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उदयनाचार्य न्याय-वैशेषिक परम्पराक ओ प्रमुख दार्शनिक छथि जिनकर काज पुरान न्याय-वैशेषिकक अनेक
तर्ककें व्यवस्थित, तीक्ष्ण आ प्रतिपक्ष-सचेत रूप दैत अछि। हुनक महत्त्व केवल ईश्वर-सिद्विक कारण नहि;
आत्मा, पदार्थ, कारणता, सार्वभौम, बौद्ध क्षणिकवाद, अनात्मवाद, मीमांसक ईश्वर-आलोचना आ न्यायीय
तत्त्वमीमांसाक अनेक क्षेत्रमे हुनकर हस्तक्षेप प्रभावशाली अछि। गङ्गेशक नव्य-न्यायपूर्व बौद्धिक संसार
बुझबाक लेल उदयन एक प्रमुख कड़ी छथि।
20.1 ऐतिहासिक स्थान
उदयनकें सामान्यत: दसम-एगारहम शताब्दीक आसपास राखल जाइत अछि। जीवनवृत्त सम्बन्धी अनेक
परम्परागत कथा उपलब्ध छथि, मुदा दार्शनिक अध्ययनमे ग्रन्थक आन्तरिक साक्ष्य, उद्रण-सम्बन्ध, टीका-
परम्परा आ विश्वसनीय विद्वत् सम्पादन अधिक सुरक्षित आधार प्रदान करेत अछि। समानान्तर दर्शन हुनक
क्षेत्रीय गौरवक चर्चा करैत समय काल्पनिक जीवनी विस्तारसँ बचैत अछि।
20.2 प्रमुख ग्रन्थ
उदयनक प्रमुख कृतिसभमे न्यायकुसुमाञ्जलि, आत्मतत्त्वविवेकन किरणावली तथा
न्यायवारत्तिकतात्पर्यपरिशुद्धि उल्लेखनीय छथि। न्यायकुसुमाञ्जलि ईश्वरक अस्तित्व सम्बन्धी न्यायीय तर्कक
प्रसिद्ध प्रस्तुति; आत्मतत्त्वविवेक बौद्ध अनात्मवादक प्रतिवाद आ आत्माक यथार्थताक रक्षा; किरणावली
वैशेषिक परम्पराक तत्त्वमीमांसा संग संवाद; परिशुद्धि पूर्ववर्ती न्यायीय भाष्य-परम्पराक आलोचनात्मक
विस्तार अछि।
20.3 प्रतिपक्षक गम्भीरता
उदयनक दार्शनिक मूल्य बुझबाक लेल केवल हुनकर निष्कर्ष गिनब पर्याप्त नहि। हुनकर पद्धति प्रतिपक्षक
शक्तिशाली तर्ककैँ गंभीरतासँ ग्रहण करैत अछि। बौद्ध दर्शन, मीमांसा आ अन्य विरोधी मत बिना गम्भीर
बौद्धिक चुनौतीक न्यायीय दर्शन एतेक सूक्ष्म नहि बनित। समानान्तर दर्शन एहि इतिहाससँ सीखैत अछि
प्रतिद्न्द्वी विचार परम्पराक शत्रु नहि; अनेक बेर ओहि परम्पराक आत्मसुधारक प्रमुख कारण होइत अछि।
20.4 आत्मतत्त्वविवेक:ः आत्माक प्रश्न
बौद्ध अनात्मवाद स्थायी आत्मा स्वीकार करबाक आवश्यकता चुनौती दैत अछि। अनुभव, स्मृति, नैतिक
निरन्तरता आ व्यक्ति-पहिचान क्षणिक अवस्थाक प्रवाहसँ बुझल जा सकैत अछि--एहन विविध बौद्ध तर्क
न्यायपरम्पराक सामने छल। उदयन आत्मतत्त्वविवेकमे स्थायी आत्माक पक्षमे प्रतिवाद विकसित करैत छथि।
न्यायीय तर्क स्मृति, इच्छा, सुख-दुःख, ज्ञान आ कर्तृत्वक एक आश्रय मानबाक आवश्यकता पर बल दैत अछि।
“हम काल्हि जे देखलहुँ से आइ स्मरण Het छी”--एहि प्रत्यभिज्ञा आ स्मृतिक निरन्तरता स्थायी ज्ञाताक
पक्षमे कारण सुप प्रस्तुत कएल जाइत अछि। बौद्ध प्रतिपक्ष एहि निरन्तरताकें कारण-श्रृंखला द्वारा बुझबाक
प्रयास करैत अछि। विवादक वास्तविक केन्द्र “आत्मा अछि/नहि” नारा नहि, व्यक्तिगत निरन्तरताक सर्वोत्तम
व्याख्या अछि।
20.5 क्षणिकवादक चुनौती
बौद्ध क्षणिकवाद वस्तु आ मानसिक अवस्थाकें क्षणभंगुर घटना रूपमे बुझैत अछि। उदयन-जकाँ न्यायीय
यथार्थवादी स्थायी पदार्थ, गुणक आश्रय आ कारणात्मक निरन्तरता आवश्यक मानेत छथि। प्रश्न ई अछि
परिवर्तन चिन्हबाक लेल की कोनो स्थायी आधार चाही? अथवा निरन्तरता स्वयं क्रमबद्ध क्षणसभक सम्बन्धसँ
बनि सकैत अछि?
समानान्तर दर्शन एहि विवादे आधुनिक “स्थायी आत्मा बनाम मस्तिष्क” बहसमे सीधा रूपान्तरण नहि
करेत। ऐतिहासिक अवधारणा अलग छथि, मुदा व्यक्ति-पहिचान, स्मृति आ निरन्तरताक समस्या आजो
जीवित अछि।
20.6 ईश्वर-सिद्धिः न्यायकुसुमाञ्जलि
न्यायकुसुमाञ्जलिमे उदयन Sukh अस्तित्वक पक्षमे अनेक न्यायीय अनुमान विकसित करैत छथि। कार्य-
जगतक कारण, परमाणु आ अदृष्टक संयोजन, भाषिक व्यवस्था, वेदक प्रामाण्य आदि विविध आधारसँ ईश्वर-
सिद्भिक प्रयास भेटैत अछि। एहि तर्कसभक रूप, संख्या आ व्याख्या टीकाकार अनुसार भिन्न रूपमे व्यवस्थित
कएल जाइत अछि; Ff सरल “आठ प्रमाण”क सूचीकें बिना पाठ-सन्दर्भ अंतिम मानब उचित नहि।
विशेष Sud कार्यकारण-तर्क कहैत अछि जे निर्मित वस्तुक ज्ञानी कर्ता होइत अछि; जगत कार्यरूप अछि;
अतः जगतक ज्ञानी कारण मानबाक कारण अछि। बौद्ध आ मीमांसक प्रतिपक्ष प्रश्न उठबैत अछि--साधारण
घट-पटसँ सम्पूर्ण जगतपर कर्ता अनुमान वैध विस्तार अछि की नहि? यदि जगत एकमात्र उदाहरण, तुलना
कोना? उदयनक दर्शनक शक्ति एहि आपत्तिसभक उत्तर देबाक प्रयासमे अछि।
20.7 प्राकृतिक धर्ममीमांसा आ तर्क
उदयन आ न्यायपरम्परा धार्मिक प्रशनकें “तर्कक बाहर” नहि मानैत। SUH अस्तित्व आ वेदक प्रामाण्य
दार्शनिक प्रमाणक विषय ata अछि। समानान्तर दर्शन एहि साहसकें महत्त्वपूर्ण मानैत अछि। आस्था
सम्मानयोग्य, मुदा सार्वजनिक दार्शनिक दाबी कारण माँगि सकैत अछि।
संगहि, तर्क प्रस्तुत भेलासँ निष्कर्ष स्वतः सिद्ध नहि। न्यायकुसुमाञ्जलिक तर्कसभ आलोचनाक लेल खुला
छथि। दार्शनिक सम्मानक अर्थ निष्कर्ष स्वीकारब नहि; तर्कक सबलतम रूप बुझि ओकर परीक्षण करब।
20.8 मीमांसा संग विवाद
मीमांसा वेदक प्रामाण्य बचबैत Sat आवश्यकता अस्वीकार करैत अछि। वेद अपौरुषेय; कर्म स्वयं
फलदायी; सृष्टि अनादि-एहन ढाँचामे ईश्वर अतिरिक्त परिकल्पना बुझाइत अछि। न्याय-वैशेषिक एक
बुद्धिमान नियामक, जगत-व्यवस्था आ विश्वसनीय शास्त्रीय साक्ष्यक UMA ईश्वरक आवश्यकता प्रतिपादित
करैत अछि।
ई विवाद धार्मिक आ नास्तिकक सरल विभाजन नहि। मीमांसा वैदिक परम्पराक भीतर ईश्वर-विहीन दार्शनिक
ढाँचा प्रस्तुत Het अछि; न्याय इश्वरवादी यथार्थवाद। भारतीय दर्शनक बहुलता बुझबाक लेल ई उदाहरण
अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि।
20.9 कारणता आ अदुष्ट
न्याय-वैशेषिक जगतमे कर्मफल, परमाणुसंयोग आ कारण-व्यवस्थाक प्रश्न जटिल अछि। अदृष्ट-प्रत्यक्ष नहि
होयवला कर्मजन्य शक्ति-व्याख्यामे भूमिका निभबैत अछि, मुदा उदयन प्रश्न करैत छथि जे अचेतन तत्त्व
स्वयं सुव्यवस्थित परिणाम कोना उत्पन्न करेत? एतयसँ बुद्धिमान नियामकक तर्क विकसित होइत अछि।
प्रतिपक्ष पूछैत अछि--नियमित प्राकृतिक प्रक्रिया लेल चेतन नियामक आवश्यक किएक?
आधुनिक विज्ञान एहि विवादक ऐतिहासिक शब्दावली साझा नहि करेत। तँँ उदयनक तर्ककें आधुनिक भौतिक
विज्ञानक पूर्वरूप कहब गलत। ओकर वास्तविक महत्त्व व्याख्यात्मक पर्याप्तता, कारणता आ बुद्धिमान
कारणक दार्शनिक प्रश्नमे अछि।
20.10 सार्वभौम आ वर्गीकरण
न्याय-वैशेषिक वास्तविक सार्वभौम--जाति--स्वीकार करैत अछि। उदयन सार्वभौम मानबाक सीमा स्पष्ट
करबाक प्रयास करेत छथि: प्रत्येक समानता अलग सार्वभौम नहि; अन्यथा अनावश्यक सत्ता-वृद्धि वा अनन्त
प्रतिगमन हो सकैत अछि। वर्गीकरणक ई समस्या आधुनिक दर्शनमे सेहो परिचित अछि-कोन समानता
वास्तविक प्रकार, कोन केवल सुविधाजनक वर्ग?
20.11 उदयनसँ गङ्गेश धरि
गङ्गेशक तत्त्वचिन्तामणि नव्य-न्यायक नूतन चरण आरम्भ करेत अछि, मुदा शून्यसँ नहि। उदयन आ पूर्ववर्ती
न्यायीय परम्परा द्वारा निर्मित समस्या-संसारप्रमाण, अनुमान, व्याप्ति, आत्मा, ईश्वर, पदार्थ, सम्बन्ध
गङ्गेशक पृष्ठभूमि अछि। गङ्गेशक नूतनता एहि विरासतकें अत्यन्त सूक्ष्म ज्ञानमीमांसात्मक भाषा आ
विश्लेषणमे पुनर्गठित करबमे अछि।
20.12 समानान्तर दर्शन लेल उदयनक शिक्षा
उदयनसँ चारि पद्धतिगत शिक्षा विशेष महत्त्वपूर्ण अछि। पहिल--आस्थाक विषय सेहो तर्कक परीक्षणसँ बाहर
नहि। दोसर--प्रतिपक्षकें कमजोर बनाकऽ हराएब नहि; बौद्ध आ मीमांसक आपत्तिक सबल रूपसँ सामना
करू। तेसर-तत्त्वमीमांसा आ ज्ञानमीमांसा परस्पर जुड़ल; “की अछि”क दावा “कोना जानल” प्रश्न माँगैत
अछि। चारिम--परम्पराक रक्षा तखन बौद्धिक होइत अछि जखन ओ आपत्तिसँ बदलय आ सूक्ष्म बनय।
पूर्वपक्षः उदयनक ईश्चर-सिद्धि आज अप्रासंगिक?
उत्तरपक्ष: कोनो ऐतिहासिक तर्कक वर्तमान महत्त्व केवल ओकर निष्कर्ष आज स्वीकारल जाइत अछि की
नहि, एहि पर निर्भर नहि। उदयन कारण, व्याख्या, अनुमानक सीमा, चेतन कर्ता, शास्त्रीय साक्ष्य आ प्रतिपक्षक
भारक प्रशन व्यवस्थित करेत छथि। आधुनिक दार्शनिक एहि तर्कसँ असहमत होइतहुँ ओकर संरचना सँ सीखि
सकैत अछि।
20.13 ईश्वरसिद्विक तर्क-रचना
उदयनक ईश्चर-विमर्श अनेक अनुमानक संरचना रखैत अछि; ओकरा “सभ वस्तुक निर्माता चाही'क एक पंक्ति
धरि घटब अनुचित। कार्यता, आयोजन, शब्द, परम्परा आ नैतिक क्रमजकाँ भिन्न आधार अलग प्रतिज्ञा माँगैत
अछि।
प्रत्येक तर्कक निष्कर्ष सेहो अलग शक्ति रखि सकैत-_बुद्धिमान कारण, प्रथम संयोजक, विश्वसनीय वेद-
वक्ता। एहि निष्कर्षसभसँ सर्वगुणसम्पन्न ईश्वर धरि बढ़बाक अतिरिक्त चरण स्पष्ट हो।
आलोचना आधुनिक विज्ञानक नाम मात्र नहि ले; उदयनक कारण-सिद्धान्त आ प्रमाणमीमांसा भीतर आपत्ति
बनाबय। तहिना समर्थक विज्ञानक आज्ञात Ach तर्कक आसान आधार नहि बनाबय।
20.14 आत्मा आ स्मृतिक तर्क
स्मृति हम ओ वस्तु देखलहुँ” कहि पूर्व अनुभवक स्वामित्व visa अछि। क्षणभंगुर ज्ञान-प्रवाहमे पहिल
अनुभूति आ बादक स्मृति एक कर्ताक कोना--न्याय स्थायी आत्माक तर्क दैत अछि।
बौद्ध प्रतिपक्ष कारणगत प्रवाहसँ निरन्तरता बुझा सकैत अछि। प्रश्न ई जे स्वामित्वबोध स्वतन्त्र आत्मा सिद्ध
करैत की स्मृति-प्रक्रियाक संरचना मात्र।
स्मृति त्रुटिपूर्ण होइत अछि; तथापि त्रुटि पहचानब लेल सेहो वर्तमान-अतीत सम्बन्ध चाही। दूनू पक्षक
व्याख्यात्मक लागत तुलना कएल जाए।
20.15 नास्तिक प्रतिपक्षक सबल प्रस्तुति
ईश्वर-विरोधी मतके नैतिक दोष वा जिद्द कहि देब तर्क नहि। जगतक स्वभाव, कर्म, अनादि परमाणु वा कारण-
श्रृंखला सँ व्याख्या सम्भव--एहन प्रतिपक्ष अपन सबल रूपमे प्रस्तुत हो।
उदयनक उपलब्धि एहि प्रतिपक्षसँग तकनीकी संवादमे अछि। आधुनिक पाठक विजेता घोषित करबाक बदला
प्रतिज्ञा, हेत्वाभास आ अनुत्तरित प्रश्न चिन्हित करय।
परम्परागत तर्कक अध्ययन विश्वास पुष्ट करबाक साधन मात्र नहि; तर्कक वैधता जाँचबाक सार्वजनिक
अभ्यास। निष्कर्ष पाठकक प्रमाण-विवेचनपर निर्भर।
20.16 पूर्वपक्ष: मध्यकालीन ईश्वर-तर्क अप्रासंगिक
आधुनिक विज्ञानक बाद प्राचीन कारण-दर्शन बेकार-एहन धारणा तत्त्वमीमांसा आ विज्ञानक स्तर मिला दैत
अछि। विज्ञान विशिष्ट प्रक्रियाक व्याख्या देत; किएक किछु अछि’, नियमक आधार, चेतना वा मूल्यक प्रश्न
शेष रहि सकैत।
तथापि शेष प्रश्न देखिते प्राचीन उत्तर सत्य नहि। आधुनिक ज्ञान कारण, पदार्थ आ जीवन सम्बन्धी अनेक
प्रतिज्ञा बदलि देलक; तर्क पुनः मूल्यांकित हो।
उदयनक स्थायी महत्त्व निष्कर्ष अचूक होयबमे नहि, सबल प्रतिपक्ष सामने औपचारिक कारण देबाक
अनुशासनमे अछि।
अध्याय-निष्कर्ष
उदयनाचार्यक दर्शन न्याय-वैशेषिक परम्पराक एक उच्च बिन्दु अछि, जतय आत्मा, कारणता, ईश्वर, सार्वभौम
आ प्रतिपक्ष-विमर्श एक-दोसरसँ Sd अछि। हुनक महत्त्व केवल धार्मिक निष्कर्षमे नहि, तर्क सार्वजनिकता
मे अछि-_विश्वास कारण प्रस्तुत करय, आपत्ति सुने, प्रत्युत्तर दे, आ दार्शनिक कसौटी स्वीकार करय।
समानान्तर दर्शन एहि बौद्धिक साहसकें अपन मिथिला-केन्द्रित पद्धतिक महत्त्वपूर्ण पूर्ववर्ती रूप मानैत अछि।
अध्याय-ग्रन्थसूचौ
उदयनाचार्य — न्यायकुसुमाञ्जलि।