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दर्शनकें केवल महान दार्शनिकसभक मतक इतिहास मानि लेब दर्शनक सबसँ पैघ संकुचन होयत। दर्शन मूलतः
मनुष्यक ओहि आत्मसचेत बौद्धिक क्रियाक नाम अछि जाहिमे ओ अपन विश्वास, अनुभव, मूल्य, व्यवहार आ
संस्थासभक कारण पूछैत अछि। जे बात सामान्य जीवनमे स्वत:सिद्ध बुझाइत अछि, दर्शन ओकरा प्रश्नक
aad आनैत अछि। “ई सत्य अछि”--किएक? “ई उचित अछि”--कोन मापदण्डसँ? “ई हमर परम्परा
अछि”--परम्परा मात्र भेला सँ उचितता सिद्ध कोना भेल? “बहुमत एहि पक्षमे अछि”--बहुमत सत्यक प्रमाण
अछि की केवल संख्याक? एहि प्रश्नसभक कारण दर्शन जीवनसँ बाहरक विलास नहि, बल्कि जीवनक
आत्मपरीक्षण अछि।
1.1 दर्शनः विस्मयसँ विवेक धरि
मनुष्य बहुत किछु बिना प्रश्न कएने स्वीकार करेत अछि। सूर्य उगैत अछि, नदी बहैत अछि, जन्म होइत अछि,
मृत्यु अबैत अछि, समाज नियम बनबैत अछि, परिवार मूल्य सिखबैत अछि, धर्म जगतक अर्थ दैत अछि, विज्ञान
घटना बुझबैत अछि। मुदा कोनो क्षण एहन अबैत अछि जखन परिचित वस्तु अपरिचित भऽ उठैत अछि। मृत्यु
देखैत मनुष्य पूछैत अछि-_व्यक्तिक अस्तित्वक सीमा की? अन्याय देखैत पूछैत अछि-जे अछि, से जे
होयबाक चाही ताहिसँ भिन्न किएक? भ्रमक अनुभव होइत पूछैत अछि-जे देखाइत अछि, से सत्ये अछि की
नहि? एहि विस्मय, असन्तोष आ आत्मसंशयसँ दर्शनक ऊर्जा जन्म लैत अछि।
विस्मय मात्र पर्याप्त नहि। बच्चा सेहो विस्मित होइत अछि; कवि विस्मयकें रूपकमे बदलि सकैत छथि;
वैज्ञानिक विस्मयकें परीक्षणीय प्रश्नमे। दार्शनिक विस्मयकें अवधारणा, तर्क, प्रमाण आ प्रतिपक्षसँ जोडत
अछि। तेँ दर्शनक पहिल गति विस्मय, दोसर प्रश्न, तेसर विवेचन, चारिम प्रमाण-परीक्षण आ पाँचम
आत्मसमीक्षा अछि।
1.2 दर्शन मत नहि, मतक परीक्षा अछि
दर्शनक इतिहासमे अनेक मत अछि--अद्वैत, द्वैत, सांख्य, न्याय, बौद्ध मध्यमक, जैन अनेकान्त, भौतिकवाद,
आदर्शवाद, अनुभववाद, बुद्धिवाद, अस्तित्ववाद, व्यवहारवाद। मुदा मतक संख्या दर्शनक परिभाषा नहि। कोनो
मत केवल एहि कारण दार्शनिक नहि भऽ जाइत अछि जे ओकर समर्थक ओकरा गम्भीर स्वरमे प्रस्तुत करेत
अछि। दार्शनिकता तखन आरम्भ होइत अछि जखन मत अपन आधार स्पष्ट करैत अछि, विरोधी प्रश्न स्वीकार
करेत अछि, निष्कर्षक परिणाम देखैत अछि आ सम्भावित भूलक लेल अपनाकेँ खुला रखैत अछि।
एहि कारण “हम मानैत छी” आ “हमर मानबाक कारण ई अछि” बीच महत्त्वपूर्ण अन्तर अछि। पहिल कथन
आत्मवर्णन अछि; दोसर दार्शनिक विमर्शक द्वार खोलैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि द्वारक सभ परम्परा लेल
समान रूपसँ खुला राखैत अछि। शास्त्र, विज्ञान, लोकविश्वास, आधुनिक सिद्धान्त--कोनो स्रोत केवल अपन
प्रतिष्ठाक बलपर आलोचनासँ मुक्त नहि।
1.3 दर्शनक मुख्य क्षेत्र
दर्शनक शाखासभक वर्गीकरण समय आ परम्पराक अनुसार बदलैत रहल अछि, तथापि अध्ययनक सुविधा
लेल किछु मूल क्षेत्र चिन्हित कएल जा सकैत अछि।
तत्त्वमीमांसा पूछैत अछि--वास्तविकता मूलतः की प्रकारक अछि? पदार्थ, मन, आत्मा, ईश्वर, समय,
कारणता, स्वतंत्र इच्छा, सम्भावना आ अस्तित्वक स्वरूप की? आधुनिक तत्त्वमीमांसा केवल “प्रथम कारण”
धरि सीमित नहि; मन-देह सम्बन्ध, सामाजिक वस्तु, व्यक्ति-पहिचान आ समय-जकाँ प्रश्न सेहो ओकर क्षेत्रमे
अबैत अछि।
ज्ञानमीमांसा पूछैत अछि-ज्ञान की? विश्वास ज्ञान कखन बनेत अछि? सत्य विश्वास सेहो संयोगवश सत्य
भऽ सकैत अछि; तखन ज्ञानक लेल सत्यक अतिरिक्त की चाही? ज्ञानक स्रोत की? प्रत्यक्ष, स्मृति, अनुमान,
भाषा, प्रमाणिक व्यक्ति वा संस्था-एहि सभक विश्वसनीयता कोना जाँचल जाए? ज्ञानक सीमा कतय अछि?
तर्कशास्त्र पूछैत अछि-_कोन निष्कर्ष कोन आधारसँ निकलैत अछि? तर्क वैध कखन? भ्रमपूर्ण कारण, शब्द-
छल, असंगत निष्कर्ष, असिद्ध हेतु आ विरोधाभास कोना चिन्हल जाए? भारतीय न्याय-परम्पराक हेत्वाभास-
विमर्श आ पाश्चात्य औपचारिक तर्क दुनू एहि व्यापक उद्देश्यक अलग ऐतिहासिक रूप अछि।
मूल्यमीमांसा मूल्यक प्रश्न उठबैत अछि। नैतिक दर्शन पूछैत अछि-नीक आ बेजाय कर्मक कसौटी की?
सौन्दर्य-दर्शन पूछैत अछि--सुन्दरता, कला आ रसक अनुभवक स्वरूप की? राजनीतिक दर्शन पूछैत अछि
न्याय, अधिकार, राज्य, स्वतंत्रता, समानता आ वैध सत्ता की? धर्म-दर्शन आस्था, ईश्वर, मुक्तिक दाबी,
धार्मिक अनुभव आ धार्मिक बहुलताक तर्कपूर्ण परीक्षण करैत अछि। विज्ञान-दर्शन वैज्ञानिक व्याख्या,
कारणता, सिद्धान्त आ प्रमाणक प्रकृति पूछैत अछि। भाषा-दर्शन शब्द, अर्थ, सन्दर्भ आ वाक्यक सत्यताक
प्रशन उठबैत अछि।
ई विभाजन उपयोगी अछि, मुदा अन्तिम नहि। “मनुष्य स्वतंत्र अछि की नहि?” तत्त्वमीमांसाक प्रश्न अछि;
“स्वतंत्र नहि तँ नैतिक जिम्मेवारी कोना?” नैतिक प्रश्न; “राज्य व्यक्ति पर दण्ड किएक दे?” राजनीतिक
प्रशन; “स्वतंत्रता अनुभवमे कोना प्रकट होइत अछि?” प्रघटनात्मक प्रश्न। जीवन विषयसूचीक हिसाबसँ नहि
चलैत अछि, तेँ दर्शनक शाखासभ निरन्तर एक-दोसरामे प्रवेश करैत अछि।
1.4 दर्शन आ विज्ञान
दर्शन आ विज्ञानकेँ परस्पर विरोधी मानब अनुचित अछि। आधुनिक विशेष विज्ञानसभ दर्शनक विस्तृत
ऐतिहासिक संसारसँ अलग-अलग अनुशासनक रूपमे विकसित भेल, मुदा प्रश्नसभक सीमा एखनो परस्पर
छुबैत अछि। विज्ञान पूछैत अछि-_विशिष्ट घटना कोना घटैत अछि, कोन परिकल्पना परीक्षणमे टिकैत अछि,
कोन प्रतिरूप भविष्यवाणी करैत अछि। दर्शन पूछि सकैत अछि-वैज्ञानिक व्याख्या ककरा कहल जाए?
कारणता की? अवलोकन सिद्धान्तसँ पूर्णतः स्वतंत्र अछि की नहि? वैज्ञानिक यथार्थवाद उचित अछि की
उपकरणवाद? विज्ञानक सफलतासँ नैतिक मूल्य स्वत: निकलैत अछि की नहि?
एहि भेदक अर्थ ई नहि जे दर्शन प्रयोगक स्थान AS सकैत अछि। रक्तचाप नापबाक प्रश्न दार्शनिक तर्कसँ नहि
सुलझत। मुदा “स्वास्थ्य संसाधनक न्यायपूर्ण वितरण कोना हो?” केवल रक्तचापक आँकड़ासँ सेहो नहि
सुलझत। तथ्य आ मूल्य परस्पर सम्बन्धित छथि, मुदा एक-दोसराक पर्याय नहि। समानान्तर दर्शन विज्ञानक
प्रमाण-अनुशासन स्वीकारैत अछि, संगहि वैज्ञानिक निष्कर्षके सामाजिक, नेतिक आ अवधारणात्मक सन्दर्भमे
जाँचैत अछि।
1.5 दर्शन आ धर्म
भारतीय बौद्धिक इतिहासमे दर्शन आ धर्मक सीमा आधुनिक विश्वविद्यालयीय विभाजन-जकाँ सरल नहि रहल।
मोक्ष, दुःख, आत्मा, कर्म, ईश्वर, शून्यता, निर्वाण, वेद-प्रामाण्य, अहिंसा-ई प्रश्न एकहि समय दार्शनिक,
धार्मिक, नेतिक आ जीवनगत रहल। मुदा एहि समीपताक अर्थ ई नहि जे धार्मिक आस्था दार्शनिक प्रमाणक
स्थान स्वतः लऽ लेत। दर्शन धार्मिक अनुभवकें मानव-अनुभवक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र मानि सकैत अछि, मुदा ओकर
सार्वभौम दाबी पर प्रश्न सेहो HS सकैत अछि।
धर्म जँ कहैत अछि--“एहि मार्गसँ मोक्ष”-_दर्शन पूछैत अछि: मोक्षसँ की अभिप्राय? मार्गक ज्ञान कोन
प्रमाणसँ? वैकल्पिक धार्मिक दावासभक संग सम्बन्ध की? नैतिक परिणाम की? एहि पूछताछक उद्देश्य
आस्थाक अपमान नहि, दाबी आ औचित्यक सम्बन्ध स्पष्ट करब अछि।
1.6 भारतीय “दर्शन”क बहुवचन
भारतीय परम्परामे “दर्शन” एकरूप सिद्धान्तक नाम नहि। वेद-प्रामाण्य स्वीकार करयवला न्याय, वैशेषिक,
सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्तक भीतर सेहो गम्भीर मतभेद अछि; बौद्ध, जैन आ लोकायत परम्परा अन्य
आधारसँ प्रश्न Jord अछि। ज्ञानक स्रोतक संख्या, आत्माक अस्तित्व, बाह्य जगतक स्वरूप, ईश्चरक
आवश्यकता, शब्दक प्रामाण्य, मुक्तिक प्रकृति--प्रायः प्रत्येक मूल प्रश्नपर विवाद भेटैत अछि। एहि
बहुवचनताकें “भारतीय विचारक भ्रम” नहि, बल्कि दर्शनक जीवित स्वरूप बुझबाक चाही।
न्यायसूत्रक आरम्भे प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, तर्क, निर्णय आ वाद-जकाँ विषयसभक
सूची दैत अछि। एहि सूचीसँ स्पष्ट होइत अछि जे दार्शनिकता केवल निष्कर्ष नहि; प्रश्न कोना उठत, प्रमाण
कोना जाँचल जाएत, विवाद कोना चलत आ भ्रान्त तर्क कोना चिन्हल जाएत--ई सभ सेहो दर्शनक अंग अछि।
1.7 दर्शन आ जीवन
एकटा आपत्ति उठि सकैत अछि--जँ दर्शनक प्रश्नसभक अन्तिम उत्तर नहि, तँ दर्शनक उपयोग की? एहि
आपत्तिमे उपयोगकें केवल तात्कालिक परिणामसँ मापबाक प्रवृत्ति अछि। दर्शन औषधि नहि जे ताप तुरन्त
घटा दे; मुदा औषधि-वितरणक न्याय, रोगीक सहमति, जीवन-मृत्युक निर्णय आ चिकित्सा-संसाधनक नैतिक
उपयोग बिना दार्शनिक धारणाक सम्भव नहि।
दैनिक जीवनमे व्यक्ति निरन्तर दर्शन करैत अछि, Wet ओकरा एहि नामसँ नहि चिन्हैत हो। बच्चाकें दण्ड देबाक
उचितता, वृद्ध माता-पिताक देखभाल, विवाहमे स्वायत्तता, जाति-आधारित व्यवहार, राजनीतिक निष्ठा, धार्मिक
सहिष्णुता, पर्यावरणीय जिम्मेवारी -सभ निर्णयक पाछाँ मनुष्य, अधिकार, कर्तव्य, कारण आ मूल्य सम्बन्धी
धारणासभ रहैत अछि। अनपरीक्षित दर्शन सेहो दर्शन अछि; अन्तर एतेक जे ओ अपन आधार नहि देखैत अछि।
1.8 मिथिला: प्रश्नपरम्पराक सन्दर्भ
एहि ग्रन्थमे मिथिला केवल भौगोलिक परिचय नहि, पद्धतिगत स्मृति अछि। विदेहक उपनिषदिक संवाद, न्याय-
मीमांसा आ नव्य-न्यायक शास्त्रार्थ-परम्परा, शब्द आ प्रमाणक सूक्ष्म परीक्षण--ई सभ एकटा एहन बौद्धिक
संस्कारक उदाहरण अछि जाहिमे प्रश्नक सम्मान आ परिभाषाक कठोरता दूनू महत्त्वपूर्ण रहल। मिथिलाक
एहि परम्पराकेँ गौरवगानमे बदलि देब समानान्तर दर्शनक उद्देश्य नहि। गौरव सेहो प्रमाण माँगैत अछि। मूल
उद्देश्य ई देखब अछि जे स्थानीय बौद्धिक परम्परा विश्व-दर्शनक समानान्तर संवादमे स्वतंत्र योगदान कोना |S
सकैत अछि।
1.9 समानान्तर दर्शनक आरम्भिक प्रतिज्ञा
समानान्तर दर्शन मुख्यधाराक निषेध नहि। “मुख्यधारा गलत, हाशिया सही”--ई उलटल Et मात्र होयत।
समानान्तर दृष्टि स्थापित विचारक ओकर सबलतम रूपमे Usd अछि, उपेक्षित स्रोतकें खोजैत अछि, दुनू पर
समान प्रमाण-कसौटी लागू करैत अछि, आ अन्ततः अपन निष्कर्षकें सेहो संशोधन लेल खुला रखैत अछि।
एहि ग्रन्थक मूल प्रतिज्ञा चारि वाक्यमे समेटल जा सकैत अछि: सत्यक दाबी हो तँ प्रमाण पूछू; प्रमाण हो तँ
ओकर सीमा पूछू; सत्ता हो ते वैधता पूछू; आ मनुष्य हो तँ ओकर गरिमा नहि बिसरु। एहि प्रतिज्ञामे दर्शनक
बौद्धिक आ नेतिक दुनू रूप उपस्थित अछि।
पूर्वपक्षः दर्शन केवल विचारक इतिहास अछि
एहि मतक अनुसार दर्शन पढ़बाक अर्थ प्लेटो, कान्ट, शंकर, नागार्जुन, गङ्गेश, मार्क्स आदि की कहलनि से
जानब। इतिहास निश्चय आवश्यक अछि; विचारक शब्दके ओकर काल, ग्रन्थ आ विवादसँ काटि देब अनुचित।
मुदा केवल इतिहास पर्याप्त नहि। जँ हम “अमुक दार्शनिक ई कहलनि” पर रुकि जाइत छी तँ हम
इतिहासकारक कार्य करेत छी; दर्शन तखन आरम्भ होइत अछि जखन पूछैत छी-_ओ तर्क आज सेहो टिकैत
अछि? ओकर पूर्वधारणा की? विरोधी तर्क की? हमर अनुभव वा ज्ञानक संग ओकर सम्बन्ध की?
उत्तरपक्ष: इतिहाससम्मत आलोचनात्मक संवाद
समानान्तर दर्शन sider त्यागैत नहि; इतिहासक आधारपर वर्तमान संवाद करैत अछि। अतीतक
विचारककेँ वर्तमान शब्दावलीमे जबरन ढालब नहि, मुदा ओकर प्रश्नक वर्तमान प्रासंगिकता जाँचब। एहि प्रकार
दर्शन इतिहास आ जीवित तर्कक संगम बनैत अछि।
अध्याय-निष्कर्ष
दर्शन उत्तरक संग्रह नहि, उत्तर देबाक जिम्मेवार पद्धति अछि। एकर क्षेत्र वास्तविकता, ज्ञान, तर्क, मूल्य, सत्ता,
भाषा, धर्म, विज्ञान आ जीवन धरि विस्तृत अछि। दर्शनक विशिष्टता एहि बातमे नहि जे ओकर प्रत्येक प्रश्नक
अन्तिम समाधान अछि, बल्कि एहि बातमे अछि जे ओ प्रश््नकेँ स्पष्ट करैत अछि, कारण arta अछि,
अवधारणाक सीमा देखैत अछि, प्रतिपक्ष सुनैत अछि आ अपन निष्कर्षकें सुधार लेल खुला रखैत अछि।
समानान्तर दर्शन एहि सामान्य दार्शनिक प्रवृत्तिक मिथिला-केन्द्रित, बहुपरम्परागत आ प्रमाण-सचेत विस्तार
अछि।
अध्याय-ग्रन्थसूची
अरस्तू — Metaphysics.
गौतम — Nyaya-sitra.