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व्यवहारवादक मूल शक्ति एहि बातमे अछि जे ओ दर्शनकें जीवनसँ काटल, केवल अमूर्त परिभाषाक खेल बनि
रहबाक अनुमति नहि दैत अछि। चार्ल्स सैण्डर्स पियर्स, विलियम जेम्स आ जॉन ड्यूईसँ set एहि परम्परामे
विचारक अर्थ, सत्य, अन्वेषण, अनुभव आ क्रियाक सम्बन्ध बारम्बार सामने अबैत अछि। मुदा व्यवहारवादके
“जे उपयोगी, से सत्य” कहि देब ओकर गम्भीर दार्शनिक रूपके अत्यधिक छोट करब होयत। उपयोगिता,
व्यावहारिक परिणाम आ दीर्घकालिक जाँच महत्त्वपूर्ण छथि, मुदा तुरन्त लाभ सत्यक पर्याय नहि।
36.1 अर्थ आ व्यावहारिक परिणाम
पियर्सक प्राग्मैटिक सूत्रक मूल भावना ई अछि जे कोनो अवधारणाक अर्थ बुझबाक लेल देखू जे व्यावहारिक
भेद ओ अवधारणा सम्भव अनुभव अथवा क्रियामे उत्पन्न Hed अछि। जँ दू सिद्धान्त सभ सम्भव परिस्थिति
मे एकहि परिणाम देत, तँ हुनकर कथित अन्तर सम्भवतः केवल शब्दगत भऽ सकैत अछि। एहि पद्धतिक महत्त्व
दार्शनिक अस्पष्टता कम करबमे अछि। “स्वतंत्रता”, “सत्य”, “विश्वास”, “कारण”, “अधिकार” जकाँ शब्द
केवल आदर्श घोषणासँ स्पष्ट नहि होइत अछि; Yor usd अछि-ई अवधारणा व्यवहारमे कोन अन्तर करैत
अछि?
36.2 सत्य: क्षणिक लाभ नहि, अन्वेषणक अनुशासन
विलियम जेम्स सत्यक जीवित, अनुभवगत पक्षपर बल दैत छथि, मुदा एतय सावधानी आवश्यक अछि। कोनो
झूठ अल्पकालमे लाभकारी भऽ सकैत अछि। अफवाह राजनीतिक लाभ दऽ सकैत अछि, मिथ्या औषधीय
दावा बाजार बना सकैत अछि, अन्धविश्वास मानसिक सांत्वना दे सकैत अछि। एहि कारण “काम करैत
अछि”क अर्थ स्पष्ट होयबाक चाही-ककर लेल, कोन समयावधिमे, कोन प्रमाणपर, आ कोन मूल्यक
आधारपर?
पियर्सक दीर्घकालिक अन्वेषणक विचार व्यवहारवादके मनमाना व्यक्तिवादसँ बचबैत अछि। सत्य केवल
“हमरा उपयोगी लगैत अछि” नहि; सार्वजनिक जाँच, आलोचना, पुनरावलोकन आ समुदायगत अनुसन्धानक
प्रक्रिया आवश्यक अछि। समानान्तर दर्शन एहि बिन्दुसँ अपन त्रुटिसंशोध्य ज्ञान-दृष्टिक पुष्टि देखैत अछि।
36.3 ड्यूई: दर्शन, शिक्षा आ लोकतन्त्र
Sag विचारक समस्या-समाधान, शिक्षा, लोकतन्त्र आ सामाजिक प्रयोगसँ जोड़ैत छथि। लोकतन्त्र केवल
मतदान-पद्धति नहि, बल्कि साझा अन्वेषण, संचार आ अनुभव-संशोधनक जीवनरुप सेहो भऽ सकैत अछि।
ule geht संस्था पवित्र नहि; संस्था सामाजिक समस्या हल करेत अछि की नहि, नागरिक गरिमा बढ़बैत अछि
की नहि, नव अनुभवसँ सीखैत अछि की नहि--ई प्रश्न आवश्यक अछि।
36.4 व्यवहारवाद आ नैतिकता
कोनो नीति सिद्धान्ततः न्यायपूर्ण कहल गेल, मुदा व्यवहारमे निरन्तर किछु समूहे अपमानित, बहिष्कृत अथवा
असहाय बनबैत अछि, तँ नीति पुनः परीक्षण योग्य अछि। परिणाम नैतिक तर्कक एक महत्त्वपूर्ण भाग अछि।
मुदा परिणाम एकमात्र कसौटी नहि। यदि बहुमतक लाभ लेल अल्पसंख्यकक मूल अधिकार नष्ट कएल जाए,
तँ “कुल उपयोगिता” पर्याप्त उत्तर नहि। तँँ समानान्तर दर्शन परिणाम, अधिकार, गरिमा, प्रक्रिया आ
दीर्घकालिक सामाजिक प्रभाव सभकेँ एक संग जाँचैत अछि।
36.5 भारतीय परम्परासँ संवाद
न्याय परम्परामे यथार्थ ज्ञान सफल प्रवृत्तिसँ जुड़ल चर्चा भेटैत अछि; मीमांसा कर्म आ फल, बौद्ध परम्परा
दुःखनिरोधक व्यावहारिक दिशाक, आ अनेक भारतीय दर्शन मुक्तिक जीवनगत उद्देश्य पर जोर दैत अछि। मुदा
एहि समानतासभकेँ प्रत्यक्ष ऐतिहासिक समानता घोषित नहि करबाक चाही। समानान्तर दर्शन समस्या-
संरचनात्मक संवाद करैत अछि--ज्ञान आ जीवनक सम्बन्ध दुनू परम्परामे कोना विचारल गेल?
पूर्वपक्षः जँ परिणाम महत्त्वपूर्ण, तेँ सिद्धान्तक स्वतंत्र मूल्य की?
उत्तरपक्ष: सिद्धान्त दिशा दैत अछि, परिणाम ओकर परीक्षण करैत अछि। केवल परिणाम बिना सिद्धान्त
अवसरवाद बनि सकैत अछि; केवल सिद्धान्त बिना परिणाम-जाँच कठोर कट्ररता।
36.6 पियर्सक संशय आ विश्वास
पियर्स कृत्रिम सर्वसंशयक बदला वास्तविक संशयपर बल दैत छथि। विश्वास क्रियाक आदत बनबैत अछि;
जखन अनुभव वा विरोधी कारण एहि आदतकें अस्थिर Hed अछि तखन अनुसन्धान आरम्भ होइत अछि।
केवल “हम सभपर संशय करेत छी? Hed, जॅ ककरो व्यवहार वा निर्णय नहि बदलय, दार्शनिक मुद्रा भऽ सकैत
अछि।
विश्वास स्थिर करबाक हठ, अधिकार, सहज बोध आ सार्वजनिक अनुसन्धान-जकाँ विधि अलग विश्वसनीयता
रखैत अछि। सार्वजनिक अनुसन्धानक श्रेष्ठता ई नहि जे शोधकर्ता निष्पक्ष देवता छथि, बल्कि विधि दीर्घकालमे
व्यक्तिगत पक्षपात सुधारबाक अवसर दैत अछि। परिणाम अन्तिम नहि, समुदाय द्वारा संशोध्य अछि।
36.7 प्राग्मैटिक अर्थ-स्पष्टता
कोनो अवधारणाक व्यावहारिक परिणाम की हो सकैत अछि से सोचला पर ओकर अर्थ स्पष्ट होइत अछि।
वस्तु कठोर अछि'क अर्थ सम्भावित स्पर्श, दबाव आ व्यवहारमे खुलैत अछि। एहि सूत्रक अर्थ सत्य केवल
तत्काल लाभ अछि नहि; परिणाम अवधारणाक बोधक कसौटी अछि।
नेतिक वा धार्मिक अवधारणामे परिणाम दीर्घकालीन, सामूहिक आ अप्रत्यक्ष भऽ सकैत अछि। तें
व्यावहारिकता त्वरित सुविधा नहि। कोन परिणाम, ककरा लेल, कोन अवधि मे, आ कोन मूल्यक दृष्टिसँ-ई
प्रशन बिना "काम करैत अछि” अस्पष्ट वाक्य अछि।
36.8 जेम्स आ सत्यक जीवित प्रश्न
विलियम जेम्स विश्वासक एहन स्थिति पर विचार करेत छथि जतय विकल्प जीवित, महत्त्वपूर्ण आ टारल नहि
जा सकय, मुदा निर्णायक प्रमाण एखन उपलब्ध नहि। एतय निर्णय स्थगित करब सेहो निर्णयक परिणाम दऽ
सकैत अछि। हुनक बहस विज्ञानक स्थापित तथ्य इच्छा अनुसार बदलबाक अनुमति नहि।
विश्वासक अधिकार सीमित परिस्थितिमे अछि। of दाबी दोसरपर बाध्यकारी नीति बनबैत, अथवा पर्याप्त
प्रमाण उपलब्ध अछि, तेँ निजी इच्छा सार्वजनिक औचित्य नहि। बहुप्रमाणीय विवेकवाद निजी अस्तित्वगत
प्रतिबद्धता आ सार्वजनिक तथ्य-दाबी अलग रखैत अछि।
36.9 Sag: अनुभव, समस्या आ लोकतन्त्र
ड्यूई लेल अनुभव निष्क्रिय संवेदन नहि, जीव आ परिवेशक परस्पर क्रिया अछि। समस्या तखन उठैत अछि
जखन चलैत आदत विफल होइत; अनुसन्धान सम्भावित समाधान बनबैत, परीक्षण करेत आ परिणाम अनुसार
सुधारैत अछि। ज्ञान जीवनसँ अलग दर्शकक चित्र नहि।
लोकतन्त्र मतदानक विधि मात्र नहि, संयुक्त समस्या-समाधानक सामाजिक पद्धति सेहो अछि। शिक्षा प्रश्न,
सहयोग आ परिणामक समीक्षा सिखबय। मुदा शक्ति-असमानता उपेक्षित रहला पर “साझा प्रयोग”
शक्तिशालीक एजेंडा बनि सकैत अछि; समान भागीदारी लेल संसाधन आ आवाजक शर्त आवश्यक अछि।
36.10 परिणाम आ नैतिक सीमा
कोनो विचार उपयोगी साबित भेल--एतयसँ ओकर सभ अर्थमे सत्यता सिद्ध नहि। उपयोग छल, हिंसा वा
अल्पकालिक लाभसँ सेहो भेटि सकैत अछि। परिणामवादी परीक्षणमे लाभ-हानिक वितरण, दीर्घकालीन
प्रभाव, अधिकार आ विकल्पक न्याय जाँचल जाएत।
व्यवहारवादक सर्वोत्तम रूप सिद्धान्तके अनुभव लेल खुलल रखैत अछि। खराब रूप 'जे चलि जाए वही ठीक”
बनि सकैत अछि। समानान्तर दर्शन प्रयोगशीलता ग्रहण hed, मनुष्यक गरिमा आ तथ्यगत ईमानदारीकें एहन
सीमा मानैत अछि जकरा सुविधा लेल त्यागल नहि जा सकैत।
अध्याय-निष्कर्ष
व्यवहारवाद ach जीवनक बीच वापस अनैत अछि। एकर शिक्षा ई नहि जे सत्य सुविधाक नाम अछि, बल्कि
ई जे अवधारणा, सिद्धान्त आ संस्था अपन व्यावहारिक परिणामसँ पूर्णतः अलग नहि रहि सकैत अछि।
समानान्तर दर्शन एहि शिक्षाक अपन प्रमाण-संवेदनशीलता आ गरिमा-आधारित नैतिकतासँ जोडत अछि।
अध्याय-ग्रन्थसूचौ
Charles S. Peirce — चयनित दार्शनिक लेख.
William James — Pragmatism.