बौद दर्शनकें केवल धार्मिक उपदेश अथवा केवल “सब किछु शून्य अछि”क सूत्रमे समेटब ओकर विशाल दार्शनिक परम्पराक अन्याय होयत। दुःख, अनित्यता, अनात्म, प्रतीत्यसमुत्पाद, कर्म, निर्वाण, ज्ञान, भाषा, प्रत्यक्ष, अनुमान, करुणा आ शून्यता--एहि सभपर बौद्ध परम्परासभ अनेक शताब्दीसँ गहन विवाद विकसित कएलक। “बौद्ध दर्शन” स्वयं बहुवचन अछि। 13.1 दुःखसँ दर्शनक आरम्भ बौद्ध चिन्तनक एक विशिष्टता ई अछि जे दर्शन अस्तित्वगत समस्यासँ जुड़ल अछि। दुःख केवल अमूर्त पहेली नहि; जन्म, जरा, रोग, मृत्यु, वियोग, असन्तोष आ आसक्तिक अनुभवसँ दर्शन आरम्भ होइत अछि। चारि आर्यसत्यक संरचना रोग-निदान-जकाँ अछि: दुःख, दुःखक कारण, निरोधक सम्भावना, आ निरोधक मार्ग। एहि संरचनामे सत्यक खोज जीवन-परिवर्तनसँ जुड़त अछि। गलत दृष्टि केवल बौद्धिक भूल नहि, दुःखक कारण बनि सकैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि अन्तर्दृष्टिकें व्यापक रूप दैत अछि-कोनो सिद्धान्तक सत्यता तर्कसँ जाँचू, मुदा ओकर मानवीय परिणाम सेहो देखू। परिणाम सत्यक विकल्प नहि, नैतिक मूल्यांकनक अतिरिक्त आयाम अछि। 13.2 अनित्यता संस्कारित वस्तुसभ परिवर्तनशील छथि। अनित्यताक अर्थ केवल “सभ नष्ट होयत” नहि; वस्तु आ अनुभव निरन्तर कारण-शर्तपर निर्भर परिवर्तनमे अछि। स्थायित्वक अनुभव व्यवहारिक STS उपयोगी हो सकैत अछि, मुदा ओकरा अपरिवर्तनशील सार मानलासँ आसक्ति उत्पन्न होइत अछि। आधुनिक विज्ञान परिवर्तन देखबैत अछि, मुदा बौद्ध अनित्यताकें आधुनिक भौतिकी द्वारा “सिद्ध” कहब अनुचित। बौद्ध सिद्धान्तक उद्देश्य अस्तित्वगत-मुक्तिमूलक सेहो अछि। समान शब्द-परिवर्तन--दू परम्परामे अलग तर्कात्मक कार्य करैत अछि। 13.3 अनात्म बौद्ध दर्शन स्थायी, स्वतन्त्र, अपरिवर्तनशील आत्मतत्त्वपर प्रश्‍न उठबैत अछि। व्यक्तिक अनुभव रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार आ विज्ञान-जकाँ स्कन्धक प्रक्रियासँ विश्लेषित कएल जाइत अछि। “अनात्म”क अर्थ “व्यक्ति बिल्कुल अस्तित्वहीन” नहि; व्यवहारिक व्यक्ति, नैतिक जिम्मेवारी आ कर्मक क्रम रहैत अछि, मुदा स्थायी आत्मसारक दाबी अस्वीकार कएल जाइत अछि। एतय एक गम्भीर प्रश्‍न उठैत अछि: Gt स्थायी आत्मा नहि, तेँ कर्मफल ककर? स्मृति आ नैतिक उत्तरदायित्व कोना? बौद्ध परम्परासभ कारणात्मक निरन्तरता, क्षणिकता आ व्यक्तित्वक प्रवाहक विभिन्न सिद्धान्त विकसित करैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि प्रश्‍नकै आधुनिक व्यक्तिगत पहिचान-विमर्शसँ संवादमे राखि सकैत अछि, मुदा दुनूकें समान सिद्धान्त नहि मानैत। 13.4 प्रतीत्यसमुत्पाद प्रतीत्यसमुत्पादक मूल अन्तर्दृष्टि अछि--वस्तु आ अवस्था कारण-शर्तपर निर्भर उत्पन्न होइत अछि। “ई रहला सँ ओ होइत अछि; ई उत्पन्न भेला सँ ओ उत्पन्न”--एहन संरचना बौद्ध कारण-दुष्टिक आधार अछि। मानव दुःख सेहो कारणयुक्त अछि, अत: कारण बदलला सँ परिणाम बदलि सकैत अछि। ई दृष्टि नियतिवाद नहि। यदि सभ पूर्वनिर्धारित होइत तँ साधना निरर्थक होइत। उलटे, कारण-शर्तक निर्भरता परिवर्तनक सम्भावना खोलैत अछि। सामाजिक समानान्तरमे सेहो अन्यायकेँ जन्मजात अथवा अपरिवर्तनीय भाग्य नहि, कारण-सम्बन्धित संस्था आ व्यवहारक परिणाम बुझल जा सकैत अछि; मुदा ई आधुनिक सामाजिक विस्तार अछि, प्राचीन सूत्रक प्रत्यक्ष राजनीतिक अर्थ नहि। 13.5 मध्यमक आ शून्यता नागार्जुनसँ सम्बद्ध मध्यमक परम्परा स्वभाव-स्वतन्त्र, स्वयंस्थित अन्तर्निहित प्रकृति-पर कठोर आलोचना करेत अछि। शून्यता “किछु नहि अछि”क नास्तिक्यवादी घोषणा नहि; वस्तुसभ स्वभावतः स्वतन्त्र नहि, सम्बन्ध आ निर्भरतामे अछि। एहि कारण मध्यमक शाश्चतवाद आ उच्छेदवाद दुनू अतिसँ बचबाक मध्यम मार्ग प्रस्तुत करैत अछि। शून्यताकें स्वयं स्थायी तत्त्व बना देब मध्यमकक उद्देश्यक विरुद्ध होयत। जँ “शून्यता”कें नूतन परम पदार्थ मानि लेल जाए तँ स्वभाववाद दोसर रूपमे लौटि आएत। एहि आत्म-आलोचनात्मक संरचनामे समानान्तर दर्शन महत्त्वपूर्ण शिक्षा देखैत अछि: आलोचनाक अवधारणा स्वयं आलोचनासँ मुक्त नहि। 13.6 द्विसत्य मध्यमक परम्परामे संवृति-सत्य आ परमार्थ-सत्यक भेद महत्त्वपूर्ण। व्यवहारिक संसारमे भाषा, व्यक्ति, कारण, मार्ग, नैतिकता कार्य Hed अछि; परम विश्लेषणमे वस्तुक स्वतन्त्र स्वभाव नहि भेटैत। एहि भेदके “दू परस्पर विरोधी सत्य”क सरल सूत्रमे नहि पढ़बाक चाही। व्यवहारिक सत्य निरर्थक नहि; ओकर बिना परमार्थक चर्चा सेहो सम्भव नहि। समानान्तर दर्शन एहि सिद्धान्तसँ “सभ दृष्टिकोण बराबर” निष्कर्ष नहि निकालैत। बौद्ध द्विसत्य विशिष्ट मुक्तिमूलक आ तत्त्वमीमांसात्मक सन्दर्भ रखैत अछि। 13.7 योगाचार योगाचार परम्परा अनुभव, विज्ञान आ विषय-वस्तु सम्बन्धक सूक्ष्म विश्लेषण करैत अछि। “विज्ञप्तिमात्र”कें साधारण “केवल हमर मन अस्तित्वमान”क व्यक्तिवादी आदर्शवाद मानब विवादास्पद सरलीकरण अछि। योगाचारक उद्देश्य अनुभवक द्वैतात्मक संरचना, कर्मबीज, आलयविज्ञान आ ज्ञान-परिवर्तनक विश्लेषणसँ जुड़ल अछि। एहि परम्पराक अध्ययन देखबैत अछि जे बौद्ध दर्शन केवल मध्यमक नहि। बौद्ध आन्तरिक बहस वास्तविक अछि; एक शाखाक सूत्र सम्पूर्ण बौद्ध दर्शनक प्रतिनिधि नहि। 13.8 दिङ्नाग आ धर्मकीर्तिः प्रमाणमीमांसा दिङ्नाग आ धर्मकीर्ति बौद्ध ज्ञानमीमांसा आ तर्कक इतिहासमे निर्णायक छथि। प्रत्यक्ष आ अनुमानक विश्लेषण, अवधारणा, अपोह, हेतु आ प्रमाणक प्रश्‍नपर हुनकर कार्य न्याय आ मीमांसा परम्परासँ दीर्घ संवाद- विवादमे विकसित भेल। बौद्ध प्रमाणमीमांसा सामान्यतः प्रत्यक्ष आ अनुमानकें प्रमुख प्रमाण मानेत अछि। शब्द-ज्ञान अन्ततः अनुमानात्मक अथवा अवधारणात्मक संरचनासँ विश्लेषित होइत अछि। एहि दृष्टिक विरोधमे मीमांसक आ नैयायिक अपन अलग तर्क प्रस्तुत करैत छथि। भारतीय दर्शनक जीवन्तता एतहि अछि--परम्परासभ एक- दोसराकेँ पढ़ैत, चुनौती दैत, अपन सिद्धान्त परिष्कृत करैत अछि। 13.9 करुणा आ प्रज्ञा विशेषतः महायान परम्परामे करुणा आ प्रज्ञाक संयुक्त आदर्श विकसित होइत अछि। केवल भावुक करुणा गलत उपाय चुनि सकैत अछि; केवल विश्लेषणात्मक प्रज्ञा मानवीय दुःखसँ कटि सकैत अछि। बोधिसत्त्व आदर्श मुक्तिक व्यक्तिगत अवधारणाकें व्यापक प्राणीहितसँ जोडत अछि। समानान्तर दर्शन एहि बिन्दुसँ अपन सूत्र विकसित करैत अछि--“करुणा बिना तर्क निर्दय भऽ सकैत अछि; तर्क बिना करुणा भ्रमित भऽ सकैत अछि।” ई एहि ग्रन्थक आधुनिक प्रतिपादन अछि, कोनो प्राचीन बौद्ध सूत्रक शब्दशः उद्धरण नहि। पूर्वपक्षः बौद्ध दर्शन नास्तिक शून्यवाद अछि ई आपत्ति अनेक भिन्न सिद्धान्तकें एक शब्दमे मिला दैत अछि। ईश्वर-सृष्टिकर्ताक अस्वीकृति, स्थायी आत्माक आलोचना आ स्वभाव-शून्यता तीन अलग दार्शनिक प्रश्‍न छथि। “शून्यता = किछु नहि” मध्यमकक गलत पाठ अछि। उत्तरपक्षः निर्भरता, प्रक्रिया आ मुक्तिक दर्शन बौद्ध दर्शन अस्तित्वक स्वतन्त्र सारपर प्रश्‍न उठबैत अछि, मुदा कारणता, नैतिकता, साधना आ दुःख-निरोधक व्यवहारिक संसार स्वीकारैत अछि। ओकर नकारात्मक तर्कक उद्देश्य अनेक बेर गलत आसक्ति हटेनाइ अछि, शून्य नास्तित्व स्थापित करब नहि। 13.10 प्रतीत्यसमुत्पाद आ कारण प्रतीत्यसमुत्पाद कहैत अछि निर्दिष्ट शर्त रहला पर घटना उत्पन्न, शर्त बदलला पर परिणाम बदलैत अछि। ई एक पहिल कारणक खोजक बदला सम्बन्धित प्रक्रिया देखैत अछि। दुःखक कारण Seal सम्भव--एहि कारण सिद्धान्त मुक्तिमूलक अछि। बारह निदानक क्रमक विभिन्न व्याख्या अछि; ओकरा सरल जैविक जीवनचक्र वा एकमात्र मनोवैज्ञानिक क्रम मानब सावधानी माँगैत। ग्रन्थ आ परम्पराविशेष स्पष्ट हो। आधुनिक प्रणाली-विज्ञानसँ संरचनात्मक तुलना सम्भव, मुदा बौद्ध सिद्धान्तक वैज्ञानिक प्रमाणीकरणक दावा नहि। उद्देश्य, प्रमाण आ पदावली भिन्न। 13.11 द्विसत्यक विवेचन संवृति सत्य व्यवहार, भाषा आ सामान्य भेदक संसार; परमार्थ सत्य वस्तुसभक स्वभावशून्यता सम्बन्धी बोध। द्विसत्य दू अलग जगत नहि। व्यवहारिक कथन बिना उपदेश सम्भव नहि, परमार्थक नामपर भाषा पूर्ण त्यागल नहि जा सकैत। संवृति कॅ झूठ कहला पर नैतिकता आ करुणा कमजोर पड़त। परमार्थ केँ एक उच्च वस्तु मानला पर शून्यताकें नूतन सार बना देल जायत। मध्यमक आलोचना दूनू अतिवाद रोकैत अछि। सामाजिक विश्लेषणमे ई भेद सावधानीसँ उपयोग हो। संस्था “मात्र नाम होइतहुँ वास्तविक हानि दे सकैत; नामनिर्भरता परिवर्तनक सम्भावना देखबैत, हानि नकारैत नहि। 13.12 बौद्ध प्रमाणमीमांसा दिङ्नाग-धर्मकीर्ति परम्परा प्रत्यक्ष आ अनुमानकें मुख्य प्रमाण मानि अवधारणा, स्वलक्षण, सामान्य आ शब्दक सम्बन्धक सूक्ष्म विश्लेषण करैत अछि। प्रत्यक्ष अवधारणारहित कहल जाइत, जखनकि भाषा सामान्यीकरणसँ काम करैत अछि। आपत्ति अछि जे पूर्ण अवधारणारहित अनुभव कोना ज्ञात वा स्मरण होयत। बौद उत्तर ज्ञानक क्षण, स्वसंवेदन आ अनुमानक भूमिका सँ Bsc अछि। मतक भीतर सेहो विविध व्याख्या अछि। न्यायसँ विवाद भारतीय ज्ञानमीमांसाक बहुलता देखबैत अछि। एक पक्ष बाह्य सामान्यक यथार्थता, दोसर भिन्नता-आधारित अवधारणा पर बल दैत। समान उदाहरणपर अलग तत्त्वमीमांसात्मक लागत स्पष्ट कएल जाए। 13.13 पूर्वपक्षः अनात्म नैतिक जिम्मेदारी नष्ट करैत जँ स्थिर आत्मा नहि, तँ कर्मकर्ता आ फलभोगी एक कोना? अपराध कर्ता क्षण बदलि गेल, तखन दण्ड ककरा? ई आपत्ति बौद्ध दर्शन लेल केन्द्रीय। उत्तर कारणगत निरन्तरता मे अछि: बादक प्रवाह पूर्ण भिन्न नहि, पूर्व क्षणसँ शर्तबद्ध। दीपक शिखा वा बीजक रूपक निरन्तरता बिना अपरिवर्तनशील सार बुझबैत अछि। तथापि नैतिक पहचानक व्यावहारिक सीमा रहैत अछि। स्मृति, आशय, देह आ सामाजिक सम्बन्ध जिम्मेदारी मापबामे भूमिका रखैत। अनात्म स्वेच्छाचारी दोषमुक्ति नहि। अध्याय-निष्कर्ष बौद्ध दर्शन दुःखक अनुभवसँ आरम्भ HS अनित्यता, HATH, प्रतीत्यसमुत्पाद, शून्यता, द्विसत्य, चेतना आ प्रमाण धरि विस्तृत अछि। एकर विभिन्न शाखासभ परस्पर असहमत होइतहुँ एक साझा अनुशासन देखबैत अछि-मानवीय Gah कारण बुझू, भ्रमक संरचना जाँचू, आ ज्ञानें जीवन-परिवर्तनसे जोड़।