लॉक, बर्कली आ ह्यूमकें प्रायः ब्रिटिश अनुभववादी परम्पराक तीन प्रमुख नाम मानल जाइत अछि। अनुभव ज्ञानक आरम्भिक सामग्रीक महत्त्व रखैत अछि--ई साझा प्रवृत्ति भेटैत अछि; मुदा बाह्य जगत, पदार्थ, आत्मा, कारणता आज्ञानक सीमा सम्बन्धी हुनक निष्कर्ष बहुत भिन्न अछि। 29.1 लॉक: मनक सामग्री कतयसँ? Locke अपन Essay Concerning Human Understandin मे जन्मजात विचारक कठोर रूपपर प्रश्‍न करैत छथि। संवेदना आ आत्म-निरीक्षण अनुभवक मुख्य स्रोत बनैत अछि। सरल विचार अनुभवसँ अबैत अछि; मन ओकर संयोजन, तुलना आ अमूर्तन द्वारा जटिल विचार बनबैत अछि। एहि दृष्टिमे ज्ञानक सीमा महत्वपूर्ण अछि। मनुष्यक बुद्धि सीमित अछि; सभ प्रश्‍नक निश्चित उत्तर सम्भव नहि। व्यावहारिक जीवन लेल पर्याप्त ज्ञान आ सम्भाव्यता सेहो आवश्यक भूमिका निभबैत अछि। ई ज्ञानात्मक विनम्रता समानान्तर दर्शनक त्रुटिसंशोध्य ज्ञान-दृष्टिसँ संवाद करैत अछि। 29.2 प्राथमिक आ द्वितीयक गुण लॉक वस्तुक आकार, विस्तार, गति आदि गुण आ रंग, स्वाद, गन्ध-जकाँ अनुभूति-निर्भर गुण बीच भेद करेत छथि। एहि भेदपर बादमे व्यापक आलोचना भेल। बर्कली प्रश्‍न उठबैत छथि-जँ द्वितीयक गुण मन-निर्भर अछि ते प्राथमिक गुण पूर्णतः मन-स्वतन्त्र कोना सिद्ध होयत? 29.3 व्यक्ति-पहिचान लॉकक व्यक्ति-पहिचान सम्बन्धी विचार विशेष प्रभावशाली अछि। व्यक्ति वही भौतिक पदार्थ वा आत्मा मात्र नहि; चेतना आ स्मृतिक निरन्तरता महत्वपूर्ण भूमिका निभबैत अछि। मुदा स्मृति त्रुटिपूर्ण होइत अछि; विस्मृति भेल तेँ पहचान समाप्त? एहि प्रश्‍नसँ आधुनिक personal identity दर्शन विकसित होइत अछि। 29.4 बर्कलीः पदार्थक आलोचना बर्कली भौतिक पदार्थक एहन स्वतंत्र आधार मानबाक आवश्यकता पर प्रश्‍न Hed छथि जे प्रत्यक्ष अनुभवसँ परे अछि। हुनक प्रसिद्ध आदर्शवादी सूत्रानुसार अस्तित्व आ अनुभूति/अनुभवक सम्बन्ध अत्यन्त घनिष्ठ अछि। ओ सामान्य जीवनक वस्तु नकारैत नहि; ओ “पदार्थ” नामक अज्ञात आधारक दार्शनिक आवश्यकता नकारैत छथि। एहि सिद्धान्तके “जगत कल्पना अछि” कहि सरल बना देब गलत होयत। बर्कलीक दर्शन धार्मिक तत्त्वमीमांसा, अनुभूति आ भाषिक आलोचनासँ जुड़ल अछि। 29.5 ह्यूमः प्रत्यक्ष प्रभाव आ विचार ह्यूम मनक सामग्रीकेँ impressions आ ideas रूपमे विश्लेषित Hid छथि। ओ देखैत छथि जे अनेक दार्शनिक अवधारणा अनुभवसँ सम्बन्ध स्पष्ट नहि करैत। एहि कारण ओ आत्मा, कारणता, पदार्थ आ आवश्यक सम्बन्धक दावासभपर कठोर प्रश्‍न ord छथि। 29.6 कारणता हम एक घटना बाद दोसर घटना बारम्बार देखैत छी--आगि बाद ताप, धक्का बाद गति। मुदा “आवश्यक सम्बन्ध” स्वयं प्रत्यक्ष देखैत छी की? TA अनुसार अनुभव नियमित अनुक्रम दैत अछि; मन आदतक कारण अपेक्षा बनबैत अछि। एहि विश्लेषणसँ कारणताक दार्शनिक आधार चुनौती पबैत अछि। 29.7 आगमनक समस्या भविष्य अतीतक समान रहत--ई धारणा वैज्ञानिक आ दैनिक जीवन दुनूक आधार अछि। मुदा एहि सिद्धान्तक तर्कसंगत औचित्य की? अतीतमे प्रकृति नियमित रहल, तेँ भविष्य सेहो नियमित रहत--ई तर्क स्वयं आगमनक उपयोग chet अछि। ह्यूम एहि चक्रके उजागर करैत छथि। 29.8 भारतीय व्याप्ति-विमर्शसँ संवाद भारतीय अनुमानमीमांसामे व्याप्ति-हेतु आ साध्यक अविनाभाव सम्बन्धक ज्ञान कोना सम्भव, ई केन्द्रीय प्रश्‍न अछि। न्याय, बौद्ध आ अन्य परम्परा एहि विषयमे अलग समाधान विकसित Het छथि। PA आगमन- संशय आ व्याप्तिक समस्या समान ऐतिहासिक समस्या नहि, मुदा सामान्यीकरणक औचित्य सम्बन्धी संरचनात्मक संवाद सम्भव अछि। एहि तुलनामे सावधानी आवश्यकः “न्याय ह्यूमक समस्या पहिने समाधान HS देने छल” वा “ह्यूम भारतीय अनुमानकें अस्वीकार करेत छथि”--एहन कथन ऐतिहासिक आधार बिना अनुचित। उद्देश्य परस्पर प्रश्‍न, विजय घोषित करब नहि। 29.9 ह्यूमक आत्मा-विमर्श आत्मनिरीक्षणमे स्थायी अपरिवर्तित आत्मा भेटैत अछि की केवल बदलैत अनुभवक प्रवाह? GA bundle- प्रवृत्ति भारतीय बौद्ध अनात्म-विमर्शक याद दिआ सकैत अछि, मुदा दार्शनिक आधार, उद्देश्य आ ऐतिहासिक प्रसंग अलग अछि। तुलनात्मक दर्शन समानता आ भिन्नता दुनू स्पष्ट राखैत अछि। 29.10 नैतिकता आ भावना ह्यूम नेतिक निर्णयमे भावनाक भूमिकापर बल दैत छथि। केवल तर्क मनुष्यकें कर्म लेल प्रेरित नहि Hea; सहानुभूति, अनुमोदन, सामाजिक भावना नैतिक जीवनक अंग अछि। समानान्तर दर्शन एतयसँ सीखैत अछि जे करुणा बिना तर्क निर्दय भऽ सकैत अछि, मुदा भावना बिना आलोचना सेहो पक्षपाती हो सकैत अछि। पूर्वपक्षः अनुभववाद स्वयं अनुभवसँ बाहर कोनो सिद्धान्त मानि सकैत अछि? उत्तरपक्षः “अनुभववाद” एकल कठोर सूत्र नहि। लॉक, बर्कली आ ह्यूमक मतभेद देखबैत अछि जे अनुभवक अर्थ, मनक भूमिका आ तर्कक स्थान पर स्वयं व्यापक विवाद अछि। 29.11 सरल विचार आ अनुभवक संरचना लॉक अनुभवकें ज्ञानक स्रोत मानैत छथि, मुदा मन निष्क्रिय भण्डार मात्र नहि। संवेदन बाहरी वस्तुसँ सामग्री दैत अछि, आत्मपर्यवेक्षण मनक अपन क्रियाक बोध दैत अछि, आ मन तुलना, संयोजन तथा अमूर्तनसँ जटिल विचार बनबैत अछि। जन्मजात विचारक आलोचना अनुभवक संगठन नकारब नहि। एहि दृष्टिक प्रश्‍न ई जे अनुभव स्वयं अवधारणाविहीन अछि की भाषा आ पूर्व अपेक्षा ओकरा आकार दैत अछि। बादक दर्शन देखबैत अछि जे 'देल सामग्री? कहब सरल नहि। समानान्तर ज्ञानमीमांसा प्रत्यक्षक प्राथमिकता Arta अछि, मुदा स्मृति, भाषा, सामाजिक प्रशिक्षण आ अनुमानक भूमिका स्पष्ट रखैत अछि। 29.12 प्राथमिक आ गौण गुण लॉक आकार, विस्तार, संख्या आ गति-जकाँ प्राथमिक गुण तथा रंग, स्वाद, गन्ध-जकाँ गौण गुणक भेद प्रस्तावित करैत छथि। प्राथमिक गुण वस्तुमे मानल जाइत, गौण गुण वस्तुक शक्ति आ अनुभवकर्ताक इन्द्रियक सम्बन्धसँ अनुभूति उत्पन्न करैत अछि। भेद बाह्य जगतक यथार्थता बचबैत अछि, मुदा प्रश्‍न उठैत अछि जे प्राथमिक गुणक ज्ञान सेहो अनुभूति मार्फत अछि; तखन ओकर विशेष विश्वसनीयता कोना? आधुनिक विज्ञानक निष्कर्षके लॉकक सिद्धान्तक सीधा प्रमाण नहि मानल जाए। दार्शनिक महत्त्व अनुभवक गुण आ बाह्य कारणक सम्बन्ध स्पष्ट करबामे अछि। 29.13 बर्कली आ अनुभूत वस्तु बर्कली भौतिक द्रव्यक VET अवधारणापर प्रश्‍न Hed छथि जे सिद्धान्ततः सभ अनुभूत गुणसँ अलग हो। हम रंग, आकार, कठोरता आ गति अनुभवैत छी; एहि गुणक पाछाँ पूर्णतः अज्ञेय पदार्थ मानब व्याख्या बढ़बैत अछि की नहि? हुनक आदर्शवाद वस्तुक नियमित अनुभव नकारैत नहि, ओकर स्वतंत्र भौतिक आधारपर प्रश्‍न करैत अछि। ‹देखनिहार नहि तँ वस्तु गायब” एहन हास्यास्पद सार हुनक तर्कक उचित प्रतिनिधित्व नहि। ईश्वरक निरन्तर अनुभूति हुनक व्यवस्थामे वस्तुगत स्थिरता बचबैत अछि। आलोचना फेर ई पूछत जे ईश्वरक स्थापना स्वतंत्र प्रमाण पबैत अछि की सिद्धान्त बचेबाक साधन बनैत अछि। 29.14 Gah कारणता आ आदत हम एक घटना बाद दोसर घटना बारम्बार देखैत छी, मुदा “आवश्यक सम्बन्ध” इन्द्रियसँ प्रत्यक्ष नहि देखैत। ह्यूम कारणताक विश्वासे नियमित सहघटना आ मनक Hada जोडत छथि। भविष्य अतीत-जकाँ होयत ई मान्यता प्रत्येक आगमनक आधार, मुदा ओकर गैर-चक्राकार प्रमाण कठिन अछि। एहि आलोचनासँ विज्ञान निरर्थक नहि होइत। विज्ञान नियंत्रित परीक्षण, गणितीय नमूना, वैकल्पिक व्याख्याक तुलना आ त्रुटि-संशोधनसँ साधारण आदतसँ अधिक विश्वसनीय बनैत अछि। तथापि निष्कर्ष संशोध्य रहैत अछि। ह्यूम निश्चितताक दम्भ घटबैत छथि, प्रमाणक अनुशासन नहि। 29.15 व्यक्तित्व आ स्मृति लॉक व्यक्तिक निरन्तरताकें चेतना आ स्मृतिसँ जोड़ैत छथि, जखनकि ह्यूम आत्मनिरीक्षणमे स्थिर आत्माक बदला अनुभूतिसभक प्रवाह देखैत छथि। प्रश्न ई जे स्मृति टूटला पर व्यक्ति बदलि जाइत अछि की नहि, आ गलत स्मृति उत्तरदायित्वकें कोना प्रभावित करैत अछि। शरीर, स्मृति, सामाजिक पहिचान आ नैतिक सम्बन्ध-सभ निरन्तरतामे भूमिका रखैत अछि। एकटा कसौटी सभ प्रसंग सुलझा नहि सकैत। न्यायिक उत्तरदायित्व, पारिवारिक सम्बन्ध आ आत्मानुभव अलग प्रश्‍न उठा सकैत अछि। सहअस्तित्वात्मक दृष्टि व्यक्तिकें न शाश्वत एकक मात्र मानेत, न क्षणिक प्रवाह मात्र। अध्याय-निष्कर्ष लॉक ज्ञानक उत्पत्ति आ सीमा, बर्कली पदार्थक अवधारणा, ह्यूम कारणता, आत्मा आ आगमनक औचित्यपर मूल प्रश्‍न उठबैत छथि। समानान्तर दर्शन विशेषतः PAH आगमन-संशयकें भारतीय व्याप्ति-विमर्शसँ संवादमे रखैत अछि--एऐतिहासिक एकरूपता बिना, समस्या-संरचनात्मक तुलना द्वारा। अध्याय-ग्रन्थसूची John Locke — An Essay Concerning Human Understanding; Two Treatises of Government.