बृहदारण्यक उपनिषदक संवादसभ भारतीय दर्शनक इतिहासमे प्रश्‍नक नाटकीयता आ अवधारणात्मक गहराई दुनू उपस्थित करेत अछि। याज्ञवल्क्य प्रमुख वक्ता छथि, मुदा गार्गी वाचक्नवी आ मैत्रेयीकें केवल हुनक विचार उजागर करयवला सहायक पात्र मानब अनुचित। हुनकर प्रश्‍न स्वयं दार्शनिक समस्या निर्धारित करेत अछि। समानान्तर पाठ एहि संवादक “एक महान पुरुष दार्शनिक आ हुनक प्रश्‍नकर्त्रीसभ”क कथा नहि, बहु-वक्ता दार्शनिक क्षेत्र रूपमे पढ़ैत अछि। 18.1 संवाद दर्शनक रूप सूत्र वा सिद्धान्तक विपरीत संवादमे विचार प्रशन, उत्तर, आपत्ति, मौन, पुन: प्रश्‍न आ प्रसंगक माध्यमसँ विकसित होइत अछि। बृहदारण्यकक संवाद दर्शबेत अछि जे दर्शन केवल तैयार उत्तर नहि; प्रश्‍नक संरचना स्वयं ज्ञानक दिशा बदलि सकैत अछि। गार्गीक प्रश्न ब्रह्माण्डक अंतिम आधार दिस, मैत्रेयीक प्रश्‍न धन, अमरत्व आ आत्म- मूल्य दिस विचारकें Aisa अछि। 18.2 मैत्रेयी: धन आ अमरत्व याज्ञवल्क्य गृहत्यागपूर्व सम्पत्ति-विभाजनक प्रसंगमे मैत्रेयीसँ संवाद करैत छथि। मैत्रेयी प्रशन hed छथि-जँँ सम्पूर्ण पृथ्वी धनसहित प्राप्त हो, की अमरत्व भेटत? उत्तर नकारात्मक। एहि प्रश्‍नक दार्शनिक तीक्ष्णता ई अछि जे ओ साधन आ परम मूल्यक भेद खोलैत अछि। धन उपयोगी, परन्तु की उपयोगिते अंतिम मानवीय लक्ष्य? मैत्रेयी एहि बिन्दुपर नैतिक अर्थशास्त्रक प्राचीन प्रश्‍न उठबैत छथि: संसाधन जीवनके समर्थ Hea अछि, मुदा जीवनक मूल्य संसाधनमे समाप्त नहि। समानान्तर दर्शन एतयसँ गरीबीक महिमामण्डन नहि करैत। भौतिक अभाव अन्याय हो सकैत अछि; मुदा भौतिक सम्पन्नताकेँ आत्म-मूल्यक पूर्ण पर्याय मानब सेहो दार्शनिक त्रुटि अछि। 18.3 प्रियता आ आत्मा मैत्रेयी-याज्ञवल्क्य संवादमे प्रिय वस्तुसभ आत्मा-सम्बन्धक कारण प्रिय होयबाक जटिल प्रतिपादन अबैत अछि। एकर अनेक व्याख्या सम्भव अछि। एक सरल स्वार्थवादी अर्थ-सभ प्रेम अन्ततः निजी लाभ--पाठक दार्शनिक गहराई घटा देत। अधिक सूक्ष्म प्रशन ई अछि: अनुभवक केन्द्र, सम्बन्धक मूल्य आ आत्म-ज्ञान परस्पर कोना Usd अछि? प्रियता ककरा प्रति अछि--व्यक्ति, सम्बन्ध, आत्मबोध वा अंतिम वास्तविकता? समानान्तर दर्शन एहि अंशके आधुनिक मनोविज्ञानक सीधा सिद्धान्त नहि बनबैत; एकरा सम्बन्धात्मक आत्मबोधक दार्शनिक स्रोत रूपमे पढ़ैत अछि। 18.4 गार्गी: जगत ककरा पर ओतप्रोत? गार्गीक प्रश्न ब्रह्माण्डीय आधारक शृंखला बनबैत अछि-ई जगत ककरा पर ओतप्रोत? तकर आधार की? प्रश्‍न क्रमशः दृश्यमान वस्तुसँ अदृश्य आधार दिस बढ़त अछि। दार्शनिक Sos ई अनन्त प्रतिगमन, अंतिम व्याख्या आ अस्तित्वक आधारक प्रश्‍न अछि। गार्गीक महत्त्व केवल एहि बातमे नहि जे “एक स्त्री प्रश्‍न पूछलनि।” हुनक प्रश्‍न तत्त्वमीमांसाक संरचना निर्धारित करैत अछि। जे प्रश्‍न सम्भावित उत्तरक क्षेत्र बदलि दैत अछि, ओ स्वयं दार्शनिक योगदान अछि। 18.5 अक्षरक प्रश्‍न गार्गी-संवादक उत्तर अन्ततः अक्षर-अविनाशी--दिस ade अछि। आधुनिक पाठक एहि पदकें तुरन्त “ईश्वर” वा “पदार्थ” वा “चेतना”क आधुनिक श्रेणीमे नहि ठेलथि। उपनिषदिक अक्षर अपन पाठ-सन्दर्भमे अंतिम, अपरिवर्तनशील आधारक दार्शनिक संकेत अछि। एकर विभिन्न वेदान्तीय व्याख्या बादमे विकसित भेल। ऐतिहासिक सावधानी ई अछि जे परवर्ती सिद्धान्तकें मूल संवादक एकमात्र अर्थ घोषित नहि कएल जाए। 18.6 याज्ञवल्क्य आ “नेति नेति” याज्ञवल्क्यसँ सम्बद्ध “नेति नेति”--ई नहि, ई नहि-अभिव्यक्ति अंतिम वास्तविकताकें सीमित गुण-वर्णनसँ मुकत करबाक पद्धति रूपमे Use जाइत अछि। ई सर्वनिषेधक निरर्थकता नहि; अवधारणाक सीमा चिन्हबाक तरीका अछि। जे वस्तु प्रत्येक सीमित वस्तुगत गुणसँ परे मानल जाइत अछि, ओकरा सामान्य वर्गीकरणमे पकड़ब कठिन। समानान्तर दर्शन एहि पद्धतिसँ एक ज्ञानात्मक शिक्षा लैत अछि: कखनो नकारात्मक परिभाषा सकारात्मक दाबीके अनुशासित Het अछि। “हम ई नहि कहि सकैत छी” ज्ञानक कमजोरी नहि, उचित सीमा भऽ सकैत अछि। 18.7 आत्मा आ चेतना याज्ञवल्क्यक अनेक संवाद आत्मन्‌, ज्ञाता आ अनुभवक आधारक प्रश्‍न उठबैत अछि। देखनेवला के? सुननेवला के? जाननेवला के? ज्ञाताक स्वयं ज्ञान कोना सम्भव? ई प्रश्‍न आधुनिक चेतना-दर्शनसँ तुलना योग्य छथि, मुदा समान नहि। उपनिषदिक आत्मन्‌ मुक्तिक, अस्तित्वक आ आध्यात्मिक प्रश्‍नसँ जुड़ल अछि; आधुनिक मन-दर्शन प्रायः तंत्रिका-विज्ञान, मानसिक अवस्था आ व्यक्ति-पहिचानक अलग संदर्भ रखैत अछि। 18.8 स्त्री-दर्शनक पुनर्पाठ इतिहासलेखनमे स्त्री पात्रके “पत्नी”, “शिष्या”, “प्रेरणा” अथवा “प्रश्‍नकत्री” कहि मुख्य दार्शनिक भ्रेणीसँ बाहर राखल जा सकैत अछि। समानान्तर दर्शन योगदानक कसौटी बदलैत अछि: के अवधारणात्मक प्रशन उठौलक? के तर्कक दिशा बदेलक? के मूल्यक आधार चुनौती देलक? एहि कसौटीपर गार्गी आ मैत्रेयी दार्शनिक छथि। मुदा ई पुनर्पाठ आधुनिक समानताक विचारकें प्राचीन समाजपर जबरन आरोपित नहि Het) WIA स्त्री- वक्ता उपस्थित होयब समाजक सम्पूर्ण लैंगिक समानताक प्रमाण नहि। विशिष्ट पाठ-साक्ष्यक सम्मान संग व्यापक सामाजिक इतिहास अलग जाँच माँगैत अछि। 18.9 जनकक दरबार आ वादक संस्था विदेहक जनकक दरबार पाठमे विद्वत्‌ प्रतियोगिता आ दार्शनिक संवादक स्थल रूपमे अबैत अछि। धन, प्रतिष्ठा आ ज्ञान एकहि दृश्य मे उपस्थित छथि। एकर संस्थागत अर्थ महत्त्वपूर्ण अछि-_दार्शनिकता सामाजिक मंच माँगैत अछि। मुदा मंच सत्ता-संरचनासँ मुक्त नहि। पुरस्कार के दैत अछि? निर्णायक के? के उपस्थित? समानान्तर दर्शन दार्शनिक पाठक संग संस्थागत प्रश्‍न सेहो पढ़ैत अछि। 18.10 आधुनिक अर्थ गार्गी, मैत्रेयी आ याज्ञवल्क्यक संवाद आधुनिक जीवनमे दूहरा उपयोग रखैत अछि। पहिल, प्रश्‍नक गुणवत्ता उत्तरक गुणवत्ता निर्धारित करेत अछि। दोसर, अंतिम मूल्य, आत्मा, धन, सम्बन्ध आ वास्तविकताक प्रश्‍न केवल ऐतिहासिक धार्मिक जिज्ञासा नहि; अलग शब्दावलीमे आजो उपस्थित छथि। 18.11 याज्ञवल्क्यक “नेति नेति? “नेति नेति” आत्मा वा ब्रह्म सम्बन्धी प्रत्येक सकारात्मक गुणक सीमा देखबैत अछि। एकरा पूर्ण शून्यवाद मानब उचित नहि; जे वस्तुगत गुणसँ पकडल नहि जाए एहन आधारक संकेत हो सकैत अछि। निषेधक श्रृंखला बाद शेष की-शुद्ध चेतना, अवर्णनीय सत्ता, वा भाषाक सीमा? भिन्न वेदान्तीय व्याख्या अलग उत्तर दैत। मूल प्रसंग आ बादक भाष्य अलग पढ़ल जाए। अवर्णनीय कहला पर विरोधाभासक जोखिम अछि: जकर विषयमे किछु नहि कहल जा सकय, ओकर अस्तित्व कोना दावा? उत्तर संकेतक भाषा आ प्रत्यक्ष बोधक भेदसँ देल जाइत, मुदा प्रमाण प्रश्‍न बनल रहैत। 18.12 मैत्रेयी संवादमे प्रेमक संरचना मैत्रेयी संवाद धनसँ अमरत्वक असम्भवता आ प्रिय वस्तु आत्माक कारण प्रिय होयबाक दाबी उठबैत अछि। एकरा स्वार्थवाद कहब सरल, मुदा “आत्मा” व्यक्तिगत अहंकार की व्यापक चेतन आधार-_अर्थ निर्णायक। यदि प्रत्येक प्रेम केवल अपन लाभ, cf दोसरक स्वतंत्र मूल्य नष्ट। यदि आत्मा व्यापक सम्बन्धक आधार, तेँ प्रेममे एकता आज्ञानक अर्थ बदलैत अछि। पाठक पूर्वधारणा स्पष्ट करय। संवादमे मैत्रेयीक प्रश्न स्वयं दार्शनिक अभिकर्तृत्व देखबैत अछि। हुनका मात्र याज्ञवल्क्यक श्रोता नहि, तर्कक दिशा बदलनिहार प्रश्नकर्ता रूपमे पढ़ल जाए। 18.13 गार्गीक प्रश्‍न आ सीमाक राजनीति गार्गी जगतक आधारक श्रृंखला पूछैत-पूछैत अक्षर धारि पहुँचैत छथि। प्रश्‍न रोकबाक चेतावनी ज्ञानक सीमा, शास्त्रार्थक नियम वा सत्ता-कुन रूपमे पढ़ल जाए? पाठ अनेक व्याख्या सम्भव बनबैत अछि। दार्शनिक SU अनन्त 'ककरा पर ओतप्रोत” प्रश्न व्याख्याक अन्तिम आधार माँगैत अछि। प्रत्येक उत्तर फेर आधार माँगय तेँ अनन्त श्रृंखला; कोनो स्वयं-आधार मानल जाए तँ ओकर औचित्य चाही। गार्गीक नि्भीकता आधुनिक समानताक पूरा प्रमाण नहि, मुदा स्त्री द्वारा सर्वोच्च तत्त्वमीमांसात्मक प्रश्‍नक स्पष्ट पाठीय उपस्थिति अछि। दाबी एतबे सीमित आ महत्त्वपूर्ण राखल जाए। 18.14 पूर्वपक्ष: संवाद इतिहास नहि, केवल साहित्य उपनिषदिक संवाद सम्पादित साहित्यिक रचना हो सकैत; तें शब्दशः दरबारी प्रतिलेख मानब अनुचित। पात्र आ संवादक ऐतिहासिकता अलग We | मुदा साहित्यिक रूप दार्शनिक सामग्री नष्ट नहि करैत। प्रश्‍न, उत्तर, उपमा आ विरोध पाठीय तथ्य छथि, जकर अवधारणात्मक विश्लेषण सम्भव। इतिहास लिखैत समय “पाठ प्रस्तुत Hed अछि? आ *घटना वास्तवमे Vet भेल” अलग भाषा प्रयोग हो। स्रोत- सीमा स्वीकारि दार्शनिक मूल्य बचाओल जाए। अध्याय-निष्कर्ष याज्ञवल्क्य, गार्गी आ मैत्रेयीके एक-दोसरसँ अलग जीवनचरितक पात्र नहि, संवादात्मक दार्शनिक क्षेत्रक सह- निर्माता रूपमे पढ़लासँ बृहदारण्यकक बौद्धिक समृद्धि स्पष्ट होइत अछि। गार्गी तत्त्वमीमांसाक प्रश्‍नक सीमा बढ़बैत छथि, मैत्रेयी मूल्य आ अमरत्वक प्रश्‍न तीक्ष्ण Hed छथि, याज्ञवल्क्य आत्मा आ अंतिम वास्तविकताक उत्तर विकसित करैत छथि। समानान्तर दर्शन एहि बहुवक्ता संरचनाके अपन gids प्राचीन प्रेरणा मानैत अछि।