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भारतीय दर्शनक इतिहास केवल वेद, आत्मा, मोक्ष आ ईश्वरक स्वीकारक इतिहास नहि। एतय एहन परम्परा
सेहो रहल जे प्रत्यक्ष अनुभव, देह, पदार्थ, इहलौकिक जीवन आ धार्मिक दावाक आलोचनाकें महत्त्व देलक।
“लोकायत” अथवा “चार्वाक” नाम एहि भौतिकवादी-संशयवादी परम्परासँ St अछि। मुदा एकर अध्ययनमे
विशेष स्रोत-सावधानी आवश्यक अछि, कारण मूल ग्रन्थ बहुतांश उपलब्ध नहि, आ अनेक विवरण विरोधी
दार्शनिकसभक खण्डनात्मक रचनासँ पुनर्निर्मित होइत अछि।
15.1 स्रोतक समस्या
जखन कोनो परम्पराक अपन मूल साहित्य नष्ट वा अनुपलब्ध हो आ ओकर विचार मुख्यतः विरोधीक उद्धरणसँ
ज्ञात हो, तखन इतिहासकारक जिम्मेवारी बढ़ि जाइत अछि। विरोधी लेखक प्रतिपक्षकें ठीक उद्धूत कएलनि
की सरल बना देलनि? अलग कालक मत एक नामक भीतर मिला देल गेल की? व्यंग्यात्मक कथन वास्तविक
सिद्धान्त अछि की polemical caricature?
लोकायत एहि कारण समानान्तर इतिहास-दृष्टिक आदर्श परीक्षण अछि। हाशियाक परम्पराकेँ पुनःस्थापित
करबाक इच्छा प्रमाणक कमी पूरा नहि HS सकैत। जे निश्चित अछि से निश्चित, जे सम्भावित से सम्भावित,
जे विवादित से विवादित लिखब चाही।
15.2 प्रत्यक्षक प्रधानता
चार्वाक परम्परासँ सामान्यतः प्रत्यक्षक प्रधानता जोड़ल जाइत अछि। किछु पारम्परिक विवरण अनुमानक
विश्वसनीयतापर कठोर आपत्ति प्रस्तुत Hed अछि--विशेषतः एहन अनुमान जे प्रत्यक्ष अनुभवसँ बहुत दूर
अदृश्य सत्ता स्थापित करय। मुदा “चार्वाक प्रत्येक प्रकारक अनुमान अस्वीकार करैत छल” ई दाबी सावधानी
माँगैत अछि; दैनिक जीवन अनुमान बिना चलब कठिन, आ उपलब्ध स्रोतसभ परम्पराक आन्तरिक विविधता
स्पष्ट नहि करैत।
दार्शनिक प्रश्न तथापि शक्तिशाली अछि: हम प्रत्यक्षसँ परे कतेक दूर जा सकैत छी? धुआँसँ आगिक अनुमान
आ अदृश्य परलोकक अनुमान समान प्रकारक अछि की नहि? अनुमानक विश्वसनीयता व्याप्ति, पुनरावृत्ति,
वैकल्पिक कारण आ परीक्षणपर निर्भर होइत अछि। लोकायतक संशय भारतीय ज्ञानमीमांसाकें अपन
अनुमान-सिद्धान्त अधिक स्पष्ट करबाक चुनौती देलक।
15.3 देह आ चेतना
भौतिकवादी दुष्टिमे चेतना देहसँ पृथक शाश्चत आत्माक प्रमाण नहि। परम्परागत चार्वाक-वर्णन चेतनाकें भौतिक
तत्त्वक विशिष्ट संयोजनसँ उत्पन्न गुणक रूपमे प्रस्तुत करेत अछि--जकाँ किछु पदार्थक संयोगसँ नूतन गुण
उत्पन्न हो।
आधुनिक स्नायुविज्ञानसँ एकर सीधा पहचान करब अनुचित। आधुनिक विज्ञानक प्रयोगात्मक संरचना,
मस्तिष्क-अध्ययन आ सिद्धान्त अलग ऐतिहासिक संसारक अछि। मुदा समस्या-संरचना-_चेतना लेल पृथक
MAA आवश्यक की भौतिक प्रक्रियासँ व्याख्या सम्भव--आज सेहो जीवित दार्शनिक प्रश्न अछि।
15.4 परलोक, कर्म आ धार्मिक अधिकारक आलोचना
लोकायतसँ सम्बद्ध विवरण परलोक, अदृश्य कर्मफल, वैदिक अनुष्ठान आ पुरोहितीय अधिकारपर आलोचना
देखबैत अछि। एहन आलोचना केवल नकारात्मक नास्तिकता नहि; ई प्रमाणक भारक प्रश्न उठबैत अछि। जे
वस्तु प्रत्यक्ष नहि, ओकर अस्तित्व सिद्ध करबाक जिम्मेवारी ककर? परम्परा मात्र प्रमाण की?
समानान्तर दर्शन एहि प्रश््नके सामान्य नियम बनबैत अछि: जे पक्ष सकारात्मक दाबी करैत अछि, ओकरा
उचित कारण देबाक दायित्व अछि। मुदा “प्रत्यक्ष नहि, अतः असत्य” सेहो अतिशय कठोर निष्कर्ष हो सकैत
अछि, कारण विज्ञानमे अनेक सत्ता प्रत्यक्ष आँखिसँ नहि, उपकरण आ अनुमानसँ ज्ञात होइत अछि। अतः
प्रत्यक्षवादक आलोचना सेहो आवश्यक।
15.5 सुखवादक प्रशन
चार्वाकक लोकप्रिय चित्रण “ऋण कऽ घी पिउ” प्रकारक उक्ति द्वारा असंयमित सुखवादक रूपमे कएल जाइत
अछि। एहि प्रकारक उद्\रणक ऐतिहासिक स्थिति आ प्रतिनिधित्व सावधानीसँ जाँचबाक चाही। विरोधी ग्रन्थक
व्य॑ग्यकेँ सम्पूर्ण परम्पराक नैतिक सिद्धान्त मानि लेब उचित नहि।
भौतिकवादी इहलौकिकता स्वतः उच्छुंखलता सिद्ध नहि Hea यदि एकहि जीवन अछि, तँ उलटे जीवनक
मूल्य, पीड़ा घटेबाक जिम्मेवारी आ पारस्परिक सहयोग अधिक महत्त्वपूर्ण कहल जा सकैत अछि। मुदा ई
आधुनिक दार्शनिक सम्भावना अछि; एकरा ऐतिहासिक चार्वाक मत कहि आरोपित नहि करबाक चाही।
15.6 संशयक सामाजिक भूमिका
धार्मिक अथवा राजकीय अधिकार जखन प्रश््नसँ ऊपर उठबाक प्रयास करैत अछि, संशय मुक्ति-दायक भऽ
सकैत अछि। “किएक मानू?” प्रश्न ज्ञानक लोकतन्त्रक आधार अछि। लोकायतक ऐतिहासिक स्मृति भारतीय
दर्शन भीतर असहमति, नास्तिकता आ भौतिकवादक स्थान देखबैत अछि।
मुदा संशय स्वयं नैतिकता नहि। कोनो व्यक्ति सभ सार्वजनिक ज्ञान, विज्ञान, इतिहास आ साक्ष्य अस्वीकार
कऽ “संशयवादी” कहि सकैत अछि। उचित संशय प्रमाण माँगैत अछि; निराधार संशय केवल अविश्वास उत्पन्न
करैत अछि।
15.7 आस्तिक-नास्तिक शब्दक सावधानी
भारतीय दर्शनक पारम्परिक वर्गीकरणमे “आस्तिक” प्रायः वेद-प्रामाण्य स्वीकारसँ sd अछि, आधुनिक
सामान्य अर्थक “ईश्वरवादी”सँ नहि। सांख्य वा मीमांसा-जकाँ परम्पराक ईश्वर सम्बन्धी स्थिति जटिल होइतहुँ
पारम्परिक रूपँ आस्तिक वर्गमे राखल जाइत अछि। बौद्ध, जैन आ चार्वाक वेद-प्रामाण्य अस्वीकार कारण
नास्तिक वर्गमे।
एहि शब्दके आधुनिक “भगवान मानयवला/नहि मानयवला” अर्थमे सीधा अनुवाद HUTA ऐतिहासिक भ्रम
होइत अछि। समानान्तर दर्शन तकनीकी शब्दक अर्थ-इतिहास स्पष्ट रखैत अछि।
15.8 हाशियाक इतिहास आ प्रमाण
लोकायतक स्थिति एहि ग्रन्थक पद्धतिक एक गम्भीर कसौटी अछि। ot मुख्यधाराक अभिलेख विरोधी परम्पराकें
विकृत कएलक हो, तँ ओकर पुनर्निर्माण आवश्यक। मुदा पुनर्निर्माणक नामपर इच्छित दर्शन गढ़ि देब दोसर
प्रकारक अन्याय।
तँ तीन स्तर राखब उपयोगी प्रत्यक्ष रुपें संरक्षित मूल अंश; विश्वसनीय विरोधी उद्धरण; बादक पुननिर्माण।
प्रत्येक स्तरक निश्चितता अलग लिखल जाए। ई पद्धति केवल लोकायत नहि, सभ नष्ट वा मौखिक परम्पराक
इतिहास लेल आवश्यक।
पूर्वपक्षः लोकायत भारतीय दर्शनक “निम्न” अथवा केवल नकारात्मक पक्ष अछि
ई निर्णय प्रायः विजयी परम्पराक दृष्टिसँ बनल हो सकैत अछि। कोनो दर्शन प्रश्न उठबैत अछि, प्रमाणक सीमा
देखबैत अछि आ स्थापित सत्ता चुनौती दैत अछि तँ ओकर दार्शनिक मूल्य केवल सकारात्मक तत्त्वमीमांसा
बनौने पर निर्भर नहि।
उत्तरपक्षः आलोचना स्वयं दार्शनिक योगदान
लोकायतक ऐतिहासिक स्वरूप आंशिक सुपेँ अस्पष्ट होइतहुँ ओकर नामसँ संरक्षित भौतिकवादी आ संशयवादी
प्रशन भारतीय दर्शनक बहुलता सिद्ध करैत अछि। ई परम्परा स्मरण करबैत अछि जे आत्मा, परलोक, कर्म वा
शास्त्रक अधिकार भारतीय इतिहासमे सर्वसम्मत निष्कर्ष नहि छल।
15.9 प्रत्यक्षवादक शक्ति
लोकायतसँ सम्बद्ध प्रत्यक्ष-प्राधान्य अनुमान, शास्त्रीय गवाही आ अदृश्य लोकक दाबीपर कठोर प्रश्न Jor
अछि। जे देखल नहि गेल ओकरा मानबाक कारण स्पष्ट हो--ई माँग बौद्धिक सत्ता चुनौती दैत अछि।
प्रत्यक्ष सेहो त्रुटिपूर्ण, आ अनेक वस्तु सीधा देखल नहि जाइत। रोगाणु, दूरस्थ इतिहास वा मनोभाव उपकरण,
संकेत आ गवाहीसँ ज्ञात होइत। तेँ प्रत्यक्ष एकमात्र प्रमाण मानब व्यवहारिक कठिनाई उत्पन्न करैत।
सबल संशय अनुमान पूर्ण नकारब नहि, अनुमानक व्याप्ति, स्रोत आ परीक्षण माँगब। लोकायतक पुनर्निर्माणमे
प्रतिपक्षक उद्धरणक सीमा स्पष्ट रखल जाए।
15.10 देह आ चेतना
भौतिक तत्त्वक विशिष्ट संयोजनसँ चेतना उत्पन्न होइत--लोकायतक एहन प्रतिपादनक उदाहरण मादक
मिश्रणसँ नूतन शक्ति जकाँ देल जाइत अछि। ई उद्भववादी दिशा आत्माकें स्वतंत्र शाश्वत द्रव्य मानबाक विकल्प
दैत।
उदाहरण सम्भावना देखबैत, चेतनाक पूर्ण व्याख्या नहि। निजी अनुभव, आशयिता आ एकताक प्रश्न बाकी।
आधुनिक स्नायुविज्ञानकें प्राचीन मतक सीधा प्रमाण कहब कालभ्रम।
दार्शनिक मूल्य ई जे देहकें निम्न आवरण नहि, चेतन जीवनक आवश्यक आधार मानल जाए। स्वास्थ्य, भोजन
आ श्रम नैतिक जीवनक भौतिक शर्त बनैत अछि।
15.11 सुखवादक पुनर्परीक्षा
लोकायतकें “ऋण लऽ घी पीबृ?क एक कथनमे समेटब संदिग्ध स्रोतपर निर्भर els हो सकैत अछि। प्रतिपक्षक
ग्रन्थमे उद्धृत वाक्य सम्पूर्ण परम्पराक विश्वसनीय सार नहि।
देहगत सुखक मूल्य स्वीकारलासँ अनियंत्रित भोग अनिवार्य नहि। दीर्घकालीन पीड़ा, दोसरक हानि आ
सामाजिक निर्भरता विवेकपूर्ण सुखविचारमे प्रवेश करेत अछि।
त्याग स्वयं श्रेष्ठ--एहन धार्मिक दाबी जाँच योग्य; सुख स्वयं सर्वोच्च--एहन दाबी सेहो। गरिमा, स्वतंत्रता आ
न्याय संग सुखक स्थान तय हो।
15.12 पूर्वपक्षः लोकायत केवल प्रतिपक्षक कल्पना
मूल ग्रन्थ दुर्लभ आ विवरण अधिकतर विरोधी स्रोतमे रहला कारण कहल जा सकैत अछि जे ऐतिहासिक
लोकायतक विश्वसनीय पुनर्निर्माण असम्भव। सावधानी सचमुच अत्यन्त आवश्यक।
मुदा अनेक स्वतंत्र परम्परामे समान प्रकारक भौतिकवादी प्रतिपक्ष, नाम आ तर्कक उल्लेख पूर्ण कल्पनाक
दाबी कमजोर करैत अछि। प्रत्येक अंशक तिथि, निर्भरता आ polemical प्रसंग अलग जाँचल जाए।
निष्कर्ष स्तरित होः प्रत्यक्ष प्रमाणित कथन, सम्भावित पुननिर्माण आ अनिश्चित परम्परा अलग। रिक्ति गौरव
वा निन्दासँ नहि भरल जाए।
अध्याय-निष्कर्ष
लोकायतक महत्त्व दू स्तरपर अछि। पहिल, ई भारतीय दर्शन भीतर भौतिकवादी, इहलौकिक आ संशयवादी
सम्भावनाक स्मृति अछि। दोसर, एकर खण्डित स्रोत समानान्तर इतिहासक नैतिकता सिखबैत अछि
उपेक्षित स्वर खोजू, मुदा रिक्त स्थान कल्पनासँ नहि भरु। प्रमाणक अभावकें स्पष्ट लिखब स्वयं विद्वत्ता अछि।
अध्याय-ग्रन्थसूचौ
चार्वाक /लोकायत सम्बन्धी संरक्षित Tae विभिन्न दार्शनिक ग्रन्थमे.
माधवाचार्यक नामसँँ सम्बद्ध — Sarvadarsanasamgraha, चार्वाक अध्याय (स्रोत-सावधानी
सहित).
Debiprasad Chattopadhyaya — Lokayata: A Study in Ancient Indian
Materialism.
Ramkrishna Bhattacharya — Studies on the Carvaka/Lokayata.
Stanford Encyclopedia of Philosophy — classical Indian naturalism सम्बन्धी
प्रविष्टि.