“सभक अपन-अपन सत्य अछि”--ई वाक्य सहिष्णुता व्यक्त करबाक लेल आकर्षक लगैत अछि, मुदा दार्शनिक Soe सावधानी माँगैत अछि। of दू व्यक्ति एकहि समय, एकहि वस्तु, एकहि अर्थमे विरोधी कथन करैत छथि-“दीप जरि रहल अछि” आ “दीप नहि जरि रहल al” sq कथन समान अर्थमे सत्य नहि भऽ सकैत अछि। मुदा एहि कठोर तथ्यसँ ई निष्कर्ष सेहो नहि निकलैत अछि जे प्रत्येक वास्तविकता केवल एकहि वर्णनमे समाप्त भऽ जाइत अछि। एकटा नदी जलप्रवाह, सिंचाइक स्रोत, सांस्कृतिक स्मृति, धार्मिक स्थल, राज्यीय संसाधन आ पारिस्थितिकी तन्त्र--सभ हो सकैत अछि। सत्य आ दुष्टिकोणक सम्बन्ध एहि दू अतिवादक बीच अछि: मनमाना सापेक्षतावाद आ एकवर्णनीय कठोरतावाद। 3.1 सत्यक प्रश्न सत्यक प्रश्‍न कमसँ कम तीन स्तरपर उठैत अछि। पहिल, कथनक सत्य: “पानी समुद्रतलपर निश्चित परिस्थितिमे एहन तापमानपर उबलैत अछि।” दोसर, व्याख्याक सत्य अथवा पर्याप्तता: “एहि ऐतिहासिक आन्दोलनक मुख्य कारण आर्थिक Sel” तेसर, मूल्य-निर्णयः “ई नीति न्यायपूर्ण अछि।” एहि स्तरसभक प्रमाण आ विवादक शैली भिन्न होइत अछि। कथन परीक्षणीय आँकड़ासँ जाँचल जा सकैत अछि; ऐतिहासिक व्याख्या अनेक स्रोत आ कारणक तुलनासँँ; नैतिक निर्णय सिद्धान्त, परिणाम, अधिकार आ अनुभवक संयोजनसँ। समस्या तखन होइत अछि जखन एक स्तरक कसौटी दोसर पर जबरन लागू कएल जाए। नैतिक न्यायकें केवल जनमत-सर्वेक्षणसँ सिद्ध नहि कएल जा सकैत अछि; ऐतिहासिक तथ्यकेँ केवल वर्तमान नैतिक पसन्दसँ बदलल नहि जा सकैत अछि। 3.2 अनुरूपता: कथन आ वस्तु सत्यक एक प्रभावशाली धारणा अछि जे सत्य कथन वास्तविकतासँ मेल खाइत अछि। “AMAA आमक गाछ अछि” तखन सत्य जँ वास्तवमे आँगनमे आमक गाछ अछि। ई सहज धारणा दैनिक जीवन, विज्ञान, न्यायालय आ इतिहासमे अत्यन्त उपयोगी अछि। दस्तावेज जे कहैत अछि, घटना वास्तवमे भेल की नहि--ई अनुरूपताक प्रश्‍न अछि। मुदा “मेल” शब्द स्वयं दार्शनिक प्रश्‍न उठबैत अछि। जटिल वैज्ञानिक सिद्धान्त, गणितीय वस्तु, नैतिक कथन वा सामाजिक संस्था कोन प्रकार “वास्तविकतासँ मेल” खाइत अछि? एहि कठिनाई कारण सत्यक अन्य सिद्धान्त विकसित भेल, मुदा अनुरुपताक मूल अन्तर्दृष्टि-वास्तविकता हमर इच्छासँ स्वतंत्र प्रतिरोध रखैत अछि--समानान्तर दर्शन लेल महत्त्वपूर्ण अछि। 3.3 संगतिः विश्वाससभक परस्पर सम्बन्ध संगति-आधारित दृष्टिमे कोनो कथनक औचित्य ओकर व्यापक विश्वास-तन्त्रसँ सम्बन्धित अछि। एकटा नूतन ऐतिहासिक दाबी जँ स्थापित तिथि, दस्तावेज, भौगोलिक तथ्य आ स्वतंत्र स्रोतसभसँ टकराइत अछि तँ विशेष मजबूत प्रमाण माँगत। ज्ञान एकाकी वाक्यसभक ढेर नहि; परस्पर समर्थन करेत संरचना अछि। मुदा संगति अकेले सत्यक पर्याप्त कसौटी नहि। पूर्णत: काल्पनिक कथा आन्तरिक STF संगत भऽ सकैत अछि। तँ समानान्तर दर्शन संगतिकें आवश्यक बौद्धिक गुण मानेत अछि, मुदा बाह्य प्रमाणक विकल्प नहि। 3.4 व्यवहार आ सत्य व्यवहारवादी परम्परा सत्य-विमर्शमे विचारक परिणाम, जाँचक प्रक्रिया आ दीर्घकालीन अन्वेषणक महत्त्व देखबैत अछि। भारतीय न्याय परम्परामे सेहो यथार्थ ज्ञान सफल प्रवृत्तिसँ जुड़ल उदाहरण भेटैत अछि: सही ज्ञान मनुष्यकें उद्देश्यपूर्ण सफल क्रियामे सहाय Hed अछि। जँ दूरसँ पानी बुझि दौड़लहुँ आ ओ मृगतृष्णा निकलल, क्रियाक असफलता भ्रमक संकेत बनैत अछि। मुदा “जे उपयोगी, से सत्य” Hea अत्यधिक सरलीकरण अछि। झूठ कखनो अल्पकालिक लाभ दऽ सकैत अछि; सत्य कखनो कष्टकर भऽ सकैत अछि। व्यवहार सत्यक परीक्षणक एक आयाम अछि, परिभाषाक सम्पूर्ण विकल्प नहि। 3.5 भारतीय ज्ञानमीमांसा आ यथार्थ बोध न्याय परम्परा यथार्थ बोध आ त्रुटिक भेद पर सूक्ष्म चिन्तन Het अछि। गङ्गेश यथार्थ बोधकें वस्तुमे जे गुण वास्तवमे अछि ताहि अनुरुप MIF जोड़ेत छथि। उदाहरणतः शुक्तिमे रजत देखबाक YAR कोनो वस्तु देखाइत अवश्य अछि, मुदा आरोपित गुण वास्तविक वस्तु पर ठीक नहि बैठेत। एहि विश्लेषणमे सत्यक प्रश्‍न केवल वाक्यक नहि, अनुभूति आ वस्तुक सम्बन्धक सेहो अछि। भारतीय परम्परामे सत्य-विमर्श एकरूप नहि। बौद्ध परम्पराक विभिन्न धारासभ सामान्य व्यवहारिक सत्य आ परमार्थक विश्लेषण बीच भेद करैत अछि; जैन अनेकान्तवाद वस्तुक बहुपक्षीयतापर बल दैत अछि। एहि सिद्धान्तसभकें “सभ सत्य बराबर”क आधुनिक नारा बनायब ऐतिहासिक STS गलत होयत। अनेकान्तवाद शर्त, दृष्टि आ नयक अनुशासन माँगैत अछि; मध्यमकक द्विसत्य-विमर्श विशिष्ट दार्शनिक उद्देश्य रखैत अछि। 3.6 दृष्टरिकोणक वैधता दृष्टिकोण किएक महत्त्वपूर्ण? कारण ज्ञाता निराकार आँखि नहि। व्यक्ति कोनो भाषा बोलैत अछि, कोनो इतिहासमे जन्मैत अछि, कोनो सामाजिक स्थान रखैत अछि, कोनो प्रशिक्षण पबैत अछि। एकहि घटनाक अलग व्यक्ति अलग पक्ष देखैत छथि। किसान नदीक जलस्तरक परिवर्तन ओहि सूक्ष्मतासँ देखि सकैत छथि जे दूरस्थ अधिकारी नहि; अधिकारीक लगे क्षेत्रीय आँकड़ा हो सकैत अछि जे एक किसानक अनुभवसँ बाहर। दुनूक दृष्टि आंशिक हो सकैत अछि, आ दुनू मिलि व्यापक ज्ञान दऽ सकैत अछि। मुदा सामाजिक स्थान स्वतः सत्यक अचूक प्रमाण नहि। पीड़ित होयब अनुभवक विशेष पहुँच दऽ सकैत अछि, अचूकता नहि। विशेषज्ञ होयब तकनीकी ज्ञान दऽ सकैत अछि, नेतिक निष्पक्षता नहि। समानान्तर दर्शन दृष्टिकोणकेँ प्रमाणक स्रोतक रूपमे सुनैत अछि, सत्यक स्वचालित मुहरक रूपमे नहि। 3.7 सापेक्षतावादक सीमा यदि कहल जाए “सभ सत्य केवल व्यक्तिसापेक्ष अछि”, तँ प्रश्‍न उठैत अछि--ई कथन स्वयं सभक लेल सत्य अछि की केवल वकताक लेल? जँ केवल dai लेल, तँ आन व्यक्ति ओकरा अस्वीकार HS सकैत अछि; जँ सभक लेल, तँ HAS कम एकटा असापेक्ष सत्य मानल गेल। ई पारम्परिक आत्मसन्दर्भी कठिनाई सापेक्षतावादक अतिवादी रूपक सीमा देखबैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि कारण सत्यक बहुदृष्ट्रिगतता स्वीकारैत अछि, मनमानापन नहि। वस्तु बहुपक्षीय हो सकैत अछि; कथन प्रसंग-सापेक्ष हो सकैत अछि; भाषा वर्गीकरण प्रभावित करैत अछि; मुदा प्रमाण, विरोधाभास, वस्तुगत प्रतिरोध आ सार्वजनिक परीक्षण एखनो महत्त्वपूर्ण अछि। 3.8 सत्ता आ सत्य इतिहासमे सत्ता अभिलेख चुनैत अछि, पाठ्यक्रम बनबैत अछि, भाषा मानकीकृत करैत अछि, किछु स्मृतिसभकें संस्थागत स्थान दैत अछि आ किछुकें हाशियापर छोड़ैत अछि। एहि कारण “आधिकारिक” आ “सत्य” पर्याय नहि। मुदा एहि आलोचनासँ उलटा निष्कर्ष-“जे हाशियापर अछि से अवश्य सत्य” सेहो नहि निकलैत अछि। सत्ता-समीक्षा स्रोत-समीक्षाक विस्तार अछि, विकल्प नहि। समानान्तर इतिहास-दृष्टि पूछैत अछि: दस्तावेज के बनौलक? कोन उद्देश्यसँ? की अनुपस्थित अछि? विपरीत स्रोत की कहैत अछि? मौखिक स्मृति कतेक पुरान, कोना प्रसारित? भौतिक प्रमाण संग मेल अछि? एहि प्रश्‍नसभसँ सत्ता द्वारा निर्मित मौन उजागर भऽ सकैत अछि, मुदा नूतन Hatch सेहो प्रमाणक कसौटी पार करय पड़त। 3.9 तथ्य, अर्थ आ मूल्य एकहि घटना पर तीन प्रकारक विवाद सम्भव अछि। “घटना भेल की नहि?” तथ्यक विवाद। “घटनाक अर्थ की?” व्याख्याक विवाद। “घटना उचित छल की नहि?” मूल्यक विवाद। सार्वजनिक बहसमे ई तीनू प्रायः TEAS होइत अछि। उदाहरणतः कोनो कानून पास भेल--ई तथ्य। ओकर परिणाम गरीब समुदायपर अधिक पड़त--ई अनुभवजन्य-व्याख्यात्मक दावा, जकर आँकड़ा चाही। ई अन्यायपूर्ण अछि--ई नैतिक निष्कर्ष, जकर न्याय-सिद्धान्त चाही। समानान्तर दर्शन प्रत्येक स्तर पर उचित प्रमाण माँगैत अछि आ स्तर बदलैत समय संकेत करैत अछि। एहि पारदर्शितासँ बहस अधिक ईमानदार बनैत अछि। 3.10 असहमति आ सत्य बुद्धिमान, ईमानदार आ सूचित व्यक्ति सेहो असहमत भऽ सकैत छथि। असहमति स्वतः एहि बातक प्रमाण नहि जे सत्य नहि; ई संकेत भऽ सकैत अछि जे प्रमाण जटिल, मूल्य अलग, अवधारणा अस्पष्ट अथवा उपलब्ध जानकारी अपूर्ण अछि। उचित प्रतिक्रिया विरोधीकें मूर्ख घोषित करब नहि, बल्कि असहमतिक स्थान चिन्हब-- तथ्य पर? स्रोत पर? तर्क पर? मूल्य पर? प्राथमिकता पर? एहि पद्धतिसँ “विचारधारा” शब्द गालीक स्थानपर विश्लेषणक साधन बनैत अछि। प्रत्येक व्यक्ति किछु पूर्वधारणा AS कऽ अबैत अछि; दर्शनक काम ओकरा अदृश्य नहि रहय देब। पूर्वपक्ष: सत्य बहुदुष्टिगत कहलासँ सापेक्षतावाद नहि आएत? आपत्ति उचित अछि। जँ “बहुदृष्टरिगत”क अर्थ “सभ कथन समान” लेल जाए तँ सत्य विघटित भऽ जाएत। उत्तरपक्षः दृष्टि बहु, कसौटी साझा समानान्तर दर्शन कहैत अछि-_दृष्टिकोण अनेक भऽ सकैत अछि, मुदा प्रत्येक दाबीकें उचित कारण, आन्तरिक संगति, उपलब्ध प्रमाण, प्रतिपक्ष आ अनुभवक प्रतिरोध सहन करय पड़त। अलग वर्णन परस्पर पूरक भऽ सकैत अछि; सीधा विरोधी कथनक बीच निर्णयक प्रश्‍न टारल नहि जा सकैत अछि। अध्याय-निष्कर्ष सत्य न तऽ केवल व्यक्तिगत पसन्द अछि, न प्रत्येक जटिल वास्तविकताक एकहि वाक्यमे पूर्ण कब्जा। सत्य- विमर्शमे वस्तु, कथन, दृष्टिकोण, प्रमाण, भाषा, सत्ता, उपयोग आ व्याख्या सभ भूमिका निभबैत अछि। समानान्तर दर्शनक सूत्र अछि-“सत्य बहुदुष्टिगत भऽ सकैत अछि, मुदा मनमाना नहि।” एहि सूत्रक पहिल भाग अहंकारी एकवर्णनीयतासँ बचबैत अछि; दोसर भाग निराधार सापेक्षतावादसँ। अध्याय-ग्रन्थसूचौ