न्याय दर्शन भारतीय बौद्धिक इतिहासमे तर्क, प्रमाण, विवाद-पद्धति आ यथार्थवादक अत्यन्त विकसित परम्परा अछि। 'न्याय’क अर्थ केवल औपचारिक तर्क नहि; ई उचित जाँच, प्रमाण-सम्मत निर्णय आ युक्तिसंगत विवादक सम्पूर्ण अनुशासनक नाम अछि। न्यायसूत्रक आरम्भे ज्ञान-स्रोत, ज्ञेय वस्तु, संशय, प्रयोजन, उदाहरण, सिद्धान्त, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति आ निग्रहस्थानक चर्चा एहि व्यापक परियोजनाकेँ संकेत करैत अछि। 9.1 न्यायसूत्र आ परम्परा न्यायसूत्र गौतम अथवा अक्षपाद गौतमक नामसँ सम्बद्ध अछि, मुदा एकर रचना-काल विद्वानसभक बीच विवादित अछि। वात्स्यायनक न्यायभाष्य प्रारम्भिक न्यायपरम्पराक मुख्य व्याख्यात्मक आधार बनल; उद्योतकर, वाचस्पति मिश्र, उदयन, गङ्गेश आ परवर्ती नव्य-न्यायकारसभ एहि परम्पराकें अलग-अलग चरणमे विकसित कएलनि। एकर इतिहास देखबैत अछि जे 'न्याय” स्थिर प्रणाली नहि। प्रारम्भिक न्याय प्रमाण आ वादक संग व्यापक तत्त्वमीमांसा प्रस्तुत Hed अछि; मध्यकालीन न्याय stg, मीमांसक, वेदान्ती आदि प्रतिपक्षसँ संवादमे अधिक सूक्ष्म होइत अछि; गड्गेशक तत्त्वचिन्तामणि सँ नव्य-न्याय विश्लेषणात्मक भाषा आ प्रमाणमीमांसाके नूतन कठोरता दैत अछि। 9.2 सोलह पदार्थ: दर्शनक कार्यसूची न्यायसूत्रक सोलह विषयकें केवल स्मरण-सूची मानब भूल होयत। ई अनुसन्धानक क्रम देखबैत अछि। प्रमाण द्वारा ज्ञान; प्रमेय अर्थात्‌ ज्ञेय वस्तु; संशय जाँचक आवश्यकता; प्रयोजन अनुसन्धानक प्रेरणा; दृष्टान्त नियमक साझा उदाहरण; सिद्धान्त स्वीकृत आधार; अवयव तर्कक संरचना; तर्क सहायक विचार; निर्णय प्रमाण-सम्मत निष्कर्ष; वाद सत्याभिमुख संवाद; जल्प विजयाभिमुख बहस; वितण्डा केवल प्रतिपक्ष-खण्डन; हेत्वाभास भ्रमित कारण; छल अर्थ-विकृति; जाति अनुचित प्रतिवाद; निग्रहस्थान विवादमे पराजयक आधार। एहि सूचीमे ज्ञानमीमांसा, तर्कशास्त्र आ संवाद-नीति एक-दोसरासँ अलग नहि। सत्य केवल निजी अनुभूति नहि; सार्वजनिक कारण-प्रदर्शनक अनुशासन सेहो अछि। 9.3 चारि प्रमाण न्याय चारि मुख्य प्रमाण स्वीकारैत अछि--प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आ शब्द। ई 'सबूतक चारि टुकड़ा” नहि, यथार्थ ज्ञान उत्पन्न करयवला चारि प्रकारक विश्वसनीय प्रक्रिया छथि। प्रत्यक्ष इन्द्रिय अथवा उपयुक्त प्रत्यक्ष-सन्निकर्षसँ उत्पन्न ज्ञानक विश्लेषण करैत अछि। न्याय प्रत्यक्षकै सरल “जे देखल से सत्य” नहि मानैत; भ्रम, इन्द्रिय-दोष, अस्पष्टता आ वैचारिक निर्धारणक प्रश्‍न पर दीर्घ विवाद भेटैत अछि। अनुमान ज्ञात चिहसँ अज्ञात निष्कर्षक ज्ञान अछि। धूमसँ अग्ने प्रसिद्ध उदाहरण, मुदा वास्तविक दार्शनिक भार धूम-अग्निक अविनाभाव अथवा व्याप्ति उचित ST जानबाक प्रश्‍नपर अछि। केवल दू घटना संग देखला सँ सार्वभौम सम्बन्ध सिद्ध नहि होइत। अपवाद, उपाधि आ विपरीत उदाहरण जाँचल जाइत अछि। उपमान परिचित समानताक ALAS शब्द-वस्तु सम्बन्ध अथवा अपरिचित वस्तुक ज्ञानमे भूमिका निभबैत अछि। शब्द विश्वसनीय वक्ताक HUTA ज्ञानक प्रश्‍न उठबैत अछि। एहि चारिमे आधुनिक जीवनक बहुत ज्ञान- प्रक्रिया तुलनात्मक SUS बुझल जा सकैत अछि, मुदा आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतिकें सीधे न्याय प्रमाण-सूचीमे विलीन करब उचित नहि। 9.4 प्रत्यक्षः अनुभव आ अवधारणा न्याय परम्परामे प्रत्यक्षक स्वरुप पर विस्तृत मतभेद विकसित भेल। प्रारम्भिक सूत्र-भाष्य परम्परा इन्द्रिय-अर्थ सन्निकर्ष, अव्यभिचारिता आ निश्चित ज्ञानक प्रश्‍न उठबैत अछि। परवर्ती न्याय निर्विकल्पक आ सविकल्पक प्रत्यक्षक भेदपर चर्चा करैत अछि--पहिल स्तरपर वस्तुक अविभाजित उपस्थिति, दोसर स्तरपर ई नील घट अछि” जकाँ वर्गीकृत ज्ञान। एहि विमर्शक आधुनिक प्रासंगिकता ई अछि जे देखनाइ सदैव पूर्णतः भाषाविहीन अछि की अवधारणा द्वारा संरचित? न्यायपरम्परा एहि प्रश्‍नक एकमात्र उत्तर नहि दैत, मुदा अनुभव आ निर्णयक स्तर अलग करबाक शक्तिशाली उपकरण दैत अछि। 9.5 अनुमान आ व्याप्ति अनुमानमे पक्ष, साध्य आ हेतु मूल तत्व छथि। “पर्वत पर अग्नि अछि, कारण धूम अछि'--एतय पर्वत पक्ष, अग्नि साध्य, धूम हेतु। मुदा हेतु तखन वैध जखन साध्यक संग ओकर विश्वसनीय व्याप्ति हो आ वर्तमान पक्षमे हेतु उपस्थित हो। न्यायीय पंचावयवी प्रस्तुतिमे प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय आ निगमनक क्रम प्रसिद्ध अछि। एकरा अरस्तूवादी syllogism क सीधा भारतीय रूप कहब गलत; एकर संवादात्मक आ प्रमाण-प्रदर्शक उद्देश्य अलग ऐतिहासिक सन्दर्भ रखैत अछि। उदाहरण केवल सजावट नहि, साझा स्वीकृत नियमक आधार प्रस्तुत करेत अछि। व्याप्ति-ज्ञानक समस्या बादक न्याय आ नव्य-न्यायमे अत्यन्त सूक्ष्म बनेत अछि। सीमित उदाहरणसँ अविनाभाव कोना? अपवादक सम्भावना कोना हटत? एहि प्रश्‍नसँ न्याय आगमन, कारणता आ नियम-ज्ञानक वैश्विक दार्शनिक समस्यासँ संवाद करैत अछि। 9.6 हेत्वाभासः तर्कक भ्रम न्याय केवल वैध तर्क नहि, गलत तर्कक संरचना सेहो विश्लेषित करैत अछि। हेतु जँ साध्य सिद्ध करबाक योग्य नहि, विरोधी परिणाम दैत अछि, अनिश्चित अछि वा अन्य दोष रखैत अछि तँ हेत्वाभास उत्पन्न होइत अछि। विभिन्न न्यायग्रन्थ हेत्वाभासक वर्गीकरण अलग Faas Het छथि। समानान्तर दर्शन लेल मूल शिक्षा नाम याद करब नहि, कारणक प्रासंगिकता जाँचब अछि। “एहि कारण ई निष्कर्ष निकलैत अछि” कहला पर प्रश्‍न हो--कारण वास्तवमे पक्षमे अछि? साध्यसँ सम्बन्धित अछि? विपरीत उदाहरण अछि? कारण स्वयं असिद्ध तँ नहि? 9.7 शब्दप्रमाण आ विश्वसनीय वक्ता मनुष्यक अधिकांश ज्ञान सामाजिक ST अर्जित होइत अछि। न्याय शब्दके स्वतंत्र प्रमाण मानि ई तथ्य दार्शनिक SoS महत्त्वपूर्ण बनबैत अछि। परम्परागत रूपमे 'आप्त'-वस्तुके यथार्थ जानयवला आ सत्य कहबाक इच्छावला विश्वसनीय वकता--क कथन ज्ञान दे सकैत अछि। आधुनिक संसारमे “वक्ता” व्यक्ति मात्र नहि; वैज्ञानिक संस्था, अभिलेखागार, न्यायालय, समाचार-संस्था, डिजिटल मंच आ विशेषज्ञ समुदाय सेहो हो सकैत अछि। मुदा न्यायीय अन्तर्दृष्टिक आधुनिक विस्तार करत समय अतिरिक्त प्रश्‍न जोड़ब आवश्यक अछि--पारदर्शिता, सहकर्मी समीक्षा, हित-संघर्ष, स्वतंत्र पुष्टिकरण, सुधार-प्रक्रिया आ डेटा उपलब्धता। 9.8 संशय, तर्क आ निर्णय न्याय संशयकें स्थायी मानसिक अवस्था नहि बनबैत। संशय जाँचक प्रेरणा अछि। तर्क स्वतंत्र प्रमाण नहि, मुदा असंगत सम्भावना हटाबय आ प्रमाणक मार्ग साफ करयवला सहायक विचार अछि। निर्णय तखन जे विरोधी पक्षक परीक्षणक बाद कोनो निष्कर्ष पर्याप्त प्रमाणसँ स्थापित हो। एतय न्यायक पद्धति सर्वसंशयवादसँ भिन्न अछि। प्रत्येक ज्ञानकें अनन्त प्रमाणक प्रतीक्षा मे रोकल नहि जाइत; सामान्य ज्ञान-प्रक्रिया कार्यरत रहैत अछि, समस्या उठला पर विशेष परीक्षण कएल जाइत अछि। 9.9 वाद, जल्प आ वितण्डा वाद सत्य-अन्वेषी संवादक आदर्श अछि। पक्षसभ साझा प्रमाण-पद्धति आ सिद्धान्तक भीतर कारण दैत छथि आ प्रतिपक्षक वास्तविक आपत्तिक उत्तर दैत छथि। जल्पमे लक्ष्य सत्यसँ अधिक विजय भऽ सकैत अछि; वितण्डामे व्यक्ति अपन सकारात्मक मत स्थापित किए बिना केवल प्रतिपक्ष ध्वस्त करबाक प्रयास करैत अछि। ई भेद आजक सार्वजनिक विमर्शमे अत्यन्त उपयोगी अछि। कोनो चर्चा बाह्य Se “बहस” होइतहुँ ज्ञान उत्पन्न नहि करैत, जँ प्रतिभागीक सफलता विरोधीकें अपमानित करब, विषय बदलि देब अथवा असम्भव प्रमाण- मापदण्ड बनायब मात्र हो। समानान्तर दर्शन वादक नेतिक अनुशासन अपनबैत अछि। 9.10 न्यायीय यथार्थवाद न्याय बाह्य जगत, स्थायी आत्मा, पदार्थ, गुण, सामान्य आदि अनेक सत्ताक यथार्थवादी प्रतिपादन करैत अछि। ज्ञान सामान्यतः जगतक वस्तुक पकड़ि सकैत अछि; भ्रम वास्तविक ज्ञान-प्रक्रियाक अपवादात्मक विफलता अछि, भ्रमक अस्तित्व स्वयं सम्पूर्ण जगतकें अवास्तविक सिद्ध नहि करैत। बौद्ध क्षणिकतावाद, अनात्मवाद आ अवधारणात्मक नामवादक संग न्याय-विवाद भारतीय दर्शनक Aas गहन बहससभमे अछि। एहि विवादकें केवल “आस्तिक बनाम नास्तिक” कहि देब दार्शनिक सामग्री नष्ट करब होयत; वास्तविक प्रश्‍न आत्मा, सार्वभौम, कारणता, भाषा आ ज्ञानक संरचनाक अछि। 9.11 दुःख आ अपवर्ग न्याय केवल तर्कक विद्यालय नहि; अंतिम लक्ष्य दुःखनिवृत्ति अथवा अपवर्गक Uta जुड़ल अछि। मिथ्याज्ञान दोष, प्रवृत्ति, जन्म आ दुःखक Yas सम्बन्धित मानल जाइत अछि; यथार्थ ज्ञान एहि चक्रक निवृत्तिमे सहायक। एतय तर्क आध्यात्मिक मुक्ति-साधनक रूप धारण करैत अछि। ई तथ्य आधुनिक पाठक लेल महत्त्वपूर्ण: Bach ‘Indian logic’ मात्र कहला सँ ओकर जीवन-दृष्टरि आधा गायब भऽ जाइत अछि। 9.12 ईश्वरक प्रशन आरम्भिक न्यायसूत्रक ईश्वरवादक स्वरूप पर व्याख्यात्मक विवाद अछि; परवर्ती न्याय विशेषतः उदयनादि आचार्य ईश्वरक अस्तित्वक पक्षमे व्यवस्थित तर्क विकसित करैत छथि। तेँ “न्याय सदा एकहि रूपक ईश्चरवादी दर्शन छल’ कहब सरलीकरण होयत। ऐतिहासिक चरण अलग राखब आवश्यक। ई उदाहरण समानान्तर दर्शनक नियम पुष्ट करेत अछि-परम्पराक बादक परिपक्व मतके ओकर आरम्भिक पाठमे पाछाँ सँ नहि पढ़। 9.13 नव्य-न्यायक दिशा गङ्गेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि प्रमाणमीमांसाकें एहन सूक्ष्म विश्लेषणात्मक भाषा दैत अछि जकर प्रभाव मिथिला, नवद्वीप आ व्यापक भारतीय विद्वत्‌ संसारपर पड़ल। सम्बन्ध, अवच्छेद, विषयता, कारणता, ज्ञानक स्वरूप आदि प्रश्‍नक विश्लेषण लेल नव्य-न्याय तकनीकी भाषा विकसित करैत अछि। एहि अध्यायमे नव्य-न्यायक पूर्ण विवेचन नहि; आगाँ मिथिलाक खण्डमे ओकर स्वतंत्र चर्चा होयत। एतय केवल एतेक महत्त्वपूर्ण जे न्यायपरम्पराक प्रमाण-केंद्रित अनुशासन स्थिर नहि रहल, समयक संग अधिक सूक्ष्म उपकरण बनौलक। 9.14 पूर्वपक्षः की न्याय अत्यधिक तकनीकी अछि? आपत्ति: यदि दर्शन एतेक पद, भेद आ तर्क-रचना पर निर्भर हो जाए, तँ जीवनक मूल प्रश्‍नसँ कटि सकैत अछि। उत्तरपक्षः तकनीकी भाषा साध्य नहि, अस्पष्टता घटाबयवला साधन अछि। जँ सूक्ष्म पद केवल विद्वत्ता प्रदर्शन बनि जाए तँ आलोचना उचित; मुदा जखन एक शब्दक अनेक अर्थ विवाद बिगाड़ैत हो, तखन अवधारणात्मक सूक्ष्मता अनिवार्य। न्यायीय आदर्श तकनीकीताक पूजा नहि, कारणक पारदर्शिता अछि। 9.15 समानान्तर दर्शनक पाठ न्यायसँ समानान्तर दर्शन पाँच मूल अनुशासन ग्रहण करैत अछि: संशय उठू ते परीक्षण करू; दाबी लेल प्रमाण स्पष्ट करू; प्रतिपक्षके सबल रूपमे प्रस्तुत HS; कारणक दोष खोजू; आ बहसक लक्ष्य विजय नहि, यथार्थ निर्णय राखू। संगहि आधुनिक स्रोत-समीक्षा, विज्ञानक पद्धति आ सामाजिक सत्ता-विश्लेषण जोड़ि ई परम्परा नूतन क्षेत्रमे विस्तारित कएल जा सकैत अछि। अध्याय-निष्कर्ष न्याय दर्शन तर्कशास्त्रसँ कहीं व्यापक अछि। प्रमाण, प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, संशय, तर्क, निर्णय, वाद-पद्धति, यथार्थवाद आ मुक्ति-ई सभ एकहि ज्ञानात्मक परियोजनाक अंग छथि। समानान्तर दर्शनक पद्धतिगत मेरुदण्ड AAS एहि कारण Bsa अछि जे न्याय प्रश्‍नक उत्तर केवल मतसँ नहि, सार्वजनिक रूपसँ जाँचल जा सकय एहन कारणसँ देबाक आग्रह करैत अछि। अध्याय-ग्रन्थसूची गौतम — Nyaya-sitra. वात्स्यायन — Nyaya-bhasya. उदयनाचार्य — Nyayakusumafijali. गङ्गेश उपाध्याय — Tattvacintamani. Bimal Krishna Matilal — Logic, Language and Reality; Perception.