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भाषा केवल विचार व्यक्त करबाक साधन नहि; अनेक बेर विचारक आकार सेहो भाषा दैत अछि। मनुष्य
जगतकें शब्द, वर्ग, नाम, सम्बन्ध आ वाक्यक माध्यमसँ बुझैत अछि। एहि कारण भाषा-दर्शन केवल
व्याकरणक विस्तार नहि, ज्ञानमीमांसा, तत्त्वमीमांसा, सामाजिक दर्शन आ सत्ता-विमर्शक केन्द्रबिन्दु अछि।
“शब्द् अर्थ कोना दैत अछि?”, “वाक्यक अर्थ शब्दसभक जोड़ मात्र अछि की एक समग्र बोध?”, “ara
अभिप्राय कतेक आवश्यक?”, “रुपक आ संकेत कोना बुझल जाइत अछि?”, “भाषा बाह्य जगतकें चित्रित
करैत अछि की अवधारणात्मक रूप दैत अछि?”--ई प्रश्न भारतीय दर्शनमे दीर्घ विवादक विषय रहल अछि।
16.1 वाक् सँ दार्शनिक भाषा धरि
वैदिक साहित्यमे वाक् केवल साधारण बोलचाल नहि, एक गम्भीर सांस्कृतिक-दार्शनिक शक्ति रूपमे उपस्थित
अछि। परवर्ती व्याकरण, मीमांसा, न्याय, बौद्ध दर्शन आ काव्यशास्त्र भाषा सम्बन्धी प्रश्नकें अलग-अलग
लक्ष्यसँ विकसित करेत अछि। मीमांसाक मूल चिन्ता वेद-वाक्यक अर्थ आ कर्तव्यबोध; न्यायक चिन्ता यथार्थ
शाब्दिक ज्ञान; व्याकरणपरम्पराक चिन्ता भाषिक संरचना आ बोध; बौद्ध चिन्तनक चिन्ता अवधारणात्मक
निर्माण आ शब्दक सीमासँ जुड़ल रहल। समान प्रश्न पर भिन्न संस्थागत उद्देश्य भिन्न सिद्धान्त उत्पन्न करेत
अछि।
16.2 शब्द आ अर्थक सम्बन्ध
“गाय” शब्द सुनिते मनमे कोन वस्तु उपस्थित होइत अछि? कोनो विशेष गाय? गायत्व नामक सामान्य धर्म?
सामान्य धर्मसँ युक्त विशेष व्यक्ति? अथवा केवल एक अवधारणात्मक निर्माण? न्याय, मीमांसा, बौद्ध आ
व्याकरणपरम्परा एहि प्रश्नपर एकमत नहि। न्याय परम्परा बाह्य वस्तु-यथार्थक दृढ़ समर्थन करेत शब्दक अर्थकें
व्यक्ति, जाति आ सम्बन्धित गुणसभक संरचनामे बुझैत अछि। मीमांसा शब्दार्थक नित्यता आ वेदक
अपौरुषेयता संग अर्थसम्बन्धक अलग प्रतिपादन करैत अछि। बौद्ध अपोह-सिद्धान्तक विविध रूप शब्दके
सकारात्मक सार्वभौम सत्ता स्वीकार किए बिना भिन्नताक माध्यमसँ अर्थबोध करबाक दिशामे AS जाइत
अछि।
एहि विवादक आधुनिक शिक्षा ई नहि जे एक परम्परा पहिने सँ आधुनिक भाषाविज्ञान खोजि लेने छल। शिक्षा
ई अछि जे “अर्थ” एकटा सरल वस्तु नहि। संकेत, वस्तु, अवधारणा, उपयोग, सामाजिक प्रथा आ श्रोता-बोध
सभ अर्थनिर्माणमे भूमिका निभा सकैत अछि।
16.3 वाक्य-अर्थः अभिहितान्वय आ अन्विताभिधान
भारतीय भाषा-दर्शनक एक सूक्ष्म विवाद अछि--शब्द पहिने स्वतंत्र अर्थ देत अछि आ बादमे ओ अर्थसभ
जोड़ि वाक्यबोध बनैत अछि, अथवा शब्द आरम्भसँ परस्पर सम्बन्धित अर्थ दैत अछि? As मीमांसा आ न्यायसँ
सम्बद्ध अभिहितान्वय दृष्टिमे पहिले शब्दार्थं बोध, तकर बाद सम्बन्धित वाक्यार्थ; प्राभाकर मीमांसाक
अन्विताभिधान दृष्टिमे शब्द स्वयं सम्बन्धित अर्थक AAA वाक्यार्थ दैत अछि।
ई विवाद आजो महत्त्वपूर्ण अछि कारण भाषा बुझब केवल शब्दकोश देखब नहि। “राजा सैनिककें आदेश
देलक” वाक्यमे प्रत्येक शब्दक अर्थ जानलासँ वाक्यक कर्ता, कर्म, क्रिया आ सम्बन्ध स्वतः स्पष्ट होइत अछि
की व्याकरणिक-सन्दर्भीय संरचना आवश्यक? भाषा-दर्शन Vet सामान्य बोधक भीतर छिपल जटिलता
देखबैत अछि।
16.4 शाब्दबोधक शर्त
न्यायपरम्परामे वाक्यबोधक लेल आकाङ्क्षा, योग्यता आ सन्निधि-जकाँ शर्तसभक चर्चा प्रसिद्ध अछि।
शब्दसभ परस्पर अपेक्षा रखथि, अर्थसंगति सम्भव हो, आ आवश्यक भाषिक निकटता रहय--तखन
वाक्यबोध सम्भव होइत अछि। “पत्थर पानी पीबैत अछि” व्याकरणिक रूपसँँ ठीक हो सकैत अछि, मुदा
साधारण सन्दर्भमे अर्थ-योग्यता प्रश्न उठबैत अछि; काव्य वा रूपकमे फेर एहि असामान्यता स्वयं अर्थक स्रोत
भऽ सकैत अछि।
एहि कारण भाषा-दर्शन संदर्भविहीन नियमक सूची नहि। जे वाक्य वैज्ञानिक प्रतिवेदनमे असंगत, ओ कविता
मे सार्थक रूपक भऽ सकैत अछि। भाषिक बोध विधा, उद्देश्य आ सामाजिक प्रथासँ जुड़ल अछि।
16.5 शब्द-प्रमाण आ विश्वसनीयता
मनुष्यक अधिकांश ज्ञान भाषिक साक्ष्यसँ अबैत अछि। हम सभ वैज्ञानिक प्रयोग स्वयं नहि करैत छी, सभ
ऐतिहासिक अभिलेख नहि पढ़ैत छी, सभ स्थान नहि देखैत छी। तेँ शाब्दिक ज्ञानक औचित्य दार्शनिक प्रशन
अछि। न्याय विश्वसनीय वक्ता--आप्त-पर बल दैत अछि; मीमांसा वैदिक वाक्यक अपौरुषेयता आ
स्वतःप्रामाण्यक व्यापक ढाँचामे भाषिक प्रामाण्य बुझैत अछि।
आधुनिक समाजमे ई विवाद विशेषज्ञता, पत्रकारिता, न्यायालय, डिजिटल माध्यम आ शैक्षिक संस्था तक
विस्तारित होइत अछि। “के कहलनि?” पर्याप्त नहि; “ओ व्यक्ति वा संस्था एहि विषयमे जानकार छथि?”,
“हित-संघर्ष अछि?”, “कथन स्वतंत्र Gla पुष्ट अछि?”, “त्रुटि सुधारबाक व्यवस्था अछि?”--ई सभ शब्द-
प्रमाणक आधुनिक नागरिक प्रश्न छथि।
16.6 वक्ता, अभिप्राय आ पाठ
किछु भाषिक अर्थ dedi आशयसँ गहराईसँ जुड़ल होइत अछि। व्यंग्य, विनोद, धमकी, वचन, आदेश आ
संकेत केवल शब्दार्थसँ नहि बुझल जाइत अछि। मुदा प्रत्येक पाठक अर्थक लेखकक निजी अभिप्रायमे सीमित
करब सेहो कठिन। विशेषतः प्राचीन ग्रन्थ परम्परागत व्याख्या, भाषिक परिवर्तन आ नूतन सामाजिक प्रसंगमे
नव प्रश्न उत्पन्न करैत अछि।
समानान्तर दर्शन एहि कारण दू अतिवादसँ बचैत अछि--“लेखक जे चाहलनि बस ओही एकमात्र अर्थ” आ
“पाठक जे चाहय वही अर्थ।” ऐतिहासिक अर्थक लेल भाषा, काल, पाठभेद आ दार्शनिक प्रसंग आवश्यक;
वर्तमान पुनर्पाठक लेल ई स्पष्ट करब आवश्यक जे हम मूल ऐतिहासिक अर्थ बता रहल छी वा वर्तमान व्याख्या
प्रस्तावित HS रहल छी।
16.7 रूपक, लक्षणा आ व्यञ्जना
मानवीय भाषा शाब्दिक कथनधरि सीमित नहि। “हृदय पत्थर भऽ गेल” वाक्य शरीरविज्ञानक दावा नहि।
भारतीय काव्यशास्त्र अभिधा, लक्षणा, व्यञ्जना, ध्वनि आ रसक माध्यमसँ अप्रत्यक्ष अर्थक समृद्ध परम्परा
विकसित करेत अछि। दर्शन लेल एकर शिक्षा महत्त्वपूर्ण अछि--भाषिक अर्थ केवल सत्य-मिथ्या वाक्यक
गणना नहि; भाषा अनुभव, मूल्य आ भावक रूपान्तरण सेहो करेत अछि।
मुदा रूपकक शक्ति तथ्यक विकल्प नहि। ऐतिहासिक दस्तावेजमे Such तथ्य आ काव्यात्मक सत्यक
वैज्ञानिक मापन मानि लेब भ्रेणीभ्रम होयत। समानान्तर दर्शन साहित्यिक आ दार्शनिक अर्थक सम्मान करैत
अछि, संगहि प्रमाणक प्रकार स्पष्ट राखैत अछि।
16.8 भाषा आ सत्ता
भाषा केवल अर्थ नहि, संस्था सेहो अछि। कोन भाषा विद्यालय, न्यायालय, विश्वविद्यालय, विज्ञान, प्रशासन
आ प्रकाशनक माध्यम बनैत अछि--ई UM ज्ञान-सत्ता सँ जुड़ल अछि। जे समुदाय अपन भाषा सार्वजनिक
ज्ञानक माध्यममे नहि देखैत अछि, ओकर अनुभव धीरे-धीरे “स्थानीय”, “अनौपचारिक” अथवा “कम
प्रामाणिक” घोषित भऽ सकैत अछि।
एहि स्थितिमे भाषिक न्यायक अर्थ केवल भाषाक भावनात्मक गौरव नहि। एकर अर्थ अछि--ज्ञानक उत्पादन,
शिक्षा, अभिलेखन, अनुवाद आ सार्वजनिक निर्णयमे भाषिक पहुँच। समानान्तर दर्शन मैथिली-जकाँ भाषामे
दर्शन लिखबकें केवल अनुवादक कार्य नहि, ज्ञान-वितरणक लोकतान्त्रिक कार्य मानैत अछि।
16.9 अनुवाद स्वयं दर्शन
(14 धर्म” , “प्रमाण” , (14 आत्मन्? , “ब्रह्मन्” , “नय? , (14 अनेकान्त” , (14 शून्यता” , (14 S e lf” , (14 r e a S oO n 59 ,
“justice’—Ule पदसभक एक-एक स्थिर समतुल्य नहि। अनुवादक प्रत्येक चयन अवधारणात्मक निर्णय
अछि। गलत समतुल्यता पूरा तर्के बदलि सकैत अछि। tf समानान्तर दर्शन तकनीकी पदक मूल रूप सुरक्षित
राखि, मैथिली कार्यार्थ स्पष्ट करेत अछि, आ जहाँ आवश्यक ओतय अनुवादक सीमा बतबैत अछि।
16.10 डिजिटल भाषा आ कृत्रिम पुनरुत्पादन
डिजिटल युगमे भाषिक कथनक उत्पादन अत्यन्त सहज भेल अछि। एकहि कथन हजार बेर प्रतिलिपि भऽ
सकैत अछि; मशीन-सृजित पाठ मनुष्यक लेखन-जकाँ देखाइत अछि; उद्धरण स्रोतसँ काटि प्रसारित होइत
अछि। एतय “बहुत जगह लिखल अछि” स्वतंत्र प्रमाण नहि। भाषाक तीव्र पुनरुत्पादन सत्यताक गारंटी नहि।
समानान्तर दर्शनक भाषिक अनुशासन एतय चारि प्रश्न प्रस्तावित करैत अछि--मूल स्रोत की? कथनक सन्दर्भ
की? शब्दक तकनीकी अर्थ की? अनुवाद अथवा पुनर्लेखनमे अर्थ बदलल की? डिजिटल नागरिकता लेल ई
भाषा-दर्शनक व्यावहारिक रूप अछि।
पूर्वपक्षः भाषा जँ विचारक आकार दैत अछि तँ वस्तुगत सत्य असम्भव?
उत्तरपक्षः भाषा जगतपर परदा मात्र नहि, जगतसँ सम्बन्धक साधन अछि। भाषा वर्गीकरण आ दृष्टिकोण
प्रभावित करैत अछि, मुदा बाह्य जगत, पारस्परिक परीक्षण, अनुवाद, प्रत्यक्ष आ व्यवहार भाषिक दाबीसँ
प्रतिरोध करैत अछि। भाषिक मध्यस्थता सत्यक असम्भवता नहि, सत्यपर पहुँचक शर्तसभक चेतना उत्पन्न
करैत अछि।
16.11 स्फोट आ भाषिक एकता
वर्ण क्रमशः सुनाइत अछि आ क्षणभंगुर, तथापि वाक्यक एकीकृत अर्थ एक बेर बुझाइत अछि। स्फोट-सिद्धान्त
एहि बोधक एकता समझबाक प्रयास अछि। ध्वनि अभिव्यंजक, स्फोट अर्थबोधक स्थिर भाषिक एकक रूपमे
विवेचित होइत अछि।
स्फोट भौतिक ध्वनिसँ पृथक कोन सत्ता, शब्द-स्तरक की वाक्य-स्तरक--परम्परा भीतर बहस अछि।
सिद्धान्तके आधुनिक ध्वनिविज्ञान वा मनोभाषाविज्ञानक खोज hed अनुचित।
दार्शनिक प्रश्न एखनहुँ उपयोगी: क्रमशः प्राप्त संकेतसँ समग्र अर्थ कोना? उत्तर व्याकरण, अपेक्षा, स्मृति आ
प्रसंगक संयुक्त भूमिका खोजि सकैत अछि।
16.12 अपोह आ वर्गीकरण
बौद्ध अपोह-दृष्टि सामान्य शब्दक अर्थक अन्यक बहिष्कारसँ जोड़ेत अछि। 'गाय'क अर्थ कोनो शाश्वत गायत्व
नहि, अगायसँ भिन्नताक अवधारणात्मक कार्य। ई बाह्य विशेष वस्तुक क्षणिकता संग सामान्य भाषा समेटबाक
प्रयास।
आपत्ति अछि जे 'अगाय” बुझबा लेल पहिने गाय बुझल होयत; निषेध सकारात्मक आधार बिना चक्राकार।
बौद्ध उत्तर संस्कार, समान प्रभाव आ अवधारणात्मक निर्माणक माध्यमसँ विकसित होइत।
सामाजिक वर्गीकरणमे शिक्षा ई जे श्रेणी भिन्नता बनबैत अछि। मुदा अपोहसँ आधुनिक पहचान-राजनीतिक
निष्कर्ष सीधा नहि निकलैत। तुलना कार्यात्मक स्तरपर हो।
16.13 व्यंग्य आ अप्रत्यक्ष कथन
वक्ता जखन विपरीत शब्द कहि आलोचना करैत, श्रोता स्वर, प्रसंग आ साझा AAS आशय बुझैत अछि।
शाब्दिक अर्थ पर्याप्त नहि। अदालत, इतिहास वा डिजिटल संदेशमे प्रसंग कटला पर गंभीर भ्रम हो सकैत
अछि।
अभिप्राय महत्त्वपूर्ण, मुदा परिणामसँ पूर्ण रक्षा नहि। वकता “मजाक छल” कहि लक्षित अपमानक पुनरावृत्ति
उचित नहि करि सकैत। श्रोता सेहो प्रत्येक अप्रिय वाक्यकें हिंसा नहि कहय।
भाषिक मूल्यांकन शब्द, प्रसंग, शक्ति, अपेक्षित श्रोता आ वास्तविक प्रभाव संयुक्त करय। एक संकेतक
मशीन-जकाँ नियम पर्याप्त नहि।
16.14 पूर्वपक्षः भाषा वास्तविकता केँ कैद करैत अछि
भाषा जगतकें MONA बाँटैत, तें कहल जाइत अछि जे हम वस्तु नहि, केवल भाषिक संरचना जानैत छी। अलग
भाषा अलग वास्तविकता बनबैत--एहन कठोर निष्कर्ष निकलि सकैत।
मुदा अनुवाद, साझा क्रिया, वैज्ञानिक मापन आ वस्तुक प्रतिरोध भाषासभ बीच सम्बन्ध सम्भव बनबैत अछि।
शब्द भिन्न होइतहुँ नदीक बाढ़ सभ समुदायपर वास्तविक प्रभाव दैत।
भाषा पहुँचक माध्यम आ सीमा दुनू। वस्तुगतता भाषा त्यागब नहि, पद परिभाषित करब, अनेक वर्णन तुलना
करब आ परिणामसँ जाँचब अछि।
अध्याय-निष्कर्ष
भाषा विचार, ज्ञान, सामाजिक प्रथा आ सत्ता सभक माध्यम अछि। शब्दार्थ, वाक्यार्थ, शाब्दप्रमाण, वक्तृ-
अभिप्राय, रूपक, अनुवाद आ भाषिक न्यायक प्रश्न एक-दोसरसँ जुड़ल छथि। समानान्तर दर्शन भाषा-दर्शनक
मूल सूत्र रूपमे ई मानेत अछि--शब्द केवल वस्तुक नाम नहि; शब्द सम्बन्ध बनबैत अछि, ज्ञान पहुँचबैत अछि,
सत्ता वितरण करैत अछि, आ कखनो वास्तविकताक महत्त्वपूर्ण पक्षकेँ अदृश्य सेहो करैत अछि।
अध्याय-ग्रन्थसूचौ
भर्तृहरि — वाक्यपदीय।
कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्त्तिक।
प्रभाकर मीमांसा सम्बन्धी परम्परागत ग्रन्थ आ भाष्य।
गौतम — न्यायसूत्र।
वात्स्यायन — न्यायभाष्य।
वाचस्पति मिश्र — तत्त्वबिन्दु।
गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि, शब्दखण्ड।
Bimal Krishna Matilal — The Word and the World; Logic, Language and
Reality.
K. Kunjunni Raja — Indian Theories of Meaning.
Stanford Encyclopedia of Philosophy — “Language and Testimony in
Classical Indian Philosophy”.