सतरहम शताब्दीक यूरोपमे विज्ञान, गणित, धर्मयुद्ध, राजनीतिक परिवर्तन आ ज्ञानक संस्थासभक रूपान्तरणक बीच निश्चित ज्ञानक आधारक प्रश्न तीक्ष्ण भेल। देकार्त, स्पिनोजा आ लाइबनित्सकें प्रायः “बुद्धिवादी” कहल जाइत अछि। ई वर्गीकरण अध्ययन लेल उपयोगी अछि, मुदा तीनू दार्शनिकक विचार एकरूप नहि। 28.1 देकार्तक पद्धतिगत संशय देकार्त एहन विश्वास खोजैत छथि जे संशयक कठोरतम परीक्षा सहि सकय। इन्द्रिय भ्रमित करैत अछि; स्वप्न अनुभव जागृत अनुभव-जकाँ बुझा सकैत अछि; अतः ओ क्रमशः अपन विश्वास पर संशय करैत छथि। मुदा संशय करैत समय एक बात नकारल नहि जा सकैत--संशय करयवला चिन्तनशील अस्तित्व अछि। एतयसँ cogito क प्रसिद्ध निष्कर्ष निकलैत अछि। एहि संशयक उद्देश्य स्थायी संशय नहि, निश्चित आधार खोजब अछि। समानान्तर दर्शन देकार्तक संशयकेँ अनुशासित पद्धति रूपमे ग्रहण करेत अछि, मुदा सर्वव्यापी संशयकेँ दैनिक ज्ञानक आदर्श नहि मानेत। न्याय परम्परा संशय उत्पन्न होयबाक विशिष्ट कारण पर परीक्षण करैत अछि; देकार्त पद्धतिगत रूपसँ व्यापक संशय उत्पन्न करैत छथि। तुलना उपयोगी, समानता घोषित करब नहि। 28.2 मन-देह द्वैत देकार्त Hach विचारशील तत्त्व आ देहके विस्तृत cea रूपमे अलग करेत छथि। एहि विभाजनसँ चेतना, पहचान आ शरीरक प्रश्‍न नूतन रूपमे सामने अबैत अछि। मुदा तखन कठिनाई उठैत अछि--दू भिन्न तत्त्व परस्पर कारणात्मक सम्बन्ध कोना बनबैत अछि? आधुनिक मन-दर्शनक अनेक प्रश्‍न एहि Cartesian विरासतसँ जुड़ल अछि। 28.3 स्पिनोजा: एक तत्त्व, अनेक गुण स्पिनोजा देकार्तक क्वैतक स्थानपर एकतत्त्ववाद प्रस्तुत करैत छथि। ईश्वर अथवा प्रकृति एकहि अनन्त तत्त्वक दू नाम-जकाँ समझल जाइत अछि। मन आ देह दू स्वतंत्र पदार्थ नहि, बल्कि एकहि वास्तविकताक भिन्न गुणात्मक अभिव्यक्ति। स्पिनोजाक दर्शनमे स्वतंत्रता मनमाना इच्छा नहि। हम कारण-क्रमक अंग छी; वास्तविक स्वतंत्रता आवश्यकताकें बुझब, भावनात्मक दास्यसँ मुक्त होयब आ बुद्धिगत जीवन विकसित करबमे अछि। एहि दृष्टिमे नैतिकता ब्रह्माण्डीय समझसँ BST अछि। 28.4 भावना आ स्वतंत्रता Ethics क महत्त्व केवल तत्त्वमीमांसामे नहि; स्पिनोजा भय, आशा, इर्ष्या, प्रेम, घृणा आ इच्छाकें कारणात्मक रूपसँ बुझैत छथि। भावनाकें केवल नैतिक दोष कहि नकारबक बजाय ओकर उत्पत्ति बुझब आवश्यक अछि। आधुनिक मनोविज्ञानसँ सीधा समानता उचित नहि, मुदा भावनात्मक जीवनक कारणात्मक विश्लेषण दार्शनिक रूपसँ उल्लेखनीय अछि। 28.5 लाइबनित्स: पर्याप्त कारण लाइबनित्स पूछैत छथि-किछु अछि किएक, शून्य किएक नहि? पर्याप्त कारणक सिद्धान्त अनुसार कोनो तथ्य वा सत्यक उचित कारण चाही। संगहि ओ contradiction क सिद्धान्त, सम्भव संसार, ATS आ पूर्वस्थापित सामंजस्यक अवधारणा विकसित करैत छथि। “सम्भव संसार” आधुनिक modal दर्शनमे व्यापक प्रभाव रखैत अछि, यद्यपि आधुनिक उपयोग लाइबनित्सक मूल तत्त्वमीमांसासँ भिन्न हो सकैत अछि। 28.6 मोनाड आ बहुलता लाइबनित्सक ATS सरल, अविभाज्य तत्त्व-जकाँ अछि जे अपन-अपन दुष्टिकोणसँ जगत प्रतिबिम्बित करेत अछि। भिन्न दृष्टि एकहि जगतक भिन्न प्रस्तुति दे सकैत अछि। समानान्तर दर्शन एतयसँ बहुदुष्टिगतताक रूपकात्मक प्रेरणा AS सकैत अछि, मुदा अपन सिद्धान्तके लाइबनित्सक प्रत्यक्ष ऐतिहासिक उत्तराधिकारी घोषित नहि करैत। 28.7 बुद्धिवादक सीमा देकार्त, स्पिनोजा, लाइबनित्स सभ गणितीय स्पष्टता, तर्क आ सिद्धान्तक उच्च आदर्श रखैत छथि। मुदा अनुभवसँ पर्याप्त सम्बन्ध बिना तर्क आत्मसंगत होइतहुँ जगतसँ कटि सकैत अछि। एहि कारण अगिला अनुभववादी परम्परा प्रश्‍न उठबैत अछि-विचारक सामग्री अबैत कतयसँँ अछि? 28.8 वर्गीकरणक सावधानी “बुद्धिवादी बनाम अनुभववादी”क पाठ्यपुस्तकीय विभाजन दार्शनिक इतिहासक शुरुआती नक्शा अछि, भूभाग स्वयं नहि। देकार्त अनुभवक चर्चा करैत छथि; लॉक तर्कक उपयोग करेत छथि; लाइबनित्स अनुभवकें नकारैत नहि। समानान्तर दर्शन प्रत्येक विचारककें ओकर तर्कक जटिलतामे पढ़ैत अछि। पूर्वपक्षः निश्चित ज्ञानक खोज असम्भव आदर्श अछि? उत्तरपक्षः पूर्ण अचूकता सम्भव न हो, तथापि स्पष्टता, कारण आ संशय-परीक्षणक आदर्श मूल्यवान अछि। समस्या तखन होइत अछि जखन अचूकताकें ज्ञानक अनिवार्य शर्त बनाओल जाए। समानान्तर दर्शन ्रुटिसंशोध्य ज्ञानक पक्ष tot अछि। 28.9 विधिसम्मत संशयक सीमा देकार्तक संशय जीवनक सभ विश्वास स्थायी रूपसँ त्यागब नहि, निश्चित आधार खोजबाक विधि अछि। इन्द्रिय कखनो भ्रम दैत अछि, स्वप्न अनुभव जागरण-जकाँ लगैत अछि, आ विचारमे व्यवस्थित धोखा सम्भव मानल जा सकैत अछि। मुदा 'किछु निश्चित नहि” निष्कर्ष स्वयं संशयक क्रियाके मानि रहल अछि। एहि पद्धतिक शक्ति आधारहीन विश्वास हटेबामे अछि; सीमा ई जे प्रतिदिनक ज्ञान अनन्त निश्चितता नहि माँगैत। न्यायालय, विज्ञान आ नागरिक जीवन सम्भाव्यता, पुष्ट स्रोत आ त्रुटि-संशोधनपर चलैत अछि। पूर्ण निश्चितता न भेटला कारण सभ दाबी समान नहि भऽ जाइत। 28.10 मन-शरीरक अन्तरक्रिया जँ मन विस्तारहीन चिन्तनशील द्रव्य आ शरीर विस्तारित द्रव्य अछि, ते दूनू एक-दोसरपर प्रभाव कोना दैत अछि? इच्छासँ हाथ उठैत अछि आ चोटसँ पीड़ा होइत अछि। देकार्तीय ga अनुभवक निजी चेतना आ भौतिक शरीरक भेद बचबैत अछि, मुदा अन्तरक्रियाक कठिनाई उत्पन्न करैत अछि। आधुनिक चेतना-दर्शनमे एहि समस्याक नूतन रूप अछि, मुदा देकार्तकें सीधा आधुनिक स्नायुविज्ञानक विरोधी कहब अनुचित। ऐतिहासिक सिद्धान्त ओकर समयक यान्त्रिक प्रकृति-विचार भीतर बुझल जाए। समानान्तर अध्ययन निजी अनुभवक अवमूल्यन नहि Hea, संगहि शारीरिक प्रमाणक सार्वजनिक जाँच आवश्यक मानैत अछि। 28.11 स्पिनोजाक एकद्रव्यवाद स्पिनोजा ईश्वर वा प्रकृतिक एकमात्र अनन्त द्रव्य मानेत छथि; मन आ शरीर स्वतंत्र द्रव्य नहि, एक वास्तविकताक भिन्न गुणगत अभिव्यक्ति रूपमे बुझल जाइत अछि। एतय ईश्वर जगतसँ बाहर कारीगर-जकाँ कारण नहि। एहि कारण परम्परागत व्यक्तिवादी ईश्चर-धारणासँ तनाव उत्पन्न होइत अछि। एकद्रव्यवाद अट्वैतक समान अछि--एहन त्वरित निष्कर्ष गलत होयत। ब्रह्म, माया, आत्मन्‌, गुण, मोक्ष आ स्पिनोजाक द्रव्य, गुण, प्रकार, बौद्धिक प्रेमक वैचारिक पृष्ठभूमि अलग अछि। तुलना निर्भरता, एकता आ भिन्नताक प्रश्‍नपर हो, शब्दगत अभिन्नतापर नहि। 28.12 आवश्यकता, स्वतंत्रता आ भाव स्पिनोजाक अनुसार मनुष्य प्रायः अपन इच्छाकें स्वतंत्र मानैत अछि कारण ओ इच्छाक कारण नहि जानेत। स्वतंत्रताक अर्थ कारणरहित चयन नहि, आवश्यकताक पर्याप्त बोध आ सक्रिय भावक वृद्धि अछि। जे भाव बाहरी कारणक अधीन निष्क्रिय बनबैत अछि, ओकर ज्ञान मनुष्यकेँ अधिक सक्रिय करि सकैत अछि। ई दृष्टि नैतिक दोषारोपण कम करि कारण बुझबाक प्रेरणा दैत अछि, मुदा उत्तरदायित्व समाप्त कएलासँ न्याय कठिन होयत। समानान्तर दर्शन कारणगत समझ, रोकथाम, सुधार आ गरिमाक रक्षा जोडत अछि। व्यक्ति कारण-श्रंखलाक भाग होइतहुँ सामाजिक उत्तरदायित्वक सम्बन्धमे रहैत अछि। 28.13 लाइबनित्सक पर्याप्त कारण पर्याप्त कारणक सिद्धान्त पूछैत अछि--एहन किएक, अन्यथा किएक नहि? केवल घटना गिनब व्याख्या नहि। लाइबनित्स सम्भव जगत, आवश्यक सत्य आ तथ्यगत सत्यक भेदक माध्यमसँँ जगतक अस्तित्व आ व्यवस्था बुझबाक प्रयास करैत छथि। मुदा प्रत्येक बातक पर्याप्त कारण माँगलासँ अन्तिम कारण स्वयं कोना समर्थित होयत, आ मानवीय ज्ञान ओ कारण धरि पहुँचि सकैत अछि की नहि-ई आपत्ति रहैत अछि। व्यावहारिक अनुसन्धानमे सिद्धान्त उपयोगी प्रश्‍न अछि, पूर्ण व्याख्या भेटबाक दावा नहि। अनिश्चितता स्वीकारितो कारण खोज जारी राखल जा सकैत अछि। अध्याय-निष्कर्ष देकार्त संशयक अनुशासन, स्पिनोजा वास्तविकताक एकता आ कारणात्मक समझ, लाइबनित्स पर्याप्त कारण आ सम्भाव्यताक गम्भीरता सामने arta छथि। तीनू मिलि आधुनिक यूरोपीय तत्त्वमीमांसा आ ज्ञानमीमांसाक प्रमुख प्रश्‍न बनबैत छथि, मुदा हुनका एक “बुद्धिवादी” कोठलीमे बन्द करब उचित नहि।