश नहि, प्रश्नक संक्षिप्त बीज मानैत अछि जाहिसँ अनन्त विचारक वन फूटि सकैत अछि।
wdm-328PDF 736उपयोगितावाद · सुख-दुःख · शिक्षा
सुखक तराजू, समाजक प्रश्न
कर्म आ नियमक मोल लोकक सुख-दुःख आ दूरगामी परिणामक तराजूपर जाँचल जाइत अछि। अपन लाभ भरि नहि, निर्णयक तरंग कतेक लोकक जीवन छूअैत अछि से नैतिक प्रश्न बनैत अछि। शिक्षा विशेष जनक बन्द दीप नहि, सामूहिक अवसरक जलधार बनबाक चाही। पद्य पीड़ा घटेब, अवसर बढ़ेब आ न्यायकेँ लोककल्याणसँ जोड़बाक आग्रह करैत, समाजक व्यवस्था केँ अपन परिणामक आधारपर निरन्तर सुधारबाक कसौटी दैत अछि।
wdm-329PDF 739समय · जीवित अवधि · स्मृति
घड़ीक पारि बहैत जीवन
घड़ी समयकेँ समान खाँचामे काटैत अछि, मुदा जीवित अनुभवक अवधि टुकड़ा-टुकड़ा नहि; बीतल क्षण वर्तमानमे स्मृति रूपेँ बन्हल रहैत अछि। पद्य बुद्धिक विश्लेषण आ सहज अनुभूतिक भीतर-प्रवेश दुनूक अलग उपयोग चिन्हैत अछि। एक औजार बनबैत आ रूप नापैत, दोसर जीवनक प्रवाह भीतरसँ छूअैत अछि। समय केवल गिनती नहि, निरन्तर बदलैत बहाव अछि जाहिमे प्रत्येक क्षण नव होइतहुँ अतीतक छाप संग लैत अछि।
wdm-330PDF 742समग्रता · सम्बन्ध · विरोध
टुकड़ाक पारि अखण्ड उजास
जगत टुकड़ा-टुकड़ा देखाइतहुँ प्रत्येक अंश दोसरा पर निर्भर साँस लैत अछि। व्यक्ति, संस्था आ विचार अपन सीमा राखैत, मुदा चेतना बारम्बार अधिक व्यापक सामंजस्य खोजैत अछि। विरोधकेँ केवल टूटन नहि, नूतन मेलक सम्भावना रूपेँ पढ़ल जाइत अछि। पद्य अपूर्ण सत्यकेँ फेकि नहि दैत; ओकर हाथ पकड़ि समग्र दिशि बढ़बाक आग्रह करैत अछि, जतय सम्बन्धक जाल अनुभवकेँ अखण्ड उजासक रूप दैत अछि।
wdm-331PDF 745नकार · आत्मबोध · ज्ञाता-विषय
नकारक सीढ़ी सँ स्वतन्त्र आत्मबोध
चेतना वस्तुक निष्क्रिय दर्पण नहि; ‘ई’ आ ‘नहि’क माध्यमेँ दूरी आ सीमा बनबैत ओ विचारक आकार रचैत अछि। प्रत्येक निर्धारणक भीतर किछु शेष रहैत अछि, जाहिसँ अगिला प्रश्न जन्मैत अछि। ध्यान विषयसँ अपने दिस मुड़िते ‘हम जानैत छी’क आत्मबोध उभरैत, मुदा आत्मा वस्तु जकाँ पूर्ण पकड़ा नहि जाइत। नकारक सीढ़ी एहि स्वतंत्र केन्द्रकेँ उघारैत अछि—ज्ञानक प्रक्रिया अपने ज्ञातासँ लगातार अधिक गहिर प्रश्न करैत रहैत अछि।
wdm-332PDF 746स्फोट · वाक्य · अर्थ
शब्दक भीतर अखण्ड ज्योति
ध्वनि क्रमशः उठि विलीन होइतहुँ अर्थ किएक अखण्ड झलकैत—पद्य एहि प्रश्नसँ वर्ण, पद आ वाक्यक सम्बन्ध खोलैत अछि। अर्थ केवल अलग-अलग ध्वनिक जोड़ नहि; वाक्यक सम्पूर्णता पदसभकेँ सेहो अपन स्थान आ मान दैत अछि। खण्ड आ अखण्ड एक-दोसरकेँ बुझबैत छथि। कहब, सुनब आ बुझब चेतनाक भिन्न क्रिया होइतहुँ भाषाक एकहि जीवित क्षेत्रमे मिलैत अछि, जतय क्षणिक स्वरक पाछाँ स्थायी अर्थ-संरचनाक खोज चलैत अछि।
wdm-333PDF 749द्वैत · पाँच भेद · भक्ति
पाँच भेदक बीच समर्पणक दीप
जगत, जीव आ मूल सत्ता सभ वास्तविक मानल गेल अछि; निर्भरता अस्तित्व मेटब नहि, सम्बन्धक रूप स्पष्ट करैत अछि। पाँच प्रकारक भेद परिचयक संरचना बनैत अछि, दूरी वा घृणाक कारण नहि। भक्ति केवल गीत वा भावुकता नहि, स्मरण, सेवा, सत्य-वचन, दया, रक्षा आ लोभ घटेबाक व्यवहार बनैत अछि। ज्ञानक संग समर्पण जुड़िते अहंकार गलैत, मुदा स्वत्व बचल रहैत; प्रेम भेदकेँ नष्ट नहि, अर्थपूर्ण सम्बन्धमे बदलैत अछि।
wdm-334PDF 752देह · अनुभूति · आदत
देहक आँखिसँ खुलैत संसार
जगत सिद्धान्तसँ पहिने देहक जीवित स्पर्शमे खुलैत अछि। पाँव, आँखि, हाथ, दिशा, दूरी आ औजारक उपयोग शरीरक मौन कुशलतासँ अर्थ पबैत; आदत मनक स्मृति मात्र नहि, देहक सीखनाइ सेहो अछि। अन्ह व्यक्तिक लाठी शरीरक अनुभूतिक सीमा बढ़बैत, आ इन्द्रियसभ अलग खिड़की नहि बल्कि एक देहमे संगति करैत छथि। वस्तु एक बेरमे पूर्ण नहि देखाइत; ओझरायल पक्षक सम्भावना अनुभवकेँ खुलल राखैत अछि।
wdm-335PDF 754ज्ञान · अनुमान · अविनाभाव
ज्ञानक दर्पण, हेतुक डोरी
निश्चित बोध अपने प्रकाशमे वस्तुक रूप खोलैत अछि, मुदा प्रत्यक्ष-परोक्षक अनेक ज्ञान-बाटक भेद बचल रहैत अछि। स्मृति, पहिचान, वाणी आ अनुमान अलग भूमिका निभबैत छथि। अनुमानक प्राण केवल औपचारिक तीन खाँचा नहि, हेतु आ साध्यक अटूट अविनाभावक ठीक पहचान अछि। सामान्य-विशेषक सम्बन्ध आ हित-अहितक फल जाँचैत पद्य ज्ञानकेँ जीवनक सजग निर्णयसँ जोड़ैत अछि; कारणक डोरी कमजोर भेल तँ निष्कर्षक उजासो धुँधला होइत अछि।
wdm-336PDF 757श्रम · परिवर्तन · विरोध
श्रमक हाथ, बदलैत जग
जगत जमल पत्थर नहि; रूप, सम्बन्ध आ उत्पादनक ढाँचा बदलैत अछि, आ विरोध स्वयं परिवर्तनक गुप्त पुकार बनि सकैत अछि। श्रम मानव जग रचैत अछि, मुदा श्रमिक अपन सृजनसँ पराया भेलापर सम्बन्ध विकृत होइत अछि। नव उत्पादन-शक्ति पुरान व्यवस्था सँ टकराइत सामाजिक फेरबदल सम्भव बनबैत अछि। पद्यक मुक्ति एहन साझा श्रमक दिशि अछि जतय मनुष्य साधन नहि, स्वयं जीवनक लक्ष्य बनि अपन सृजनपर फेर अधिकार पबैत अछि।
wdm-337PDF 760रहस्य · समस्या · प्रेम
रहस्यक दुआर पर खुलल हाथ
जीवनक सभ प्रश्न समान प्रकारक समस्या नहि; किछु बाहरी समाधान माँगैत, किछुमे हम स्वयं समायल रहैत छी आ ओ ‘रहस्य’ बनैत अछि। एहन अनुभवकेँ मापि समाप्त करबाक अहंकारक बदला खुलल उपस्थिति, प्रेम, सुनब, ठहरब आ निष्ठा आवश्यक अछि। सम्बन्ध क्षणिक भाव नहि, समय पारि निभाओल वचन अछि। पद्य जकरा पूर्ण बुझि समाप्त नहि कएल जा सकय, ओकरा संग सजग भऽ जीब सीखबाक मानवीय कला पर बल दैत अछि।
wdm-338PDF 762स्वतन्त्रता · विचार-स्वातंत्र्य · सुख
स्वतन्त्र स्वर, सुखक गहिर माप
अनुभव आ प्रमाणक सीमा मानैत पद्य अन्तिम सत्यक दम्भसँ दूरी राखैत अछि। स्वतन्त्र विचारक मूल्य एहि मे अछि जे चुप कराओल विरोधी स्वर साँचो हो सकैत, आ बेठीक होइतहुँ सत्यकेँ भिड़न्तमे तेज करि सकैत अछि। व्यक्तिक स्वातंत्र्य पूर्ण मनमानी नहि; दोसरा केँ हानि पहुँचेनाइ सीमा बनैत अछि। उच्चतर सुख, गरिमा, लोककल्याण आ खुलल बहसक संग पद्य एहन समाजक कल्पना करैत अछि जतय विचार जीवित रहय।
wdm-339PDF 765नीक · विश्लेषण · सामान्य बुद्धि
‘नीक’ केर अनिर्वचनीय उजास
दार्शनिक गाँठ खोलबाक पहिल काज शब्दक अर्थ साफ करब अछि। पद्य सामान्य अनुभवक बाहरी जग, देह, हाथ आ कालकेँ केवल संशयक नामपर मेटेनाइ उचित नहि मानैत अछि। नैतिक ‘नीक’ केँ सुख, इच्छा, विकास वा उपयोगक कोनो एक प्राकृतिक गुणमे पूर्ण घोलल नहि जा सकैत—‘सुख नीक अछि?’ प्रश्न बचल रहिते दुनू अर्थक भेद स्पष्ट होइत अछि। विश्लेषण मूल्यक एहि अनिर्वचनीय उजासकेँ झूठी सरल परिभाषासँ बचबैत अछि।
wdm-340PDF 767करुणा · शासन · न्याय
करुणाक अंकुर, जनक राज
बालक संकटमे पड़िते लाभ-हानिक हिसाबसँ पहिने उठैत सहायता-हाथ करुणाक सहज अंकुर बनैत अछि। पद्य एहि मानवीय संवेदनाकेँ शासन धरि विस्तार दैत अछि: भयक बल जमीन जीत सकैत, हृदय नहि; टिकाउ राजक आधार सम्मान, न्याय, विवेक आ जनक विश्वास अछि। पद पदवीसँ पैघ नहि, सेवा जनसँ शुरू होइत अछि। करुणामय शासन लोकक गरिमा केँ केन्द्रमे राखिते शक्ति जनहितक साधन बनि सकैत अछि।
wdm-341PDF 770नेति-नेति · आत्मा · साक्षी
नेति-नेतिक पारि अन्तरतम साक्षी
धन, नाम, रूप आ सम्बन्धक प्रियता अन्ततः ककरा लेल—पद्य एहि प्रश्नसँ भीतरक आत्मप्रियताक स्रोत दिस मुड़ैत अछि। ‘ई नहि, ओ नहि’ कहैत नाम-रूपक खोल हटाओल जाइत अछि, कारण अन्तरतम साक्षी स्वयं देखल वा सुनल वस्तु जकाँ पकड़मे नहि अबैत। बाहरी चाहक पाछाँ चेतनाक स्पर्श अछि; तें आत्मबोध वस्तु-संग्रहक वृद्धि नहि, देखनिहारक स्रोत दिस ध्यान घुमेबाक साधना बनैत अछि।
wdm-342PDF 772सीमा · आत्मा · पीड़ा
सीमारेखाक आगिमे आत्मक उजास
विज्ञान जगतक तारा, देह आ पदार्थक नियम दूर धरि नापि सकैत, मुदा ‘हम के छी’ आ ‘किएक जिअैत’ जेकाँ प्रश्न केवल मापन-पत्रमे नहि समाय। मृत्यु, दोष, पीड़ा आ सीमितता मनुष्यकेँ अपन चुनाव आ जिम्मेदारीक सामने ठाढ़ करैत अछि। दुःख सभ मिटत नहि; किछु घावक बीच अर्थ सहनशील जागरणसँ बनैत अछि। पद्य संख्या बनि रहबाक बदला संवाद, स्वतन्त्रता आ पारगमनक बाटेँ सीमित जीवनकेँ अनन्त दिशि खुलल राखैत अछि।
wdm-343PDF 775तर्क · भाषा · सरलता
तर्कक कण, भाषाक पारदर्शी आकाश
जटिल विचारक वनमे तर्क भाषाक गाँठ खोलि कथनक भीतरी ढाँचा स्पष्ट करैत अछि। अनावश्यक भार काटि तथ्य, सम्बन्ध, संख्या आ अनुभवक अलग स्थान चिन्हल जाइत अछि। विज्ञानक निष्कर्ष स्थायी सिंहासन नहि; नव तथ्य पुरान सीमा बदलि सकैत अछि। तर्क दिशा दैत, अनुभव जाँच करैत, आ दुनू मिलि निश्चयक गर्व घटबैत छथि। पद्य जे कहल जाए ओकर रूप परखबाक आ जे मानल जाए ओकर संग प्रश्नक दुआर खुलल रखबाक आग्रह करैत अछि।
wdm-344PDF 778भाषा · श्रेणी · प्रवृत्ति
भाषाक गाँठि, मनक अदृश्य चाल
कतेको दार्शनिक उलझन जगतमे कम, शब्दकेँ बेठीक श्रेणीमे राखलासँ बेसी जन्मैत अछि। क्रोधकेँ भीतर राखल वस्तु नहि, व्यवहारिक प्रवृत्ति रूपेँ; टूटनशीलताकेँ हर क्षण टूटब नहि, सम्भावना रूपेँ बुझल जाइत अछि। कौशल, मन, प्रवृत्ति आ क्रियाक अलग व्याकरण चिन्हित करिते अदृश्य भूत-जेकाँ अनावश्यक सत्ता खोजबाक जरूरत घटैत अछि। पद्य भाषिक श्रेणीक धुँध हटाकऽ जीवित व्यवहार दिस विचारकेँ फेरबैत अछि।
wdm-345PDF 781पूब-पश्चिम संवाद · विज्ञान · प्रज्ञा
पूब-पश्चिमक बीच एकहि उजास
दिशा आ भाषा भिन्न होइतहुँ मानवक मूल प्रश्न अनेक परम्परामे एक-दोसरा छूअैत अछि। इन्द्रिय, विवेकी बुद्धि आ गहिर अनुभूति ज्ञानक अलग स्तर बनैत छथि; विज्ञान, धर्म आ दर्शनक काज एक-दोसरपर विजय नहि, अपन सीमाक पहचान आ संवाद हो। जखन जाननिहार स्वयं अनुभवमे बदलैत अछि, प्रज्ञा केवल बाहरी प्रमाणक सूची नहि रहैत। पद्य मानव-मर्यादाकेँ साझा धरातल बनाकऽ पूब-पश्चिमक अनेक आवाजकेँ विशाल संगीतमे मिलबाक सम्भावना देखबैत अछि।
wdm-346PDF 784एकता · जीव-जगत · आश्रय
अनेक रूपमे एकहि आश्रय
जगतकेँ छलना आ जीवकेँ व्यर्थ मानबाक बदला पद्य रूप, देह, इच्छा, श्रम आ सम्बन्धक वास्तविकता स्वीकारैत अछि। मूल आश्रय एक होइतहुँ अनेक रूप ओकरासँ पूर्णतः अलग नहि; जीव सीमित ज्ञान, कर्म आ भोगक धारक रहैत अछि। अज्ञान आ कर्मक आवरण हटिते आत्मप्रकाश बढ़ैत अछि। जग छोड़ब वा स्वत्वक घमण्ड—दुनू छोरक बदला आश्रित सत्यता, प्रेम आ सम्बन्धक बाटेँ अपन घर पहिचानबाक विचार उभरैत अछि।
wdm-347PDF 787मानवतावाद · तर्क · व्यक्ति
मनुष्यक हाथमे स्वतन्त्र भोर
धरती, देह, तारा आ चेतनाक प्रश्नकेँ अदृश्य भयक सिंहासनपर नहि छोड़ि प्रकृति, तर्क आ मानवीय बुद्धिसँ बुझबाक आग्रह अछि। दल, पंथ, सत्ता वा झण्डा व्यक्तिक स्वतन्त्र चेतनाकेँ छाया नहि बनाबय; सहमतिक संग असहमतिको समाजमे ठाम रहय। पद्य तर्ककेँ करुणासँ जोड़ैत अछि, ताकि स्वतन्त्र व्यक्ति आ न्यायी समाज एक-दोसरक विरोधी नहि बनय। मानवता अपन जिम्मेदार बुद्धि आ साझा विश्व-बोधसँ भविष्यक दुआर खोलय।
wdm-348PDF 789प्राकृतिक मनुष्य · सम्पत्ति · असमानता
वनक स्वतन्त्र साँससँ जन-इच्छाक नगर
मनुष्य जन्मसँ बेड़ीबद्ध नहि; सरल आवश्यकता आ सहज दया प्रकृतिक मुक्त साँससँ जुड़ल अछि। तुलना, प्रतिष्ठा, सम्पत्ति आ ‘ई भूमि हमर’क रेखासँ धीरे-धीरे असमानता आ सत्ता उभरैत अछि। कानून समान कहाइतहुँ धन-शक्ति ओकर रूप बिगाड़ि सकैत अछि। पद्य व्यक्तिगत स्वतन्त्रताकेँ सामूहिक जन-इच्छाक नगरसँ जोड़ैत, एहन राजनीतिक व्यवस्था खोजैत अछि जतय मनुष्य अपनहि बनाओल बेड़ीकेँ फेर पहचानि बदलि सकय।
wdm-349PDF 791दाओ · मौन · सरलता
निःशब्द धाराक सहज बाट
मूल धारा नामक पारि अछि; शब्द ओकरा पूरा बाँधि नहि सकैत, तें मौन कतेको बेर अधिक गहिर कथन बनैत अछि। अधिक चाह, संचय आ हस्तक्षेप मनकेँ बान्हैत, जखन कि कममे सन्तोष, सरलता आ प्रकृतिक लय निश्चिन्तता खोलैत अछि। निष्क्रियता अकर्मण्यता नहि, अनावश्यक जोर घटेबाक सहज काज होइत अछि। पद्य विपरीत स्वरकेँ संग राखि, लोभ आ हिंसा घटाकऽ जीवनकेँ निःशब्द मूलधारा दिस मोड़बाक बाट देखबैत अछि।
wdm-350PDF 795मोनाड · पर्याप्त हेतु · सामञ्जस्य
अदृश्य केन्द्रसभक एक सुर
जगत बाहरी पसार मात्र नहि, अनेक अदृश्य जीवित केन्द्रक संगति अछि; प्रत्येक अपन ढंगसँ समूचा जगक छवि धरैत अछि। घटना ‘भेल’ कहि छोड़ब पर्याप्त नहि—बुद्धि कारण आ पर्याप्त हेतु खोजैत अछि। धुँधल अनुभूति सँ स्पष्ट आत्मबोध धरि स्तर-स्तर खुलैत चेतना, तर्क, अनुभव आ सामञ्जस्यकेँ जोड़ल गेल अछि। पद्य अनेक स्वतन्त्र केन्द्रसभकेँ टूटल टुकड़ा नहि, एक व्यापक विश्व-संगीतक अलग स्वर रूपेँ देखैत अछि।
wdm-351PDF 798अनुभववाद · कोरा पात · अधिकार
अनुभवक कोरा पात पर स्वतन्त्र हस्ताक्षर
मन जन्मसँ लिखल पोथी नहि; बाहरक स्पर्श आ भीतरक क्रिया—देखब, सुनब, चाहब, सोचब—मिलि अनुभवक कोरा पात भरैत अछि। ज्ञान सीमित अछि, तें संशयक दीप संग राखल जाए। नैतिक नियम आ सामाजिक भेदो सीखल इतिहास धरैत छथि; सुख-दुःख, दैवी, सामाजिक आ नागरिक माप व्यवहारक दिशा बनबैत अछि। पद्य स्वतन्त्र हस्ताक्षरकेँ मनमानी नहि, अधिकारक संग उत्तरदायित्व आ खुलल समाजक मानवीय गरिमासँ जोड़ैत अछि।
wdm-352PDF 801विश्वास · अन्तरात्मा · कृपा
विश्वासक आगि, अन्तरात्माक मुक्त स्वर
पाप-मोचनक बजारू लेन-देनपर अन्तरात्मा प्रश्न उठबैत अछि: साँच पश्चात्ताप आ कृपा सिक्कासँ किनल नहि जा सकैत। प्रत्येक विश्वासी भीतर प्रार्थनाक सोझ दुआर धरैत, जन्माधारित विशेषाधिकार वा अनिवार्य मध्यस्थता आवश्यक नहि। पढ़ब, सोचब, प्रश्न उठेब आ प्रेमक कर्म करब विश्वासक जीवित अभ्यास बनैत अछि। पद्य सेवाकेँ सत्ता नहि बनबाक चेतावनी दैत, आत्म-मर्यादा आ समानतासँ जुड़ल मुक्त अन्तर-स्वरकेँ धर्मक गहिर आगि रूपेँ रखैत अछि।
wdm-353PDF 804श्रम · ऐतिहासिक परिवर्तन · समानता
श्रमक मुक्ति, बदलैत धरतीक गीत
धरती आ समाज स्थिर नहि; विरोधक भीतर नव रूपक सम्भावना जन्मैत अछि। उत्पादन, सम्बन्ध आ वर्गक ढाँचा बदलैत इतिहासक गति बनैत, मुदा मुक्ति केवल रूप-बदलाव नहि—श्रमक मान, अवसर, अधिकार, सुरक्षा आ गरिमाक साझा धरातल चाही। समानता एकरूपता नहि; जन्म, लिंग वा वर्ग मनुष्यक मोल तय नहि करय। पद्य समाजक फल समाजमे बहबाक, श्रम करनिहारकेँ सम्मान पाबबाक आ न्यायपूर्ण भविष्य सामूहिक रूपेँ रचबाक गीत अछि।
wdm-354PDF 807विशिष्टाद्वैत · जगत · कृपा
सत्य जगत पर कृपाक मधुर धारा
जगत झूठक पर्दा नहि; अनेक रूप एकहि मूल उजासक शक्ति-विस्तार छथि। लहरि अनेक होइतहुँ समुद्र अपन गहिराइ नहि हारैत, तेनहि जीव-जगतक सत्य मूलसँ सम्बन्धित रहैत अछि। कर्म अनुशासन दैत, ज्ञान भ्रम काटैत, मुदा प्रेम आ कृपा हृदयक कठोरता गलाबैत अछि। मुक्ति केवल ‘जानलहुँ’क बौद्धिक दावा नहि, मूलक प्रियता जागब आ सेवा-सम्मिलित समर्पण अछि; जग छोड़बाक बदला जीवनमे घर पहिचानबाक प्रक्रिया बनैत अछि।
wdm-355PDF 810क्षणिकता · अनात्म · चेतना
चेतनाक धारामे रूपक स्वप्न
जगत क्षण-क्षण बदलैत अछि; स्थिर आत्माक गाढ़ छाप खोजलासँ अधिक कारण-क्रम, कर्मफल आ चेतनाक निरन्तर धारा सोझाँ अबैत अछि। दू चन्द्रक भ्रम देखबैत अछि जे अनुभव साँच रूपेँ घटि सकैत, मुदा बाह्य वस्तु ताहि अनुरूप आवश्यक नहि। ज्ञाता-विषयक भेदो चेतनाक रचनामे जाँचल जाइत अछि। स्थिर ‘हम’क पकड़ ढील भेलापर भय घटैत, निर्भरता आ क्षणिकता करुणामय जागरणक दुआर खोलैत अछि।
wdm-356PDF 813बहु-दर्शन · विवेक · सांख्य
अनेक बाटक बीच विवेकक सेतु
ज्ञानक वनमे अनेक बाट—तर्क, शब्द, ध्यान, अभाव, अनुमान, प्रकृति-चेतना भेद—अपन-अपन दिशा देखबैत छथि। एक पथ दोसराकेँ पूर्ण नकारिते सत्यक आकाश छोट भऽ जाइत; विवेक सेतु बनि भिन्न दृष्टिक सीमा आ उपयोग चिन्हैत अछि। प्रकृति गतिशील गुणधारा आ चेतन साक्षी भिन्न प्रकाश रूपेँ उभरैत छथि; बेठीक पहिचान टूटिते स्वतन्त्रता सम्भव होइत अछि। मतभेद वैर नहि, विशाल सत्य-खोजक अलग खिड़की बनैत अछि।
wdm-357PDF 816चारि प्रमाण · तर्क · मुक्ति
प्रमाणक चारि दुआर, मुक्तिक एक बाट
ज्ञान तखने जीवनक अन्हार घटबैत अछि जखन भ्रमक गाँठ खोलि दुःखक कारण चिन्हबैत अछि। प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आ शब्द चारि प्रमाण-दुआर रूपेँ अलग काम करैत छथि; कारण, उदाहरण, सम्बन्ध आ निष्कर्षक खुलल क्रम बहसमे स्पष्टता अनैत अछि। हेतुक शुद्धि आ वाणीक विश्वसनीयता अनिवार्य अछि। पद्य ज्ञानकेँ संग्रह नहि, मुक्तिक व्यावहारिक दिशा बनबैत अछि—ठीक बोध जतेक गहिर, बेठीक आसक्ति आ भ्रम ततेक ढील।
wdm-358PDF 819भाषा-खेल · तर्क · परिवार-सादृश्य
शब्दक खेलमे जगक सीमा
वाक्य कखनो जगक वस्तु-स्थितिक चित्र जकाँ काम करैत अछि, मुदा भाषा एहि एक रूपमे सीमित नहि। ‘खेल’ जेकाँ शब्दक सभ उदाहरणमे एकहि साझा गुण नहि भेटितो परिवार-जकाँ आंशिक समानता जोड़ि राखैत अछि। अर्थ जीवित व्यवहार, नियम आ प्रयोगमे बनैत; शब्दक काम ओकर संदर्भसँ बदलैत अछि। पद्य भाषाक सीमा बुझैत मौनक ठामो स्वीकारैत, विचारक उलझनकेँ शब्दक वास्तविक उपयोग दिस फेरि खोलबाक आग्रह करैत अछि।
wdm-359PDF 822सामाजिक क्रिया · तर्कीकरण · संस्था
नियमक जालमे अर्थ खोजैत मनुष्य
समाज भीड़क गणना नहि; कर्ताक आशय बुझल बिना बाहरी चालक अर्थ अधूर रहैत अछि। धर्म, अर्थव्यवस्था, सत्ता, संस्था आ दैनिक क्रियाक अलग प्रेरणा सामाजिक जाल बनबैत अछि। आधुनिक कार्यालय, लेखा, योग्यता आ नियम व्यक्तिगत कृपाक बदला निर्वैयक्तिक व्यवस्था अनैत, मुदा तर्कीकरण अपन संग कठोर बन्धनो बना सकैत अछि। पद्य लाभ आ बन्धन दुनू देखबाक, आ जटिल समाजकेँ कोनो एक सूत्रमे कैद नहि करबाक चेतावनी दैत अछि।
wdm-360PDF 826प्रक्रिया · क्षण · सृजन
क्षणक गर्भमे सृष्टिक अनन्त बहाव
जगत स्थिर पदार्थक ढेर नहि, घटना-घटनाक निरन्तर जन्म अछि। प्रत्येक वर्तमान बीतल जगक प्रभाव ग्रहण करैत, चयन करैत आ भविष्य दिशि नव निर्माण छोड़ैत अछि। देह, वनस्पति, समुदाय आ तारा स्थायित्व पबैत छथि कारण सम्बन्धक किछु लय दोहराइत अछि, परिवर्तन रुकलासँ नहि। पद्य हरेक क्षणकेँ सृष्टिक गर्भ मानैत अछि—अतीत वर्तमानमे रूप बदलि आबैत, वर्तमान भविष्य लेल नव बीज उछारैत रहैत अछि।
wdm-361PDF 830अद्वैत · साक्षी · ज्ञान
तीन परत पारि एकहि उजास
बदलैत नाम-रूपक पाछाँ अपरिवर्तित साक्षी-चेतनाक खोज एहि पद्यक केन्द्र अछि। जागरण, स्वप्न आ निद्राक तीन परत बदलितो जे उजास अनुभवक आधार बनैत, ओकरा वस्तु-जकाँ घटैत-बढ़ैत नहि देखाओल गेल। कर्म मनकेँ निर्मल आ उपासना एकाग्र करि सकैत, मुदा मूल अज्ञान विवेक-ज्ञानसँ कटैत अछि। भ्रमक साँप-डोरक भेद खुलिते मुक्ति नूतन वस्तु प्राप्ति नहि, पहिनेसँ उपस्थित सत्यक पहचान बनैत अछि।
wdm-362PDF 833विधि-वाक्य · कर्तव्य · शब्द
वचनक विधिमे कर्तव्यक अदृश्य बीज
‘की करबाक अछि’क उत्तर रंग-स्पर्श जेकाँ प्रत्यक्ष वस्तुसँ नहि, कर्तव्यसूचक वचनक विधिसँ उभरैत अछि। शब्द एतय सूचना मात्र नहि, अगिला कर्मक दिशा जगबैत अछि। धर्म आकारवाला पदार्थ नहि, व्यवहारमे ‘करू’ आ ‘नहि करू’क अर्थसँ चिन्हल कर्तव्य अछि। पद्य वचन, अर्थ, विधि आ फलकेँ जोड़ैत ई देखबैत अछि जे अदृश्य नैतिक बीज जीवनक क्रियामे देह धारण करैत अछि।
wdm-363PDF 835ओक्कम · भेद · कारण
भेदक सूक्ष्म रेखा, सम्बन्धक मौन सूत्र
वस्तुक भेद बुझबाक लेल अनावश्यक सत्ता बढ़ेबाक बदला जे बिना मानलासँ काज चलि सकय ओकर बोझ घटेबाक आग्रह अछि। काल, कारण, फल, शक्ति आ अनुपस्थितिक नाम तभी अर्थपूर्ण छथि जखन वास्तविक सम्बन्ध स्पष्ट करथि। ‘शक्ति’ खाली शब्द नहि, विशेष दशामे विशेष फल देबाक क्षमता रूपेँ पढ़ल जाइत अछि। पद्य कम कल्पना, स्पष्ट प्रमाण आ सम्बन्धक सूक्ष्म रेखासँ बुद्धिक भार हलुक करैत अछि।
wdm-364PDF 838सन्देह · विश्वास · चारि जग
सन्देहक पारि विश्वासक चारि आकाश
सन्देह अनुभूति आ स्मृति धरि प्रश्न लऽ जाइत, मुदा यदि सभ किछु अनन्त संशय बनि जाए तँ जीवनक पग रुकि सकैत अछि। तें सहज विश्वास पूर्ण अन्धता नहि, व्यवहारक आरम्भिक धरती बनैत अछि। पद्य रूप, पदार्थ, सत्य आ चेतनाक चारि ‘आकाश’ अलग ढंगसँ जगक अर्थ खोलैत देखबैत अछि। कला, नीति, इच्छा आ बुद्धि एहि बहुस्तरीय जगमे मनुष्यकेँ केवल तथ्य नहि, मूल्य आ जीवन-रूप सेहो गढ़बाक सामर्थ्य दैत अछि।
wdm-365PDF 841अस्तित्व · चयन · जिम्मेदारी
अपनेक निर्माणक खुलल आकाश
मनुष्य पहिने जगमे आबैत अछि, पाछाँ अपन कर्म आ चुनावसँ पहचान गढ़ैत—कोनो तैयार सार पहिनेसँ लिखल नहि। स्वतन्त्रता सुखद खाली आकाश मात्र नहि; प्रत्येक निर्णय जिम्मेदारीक भार अनैत अछि। दोसरा आँखिक उपस्थितिसँ हम अपने केँ वस्तु-जकाँ देखल अनुभव करैत, लाज आ सम्बन्धक नव तनाव जन्मैत अछि। पद्य बहाना छोड़ि सीमा बुझैत स्वतन्त्र कर्मक हस्ताक्षर करबाक आग्रह करैत अछि।
wdm-366PDF 844संस्कृति · इन्द्रिय · मूल्य
इन्द्रियक शोर आ अन्तरक दीप
मानव-संस्कृति कखनो बाहरी स्पर्श्य वस्तु आ भोगक दिशि झुकैत, कखनो अन्तरक अदृश्य मूल्यकेँ सर्वोच्च मानैत अछि। पद्य दुनू छोरक एकांगीपन जाँचैत अछि। इच्छा मात्रक स्वतन्त्रता जल्दी इच्छाक दासता बनि सकैत; जगत्याग सेहो जीवनक ठोस धरती गमा सकैत अछि। पदार्थक वास्तविकता आ अन्तरक मूल्यक दीप बीच संतुलन बनिते संस्कृति मनुष्यकेँ भोग-विरक्ति दुनू अतिसँ बचाकऽ गहिर संगीत दैत अछि।
wdm-367PDF 848विश्लेषण · पूर्वशर्त · पहिचान
पहिचानक धरती, वाक्यक मौन पूर्वशर्त
दार्शनिक काज सदिखन नव महल गढ़ब नहि; कखनो दैनिक बोधक पहिनेसँ चलैत ढाँचाकेँ साफ देखब आवश्यक अछि। व्यक्ति-चिन्हारि, प्रसंग आ वाक्यक अर्थ कतेको मौन पूर्वशर्तपर ठाढ़ रहैत अछि। जे बात स्पष्ट कहल नहि गेल, ताहि पर कथन पएर राखि सकैत अछि; आधार टूटिते साधारण सत्य-असत्य मूल्यांकन सेहो डोलि जाइत। पद्य औपचारिक तर्क आ जीवित भाषाक बीच एहि मौन धरतीकेँ सजग विवेकसँ पढ़बैत अछि।
wdm-368PDF 851एकत्व · विचार-विस्तार · अनिवार्यता
एकहि अनन्त धारा, अनिवार्य जग
एक अनन्त, अपने कारण सत्ता अनेक गुण आ रूपमे प्रकट होइत अछि; विचार आ विस्तार ओकर अलग आयाम छथि, एक-दोसरा केँ धक्का देनिहार दू राज्य नहि। देहक क्रम देहक कारणसँ, विचारक क्रम विचारक कारणसँ चलैतहुँ दुनू एकहि मूलक समान अभिव्यक्ति छथि। पद्य जगकेँ आकस्मिक बाहरी जोड़ नहि, अनिवार्य धाराक रूप मानैत अछि; स्वतन्त्रता कारणहीन मनमानी नहि, आवश्यकता बुझि ओकर भीतर सजग होएब बनैत अछि।
wdm-369PDF 853विकास · सरल-जटिल · नीति
सरल बीजसँ बहुरंगी जग
एक सरल बीजसँ भेद, समन्वय आ जटिलता क्रमशः फूटैत अछि। पदार्थ, जीवन, समाज आ विचार सभ परिवर्तनक धारा भीतर नूतन संरचना बनबैत छथि। नैतिकता आकाशसँ तैयार सूची बनि नहि उतरैत; दीर्घ सामाजिक अनुभवमे जीवन बचेब, मेल, सुख आ विकास बढ़ेबाक व्यवहार धीरे-धीरे मानक बनैत अछि। पद्य प्रकट नियमक संग अप्रकट रहस्यक ठाम बचबैत विकासकेँ एकरेखीय नारा नहि, बहुरंगी संगतिक प्रक्रिया बनबैत अछि।
wdm-370PDF 856जगतमे-होएब · फेंकलपन · मृत्यु
फेंकल क्षणसँ मृत्यु-दिशि खुलल समय
मनुष्य जगकेँ बाहरसँ निहारनिहार अलग दर्शक नहि; ओ पहिनेसँ सम्बन्धक बीच ‘फेंकल’ अवस्था मे अछि। अपन जन्मक प्रारम्भ चुनल नहि गेल, मुदा एहि प्राप्त परिस्थिति भीतर सम्भावना आ निर्णय खुलैत छथि। समय घड़ीक क्रम मात्र नहि, भविष्य दिशि प्रक्षेप, अतीतक भार आ वर्तमानक काजक एकता अछि। मृत्यु निश्चित सीमा बनि जीवनकेँ व्यक्तिगत गम्भीरता दैत; अपन मृत्यु-बोध मनुष्यकेँ भीड़क अनाम चालसँ अलग प्रामाणिक चुनाव दिस धकेलैत अछि।
wdm-371PDF 860इन्द्रियवाद · भय · अनुबन्ध
भयक मैदान सँ अनुबन्धक नगर
ज्ञान बाहरी स्पर्शक छापसँ आरम्भ होइत, स्मृति आ कल्पना ओकर फीका प्रतिरूप सँ बनैत छथि; मन देहसँ काटल रहस्यमय प्रदेश नहि। जगत गति, कारण आ प्रभावक नियममे पढ़ल जाइत अछि। मनुष्यक भय—विशेषतः असुरक्षित मृत्यु आ संघर्षक भय—सामूहिक अनुबन्धक आवश्यकता जन्मबैत अछि। पद्य प्राकृतिक असुरक्षासँ नियमबद्ध नगर दिस यात्रा देखबैत, शान्ति लेल साझा सत्ता किएक गढ़ल जाइत अछि से अनुभववादी धरातलपर पूछैत अछि।
wdm-372PDF 863छाप · विचार · आदत
छापक आगिसँ आदतक कारण
तीख प्रत्यक्ष अनुभूति पहिल ‘छाप’ अछि; स्मृति आ विचार ओकर अपेक्षाकृत फीका प्रतिरूप। जटिल कल्पना सेहो सरल अनुभूतिक सामग्री जोड़ि-काटि बनैत अछि। विचार एक-दोसरा दिस सादृश्य, निकटता आ कारण-फल जेकाँ सहज सम्बन्धसँ सरैत छथि। बारम्बार अनुक्रम देखिते मन आदत बनबैत, आ ‘आवश्यक कारण’क अनुभूति एहि अपेक्षासँ उभरैत अछि। पद्य निश्चितता घटाकऽ अनुभव, आदत आ मानवीय अपेक्षाक भूमिकाकेँ सामने अनैत अछि।
wdm-373PDF 865प्रत्ययवाद · चेतना · कोष्ठकीकरण
चेतनाक दुआर पर वस्तुक उजास
जगतकेँ नकारल नहि जाइत; पहिनेसँ मानल अस्तित्व-दावाकेँ क्षण भरि कोष्ठकमे राखि वस्तु चेतनामे कोना प्रकट होइत अछि से देखल जाइत अछि। चेतना खाली पात्र नहि, सदिखन किछु दिशि खुलल—देखब, सोचब, स्मरण, प्रेम वा भय प्रत्येकक अपन विषय अछि। एहि अभिप्रायात्मक सम्बन्धकेँ सूक्ष्म वर्णन करैत पद्य वस्तु आ ज्ञाताक जीवित मिलनपर ध्यान दैत अछि, ताकि पूर्वधारणाक शोर घटि अनुभवक उजास स्पष्ट हो।
wdm-374PDF 868स्याद्वाद · सप्तभंगी · अनेकान्त
सात भंगीक खिड़की सँ अहिंसक सत्य
सत्यक घर एक दुआर नहि; समय, स्थान, रूप आ अपेक्षा बदलिते ‘अछि’, ‘नहि अछि’, ‘अछि आ नहि अछि’ जेकाँ कथन अलग प्रसंगमे उचित भऽ सकैत अछि। सात भंगीक विनम्र भाषा एक वचनसँ अनन्त वस्तुकेँ पूरा बाँधबाक दम्भ रोकैत अछि। अनेक दृष्टिक सीमित सत्य मानिते वैचारिक अहिंसा जन्मैत अछि—विरोधी मतकेँ तुरन्त झूठ कहबाक बदला ओकर नय, प्रसंग आ सीमा बुझबाक अभ्यास बनैत अछि।
wdm-375PDF 870द्वंद्व · नकार · विकास
विरोधक गर्भसँ पूर्णताक यात्रा
आरम्भक अनिर्धारित ‘अछि’ अपनहि भीतर अभावक छाया धारण करैत, आ दुनूक तनावसँ ‘बनैत रहब’क गति जन्मैत अछि। प्रत्येक निश्चित रूप अपन सीमा भीतर राखैत अछि; नकार केवल मिटेनाइ नहि, पुरानक सत्यांश नव रूपमे सँभारि आगाँ बढ़ेनाइ सेहो अछि। एहि द्वंद्वात्मक सीढ़ीपर विरोध विकासक शत्रु नहि, नूतन स्तरक गर्भ बनैत अछि। पूर्णता जड़ अन्तिम बिन्दु नहि, अपने विरोधसभकेँ रूपान्तरित करैत चेतनाक यात्रा बनैत अछि।