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वैशेषिकक विशेषता ई अछि जे ओ दर्शनकें केवल मुक्ति वा आत्मज्ञानक प्रश्न धरि सीमित नहि रखैत, बल्कि
जगतमे जे-जे प्रकारक सत्ता मानल जाए तकर व्यवस्थित वर्गीकरण करबाक साहस करैत अछि। एहि कारण
वैशेषिक भारतीय तत्त्वमीमांसाक एकटा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण यथार्थवादी परम्परा अछि। एकर मूल प्रश्न अछि
वास्तविकता किन मूल प्रकारक वस्तु, गुण, क्रिया आ सम्बन्धसँ बनल अछि, आ परिवर्तनक बीच स्थायित्वकें
कोना बुझल जाए?
10.1 कणाद आ वैशेषिकसूत्र
वैशेषिकसूत्र परम्परागत रुपसँ कणादक नामसँ सम्बद्ध अछि, मुदा ग्रन्थक काल-निर्धारण विवादित अछि।
उपलब्ध पाठक दीर्घ सम्पादन-इतिहासक कारण एकर विचारसभकें एकहि क्षणक निर्मिति मानब उचित नहि।
आरम्भिक वैशेषिकमे द्रव्य, गुण आ कर्म विशेष प्रधानता पबैत अछि; परवर्ती व्याख्याकार प्रशस्तपादक
परम्परामे सामान्य, विशेष आ समवाय सहित छह पदार्थक सूची व्यवस्थित रुप ग्रहण Hea अछि। बादक
न्याय-वैशेषिक परम्परामे अभावकें सेहो स्वतंत्र पदार्थक रूपमे स्वीकारबाक प्रवृत्ति विकसित होइत अछि।
एहि विकासक्रमसँ एकटा पद्धतिगत शिक्षा भेटैत अछि: दार्शनिक वर्गीकरण स्थिर शब्दकोश नहि, बल्कि
समस्याक दबावमे विकसित होइत अवधारणात्मक संरचना अछि।
10.2 द्रव्य: गुण आ क्रियाक आधार
वैशेषिक नौ प्रकारक द्रव्य मानेत अछि--पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक् अथवा दिशा/ देश,
आत्मा आ मन। एहि सूचीमे भौतिक तत्व, स्थान-काल, चेतन आत्मा आ सूक्ष्म मन एकहि तत्त्वमीमांसीय वर्ग
GOH भीतर अबैत छथि, कारण द्रव्य गुण आ कर्मक आश्रय तथा किछु प्रकारक कार्यक समवायी कारण
भऽ सकैत अछि।
ई सूची आधुनिक विज्ञानक तत्व-सारणी नहि। “पृथ्वी”, जल”, “तेज” आ “वायु” वैशेषिक तत्त्वमीमांसाक श्रेणी
छथि; हुनका आधुनिक रसायनशास्त्रीय पदार्थक समान मानब अनैतिहासिक होयत। समानान्तर दर्शन तुलना
करैत समय एहि भेदके स्पष्ट राखैत अछि।
10.3 परमाणुवाद
वैशेषिकक प्रसिद्ध योगदान परमाणुवादी प्राकृतिक दर्शन अछि। पृथ्वी, जल, तेज आ वायुक परमाणु अविभाज्य
आ नित्य मानल जाइत छथि; दृश्य स्थूल वस्तु परमाणुसभक संयोजनसँ उत्पन्न आ विनष्ट होइत अछि।
आकाश, काल, दिक्, आत्मा आ मन एहि HAA भौतिक परमाणुसँ बनल नहि मानल जाइत।
ई परमाणुवाद आधुनिक परमाणु-विज्ञानक पूर्वरूप कहि देब आकर्षक मुदा भ्रामक होयत। आधुनिक परमाणु
प्रयोग, गणितीय भौतिकी आ उपकरणीय अवलोकनक परिणाम अछि; वैशेषिक परमाणुवाद तत्त्वमीमांसीय
आतार्किक अनुमानक प्रणाली अछि। तथापि दुनूकें संवादमे राखल जा सकैत अछि, कारण दुनू दृश्य जटिल
वस्तुक UST सूक्ष्म संरचनाक प्रश्न उठबैत अछि। ऐतिहासिक समानता नहि, समस्या-संरचनात्मक तुलना
उचित अछि।
10.4 गुण आ कर्म
गुण द्रव्यमे आश्रित होइत अछि, मुदा स्वयं स्वतंत्र द्रव्य नहि। रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व,
संयोग, विभाग, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न आदि अनेक गुण वैशेषिक-न्याय परम्परामे विश्लेषित
भेल। कर्म गति अथवा क्रियाक श्रेणी अछि।
एहि भेदक दार्शनिक महत्त्व ई अछि जे “वस्तु की अछि?” आ 'वस्तु कोन गुण रखैत अछि?” तथा “वस्तु की
करैत अछि?” तीनू प्रश्न एक नहि। भाषा प्रायः एहि स्तरसभकें MSHS Heat अछि। उदाहरणतः “लालिमा? आ
“लाल वस्तु समान सत्ता नहि; 'चलनाइ” आ 'चलैत वस्तुक सम्बन्ध सेहो विश्लेषण माँगैत अछि।
10.5 सामान्य आ विशेष
सामान्य ओ आधार अछि जाहिसँ अनेक व्यक्तिगत वस्तु एकहि जाति अथवा प्रकारक रूपमे चिन्हल जाइत
अछि। अनेक गायक भीतर 'गायत्व”, अनेक घटक भीतर “घटत्व? जकाँ उदाहरण परम्परामे देल जाइत अछि।
विशेष विशेषतः नित्य द्रव्यसभक अन्तिम भिन्नताकें बुझाबय लेल प्रयुक्त अवधारणा अछि।
एतय वैशेषिक सार्वभौमिकता आ व्यक्तित्वक समस्या उठबैत अछि-_अनेक वस्तुमे समानता केवल हमर
मनक वर्गीकरण अछि की वास्तविकतामे कोनो साझा तत्त्व सेहो अछि? आधुनिक तत्त्वमीमांसामे
universals, properties आ particulars पर जे विवाद अछि, तकर संग तुलना सम्भव अछि,
मुदा पदसभक ऐतिहासिक अर्थ अलग राखब आवश्यक।
10.6 समवायः अविच्छिन्न सम्बन्धक समस्या
समवाय वैशेषिकक अत्यन्त विशिष्ट अवधारणा अछि। गुण आ द्रव्य, अवयव आ अवयवी, सामान्य आ व्यक्ति
आदि एहन सम्बन्ध रखैत छथि जे साधारण बाह्य संयोग-जकाँ नहि। कपड़ा आ तन्तु, वस्तु आ ओकर गुण
एहि सम्बन्धकेँ केवल दू स्वतंत्र वस्तुक निकटता कहि HS बुझाओल नहि जा सकैत। समवाय एहि अविच्छिन्न
सम्बन्धकें तत्त्वमीमांसीय स्थान दैत अछि।
मुदा एतय प्रसिद्ध कठिनाई उठैत अछि: St गुणकें GAS जोड़बाक लेल समवाय चाही, तँ समवाय स्वयं द्रव्यसँ
कोना जुड़त? की दोसर समवाय चाही? परम्परागत उत्तर समवायकें विशिष्ट, नित्य, स्वयं सम्बन्धकारी सम्बन्ध
मानैत अछि। विरोधी परम्परासभ एहि पर प्रश्न उठबैत रहल।
10.7 अभावः अनुपस्थितिक अस्तित्व
परवर्ती न्याय-वैशेषिक विचारमे अभावक विस्तृत विश्लेषण विकसित भेल। 'टेबल पर पुस्तक नहि अछि’
एहि वाक्यक ज्ञान केवल टेबल आ पुस्तकक ज्ञान नहि, पुस्तकक अनुपस्थितिक ज्ञान सेहो अछि। अनुपस्थिति
की केवल भाषिक नकार अछि, की ओकर वस्तुगत आधार सेहो अछि? न्याय-वैशेषिक एहि प्रश्नकेँ गम्भीर
तत्त्वमीमांसीय विषय बनबैत अछि।
एहि विमर्शक आधुनिक महत्त्व स्पष्ट अछि। डेटा-विश्लेषण, न्यायिक प्रमाण, चिकित्सा आ इतिहासमे “किछु
नहि भेटल” स्वयं कखन प्रमाण बनैत अछि? अनुपस्थितिक प्रमाण तखन मजबूत होइत अछि जखन वस्तु
उपस्थित रहितै तँ उचित जाँचमे भेटबाक अपेक्षा छल। एहि प्रकार प्राचीन अभाव-विमर्श आधुनिक प्रमाण-
चिन्तनक संग उपयोगी संवाद खोलैत अछि।
10.8 कारणता: सांख्यसँ भिन्न मार्ग
सांख्य सत्कार्यवादक अनुसार कार्य कारणमे पूर्वरुपैँ निहित मानैत अछि; वैशेषिक-न्याय परम्परा सामान्यतः
आरम्भवाद अथवा असत्कार्यवादक दिशा लैत अछि-_कार्य उत्पत्तिसँ पूर्व ओहि कार्यरूपमे विद्यमान नहि,
कारण-संयोजनसँ नूतन कार्य उत्पन्न होइत अछि।
माटिसँ घट बनबाक उदाहरणमे सांख्य कहत जे कार्य कारणक रूपान्तरण; न्याय-वैशेषिक Tech नूतन समष्टि-
सत्ता मानयवला विश्लेषण विकसित करेत अछि। एहि विवादमे मूल प्रश्न अछि: परिवर्तनक अर्थ पहिनेसँ
विद्यमान रुपक प्रकट होयब अछि, की वास्तवमे नूतन वस्तुक उत्पत्ति?
10.9 आत्मा, मन आ ज्ञान
वैशेषिक-न्याय यथार्थवाद बाह्य जगत मात्र नहि, आत्माकें सेहो वास्तविक द्रव्य मानेत अछि। मन अत्यन्त सूक्ष्म
आ प्रत्येक शरीरक लेल एक मानल जाइत अछि; एक समयमे सीमित मानसिक सम्पर्क व्याख्या एहि मनद्वारा
कएल जाइत अछि। ज्ञान, सुख, दु:ख, इच्छा आदि आत्माक गुण मानल जाइत अछि।
ई दृष्टि सांख्यक “शुद्ध चेतन Your's भिन्न अछि। सांख्यमे बुद्धि-मन प्रकृतिक अंश, पुरुष शुद्ध साक्षी; न्याय-
वैशेषिकमे ज्ञान आत्माक गुण। एहि भेदकें स्पष्ट राखला सँ भारतीय आत्म-दर्शनक वास्तविक बहुलता सामने
अबैत अछि।
10.10 वैशेषिक आ न्यायः समीपता, मुदा पूर्ण समानता नहि
इतिहासक परवर्ती चरणमे न्याय आ वैशेषिक घनिष्ठ STS संयुक्त भेल, आ 'न्याय-वैशेषिक” संयुक्त परम्पराक
रूप प्रसिद्ध भेल। न्याय विशेषतः प्रमाण, तर्क आ विवाद-पद्धतिमे विकसित छल; वैशेषिक तत्त्वमीमांसीय
वर्गीकरणमे। परवर्ती लेखक दुनूक साधन एक-दोसरामे समाहित करैत गेलाह।
तथापि आरम्भिक इतिहासकें पाछाँसँ संयुक्त रूपमे पढ़ब उचित नहि। समानान्तर दर्शन विकासक्रम, पाठभेद
आ परम्परागत भिन्नताकें सुरक्षित राखैत अछि।
10.11 पूर्वपक्ष: एतेक श्रेणी मानबाक आवश्यकता किएक?
आपत्ति ई भऽ सकैत अछि जे द्रव्य, गुण, सामान्य, विशेष, समवाय, अभाव आदि स्वतंत्र तत्त्व मानलासँ जगत
अनावश्यक सत्ता-संख्या सँ भरि जाइत अछि। बौद्ध नामवाद अथवा क्षणिकतावादी दृष्टि विशेषतः स्थायी द्रव्य
आ सार्वभौमक आलोचना करैत अछि।
उत्तरपक्षमे वैशेषिक कहि सकैत अछि जे भाषा आ अनुभवमे वास्तविक भेदक उचित व्याख्या लेल अलग श्रेणी
आवश्यक अछि। यदि गुण, व्यक्ति, समानता आ सम्बन्ध सभकेँ एकहि प्रकारक सत्ता मानि ली तँ हम
वास्तविक भिन्नता बुझा नहि सकब। मुदा श्रेणीक संख्या केवल परम्परा कारण नहि; प्रत्येक श्रेणी अपन
व्याख्यात्मक काम सिद्ध करय--ई कसौटी समानान्तर दर्शन जोड़ेत अछि।
10.12 समानान्तर दर्शनक पाठ
वैशेषिकसँ तीन प्रमुख शिक्षा भेटैत अछि। पहिल, वास्तविकताक वर्गीकरण स्वयं दार्शनिक कार्य अछि; वर्गसभ
प्राकृतिक आ स्वत:सिद्ध मानि नहि लेबाक चाही। दोसर, सूक्ष्म सत्ता मानबाक अधिकार तखन अछि जखन
ओकर स्पष्ट व्याख्यात्मक भूमिका हो। तेसर, आधुनिक विज्ञानसँ ऐतिहासिक समानता गढ़बाक बदला समस्या-
संरचनात्मक संवाद अधिक फलदायी अछि।
अध्याय-निष्कर्ष
वैशेषिक भारतीय दर्शनक एकटा शक्तिशाली यथार्थवादी तत्त्वमीमांसा अछि। द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य,
विशेष, समवाय आ परवर्ती अभाव-विमर्श द्वारा ई पूछैत अछि जे जगतमे की-की प्रकारक सत्ता मानल जाए
आ ओकर परस्पर सम्बन्ध कोना बुझल जाए। एकर परमाणुवाद आधुनिक विज्ञान नहि, मुदा प्राकृतिक जगतक