जैन दर्शन भारतीय बौद्धिक इतिहासमे अहिंसा, जीव-अजीव, कर्म, अनेकान्तवाद, नयवाद आ स्याद्वादक अत्यन्त विकसित परम्परा प्रस्तुत करैत अछि। लोकप्रिय वर्णनमे अनेकान्तवादकें “सभक अपन सत्य” कहि देल जाइत अछि, मुदा ई दार्शनिक रुपसँ गलत सरलीकरण अछि। जैन दृष्टि वस्तुक बहुपक्षीयता स्वीकारैत अछि, संगहि कथनकें शर्त, दृष्टिकोण आ प्रसंगसँ अनुशासित करैत अछि। 14.1 जीव आ अजीव जैन तत्त्वमीमांसामे जीव चेतन तत्त्व अछि आ अजीव गैर-चेतन तत्त्वसभक BA जीव मूलत: ज्ञान आ चेतनाक क्षमता रखैत अछि, मुदा कर्मक बन्धन ओकर अभिव्यक्तिके सीमित करैत अछि। अजीवक वर्गीकरणमे पुदूल, धर्म, अधर्म, आकाश आ काल-जकाँ तत्त्वक विशिष्ट जैन अर्थ अछि। “धर्म” आ “अधर्म” एतय नेतिक पुण्य- पाप मात्र नहि, गति आ विश्रामक सहायक तत्त्वक तकनीकी अर्थ सेहो रखैत अछि; अनुवादमे एहि भेदक सावधानी आवश्यक। 14.2 कर्मः नैतिकता आ तत्त्वमीमांसा जैन कर्म-सिद्धान्तमे कर्म केवल रूपक नैतिक लेखा नहि; सूक्ष्म भौतिक बन्धनक रूपमे विश्लेषित परम्परा विकसित भेल। आत्माक प्रवृत्ति, कषाय आ कर्मक आगमन-बन्धन, संवर, निर्जरा आ मोक्षक विस्तृत सिद्धान्त अछि। आधुनिक पाठक एहि तत्त्वमीमांसाकें स्वीकार वा अस्वीकार HS सकैत अछि, मुदा ऐतिहासिक सिद्धान्तकें ओकर अपन श्रेणीमे बुझब आवश्यक। कर्मके आधुनिक वैज्ञानिक “ऊर्जा” कहि देब प्रमाणहीन समानता होयत। समानान्तर दर्शन एहन विजयवादी अनुवादसँ बचैत अछि। 14.3 अहिंसा अहिंसा जैन नेतिकताक केन्द्रीय मूल्य अछि। हिंसा केवल प्रत्यक्ष हत्या नहि; जीवकें हानि पहुँचेनाइ, वाणी, मन, व्यवसाय, उपभोग आ जीवनशैली सेहो नेतिक परीक्षणक विषय बनैत अछि। मुनि आ गृहस्थक व्रतक स्तर अलग भऽ सकैत अछि, जाहिसँ नैतिक आदर्श आ व्यवहारिक जीवन बीच श्रेणीबद्ध अनुशासन विकसित होइत अछि। अहिंसाक दार्शनिक शक्ति एहि बातमे अछि जे ओ नैतिक समुदायक सीमा मनुष्यसँ बाहर जीवजगत धरि विस्तृत करैत अछि। आधुनिक पर्यावरणीय नैतिकतासँ संवाद एतय फलदायी अछि, मुदा जैन सिद्धान्तकें आधुनिक पारिस्थितिकी विज्ञानक पूर्वरूप कहब अनुचित। 14.4 अनेकान्तवाद वस्तु अनेक पक्ष रखैत अछि। कोनो एक कथन विशिष्ट दृष्टिसँ उचित भऽ सकैत अछि, मुदा वस्तुक सम्पूर्णता समाप्त नहि करैत। ई अनेकान्तवादक मूल प्रेरणा अछि। उदाहरणतः माटिक घट एक अर्थमे स्थायी-किछु समय धरि एक वस्तु; दोसर अर्थमे परिवर्तनशील--माटि, ताप, टूटन, समयक प्रक्रियामे। “स्थायी” आ “अस्थायी” कथन शर्त बिना विरोधी, उचित दृष्टि स्पष्ट कएलापर पूरक भऽ सकैत अछि। मुदा एहि सिद्धान्तसँ “घट अछि” आ “घट नहि अछि” एकहि समय, एकहि स्थान, एकहि अर्थमे समान रूपसँ सत्य नहि बनेत। दृष्टि, काल, सम्बन्ध आ अर्थ स्पष्ट करब आवश्यक। तेँ अनेकान्तवाद सापेक्षतावाद नहि, शर्तित कथनक अनुशासन अछि। 14.5 नयवाद “नय” deh देखबाक आंशिक दृष्टि अथवा विश्लेषण-पद्धति अछि। प्रत्येक नय किछु पक्ष उजागर Het अछि, किछु छोड़ैत अछि। समस्या तखन होइत अछि जखन आंशिक दृष्टि अपनाकेँ सम्पूर्ण घोषित करैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि विचारसँ विशेष संवाद करैत अछि। आर्थिक इतिहास वर्ग देखैत अछि; भाषिक इतिहास भाषा; स्त्रीवादी अध्ययन लिंग; राजनीतिक इतिहास राज्य। प्रत्येक महत्त्वपूर्ण, मुदा कोनो एक स्वतः सम्पूर्ण इतिहास नहि। तथापि ई आधुनिक पद्धतिगत विस्तार अछि; जैन नयवादक ऐतिहासिक अर्थक यथावत्‌ आधुनिक सामाजिक सिद्धान्त मानब नहि चाही। 14.6 स्याद्वाद आ सप्तभङ्गी स्याद्वाद कथनक शर्तित स्वरूपपर बल दैत अछि। “स्यात्‌”क अर्थ केवल अनिश्चित “शायद” नहि; विशिष्ट दृष्टि वा शर्तक अधीन कथनक वैधता सूचित करैत अछि। सप्तभङ्गी सात प्रकारक शर्तित प्रतिपादनक योजना विकसित करैत अछि-_अस्ति, नास्ति, अस्ति-नास्ति, अवक्तव्य तथा एहि रूपसभक संयोजन। एहि योजनाकेँ सामान्य विरोधाभासक स्वीकृति मानब गलत। कथनसभ भिन्न दृष्टि, काल अथवा सम्बन्धक अधीन छथि। दार्शनिक उद्देश्य भाषा द्वारा बहुपक्षीय वास्तविकताकें एकरेखीय बनि जाएबासँ रोकब अछि। 14.7 ज्ञान आ केवलज्ञान सामान्य जीवक ज्ञान कर्मावरणसँ सीमित; पूर्ण मुक्त जीवक केवलज्ञान सर्वज्ञतासँ सम्बद्ध मानल जाइत अछि। सामान्य ज्ञानक विभिन्न रूप, प्रत्यक्ष-परोक्षक जैन वर्गीकरण आ प्रमाण-नयक सम्बन्ध विस्तृत परम्परा बनबैत अछि। समानान्तर दर्शन ऐतिहासिक सर्वज्ञता-दावाकें आधुनिक सार्वजनिक प्रमाणक स्वतः आधार नहि मानैत। मुदा सीमित ज्ञाताक आंशिक दृष्टि सम्बन्धी जैन विश्लेषण ज्ञानात्मक विनम्रताक शक्तिशाली स्रोत अछि। 14.8 अनेकान्त आ सहिष्णुता अनेकान्तवादक आधुनिक उपयोग प्रायः धार्मिक सहिष्णुताक समर्थनमे होइत अछि। एहि उपयोगमे नैतिक शक्ति अछि, मुदा सावधानी चाही। सहिष्णुता केवल “सभ सही” नहि। जँ कोनो मत हिंसा, दासता वा जन्माधारित अपमान उचित ठहरबैत अछि, तेँ अनेक दृष्टिक सम्मान ओकर नेतिक आलोचना रोकैत नहि। समानान्तर दर्शनक सूत्र: दृष्टि बहु हो सकैत अछि, गरिमाक कसौटी सेहो आवश्यक। बहुलता आ नैतिक विवेक दुनू संग चलय। पूर्वपक्ष: अनेकान्तवाद स्वयं विरोधाभासी अछि जँ कहल जाए “कोनो कथन पूर्ण नहि”, तँ ई कथन स्वयं पूर्ण अछि की नहि? ई गम्भीर आपत्ति अछि। उत्तरपक्षः सिद्धान्त स्वयं शर्तित जैन परम्पराक शक्ति एतय अछि जे अनेकान्तवाद अपन दाबीकेँ सेहो दृष्टि-सापेक्ष विश्लेषणक भीतर रखैत अछि। ओ सर्वज्ञ सामान्य जीवक दावा नहि, सीमित कथनक अनुशासन अछि। 14.9 जीव आ अजीवक सम्बन्ध जैन तत्त्वमीमांसा जीवकें चेतन द्रव्य आ अजीवकें अन्य द्रव्य-श्रेणी रूपमे भेद करैत अछि। कर्म केवल नैतिक अभिलेख नहि, जीवसँ बन्हनिहार सूक्ष्म पदार्थ रूपमे व्याख्यायित होइत अछि। एकरा साधारण रुपक मानब शास्त्रीय मत बदलि देत। बन्धक कारण कषाय, आसक्ति आ क्रिया सँ जुड़ैत; संवर नूतन कर्म रोकैत, निर्जरा बन्हल कर्म क्षीण करैत। मुक्ति आत्माक ज्ञान-शक्ति पूर्ण प्रकट होयब अछि। आधुनिक विज्ञानक पदार्थसँ कर्म-पुद्लक सीधा समानता नहि। ई धार्मिक-तत्त्वमीमांसात्मक सिद्धान्त अछि, जकर संगति परम्पराक अन्य प्रतिज्ञा भीतर जाँचल जाए। 14.10 स्याद्वादक सात भंग स्याद्वाद दाबीकेँ शर्तयुक्त Hed अछि: कोनो दृष्टि, समय, सम्बन्ध वा रूपसँ वस्तु अछि; अन्य दृष्टिसँ नहि; कथनयोग्य आ अकथनीयक संयुक्त रूप सेहो सम्भव। सात भंग विरोधी कथनकें एकहि ALA एक साथ सत्य कहब नहि। “स्यात्‌? संशयक आलस्य नहि, दाबीक सीमा लिखबाक अनुशासन। घट एक स्थानमे अछि, दोसरमे नहि; वर्तमानमे अछि, पूर्व अवस्थामे नहि। सन्दर्भ हटला पर विरोध देखाइत अछि। सीमा ई जे सभ विरोधके दृष्टिभेद कहि टारल नहि जाए। एकहि समय, सम्बन्ध आ अर्थमे “अछि” आ नहि? दुनू सत्य नहि। तार्किक कसौटी बनल रहय। 14.11 अहिंसाक ज्ञानमीमांसात्मक आधार अनेकान्तवाद अपन दृष्टिक अपूर्णता स्वीकारि बौद्धिक हिंसा घटबैत अछि। प्रतिपक्षक आंशिक सत्य सुनब, ओकर वाक्यक उपयुक्त नय खोजब, आ सम्पूर्ण नकार सँ बचब अहिंसक संवादक रूप। मुदा असत्य वा अत्याचारकें “ओहो एक दृष्टि? कहि स्वीकारब नहि। दृष्टि सीमित हो सकैत, हानि वास्तविक। करुणा संग स्पष्ट आलोचना सम्भव। ज्ञानात्मक विनम्रता प्रतिपक्षकें मजबूत रूपमे प्रस्तुत करय। असहमति बचल रहय, व्यक्ति पर हिंसक अभिप्राय आरोपित नहि। 14.12 पूर्वपक्ष: अनेकान्तवाद अपन दाबीपर लागू भेला खण्डित जँ सभ दाबी आंशिक, तँ “सभ दाबी आंशिक” सेहो आंशिक; सिद्धान्त सार्वभौम सत्य कोना? आत्मसन्दर्भक ई आपत्ति महत्त्वपूर्ण। उत्तर ई जे अनेकान्तवाद प्रत्येक कथन झूठा नहि कहैत; जटिल वस्तुपर एक दुष्टिक पूर्णता नकारैत अछि। सिद्धान्त स्वयं विशिष्ट तत्त्वमीमांसात्मक-ज्ञानमीमांसात्मक दाबी, जकर सीमा स्वीकारल जा सकैत। आलोचना फेर पूछत जे कुन वस्तु वास्तवमे अनेक धर्मवला आ कुन सरल तथ्य। सिद्धान्तक प्रयोग प्रमाणानुसार हो, प्रत्येक विवादक तैयार समाधान नहि। अध्याय-निष्कर्ष जैन दर्शन जीवक नेतिक गरिमा, अहिंसा, कर्म-बन्धन, अनेकान्त, नय आ स्याद्वाद द्वारा एहन दर्शन प्रस्तुत करेत अछि जतय सत्यक खोज विनम्रता आ नैतिक GAA Osc अछि। समानान्तर दर्शन एहि परम्परासँ बहुदुष्टिगत यथार्थक शिक्षा ग्रहण करैत अछि, मुदा “सभ सत्य बराबर”क निष्कर्ष अस्वीकार करैत अछि।