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सांख्य भारतीय दर्शनक सबसँ प्रभावशाली तत्त्वमीमांसीय प्रणालिसभमे एक अछि। एकर मूल समस्या
अछि-_चेतन अनुभवकर्ता आ परिवर्तनशील जगत-दुनूक सम्बन्ध कोना बुझल जाए? सांख्य एहि प्रश्नक उत्तर
दू अनादि तत्त्वक AAAS दैत अछि: पुरुष, शुद्ध चेतना; आ प्रकृति, परिवर्तनशील मूल प्रकृति। मुक्ति तखन
सम्भव होइत अछि जखन पुरुष अपनाकेँ प्रकृतिक विकारसँ भिन्न Sd जानैत अछि।
7.1 “सांख्य” आ गणनाक पद्धति
“सांख्य? शब्दके प्रायः गणना अथवा तत्त्वसभक संख्या-सूची सँ जोडल जाइत अछि। परम्परा कपिलकें आद्य
आचार्य मानैत अछि, मुदा हुनकर कोनो निर्विवाद मूल ग्रन्थ उपलब्ध नहि। शास्त्रीय सांख्यक प्रमुख उपलब्ध
आधार ईश्वरकृष्णक सांख्यकारिका अछि। एकर पूर्वइतिहास महाभारत, उपनिषद आ अन्य प्राचीन साहित्यक
विविध विचारधारामे खोजल जाइत अछि, मुदा बादक व्यवस्थित प्रणालीकें सभ पूर्ववर्ती उल्लेखपर ज्यों-का-
त्यों आरोपित करब उचित नहि।
ई ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक अछि, कारण "सांख्य? नाम अलग कालमे अलग रूपक विचार-संरचनाक
संकेत दे सकैत अछि।
7.2 दुःखसँ आरम्भ
सांख्यकारिका दार्शनिक जिज्ञासाकें दुःखक त्रिविध अनुभवसँ जोडत अछि--आध्यात्मिक/ व्यक्तिगत, बाह्य-
भौतिक आ दैविक अथवा अप्रत्यक्ष SRS उत्पन्न दुःखक पारम्परिक वर्गीकरण। साधारण उपाय दु:खे
अस्थायी SF घटा सकैत अछि; सांख्यक लक्ष्य मूल बन्धनक ज्ञानात्मक कारण बुझि स्थायी मुक्ति खोजब
अछि।
एहि अर्थमे सांख्य तत्त्वमीमांसा केवल ब्रह्माण्डक नक्शा नहि। जगत की सँ बनल--एहि प्रश्नक उत्तर अन्ततः
'दुःखसँ मुक्ति कोना?” प्रश्नक सेवा करैत अछि।
7.3 प्रकृतिः मूल परिवर्तनशील आधार
प्रकृति अव्यक्त, अनादि आ त्रिगुणात्मक मूल तत्त्व अछि। ओ चेतन नहि, मुदा जगतक समस्त मानसिक आ
भौतिक विकासक कारण मानल जाइत अछि। सांख्यक विशेषता ई अछि जे बुद्धि, अहंकार आ मनोवृत्ति सेहो
प्रकृतिक विकास छथि; मानसिकता स्वतः शुद्ध चेतना नहि।
एहि बिन्दुपर सांख्य आधुनिक सामान्य द्वैतवादसँ भिन्न अछि। मन? एक तरफ आ “पदार्थ” दोसर तरफ
एहन सरल विभाजन नहि। मन, बुद्धि, अहंकार, इन्द्रिय, सूक्ष्म तत्व आ स्थूल तत्व सभ प्रकृतिक क्षेत्रमे; पुरुष
मात्र शुद्ध चेतना।
7.4 तीन गुण
सत्त्व, रजस् आ तमस् प्रकृतिक तीन गुण छथि। गुणकें साधारण नैतिक 'नीक-बेजाय” वर्ग मानब गलत। सत्त्व
प्रकाश, स्पष्टता, हलकापन आ संतुलनसँ; रजस् गति, प्रयास, इच्छा आ अस्थिरतासँ; तमस् जड़ता, अवरोध,
भारीपन आ AAAs सम्बद्ध व्याख्यायित होइत अछि। प्रत्येक प्रकृतिजन्य अवस्था एहि गुणसभक अलग
अनुपातक परिणाम मानल जाइत अछि।
मानसिक चरित्र, अनुभव आ पदार्थीय परिवर्तनकें एकहि गुण-सिद्धान्तक भीतर समझबाक प्रयास सांख्यक
विशिष्ट दार्शनिक साहस अछि। तथापि आधुनिक मनोविज्ञान वा भौतिक विज्ञानमे एहि गुणसभकें मापनीय
वैज्ञानिक चर ठहराबय लेल स्वतंत्र प्रमाण चाही। शास्त्रीय अवधारणा आ आधुनिक वैज्ञानिक मॉडल अलग
स्तरक वस्तु छथि।
7.5 पच्चीस तत्त्व
शास्त्रीय सांख्य पच्चीस तत्त्वक संरचना प्रस्तुत करैत अछि। प्रकृतिसँ महत् अथवा बुद्धि; बुद्धिसँ अहंकार;
अहंकारसँ मन, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, तन्मात्रा; तन्मात्रासँ स्थूल महाभूतक विकास वर्णित अछि। पुरुष पच्चीसम
तत्त्वक रूपमे प्रकृतिसँ पूर्णतः भिन्न।
ई 'विकास'’ आधुनिक जैविक evolution नहि। ई तत्त्वमीमांसीय परिणाम-क्रम अछि--कतेक प्रकारक
वास्तविकता कोन मूल सिद्धान्तसँ प्रकट होइत अछि। आधुनिक शब्द ‘evolution’& उपयोग करैत समय
एहि भेद स्पष्ट रहबाक चाही।
7.6 बुद्धि, अहंकार आ मन
सांख्यक अन्तःकरण-विश्लेषण अत्यन्त सूक्ष्म अछि। बुद्धि निर्णयात्मक आ विवेकात्मक क्षमता; अहंकार “SH?
भावक निर्माण; मन इन्द्रिय-सूचनाक समन्वय आ संकल्प-विकल्पक eg! ई सभ चेतन देखाइत अछि, मुदा
सांख्य अनुसार मूलतः अचेतन प्रकृतिक सूक्ष्म रूप छथि। पुरुषक निकटता कारण ई चेतन-जकाँ प्रकाशित
होइत अछि।
एहि विश्लेषणसँ एकटा कठोर प्रश्न उठैत अछि-जेँ बुद्धि स्वयं अचेतन अछि, तखन ज्ञानक अनुभव कोना?
सांख्य उत्तर देत जे चित्तीय संरचना पुरुषक चेतना प्रतिबिम्बित करैत अछि; विरोधी परम्परासभ एहि सम्बन्ध्के
अस्पष्ट मानि आपत्ति करैत रहल।
7.7 पुरुषः शुद्ध चेतना
पुरुष न शरीर, न मन, न बुद्धि, न अहंकार। ओ निरवयव, निष्क्रिय, अपरिणामी द्रष्टा अछि। सुख-दुःख प्रकृतिक
बुद्धि-चित्तमे घटैत अछि, मुदा अज्ञान कारण पुरुष अपनाकेँ ओहि अवस्थासँ एक मानि लैत अछि। मुक्ति एहि
मिथ्या तादात्म्यक समाप्ति।
सांख्य अनेक पुरुष मानैत अछि। यदि एकहि सार्वभौम पुरुष होइत, तँ एक व्यक्तिक जन्म-मृत्यु, ज्ञान-अज्ञान,
सुख-दुःख सभ व्यक्ति पर एकसाथ लागू होयबाक समस्या उठित। व्यक्तिगत अनुभवक विविधता अनेक
पुरुषक तर्कमे उपयोग होइत अछि।
7.8 पुरुषक बहुलताक प्रश्न
अनेक पुरुष मानलासँ व्यक्तिगत चेतनाक भिन्नता स्पष्ट करबाक प्रयास होइत अछि, मुदा कठिनाई सेहो उठैत
अछि। जँ सभ पुरुष गुणरहित शुद्ध चेतना मात्र छथि, तँ एक पुरुष दोसरसँ भिन्न कोना? भिन्नताक चिह्न
प्रकृतिजन्य शरीर-मनमे अछि, पुरुष स्वयंमे नहि।
ई सांख्यक गम्भीर आन्तरिक दार्शनिक समस्या अछि। परम्परा व्यक्तिगत कर्म-शरीरक भिन्नता आ अनुभवक
पृथकता द्वारा बहुलता सिद्ध करबाक प्रयास करैत अछि, मुदा प्रतिपक्ष पूछि सकैत अछि जे गुणरहित तत्वसभक
संख्यात्मक भिन्नता कोना ज्ञात होयत।
7.9 सत्कार्यवाद
सांख्य कारणता पर सत्कार्यवाद प्रतिपादित करैत अछि--कार्य अपन कारणमे सम्भावित अथवा अव्यक्त
रूपसँ पूर्वस्थित अछि; पूर्ण शून्यसँ नूतन सत्ता उत्पन्न नहि होइत। दूध दही बनेत अछि, बीज वृक्ष; कारणमे
कार्य-क्षमता रहबाक चाही।
सांख्यकारिका एहि मतक पक्षमे अनेक तर्क दैत अछि: असत्सँ सत् उत्पन्न नहि; प्रत्येक कारण सभ कार्य
उत्पन्न नहि करैत; विशिष्ट कारण विशिष्ट कार्यक क्षमता रखैत; कार्य कारणक स्वभावसँँ सम्बद्ध।
परिणामवादक अनुसार कार्य कारणक वास्तविक रुपान्तरण।
न्याय-वैशेषिकक आरम्भवाद एहि मतक प्रतिपक्ष प्रस्तुत करैत अछि। एहि बहससँ भारतीय दर्शनमे कारणता
विषयक गहन बहुलता स्पष्ट होइत अछि।
7.10 पुरुष-प्रकृति सम्बन्ध
सांख्यक प्रसिद्ध रूपकमे अन्ध आ पंगु दुनू परस्पर सहयोग करेत छथि--एक चलि सकैत अछि मुदा देखि नहि,
दोसर देखि सकैत अछि मुदा चलि नहि। प्रकृति सक्रिय मुदा अचेतन; पुरुष चेतन मुदा निष्क्रिय। दुनूक संयोगसँ
अनुभवक संसार संभव होइत अछि।
रुपक उपयोगी अछि, पर प्रश्न समाप्त नहि करेत। दू पूर्णतः भिन्न, अनादि तत्व वास्तवमे “संयोग” कोना Het
अछि? of पुरुष किछु करैत नहि, प्रकृति ओकर उद्देश्य” लेल किएक विकसित होइत अछि? सांख्य प्रकृतिमे
पुरुषक भोग आ अपवर्ग लेल कार्य करबाक प्रवृत्ति मानैत अछि, मुदा ई टेलियोलॉजिकल संरचना आलोचनाक
विषय रहल।
7.11 ईश्वरक प्रशन
शास्त्रीय सांख्यकारिका सृष्टिकर्ता ईश्वरकें प्रणालीक आवश्यक तत्त्व नहि बनबैत। एहि कारण सांख्यकें प्रायः
निरीश्वरवादी कहल जाइत अछि। मुदा “निरीश्वरवादी'क आधुनिक अर्थ सावधानीसँ उपयोग करबाक चाही।
प्रश्न मुख्यतः ई अछि जे जगत-व्याख्या लेल प्रकृति आ पुरुषक अतिरिक्त सृष्टिकर्ता कारण दार्शनिक रूपसँ
आवश्यक अछि की नहि।
पाश्चात्य आधुनिक atheism क सामाजिक-ऐतिहासिक अर्थ सांख्यपर सीधा आरोपित करब अनेतिहासिक
होयत।
7.12 ज्ञान आ मुक्ति
मुक्तिक उपाय विवेकख्याति--पुरुष आ प्रकृतिक निर्णायक भेदज्ञान। अज्ञानमे "हम दुखी”, “हम कर्ता”, "हम
सुखी? जकाँ तादात्म्य उत्पन्न होइत अछि। विवेकमे बुझल जाइत अछि जे परिवर्तनशील मानसिक-भौतिक
अवस्था प्रकृतिक, शुद्ध द्रष्टा पुरुष अलग।
कैवल्यक अर्थ प्रकृतिक विनाश नहि। विशिष्ट पुरुषक लेल प्रकृतिक प्रयोजन समाप्त; तादात्म्यक भ्रम टूटैत
अछि। रूपक रुपें नर्तकी दर्शक लेल नृत्य समाप्त कऽ मंच छोड़ैत अछि--प्रकृति अपन स्वरूप देखाबि चुकलापर
निवृत्त।
7.13 सांख्य आ योग
योग सांख्यक तत्त्वमीमांसीय ढाँचा व्यापक SUS साझा करैत अछि--पुरुष, प्रकृति, गुण, चित्तीय संरचना,
विवेक आ कैवल्य। मुदा योग साधना, ध्यान, ईश्वरप्रणिधान आ चित्तवृत्तिनिरोधक व्यवस्थित पद्धति विकसित
करेत अछि। एहि कारण दुनूकें बहुधा 'सांख्य-योग? कहल जाइत अछि, मुदा पूर्णतः एक दर्शन मानब ठीक
नहि।
सांख्य मुख्यतः विवेकात्मक तत्त्वज्ञानक संरचना दैत अछि; योग मनो-अनुशासनक विस्तृत साधन-पद्धति जोड़ैत
अछि।
7.14 आधुनिक चेतना-दर्शनसँ संवाद
सांख्य चेतना आ मानसिक अवस्थाक बीच एहन भेद करैत अछि जे आधुनिक philosophy of mind
लेल रोचक तुलना प्रदान करेत अछि। विचार, स्मृति, इच्छा, अहंकार सभ मानसिक प्रक्रिया होइतहुँ शुद्ध
चेतना? नहि-ई दावा phenomenal consciousness, self-model, subjectivity आदि
आधुनिक प्रश्नक संग संवाद खोलि सकैत अछि।
मुदा सांख्यक You आधुनिक neuroscience क ‘consciousness module’ व quantum
entity कहब निराधार होयत। समानान्तर दर्शन तुलना करैत अछि, नकली वैज्ञानिक पुष्टि नहि गढ़ैत।
7.15 पूर्वपक्षः निष्क्रिय चेतना कोना अनुभवकर्ता?
आपत्ति: यदि पुरुष पूर्ण निष्क्रिय, निर्विकार आ गुणरहित अछि, तेँ “अनुभव” ओकरा कोना सम्बद्ध? अनुभवमे
परिवर्तन, स्मृति आ क्रम अछि; ई सभ प्रकृतिक बुद्धिमे होइत अछि। तखन पुरुषकें स्वतंत्र मानबाक
आवश्यकता की?
उत्तरपक्षः सांख्य कहैत अछि जे जड़ प्रकृति स्वयंप्रकाशी नहि; अनुभवक उपस्थिति बुझाबय लेल चेतन साक्षी
आवश्यक। बुद्धि अनुभवक सामग्री रूपान्तरित करैत अछि, पुरुष ओकर प्रकाशक शर्त। मुदा एहि उत्तरसँ
सम्बन्धक समस्या पूर्णतः समाप्त नहि; एतहि सांख्यक दार्शनिक शक्ति आ कठिनाई दुनू अछि।
7.16 समानान्तर दर्शनक पाठ
सांख्यसँ समानान्तर दर्शन तीन प्रमुख पद्धतिगत शिक्षा लैत अछि। पहिल, अनुभवकर्ता आ अनुभवक सामग्री
अलग करि जाँचू। दोसर, जटिल जगतकें स्तरबद्ध कारण-रचनामे विश्लेषित करू। तेसर, कोनो दार्शनिक
प्रणालीक सबल अन्तर्दृष्टि स्वीकारैतहुँ ओकर कठिन प्रश्न--पुरुष-प्रकृति सम्बन्ध, बहुल पुरुष,
टेलियोलॉजी--लुकाउ नहि।
अध्याय-निष्कर्ष
सांख्य प्रकृति आ पुरुषक द्वैत, त्रिगुण सिद्धान्त, पच्चीस तत्त्व, सत्कार्यवाद आ विवेकमुक्तिक माध्यमसँ
भारतीय दर्शनमे चेतना, कारणता आ दुःखक एक सुसंगठित उत्तर प्रस्तुत करैत अछि। ई आधुनिक विज्ञान
नहि, मुदा चेतना आ जगतक सम्बन्ध पर गम्भीर दार्शनिक प्रतिपक्ष अछि। समानान्तर दर्शन ओकर ऐतिहासिक
स्वतन्त्रता सम्मानित Hed, उपयोगी तुलना करैत, आ कठिन आपत्तिकें खुला राखैत अछि।
अध्याय-ग्रन्थसूचौ
ईश्वरकृष्ण — Samkhya-karika.
वाचस्पति मिश्र — Tattvakaumudi.
Gerald James Larson — Classical Sdmkhya: An Interpretation of Its
History and Meaning.
Gerald James Larson and Ram Shankar Bhattacharya (eds.) — Samkhya:
A Dualist Tradition in Indian Philosophy.