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विश्लेषणात्मक दर्शन एकटा एकरूप सिद्धान्त नहि, बल्कि बीसम आ एकैसम शताब्दीमे भाषा, तर्क, अर्थ,
ज्ञान, विज्ञान, मन आ अवधारणाक सूक्ष्म विश्लेषणपर बल देनिहार अनेक धाराक व्यापक नाम अछि। फ्रेगे,
रसेल, मूर, विट्गेन्स्टाइन आ बादक अनेक विचारक एहि परम्परामे भिन्न-भिन्न दिशा विकसित कएलनि।
समानान्तर दर्शन लेल एकर विशेष महत्त्व एहि कारण अछि जे नव्य-न्यायक भाषिक-तार्किक सूक्ष्मतासँ
समस्या-स्तरीय संवाद सम्भव अछि, मुदा ऐतिहासिक समानता घोषित करब अनुचित।
35.1 भाषा आ तर्कक नूतन मोड़
फ्रेगे आधुनिक तर्कमे कथनक संरचना, फलन, परिमाणक आ अर्थ-सन्दर्भक भेद विकसित कएलनि। रसेल
वर्णनक विश्लेषण द्वारा देखेलनि जे व्याकरणिक रूप आतार्किक रूप अलग भऽ सकैत अछि। 'फ्रांसक वर्तमान
राजा गंजा अछि” जकाँ वाक्य देखबैत अछि जे साधारण व्याकरण कखनो अस्तित्व सम्बन्धी छिपल दाबी
राखैत अछि। दर्शनक अनेक भ्रम भाषिक रूपक गलत पठनसँ उत्पन्न भऽ सकैत अछि।
35.2 प्रारम्भिक विट्गेन्स्टाइन
Tractatus मे भाषा आ जगतक सम्बन्ध चित्र-सिद्धान्तक माध्यमसँ बुझबाक प्रयास अछि। सार्थक कथन
तथ्यक सम्भावित अवस्था दर्शबैत अछि। तर्क भाषा आ जगतक संरचना स्पष्ट करैत अछि। मुदा नैतिकता,
सौन्दर्य आ जीवनक अर्थ एहन क्षेत्र हो सकैत अछि जे तथ्यात्मक कथनक समान रूपमे व्यक्त नहि हो। एहि
सीमा-विमर्शक प्रभाव गहरा रहल।
35.3 बादक विट्गेन्स्टाइन
Philosophical Investigations मे दृष्टि बदलैत अछि। शब्दक अर्थ अनेक बेर ओकर उपयोगमे अछि।
भाषा एकहि कठोर संरचना नहि; भाषा-खेलसभक बहुलता अछि। आदेश, प्रश्न, प्रार्थना, मजाक, गणना,
कविता, विधिक घोषणा--सभक नियम अलग। दर्शनक काम कखनो सिद्धान्त बनाबय सँ अधिक भाषिक
गाँठ खोलब हो सकैत अछि।
35.4 अवधारणात्मक स्पष्टता
विश्लेषणात्मक पद्धति Ysa अछि--“ज्ञान’, “कारण”, “स्वतंत्रता”, “व्यक्ति’, सत्य’, 'कर्तव्य’ जकाँ शब्दक
आवश्यक आ पर्याप्त शर्त की? यद्यपि बादक दर्शन कठोर परिभाषाक सीमा देखेलक, स्पष्ट भेदक मूल्य बनल
रहल। समानान्तर दर्शन एहि अनुशासनकें अपनेत अछि: अस्पष्ट शब्द पर आधारित सामाजिक बहस शीघ्र
भ्रमित होइत अछि।
35.5 तर्क आ नैतिकता
विश्लेषणात्मक दर्शन केवल भाषा-क्रीड़ा नहि। आधुनिक नैतिकता, राजनीतिक दर्शन, मन-दर्शन, विज्ञान-
दर्शन आ ज्ञानमीमांसाक बहुत भाग एहि परम्पराक भीतर विकसित भेल। रॉल्सक न्याय सिद्धान्त, समकालीन
स्वतंत्र इच्छा-विमर्श, मन-मस्तिष्क सम्बन्ध, व्यक्तिगत पहचान, कृत्रिम बुद्धि-सभमे विश्लेषणात्मक स्पष्टता
महत्त्वपूर्ण अछि।
35.6 नव्य-न्यायसँ संवाद
नव्य-न्याय सम्बन्ध, अवच्छेद, ज्ञान, अभाव, व्याप्ति आ भाषिक संरचनाक वर्णन लेल अत्यन्त YAH तकनीकी
भाषा विकसित करैत अछि। विश्लेषणात्मक दर्शन सेहो तार्किक रूप, सन्दर्भ, गुण, सम्बन्ध आ ज्ञानक शर्त
सूक्ष्म करेत अछि। एहि समानतासँ तुलनात्मक संवाद सम्भव अछि। मुदा “गङ्गेश फ्रेगे छलाह” अथवा “नव्य-
न्याय आधुनिक symbolic logic छल? Hea ऐतिहासिक भूल होयत। प्रशन, प्रयोजन, संकेत-पद्धति आ
दार्शनिक पृष्ठभूमि अलग अछि।
35.7 सूक्ष्मताक खतरा
तकनीकी स्पष्टता उपयोगी अछि, मुदा भाषा एतेक विशेषज्ञीय भऽ जाए जे व्यापक बौद्धिक समुदाय प्रवेशे नहि
करि सकय, तेँ दर्शन सामाजिक जीवनसँ कटि सकैत अछि। नव्य-न्याय आ आधुनिक विश्लेषणात्मक दर्शन
दुनू एहि आलोचनासँ परिचित अछि। समानान्तर दर्शन दूहरा लेखन-अनुशासन प्रस्तावित करैत अछि
तकनीकी स्तरपर आवश्यक सूक्ष्मता, आ सामान्य पाठक लेल स्पष्ट व्याख्या।
35.8 “समस्या विलीन’ बनाम समस्या हल”
किछु दार्शनिक समस्या भाषिक भ्रम हो सकैत अछि; सही विश्लेषणसँ समस्या विलीन भऽ जाए। मुदा सभ
समस्या एहन नहि। गरीबी, जातिगत अपमान, धार्मिक हिंसा, जलवायु संकट केवल शब्दक भ्रम नहि।
विश्लेषणात्मक स्पष्टता समस्या बुझबैत अछि, सामाजिक क्रिया आवश्यक रहैत अछि।
35.9 पूर्वपक्षः स्पष्टता ही दर्शनक सर्वोच्च गुण अछि
जँ अस्पष्टता WA स्रोत अछि तँ दर्शनक काम केवल स्पष्ट परिभाषा आ वैध तर्क रहि जाए?
उत्तरपक्षः स्पष्टता आवश्यक, पर्याप्त नहि
स्पष्ट अन्याय सेहो अन्याय हो सकैत अछि। कोनो दमनकारी नियम तार्किक रुपसँ पूर्ण स्पष्ट भऽ सकैत अछि।
तँ atch स्पष्टताक संग सत्य, प्रमाण, इतिहास, नैतिकता आ सत्ता-समीक्षा जोड़य पड़त।
35.10 तर्कीय रूप आ साधारण भाषा
विश्लेषणात्मक दर्शनक एक धारा साधारण वाक्यक पाछाँ तर्कीय रूप खोजैत अछि। व्याकरणिक सतह कखनो
अस्तित्व वा सम्बन्धक विषयमे भ्रम उत्पन्न करैत अछि। दोसर धारा साधारण भाषाक उपयोग, प्रसंग आ
भाषिक व्यवहारकें दार्शनिक स्पष्टताक आधार मानैत अछि।
a दृष्टि विरोधी मात्र नहि। किछु समस्यामे औपचारिक रूप अस्पष्टता हटबैत, किछुमे प्रसंग काटलासँ अर्थ नष्ट
होइत। उपकरण समस्या अनुसार चुनल जाए। एकहि विधिक सार्वभौम प्रभुत्व विश्लेषणात्मक दर्शनक अपन
बहुलता नकारत।
35.11 रसेलक वर्णन-सिद्धान्त
“वर्तमान मिथिलाक राजा” जकॉँ निश्चित वर्णन जँ कोनो वास्तविक व्यक्ति सूचित नहि करय, cf वाक्य अर्थहीन
होयत की मिथ्या? वर्णन-सिद्धान्त वाक्यकें अस्तित्व, एकत्व आ गुणक संयुक्त दाबी रूपमे विश्लेषित करेत
अछि। एहि सँ काल्पनिक नाम वा अनुपस्थित वस्तु मानबाक दबाव घटैत अछि।
औपचारिक विश्लेषणक लाभ स्पष्ट, मुदा सभ नाम आ वर्णन एकहि ढाँचामे समाइत अछि की नहि ई विवादित।
AFA आशय, सामाजिक प्रथा आ प्रसंग सेहो सन्दर्भ निर्धारण करैत अछि। तर्कीय रूप आवश्यक स्पष्टीकरण
दे सकैत अछि, सम्पूर्ण भाषिक जीवन नहि।
35.12 आरम्भिक आ परवर्ती विट्गेन्स्टाइन
आरम्भिक विट्गेन्स्टाइन भाषा आ जगतक चित्रात्मक सम्बन्ध, कथनीयक सीमा आ तर्कीय रूपपर बल दैत
छथि। परवर्ती लेखन अर्थक उपयोग, भाषा-खेल आ जीवन-रूपसँ जोड़ेत अछि। एहि परिवर्तनकें सरल
आत्मखण्डन कहब पर्याप्त नहि; दार्शनिक समस्याक स्रोत सम्बन्धी दृष्टि बदलैत अछि।
“अर्थ उपयोग अछि” कहला सँ सत्य मनमाना सामाजिक सहमति नहि बनैत। उपयोग नियमबद्ध होइत, आ
जगत सफल-असफल क्रियासँ प्रतिरोध करेत अछि। भाषा-खेलक भिन्नता प्रमाणक क्षेत्र बुझबैत अछि;
खेलसभ बीच आलोचना असम्भव नहि।
35.13 निजी भाषाक प्रशन
जँ कोनो शब्द केवल एहन निजी अनुभूति सूचित करय जकर सही-गलत उपयोगक सार्वजनिक कसौटी सम्भव
नहि, तँ “नियम मानब” आ “हमरा ठीक लगल” बीच भेद कोना होयत? निजी भाषा-विमर्श अनुभवक निजीपन
नकारेत नहि; भाषिक अर्थक मानक सार्वजनिक अभ्याससँ जुड़ल अछि से देखबैत अछि।
पीड़ा व्यक्तिगत अछि, तथापि पीड़ाक भाषा सामाजिक ed सीखल जाइत अछि। सार्वजनिक कसौटी
वयक्तिक अनुभव रद्द करबाक अधिकार नहि दैत। चिकित्सकीय मापन आ आत्मवर्णन दूनू प्रमाण, मुदा अलग
पक्षक। बहुप्रमाणीय विवेकवाद एककें दोसरमे घटबैत नहि।
35.14 अवधारणात्मक विश्लेषण आ सत्ता
“स्वतंत्रता”, “समानता’, “जाति? वा “area परिभाषा केवल शब्दकोशीय प्रश्न नहि। संस्था एहि पदक
अधिकृत अर्थ बनबैत आ अधिकार बाँटैत अछि। कौन बोलि “मानक भाषा”, कोन काम “कुशल”, आ कोन
क्षति “निजी मामला'-_अवधारणा राजनीतिक परिणाम दैत अछि।
एहि कारण स्पष्टता स्वयं तटस्थ नहि, मुदा अस्पष्टता आलोचनाक साधन सेहो नहि। विश्लेषण पदक उपयोग,
सीमा, लाभान्वित पक्ष आ छूटल अनुभव देखत। सामाजिक इतिहास बिना अवधारणात्मक विश्लेषण अधूरा,
आ स्पष्ट अवधारणा बिना सत्ता-आलोचना धुँधला रहत।
अध्याय-निष्कर्ष
विश्लेषणात्मक दर्शन समानान्तर दर्शनके भाषिक स्पष्टता, तर्कीय अनुशासन आ अवधारणात्मक सूक्ष्मता दैत
अछि। नव्य-न्याय एहि संवादक भारतीय साझेदार बनि सकैत अछि, मुदा दुनूक ऐतिहासिक स्वतन्त्रता सुरक्षित
रहबाक चाही। सूक्ष्मता उपयोगी तखन अछि जखन ओ गलत निष्कर्ष घटबैत अछि आ सार्वजनिक समझ
बढ़बैत अछि।
अध्याय-ग्रन्थसूचौ
Gottlob Frege — “On Sense and Reference”.
Bertrand Russell — “On Denoting”.
Ludwig Wittgenstein — Tractatus Logico-Philosophicus.
Ludwig Wittgenstein — Philosophical Investigations.
G. E. Moore — Principia Ethica.
Bimal Krishna Matilal — Logic, Language and Reality.
Jonardon Ganeri— Philosophy in Classical India.