हेगेलक दर्शन आधुनिक यूरोपीय चिन्तनमे इतिहास, चेतना, समाज आ तर्ककें एकहि गतिशील प्रक्रियामे बुझबाक महत्त्वाकांक्षी प्रयास अछि। हुनक दर्शनक मूल शक्ति एहि विचारमे अछि जे वास्तविकताकें केवल स्थिर वस्तुसभक संग्रह नहि मानल जाए। मनुष्य, संस्था, विचार, नैतिकता आ इतिहास--सभ परिवर्तनशील सम्बन्धसभक भीतर बनैत अछि। विरोध एहि परिवर्तनक बाधा मात्र नहि; अनेक बेर परिवर्तनक माध्यम सेहो अछि। मुदा एहि बिन्दुसँ तुरन्त ई निष्कर्ष निकालब कि इतिहासक एक निश्चित अन्त, एक अनिवार्य दिशा अथवा एक सार्वभौम मंजिल पहिने सँ तय अछि--एहि ग्रन्थक समानान्तर दृष्टि एहन दाबीपर सावधानी बरतैत अछि। 31.1 स्थिर वस्तुसँ प्रक्रिया दिस दैनिक बुद्धि वस्तुसभकें पृथक, तैयार आ स्थिर मानबाक प्रवृत्ति रखैत अछि। मुदा सामाजिक संस्था, नैतिक मूल्य, राजनीतिक व्यवस्था अथवा आत्मचेतना वास्तवमे स्थिर वस्तु नहि। ई इतिहासक भीतर बदलैत सम्बन्धसभक परिणाम अछि। हेगेलक चिन्तन एहि गतिशीलतापर बल दैत अछि। कोनो अवधारणा अपन अर्थ केवल अपन भीतर नहि, अपन विपरीत, सीमा आ सम्बन्धसँ सेहो पबैत अछि। स्वतंत्रता ककरा कहल जाए-- ई प्रश्‍न दासता, बाध्यता, कानून आ सामाजिक मान्यतासँ काटि कऽ नहि बुझल जा सकैत अछि। 31.2 द्रन्द्क अर्थ हेगेलक नामसँ थीसिस-एण्टीथीसिस-सिन्थेसिस” सूत्र लोकप्रिय अछि, मुदा हुनक वास्तविक पद्धति एहि विद्यालयी त्रिपदीसँ अधिक जटिल अछि। महत्त्वपूर्ण बात ई जे अवधारणा अपन भीतर एहन तनाव उत्पन्न करेत अछि जे ओकर सीमाकें उजागर करेत अछि। एक रूपक अपूर्णता दोसर रूपक आवश्यकता जन्मबैत अछि। ई प्रक्रिया केवल बहसक तकनीक नहि; चेतना, समाज आ इतिहासक विकास बुझबाक पद्धति बनेत अछि। 31.3 स्वामी-दास सम्बन्ध Phenomenology of Spirit मे स्वामी-दास प्रसंग आधुनिक सामाजिक दर्शनपर गहरा प्रभाव छोड़लक। आत्मचेतना केवल अकेले “हम” द्वारा पूर्ण नहि; दोसर आत्मचेतनाक मान्यता आवश्यक अछि। प्रभुत्व चाहयवला व्यक्ति विरोधीकें केवल वस्तु बनाबय चाहैत अछि, मुदा ओहि व्यक्ति द्वारा मान्यता तखने अर्थपूर्ण हो सकैत अछि जखन ओ स्वयं स्वतंत्र आत्मचेतना हो। एहि विरोधाभाससँ प्रभुत्वक सीमा उजागर होइत अछि। समानान्तर दर्शन एहि frac जाति, वर्ग, लिंग आ औपनिवेशिक सम्बन्धसभक विश्लेषणमे उपयोगी संकेत मानैत अछि--अपमानित व्यक्तिक मान्यता छीनि लेब प्रभुत्वशालीक आत्मबोधकें सेहो विकृत करैत अछि। 31.4 स्वतंत्रता आ संस्था हेगेलक लेल स्वतंत्रता केवल “हम जे चाही से करी” नहि। वास्तविक स्वतंत्रता कानून, परिवार, नागरिक समाज आ राज्य-जकाँ संस्थासभक माध्यमसँ सामाजिक रूप पबैत अछि। एहि विचारक शक्ति ई अछि जे स्वतंत्रताके सामाजिक बनबैत अछि। मुदा खतरा सेहो अछि--जँ विद्यमान संस्थाकें तर्कक पूर्ण अभिव्यक्ति मानि लेल जाए तँ संस्था-आलोचना कमजोर भऽ सकैत अछि। समानान्तर दर्शन संस्थाक आवश्यकता स्वीकारैत अछि, मुदा कोनो ऐतिहासिक tench अंतिम विवेकक रूप नहि मानेत अछि। 31.5 इतिहासक दिशा हेगेल इतिहासमे स्वतंत्रताक चेतनाक विस्तार देखबैत छथि। एहि विचारक प्रेरक पक्ष ई जे इतिहास अर्थहीन घटनाक ढेर नहि; संस्थागत परिवर्तन नैतिक अर्थ रखि सकैत अछि। मुदा इतिहासकें एकरेखीय प्रगतिक कथामे बदललासँ समस्या उत्पन्न होइत अछि। जे समाज यूरोपीय आधुनिकताक मार्गसँ नहि गुजरल, ओकरा “UTS? घोषित करब औपनिवेशिक श्रेष्ठताबोधकें वैचारिक आधार दऽ सकैत अछि। समानान्तर दर्शन कहैत अछि-- इतिहासमे दिशा खोजू, मुदा दिशा प्रमाणसँँ; प्रगति कहू, मुदा ककर प्रगति, ककर लागत, ककर विस्थापन-- ई प्रश्न सेहो पूछू। 31.6 भारतीय आ मिथिला-समानान्तर संवाद भारतीय दर्शनमे विरोध, परिवर्तन आ तर्कक अनेक रुप अछि, मुदा ओकरा Miele gar पूर्वरूप Hed अनैतिहासिक होयत। न्यायीय पूर्वपक्ष-उत्तरपक्ष, बौद्ध मध्यमकक प्रतिपक्ष-विघटन, सांख्यक गुणगत परिवर्तन, वेदान्तीय भेद-अभेद विवाद-ई सभ अलग ऐतिहासिक पद्धति अछि। उपयोगी तुलना एतय एतेक अछि जे सत्य-अन्वेषण विरोधके हटबैत नहि, ओकरा विचारक साधन बना सकैत अछि। मिथिलाक शास्त्रार्थ- संस्कार सेहो विरोधी पक्षकें सुनबाक अनुशासन विकसित करैत अछि। 31.7 पूर्वपक्षः oq इतिहासक नियम अछि एक मत कहि सकैत अछि जे प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था अपन विरोध उत्पन्न करैत अछि, आ ओहि विरोधसँ अगिला उच्चतर अवस्था अनिवार्य Sua निकलैत अछि। एहि दृष्टिसँ इतिहासक दिशा तर्कसंगत आ पूर्वानुमेय बुझाइत अछि। उत्तरपक्षः विरोध वास्तविक, परिणाम खुला समानान्तर दर्शन विरोधक वास्तविकता स्वीकारैत अछि, मुदा परिणामकें पूर्वनिर्धारित नहि मानैत अछि। एकहि विरोधसँ सुधार, दमन, विघटन, समझौता अथवा हिंसा--अनेक परिणाम सम्भव। मानवीय कर्म, संस्था, संयोग, तकनीक, संसाधन आ नैतिक चुनाव इतिहासक दिशा प्रभावित करेत अछि। 31.8 gam भीतर निषेध आ संरक्षण हेगेलीय gg 'थीसिस-एण्टीथीसिस-सिन्थेसिस’क स्थिर तीन चरणमे समेटब प्रायः भ्रामक अछि। महत्त्वपूर्ण बात ई जे कोनो अवधारणा अपन सीमा भीतर विरोध उत्पन्न करेत अछि, आ ओकर अतिक्रमण पुरानकें केवल नष्ट नहि करैत--किछु पक्ष नकारैत, किछु बचबैत, आ नूतन सम्बन्धमे बदलैत अछि। जर्मन पद ‹आउफहेबुंग?क एहि बहुअर्थकता कारण एक-शब्दीय अनुवाद कठिन अछि। Fah उपयोग तखन प्रमाणीय होयत जखन विशिष्ट अवधारणात्मक संक्रमण देखाओल जाए। केवल दू विरोधी घटना देखिकऽ {न्द्रः कहब व्याख्या नहि। कोन आन्तरिक तनाव, किएक पुरान रूप अपर्याप्त, आ नूतन रूप कोन पक्ष बचबैत अछि--ई तीन प्रश्न स्पष्ट होयत। 31.9 स्वामी-दास सम्बन्ध आ मान्यता आत्मचेतना स्वयंकें केवल एकान्त निरीक्षणसँ पूर्ण नहि पबैत; ओकरा दोसर आत्मचेतनाक मान्यता चाही। प्रभुत्वक संघर्षमे स्वामी दासक मान्यता चाहैत अछि, मुदा जबरदस्ती प्राप्त मान्यता स्वतंत्र ्रोतक नहि रहैत। दास श्रमक ALAS वस्तु-जगत बदलैत आ अपन शक्ति सम्बन्धी बोध पबैत अछि। एहि रुपककें प्रत्येक ऐतिहासिक दासता वा वर्ग-संघर्षक पूर्ण व्याख्या मानब अनुचित। तथापि मान्यताक असमान सम्बन्ध बुझबामे उपयोगी अछि। जे सत्ता अधीन व्यक्तिक स्वतंत्र निर्णय नष्ट करेत अछि, ओ ओकर प्रशंसा पाबितो वास्तविक मान्यता नहि पबैत। सम्मान पारस्परिक स्वतंत्रतापर निर्भर अछि। 31.10 इतिहासमे स्वतंत्रताक विस्तार हेगेल इतिहासकें स्वतंत्रताक चेतनाक विकास रूपमे पढ़ैत छथि। एहि दृष्टिसँ संस्था केवल बाहरी बन्धन नहि; परिवार, नागरिक समाज आ राज्य स्वतंत्रताकें ठोस रूप दे सकैत अछि। मुदा इतिहासक एकरेखीय दिशा आ यूरोपकें परिणति मानबाक प्रवृत्ति गंभीर आलोचनाक विषय अछि। उपनिवेश, जाति, स्त्री-अधीनता आ क्षेत्रीय अनुभव देखबैत अछि जे स्वतंत्रताक घोषणा संग अस्वतंत्रता सहअस्तित्वमे रहि सकैत अछि। समानान्तर इतिहास-दृष्टि प्रगतिक दाबीकें लाभान्वित आ बहिष्कृत दुनूक प्रमाणपर जाँचैत अछि। इतिहासक अर्थ पूर्वनिर्धारित अन्त नहि, विवादित परिवर्तनक आलोचनात्मक पुनर्निर्माण अछि। 31.11 अमूर्त अधिकार आ ठोस संस्था केवल “हम स्वतंत्र छी? कहब पर्याप्त नहि, जँ सम्पत्ति, शिक्षा, कानून वा सामाजिक मान्यता स्वतंत्र क्रियाक साधन नहि दे। हेगेल अमूर्त अधिकारसँ नैतिक जीवन धरि बढ़त संस्था भीतर स्वतंत्रताक ठोस रूप खोजैत छथि। व्यक्ति आ समुदायकें पूर्ण विरोधी मानब एहि दृष्टिमे गलत अछि। मुदा संस्था स्वतंत्रताक साधन होइतहुँ प्रभुत्वक साधन बनि सकैत अछि। राज्यें नैतिक विचारक मूर्ति मानि आलोचनासँ ऊपर राखल नहि जा सकैत। वैध संस्था अपील, अधिकार, प्रतिनिधित्व आ सार्वजनिक समीक्षा स्वीकारत; केवल ऐतिहासिक अस्तित्व नैतिक औचित्य सिद्ध नहि करैत। 31.12 प्रणाली आ अपूर्णता हेगेलक दर्शन व्यापक प्रणाली बनबैत अछि-_तर्क, प्रकृति, आत्मा, इतिहास, कला, धर्म आ दर्शनकें परस्पर सम्बन्धित करैत। प्रणालीक लाभ अछि जे अलग प्रशनक छिपल सम्बन्ध देखाइत अछि; खतरा ई जे जे अनुभव प्रणालीमे नहि समाए, ओकरा गौण वा अपरिपक्व कहल जाए। समानान्तर दर्शन प्रणालीक आकांक्षा ग्रहण करैत, अन्तिम पूर्णताक दावा नहि। कोनो ढाँचा अपन अपवाद, मौन आ स्रोत-सीमा लिखत। जे सिद्धान्त प्रतिवादकें 'इतिहासक आवश्यक चरण? कहि निष्प्रभावी करैत अछि, ओ परीक्षणसँ बचेत अछि। आत्मसमीक्षा बिना समग्रता बौद्धिक सत्ता बनि सकैत अछि। अध्याय-निष्कर्ष हेगेलसँ समानान्तर दर्शन तीन शिक्षा ग्रहण Hed अछि--वास्तविकताकें प्रक्रिया मानू, विरोधके विचारक शत्रु नहि बल्कि परीक्षणक साधन मानू, आ स्वतंत्रताके सामाजिक संस्थासँ जोड़। मुदा ओ इतिहासक पूर्वनिर्धारित अन्त स्वीकार नहि करैत अछि। eg उपयोगी अछि; नियतिवाद आवश्यक नहि।