“वेदान्त”क शाब्दिक अर्थ वेदक अन्त अथवा परिपाकसँ ase अछि, मुदा दार्शनिक इतिहासमे ई उपनिषद, ब्रह्मसूत्र आ भगवद्गीता केन्द्रित अनेक परम्पराक विस्तृत परिवार अछि। वेदान्तकें केवल अट्वैतक पर्याय मानब गलत होयत। अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत आ अन्य वेदान्तीय धारासभ ब्रह्म, जगत, जीव, ईश्वर, बन्धन आ मुक्तिक सम्बन्धपर गम्भीर मतभेद रखैत अछि। 12.1 प्रस्थानत्रयी आ व्याख्याक प्रश्‍न वेदान्तीय परम्परासभ उपनिषद, ब्रह्मसूत्र आ भगवद्गीताके विशेष आधारग्रन्थ Arta छथि। मुदा एकहि पाठसमूहसँ भिन्न दर्शन कोना निकलैत अछि? एहि प्रश्‍नक उत्तर व्याख्यामे अछि। कोन वाक्य प्रधान, कोन गौण, कोन रूपक, कोन प्रत्यक्ष प्रतिपादन, कोन प्रसंगविशेष--एहि निर्णयसभसँ सम्पूर्ण तत्त्वमीमांसा बदलि सकैत अछि। एहि कारण ग्रन्थ स्वयं बिना व्याख्याकारक नहि बोलैत। “शास्त्रमे लिखल अछि” बहसक अन्त नहि; अगिला प्रश्‍न अछि--कोन पाठ, कोन पाठभेद, कोन प्रसंग, कोन व्याख्या, आ वैकल्पिक व्याख्याक उत्तर की? 12.2 ब्रह्मक प्रशन वेदान्तक केन्द्रमे ब्रह्मक धारणा अछि, मुदा ब्रह्मक स्वरूप पर मतभेद अछि। अद्वैतमे ब्रह्म अन्तिम अद्वितीय सत्य; विशिष्टाद्वैतमे ब्रह्म गुणसम्पन्न परम वास्तविकता, जकर संग जीव-जगत विशिष्ट सम्बन्धमे; gad ईश्वर आ जीवक वास्तविक भेद मूलभूत। एहि मतभेदक कारण “वेदान्त कहैत अछि जगत मिथ्या” जकाँ सामान्य वाक्य केवल अद्वैतक विशिष्ट व्याख्याक विकृत सार बनि सकैत अछि, सम्पूर्ण वेदान्तक नहि। 12.3 आत्मन्‌ आ ब्रह्मन्‌ उपनिषदिक महावाक्यसभ आत्मा आ परम वास्तविकताक सम्बन्धपर गहन व्याख्या उत्पन्न करैत अछि। अद्वैत एहि सम्बन्धक अभेदक दिशामे usd अछि। मुदा अभेदक अर्थ की? व्यक्तिगत मन, शरीर आ अहंकार ब्रह्म अछि--एहन साधारण समानता नहि। अद्वैत अविद्या, अध्यास, उपाधि आ ज्ञानक माध्यमसँ अनुभवगत भेद आ परमार्थक अभेदक सम्बन्ध समझबैत अछि। विशिष्टाद्वैत आ द्वैत एहि अभेद-पाठपर आपत्ति करेत अछि। जीवक निर्भरता, ईश्वरक व्यक्तित्व, भक्ति, कृपा आ वास्तविक भेदकें अलग रूपे प्रतिपादित कएल जाइत अछि। समानान्तर दर्शन एहि विवादकें “एक सही, बाकी भ्रम” कहि समाप्त नहि करैत; प्रत्येक मतक तर्क, पाठाधार आ अनुभव-दृष्टि अलग जाँचैत अछि। 12.4 जगत: वास्तविक, आश्रित की मिथ्यात्वक विशेष अर्थ? वेदान्त-विमर्शमे “मिथ्या” शब्दके साधारण “झूठ”क HAA पढ़लासँ भ्रम होइत अछि। अद्वैतमे जगत न पूर्ण शून्य, न ब्रह्म-जकाँ स्वतन्त्र परम सत्य; ओकर अनुभवगत व्यवहारिकता अछि, मुदा अन्तिम स्वतन्त्र सत्ता नहि। दोसर वेदान्तीय परम्परा जगतक वास्तविकताकें अधिक सकारात्मक रूपमे स्वीकारैत अछि। एहि विवादक आधुनिक दार्शनिक मूल्य ई अछि जे “वास्तविकता”क स्तर, निर्भरता आ अनुभवगत स्थायित्व अलग-अलग प्रश्‍न भऽ सकैत अछि। मुदा आधुनिक आभासी संसार वा क्वाण्टम भौतिकीकें अद्वैतक “वैज्ञानिक प्रमाण” कहब ऐतिहासिक आ अवधारणात्मक भूल होयत। 12.5 अविद्या आ बन्धन यदि अन्तिम सत्य एक अछि, तेँ भेदक अनुभव किएक? अद्वैतमे अविद्या अथवा अज्ञान एहि समस्याक केन्द्र अछि। मुदा अविद्या स्वयं ककर? ओकर अऱस्तित्वक स्तर की? AAS ओकर निवृत्ति कोना? अद्वैत परम्परा भीतर एहि प्रश्‍नपर विस्तृत बहस विकसित भेल। बन्धनकें केवल बाहरी शृंखला नहि, गलत आत्मपहिचानक रूपमे बुझल जाइत अछि। मनुष्य शरीर, मन, सामाजिक पद वा सीमित अहंकारकेँ अन्तिम आत्मस्वरूप मानि लैत अछि। ज्ञान एहि भ्रमक निवृत्ति करैत अछि। समानान्तर दर्शन एतय मनोवैज्ञानिक रुूपकक सम्भावना देखैत अछि, मुदा सामाजिक अन्यायकें केवल “अज्ञान” कहि वास्तविक संस्थागत शोषणक महत्त्व घटेबाक विरोध करैत अछि। 12.6 ज्ञान, कर्म आ भक्ति वेदान्तीय परम्परासभ मुक्तिक साधनपर सेहो भिन्न बल दैत अछि। अद्वैतमे आत्मब्रह्मज्ञान निर्णयक; विशिष्टाद्वैत आ द्वैत परम्परामे भक्ति, ईश्वरक अनुग्रह आ समर्पणक भूमिका अधिक केन्द्रीय। कर्मक स्थान तैयारी, धर्मपालन अथवा भक्तिक जीवनमे भिन्न रुपें व्याख्यायित होइत अछि। एहि विविधतासँ एकटा व्यापक शिक्षा भेटैत अछि: “भारतीय मुक्ति-दर्शन” एक सूत्रमे नहि समेटल जा सकैत। ज्ञान, कर्म, भक्ति, ध्यान, कृपा-एहि सभक सम्बन्ध विभिन्न परम्परामे अलग अछि। 12.7 शंकर आ आलोचनात्मक अद्वैत शंकरक अद्वैत भारतीय दर्शनक इतिहासमे अत्यन्त प्रभावशाली अछि। अध्यास, ब्रह्मज्ञान, श्रुति, तर्क आ अनुभूतिक सम्बन्ध हुनक व्याख्यामे महत्त्वपूर्ण। मुदा शंकरकें समस्त उपनिषदक एकमात्र सम्भव अर्थ मानब इतिहासक बहुलता मिटा देत। बादक अद्वैत स्वयं अनेक उपशाखामे विकसित भेल। समानान्तर दर्शन शंकरक तर्कक सम्मान करैत अछि, संगहि प्रश्‍न उठबैत अछि: जँ सामाजिक व्यक्ति अन्तिम स्तरपर एकत्वक भाग अछि, तँ व्यवहारिक स्तरपर जाति, लिंग वा जन्माधारित असमानता लेल की नैतिक परिणाम निकलैत अछि? तत्त्वमीमांसात्मक एकत्व स्वतः सामाजिक समानता उत्पन्न नहि करैत; एहि लेल पृथक नैतिक तर्क आवश्यक अछि। 12.8 रामानुज आ सम्बन्धात्मक एकता रामानुजक विशिष्टाक्वैत Tale एकताकें जीव-जगतक वास्तविक विविधतासँ जोड़ेत अछि। ईश्वर सर्वोच्च वास्तविकता छथि, मुदा जीव आ जगत केवल भ्रम नहि। निर्भरता आ भिन्नता एक व्यापक एकतामे समाहित होइत अछि। भक्ति एतय केवल भावनात्मक पूरक नहि, मुक्तिक मार्गक केन्द्रीय अंग अछि। दार्शनिक दृष्टिसँ ई प्रश्‍न महत्त्वपूर्ण अछि: एकता विविधताकें नष्ट कए बिना सम्भव अछि की? समानान्तर दर्शन सामाजिक क्षेत्रमे एहि प्रश्‍नक रूपान्तर देखैत अछि--साझा नागरिकता भाषिक, धार्मिक, क्षेत्रीय भिन्नता मिटौने बिना कोना सम्भव? ई तुलना केवल संरचनात्मक अछि, रामानुजक धार्मिक सिद्धान्तक राजनीतिक अनुवाद नहि। 12.9 ga आ भेदक वास्तविकता मध्वक द्वैत ईश्वर, जीव आ जगतक वास्तविक भेदपर बल दैत अछि। एतय मुक्ति अभेदमे विलय नहि, ईश्वरसँ उचित सम्बन्धमे अछि। ई दृष्टि वेदान्त भीतर तत्त्वमीमांसात्मक बहुलताक स्पष्ट प्रमाण ATS | वेदान्तक अध्ययन तखन परिपक्व होइत अछि जखन विद्यार्थी “वेदान्त = अद्वैत”क सरल समीकरण छोड़ि व्याख्यात्मक संघर्ष देखैत अछि। एकहि शास्त्रीय आधारपर भिन्न तर्क सम्भव--ई तथ्य स्वयं भाषा-दर्शन आ व्याख्याशास्त्रक महत्त्वपूर्ण शिक्षा अछि। पूर्वपक्ष: सभ वेदान्त अन्ततः एकहि बात कहैत अछि ई लोकप्रिय समन्वयवादी धारणा मतभेदक वास्तविकता घटा दैत अछि। जँ ब्रह्म-जीव सम्बन्ध, जगतक वास्तविकता आ मुक्तिक स्वरूपपर विरोधी दाबी अछि तँ “सभ एक” कहब दार्शनिक विवाद मिटा देब होयत। उत्तरपक्षः संवाद एकता नहि, बहुलताक अनुशासित अध्ययन समानान्तर दर्शन परम्परासभकें कृत्रिम SUS एक नहि Hed ओ पूछैत अछि--कहाँ साझा प्रश्‍न अछि, कहाँ वास्तविक मतभेद, आ कोन तर्क कोन पूर्वधारणापर निर्भर? 12.10 अध्यासक समस्या अट्वैतमे अध्यास एक वस्तुक धर्म दोसरपर आरोपित करब अछि-_आत्माक चेतना शरीर-मनक सीमा संग आ शरीर-मनक परिवर्तन आत्मासँ जोडल जाइत। “हम बूढ़ भऽ रहल छी”, “SA दुखी GP जकाँ साधारण अनुभवमे आत्मपहिचानक स्तर मिश्रित होइत अछि। ई केवल भाषिक भूल नहि; बन्धनक अस्तित्वगत आधार कहल जाइत अछि। मुदा अध्यासक आरम्भ कोना, आ अनादि AMA Tah अद्वैत संग कोना संगत--गंभीर आपत्ति छथि। उत्तर अनुभवक स्तर आ परम सत्यक भेदसँ देल जाइत, मुदा स्तरक सम्बन्ध फेर स्पष्ट करब UST अछि। मनोवैज्ञानिक रूपक उपयोगी भऽ सकैत, तथापि सामाजिक दजकिँ “मात्र अध्यास” कहब गलत। जाति वा गरीबी व्यवहारिक संस्थागत हानि दैत अछि; तत्त्वमीमांसात्मक अभेद ओकर निराकरणक अलग नैतिक- राजनीतिक कर्तव्य माँगैत अछि। 12.11 श्रुति आ तर्कक सम्बन्ध वेदान्तमे ब्रह्म-जकाँ इन्द्रियातीत विषयक विशेष स्रोत श्रुति मानल जाइत अछि। मुदा श्रुति-वाक्य बुझबा, विरोध सुलझाबा आ अर्थ निश्चित करबा लेल तर्क आवश्यक। तर्क पूर्ण स्वतंत्र Ula नहि कहल जा सकैत, तथापि व्याख्याक प्रत्येक चरणमे सक्रिय अछि। प्रतिपक्ष पूछत जे श्रुतिक प्रामाण्य स्वयं कोना स्थापित। परम्परागत उत्तर अपौरुषेयता, दोषाभाव वा अनुभूतिसँ सम्बन्धित हो सकैत। प्रत्येक उत्तर अलग प्रमाण-दायित्व रखैत अछि। अन्य धर्मक प्रकाशन-दाबी सामने निष्पक्ष कसौटी विशेष आवश्यक। समानान्तर दर्शन धार्मिक Teach परम्परा भीतरक प्रमाण मानैत, सार्वजनिक तत्त्वमीमांसात्मक निष्कर्ष लेल अतिरिक्त तर्क Atte अछि। पाठाधिकार प्रतिपक्षक प्रश्‍न रोकि नहि सकैत। 12.12 जीवन्मुक्ति आ नैतिकता ज्ञानसँ अज्ञान निवृत्त भेलाक बाद शरीर-मनक पूर्व कारण किछु समय चलैत रहय--जीवन्मुक्तिक एहन व्याख्या भेटैत अछि। प्रश्‍न ई जे मुक्त व्यक्ति कर्तव्य, करुणा आ सामाजिक सम्बन्धमे कोना व्यवहार करत। जँ सभ आत्मा एक, तेँ दोसरक पीड़ा अपन पीड़ासँ पूर्ण अलग नहि--एहन नैतिक प्रेरणा निकालल जा सकैत। मुदा तत्त्वमीमांसात्मक एकता स्वतः समान व्यवहार सुनिश्चित नहि; इतिहासमे सिद्धान्त आ प्रथा बीच अन्तर सम्भव। मुक्तिक दाबी व्यक्तिकें आलोचना सँ ऊपर नहि रखय। शिष्य, सम्पत्ति वा शरीरपर विशेष अधिकार माँगनिहार Teh संस्थागत कसौटी सहय पड़त। ज्ञानक नैतिक फल व्यवहारमे जाँचल जाए। 12.13 पूर्वपक्ष: जगत मिथ्या तँ नैतिकता मिथ्या आपत्ति अछि जे जगत अन्तिम सत्य नहि तँ पीड़ा, कर्तव्य आ न्याय सेहो निम्न स्तरक भ्रम; अद्वैत सामाजिक उदासीनता उत्पन्न करि सकैत अछि। उत्तर ई जे व्यवहारिक स्तर ज्ञानपूर्व आ ज्ञानोत्तर जीवनमे उपेक्षणीय नहि। आगिक व्यवहारिक सत्यता जकाँ पीड़ा आ कर्मक परिणाम वास्तविक प्रभाव दैत अछि। शास्त्रीय अनुशासन नेतिक तैयारीपर बल दैत अछि। तथापि उत्तरक पर्याप्तता आचरणपर जाँचल जाए। व्यवहारिक अन्यायके परमार्थक भाषासँ छोट करब अनुचित। स्तर-भेद जिम्मेदारी व्यवस्थित करय, समाप्त नहि। अध्याय-निष्कर्ष वेदान्त एक दर्शन नहि, उपनिषदिक-ब्रह्मसूत्रीय प्रश्‍नसभक अनेक व्यवस्थित उत्तरक परिवार अछि। एकर अध्ययन आत्मा, ब्रह्म, जगत, ईश्वर, ज्ञान, भक्ति आ मुक्तिक प्रश्नकें संगहि व्याख्याक बहुलता बुझबैत अछि। समानान्तर दर्शनक लेल वेदान्तक प्रमुख शिक्षा अछि--एकहि प्रतिष्ठित पाठक अनेक व्याख्या सम्भव, अतः पाठाधिकार तर्कक स्थान नहि AS सकैत।