“मध्ययुग” शब्द स्वयं एक विशेष यूरोपीय काल-विभाजन अछि। एकरा सम्पूर्ण विश्वक इतिहासपर यांत्रिक रुपसँ लागू कएल जाए तँ भ्रम उत्पन्न होइत अछि। यूरोपक मध्ययुगक समय भारत, इस्लामी संसार, यहूदी बौद्धिक केन्द्र, चीन आ अन्य क्षेत्रमे अलग ऐतिहासिक कालक्रम आ दार्शनिक परिवर्तन चलि रहल छल। तें एहि अध्यायमे “मध्ययुगीन दर्शन” मुख्यतः यूरोपीय, इस्लामी आ यहूदी दार्शनिक संवादक सन्दर्भमे प्रयुक्त अछि। 27.1 “अन्धकार युग”क मिथक लोकप्रिय इतिहास कखनो प्राचीन यूनानक बाद एकटा अन्धकार आ फेर Renaissance/ Modernity क अचानक प्रकाशक कथा सुनबैत अछि। ई अत्यधिक सरल रेखा अछि। यूनानी दर्शनक ग्रन्थसभक संरक्षण, अनुवाद, व्याख्या आ आलोचनामे सीरियाक, अरबी, फारसी, यहूदी आ लैटिन विद्वानसभक विशाल योगदान रहल। दर्शन नष्ट भऽ कऽ पुनर्जन्म नहि लेलक; अनेक भाषिक-सांस्कृतिक मार्गसँ रूपान्तरित भेल। 27.2 आस्था आ तर्क मध्ययुगीन दर्शनक एक केन्द्रीय प्रश्‍न--धार्मिक प्रकाशना आ मानवीय तर्कक सम्बन्ध की? GT सत्य ईश्वरसँ अबैत अछि तेँ दर्शनक स्वतंत्र भूमिका की? आ जँ तर्क स्वतंत्र अछि तँ धार्मिक ग्रन्थक व्याख्या कोना हो? एहि WAH उत्तर अलग परम्परामे अलग रहल। ऑगस्टीन विश्वास आ समझक परस्पर सम्बन्धपर बल दैत छथि। अन्सेल्म ईश्वर-अस्तित्वक तर्क प्रस्तुत करैत छथि। थॉमस अक्वाइनस अरस्तूकीय दर्शन आ ईसाई धर्मशास्त्रक विस्तृत समन्वय करैत छथि। मुदा एहि यूरोपीय विकासकेँ इस्लामी दर्शनसँ अलग पढ़ल जाए तँ कथा अधूरी रहत। 27.3 इस्लामी दर्शनक भूमिका अल-फाराबी, इब्न सीना, इब्न रुशद, अल-गजाली आदि विचारक यूनानी दर्शनक केवल संरक्षक नहि छलाह; ओ अपन स्वतन्त्र प्रश्‍न, आलोचना आ सिद्धान्त विकसित कएलनि। इब्न सीनाक अस्तित्व-तत्त्वमीमांसा, आवश्यक आ सम्भव अस्तित्वक भेद, आत्मा-विमर्श; इब्न रुश्दक अरस्तू-व्याख्या; अल-गजालीक दार्शनिक आलोचना--ई सभ मध्ययुगीन बौद्धिक इतिहासक सक्रिय निर्माण अछि। 27.4 यहूदी दार्शनिक परम्परा माइमोनिडीज जकाँ विचारक धर्मग्रन्थ, तर्क, भाषा आ ईश्चरक गुणक प्रशनपर महत्वपूर्ण चिन्तन करेत छथि। नकारात्मक धर्ममीमांसा--ईश्चरक विषयमे हम की नहि कहि सकैत छी--भाषाक सीमा आ धार्मिक ज्ञानक समस्या सामने आनैत अछि। 27.5 सार्वभौमक समस्या “मनुष्य” जकाँ सामान्य शब्द वास्तविकता मे कोनो स्वतन्त्र सामान्य तत्त्वक संकेत करैत अछि, अथवा केवल अनेक व्यक्तिक लेल एक नाम? सार्वभौम सम्बन्धी यथार्थवाद, नामवाद आ अवधारणावादक विवाद मध्ययुगीन तर्क आ भाषा-दर्शनक केन्द्रीय प्रश्‍न बनल। एहि प्रश्‍नक तुलनात्मक प्रतिध्वनि भारतीय सामान्य, अपोह आ शब्दार्थ-विमर्शमे भेटि सकैत अछि, मुदा ऐतिहासिक समानता मानि लेब उचित नहि। 27.6 अक्वाइनसः तर्क, प्रकृति आ ईश्वर अक्वाइनस अरस्तूकीय दर्शनकें ईसाई धर्ममीमांसासँ संयोजित करैत छथि। हुनक “पाँच मार्ग” sue अस्तित्वक विभिन्न प्रकारक तर्क प्रस्तुत करैत अछि--परिवर्तन, कारण, सम्भाव्यता, मूल्य-क्रम आ प्रयोजनसँ। आधुनिक धर्म-दर्शन एहि तर्कसभपर व्यापक बहस करेत अछि। समानान्तर दर्शनक लेल महत्वपूर्ण बात ई जे आस्थाक प्रश्न तर्कक सीमा बाहर घोषित नहि कएल गेल। 27.7 विश्वविद्यालय, टिप्पणी आ शास्त्रार्थ मध्ययुगीन यूरोपीय विश्वविद्यालयी संस्कृति प्रश्न (quaestio), आपत्ति, प्रत्युत्तर आ निष्कर्षक व्यवस्थित रूप विकसित करैत अछि। भारतीय पूर्वपक्ष-उत्तरपक्ष परम्परासँ रूपात्मक तुलना रोचक अछि। दुनू परम्परामे प्रतिपक्षक तर्क प्रस्तुत करब आ उत्तर देब बौद्धिक शैलीक अंग अछि, यद्यपि सामाजिक संस्था आ ऐतिहासिक विकास अलग अछि। 27.8 धर्म, सत्ता आ सीमा मध्ययुगीन दर्शनकें केवल तर्क-परम्परा कहब पर्याप्त नहि। धार्मिक आ राजनीतिक सत्ता, विधर्मक प्रश्न, स्त्रीक सीमित संस्थागत पहुँच, यहूदी आ अन्य अल्पसंख्यक समुदायक स्थिति-ई सभ ज्ञानक सामाजिक भूगोल प्रभावित करैत छल। जे ग्रन्थ सुरक्षित भेल, जे पाठ्यक्रम मान्य भेल, जे आवाज संस्थागत स्थान पेलक--ई सभ सत्ता-संरचनासँ पृथक नहि। 27.9 समानान्तर पाठ समानान्तर दर्शन मध्ययुगके आधुनिकताक विफल पूर्वकथा नहि मानेत अछि। ई अपन स्वतन्त्र प्रश्‍नवला जटिल काल अछि। एहि कालक बौद्धिक उत्पादन आधुनिक विज्ञान, विश्वविद्यालय, विधि, तत्त्वमीमांसा आ धर्म-दर्शनक अनेक प्रश्‍नक पृष्ठभूमि बनल। पूर्वपक्ष: मध्ययुगीन दर्शन धर्मशास्त्र मात्र छल? उत्तरपक्षः धार्मिक प्रश्न प्रमुख छल, मुदा तर्क, भाषा, अस्तित्व, कारणता, ज्ञान, नैतिकता, राजनीति आ विधिक प्रशन स्वतंत्र दार्शनिक विश्लेषण पेलक। धर्मशास्त्र आ दर्शनक सीमा सदा स्पष्ट नहि, पर एकरा दर्शन-विहीन कहब ऐतिहासिक रूपसँ गलत। 27.10 विश्वास आ बुद्धिक अनेक सम्बन्ध मध्ययुगीन दर्शनकें केवल आस्था द्वारा तर्कक दमन ches ऐतिहासिक विविधता मिटा दैत अछि। किछु विचारक तर्के धार्मिक सत्यक स्पष्टीकरण मानैत छथि, किछु प्राकृतिक बुद्धिसँ सिद्ध होय योग्य निष्कर्ष आ प्रकाशनपर निर्भर दाबी अलग करैत छथि, किछु तर्कक सीमा पर बल दैत छथि। “विश्वास आ “बुद्धि? दू स्थिर शिविर नहि, अनेक सम्बन्धक नाम छथि। दार्शनिक परीक्षा लेल प्रश्‍न ई जे कोन निष्कर्ष सार्वजनिक कारणसँ समर्थित अछि आ कोन विशिष्ट धार्मिक प्रतिज्ञापर निर्भर। धार्मिक समुदाय भीतरक तर्क वैध हो सकैत अछि, मुदा राज्यक बाध्यकारी निर्णय लेल साझा प्रमाण चाही। एहि भेदसँ आस्थाक अपमान नहि, कारणक क्षेत्र स्पष्ट होइत अछि। 27.11 सार्वभौम आ विशेष वस्तुक समस्या “मनुष्य’, “वृक्ष” वा लालिमा” जकाँ सामान्य पद वास्तविक सार्वभौम सत्ता सूचित करैत अछि, वस्तुसभमे उपस्थित साझा रुप, मनक अवधारणा, अथवा नाम मात्र? मध्ययुगीन यथार्थवाद, संकल्पनावाद आ नामवाद एहि प्रशनक भिन्न उत्तर दैत अछि। विवाद भाषाक खेल नहि, कारण ज्ञान, वर्गीकरण आ ईश्वरक सृष्टि बुझबाक ढाँचासँ जुड़ल अछि। भारतीय जाति, सामान्य, अपोह आ शब्दार्थ-विवादसँ तुलना उपयोगी अछि, मुदा समान पद chad ऐतिहासिक समानता मानब अनुचित। दुनू परम्परामे समस्या-क्षेत्र आ तर्कक संरचना जाँचल जाए। तुलनाक लक्ष्य “कियो पहिने कहल” सिद्ध करब नहि, वैकल्पिक समाधानक शक्ति आ सीमा देखब होयत। 27.12 एन्सेल्मक तर्क आ अवधारणासँ अस्तित्व एन्सेल्मक प्रसिद्ध तर्क ईश्वरक अवधारणासँ अस्तित्वक निष्कर्ष धरि पहुँचबाक प्रयास करैत अछि। तर्कक बल एहि प्रश्‍नमे अछि जे सर्वोच्च सम्भव सत्ता केवल AAA रहला पर की ओहि अवधारणासँ विरोध उत्पन्न होइत अछि। आलोचक पूछैत छथि जे कोनो वस्तुक परिभाषामे पूर्णता जोडि ओकर बाह्य अस्तित्व सिद्ध कएल जा सकैत अछि की नहि। एहि Teach एक वाक्यक चमत्कार नहि मानल जाए। अवधारणा, सम्भाव्यता, आवश्यक अस्तित्व आ वास्तविकता बीच सम्बन्ध स्पष्ट करब पड़त। तर्क सफल हो वा नहि, ई देखबैत अछि जे ईश्चरक प्रश्‍न केवल अनुभवजन्य वस्तु खोजबाक प्रश्‍न नहि; तत्त्वमीमांसा आ तर्कक प्रकृति स्वयं विवादमे प्रवेश करैत अछि। 27.13 थॉमस एक्विनास आ कारणक मार्ग एक्विनास गति, कारण, सम्भाव्यता, मूल्यक्रम आ जगतक व्यवस्था सँ ईश्वरक दिशामे अनेक मार्ग प्रस्तुत करैत छथि। ई सभ एकहि तर्कक पुनरावृत्ति नहि। प्रत्येक मार्ग अनुभवगत जगतसँ आरम्भ Het अछि, मुदा निष्कर्ष धारि पहुँचबाक लेल कारण-श्रृंखला, निर्भरता आ अन्तिम व्याख्याक सिद्धान्त मानैत अछि। आलोचना पूछैत अछि जे अनन्त श्रृंखला असम्भव किएक, पहिल कारण धार्मिक परम्पराक ईश्वर किएक, आ जगतक व्यवस्था प्राकृतिक प्रक्रियासँ कतेक बुझल जा सकैत अछि। समानान्तर पद्धति तर्कके ओकर सबल रूपमे पुनर्निर्मित क5 प्रत्येक अतिरिक्त प्रतिज्ञा अलग जाँचैत अछि। 27.14 इस्लामी आ यहूदी दार्शनिक संवाद मध्ययुगीन दर्शन केवल लैटिन ईसाई यूरोपक कथा नहि। अरबी आ यहूदी दार्शनिक परम्परासभ यूनानी ग्रन्थक संरक्षण, अनुवाद, आलोचना आ नूतन विकासमे निर्णायक Set! बुद्धि, प्रकाशन, आत्मा, सृष्टि, आवश्यक सत्ता आ कानूनक प्रश्‍न बहुभाषिक बौद्धिक संसारमे घुमैत रहल। “पूर्वसँ ज्ञान “पश्चिम? पहुँचल--एहन एकदिश सरल कथा सेहो अपर्याप्त। अनुवाद चयन, टीका, संस्थागत संरक्षण आ राजनीतिक प्रसंगसँ बदलैत अछि। इतिहासक न्याय लेल विचारक नाम जोड़ब मात्र नहि, ज्ञान- संचरणक सम्बन्ध, ऋण आ विवाद स्पष्ट करब आवश्यक अछि। अध्याय-निष्कर्ष मध्ययुगीन दर्शनक इतिहास ज्ञानक बहुभाषिक परिसंचरणक इतिहास सेहो अछि। यूनानी, अरबी, यहूदी आ लैटिन संसार परस्पर अनुवाद, आलोचना आ पुनर्व्याख्यासँ जुड़ल। एहि कालके अन्धकार कहि हटायब इतिहासक जटिलताकेँ नष्ट Het अछि। समानान्तर दर्शन इतिहासकें सीधा प्रगति-रेखा नहि, बहुकेन्द्रिक संवादक रूपमे पढ़ैत अछि। अध्याय-ग्रन्थसूचौ Augustine — Confessions; City of God. Anselm — Proslogion. Thomas Aquinas — Summa Theologiae; Summa Contra Gentiles. Avicenna (Ibn Sina) — The Metaphysics of The Healing.