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जे व्यक्ति कहैत अछि “हम सभ जानैत छी”, ओ ज्ञानक नहि, अहंकारक भाषा बाजैत अछि। मानवीय ज्ञान
सीमित अछि--इन्द्रिय सीमित, स्मृति त्रुटिपूर्ण, ध्यान चयनात्मक, भाषा अपूर्ण, अवधारणा ऐतिहासिक, संस्था
पक्षपातग्रस्त भऽ सकैत अछि, आ प्रत्येक व्यक्तिक अनुभव सीमित। मुदा एहि सीमा सँ ई निष्कर्ष नहि
निकलैत अछि जे ज्ञान असम्भव अछि। समानान्तर दर्शनक मूल सिद्धान्त अछि-ज्ञान सम्भव अछि, मुदा
संशोध्य अछि।
4.1 सीमा मानब पराजय नहि
ज्ञानक सीमा स्वीकारब कखनो बौद्धिक दुर्बलता बुझल जाइत अछि। वास्तवमे “हम नहि जानैत छी” उचित
परिस्थितिमे अत्यन्त मजबूत ज्ञानात्मक कथन अछि। चिकित्सक ot परीक्षण बिना निश्चित रोग घोषित नहि
करेत छथि, इतिहासकार जँ अस्पष्ट स्रोतपर “सम्भवतः” लिखैत छथि, वैज्ञानिक जँ त्रुटि-सीमा दैत छथि--ई
अज्ञान नहि, अनुशासित ज्ञान अछि।
अचूकता आ ज्ञान अलग वस्तु अछि। यदि ज्ञानक शर्त ई राखल जाए जे भूलक कोनो सम्भावना नहि, तेँ दैनिक
आ वैज्ञानिक ज्ञानक विशाल भाग असम्भव कहल जाएत। व्यवहारमे हम पर्याप्त प्रमाण, विश्वसनीय प्रक्रिया
आ संशोधनक क्षमता पर निर्भर रहैत छी।
4.2 इन्द्रियक सीमा
प्रत्यक्ष ज्ञानक मूल स्रोत अछि, मुदा इन्द्रिय विशेष परिस्थितिमे भ्रमित होइत अछि। दूरक वस्तु छोट देखाइत
अछि, जलमे डण्डा टेढ़ बुझाइत अछि, अस्पष्ट प्रकाशमे रस्सी साँप बुझा सकैत अछि। एहि तथ्यसँ “सभ
प्रत्यक्ष झूठ” नहि निकलैत अछि। उलटे, भ्रम चिन्हबाक लेल सेहो हम अन्य प्रत्यक्ष, स्पर्श, निकट अवलोकन,
उपकरण आ परस्पर तुलना उपयोग करैत छी।
विज्ञान इन्द्रियक सीमा दूर करबाक लेल दूरबीन, सूक्ष्मदर्शी, संवेदक, स्पेक्ट्रोमीटर, चित्रण तकनीक बनबैत
अछि। मुदा उपकरण सेहो सिद्धान्त, अंशांकन आ व्याख्या माँगैत अछि। “यन्त्र देखेलक” अन्तिम वाक्य नहि;
प्रश्न अछि--यन्त्र कोना काम करैत अछि, सीमा की, Ale कतेक?
4.3 स्मृति आ अतीत
व्यक्तिगत स्मृति छायाचित्र-जकाँ स्थिर अभिलेख नहि। मनुष्य भूलैत अछि, घटना पुननिर्मित करैत अछि,
बादक सूचना पुरान स्मृति प्रभावित कऽ सकैत अछि। तेँ आत्मकथा, मौखिक इतिहास आ प्रत्यक्षदर्शी गवाही
मूल्यवान होइतहुँ परीक्षण माँगैत अछि।
मुदा स्मृति त्रुटिपूर्ण अछि कहि Hs ओकरा निरर्थक मानब सेहो गलत। इतिहासकार अनेक स्मृति, दस्तावेज,
तिथि, भौतिक प्रमाण आ स्वतंत्र स्रोत मिलाकऽ अधिक विश्वसनीय चित्र बनबैत अछि। समानान्तर दर्शन एतय
“एक स्रोत बनाम शून्य स्रोत” नहि, “स्रोतसभक पारस्परिक परीक्षण” पर बल दैत अछि।
4.4 भाषा आ अवधारणाक सीमा
हम जे अनुभव करैत छी, ओकर वर्णन भाषा द्वारा करैत छी। भाषा वर्ग बनबैत अछि--रंगक नाम, सम्बन्धक
नाम, सामाजिक पद्, रोगक श्रेणी, राजनीतिक पहचान। वर्गीकरण उपयोगी अछि; बिना वर्गक विचार कठिन।
मुदा वर्ग वास्तविकताक सम्पूर्णता नहि।
“धर्म”, “जाति”, “राष्ट्र”, “आधुनिकता”, “न्याय”, “चेतना”--एहि शब्दसभक अर्थ इतिहास आ परम्परा
अनुसार बदलैत अछि। एक भाषाक शब्दके दोसर भाषामे सीधा समतुल्य मानि लेब भ्रम उत्पन्न करैत अछि।
एहि ग्रन्थमे संस्कृत, मैथिली, हिन्दी आ अंग्रेजी दार्शनिक पदसभक अनुवाद करैत समय अर्थक्षेत्र स्पष्ट राखब
आवश्यक अछि। समान शब्दरूप विचारक समानता सिद्ध नहि करैत अछि।
4.5 ज्ञान आ भाग्यः गेटियरक चुनौती
यदि ach केवल “सत्य विश्वास + उचित कारण” कहल जाए, तखन किछु एहन उदाहरण बनैत अछि जतय
वयक्तिक विश्वास सत्य आ उचित बुझाइत अछि, मुदा सत्यता संयोगवश होइत अछि। बीसम शताब्दीक
गेटियर-विमर्श एहि कठिनाईकेँ तीक्ष्ण रूप देलक। एकर महत्त्व ई नहि जे पश्चेमी ज्ञानमीमांसा एकटा पहेलीमे
ae; महत्त्व ई जे ज्ञानक सफलतामे केवल भीतरक विश्वास नहि, विश्वास आ जगतक उचित सम्बन्ध
आवश्यक अछि।
भारतीय प्रमाणमीमांसाक प्रक्रियाकेन्द्रित दृष्टि एहि प्रश्नसँ संवाद करबाक समृद्ध अवसर दैत अछि। यथार्थ
ज्ञानक उत्पादन विश्वसनीय कारण-प्रक्रियासँ जुड़ल हो--ई विचार आधुनिक विश्वसनीयतावाद आ न्यायीय
प्रमाण-विश्लेषण बीच तुलनात्मक संवाद खोलैत अछि, यद्यपि दुनू परम्पराके एक समान घोषित करब अनुचित
होयत।
4.6 आगमनक सीमा
हम अतीतक अनेक उदाहरण देखि भविष्यक अपेक्षा बनबैत छी। सूर्य प्रतिदिन उगल, तैँ काल्हियो उगत;
औषधि नियंत्रित परीक्षणमे बारम्बार प्रभावी भेल, ¢ समान परिस्थितिमे प्रभावी होयबाक सम्भावना अछि।
ह्यूमक प्रसिद्ध प्रश्न अछि-अतीत भविष्यक विश्वसनीय मार्गदर्शक किएक? ot उत्तर दी “कारण अतीतमे
एहन भेल”, तँ हम ओहि सिद्धान्तके ओहि सिद्धान्तसँ सिद्ध करैत छी।
व्यवहारमे विज्ञान आगमन त्यागैत नहि; सांख्यिकी, सम्भाव्यता, नियंत्रित परीक्षण, पुनरावृत्ति, कारणात्मक
मॉडल आ त्रुटि-मूल्यांकन द्वारा जोखिम व्यवस्थित करैत अछि। समानान्तर दर्शनक शिक्षा: अनिश्चितता ज्ञानक
विरोधी नहि; अनिश्चितताक माप स्वयं ज्ञानक भाग हो सकैत अछि।
4.7 अन्य मन आ निजी अनुभव
हम अपन पीड़ा प्रत्यक्ष अनुभव करैत छी, दोसराक पीड़ा संकेत, कथन आ व्यवहारसँ जानैत छी। एहि अन्तरसँ
“अन्य मन”क दार्शनिक समस्या उठैत अछि। मुदा सामाजिक जीवन एहि कारण रुकैत नहि। भाषा, चेहरा,
व्यवहार, शरीर, साझा जेविकता आ साक्ष्यक निरन्तरता दोसर व्यक्तिक अनुभव समझबाक पर्याप्त
व्यावहारिक आधार दैत अछि।
नेतिक दृष्टिसँ एतय विशेष सावधानी चाही। “हम तोहर पीड़ा प्रत्यक्ष नहि जानैत छी” कहि कऽ पीड़ाकें
अस्वीकार करब अनुचित। संगहि प्रत्येक आत्मवर्णनकें बिना सन्दर्भ सार्वभौम सिद्धान्त बनायब सेहो उचित
नहि। अनुभव सुनू, संदर्भ बुझू, आवश्यक स्थानपर स्वतंत्र प्रमाण जोड़।
4.8 सामाजिक स्थान आ ज्ञानक सीमा
ककरो सामाजिक स्थिति ओकरा किछु अनुभवक विशेष पहुँच दैत अछि आ किछु अनुभवसँ दूर राखैत अछि।
ग्रामीण स्त्रीक दैनिक जल-संकट पर ज्ञान शहरक नीति-विशेषज्ञसँ अधिक सूक्ष्म भऽ सकैत अछि; नीति-
विशेषज्ञक लगे क्षेत्रव्यापी आँकड़ा भऽ सकैत अछि जे एक व्यक्तिक अनुभवसँ बाहर। ज्ञानक लोकतन्त्र सभ
विशेषज्ञता बराबर करब नहि, बल्कि भिन्न ज्ञान-स्थानकें संवादमे आनब अछि।
समानान्तर दर्शन एहि कारण उपेक्षित स्वरकैँ शामिल करैत अछि। ई नैतिक प्रतिनिधित्व मात्र नहि; ज्ञानात्मक
आवश्यकता सेहो। जे समूह निर्णयक प्रभाव भोगैत अछि, ओकर अनुभव अनुपस्थित रहला सँ तथ्यक
महत्त्वपूर्ण पक्ष छूटि सकैत अछि।
4.9 संस्था आ संरचित अज्ञान
अज्ञान केवल “जानकारी नहि” नहि; कखनो संस्था एहन रूपमे बनल होइत अछि जे किछु प्रश्न पूछले नहि
जाइत अछि। राज्य केवल कर-संग्रहक आँकड़ा रखय, मुदा विस्थापनक सामाजिक लागत नहि; कम्पनी लाभ
मापय, मुदा अवैतनिक देखभालक प्रभाव नहि; इतिहास केवल राजकीय अभिलेख सुरक्षित रखय, श्रमिक
स्त्रीक मौखिक स्मृति नहि-तखन जे नापल नहि गेल से सार्वजनिक AMS बाहर भऽ सकैत अछि।
एहि प्रकारक संरचित अज्ञानक उत्तर कल्पना नहि, स्रोत-विस्तार अछि। नूतन प्रश्न, नूतन अभिलेख, मौखिक
इतिहास, क्षेत्र-अध्ययन, स्थानीय भाषा स्रोत, भौतिक प्रमाण--ई सभ ज्ञानक्षेत्र विस्तृत करैत अछि।
4.10 “अज्ञात”, “अज्ञेय” आ “एखन अज्ञात”
ई तीन शब्द अलग राखब आवश्यक अछि। “हमरा नहि मालूम” व्यक्तिगत अज्ञान। “एखन उपलब्ध प्रमाणसँ
नहि मालूम” सामूहिक वा वर्तमान सीमा। “सिद्धान्ततः जानल नहि जा सकैत” अज्ञेयताक कठोर दार्शनिक
दावा। पहिल दू अवस्थासँ तेसर निष्कर्ष स्वतः नहि निकलैत अछि।
इतिहासमे अनेक वस्तु एक समय अज्ञात छल, बादमे ज्ञात भेल। संगहि किछु प्रश्न एहन हो सकैत अछि जतय
प्रमाण मूलतः सीमित--जैसे प्राचीन घटनाक सूक्ष्म विवरण, जकर अभिलेख नष्ट। विद्वानक ईमानदारी एहि
सीमा स्पष्ट करबमे अछि, रिक्त स्थान कल्पनासँ भरबमे नहि।
4.11 ज्ञानात्मक विनम्रता
विनम्रता अपन Ach कम आँकब नहि। प्रमाण मजबूत हो तेँ स्पष्ट निष्कर्ष देबाक साहस चाही। विनम्रता एहि
बातक चेतना अछि जे हमर निष्कर्ष प्रमाणपर निर्भर, नव सूचना पर संशोध्य, आ हमर दृष्टि सीमित हो सकैत
अछि।
समानान्तर दर्शन चारि स्तरक भाषा प्रस्तावित करेत अछि: “प्रमाणित/ मजबूत Sua समर्थित”, “सम्भावित”,
“विवादित”, “अज्ञात”। एहि स्तरसभक स्पष्ट उपयोग इतिहास, दर्शन आ सामाजिक विश्लेषणमे झूठी
निश्चितता घटा सकैत अछि।
4.12 पूर्वपक्ष: जँ ज्ञान संशोध्य अछि तँ सत्य कोना?
आपत्ति: आजक ज्ञान काल्हि बदलि सकैत अछि, तखन आज ओकरा ज्ञान किएक कहब?
उत्तरः संशोध्यता असत्यताक पर्याय नहि। नक्शा सुधारल जा सकैत अछि, मुदा पुरान नक्शा पूर्णतः निरर्थक
नहि। वैज्ञानिक सिद्धान्त अधिक सटीक होइत अछि, इतिहास नूतन स्रोतसँ विस्तृत होइत अछि। ज्ञानक दाबी
उपलब्ध सर्वोत्तम कारणक आधारपर होइत अछि, भविष्यक सर्वज्ञ दृष्टिसँ नहि।
अध्याय-निष्कर्ष
मानवीय ज्ञान सीमित अछि, मुदा सीमा पहचानि कऽ ज्ञान अधिक विश्वसनीय ata अछि। इन्द्रिय, स्मृति,
भाषा, अनुमान, संस्था, सामाजिक स्थान आ ऐतिहासिक स्रोत--सभ शक्ति आ सीमा दुनू रखैत अछि।
समानान्तर दर्शन न सर्वज्ञताक दावा करेत अछि, न सर्वसंशय स्वीकारैत अछि। ओकर सूत्र-“ज्ञान सम्भव
अछि, मुदा संशोध्य अछि”-_दार्शनिक विनम्रता आ सार्वजनिक जिम्मेवारी दुनूकें एक संग राखैत अछि।
अध्याय-ग्रन्थसूची
David Hume — An Enquiry Concerning Human Understanding.
Edmund Gettier — “Is Justified True Belief Knowledge?”
Bimal Krishna Matilal — Perception.
Stephen H. Phillips — Epistemology in Classical India.
Timothy Williamson — Knowledge and Its Limits.
Stanford Encyclopedia of Philosophy — “Epistemology”; “Skepticism”;
“A Priori Justification and Knowledge”.