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इमानुएल कान्ट आधुनिक दर्शनक एहन मोड़ छथि जतय बुद्धिवाद आ अनुभववादक पूर्ववर्ती विवाद नूतन रूप
पबैत अछि। हुनक प्रश्न अछि-_अनुभव सम्भव कोना अछि? ज्ञानक सीमा की? नैतिक कर्तव्यक आधार की?
सौन्दर्यात्मक निर्णय कोना सम्भव? मनुष्य स्वतंत्र कोना सोचल जा सकैत अछि?
30.1 “कोपरनिकीय” परिवर्तन
कान्ट प्रस्ताव करैत छथि जे ज्ञानमे मन केवल बाहरसँ आबयवला सामग्रीक निष्क्रिय पात्र नहि। अनुभूतिक
संरचना मे ज्ञाताक योगदान अछि। स्थान आ समय अनुभूतिक रूप, at Giga श्रेणी अनुभवकें व्यवस्थित
करेत अछि। एहि कारण हम वस्तुके जेना हमरा अनुभवमे प्रकट होइत अछि ताहि रूपमे जानैत छी; वस्तु अपने-
आपमे की अछि, ओकर ज्ञान सीमित अछि।
30.2 अनुभवपूर्व आ अनुभवोत्तर
कान्ट a priori आ a posteriori ज्ञानक भेदके नूतन गहराई दैत छथि। संगहि analytic आ
synthetic निर्णयक भेद पर चर्चा करैत synthetic a 7107 ज्ञानक सम्भावना पूछैत छथि। गणित
आ प्राकृतिक विज्ञानक सार्वभौमिकता समझेबाक हुनक परियोजना एहि WAS जुड़ल अछि।
30.3 phenomenon आ noumenon
प्रतीत जगत (phenomenal world) अनुभवक शर्तसभमे ज्ञात अछि। noumenon अथवा वस्तु-
अपने-आपमे अवधारणा ज्ञानक सीमा चिह्लित Hea अछि, सरल “दोसर अदृश्य जगत”क प्रत्यक्ष ज्ञान नहि।
एहि सूक्ष्मता बिना कान्टकें “हम वास्तविकता नहि जानि सकैत छी” कहि संक्षिप्त करब भ्रमपूर्ण होयत।
30.4 कारणता आ ह्यूमक चुनौती
GAS कारणता-संशय कान्टपर गहरा प्रभाव छोड़लक। कान्ट कारणताकें AGUAS बादमे बनल आदत मात्र
नहि, अनुभवकें वस्तुगत क्रममे बुझबाक आवश्यक बौद्धिक श्रेणी मानेत छथि। एहि प्रकार ओ वैज्ञानिक ज्ञानक
सार्वभौमिकता बचाबय चाहैत छथि, मुदा ज्ञानक सीमा सेहो स्पष्ट करैत छथि।
30.5 नैतिकता: स्वायत्तता आ कर्तव्य
कान्टक नैतिक दर्शनमे मनुष्य स्वयं विधि-निर्माणक्षम विवेकशील प्राणी अछि। नैतिकता बाहरी पुरस्कार, भय
अथवा इच्छा पर मात्र आधारित नहि। categorical imperative व्यक्ति के एहन नियमपर कर्म
करबाक मांग करैत अछि जे सार्वभौमिक विधि बनि सकय।
एक दोसर प्रसिद्ध रूप कहैत अछि--मानवताकें, अपन वा दोसर व्यक्तिमे, केवल साधन नहि बल्कि सदैव
साध्यक रूपमे व्यवहार करू। एहि विचारसँ मानवीय गरिमाक आधुनिक धारणा गहरा संवाद रखैत अछि।
30.6 सार्वभौमिकता आ समानता
कान्टक नैतिक सार्वभौमिकता शक्तिशाली अछि कारण ओ नैतिक विशेषाधिकारकें चुनौती दऽ सकैत अछि।
जँ नियम सभ विवेकशील व्यक्ति लेल समान, तँ जन्म, पद अथवा निजी लाभक आधारपर अलग नैतिक
नियम कठिन होइत अछि। समानान्तर दर्शन एहि सार्वभौमिक आग्रहकें गरिमा-आधारित नैतिकताक महत्वपूर्ण
संवाददाता मानेत अछि।
30.7 मुदा “सार्वभौम मनुष्य’ के?
इतिहासमे सार्वभौमिक भाषा अनेक बेर विशेष सामाजिक समूहक अनुभवकें सामान्य मानव अनुभव मानि
लेलक। स्त्री, उपनिवेशित समाज, जातिगत रूपसँ बहिष्कृत समुदाय, श्रमिक, दास अथवा नस्लीकृत
समुदायक अनुभव दार्शनिक “मनुष्य”क परिभाषासँ बाहर रहल। तें सार्वभौमिकता छोड़ब समाधान नहि;
सार्वभौमिकताकें अधिक वास्तविक समावेशनसँ भरब आवश्यक अछि।
30.8 कान्टक ऐतिहासिक सीमा
कान्टक लेखनमे नस्ल आ मानव विविधता सम्बन्धी किछु विचार आज गंभीर आलोचनाक विषय छथि।
दार्शनिक इतिहासमे ई तथ्य छिपायब उचित नहि। एक विचारकक महान नैतिक सिद्धान्त आ ओकर ऐतिहासिक
पूर्वग्रह एकहि व्यक्ति मे सहअस्तित्व रखि सकैत अछि। समानान्तर पद्धति एहि विरोधाभासकें अध्ययनक
विषय बनबैत अछि, न कि असुविधाजनक तथ्य हटबैत अछि।
30.9 स्वतंत्रता
प्रकृतिक जगत कारण-नियमक अधीन बुझाइत अछि; नैतिक जिम्मेवारी स्वतंत्रताक धारणा माँगैत अछि।
कान्ट एहि तनावरके phenomenon/noumenon भेदक माध्यमसँ सँँभालबाक प्रयास करैत छथि।
एहि समाधानपर व्यापक विवाद अछि, मुदा प्रश्न आजो जीवित: जँ हमर प्रत्येक कर्म कारण-शृंखलासँ
निर्धारित, तखन नैतिक जिम्मेवारी कोना?
30.10 सार्वजनिक विवेक आ प्रबोधन
कान्ट प्रबोधनकें व्यक्ति द्वारा अपन बुद्धिक सार्वजनिक उपयोगक साहससँँ जोड़ेत छथि। सत्ता द्वारा निर्देशित
अल्पवयस्कता सँ बाहर आबि स्वतन्त्र विवेकक उपयोग आधुनिक नागरिकता लेल महत्वपूर्ण आदर्श बनैत
अछि। मुदा सार्वजनिक विवेकक वास्तविक उपयोग लेल शिक्षा, अभिव्यक्ति-स्वतंत्रता आ सामाजिक समानता
चाही। भूख, जातीय दमन, लिंग-असमानता वा औपनिवेशिक अधीनता मे केवल “विवेकक उपयोग करू”
कहब अपर्याप्त अछि।
30.11 भारतीय दर्शनसँ तुलनात्मक संवाद
कान्टक ज्ञाता-सक्रियता, ज्ञानक सीमा आ अनुभवक शर्तक प्रश्न भारतीय दर्शनक अनेक परम्परासँ संवाद
खोलि सकैत अछि--न्यायक वस्तुगत ज्ञान, बौद जञप्ति-विमर्श, वेदान्तक ज्ञाता-ज्ेय प्रश्न आदि। मुदा प्रत्यक्ष
समतुल्यता बनायब उचित नहि। तुलना तखन फलदायी अछि जखन समस्या-संरचना स्पष्ट हो, शब्द-समानता
मात्र नहि।
पूर्वपक्षः कान्टक सार्वभौमिक नैतिकता अत्यधिक अमूर्त अछि?
आपत्ति अछि जे वास्तविक सामाजिक सम्बन्ध, भावना, इतिहास आ असमानता अमूर्त नियममे पर्याप्त रुपसँ
नहि समाहित होइत।
उत्तरपक्षः आलोचना उचित अछि, मुदा सार्वभौमिकता स्वयं त्याज्य नहि। बिना सार्वभौमिक गरिमा,
शक्तिशाली समूह अपन विशेष नियम बना सकैत अछि। आवश्यक अछि-सार्वभौमिक नेतिक कसौटी +
ऐतिहासिक असमानताक ठोस विश्लेषण।
30.12 संश्लेषणात्मक पूर्वानुभविक निर्णय
arch मूल प्रश्न अछि--एहन ज्ञान कोना सम्भव जे अनुभव बढ़बैत अछि, मुदा केवल विशिष्ट अनुभवक
सामान्यीकरण नहि? गणित आ प्राकृतिक विज्ञानक किछु आधारभूत निर्णय हुनका लेल संश्लेषणात्मक
पूर्वानुभविक उदाहरण छथि। 'संश्लेषणात्मक” विषयमे नूतन बात visa, “पूर्वानुभविक? ओकर आवश्यक
औचित्य केवल अनुभवसँ नहि लैत।
एहि वर्गीकरणक प्रत्येक उदाहरण विवादमुक्त नहि। आधुनिक गणित आ विज्ञानक विकास बाद प्रश्न पुनः
उठल। तथापि दार्शनिक महत्त्व ई जे ज्ञानकें केवल शब्दार्थक सत्य आ अनुभवजन्य तथ्यक दू भागमे समेटब
कठिन हो सकैत अछि। ज्ञान सम्भव होयबाक शर्त स्वयं अनुसन्धानक विषय बनेत अछि।
30.13 संवेदनक रूप: स्थान आ काल
कान्ट स्थान आ कालके वस्तुस्वतन्त्र पात्र नहि, मानवीय संवेदनक पूर्वरूप मानैत छथि। अनुभवमे जे किछु
भेटैत अछि, ओ स्थानिक वा कालिक व्यवस्थामे भेटैत अछि; तैँ हम अनुभवसँ बाहर स्थान-कालक वस्तुस्वरूप
पर सीधा दावा नहि कऽ सकैत छी।
एकरा आधुनिक सापेक्षता सिद्धान्तक पूर्वानुमान Hed गलत। कान्टक प्रश्न ज्ञानक अतिक्रमणीय शर्त सम्बन्धी
अछि; आधुनिक भौतिकीक प्रश्न मापन, गति आ गुरुत्वक अनुभवजन्य-गणितीय सिद्धान्त सम्बन्धी। संवाद
सम्भव अछि, ऐतिहासिक समानता नहि।
30.14 बुद्धिक कोटि आ अनुभव
संवेदन सामग्री दैत अछि, मुदा वस्तु रूपमे अनुभव लेल बुद्धिक एकता आ अवधारणात्मक कोटि आवश्यक
अछि। कारणता, द्रव्य आ एकता केवल बाहरसँ नकल कएल fle नहि; ओ अनुभवकें निर्णययोग्य बनबैत
अछि। एतय मन जगतक मनमाना निर्माता नहि, अनुभवक सक्रिय संयोजक अछि।
आपत्ति ई जे कान्ट निर्धारित कोटिसभक पूर्णता कोना सिद्ध करेत छथि। भिन्न भाषा वा संस्कृतिक अवधारणा
अनुभवक संगठन बदलैत अछि की नहि? समानान्तर दर्शन कान्टक सक्रिय ज्ञानकर्ता स्वीकारैत अछि, मुदा
सामाजिक-भाषिक विविधताकें अधिक स्पष्ट रूपसँ sited अछि।
30.15 स्वायत्तता आ नैतिक नियम
नैतिक स्वायत्तताक अर्थ मन जे चाहय से करब नहि; एहन नियम अपन मानब जे सभ तर्कशील व्यक्तिपर
समान रूपसँ लागू हो सकय। व्यक्ति साधन मात्र नहि, अपने में लक्ष्य अछि। एहि कारण छल, जबरदस्ती आ
शोषण व्यक्तिक तर्कशील दर्जाक अपमान Het अछि।
मुदा अमूर्त तर्कशीलता शरीर, निर्भरता, देखभाल आ सामाजिक असमानता पर्याप्त रुपसँ Vasa अछि की
नहि--ई आलोचना महत्त्वपूर्ण अछि। गरिमा-आधारित नेतिकता स्वायत्तताकेँ पीड़ा, पारस्परिक निर्भरता,
समान दर्जा आ न्यायपूर्ण अवसरसँ जोड़ेत अछि।
30.16 सौन्दर्य, प्रयोजन आ साझा निर्णय
सौन्दर्यनिर्णय निजी आनन्दसँ आरम्भ होइतहुँ साझा स्वीकृतिक दावा करैत अछि। 'ई सुन्दर अछि” Hed केवल
“हमरा पसन्द अछि” नहि, यद्यपि अवधारणात्मक प्रमाणसँ बाध्य नहि कएल जा सकैत। कान्ट एहि विचित्र
सार्वभौमिक दावीक आधार कल्पना आ बुद्धिक मुक्त सामंजस्य मे खोजैत छथि।
सौन्दर्यरुचि सामाजिक प्रशिक्षण आ सत्ता सँ मुक्त नहि। कोन कला प्रतिष्ठित, ककर भाषा साहित्य मानल
जाए, आ ककर शिल्प “लोक” कहि नीचा राखल जाए--ई प्रश्न कान्टक अमूर्त संरचनाकें ऐतिहासिक परीक्षा
दैत अछि। साझा निर्णय खुलल आलोचना माँगैत अछि, प्रभुत्वपूर्ण मानक नहि।
अध्याय-निष्कर्ष
कान्टज्ञानमे ज्ञाताक सक्रिय भूमिका, अनुभवक सीमा, कारणताक संरचना, नेतिक स्वायत्तता आ सार्वभौमिक
गरिमाक शक्तिशाली रूप प्रस्तुत करैत छथि। समानान्तर दर्शन हुनक सार्वभौमिकताके स्वीकारैतहुँ ओकर
ऐतिहासिक सीमासँ प्रश्न करैत अछि। सार्वभौमिकता तखन न्यायपूर्ण बनत जखन “मनुष्य” शब्दमे वास्तवमे
सभ मनुष्य समाहित होथि।