योगकेँ आधुनिक संसारमे प्रायः आसन, शारीरिक लचीलापन अथवा स्वास्थ्य-अभ्यासक रूपमे प्रस्तुत कएल जाइत अछि। ई उपयोग महत्वहीन नहि, मुदा पतञ्जलिक योगदर्शनक दार्शनिक क्षेत्र बहुत व्यापक अछि। योग मनक वृत्ति, दुःखक कारण, नैतिक अनुशासन, ध्यान, ज्ञान, कर्म, समाधि आ कैवल्यक व्यवस्थित पद्धति प्रस्तुत करैत अछि। एकर मूल प्रश्‍न अछि--मनुष्य अपन मानसिक प्रवाहक संग पूर्ण तादात्म्य राखत, की ओ एहि प्रवाहकें देखैत-समझैत स्वतंत्र चेतन साक्षीक रूपमे स्थापित भऽ सकैत अछि? 8.1 योगसूत्र: पाठ आ परम्परा योगसूत्र पतञ्जलिक नामसँ सम्बद्ध ग्रन्थ अछि, चारि पादमे व्यवस्थित--समाधि, साधना, विभूति आ कैवल्य। ग्रन्थक रचना-काल आ सम्पादन-इतिहास पर विद्वानसभक मतभेद अछि; अतः निश्चित तिथि पर अनावश्यक दृढ़ता उचित नहि। व्यासभाष्य योगसूत्रक प्राचीनतम उपलब्ध व्यापक व्याख्यासभमे एक अछि आ परवर्ती योगपरम्पराक समझमे केन्द्रीय स्थान रखैत अछि। योग पतञ्जलिसँ आरम्भ नहि भेल। महाभारत, उपनिषद आ अनेक श्रमण-परम्परामे ध्यान, तप, इन्द्रियनिग्रह आ योगसदृश अभ्यासक पूर्वहतिहास भेटैत अछि। पतञ्जलिक महत्त्व एहि विविध अभ्यासकें एक दार्शनिक- पद्धतिगत संरचनामे व्यवस्थित करबमे अछि। 8.2 'चित्तवृत्तिनिरोध’क अर्थ योगसूत्रक प्रसिद्ध सूत्र योगकेँ चित्तक वृत्तिसभक निरोधसँ परिभाषित करैत अछि। “निरोध'कें जबरन विचार नष्ट करब मात्र बुझब गलत होयत। योगक उद्देश्य मानसिक प्रक्रियाके Vet अनुशासित स्थिति धरि आनब अछि जतय चेतना अपन विषयगत परिवर्तनक संग भ्रमित नहि रहय। चित्त प्रकृतिक अंश अछि; पुरुष शुद्ध चेतन साक्षी। जखन चित्तक वृत्ति उथल-पुथल अछि, तखन पुरुष मानो ओहि वृत्तिक रंग ग्रहण कऽ लैत अछि। विवेक आ समाधिद्वारा एहि तादात्म्यक भ्रम टूटैत अछि। योगक मुक्ति- सिद्धान्त एहि सांख्य-आधारित तत्त्वमीमांसासँ गहिर SU जुल अछि। 8.3 पाँच वृत्ति योगसूत्र प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा आ स्मृति-पाँच वृत्तिक चर्चा करैत अछि। एहि वर्गीकरणक अर्थ ई नहि जे सभ वृत्ति समान ed बेजाय अछि। वृत्तिसभ क्लिष्ट अथवा अक्लिष्ट भऽ सकैत अछि-_अर्थात्‌ बन्धन बढ़ाबयवला वा मुक्ति दिस सहाय करयवला। ule Fatah आधुनिक ‘mind empty करबाक’ लोकप्रिय व्याख्यासँ बचायब आवश्यक अछि। योग ज्ञान, स्मृति आ अवधारणाकें केवल शत्रु नहि मानैत; प्रश्‍न अछि कि मानसिक क्रिया अज्ञान, आसक्ति आ क्लेशद्वारा संचालित अछि की विवेकद्वारा। 8.4 योगक प्रमाणमीमांसा योग तीन प्रमाण स्वीकारैत अछि--प्रत्यक्ष, अनुमान आ आगम अथवा प्रमाणिक वचन। एहि बिन्दुपर योग सांख्यसँ निकट अछि, न्यायसँ भिन्न जे चारि प्रमाण स्वीकारैत अछि। योगदर्शनक उद्देश्य केवल सैद्धान्तिक ज्ञान नहि, तथापि साधना गलत ज्ञानपर आधारित नहि भऽ सकैत। ई तथ्य महत्त्वपूर्ण अछि: ध्यानक परम्परा स्वयं ज्ञानक वैधता पर विचार करैत अछि। केवल “हमरा अनुभव भेल” प्रत्येक आध्यात्मिक दाबीकें स्वतः सार्वजनिक सत्य नहि बनबैत। निजी अनुभूति, अनुमान आ प्रमाणिक परम्परा--तीनू अपन-अपन सीमा रखैत अछि। 8.5 अभ्यास आ वैराग्य चित्तक स्थिरता लेल अभ्यास आ वैराग्य दू प्रमुख साधन बताओल गेल। अभ्यास निरन्तर, दीर्घकालिक अनुशासन; वैराग्य विषयक प्रति तृष्णाक क्षय। US Sat एकटा गहन मनोवैज्ञानिक अन्तर्दृष्टि अछि-केवल इच्छा-शक्ति पर्याप्त नहि; आदत बदलबाक लेल पुनरावृत्ति चाही, आ पुनरावृत्तिक परिणाम स्थायी होयब लेल आसक्तिक संरचना सेहो बदलय पड़त। मुदा आधुनिक मनोविज्ञानक शब्द योगपर सीधा आरोपित नहि करबाक चाही। समानता उपयोगी तुलना भऽ सकैत अछि, ऐतिहासिक पहचान नहि। 8.6 क्लेशः दुःखक मानसिक संरचना अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष आ अभिनिवेश पाँच क्लेश मानल जाइत अछि। अविद्या मूल भ्रम; असिता द्रष्टा आ दर्शन-उपकरणक तादात्म्य; राग सुखद अनुभवक प्रति आकर्षण; द्वेष दुःखद अनुभवक प्रति विकर्षण; अभिनिवेश state चिपकल भय अथवा मृत्यु-आशंका। एहि विश्लेषणमे नैतिकता आ मनोविज्ञान अलग नहि। क्लेश केवल “भावना” नहि; ओ कर्म, चयन, आदत आ पुनः दुःखक कारण Sta अछि। योग मनुष्यक दुःखकें बाह्य घटना मात्र नहि, अनुभवक आन्तरिक संरचनासँ सेहो जोड़ेत अछि। 8.7 अष्टाङ्ग योग पतञ्जलिक अष्टाङ्ग योग अछि--यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान आ समाधि। एहि क्रममे आसन केवल तेसर अङ्ग अछि। आधुनिक योगक इतिहासमे आसनक भूमिका अत्यन्त विस्तृत भेल, मुदा शास्त्रीय योगदर्शनक भीतर ओकर उद्देश्य शरीरके ध्यानयोग्य स्थिरता देब अछि। यम-_अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य आ अपरिग्रह-सामाजिक-नैतिक संयम छथि। नियम--शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय आ ईश्वरप्रणिधान-व्यक्तिगत अनुशासन। एहि आधार बिना ध्यानक उच्च अवस्थाकेँ योगक सम्पूर्ण अर्थ मानब शास्त्रीय संरचनाकें उलटि देब होयत। 8.8 अहिंसा आ नैतिकता अहिंसा योगक पहिल यम अछि। सत्य सेहो महत्त्वपूर्ण, मुदा योग नैतिकतामे सत्य बोलनाइ अहिंसासँ पूर्णतः काटल नहि। नेतिक अनुशासन केवल समाजक नियम मानबाक बात नहि; मानसिक क्लेश घटाबय, आसक्ति तोड़य आ ध्यानक योग्य जीवन बनाबयक साधन सेहो अछि। समानान्तर दर्शन एतय एकटा प्रश्‍न जोड़ेत अछि: व्यक्तिगत अहिंसा पर्याप्त अछि की संरचनात्मक हिंसाक परीक्षण सेहो चाही? जाति, भूख, लैंगिक भेदभाव अथवा पर्यावरणीय विनाश जँ संस्थागत रूपमे पीड़ा उत्पन्न करैत अछि, तँ केवल व्यक्तिगत शान्ति सामाजिक नैतिकताक विकल्प नहि। 8.9 प्रत्याहारसँ समाधि धरि प्रत्याहार इन्द्रियसभक विषयसँ अनुशासित वापसी; धारणा मनकें एक बिन्दुपर स्थिर करब; ध्यान ओहि प्रवाहक निरन्तरता; समाधि ध्यानक एहन गहनता जतय विषय आ चेतनाक सम्बन्ध रूपान्तरित होइत अछि। योगसूत्र विभिन्न प्रकारक समाधि आ संप्रज्ञात-असंप्रज्ञात अवस्थाक चर्चा करैत अछि। एहि अवस्थासभके आधुनिक न्यूरोविज्ञानक विशिष्ट मस्तिष्क-अवस्था घोषित करबाक लेल स्वतंत्र प्रयोगात्मक प्रमाण चाही। दार्शनिक ग्रन्थ अनुभवक संरचना वर्णित करैत अछि; वैज्ञानिक पहचान अलग अनुसन्धानक विषय अछि। 8.10 ईश्वरप्रणिधान योग सांख्यसँ निकट होइतहुँ Sut विशेष अवधारणा स्वीकारैत अछि। पतञ्जलिक ईश्वर “विशेष पुरुष” छथि-_क्लेश, कर्म, विपाक आदि सँ असम्पृक्त। ई अवधारणा सृष्टिकर्ता ईश्वरक प्रत्येक परवर्ती धार्मिक धारणा समान नहि। ईश्वरप्रणिधान साधनाक एक महत्त्वपूर्ण उपाय भऽ सकैत अछि, मुदा योगसूत्र अनेक मार्गक चर्चा सेहो करेत अछि। तँ योगकें या तऽ पूर्ण नास्तिक सांख्यक प्रतिलिपि या आधुनिक भक्ति-धर्मक सीधा रूप मानब दुनू सरलीकरण अछि। 8.11 सिद्धि आ विभूति योगसूत्रक विभूतिपाद ध्यान-संयमसँ उत्पन्न असाधारण क्षमतासभक चर्चा Hed अछि। आधुनिक पाठक लेल ई खण्ड विशेष सावधानी माँगैत अछि। परम्परागत ग्रन्थ स्वयं अनेक सिद्धिकें अंतिम मुक्ति नहि मानेत; ओ साधक लेल आसक्तिक कारण बनि सकैत अछि। समानान्तर दर्शन ऐतिहासिक दाबी आ आधुनिक तथ्य-दाबी अलग राखैत अछि। ग्रन्थमे सिद्धिक वर्णन अछि ई ऐतिहासिक तथ्य; ओ क्षमता आधुनिक प्रयोगात्मक कसौटीपर सिद्ध अछि-ई अलग दावा, जकर स्वतंत्र प्रमाण चाही। 8.12 कैवल्य योगक अंतिम लक्ष्य कैवल्य-पुरुषक प्रकृतिसँ विवेकपूर्ण पृथकता। ई आत्मक सामाजिक स्वतंत्रता मात्र नहि, तत्त्वमीमांसीय मुक्ति अछि। चित्तक गुणात्मक प्रवाह अपन कारणमे लौटैत अछि आ पुरुष अपन शुद्ध रष्टा-स्वरूपमे स्थित बुझल जाइत अछि। एहि लक्ष्यकें बौद्ध निर्वाण, अद्वैत ब्रह्मज्ञान अथवा जैन केवलज्ञान समान Hed अनुचित। भारतीय मुक्ति- परम्परासभक शब्द भलँ अनुवादमे ‘liberation’ बनि जाए, तत्त्वमीमांसीय आधार भिन्न अछि। 8.13 योग आ आधुनिक मानसिक स्वास्थ्य ध्यान, श्वास-अभ्यास आ शारीरिक योगक किछु आधुनिक रूप स्वास्थ्य-सम्बन्धी अनुसन्धानक विषय छथि। मुदा शास्त्रीय योगक प्रत्येक दार्शनिक दाबीकें आधुनिक चिकित्सा प्रमाणित करेत अछि--एहन निष्कर्ष नहि निकालल जा सकैत। उलटा, आधुनिक चिकित्सकीय लाभक प्रश्‍नक उत्तर नियंत्रित अध्ययनसँँ, न कि केवल शास्त्रीय प्रतिष्ठासँ, देल जाए। समानान्तर दर्शन परम्पराक सम्मान आ प्रमाणक आधुनिक कसौटी दुनू राखैत अछि। 8.14 पूर्वपक्ष: की योग पलायनवाद अछि? आपत्तिः जँ दुःखक समाधान मनकें बदलनाइ अछि, तँ अन्यायपूर्ण समाजक संरचना अछूता रहि जाएत। भूखल, उत्पीड़ित अथवा विस्थापित व्यक्तिक समस्या केवल ध्यानसँ दूर नहि होयत। उत्तरपक्षः शास्त्रीय योग मुख्यतः मुक्तिक व्यक्तिगत अनुशासन प्रस्तुत करैत अछि; ओकरा आधुनिक सामाजिक न्याय-सिद्धान्त कहब उचित नहि। मुदा आत्मानुशासन, अहिंसा, लोभ-नियन्त्रण आ ध्यान नैतिक क्रियाक शक्ति बनि सकैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि ठाम योगक आन्तरिक अनुशासनकें सामाजिक न्याय, संस्थागत उत्तरदायित्व आ भौतिक परिस्थितिक विश्लेषणसँ जोडत अछि--एककें दोसराक विकल्प नहि बनबैत। 8.15 समानान्तर दर्शनक पाठ योगसँ चारि शिक्षा ग्रहण कएल जा सकैत अछि: मानसिक प्रक्रियाकें स्वतः “हम” नहि मानू; अभ्यास बिना विचारक परिवर्तन अधूरा; नैतिक अनुशासन ज्ञानात्मक अनुशासनसँ जुड़ल; आ आत्मनियन्त्रण सामाजिक जिम्मेवारीक स्थान नहि लेत। व्यक्तिगत मुक्ति आ सार्वजनिक न्यायक बीच कृत्रिम विरोध आवश्यक नहि। अध्याय-निष्कर्ष