प्रघटनावाद अनुभवकें ओहि रूपमे बुझबाक प्रयास करेत अछि जाहि रूपमे ओ चेतनामे प्रकट होइत अछि। अस्तित्ववाद एहि अनुभवक भीतर स्वतंत्रता, चुनाव, मृत्यु, चिन्ता, निरर्थकता, जिम्मेवारी आ प्रामाणिक जीवनक प्रश्न तीक्ष्ण करैत अछि। दुनू परम्पराकेँ एक मानब उचित नहि, मुदा बीसम शताब्दीक अनेक विचारकमे एहि दुनूक गहरा संवाद अछि। 34.1 अनुभव दिस फेरब हुसर्लक प्रसिद्ध आग्रह 'वस्तुसभ दिस फेरु'क अर्थ सामान्य अनुभवे बिना परीक्षण स्वीकारब नहि; बल्कि सिद्धान्तक पूर्वधारणाकें कोष्ठकमे राखि अनुभव कोना प्रकट होइत अछि से वर्णन करब। चेतना सदैव किछु दिस उन्मुख होइत अछि--एहि गुणकें उद्देश्यता कहल जाइत अछि। देखब, स्मरण, आशा, भय--सभमे कोनो वस्तु, घटना वा सम्भावना दिस चेतना उन्मुख अछि। 34.2 जीवन-जगत वैज्ञानिक अमूर्तन महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा मानव अनुभव केवल वैज्ञानिक माप नहि। हम पहिने संसारमे जीबैत छी--रास्ता चलैत छी, सम्बन्ध बनबैत छी, वस्तु उपयोग करेत छी, भाषा बोलैत छी-तकर बाद वैज्ञानिक वर्णन करैत छी। जीवन-जगतक विचार एहि पूर्ववैज्ञानिक अनुभवक महत्त्व देखबैत अछि। समानान्तर दर्शन एतय लोकज्ञान, भाषा आ दैनिक अनुभवक दार्शनिक महत्त्व देखैत अछि, बिना वैज्ञानिक कसौटी छोड़ने। 34.3 हैडेगर: संसारमे-होयब मानव अस्तित्वक अलग मस्तिष्क-जकाँ बुझब अपर्याप्त अछि। हम पहिने सँ संसार, उपकरण, सम्बन्ध, इतिहास आ सम्भावनाक भीतर छी। मृत्यु-जागरूकता आ समयशीलता व्यक्तिक अस्तित्वक अर्थ बदलैत अछि। मुदा हैडेगरक दार्शनिक महत्त्व स्वीकार करैत समय हुनक राजनीतिक इतिहासक आलोचनात्मक चर्चा दबायल नहि जा सकैत अछि। विचार आ जीवनक इतिहास अलग प्रश्‍न होइतहुँ नैतिक समीक्षा आवश्यक अछि। 34.4 सार्त्र: स्वतंत्रता आ जिम्मेवारी सार्त्रक प्रसिद्ध विचार-मनुष्य पहिने अस्तित्वमे अबैत अछि, फेर अपन चुनावसँ अर्थ बनबैत अछि पूर्वनिर्धारित मानव-सारक विरुद्ध स्वतंत्रताक घोषणाक रूपमे Use जाइत अछि। बहाना, आत्मछल आ “बदनीयती? व्यक्ति अपन स्वतंत्रतासँ बचबाक प्रयास हो सकैत अछि। मुदा समानान्तर दर्शन प्रश्‍न करेत अछि--कतेक स्वतंत्रता? भूख, जाति, पितृसत्ता, गरीबी, युद्ध, विकलांगता, कारावास आ राज्यीय हिंसा वास्तविक सम्भावना सीमित करैत अछि। 34.5 देह आ अनुभव प्रघटनावादी परम्पराक बादक विकास, विशेषतः मर्लो-पोन्ती, tech केवल वस्तु नहि बल्कि संसार अनुभव करबाक माध्यम मानैत अछि। हम 'देह रखैत” मात्र नहि; हम देहधारी अस्तित्व छी। बीमारी, विकलांगता, लिंग, श्रम आ स्थान अनुभवक संरचना बदलैत अछि। समानान्तर दर्शनक गरिमा-आधारित नैतिकता लेल देहधारित अनुभव महत्त्वपूर्ण अछि। 34.6 दोसर व्यक्ति अन्य व्यक्ति केवल हमर अनुभवक वस्तु नहि। ओकर अपन दृष्टि, इच्छा आ स्वतंत्रता अछि। प्रेम, संघर्ष, लज्जा, मान्यता आ हिंसा--सभ अन्य आत्मचेतनाक उपस्थितिसँ बनैत अछि। सामाजिक न्यायक प्रश्‍न एतय अनुभववादी गहराई पबैत अछि: अपमान केवल संसाधनक कमी नहि, व्यक्ति कोना सार्वजनिक संसारमे देखल आ मानल जाइत अछि ताहिसँ जुड़ल अछि। 34.7 अस्तित्ववाद आ सामाजिक न्याय अस्तित्ववादक आलोचना ई रहल जे ओ कखनो अत्यधिक व्यक्तिगत होइत अछि। समानान्तर दर्शन एहि सीमा सुधारैत अछि। चुनाव करु?क उपदेश तखन खोखला अछि जखन व्यक्ति लेल वास्तविक विकल्प बंद अछि। स्वतंत्रता लेल केवल कानूनी निषेध हटेनाइ पर्याप्त नहि; शिक्षा, भोजन, स्वास्थ्य, सुरक्षा, सामाजिक सम्मान आ राजनीतिक आवाजक न्यूनतम परिस्थिति सेहो चाही। 34.8 मिथिला-समानान्तर अनुभव क्षेत्रीय भाषा, प्रवासन, बाढ़, कृषि, स्त्रीक घरेलू श्रम, जातिगत व्यवहार, उत्सव, पञ्जी, लोकस्मृति-ई सभ “अनुभव’क संसार बनबैत अछि। एहि अनुभवकें दर्शनमे स्थान देब लोकजीवनकें रोमानी बनायब नहि; ओकर संरचना, पीड़ा, अर्थ आ सत्ता सम्बन्धक सूक्ष्म वर्णन करब अछि। 34.9 आशयिताः चेतना सदैव किछुक चेतना प्रथटनावादक मूल सूत्र अनुसार चेतना खाली पात्र नहि; देखब, स्मरण, चाहब, डरब वा कल्पना करब सदैव किछु दिस उन्मुख अछि। वस्तु चेतनामे एकहि बेर पूर्ण नहि भेटैत; दृष्टिकोण, स्मृति आ सम्भावित अगिला अनुभवसँ ओकर अर्थ Tete अछि। आशयिता बाह्य वस्तुक अस्तित्व नकारब आवश्यक AS प्रश्‍न पहिने ई जे वस्तु अनुभवमे कोना प्रकट होइत अछि। समानान्तर यथार्थवाद अनुभवक संरचना वर्णित करेत, संगहि मानैत अछि जे वस्तु हमर अपेक्षाक प्रतिरोध करैत आ पारस्परिक परीक्षण सम्भव बनबैत अछि। 34.10 कोष्ठकीकरण आ वर्णन प्रघटनात्मक कोष्डकीकरण प्राकृतिक विश्वास स्थायी रूपसँ नकारब नहि; किछु समय लेल “वस्तु वास्तवमे अछि की नहि? प्रश्‍न रोकि, ओ अनुभवमे कोना देल जाइत अछि से देखब अछि। एहि विरामसँ परिचित वस्तुक छिपल संरचना-_ुष्टि, पृष्ठभूमि, अपेक्षा, शरीर सामने अबैत अछि। पूर्ण पूर्वधारणाहीन वर्णन सम्भव अछि की नहि, ई विवादित। भाषा आ चयन पहिनेसँ अर्थ दैत अछि। तें कोष्कीकरण पूर्ण निष्पक्षताक दावा नहि, आत्म-जागरुक अनुशासन मानल जाए। शोधकर्ता अपन दृष्टि लिखत आ वैकल्पिक वर्णनसँ तुलना करत। 34.11 हाइडेगर: संसारमे होयब मनुष्य पहिने पृथक मन नहि जे बादमे बाह्य जगतसँ सम्बन्ध जोइय। ओ आरम्भसँ काम, भाषा, उपकरण, दोसर व्यक्ति आ सम्भावना सँ बनल संसारमे स्थित अछि। हथौड़ी सामान्यतः निरीक्षणक वस्तु नहि, कामक साधन रूपमे बुझाइत अछि; टूटला पर ओकर वस्तुगत गुण स्पष्ट होइत अछि। एहि विश्लेषणसँ व्यवहारक प्राथमिकता देखाइत अछि, मुदा प्राकृतिक विज्ञानक वस्तुनिष्ठ अध्ययन नष्ट नहि होइत। उपकरणगत संसार आ वैज्ञानिक वर्णन भिन्न उद्देश्यक स्तर छथि। कोनो एकके सम्पूर्ण वास्तविकता मानब अधूरापन उत्पन्न करत। 34.12 सार्त्र: स्वतंत्रता आ दुर्निष्ठा सार्त्र मनुष्यकेँ पूर्वनिर्धारित सार बिना अपन चयनसँ बनेत प्राणी मानेत छथि। परिस्थिति सीमा दैत अछि, मुदा व्यक्ति अपन स्थितिक अर्थ आ प्रतिक्रिया लेल उत्तरदायी रहैत अछि। दुर्निष्ठा तखन होइत अछि जखन व्यक्ति स्वयंके वस्तु मात्र वा पूर्णतः सीमाहीन स्वतंत्रता मानि जिम्मेदारीसँ बचैत अछि। चरम गरीबी, हिंसा वा सामाजिक बन्धनमे तँ ay कहब पीड़ितक दोषारोपण बनि सकैत अछि। स्वतंत्रता सदैव स्थितिगत अछि। समानान्तर दर्शन व्यक्तिक चयन स्वीकारैत, विकल्पक वास्तविक उपलब्धता, जोखिम आ संस्थागत बाधा सेहो मापैत अछि। 34.13 देह, लिंग आ दोसर देह केवल चेतनाक बाहरी वस्तु नहि; हम संसारके देहक माध्यमसँ जीबैत छी। देहक क्षमता, पीड़ा, दृष्टि आ सामाजिक अर्थ अनुभवक क्षेत्र बनबैत अछि। लिंगगत देहपर समाजक अपेक्षा, निगाह आ भूमिका आरोपित भेला सँ “दोसर” बनबाक अनुभव उत्पन्न हो सकैत अछि। जीववैज्ञानिक तथ्य आ सामाजिक अर्थ अलग HS फेर सम्बन्धित करब आवश्यक अछि। शरीरक वास्तविकता नकारब उचित नहि, मुदा शरीरसँ स्थिर सामाजिक भाग्य निकालब सेहो गलत। प्रघटनात्मक वर्णन व्यक्तिगत अनुभव दैत अछि; व्यापक दाबी लेल अनेक अनुभव आ संस्थागत प्रमाण चाही। अध्याय-निष्कर्ष प्रथटनावाद अनुभवक बनावट बुझबैत अछि; अस्तित्ववाद स्वतंत्रता आ जिम्मेवारी तीक्ष्ण करेत अछि। समानान्तर दर्शन दुनूक शक्ति ग्रहण करैत अछि, मुदा स्वतंत्रताकें सामाजिक परिस्थिति सँ काटि नहि देखैत अछि। व्यक्ति चुनाव करैत अछि, मुदा चुनावक मैदान इतिहास आ सत्ता द्वारा असमान SUS बनाओल जाइत अछि। अध्याय-ग्रन्थसूचौ Edmund Husserl — Ideas Pertaining to a Pure Phenomenology. Martin Heidegger — Being and Time. Jean-Paul Sartre — Being and Nothingness. Jean-Paul Sartre — Existentialism Is a Humanism. Maurice Merleau-Ponty — Phenomenology of Perception. Simone de Beauvoir — The Ethics of Ambiguity.