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समानान्तरता विरोधक दोसर नाम नहि। एकटा मुख्य सड़कक बगलमे समानान्तर बाट रहि सकैत अछि; कखनो
मुख्य सड़क उपयोगी, कखनो अवरुद्ध, कखनो ओकर निर्माणे एहन जे अनेक बस्ती पहुँचसँ बाहर। समानान्तर
दर्शन मुख्यधाराकेँ तोड़ि देबाक परियोजना नहि; ज्ञानक मार्ग-विन्यासकें विस्तृत करबाक पद्धति अछि। एकर
लक्ष्य छूटल स्रोत जोड़ब, स्थापित तर्कक कठोर परीक्षण करब, परम्परासभकें संवादमे आनब आ अपन
निष्कर्षके सेहो आलोचनासँ मुक्त नहि राखब।
5.1 पद्धतिक आवश्यकता
“समानान्तर दर्शन” जँ केवल भावनात्मक घोषणा रहि जाए--“हमर परम्परा महान”-तँ ई दर्शन नहि।
स्वतंत्र दार्शनिक पद्धति लेल स्पष्ट नियम चाही: स्रोत कोना चुनल जाए? प्रतिपक्ष कोना प्रस्तुत? अनुवाद
कोना? ऐतिहासिक दाबी आ मौलिक प्रतिपादन कोना अलग? मिथिला, भारत आ पाश्चात्य परम्पराक तुलनामे
समानता आ भिन्नता कोना मापल जाए? सामाजिक हाशियाक स्वर जोड़ैत समय प्रमाणक कसौटी बदलत
की समान रहत?
एहि अध्यायमे समानान्तर दर्शनक कार्यपद्धति व्यवस्थित कएल जा रहल अछि। आगाँक सम्पूर्ण ग्रन्थ एहि
पद्धतिक प्रयोग होयत।
5.2 पहिल नियमः विषयकेँ स्पष्ट परिभाषित करू
दार्शनिक विवादक आधा भ्रम शब्दक अस्पष्टतासँ उत्पन्न होइत अछि। “धर्म”, “आत्मा”, “स्वतंत्रता”,
“समानता”, “आधुनिकता”, “राष्ट्र”, “ज्ञान”-प्रत्येक शब्द अनेक अर्थ रखैत अछि। तर्क आरम्भ करबाक
पहिने WAH अर्थक्षेत्र स्पष्ट हो।
परिभाषा बहुत सँकरी हो तँ महत्त्वपूर्ण उदाहरण बाहर; बहुत व्यापक हो तँ भेद नष्ट। तँ समानान्तर पद्धति
कार्यपरिभाषासँ आरम्भ करैत अछि, तकर सीमा स्पष्ट करैत अछि आ अध्याय ada परिभाषा संशोधित
करबाक अनुमति दैत अछि। विश्लेषणात्मक दर्शनमे अवधारणात्मक विश्लेषणक विविध रूप, आ नव्य-न्यायमे
अवच्छेद-सचेत परिभाषा-दुनू एहि अनुशासनक अलग उदाहरण प्रदान करेत अछि।
5.3 दोसर नियमः स्रोतक स्तर अलग करू
प्राथमिक स्रोत-मूल ग्रन्थ, पत्र, अभिलेख, भाषण, शिलालेख, समकालीन दस्तावेज।
द्वितीयक स्रोत--सम्पादित संस्करण, अनुवाद, शोधग्रन्थ, विद्वत् लेख।
तृतीयक स्रोत--विश्वकोश, पाठ्यपुस्तक, सामान्य सारांश।
लोक-स्रोत-मौखिक स्मृति, गीत, कथा, स्थानीय अभिलेख, पारिवारिक पञ्जी, सामुदायिक परम्परा।
समानान्तर दर्शन लोक-स्रोतकें स्वतः निम्न नहि मानैत, मुदा ओकर प्रकृति स्पष्ट करेत अछि। मौखिक स्मृति
राजकीय आदेश-जकाँ प्रमाण नहि; राजकीय आदेश सेहो निष्पक्ष आत्मवर्णन नहि। प्रत्येक स्रोतक प्रश्न अलग:
के बनौलक? कखन? कोन उद्देश्य? प्रसारण कोना? पाठभेद? स्वतंत्र पुष्टि? मौन की?
5.4 तेसर नियमः पूर्वपक्षके सबल रूपमे प्रस्तुत करू
प्रतिपक्षकें जानि-बुझि कऽ दुर्बल बनाकऽ हराएब बौद्धिक छल अछि। भारतीय शास्त्रार्थ परम्परामे पूर्वपक्ष-
उत्तरपक्षक संरचना एहि कारण महत्त्वपूर्ण अछि। समानान्तर दर्शन “सबल प्रतिपक्ष” सिद्धान्त अपनबैत अछि:
विरोधी मतक समर्थक जँ हमर वर्णन पढ़थि तँ कहि सकथि--“हाँ, हमर तर्क ठीक रूपमे प्रस्तुत अछि।”
एहि नियमक आधुनिक लाभ विशेष अछि। राजनीतिक आ धार्मिक बहसमे विरोधीकें चरम, हास्यास्पद रूपमे
प्रस्तुत करब सहज अछि। दर्शनक अनुशासन एहि प्रवृत्तिक प्रतिरोध करेत अछि। आलोचना तखन मूल्यवान
जखन ओ असली तर्कक उत्तर दैत अछि।
5.5 चारिम नियमः वाद, जल्प आ वितण्डाक भेद
न्याय परम्परा सत्य-अन्वेषी वाद आ विजय-केन्द्रित विवादक भेद चिन्हैत अछि। वादमे पक्षसभक उद्देश्य
विषयक यथार्थ निर्णय; जल्पमे विजय; वितण्डामे अपन सकारात्मक मत स्थापित किए बिना केवल प्रतिपक्षक
खण्डन। आधुनिक सार्वजनिक जीवनमे एहि भेदक अपार प्रासंगिकता अछि।
दूरदर्शन बहस, सामाजिक माध्यम, दलगत वाद-विवादमे कखनो प्रश्न सत्यक नहि, प्रदर्शनक होइत अछि।
समानान्तर दर्शन Teach आदर्श मानैत अछि: स्पष्ट दावा, स्वीकार्य प्रमाण, परिभाषित शब्द, प्रतिपक्षक उत्तर,
भूल स्वीकारबाक सम्भावना। जल्प आ वितण्डाकें पहचानब सेहो पद्धतिक भाग अछि, कारण प्रत्येक बहस
ज्ञान उत्पन्न करबाक लेल नहि होइत अछि।
5.6 पाँचम नियम: प्रमाणक समान कसौटी
अपन प्रिय परम्पराक लेल नरम आ विरोधीक लेल कठोर प्रमाण-कसौटी--ई पक्षपात अछि। जँ पाश्चात्य
दार्शनिकक तिथि लेल आलोचनात्मक संस्करण Arta छी, मिथिलाक दार्शनिकक तिथि लेल सेहो स्रोत चाही।
जँ राजकीय इतिहासक दाबी पर संदेह करैत छी, लोककथा पर सेहो उचित जाँच चाही।
समानताक अर्थ सभ स्रोत एकहि प्रकारक नहि; अर्थ ई जे प्रमाणक भार दाबीक प्रकृतिसँ तय हो, भावनात्मक
निकटतासँ नहि। असाधारण दाबी अधिक स्पष्ट स्रोत माँगैत अछि। अनिश्चित स्रोत हो तँ निष्कर्षक भाषा सेहो
अनिश्चित रहय।
5.7 छठम नियमः इतिहास आ दर्शन अलग, मुदा संवादरत
ऐतिहासिक प्रश्न--“अमुक ग्रन्थ कखन लिखल गेल?” दार्शनिक प्रश्न-“ओकर तर्क वैध अछि?” दुनू
अलग। गलत तिथि सही तर्ककें स्वतः गलत नहि Hea अछि; सही तिथि गलत तर्ककेँ सही नहि। मुदा
ऐतिहासिक प्रसंग तर्कक अर्थ बुझबाक लेल महत्त्वपूर्ण।
समानान्तर दर्शन पहिने ऐतिहासिक स्थितिक यथासम्भव स्रोतसम्मत पुनर्निर्माण करैत अछि, तकर बाद
दार्शनिक मूल्यांकन। एहि क्रमसँ वर्तमान अवधारणाकें अतीतपर जबरन थोपबाक अनेतिहासिकता Tet अछि।
5.8 सातम नियमः अनुवादके दार्शनिक समस्या मानू
“प्रमाण” = evidence लिखि देब सदैव पर्याप्त नहि; pramana ज्ञान-उत्पादक साधनक तकनीकी अर्थ
रखैत अछि। “धर्म” = religion सेहो अनेक सन्दर्भमे अधूरा; धर्म कर्तव्य, व्यवस्था, गुण, शिक्षण, धार्मिक
परम्परा आदि अर्थ AS सकैत अछि। “आत्मन्”, “self”, “person”, “subject” समानार्थी मानलासँ
गम्भीर भ्रम उत्पन्न भऽ सकैत अछि।
तँ समानान्तर पद्धति तकनीकी पदक पहिल उपयोगपर मूल पद, कार्यार्थ आ अनुवाद सीमा स्पष्ट करैत अछि।
तुलनात्मक दर्शन शब्द-समानता नहि, समस्या-समानता, तर्क-संरचना आ ऐतिहासिक भिन्नता देखैत अछि।
5.9 आठम नियम: तुलनाक तीन स्तर
पहिल, विषयगत तुलना: दुनू परम्परा ज्ञान पर चर्चा करेत अछि। ई सबसँ कमजोर समानता।
दोसर, समस्या-संरचनात्मक तुलना: न्यायमे व्याप्ति आ GAA आगमन-ुनू ज्ञात उदाहरणसँ सामान्य
सम्बन्धक औचित्यक प्रशन छुबैत अछि, मुदा ऐतिहासिक भाषा आ समाधान भिन्न। ई अधिक फलदायी तुलना।
तेसर, तर्क-संवाद: एक परम्पराक तर्क दोसराक आपत्तिक उत्तर eS सकैत अछि की? एतय वास्तविक
तुलनात्मक दर्शन आरम्भ होइत अछि।
समानान्तर दर्शन तेसर स्तर धरि पहुँचनाइ चाहैत अछि, मुदा झूठी समानता बिना। “गङ्गेश पहिनहि आधुनिक
विश्लेषणात्मक दर्शन कहि देने छलाह” जकाँ विजयवादी कथन दार्शनिक अध्ययनकें नुकसान Hed अछि।
ऐतिहासिक स्वतन्त्रता सम्मानित रहय।
5.10 नवम नियमः केन्द्र आ हाशिया दुनूक अध्ययन
मुख्य ग्रन्थ उपलब्ध होइत अछि कारण संस्थासभ ओकरा सुरक्षित रखैत अछि। हाशियाक ज्ञान मौखिक,
क्षेत्रीय भाषा, स्त्रीक गीत, श्रमिक व्यवहार, स्थानीय दस्तावेज अथवा नष्ट होइत स्मृतिमे रहि सकैत अछि।
समानान्तर दर्शन एहि अनुपस्थितिकें विषय बनबैत अछि।
मुदा “हाशिया” स्वयं एकरूप नहि। कोनो समुदाय एक सन्दर्भमे पीड़ित, दोसरमे प्रभुत्वशाली हो सकैत अछि।
जाति, वर्ग, लिंग, भाषा, क्षेत्र आ धर्मक सम्बन्ध जटिल। तेँ केन्द्र-हाशिया विश्लेषण स्थिर नैतिक लेबल नहि,
सत्ता-संरचनाक परीक्षण अछि।
5.11 दसम नियमः अनुभव आ सिद्धान्तक परस्पर परीक्षण
दार्शनिक सिद्धान्त दैनिक अनुभवसँ पूर्णतः कटि जाए तँ खोखला अमूर्तन बनि सकैत अछि; केवल अनुभव
सिद्धान्त बिना बिखरल विवरण। आधुनिक नैतिक दर्शनमे “प्रतिबिम्बी संतुलन”क पद्धति विशिष्ट निर्णय,
सामान्य सिद्धान्त आ पृष्ठभूमि ज्ञानकेँ परस्पर संशोधित करेत आगे बढ़ेत अछि। समानान्तर दर्शन एहि व्यापक
Helga अपन रूपमे ग्रहण करैत अछि: सिद्धान्त उदाहरण जाँचय, उदाहरण सिद्धान्त जाँचय, आ नव प्रमाण
दुनूकें बदलि सकय।
मुदा संगति मात्र पर्याप्त नहि। यदि पूरा विश्वास-तन्त्र पूर्वग्रहग्रस्त अछि तँ भीतरक संतुलन अन्यायपूर्ण रहि
सकैत अछि। तेँ बाह्य स्रोत, विरोधी दृष्टि, ऐतिहासिक अनुभव आ प्रभावित समुदायक स्वर आवश्यक अछि।
5.12 विश्लेषण, वंशावली आ प्रघटनात्मक वर्णन
कोनो एक दार्शनिक विधि सभ प्रश्न लेल पर्याप्त नहि। अवधारणात्मक विश्लेषण शब्द आ तर्क स्पष्ट करैत
अछि। वंशावली पूछैत अछि-कोनो मूल्य वा श्रेणी ऐतिहासिक रूपसँ कोना बनल? प्रघटनात्मक वर्णन अनुभव
कतेक रूपमे प्रकट होइत अछि से देखैत अछि। विज्ञान आ सामाजिक शोध अनुभवजन्य तथ्य दैत अछि।
पाठालोचना ग्रन्थक रूप आ पाठभेद जाँचैत अछि।
समानान्तर दर्शन पद्धतिगत बहुलता स्वीकारैत अछि, मुदा “जे मन पड़ल से विधि” नहि। प्रश्नक प्रकृति अनुसार
विधि चुनल जाए आ चयनक कारण स्पष्ट हो।
5.13 मौलिक प्रतिपादन आ स्रोतक भेद
एहि ग्रन्थमे “समानान्तर दर्शन”क अनेक सूत्र लेखकक स्वतंत्र दार्शनिक प्रतिपादन छथि-जैसे बहुप्रमाणीय
विवेकवाद, सहअस्तित्वात्मक यथार्थवाद, गरिमा-आधारित नैतिकता, बहुकेन्द्रिक लोकतन्त्र। एहि प्रतिपादनकेँ
प्राचीन ग्रन्थपर आरोपित नहि कएल जाएत। प्राचीन वा आधुनिक स्रोत प्रेरणा, तर्क अथवा प्रतिपक्ष देत;
मौलिक संश्लेषण स्पष्ट रूपसँ वर्तमान प्रतिपादन रहत।
ई भेद बौद्धिक ईमानदारी लेल अनिवार्य अछि। “फलां प्राचीन दार्शनिक वास्तवमे हमर आधुनिक सिद्धान्ते कहैत
छलाह” जकाँ दावा ऐतिहासिक जटिलता मिटा दैत अछि। समानान्तर दर्शन परम्परासँ संवाद करैत अछि,
परम्पराक अपन मुखपत्र नहि बनबैत अछि।
5.14 पद्धतिक बारह चरण
समानान्तर दार्शनिक अध्ययनक कार्य-क्रम एहि प्रकार राखल जा सकैत अछिः
1. प्रशन स्पष्ट करू।
2. प्रमुख तकनीकी पद परिभाषित HSI
3. प्राथमिक आ विश्वसनीय द्वितीयक स्रोत चिन्हित Hel
A, ऐतिहासिक प्रसंग अलग स्थापित करू।
5. मूल मतके ओकर सबलतम रूपमे प्रस्तुत Hel
6. प्रमुख प्रतिपक्ष आ आपत्ति प्रस्तुत करू।
7, प्रमाणक प्रकार आ सीमा चिन्हित करू।
8. तुलनीय भारतीय, मिथिला, पाश्चात्य अथवा सामाजिक परम्परा चुनू।
9. समानता संग भिन्नता स्पष्ट करू।
10. वर्तमान जीवन वा ज्ञानक WAS सम्बन्ध जाँचू।
11. स्वतंत्र समानान्तर निष्कर्ष दिअ, Gide Aces स्पष्ट भेद राखि।
12. निष्कर्षक सीमा, अनिश्चितता आ भविष्यक आपत्ति लेल खुलापन लिखू।
एहि बारह चरणक उद्देश्य प्रत्येक अध्यायकें यान्त्रिक साँचा बनायब नहि; बौद्धिक जवाबदेही सुनिश्चित करब
अछि।
5.15 पद्धतिक नैतिकता
दर्शन केवल तार्किक शुद्धता नहि; व्याख्याक नैतिकता सेहो। मृत लेखक अपन उत्तर नहि दे सकैत छथि,
अल्पसंख्यक समुदायक कथन आसानीसँँ विकृत भऽ सकैत अछि, अनुवाद शक्ति-सन्तुलन बदलि सकैत
अछि। तें उद्धरण सन्दर्भसहित, आलोचना न्यायपूर्ण, अनिश्चितता स्पष्ट, आ उपेक्षित स्वरक प्रतिनिधित्व
सावधान हो।
विशेष रूपसँ सामाजिक-राजनीतिक दर्शनमे पीड़ा “उदाहरण” मात्र नहि। जाति, लिंग, गरीबी, हिंसा, धार्मिक
दमन आ विस्थापनक चर्चा वास्तविक मनुष्यक अनुभवसँ जुड़ल अछि। दार्शनिक दूरी आवश्यक, अमानवीय
निर्लिप्तता नहि।
5.16 आत्मसमीक्षाः समानान्तर दर्शन स्वयं कसौटीपर
जँ समानान्तर दर्शन मुख्यधारासँ प्रमाण माँगैत अछि तँ अपन दाबी सँ सेहो माँगत। जँ ओ बहुलता समर्थित
करैत अछि तँ आलोचकक स्वर स्वीकारत। जँ ओ सत्ता-समीक्षा करैत अछि तँ अपन लेखकत्व, चयन आ
मौनक सत्ता सेहो जाँचत। एहि आत्मसमीक्षा बिना समानान्तर दर्शन नूतन “मुख्यधारा” बनबाक जोखिम रखैत
अछि।
एहि कारण पद्धतिक पाँच मूल प्रतिज्ञा पुनः स्थापित होइत अछि: स्थापित विचारक सबल रूपमे बुझू; ओकर
इतिहास देखू; छूटल स्वर खोजू; विरोधी विचारक प्रत्यक्ष संवादमे आनू; अपन निष्कर्षकें संशोधन लेल खुला
रखू।
पूर्वपक्षः एतेक पद्धति दर्शनक सृजनात्मकता मारि देत
कहल जा सकैत अछि जे स्रोत, परिभाषा, प्रमाण, पूर्वपक्ष, अनुवाद, ऐतिहासिक सावधानी--एतेक नियमसँ
दर्शन केवल शुष्क शोध बनि जाएत।
उत्तरपक्षः अनुशासन सृजनात्मकताक शत्रु नहि
संगीतमे रागक व्याकरण सृजन रोकी नहि; उलटे सूक्ष्मता सम्भव करेत अछि। दार्शनिक अनुशासन कल्पनाकें
तथ्यक वेशमे प्रस्तुत होएबासँ रोकैत अछि। स्वतंत्र प्रतिपादन तखन अधिक शक्तिशाली होइत अछि जखन
पाठक जानैत छथि जे इतिहास कतय समाप्त आ लेखकक नूतन तर्क HATS आरम्भ।
अध्याय-निष्कर्ष
समानान्तर दर्शनक पद्धति न तऽ केवल तुलनात्मक दर्शन, न केवल क्षेत्रीय इतिहास, न केवल सामाजिक
आलोचना। ई स्रोत-समीक्षा, अवधारणात्मक स्पष्टता, प्रमाणमीमांसा, सबल पूर्वपक्ष, बहुपद्धति, इतिहास-
सचेत तुलना, केन्द्र-हाशिया विश्लेषण आ आत्मसमीक्षाक संयुक्त अनुशासन अछि। एहि पद्धतिक उद्देश्य नूतन
कट्टरता बनायब नहि, बल्कि एहन दार्शनिक क्षेत्र बनायब अछि जतय मिथिला, भारतीय, पाश्चात्य, सामाजिक,
राजनीतिक आ धार्मिक परम्परासभ समान आलोचनात्मक गरिमासँ संवाद Hs सकथि।
अध्याय-ग्रन्थसूचौ
गौतम — Nyaya-sitra.
वात्स्यायन — Nyaya-bhasya.
गङ्गेश उपाध्याय — Tattvacintamani.
Bimal Krishna Matilal — Logic, Language and Reality.
Jonardon Ganeri— Philosophy in Classical India.
John Rawls — A Theory of Justice.
Stanford Encyclopedia of Philosophy — “Analysis”; “Argument and
Argumentation”; “Reflective Equilibrium”.
Internet Encyclopedia of Philosophy — “Nyaya”.