पूर्वमीमांसा भारतीय दर्शनक ओहि महत्त्वपूर्ण परम्परासभमे सँ अछि जतय दर्शनक केन्द्र केवल जगत कोन पदार्थसँ बनल अछि अथवा आत्मा की अछि--एहि प्रश्‍नपर नहि, बल्कि मनुष्य कर्तव्य कोना जानेत अछि, वाक्य अर्थ कोना दैत अछि, प्रमाण अपन विश्वसनीयता कोना प्राप्त करैत अछि, आ विधिवाक्य क्रियाकें कोना निर्देशित करैत अछि--एहि प्रश्‍नसभपर अछि। जैमिनिक मीमांसासूत्र “धर्म”क जिज्ञासासँ आरम्भ होइत अछि। एतय धर्म केवल सामान्य धार्मिक भावना नहि; ओ मुख्यतः एहन कर्तव्य अछि जकर ज्ञान वैदिक विधिसँ प्राप्त होइत अछि। एहि कारण पूर्वमीमांसा एकहि समय विधि-व्याख्या, भाषा-दर्शन, ज्ञानमीमांसा आ कर्म- दर्शन अछि। 11.1 मीमांसा: जिज्ञासा आ व्याख्या “मीमांसा”क मूल भाव जाँच, विचार अथवा विवेचन अछि। पूर्वमीमांसाक ऐतिहासिक केन्द्र वैदिक कर्मकाण्डक उचित अर्थ आ अनुप्रयोग रहल, मुदा एहि व्याख्यात्मक HAS अत्यन्त सूक्ष्म दार्शनिक प्रश्‍न जन्म लेल। जँ दू वैदिक वाक्य परस्पर भिन्न दिशा देखबैत बुझाइत अछि तेँ कोन प्रधान? विधि, निषेध, मन्त्र, नामधेय, अर्थवाद--एहि भिन्न भाषिक कार्यसभकें कोना चिन्हल जाए? कोनो वाक्य स्वतंत्र विधि अछि की दोसर विधिक सहायक? प्रसंग, वाक्य-सन्निधि, शब्दार्थ आ प्रयोजनक भूमिका की? एहि प्रश्‍्नसभक कारण मीमांसा केवल अनुष्ठानक नियमावली नहि रहल। ओ व्याख्याक अनुशासन बनल। आधुनिक कानून, संविधान, धार्मिक ग्रन्थ, प्रशासनिक आदेश वा साहित्य Usd समय सेहो समान प्रकारक समस्या उठैत अछि--शब्दक सामान्य अर्थ, तकनीकी अर्थ, प्रसंग, अपवाद, उद्देश्य आ परस्पर संगति कोना तय हो? समानान्तर दर्शन एहि तुलनाके ऐतिहासिक समानता नहि, समस्या-संरचनाक संवाद मानेत अछि। 11.2 धर्म आ प्रत्यक्षक सीमा प्रत्यक्ष वर्तमान वस्तु्े ग्रहण करैत अछि। मुदा “की करबाक चाही?” क प्रत्येक उत्तर प्रत्यक्षसँ नहि निकलैत। आगि देखल जा सकैत अछि; मुदा “एहि अवसरपर अमुक कर्म कर्तव्य अछि” ई केवल आँखिसँ नहि देखाइत। मीमांसक एहि अन्तरकें धर्म-ज्ञानक विशिष्ट समस्या मानेत छथि। एहि कारण वैदिक वाक्यक प्रामाण्य हुनका लेल केन्द्रीय अछि। एतय तथ्य आ विधिक भेद महत्त्वपूर्ण अछि। “वर्षा भऽ रहल अछि” वर्णनात्मक कथन; “छाता लिअ” व्यावहारिक निर्देश; “वचन निभेनाइ कर्तव्य अछि” नैतिक कथन। भाषा केवल वस्तु वर्णन नहि करैत अछि, क्रिया निर्देशित सेहो करेत अछि। पूर्वमीमांसाक योगदान ई अछि जे ओ भाषाक एहि क्रियात्मक पक्षकें व्यवस्थित दार्शनिक विषय बनबैत अछि। 11.3 वेदक अपौरुषेयता मीमांसक वेदकें कोनो मानवीय लेखक अथवा ईश्वरक रचना मानि ओकर अधिकार स्थापित नहि करैत छथि। परम्परागत मीमांसा dah अपौरुषेय मानेत अछि-_अर्थात्‌ ओकर प्रामाण्य कोनो ऐतिहासिक व्यक्तिक विश्वसनीयतापर निर्भर नहि। ई दृष्टि न्यायीय ईश्वरवादी व्याख्यासँ भिन्न अछि। एहि भिन्नताकेँ बुझब आवश्यक अछि, कारण “वेद-प्रामाण्य स्वीकार करयवला सभ दर्शन such एकहि रूपमे मानैत अछि” एहन सामान्यीकरण गलत होयत। दार्शनिक प्रश्‍न एतय ई अछि: कोनो कथनक अधिकार ओकर लेखकसँ अबैत अछि, भाषिक परम्परासँ, सत्य- उत्पादक प्रक्रियासँ, अथवा खण्डनक अभावसँ? आधुनिक समानान्तर विमर्शमे एहि प्रश्‍नक रुप बदलि सकैत अछि--संस्था विश्वसनीय किएक, विशेषज्ञक कथन कखन स्वीकार्य, पुरान ग्रन्थक अधिकारक सीमा की? मुदा उत्तर पूर्वमीमांसासँ यथावत्‌ उधार नहि लेल जा सकैत; केवल प्रशनक YR ग्रहण कएल जा सकैत अछि। 11.4 स्वतःप्रामाण्य कुमारिल भट्टक ज्ञानमीमांसामे स्वतःप्रामाण्य अत्यन्त प्रभावशाली सिद्धान्त अछि। सामान्य रुपमे एकर आशय ई जे ज्ञान उत्पन्न होइत समय ओकर स्वीकार्यता लेल प्रत्येक बेर बाहरी प्रमाणपत्र आवश्यक नहि। जँ प्रत्येक ज्ञानक सत्यता सिद्ध करबाक लेल दोसर ज्ञान चाही, दोसर लेल तेसर, तेँ अनन्त श्रुंखला उत्पन्न होयत। तें ज्ञान सामान्यतः स्वीकार्य रूपमे उपस्थित होइत अछि; बादमे बाधक कारण भेटला पर ओकर अप्रामाण्य प्रकट भऽ सकैत अछि। एहि सिद्धान्तके “जे मनमे आयल से सत्य” नहि बुझबाक चाही। मीमांसा त्रुटि, बाध आ खण्डन स्वीकारैत अछि। मूल बिन्दु ज्ञानात्मक जीवनक प्रारम्भिक विश्वास अछि। हम प्रत्येक दृश्य, प्रत्येक स्मृति, प्रत्येक वाक्यकें पहिने शून्य विश्वसनीयता दऽ कऽ जीवन नहि चला सकैत छी। समानान्तर दर्शन एहि अन्तर्दृष्टिके त्रुटिसंशोध्य विश्वासक रूपमे ग्रहण करैत अछि: प्रारम्भिक स्वीकार्यता हो, मुदा उचित आपत्ति आएलापर पुनः परीक्षण अनिवार्य। 11.5 भट्ट आ प्राभाकर पूर्वमीमांसा भीतर एकरूपता नहि। कुमारिल HSH सम्बद्ध भट्ट मत आ प्रभाकरसँ सम्बद्ध प्राभाकर मत अनेक प्रश्‍नपर भिन्न अछि। प्रमाणक संख्या, ज्ञानक स्वरूप, वाक्यार्थ आ कर्तव्यक विश्लेषणमे मतभेद भेटैत अछि। एहि आन्तरिक Teach छोड़ि केवल “मीमांसा कहैत अछि” लिखब ऐतिहासिक जटिलता घटा देत। भट्ट परम्परा अर्थापत्ति आ अनुपलब्धि सहित अधिक प्रमाण मानेत अछि; प्राभाकर परम्परा अनुपलब्धिक स्वतंत्र प्रमाणत्व स्वीकार नहि Heal वाक्यार्थमे सेहो अभिहितान्वय आ अन्विताभिधानक प्रसिद्ध भेद विकसित भेल। तकनीकी विवरण अलग-अलग व्याख्याकारमे सूक्ष्म अछि, मुदा व्यापक प्रश्न स्पष्ट: शब्द पहिने स्वतंत्र अर्थ दैत अछि आ बादमे वाक्यमे Osa अछि, की शब्दक अर्थ आरम्भसँ वाक्यगत सम्बन्धमे प्रकट होइत अछि? 11.6 अर्थापत्ति आ अनुपलब्धि अर्थापत्ति एहन स्थिति बुझबैत अछि जतय ज्ञात तथ्यसभक संगति लेल कोनो अतिरिक्त तथ्य मानब आवश्यक बुझाइत अछि। पारम्परिक उदाहरणमे दिनमे नहि खायवला मुदा स्थूल व्यक्तिक स्थिति बुझबाक लेल रातिमे भोजनक कल्पना कएल जाइत अछि। ई सामान्य अनुमानसँ अलग प्रमाण अछि की अनुमानक विशेष रूप एहि पर भारतीय परम्परासभमे विवाद अछि। अनुपलब्धि अभाव-ज्ञानक प्रश्‍न उठबैत अछि। मेजपर घट नहि अछि--ई “नहि होयब” हम कोना जानैत छी? केवल मेज देखलासँ, की घटक अनुपलब्धि स्वतंत्र ज्ञानात्मक भूमिका निभबैत अछि? ई सूक्ष्म प्रश्‍न आधुनिक अनुपस्थिति-प्रमाणक समस्यासँ संवाद करैत अछि: “प्रमाण नहि भेटल” आ “नहि होयबाक प्रमाण भेटल” एक बात नहि। खोज पर्याप्त छल की नहि--ई निर्णायक प्रश्‍न अछि। 11.7 शब्द, अर्थ आ वाक्य मीमांसा भाषा-दर्शनक इतिहासमे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। शब्दार्थ स्थिरता, शब्द-शक्ति, वाक्य-संगति, आकांक्षा, योग्यता आ सन्निधि-जकाँ प्रश्न व्याख्याक आधार बनेत अछि। वाक्य बुझबाक लेल शब्दसभ केवल पास-पास होयब पर्याप्त नहि; हुनका बीच अर्थगत अपेक्षा आ संगति चाही। “पाथर पानी पीबैत अछि व्याकरणतः वाक्य भऽ सकैत अछि, मुदा सामान्य प्रसंगमे अर्थगत योग्यता प्रश्‍न उठबैत अछि। एहि भाषिक अनुशासनक आधुनिक महत्त्व स्पष्ट अछि। कानूनक एक शब्द, डिजिटल अनुबन्धक एक शर्त, धार्मिक वाक्यक एक अनुवाद, इतिहासक एक अभिलेख-_अर्थ प्रसंग बदललास बदलि सकैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि कारण अनुवादकें केवल शब्द-बदली नहि, दार्शनिक जिम्मेवारी मानैत अछि। 11.8 कर्म आ परिणाम मीमांसाक कर्म-सिद्धान्तमे अपूर्व-जकाँ धारणा कर्म आ दूरस्थ फल बीच सम्बन्ध समझेबाक प्रयत्न करेत अछि। आधुनिक वैज्ञानिक कारणतासँ एकर सीधा समानता स्थापित करब अनुचित होयत। ई विशिष्ट वैदिक कर्ममीमांसाक अवधारणा अछि। तथापि दार्शनिक स्तरपर प्रश्‍न रोचक अछि--एखन कएल क्रिया भविष्यक फलसँ कोना GST अछि, आ अदृश्य सम्बन्धक औचित्य कोन प्रमाणसँ? समानान्तर दर्शन एहि बिन्दुपर प्रमाण-अनुशासन लागू करेत अछि। परम्परागत सिद्धान्तके ओकर ऐतिहासिक तर्कमे बुझू; ओकरा आधुनिक भौतिक विज्ञानक सिद्धान्त घोषित नहि करु; आ जँ वर्तमान सार्वजनिक दाबी बनाओल जाए तँ वर्तमान प्रमाणक कसौटी सेहो लागू करू। पूर्वपक्षः पूर्वमीमांसा केवल कर्मकाण्ड अछि ई आपत्ति आधा सत्यक कारण भ्रामक अछि। वैदिक अनुष्ठान एकर केन्द्रीय ऐतिहासिक विषय अवश्य अछि, मुदा ओहि विषयक व्याख्यासँ भाषा, प्रमाण, कर्तव्य, ज्ञानक वैधता आ अभाव-जकाँ प्रश्‍नपर गहन दर्शन विकसित भेल। उत्तरपक्षः कर्मक व्याख्यासँ ज्ञानक दर्शन धरि पूर्वमीमांसाक दार्शनिक मूल्य ओकर प्रत्येक धार्मिक निष्कर्ष स्वीकार करबमे नहि, बल्कि एहि बातमे अछि जे ओ निर्देशात्मक भाषा, ग्रन्थ-अर्थ, प्रमाणक आत्मवैधता, खण्डन, अभाव आ कर्तव्यक ज्ञानक कठोर विश्लेषणक विषय बनबैत अछि। अध्याय-निष्कर्ष पूर्वमीमांसा देखबैत अछि जे दर्शन केवल “की अस्तित्वमान अछि?” नहि, “हम कर्तव्य कोना जानैत छी?” आ “भाषा हमरा क्रिया लेल कारण कोना दैत अछि?” सेहो अछि। समानान्तर दर्शन एहि परम्परासँ व्याख्याक