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भारतीय दर्शनक इतिहासमे वाचस्पति मिश्रक महत्त्व केवल एहि कारण नहि जे ओ अनेक दर्शन-परम्परासँ
सम्बन्धित ग्रन्थपर व्याख्या कएलनि। हुनक महत्त्व एहि बातमे अछि जे भारतीय दार्शनिकता एक-दोसरासँ
काटल बन्द कोठरीसभक समूह नहि, बल्कि सतत पारस्परिक पठन, विवाद, ग्रहण आ पुनर्व्याख्याक संसार
छल--ई बात हुनक कृतित्व अत्यन्त स्पष्ट Cus देखबैत अछि। समानान्तर दर्शन लेल वाचस्पति मिश्र
बहुशास्त्रीय बौद्धिक अनुशासनक उदाहरण छथि।
21.1 बहुशास्त्रीयताः मतान्धताक विरुद्ध पद्धति
कोनो एक दर्शन-पद्धतिक भीतर रहि कऽ दोसर परम्पराकें केवल विरोधी रूपमे देखब सहज अछि। वाचस्पति
मिश्रक बौद्धिक संसार एहि सरलताके ated अछि। न्याय, सांख्य, योग, मीमांसा आ वेदान्त सम्बन्धी
ग्रन्थसभपर हुनक कार्य देखबैत अछि जे एक दार्शनिक परम्पराकें गम्भीरतासँ बुझबाक लेल ओकर पड़ोसी आ
प्रतिपक्षी परम्परासभकें सेहो बुझब आवश्यक अछि।
एहि बहुशास्त्रीय पठनक अर्थ ई नहि जे सभ मत अन्ततः एकहि बात कहैत अछि। उलटे, tach ठीक-
ठीक देखबाक क्षमता Ted अछि। सांख्यक पुरुष-प्रकृति द्वैत, वेदान्तक ब्रह्म-विमर्श, न्यायीय प्रमाणमीमांसा,
योगक चित्त-वृत्ति आ मीमांसाक शब्द-प्रामाण्य--ई सभकें एकमे मिला देब बौद्धिक आलस्य होयत। वाचस्पति
मिश्रक अध्ययन एहि विविधताकें सहन करबाक क्षमता सिखबैत अछि।
21.2 व्याख्या केवल पुनरुक्ति नहि
व्याख्याकारक कार्यके कई बेर मूल लेखकक बात दोहराबयवला गौण कार्य मानल जाइत अछि। भारतीय
शास्त्रीय परम्परामे ई धारणा बहुत अधूरी अछि। भाष्य, वार्तिक, टीका आ उपटीका अनेक बेर मूल सिद्धान्तक
नूतन प्रश्न, सूक्ष्म भेद आ तर्क-विस्तारक स्थल बनैत अछि। वाचस्पति मिश्रक रचनात्मकता एहि व्याख्यात्मक
परम्पराक भीतर देखबाक चाही।
व्याख्या तखन दर्शन बनैत अछि जखन पाठक कठिन पद स्पष्ट करैत अछि, विरोधी अर्थसभक परीक्षण करैत
अछि, तर्कक रिक्त स्थान भरैत अछि, सम्भावित आपत्ति soda अछि, आ मूल सिद्धान्तकें नूतन विवाद-
सन्दर्भमे रखैत अछि। एहि अर्थमे व्याख्याकार परम्पराक सेवक मात्र नहि; परम्पराक सह-निर्माता सेहो भऽ
सकैत अछि।
21.3 प्रमुख दार्शनिक क्षेत्र
वाचस्पति मिश्रसँ सम्बद्ध प्रसिद्ध कृतिसभमे सांख्यतत्त्वकौमुदी, तत्त्ववैशारदी, भामती, न्यायदर्शन सम्बन्धी
तात्पर्य-टीका आ तत्त्वबिन्दु-जकोँ ग्रन्थ उल्लेखनीय छथि। एहि कृतिसभक विषय अलग-अलग अछि, मुदा एक
समान प्रवृत्ति देखाइत अछि-दुरुह प्रश्नकें पद्धतिगत STA खोलब।
सांख्यक प्रसंगमे प्रकृति, पुरुष, गुण आ मुक्तिक प्रश्न; योगक प्रसंगमे चित्त, वृत्ति, समाधि आ कैवल्य; वेदान्तमे
ब्रह्म, आत्मा, अविद्या AT AA; AAA प्रमाण, तर्क आ प्रतिपक्ष; भाषा-विमर्शमे शब्द आ अर्थ-ई सभ हुनक
अध्ययन-क्षेत्रक विस्तार देखबैत अछि।
21.4 समानान्तर दर्शनक शिक्षा
समानान्तर दर्शन वाचस्पति मिश्रसँ एकटा महत्त्वपूर्ण पद्धति ग्रहण करैत अछि-अपन मतक सत्यता सिद्ध
करबाक पहिने आन मतके ओकर सबल रूपमे बुझू। न्याय पढ़ैत बौद्ध आपत्ति पढ़; वेदान्त पढ़ैत मीमांसा आ
सांख्य पढ़; मार्क्स पढ़ैत उदारवाद; गांधी पढ़ैत आम्बेडकर; परम्परा पढ़ैत ओकर हाशिया।
बहुशास्त्रीयता तटस्थता नहि। अन्ततः निष्कर्ष देबाक आवश्यकता रहैत अछि। मुदा निष्कर्षक मूल्य तखन
Fed अछि जखन ओ विरोधी पक्षक वास्तविक शक्ति देखलाक बाद देल गेल हो। एहि अर्थमे बहुशास्त्रीय
अध्ययन बौद्धिक न्याय अछि।
21.5 व्याख्या, सत्ता आ परम्परा
प्रत्येक परम्परा अपन अधिकृत व्याख्या बनबैत अछि। कोन टीका पढ़ल जाए, कोन ग्रन्थ पाठ्यक्रममे, कोन
मत “मुख्य” कहल जाए--ई निर्णय ज्ञानक इतिहास प्रभावित करैत अछि। वाचस्पति मिश्रक बहुपरम्परागत
उपस्थिति समानान्तर दर्शनकें याद दिअबैत अछि जे परम्परा एकरूप नहि; ओकर भीतर अनेक पठन सम्भव
रहैत अछि।
तँ इतिहास लिखैत समय केवल “मूल ग्रन्थ” नहि, व्याख्यात्मक परम्परासभक मार्ग सेहो देखबाक Tet
विचारक प्रभाव कई बेर मूल सूत्रसँ कम, ओकर टीका-परम्परासँ बेसी फैलैत अछि।
पूर्वपक्षः बहुशास्त्रीयता सँ दार्शनिक प्रतिबद्धता कमजोर होइत अछि
आपत्ति ई हो सकैत अछि जे अनेक परम्परा गम्भीरतासँ पढ़ला पर व्यक्ति अपन स्पष्ट दर्शन खो देत। उत्तर ई
जे असली प्रतिबद्धता आलोचनासँ Std नहि। जे मत केवल विरोधी मत नहि सुनलाक कारण टिकैत अछि,
ओकर शक्ति संदिग्ध अछि।
21.6 सर्वतन्त्रस्वतन्त्रताक दार्शनिक अर्थ
वाचस्पति मिश्रक बौद्धिक व्यक्तित्व बुझबाक लेल “सर्वतन्त्रस्वतन्त्र' पद उपयोगी अछि, मुदा एकरा
अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसामे बदलि देब उचित नहि। एकर ठोस अर्थ ई जे ओ न्याय, सांख्य, योग, मीमांसा आ
वेदान्त-जकाँ भिन्न परम्पराक तकनीकी भाषा भीतर प्रवेश HS सकैत छथि। कोनो मतक विवेचन करैत समय
ओ बाहरी आलोचकक सुविधाजनक भाषा नहि थोपैत छथि; मतक अपन प्रश्न, प्रमाण आ पारिभाषिक
HAMA पहिने ग्रहण करेत छथि।
एहन बहुशास्त्रीय दक्षता समन्वयवादसँ भिन्न अछि। समन्वयवाद मतभेदकें अन्ततः एक कहि सकैत अछि;
वाचस्पतिक लेखन मतभेदक वास्तविकता बनौने रखैत अछि। सांख्यमे पुरुष-प्रकृति, न्यायमे प्रमाण-प्रमेय,
योगमे चित्तवृत्ति, आ अद्वैतमे अध्यास-ई सभ एक-दोसरक सरल पर्याय नहि। समानान्तर दर्शन लेल शिक्षा
ई जे अनेक परम्परा पढ़बाक अर्थ ओकर भिन्नता मेटायब नहि, बल्कि Utah ओकर सबल रूपमे बुझि
साझा WAH धरातल खोजब होयत।
21.7 भाष्य, टीका आ मौलिकताक सम्बन्ध
आधुनिक पाठक प्रायः मौलिक ग्रन्थकें प्रधान आ टीका-भाष्यकें दोसर दर्जाक लेखन मानि लैत अछि। भारतीय
शास्त्रीय परम्परामे ई विभाजन अपर्याप्त अछि। टीकाकार पाठक वाक्य खोलैत, आपत्ति व्यवस्थित करैत,
अस्पष्ट पदक सीमा निश्चित करेत आ नूतन विवादक उत्तर दैत छथि। एहि क्रियामे व्याख्या स्वयं दार्शनिक सृजन
बनैत अछि। वाचस्पतिक कृतिसभ एहि बातक उदाहरण छथि जे परम्पराक भीतर रहितो प्रश्नक संरचना बदली
सकैत अछि।
मुदा भाष्यकारक अधिकार असीम नहि। व्याख्या मूल पाठक सम्भव अर्थ, अन्य उपलब्ध व्याख्या, आ दार्शनिक
संगतिक कसौटीपर जाँचल जायत। जँ कोनो बादक टीका अपन सम्प्रदायगत निष्कर्ष मूल लेखकपर आरोपित
करैत अछि, तँ पाठालोचन आ तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक होइत अछि। एहि कारण समानान्तर पद्धति मूल
सूत्र, आरम्भिक भाष्य, बादक टीका आ आधुनिक इतिहासकारक कथनकें एकहि स्तरक स्रोत नहि मानेत
अछि।
21.8 तत्त्ववैशारदी आ चित्तक प्रश्न
योगपर वाचस्पतिक विवेचन चित्त, वृत्ति, संस्कार, क्लेश आ समाधि-जकाँ पदसभक परस्पर सम्बन्ध स्पष्ट
करबाक प्रयास Hed अछि। चित्त केवल आधुनिक अर्थक “मन” नहि; ई अनुभव, स्मृति, प्रवृत्ति आ बन्धनक
प्रक्रियासँ जुल एक सूक्ष्म दार्शनिक उपकरण अछि। वृत्तिनिरोधकें चेतनाक विनाश मानलासँ योगक लक्ष्य
विकृत होयत; प्रशन ई अछि जे द्रष्टा आ चित्तक परिवर्तनशील रूपक भेद कोना प्रत्यक्ष हो।
एहि विश्लेषणकें आधुनिक मनोविज्ञानक पूर्वरूप कहि देब प्रमाणविहीन होयत। दुनू अनुशासनक लक्ष्य, पद्धति
आ शब्दावली अलग अछि। तथापि संस्कार, ध्यान, अभ्यास आ आत्मपहिचानक प्रश्नपर संरचनात्मक संवाद
सम्भव अछि। संवादक शर्त ई जे प्राचीन पदके आधुनिक निदानक नाम नहि देल जाए आ आधुनिक अनुभवजन्य
निष्कर्षकेँ शास्त्रीय वाक्यक प्रमाण नहि मानल जाए।
21.9 भामती परम्परा आ अविद्याक समस्या
अद्वैत व्याख्यामे अविद्या केवल जानकारीक अभाव नहि, अनुभवगत भेदकें अन्तिम सत्य मानबाक मूल भ्रमसँ
जुड़ल अछि। मुदा अविद्या ककर आश्रित अछि, ओकर विषय की, आ ब्रह्मज्ञानसँ ओकर निवृत्ति कोना-एहि
प्रश्नसभ बिना अद्वैतक तर्क अधूरा रहैत अछि। वाचस्पतिक भामती एहि विवादक दीर्घ परम्परामे महत्त्वपूर्ण
पड़ाव अछि, कारण ओ सूत्रात्मक निष्कर्षक बदला आपत्ति आ उत्तरक विस्तृत संरचना प्रस्तुत करेत अछि।
समानान्तर दृष्टि एतय दू स्तर अलग रखैत अछि। आत्मपहिचानक भ्रम वास्तविक मानवीय समस्या भऽ सकैत
अछि; मुदा सामाजिक उत्पीड़नकें केवल व्यक्तिक अज्ञान मानि लेब संस्थागत कारण ढाँकि देत। ज्ञानमुक्ति
आ सामाजिक न्याय एक-दोसरक विकल्प नहि। आत्मबोध मनुष्यकें जन्माधारित अहंकारसँ मुक्त करय, ते
ओकर नैतिक परिणति व्यवहारिक समानतामे जाँचल जायत।
21.10 मतानुवर्तन आ आलोचनात्मक दूरी
वाचस्पतिक अध्ययनमे एक कठिन व्याख्यात्मक प्रश्न उठैत अछि: अनेक दर्शनपर लिखैत समय ओ प्रत्येक
Adc केवल प्रस्तुत करेत छथि, अथवा अपन स्वतंत्र स्थिति सेहो रखैत छथि? एकर उत्तर कृतिविशेषक निकट
पाठ बिना नहि देल जा सकैत। लेखकक एक नाम देखिते सभ ग्रन्थमे एकहि अन्तिम मत खोजब सरल, मुदा
जोखिमपूर्ण अछि। भाष्यक विधा प्रायः विवेचित परम्पराक प्रतिज्ञा भीतर तर्क करबाक अपेक्षा रखैत अछि।
तँ बौद्धिक जीवनी आ ग्रन्थार्थ अलग प्रमाण माँगैत अछि। कोन कृति ककर भाष्य, कोन आपत्ति पूर्वपक्ष, कोन
उत्तर सिद्धान्त, आ कोन वाक्य सम्पादक वा बादक परम्परासँ प्रभावित--ई प्रश्न क्रमशः जाँचल जाएत। एहि
सावधानीसँ वाचस्पति “सभ दर्शनक एकता'क प्रतीक नहि, बल्कि निष्पक्ष पुनर्निर्माण, आन्तरिक आलोचना
आ भाष्यात्मक मौलिकताक जटिल उदाहरण बनैत छथि।
अध्याय-निष्कर्ष
वाचस्पति मिश्रक दार्शनिक महत्त्व बहुशास्त्रीय पठन, व्याख्यात्मक सृजनशीलता आ परम्परासभक पारस्परिक
संवादमे अछि। समानान्तर दर्शन एहि आदर्शके अपनबैत अछि--एक विद्यालय, एक स्रोत, एक व्याख्या वा
एक केन्द्रक अन्तिम अधिकार नहि मानब; मतभेदकें नष्ट नहि, स्पष्ट करब; आ आलोचनात्मक पठनकेँ बौद्धिक
निष्ठाक रूपमे स्वीकारब।
अध्याय-ग्रन्थसूचौ
वाचस्पति मिश्र — सांख्यतत्त्वकौमुदी।
वाचस्पति मिश्र — तत्त्ववैशारदी।
वाचस्पति मिश्र भामती।
वाचस्पति मिश्र — न्यायदर्शन सम्बन्धी तात्पर्य-टीका।
वाचस्पति मिश्र — तत्त्वबिन्दु।
Surendranath Dasgupta — A History of Indian Philosophy.
Karl H. Potter — Encyclopedia of Indian Philosophies.