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भारतीय दर्शनक प्राचीनतम पृष्ठभूमिकें एकटा तैयार सिद्धान्तक इतिहासक रूपमे पढ़ब उचित नहि। वैदिक
साहित्य, ब्राह्मण, आरण्यक आ उपनिषदसभमे अनुष्ठान, देवता, जगत-उत्पत्ति, वाक्, मृत्यु, आत्मा, कर्म, ज्ञान
आ मुक्ति सम्बन्धी अनेक स्वर एक-दोसरासँ संवाद Hea, बदलैत आ कखनो विरोध सेहो Hea अछि। एहि
बहुवचन GARE बादक व्यवस्थित दर्शनसभक प्रश्न उभरैत अछि।
6.1 ऋग्वैदिक प्रश्नः सृष्टिक निश्चित कथा नहि
ऋग्वेदमे विश्वोत्पत्तिक अनेक कल्पना भेटैत अछि। प्रसिद्ध नासदीय सूक्त अस्तित्व आ अनस्तित्व, अन्धकार,
इच्छा आ सृष्टिक मूल पर प्रश्न उठबैत अछि, आ अन्तमे ज्ञानक सीमा पर असाधारण संशय व्यक्त करेत
अछि-सृष्टिक अंतिम रहस्य स्वयं सर्वोच्च पर्यवेक्षक जानैत छथि की नहि, एहि प्रश्नकें सेहो खुला राखैत
अछि।
एहि सूक्तक महत्त्व एहि बातमे नहि जे ओ आधुनिक cosmology क वैज्ञानिक सिद्धान्त देलक; महत्त्व ई
जे धार्मिक काव्यक भीतर स्वयं ज्ञानक सीमा आ सृष्टिक कारण पर प्रश्न उपस्थित अछि। समानान्तर दर्शन
एहि संशयशील स्वरकेँ भारतीय बौद्धिक परम्पराक एक महत्त्वपूर्ण आरम्भिक रूप मानैत अछि।
6.2 ऋत, यज्ञ आ विश्व-व्यवस्था
वैदिक संसारमे ऋत--व्यवस्था, नियमितता, सत्य-संगत विश्वक्रम-एक महत्त्वपूर्ण धारणा अछि। यज्ञ केवल
निजी धार्मिक कर्म नहि, सामाजिक आ ब्रह्माण्डीय व्यवस्था सँ सम्बद्ध अनुष्ठानक रुपमे विकसित भेल। मंत्र,
उच्चारण, क्रम, पात्र, दान आ समयक शुद्धता द्वारा मनुष्य विश्व-व्यवस्थामे भाग लेत अछि--एहन धार्मिक-
अनुष्ठानिक कल्पना ब्राह्मण साहित्यमे अत्यन्त विकसित होइत अछि।
मुदा बादक उपनिषदिक चिन्तनकें यज्ञ छोड़ि दर्शन शुरू भेल? जकाँ सरल रेखा बनायब गलत। उपनिषद अनेक
बेर यज्ञीय पदके भीतरक ज्ञान, प्राण, ध्यान वा प्रतीकात्मक सम्बन्धक रूपमे पुनर्व्याख्यायित करैत अछि।
अस्वीकार, रूपान्तरण आ निरन्तरता एकसाथ भेटैत अछि।
6.3 बाह्य अनुष्ठानसँ अन्तर्मुख प्रशन
आरण्यक आ उपनिषदिक साहित्यक एक प्रमुख प्रवृत्ति ई अछि जे बाह्य अनुष्ठानक अर्थ शरीर, प्राण, मन,
वाक्, स्मृति आ चेतनाक संरचनासँ जोड़ल जाए। यज्ञक वेदी ब्रह्माण्ड वा शरीरक प्रतीक बनि सकैत अछि;
मंत्रक शक्ति वाक् आ ज्ञानक प्रश्न खोलैत अछि; प्राण देवतासभक बीच भ्रेष्ठता-विमर्शक विषय बनेत अछि।
ई “आध्यात्मिकता बनाम कर्मकाण्ड'क सरल संघर्ष नहि। अनेक पाठमे कर्म आ ज्ञानक सम्बन्ध जटिल अछि।
किछु ठामज्ञान कर्मके अधिक गूढ़ अर्थ दैत अछि; किछु ठाम आत्मज्ञान बाह्य साधनसं श्रेष्ठ घोषित होइत अछि।
6.4 उपनिषद एक पुस्तक नहि, संवादक परिवार
“उपनिषद” नाम अनेक काल, शैली आ बौद्धिक परिस्थिति मे रचल ग्रन्थसभक समूहक संकेत अछि।
बृहदारण्यक आ छान्दोग्य प्राचीनतम प्रमुख उपनिषदसभमे गिनल जाइत अछि; केन, कठ, ईश, प्रश्न, मुण्डक
आदि अलग स्वर आ दार्शनिक बल रखैत अछि। एहि साहित्यक एकहि व्यवस्थित दर्शन मानि पढ़ला सँ
वास्तविक मतभेद नष्ट भऽ जाइत अछि।
कहीं आत्मा ब्रह्मसँ गहन सम्बन्धमे; कहीं मृत्यु-पश्चात गतिक प्रश्न; कहीं प्राणक प्रधानता; कहीं ज्ञान आ कर्मक
भेद; कहीं अवर्णनीय परम वास्तविकता पर बल। समानान्तर दर्शन उपनिषदिक बहुवचनताकें ऐतिहासिक
समस्या नहि, दार्शनिक संसाधन मानैत अछि।
6.5 आत्मन्ः ‘GH’ के?
उपनिषदिक चिन्तनक केन्द्रमे आत्मन् सम्बन्धी प्रश्न बारम्बार उठैत अछि। मनुष्य शरीर अछि? श्वास? इन्द्रिय?
मन? स्मृति? इच्छा? ज्ञान? की एहि परिवर्तनशील अवस्थासभक पाछाँ कोनो गहन आत्मा अछि?
बृहदारण्यक उपनिषदमे याज्ञवल्क्यक संवादसभ AHI साधारण वस्तु-जकाँ पकड़ि लेल जा सकय एहन
सत्ता नहि मानैत। “नेति नेति’ प्रकारक निषेधात्मक भाषा बतबैत अछि जे आत्मा/परम वास्तविकताकें परिचित
गुणक सूचीमे पूर्णतः समेटब कठिन। एहि पद्धतिमे ज्ञान सकारात्मक परिभाषा मात्र नहि; गलत तादात्म्य हटेनाइ
सेहो अछि।
6.6 ब्रह्मः मंत्रसँ परम आधार धरि
ब्रह्मन्? शब्दक अर्थ वैदिक इतिहासमे विकसित होइत अछि। मंत्र, पवित्र वाणी वा अनुष्ठानिक शक्ति सम्बन्धी
ata उपनिषदिक सन्दर्भमे ई जगत, ज्ञान आ अस्तित्वक परम आधारक दार्शनिक अर्थ ग्रहण करैत अछि।
मुदा सभ उपनिषद ब्रह्मकें एकहि परिभाषामे नहि रखैत।
छान्दोग्यक शिक्षासभ अस्तित्वक मूल एकता आ जीवक गहन आधारक सम्बन्ध पर बल दैत अछि; बृहदारण्यक
परम वास्तविकताकें सकारात्मक आ निषेधात्मक दुनू भाषामे खोजैत अछि। बादक वेदान्त विद्यालय एहि
वाक्यसभक भिन्न व्याख्या करैत अछि--ई तथ्य cada अछि जे उपनिषदिक पाठ स्वयं बादक अद्वैत,
विशिष्टाद्वैत वा द्वैतक तैयार रूप नहि।
6.7 उद्दालक आ श्वेतकेतुः पदार्थ, जीवन आ आत्मबोध
छान्दोग्य उपनिषदक उद्दालक-श्वेतकेतु संवाद शिक्षा-पद्धतिक दृष्टिसँ महत्त्वपूर्ण अछि। गुरु केवल निष्कर्ष
घोषित नहि करैत, माटि-घट, धातु, बीज, लवण आदि उदाहरणद्वारा दृश्य विविधताक पाछाँ सामान्य आधार
बुझाबयक प्रयास करैत छथि। “एक जानला सँ अनेक कोना जानल जाए?'-ई प्रशन ज्ञानक संगठनक समस्या
अछि।
एहि संवादकें आधुनिक chemistry वा physics क पूर्वाभास मानब उचित नहि। एकर लक्ष्य
तत्त्वमीमांसीय आ आत्मविद्यात्मक अछि। मुदा उदाहरण, सामान्यीकरण आ प्रत्यक्ष अनुभवक उपयोग
दार्शनिक शिक्षाक प्राचीन पद्धति अवश्य देखबैत अछि।
6.8 याज्ञवल्क्य आ मैत्रेयी: धन, प्रेम आ अमरत्व
बृहदारण्यक उपनिषदमे याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद एकटा गहन प्रश्न उठबैत अछि--धन मनुष्यकें अमरत्व दऽ
सकैत अछि की? उत्तर नकारात्मक। संवाद प्रेमक संरचनाकें सेहो आत्मा-सापेक्ष विश्लेषण करैत अछि: प्रिय
वस्तु अपनेमे नहि, आत्मासँ सम्बन्ध कारण प्रिय--एहन तर्क प्रस्तुत होइत अछि।
एहि अंशके आधुनिक मनोवैज्ञानिक स्वार्थवादक सरल रूप नहि मानबाक चाही। प्रश्नक पृष्ठभूमि अमरत्व,
आत्मज्ञान आ अस्तित्वक अंतिम मूल्य अछि। तथापि ई संवाद “मनुष्य ककरा लेल चाहैत अछि?” नैतिक-
मनोवैज्ञानिक प्रश्न खोलैत अछि।
6.9 गार्गी: Wet सीमा आ निर्भीकता
बृहदारण्यकक जनक-सभामे गार्गी वाचक्नवी याज्ञवल्क्यसँ जगतक अंतिम आधार पर लगातार प्रश्न करेत
छथि-जे किछु 'ओत-प्रोत? अछि, ओ स्वयं ककरामे? प्रश्न कारण-शृंखलाकें अधिकाधिक गहन स्तर दिस
AS जाइत अछि।
एहि संवादक ऐतिहासिक महत्त्व केवल ‘UH Si दार्शनिक”क प्रतीकात्मक उल्लेख नहि। ओ सार्वजनिक
शास्त्रार्थमे ब्रह्मविद्याक मूल प्रश्न उठबैत छथि। तथापि एक उदाहरणसँँ प्राचीन समाजक सम्पूर्ण लैंगिक
समानता सिद्ध नहि कएल जा सकैत। समानान्तर दर्शन प्रतिनिधि उदाहरण आ व्यापक सामाजिक संरचनाक
बीच भेद रखैत अछि।
6.10 नचिकेताः मृत्युर्के प्रशन
कठोपनिषदमे नचिकेता मृत्यु-देव GAS धन, दीर्घायु आ सुखक आकर्षक प्रस्ताव छोड़ि मृत्यु-पश्चात मनुष्यक
स्थिति पूछैत अछि। कथा दार्शनिक विकल्पक रूप धारण करेत अछि--श्रेय आ प्रेय, स्थायी आ क्षणिक,
आत्मबोध आ विषयासक्ति।
रथरूपकमे शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि आ आत्माक सम्बन्ध एक अनुशासनात्मक ASA प्रस्तुत होइत अछि।
बादक सांख्य-योगक संरचनासँ तुलना सम्भव, मुदा कठोपनिषदकें पूर्ण विकसित सांख्यक ग्रन्थ Hed
अनेतिहासिक होयत।
6.11 केनोपनिषद: ज्ञानक विडम्बना
केनोपनिषद पूछैत अछि-मन ककर प्रेरणासँ सोचैत अछि? वाणीकें वाणी देनिहार की? आँखिक दृष्टिक पाछाँ
की? उत्तर परम तत्त्वके साधारण ज्ञेय वस्तु जकाँ पकड़ब कठिन बतबैत अछि। जे सोचैत अछि “हम पूर्णतः
जानि लेलहुँ', संभवतः ओ नहि जानलक; जे अपन ज्ञानक सीमा gate अछि, ओ अधिक निकट।
ई आत्म-विरोधी अज्ञानक महिमामण्डन नहि। प्रश्न अछि-ज्ञाता स्वयं ज्ञानक वस्तु कोना बनत? चेतनाकें
बाहरी वस्तु-जकाँ पूर्णतः वस्तुकरण सम्भव की? ई प्रश्न आधुनिक philosophy of mind धरि जीवित
अछि।
6.12 कर्म आ पुनर्जन्मक विकसित धारणा
उपनिषदिक साहित्यमे कर्म बाह्य अनुष्ठानक अर्थसँ नैतिक-जीवनगत परिणामक व्यापक सिद्धान्त दिस
विकसित होइत देखाइत अछि। कर्म, ज्ञान, इच्छा आ मृत्यु-पश्चात गति बीच सम्बन्धक अनेक रूप भेटैत अछि।
एकहि सर्वमान्य सूत्र सभ पाठमे नहि।
परवर्ती भारतीय दर्शन कर्म-सिद्धान्तके अलग-अलग तत्त्वमीमांसीय आधारपर व्यवस्थित करैत अछि--बौद्ध
अनात्मवाद, जैन जीववाद, न्यायीय आत्मा, वेदान्तीय आत्मब्रह्म सम्बन्ध। तँ “भारतीय कर्म सिद्धान्त? एकवचनमे
लिखब कई भिन्न सिद्धान्तकें मिटा देत।
6.13 ज्ञान आ मुक्ति
उपनिषदसभमे एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन ई अछि जे मुक्तिक मार्गमे ज्ञान निर्णायक महत्त्व पबैत अछि। “जानब”
एतय तथ्य-सूची याद करब नहि; अपन अस्तित्वक वास्तविक आधारक रूपान्तरणकारी बोध। तथापि ज्ञान,
ध्यान, संयम, कर्म आ जीवन-पद्धतिक सम्बन्ध ग्रन्थानुसार बदलैत अछि।
एहि ठाम दर्शनक उद्देश्य स्पष्ट SU अस्तित्वगत अछि। प्रश्न केवल “सत्य कथन की?” नहि; "सत्य जानला सँ
जीवन-मृत्युक अर्थ कोना बदलैत अछि?” सेहो।
6.14 उपनिषद आ तर्क
उपनिषद आधुनिक औपचारिक दार्शनिक ग्रन्थ नहि, मुदा ओकर संवादसभमे तर्कक प्रारम्भिक संरचना स्पष्ट
अछि--प्रतिप्रशन, उदाहरण, निषेध, विरोधी उत्तर, अनुभवक परीक्षण, सार्वजनिक विद्वत्-सभा। जनकक
सभासभ विशेष रुपें ज्ञानक सार्वजनिक प्रतिस्पर्धा आ परीक्षा देखबैत अछि।
Teh न्यायीय वाद-पद्धतिके सीधे एहि dared उत्पन्न Hes ऐतिहासिक प्रमाण बिना उचित नहि; मुदा
भारतीय बौद्धिक परम्परामे प्रश्नोत्तर आ कारण-दर्शनक दीर्घ पृष्ठभूमि स्पष्ट अछि।
6.15 मिथिला/विदेहक सन्दर्भ
बृहदारण्यक उपनिषदमे विदेहक राजा जनक आ याज्ञवल्क्यक संवाद एहि ग्रन्थक व्यापक मिथिला-केंद्रित
परियोजना लेल विशेष महत्त्व रखैत अछि। मुदा प्राचीन ‘fade’ भूगोल, आधुनिक राजनीतिक सीमा आ
वर्तमान मैथिली पहचानकेँ बिना ऐतिहासिक मध्यवर्ती चरणक एक समान मानब उचित नहि।
एहि अध्यायमे विदेह केवल स्रोत-सम्मत ऐतिहासिक सन्दर्भक रूपमे उपस्थित अछि; आगाँ स्वतंत्र खण्डमे
विदेह, मिथिला आ शास्त्रार्थ-परम्पराक ऐतिहासिक सम्बन्ध अधिक सावधानीसँ विवेचित होयत।
6.16 पूर्वपक्षः की उपनिषद केवल आध्यात्मिक कविता अछि?
आपत्तिः रूपक, कथा आ रहस्यात्मक भाषा कारण उपनिषदकें कठोर दर्शन मानब कठिन। स्पष्ट परिभाषा आ
औपचारिक तर्क अनेक ठाम अनुपस्थित।
उत्तरपक्ष: दर्शनक रूप केवल सूत्रबद्ध तर्क नहि। उपनिषद अस्तित्व, ज्ञान, आत्म, मृत्यु, कारण, मूल्य आ
भाषाक सीमा पर व्यवस्थित प्रश्न उठबैत अछि; संवाद आ उदाहरणद्वारा तर्क विकसित करैत अछि। तथापि
प्रत्येक काव्यात्मक वाक्यकें पूर्ण तत्त्वमीमांसीय सिद्धान्त बनायब सेहो गलत। दार्शनिक पुननिर्माण स्रोतक
साहित्यिक स्वरूपक सम्मानसँ होयबाक चाही।
6.17 समानान्तर दर्शनक पाठ
वैदिक-उपनिषदिक संसारसँ समानान्तर दर्शन चारि मूल शिक्षा ग्रहण करैत अछि। पहिल, धार्मिक परम्पराक
भीतर सेहो संशय आ प्रश्न सम्भव अछि। दोसर, बाह्य अनुष्ठानक अर्थ आन्तरिक अनुभवसँ पुनर्व्याख्यायित हो
सकैत अछि। तेसर, एकहि परम्परामे अनेक उत्तर सहअस्तित्व रखि सकैत अछि। चारिम, ज्ञानक सीमा
स्वीकारब ज्ञानक परित्याग नहि--कखनो ओही सँ गहन प्रश्न आरम्भ होइत अछि।
अध्याय-निष्कर्ष
वैदिक आ उपनिषदिक चिन्तन भारतीय दर्शनक एकरेखीय “आरम्भ-बिन्दु? नहि, प्रश्नसभक विशाल
प्रयोगशाला अछि। सृष्टि, ऋत, यज्ञ, आत्मा, ब्रह्म, कर्म, मृत्यु, ज्ञान आ मुक्ति पर अनेक स्वर बादक दर्शनसभ
लेल समस्या-संसार तैयार करैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि सामग्रीके न AS एकरूप आध्यात्मिक सत्य
बनबैत अछि, न आधुनिक विज्ञानक पूर्वरूप}; ओ स्रोतक बहुवचनता, ऐतिहासिक विकास आ तर्कात्मक
प्रश्नशीलताकें केन्द्रमे राखैत अछि।