सुकरात, प्लेटो आ अरस्तूक संग प्राचीन यूनानी दर्शन एकटा नूतन चरणमे प्रवेश करैत अछि। प्रकृतिक मूल तत्त्वक प्रश्‍न एखन मनुष्य, ज्ञान, AAU, न्याय, राज्य, शिक्षा, आत्मा आ उत्तम जीवनक प्रश्नसँ जुड़ि जाइत अछि। एहि तीनू दार्शनिककें एकहि सूत्रमे बाँधब सहज अछि, मुदा उचित नहि। सुकरातक विचार मुख्यतः संवाद आ प्रश्‍नक रूपमे सुरक्षित अछि; प्लेटो दार्शनिक संवादक माध्यमसँ न्याय, रूप, ज्ञान आ राज्यक व्यापक संरचना विकसित करैत छथि; अरस्तू अनुभव, वर्गीकरण, तर्क, नैतिकता आ राजनीति के अधिक व्यवस्थित ढंगसँ संयोजित करैत छथि। 26.1 सुकरात: प्रशन पूछबाक नैतिक साहस सुकरात स्वयं कोनो ग्रन्थ नहि लिखलनि। हुनक विचारक प्रमुख स्रोत प्लेटोक संवाद, जेनोफोनक लेखन आ अरिस्टोफेनीजक व्यंग्यात्मक प्रस्तुति अछि। एहि ख्रोतसभमे अन्तर अछि; cf ऐतिहासिक सुकरात आ प्लेटोक साहित्यिक सुकरातकें पूर्णत: एक मानब उचित नहि। तथापि एक बात स्पष्ट अछि--सुकरात दर्शनकें सार्वजनिक प्रश्नोत्तरक क्रिया बनबैत छथि। हुनक पद्धति ककरो Aceh तुरन्त नकारब नहि, बल्कि शब्दक अर्थ पूछब, उदाहरण माँगब, विरोधाभास देखेब, आ वक्ताके अपन विश्वासक आधार YA: जाँचबाक लेल बाध्य करब Gell “साहस की?”, “न्याय की?”, “सद्गुण की?”-एहन प्रशन केवल शब्दार्थक खेल नहि; व्यक्ति जे जीवन जीबैत अछि, ओकर नेतिक आधारक परीक्षा छल। सुकरातक दार्शनिक महत्त्व एहि कारण उत्तरसँ बेसी प्रश्‍नमे अछि। पर प्रश्‍न पूछब मात्र दर्शन नहि। प्रश्‍न ईमानदार हो, उत्तर सुनबाक इच्छा हो, अपन मत बदलबाक सम्भावना हो--तखन प्रश्न दर्शन बनेत अछि। एहि दृष्टिसँ सुकराती संवाद आ न्यायीय वाद-पद्धति बीच तुलनात्मक साम्य देखल जा सकैत अछि: दुनू सत्य-अन्वेषी संवादक आदर्श प्रस्तुत करैत अछि, यद्यपि ऐतिहासिक विकास स्वतंत्र अछि। 26.2 ज्ञान आ सद्ुण सुकरातसँ जुड़ल एक प्रसिद्ध धारणा अछि जे नैतिक भूल AAAS उत्पन्न होइत अछि। ot व्यक्ति वास्तवमे जानि जाए जे उचित की अछि, तँ ओ जानि-बुझि कऽ dona नहि करत। एहि विचारमे नैतिक ज्ञानक महत्त्व अत्यन्त ऊँच अछि। मुदा आधुनिक अनुभव प्रश्‍न Jord अछि--मनुष्य अनेक बेर जानितो गलत करैत अछि; इच्छा, लोभ, भय, समूह-दबाव आ स्वार्थ ज्ञानपर भारी पड़ि सकैत अछि। तें ज्ञान सद्रुणक आवश्यक आधार भऽ सकैत अछि, पर्याप्त शर्त नहि। 26.3 प्लेटो: न्याय, ज्ञान आ रूप प्लेटोक दर्शन संवादात्मक अछि। Republic 4 न्यायपूर्ण व्यक्ति आ न्यायपूर्ण नगरक तुलना द्वारा ओ पूछैत छथि-_मानव आत्माक सुव्यवस्था आ राज्यक सुव्यवस्था बीच की सम्बन्ध? ज्ञान, मत आ अज्ञानक भेद की? जे शासन करय, ओकर योग्यताक आधार की? शिक्षा सत्ता-संरचनाकें कोना प्रभावित करैत अछि? प्लेटोक रूप-सिद्धान्त सामान्यतः एहि विचारसँ जुड़ल अछि जे परिवर्तनशील इन्द्रिय-जगतक पाछाँ स्थायी बोधगम्य रूप अथवा आदर्श संरचना अछि। सुन्दर वस्तु बदलैत अछि, मुदा “सुन्दरता”क अवधारणा केवल एहि बदलैत उदाहरणसभक जोड़ नहि। एहि सिद्धान्तक अनेक व्याख्या अछि; समानान्तर दर्शन लेल मूल प्रश्‍न अछि-ज्ञानकें केवल दृश्य उदाहरणसँ परे सामान्य संरचना चाही की? भारतीय न्यायमे सामान्य, बौद्ध अपोह- विचार आ जैन सामान्य-विशेष विश्लेषण एहि प्रश्‍नसँ अलग ऐतिहासिक मार्गसँ संवाद खोलि सकैत अछि। 26.4 गुफाक रूपक आज्ञानक राजनीति Republic क गुफा-रूपक ज्ञान आ आज्ञानक प्रसिद्ध चित्र अछि। मनुष्य छायाकें सत्य मानि सकैत अछि; शिक्षा दृष्टि बदलैत अछि। मुदा एहि रुपकक राजनीतिक प्रश्‍न सेहो अछि--जँ किछु लोक सत्य देखैत छथि आ बहुसंख्यक छाया, तखन ज्ञानक आधारपर शासनक दाबी कोना वैध होयत? विशेषज्ञता आवश्यक अछि, पर विशेषज्ञता नागरिक समानताकें समाप्त नहि करैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि कारण ज्ञान-सत्ता सम्बन्धपर प्रश्‍न करैत अछि। 26.5 प्लेटोक आदर्श राज्यक सीमा प्लेटोक राजनीतिक atch केवल आदर्शवाद कहि छोड़ब अनुचित। ओ शिक्षा, चरित्र, सत्ता आ संस्थाक सम्बन्धक गम्भीर विश्लेषण Het छथि। मुदा समानान्तर पाठ पूछैत अछि-स्त्रीक स्थान की? दासक स्वर कतय? श्रम करयवला वर्गकें निर्णयमे कतेक स्थान? विदेशी आ पराजित समुदायक अनुभव की? इतिहासक महान ग्रन्थक ओकर उत्तरसँ संग ओकर मौन सेहो पढ़ल जाय। 26.6 अरस्तू: अनुभव, वर्गीकरण आ कारण अरस्तू प्लेटोक शिष्य छलाह, मुदा अनेक प्रश्‍नपर अलग मार्ग अपनौलनि। हुनक काज तर्कशास्त्र, तत्त्वमीमांसा, जीवविज्ञान, नैतिकता, राजनीति, काव्यशास्त्र आ भाषिक विश्लेषण धरि विस्तृत अछि। अरस्तू वस्तुक व्याख्यालेल कारणक अनेक स्तर--द्रव्य, रूप, प्रेरक कारण आ प्रयोजन--विचारैत छथि। आधुनिक विज्ञान सभ संदर्भमे प्रयोजनात्मक व्याख्या स्वीकार नहि करैत, मुदा कारणक प्रकारसभ अलग करबाक असस्तूर्कीय आग्रह एखनो दार्शनिक Sue उपयोगी अछि। 26.7 Agu नैतिकता Nicomachean Ethics मे अरस्तू उत्तम जीवनके केवल नियमपालन नहि, चरित्र-निर्माणक प्रश्‍न मानेत छथि। सद्गुण अभ्याससँ बनेत अछि। साहस डरक अभाव नहि; भय आ उद्दण्डताक बीच विवेकपूर्ण स्थिति अछि। उदारता, संयम, न्याय-सभ मानवीय चरित्रक गठनसँ जुड़ल अछि। एहि दृष्टिक लाभ अछि जे नैतिक जीवनकें एकल निर्णयक बजाय दीर्घ अभ्यास मानेत अछि। सीमा ई जे “मध्यम मार्ग” प्रत्येक अन्यायपर लागू नहि। दासता, जातीय अपमान वा स्त्री-दमनक बीच “मध्यम” खोजब नेतिक भूल होयत। किछु प्रसंगमे स्पष्ट निषेध आवश्यक अछि। 26.8 राजनीति आ मानवकल्याण अरस्तू राजनीति के मानवकल्याणसँ जुड़ल व्यावहारिक विज्ञान मानेत छथि। मनुष्य सामाजिक-राजनीतिक प्राणी अछि; पूर्ण मानव-विकास संस्था आ समुदायसँ Use अछि। मुदा हुनक ऐतिहासिक समाजमे नागरिकताक सीमा संकुचित छल। स्त्री, दास आ अनेक श्रमिक पूर्ण राजनीतिक नागरिक नहि मानल जाइत छलाह। समानान्तर दर्शन एतय एकटा महत्त्वपूर्ण नियम स्थापित Hed अछि-दार्शनिक अन्तर्दृष्टि ग्रहण करु, मुदा ओकर ऐतिहासिक बहिष्कारके अदृश्य नहि बनाउ। 26.9 तीनू दार्शनिकक समानान्तर पाठ सुकरात प्रश्‍नक नैतिकता सिखबैत छथि; प्लेटो ज्ञान, न्याय आ संस्थाक सम्बन्ध; अरस्तू चरित्र, अनुभव आ राजनीति के व्यवस्थित विश्लेषण। मुदा तीनूकेँ यूरोपीय दर्शनक “एकमात्र मूल” मानब उचित नहि। ओ विश्व- दर्शनक महान परम्परामे एक केन्द्र छथि, एकमात्र केन्द्र नहि। भारतीय, चीनी, ईरानी, बौद्ध, जैन, मिथिला आ अन्य परम्परासभक स्वतन्त्र दार्शनिक आरम्भ समान आदरसँ पढ़ल जायत। पूर्वपक्षः महान ग्रन्थकें आधुनिक नेतिक कसौटीपर किएक जाँचब? आपत्ति उठि सकैत अछि जे प्राचीन समाजक दासता वा स्त्री-स्थिति आधुनिक मानदण्डसँ जाँचब अनैतिहासिक अछि। उत्तरपक्षः ऐतिहासिक प्रसंग बुझब आवश्यक, पर नेतिक परीक्षण निषिद्ध नहि। हम एहि बातकें बुझि सकैत छी जे कोनो विचार अपन युगमे किएक सम्भव छल, आ संगहि पूछि सकैत छी जे ओकर तर्क आज स्वीकार्य अछि की नहि। इतिहास-समझ आ नैतिक समीक्षा परस्पर विरोधी नहि। 26.10 सुकराती अज्ञान आ उत्तरदायी प्रश्‍न सुकराती अज्ञानक अर्थ सभ विषयमे किछु नहि जानब नहि। एकर अर्थ अपन दाबीक सीमा पहचानब आ प्रतिष्ठा, बहुमत वा आत्मविश्वासकें ज्ञानक प्रमाण नहि मानब अछि। संवादमे प्रश्‍न धीरे-धीरे देखबैत अछि जे आरम्भिक परिभाषा अपवाद सहि नहि पबैत, उदाहरण एक-दोसरसँ टकराइत अछि, अथवा वक्ता अनजाने दू विरोधी प्रतिज्ञा मानि रहल अछि। एहन प्रश्‍न अपमानक साधन बनि सकैत अछि जँ प्रश्नकर्ता अपन निष्कर्ष छिपाकऽ केवल दोसरकें पराजित करय। उत्तरदायी सुकराती पद्धतिमे प्रश्नकर्ता सेहो परीक्षा लेल खुलल रहत, पद स्पष्ट करत, आ प्रतिपक्षक उत्तरके सबल रूपमे ग्रहण करत। लक्ष्य व्यक्ति नहि, दाबीक संगति अछि। 26.11 प्लेटोक रूप आ ज्ञानक स्तर प्लेटोक रूप-सिद्धान्त परिवर्तनशील विशेष वस्तु आ स्थिर ज्ञानक सम्बन्ध बुझबाक प्रयास अछि। अनेक सुन्दर वस्तु बदलैत अछि, मुदा “सुन्दरता'क विचार केवल एहि क्षणक पसन्द अछि की कोनो अधिक स्थिर मानक? रुपके आकाशमे राखल भौतिक वस्तु बुझब भ्रान्ति होयत; ई वस्तुक बोध, परिभाषा आ मूल्यांकनक आधार सम्बन्धी तत्त्वमीमांसात्मक प्रस्ताव अछि। रूपक सिद्धान्तपर भागीदारी, पृथकता आ अनन्त प्रत्यावर्तन-जकाँ आपत्ति उठैत अछि, आ प्लेटोक संवाद स्वयं एहि कठिनाइकें छिपबैत नहि। समानान्तर अध्ययन निष्कर्षक संग आत्मालोचना सेहो पढ़ैत अछि। कोनो दार्शनिककें एक स्थिर APA बन्द करबाक बदला ओकर संवादसभमे प्रश्‍नक विकास देखब अधिक विश्वसनीय अछि। 26.12 आत्माक त्रिभाग आ नैतिक संघर्ष प्लेटो मानवीय क्रियामे तर्क, उत्साह वा मान-बोध, आ इच्छा-जकाँ भिन्न प्रेरणा देखैत छथि। मनुष्य जखन उचित जानितो विपरीत करैत अछि, तखन केवल अज्ञानक व्याख्या पर्याप्त नहि लगैत। आत्माक त्रिभाग एहन आन्तरिक संघर्ष बुझबाक एक नमूना अछि, शारीरिक अवयवक वैज्ञानिक वर्णन नहि। राज्यक वर्गसभसँ एहि मनोवैज्ञानिक विभाजनक तुलना नैतिक आ राजनीतिक जोखिम राखैत अछि। व्यक्तिक भीतर कार्यात्मक भेद जन्माधारित सामाजिक पदानुक्रमक प्रमाण नहि। समानान्तर दर्शन प्लेटोक सामंजस्यक प्रश्‍न ग्रहण करैत अछि, मुदा सामाजिक दर्जा स्थिर करबाक औचित्य स्वतंत्र SS जाँचैत अछि। 26.13 अरस्तूक चारि कारण कोनो वस्तु बुझब केवल "किससँ बनल” बतब नहि। अरस्तू पदार्थ, रूप, प्रेरक स्रोत आ प्रयोजन-_चारि प्रकारक कारणक चर्चा करैत छथि। मूर्ति लेल पत्थर पदार्थ, आकृति रूप, शिल्पीक कार्य प्रेरक कारण, आ निर्धारित उपयोग वा लक्ष्य प्रयोजन भऽ सकैत अछि। सभ वस्तुमे चारु कारण एकहि ढंगसँ लागू होयत--एहन यान्त्रिक नियम नहि। आधुनिक प्राकृतिक विज्ञान प्रायः प्रयोजनक बदला प्रक्रियात्मक कारणपर बल दैत अछि, मुदा जीव, उपकरण आ मानवीय संस्था बुझबमे कार्य वा उद्देश्यक भाषा एखनहुँ उपयोगी अछि। सावधानी ई जे मानवीय उद्देश्य प्रकृतिपर आरोपित नहि हो, आ “काज की अछि? प्रश्‍न “उत्पन्न कोना भेल’क स्थान नहि लय। 26.14 सद्रुण, अभ्यास आ मध्यमार्ग अरस्तूक नैतिकतामे सद्गण केवल नियम मानबाक घटना नहि; उचित भाव, चयन आ अभ्याससँ बनल चरित्र अछि। साहस भयक अभाव नहि, उचित कारण लेल उचित ढंगसँ भयक सामना अछि। मध्यमार्ग गणितीय बीच नहि; परिस्थिति, व्यक्ति आ विवेक अनुसार अति आ न्यूनताक बीच उचित आचरण अछि। एहि gta सीमा सेहो अछि। चरित्रपर बल देला सँ अन्यायपूर्ण संस्था अदृश्य भऽ सकैत अछि, आ “उचित” निर्णय ककर सामाजिक अनुभवसँ बनल से प्रश्‍न रहैत अछि। गरिमा-आधारित नैतिकता Age अधिकार, समान दर्जा आ संरचनात्मक न्यायसँ जोड़ि Use अछि। अध्याय-निष्कर्ष