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संशय ज्ञानक शत्रु नहि; अनुशासित संशय ज्ञानक प्रहरी अछि। मुदा प्रत्येक वस्तुपर निराधार, समान स्तरक
आ अनन्त संशय ज्ञानक आदर्श नहि। St हम प्रत्यक्ष, स्मृति, भाषिक कथन, गणना, अपन तर्क आ सभ साझा
अनुभवपर एकहि बेर पूर्ण अविश्वास कऽ दी, तँ न केवल दर्शन बल्कि सामान्य व्यवहार असम्भव भऽ जाएत।
तँ मूल प्रश्न “संशय करब की नहि” नहि; प्रश्न अछि--संशयक उचित कारण की, ओकर सीमा की, आ संशय
उठला पर परीक्षण कोना हो?
2.1 प्रशन आ संशयक भेद
प्रशन अनिवार्य Sue संशय नहि। “गङ्गा कतयसँ निकलैत अछि?” जानकारीक प्रश्न भऽ सकैत अछि। “ई
स्रोत विश्वसनीय अछि की नहि?” संशयक प्रश्न अछि। “विश्वसनीयता ककरा कहल जाए?” दार्शनिक प्रश्न
अछि। एहि तीन स्तरके अलग राखब आवश्यक अछि। कखनो सूचना उपलब्ध नहि होइत अछि; कखनो सूचना
परस्पर विरोधी; कखनो मूल मापदण्डे अस्पष्ट। दर्शन तेसर स्तरपर विशेष Sas सक्रिय होइत अछि, मुदा पहिल
दू स्तरक तथ्यक उपेक्षा नहि करैत अछि।
न्याय-परम्परामे संशय जाँचक महत्त्वपूर्ण अवस्था अछि। संशयक उपस्थितिमे परीक्षण आवश्यक मानल गेल,
मुदा न्यायीय परम्परा सर्वव्यापी संशयकें आरम्भिक आदर्श नहि मानेत अछि। सामान्य ज्ञान-प्रक्रियासभकें
कार्यरत मानल जाइत अछि जाबत धरि विरोधी कारण न उठय। एहि दृष्टिमे विश्वास अन्धविश्वास नहि; प्रारम्भिक
विश्वसनीयता अछि, जे उचित चुनौती आएलापर पुनः परीक्षणीय अछि।
2.2 प्रमाण: ज्ञानक स्रोत
भारतीय ज्ञानमीमांसामे “प्रमाण” केवल बहसक “सबूत” नहि; व्यापक अर्थमे यथार्थ ज्ञान उत्पन्न करयवला
विश्वसनीय साधन अथवा प्रक्रिया अछि। न्याय चारि प्रमाण स्वीकारत अछि--प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आ
शब्द। आन भारतीय दर्शन अतिरिक्त प्रमाण स्वीकारैत अथवा एहि चारिमे सँ foc घटबैत अछि। एहि
मतभेदसँ एकटा महत्त्वपूर्ण बात स्पष्ट होइत अछि: दार्शनिक विवाद केवल “की सत्य अछि” पर नहि, “सत्य
जानबाक उचित साधन की” पर सेहो होइत अछि।
प्रत्यक्ष हमर इन्द्रिय आ प्रत्यक्ष अनुभवसँ सम्बन्धित अछि। आँखि आगि देखैत अछि, त्वचा ताप अनुभव करेत
अछि, कान ध्वनि सुनैत अछि। मुदा प्रत्यक्ष अचूक नहि। दूरी, प्रकाश, रोग, अपेक्षा, भ्रम आ ध्यानक सीमा
अनुभव प्रभावित करैत अछि। तँ “हम देखलहुँ” महत्त्वपूर्ण प्रमाण हो सकैत अछि, मुदा प्रत्येक परिस्थिति मे
अन्तिम प्रमाण नहि।
अनुमान ज्ञात संकेतसँ अज्ञात निष्कर्ष धारि पहुँचैत अछि। धुआँ देखि आगिक अनुमान, लक्षण देखि रोगक
अनुमान, पुरातात्त्विक अवशेषसँ अतीतक सामाजिक संरचनाक अनुमान--सभमे ज्ञात-अज्ञात सम्बन्धक
कसौटी आवश्यक अछि। गलत सामान्यीकरण, संयोगकें कारण मानि लेब, अपूर्ण आँकड़ा, पूर्वग्रह-अनुमान
बिगाड़ि सकैत अछि।
उपमान समानताक आधारपर अज्ञातकें ज्ञातसँ जोड़ेत अछि। दैनिक जीवनमे तुलनाक भूमिका व्यापक अछि।
मुदा समानता असीम नहि; दू वस्तु कोनो एक गुणमे समान आ आन गुणमे भिन्न भऽ सकैत अछि। गलत
उपमान राजनीतिक, धार्मिक आ ऐतिहासिक ahs विशेष रूपसँ भ्रामक होइत अछि।
शब्द अथवा प्रमाणिक कथन मानवीय ज्ञानक विशाल भागक आधार अछि। हम सभ स्वयं सभ देश नहि देखैत
छी, सभ वैज्ञानिक प्रयोग नहि दोहरबैत छी, सभ ऐतिहासिक अभिलेख नहि पढ़ैत छी। शिक्षक, चिकित्सक,
विशेषज्ञ, ग्रन्थ, अभिलेख, समाचार, परिवार आ संस्थासभक कथनपर निर्भरता अनिवार्य अछि। प्रश्न ई नहि
जे “दोसराक बात मानब की नहि”; प्रश्न ई जे वक्ता वा स्रोत विश्वसनीय कखन अछि। ज्ञान अछि? ईमानदारी
अछि? हित-संघर्ष अछि? कथन स्वतंत्र स्रोतसँ पुष्ट होइत अछि? संस्था सुधार-प्रक्रिया रखैत अछि?
2.3 प्रमाणक संख्या पर भारतीय विवाद
भारतीय दर्शनक विशिष्टता ई अछि जे प्रमाणसभक संख्या आ स्वरुप स्वयं विस्तृत विवादक विषय बनल।
न्याय चारि प्रमाण मानेत अछि। मीमांसा आ वेदान्तक अनेक धारासभ अर्थापत्ति आ अनुपलब्धि-जकाँ
अतिरिक्त प्रमाणक चर्चा करैत अछि। बौद प्रमाणमीमांसाक प्रमुख धारासभ प्रत्यक्ष आ अनुमानकें केन्द्रमे
रखैत अछि। चार्वाकसँ सम्बद्ध परम्पराक पुननिर्माणमे प्रत्यक्षक प्रधानता पर बल देल जाइत अछि, यद्यपि मूल
स्रोतक अभाव कारण सावधानी आवश्यक अछि।
एहि विवादक समानान्तर अर्थ ई अछि जे “प्रमाण” एकटा बन्द सूची नहि, बल्कि ज्ञान-प्रक्रियाक विश्लेषण
अछि। आधुनिक विज्ञानमे उपकरण-आधारित अवलोकन, सांख्यिकीय अनुमान, सहकर्मी समीक्षा आ
पुनरुत्पादन; इतिहासमे दस्तावेज, अभिलेख, वस्तुपरक अवशेष, मौखिक इतिहास; न्यायालयमे साक्ष्य,
विशेषज्ञ मत आ दस्तावेज--सभ क्षेत्र अपन उचित प्रमाण-अनुशासन विकसित करैत अछि।
2.4 सत्य विश्वास आ ज्ञान
कोनो विश्वास संयोगवश सत्य हो सकैत अछि। व्यक्ति बिना कारण अनुमान लगबय जे काल्हि वर्षा होयत,
आ संयोगसँ वर्षा भऽ जाए। सत्यता मात्र एहि विश्वासकें ज्ञान नहि बनबैत अछि। पाश्चात्य आधुनिक
ज्ञानमीमांसामे ज्ञानकें दीर्घकाल धरि “औचित्ययुक्त सत्य विश्वास”क रूपमे विश्लेषित कएल गेल; बीसम
शताब्दीक गेटियर-समस्या देखेलक जे सत्य, विश्वास आ औचित्यक तीन शर्त सेहो किछु परिस्थितिमे पर्याप्त
नहि। एहि विवादक महत्त्व एतय अछि जे ज्ञानमे सत्यक संग उचित ज्ञान-उत्पत्ति अथवा ज्ञानात्मक सफलता
आवश्यक अछि।
भारतीय प्रमाणमीमांसामे सेहो ज्ञानक उत्पत्तित्रोत पर विशेष बल अछि। “प्रमा” यथार्थ बोध आ “प्रमाण”
ओकर उत्पादक साधनक रूपमे विचारल जाइत अछि। परम्परासभ एहि सम्बन्धक अलग-अलग रूपमे
व्याख्यायित करैत अछि, मुदा प्रश्न समान अछि--सही निष्कर्ष सही कारणसँ प्राप्त भेल की केवल संयोगसँ?
2.5 संशयक तीन रूप
पहिल, व्यावहारिक संशयः “ई औषधि सचमुच एहि रोगमे प्रभावी अछि की?” एतय परीक्षण सम्भव अछि।
दोसर, पद्धतिगत संशय: अपन विश्वासक आधार जाँचबाक लेल जानि-बुझि कऽ प्रश्न उठेनाइ। देकार्तक
विधिपूर्वक संशय एहि रूपक प्रसिद्ध उदाहरण अछि, यद्यपि ओकर उद्देश्य स्थायी संशय नहि बल्कि निश्चित
आधार खोजब छल।
तेसर, दार्शनिक सर्वसंशय: “की हम बाह्य जगत, अन्य मन, अतीत, आगमन वा कोनो वस्तुक जानि सकैत
छी?” एहन संशय ज्ञानक संरचना बुझबाक शक्तिशाली साधन भऽ सकैत अछि, मुदा सामान्य व्यवहारक
सीधा निर्देश नहि।
समानान्तर दर्शन एहि तीन Sach गड्टमट्ट नहि करैत अछि। व्यावहारिक प्रश्नक उत्तर प्रयोग वा दस्तावेजसँ भेटि
सकैत अछि; सर्वसंशयक उत्तर अवधारणात्मक तर्क माँगैत अछि।
2.6 निराधार संशय आ विश्वसनीय आलोचना
समकालीन सार्वजनिक जीवनमे “हम तऽ बस प्रश्न पूछैत छी” वाक्य कखनो-कखनो बिना प्रमाणक आरोप
फैलाबय लेल उपयोग होइत अछि। प्रश्न पूछब स्वयं सद्गुण नहि, जें प्रश्नक रूप एहन हो जे कोनो उत्तर स्वीकारे
नहि करय। उचित संशयक HAS कम चारि शर्त मानल जा सकैत अछि: संशयक स्पष्ट विषय हो; संशय
उठेबाक कारण हो; सम्भावित खण्डनक शर्त स्पष्ट हो; आ समान कसौटी अपन पक्षपर सेहो लागू हो।
जँ व्यक्ति केवल विरोधी स्रोतपर कठोर संशय करय आ अपन प्रिय स्रोतकें बिना परीक्षण मानि लय, तँ ई
दर्शन नहि, पक्षपात अछि। समानान्तर दर्शनक प्रमाण-अनुशासन सममित अछि-जे कसौटी दोसर पर, से
अपन पर सेहो।
2.7 संस्था, विशेषज्ञता आ ज्ञान
आधुनिक समाजमे ज्ञान व्यक्तिगत नहि, संस्थागत सेहो अछि। अस्पताल, विश्वविद्यालय, न्यायालय,
अभिलेखागार, वैज्ञानिक पत्रिका, सांख्यिकीय संस्था-सभ जटिल ज्ञान-उत्पादन प्रणाली अछि। व्यक्ति सभ
प्रयोग स्वयं नहि कऽ सकैत अछि; तेँ संस्थागत विश्वसनीयता आवश्यक अछि। मुदा संस्था त्रुटिहीन नहि। सत्ता,
वित्त, प्रतिष्ठा, राजनीतिक दबाव, सम्पादकीय पूर्वग्रह, समूह-चिन्तन--ई सभ ज्ञान प्रभावित HS सकैत अछि।
तँ समानान्तर दर्शन अन्ध-विशेषज्ञवाद आ अन्ध-विरोध दुनूसँ दूरी रखैत अछि। “विशेषज्ञ कहलक” पर्याप्त
नहि, मुदा विशेषज्ञताकेँ सामान्य अनुमानक बराबर मानब सेहो अनुचित। उचित प्रश्न अछि--विशेषज्ञता कोन
्षेत्रक? प्रमाण सार्वजनिक अछि? समीक्षा सम्भव अछि? असहमति कतेक? हित-संघर्ष की? निष्कर्षक
अनिश्चितता कतेक?
2.8 डिजिटल युगमे प्रमाण
डिजिटल माध्यम प्रत्यक्ष, शब्द आ अनुमानक सीमा धुंधला कऽ दैत अछि। चलचित्र देखाइत अछि प्रत्यक्ष-
जकाँ, मुदा सम्पादित वा कृत्रिम भऽ सकैत अछि। हजार लोक एकहि बात साझा Hed छथि, मुदा हजार
स्वतंत्र स्रोत नहि; सम्भव अछि सभ एकहि मूल प्रविष्टि दोहरा रहल हो। खोज-परिणाम लोकप्रियताक संकेत
हो सकैत अछि, सत्यताक नहि।
एहि परिस्थिति मे प्रमाण-परीक्षणक नूतन नागरिक अनुशासन आवश्यक अछि: मूल स्रोत खोजू; तिथि जाँचू;
सम्पूर्ण सन्दर्भ देखू; स्वतंत्र पुष्टिकरण खोजू; छवि वा चलचित्र-्रोत जाँचू; कथन आ व्याख्या अलग करु;
अनिश्चितता स्पष्ट राखू। ई आधुनिक उपकरण न्यायीय “संशय उठला पर परीक्षण”क संस्कारक नूतन रूप
मानल जा सकैत अछि।
2.9 पूर्वपक्ष: सभ प्रमाण अन्ततः प्रमाणित कोना होयत?
एकटा गम्भीर आपत्ति अछि: जँ प्रत्येक प्रमाणक विश्वसनीयता लेल दोसर प्रमाण चाही, आ दोसर लेल तेसर,
तँ अनन्त श्रृंखला उत्पन्न होयत। जँ प्रमाण स्वयंकें प्रमाणित करय तेँ चक्र होयत। जँ बिना प्रमाणक किछु मानि
ली तँ मनमानी। ई ज्ञानमीमांसाक प्राचीन समस्या अछि।
उत्तरपक्षः त्रुटिसंशोध्य आरम्भ
समानान्तर दर्शन पूर्ण, बाह्य, सर्वज्ञ प्रमाणक खोज नहि करैत अछि। सामान्य ज्ञान-प्रक्रियासभकेँ प्रारम्भिक
अधिकार देल जा सकैत अछि जाबत उचित प्रतिरोध न हो; विरोध आएलापर पारस्परिक परीक्षण, स्वतंत्र
प्रमाण, व्यावहारिक सफलता, तर्कसंगति आ स्रोत-परीक्षण द्वारा विश्वास संशोधित कएल जाए। ई
अचूकतावाद नहि, त्रुटिसंशोध्यवाद अछि।
अध्याय-निष्कर्ष
ज्ञानक शत्रु संशय नहि; निराधार विश्वास आ निराधार संशय दुनू ज्ञानक बाधा अछि। प्रमाणक प्रकार क्षेत्रानुसार
बदलैत अछि, मुदा Gy AIA एक साझा नियम अछि-दाबी, स्रोत, प्रक्रिया, प्रतिपक्ष आ संशोधनक सम्बन्ध
स्पष्ट हो। समानान्तर दर्शन न्यायीय प्रमाण-संवेदनशीलता, भारतीय ज्ञानमीमांसाक बहस, आधुनिक
ज्ञानमीमांसाक औचित्य-समस्या आ डिजिटल युगक स्रोत-जाँचकें एकहि व्यापक पद्धतिमे जोड़ेत अछि।
अध्याय-ग्रन्थसूचौ
गौतम — Nyaya-sitra.
वात्स्यायन — Nyaya-bhasya.
गङ्गेश उपाध्याय — Tattvacintamani.
Bimal Krishna Matilal — Perception; Logic, Language and Reality.
Stephen H. Phillips — Epistemology in Classical India.
René Descartes — Meditations on First Philosophy.
David Hume — An Enquiry Concerning Human Understanding.
Stanford Encyclopedia of Philosophy — “Epistemology”; “Skepticism”;
“Epistemology in Classical Indian Philosophy”.
Internet Encyclopedia of Philosophy — “Nyaya”.