व्यक्ति समाजसँ बाहर जन्म नहि लैत अछि। भाषा, नाम, सम्बन्ध, स्मृति, शिक्षा, व्यवसाय, अवसर, भय, मान्यता आ प्रतिबन्ध-सभ सामाजिक संसारसँ जुल अछि। मुदा व्यक्ति समाजक निष्क्रिय उत्पाद सेहो नहि। व्यक्ति प्रशन करैत अछि, विद्रोह करेत अछि, नूतन भाषा बनबैत अछि, परम्परा सुधारैत अछि, संस्था बदलैत अछि। तेँ व्यक्ति आ समाजक सम्बन्ध एकतरफा कारणता नहि; पारस्परिक निर्माण अछि। 38.1 सामाजिक रूपसँ निर्मित व्यक्ति जन्मक बाद बच्चा कोनो तैयार “स्वतंत्र आत्म” रूपमे सामाजिक अर्थ बिना नहि रहैत। भाषा सिखैत, सम्बन्ध बनबैत, नियम बुझैत, अपन देह आ पहिचानक सामाजिक अर्थ ग्रहण करैत व्यक्ति बनेत अछि। “हम”क भावना सेहो “हमरा कोना देखल जाइत अछि” सँ प्रभावित होइत अछि। परिवार, जाति, वर्ग, लिंग, भाषा, क्षेत्र आ धर्म अनेक अवसर आ सीमा निर्धारित कऽ सकैत अछि। 38.2 समाज व्यक्ति नहि निगलय यदि सभ विचारक केवल सामाजिक उत्पाद कहल जाए, तखन सामाजिक आलोचना स्वयं कोना सम्भव? सुधारक, विद्रोही, कवि, वैज्ञानिक, दार्शनिक आ सामान्य नागरिक अपन समाजक मान्यतासँ असहमत होइत छथि। सामाजिक प्रभाव वास्तविक अछि, पूर्ण नियतत्व नहि। समानान्तर दर्शन एहि कारण व्यक्ति-स्वायत्तता आ सामाजिक स्थितिक दुनूकें स्वीकारैत अछि। 38.3 समुदाय आ गरिमा समुदाय मनुष्यकें भाषा, सुरक्षा, आत्मीयता आ अर्थ दैत अछि। मुदा समुदाय पवित्र नहि। जातिगत बहिष्कार, स्त्री-विरोधी नियम, धर्मपरिवर्तन पर हिंसा, भाषिक दमन, परिवारक नामपर स्वायत्तताक नाश--ई सभ ead अछि जे समुदाय स्वयं अन्याय करि सकैत अछि। व्यक्ति-गरिमा समुदायगत परम्परासँ निम्न नहि होयबाक चाही। 38.4 उदारवाद आ सामुदायिक आलोचना उदार परम्परा व्यक्तिक अधिकार, चुनाव आ राज्यसँ सुरक्षा पर बल दैत अछि। सामुदायिक आलोचक स्मरण करबैत छथि जे वास्तविक व्यक्ति सम्बन्धविहीन परमाणु नहि। ओकर मूल्य, भाषा, विकल्प आ पहिचान सामाजिक इतिहासमे बनैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि विवादके “एक पक्ष चुनू” रूपमे नहि देखैत अछि। अधिकार बिना समुदाय अत्याचारी भऽ सकैत अछि; सम्बन्ध बिना व्यक्ति-कथन काल्पनिक हो सकैत अछि। 38.5 मान्यता आ सामाजिक अस्तित्व मनुष्य केवल संसाधन नहि चाहैत अछि; सम्मान आ मान्यता सेहो चाहैत अछि। अपमान, अस्पृश्यता, भाषिक हीनता, जातीय रूढ़ि, लिंगगत अवमूल्यन व्यक्तिक आत्मसम्बन्ध प्रभावित Het अछि। सामाजिक न्यायक अर्थ केवल आय-वितरण नहि; सम्मानक संरचना सेहो। 38.6 डिजिटल समाज डिजिटल माध्यम व्यक्तिक सामाजिकता नूतन रूप देलक। नेटवर्क समुदाय, एल्गोरिद्यिक दृश्यता, समूह- पहिचान, ऑनलाइन अपमान, सामूहिक स्मृति आ दुष्प्रचार व्यक्ति-समाज सम्बन्धे बदलैत अछि। व्यक्ति अधिक बोलि सकैत अछि, मुदा अधिक निगरानी, समूह-दबाव आ सूचना-प्रवर्तनक अधीन सेहो भऽ सकैत अछि। पूर्वपक्षः व्यक्ति समाजक उत्पाद अछि, तेँ व्यक्तिगत जिम्मेवारी घटि जाइत अछि? उत्तरपक्षः सामाजिक कारण जिम्मेवारीक सन्दर्भ बुझबैत अछि, ओकरा पूर्ण समाप्त नहि करैत। जिम्मेवारी क्षमता, बाध्यता, ज्ञान आ विकल्पक स्तर अनुसार विचारल जाए। 38.12 समाजक तत्त्वमीमांसा: जोड़ की संरचना? समाजकेँ व्यक्तिसभक जोड़ मात्र मानल जाए तँ भाषा, मुद्रा, कानून आ परम्परा-जकाँ एहन तथ्य कठिन होइत अछि जे कोनो एक व्यक्तिक इच्छासँ उत्पन्न वा समाप्त नहि होइत। विपरीत रूपसँ समाजकेँ स्वतंत्र जीव मानल जाए तँ व्यक्तिगत पीड़ा आ जिम्मेदारी अदृश्य भऽ जाइत। उचित विश्लेषण उद्भूत संरचना मानेत अछि: वयक्तिक क्रियासँ बनल, मुदा बनलाक बाद व्यक्तिक विकल्पपर वास्तविक प्रभाव देनिहार। उदाहरणतः बाजार लाखों निर्णयसँ बनेत अछि, तथापि मूल्य आ रोजगारक स्थिति एक व्यक्ति सामने बाहरी बाधा जकाँ उपस्थित होइत अछि। परिवार सदस्यसभक सम्बन्धसँ अछि, मुदा उत्तराधिकार आ लिंग-भूमिका पीढ़ीगत नियम बनि सकैत अछि। संरचना बदलय लेल व्यक्तिगत सदिच्छा संग सामूहिक नियमक परिवर्तन चाही। प्रमाण-विवेचनमे स्तर स्पष्ट रहय। व्यक्तिक HITS संस्था सम्बन्धी परिकल्पना बनि सकैत, मुदा व्यापक दाबी लेल अनेक अनुभव, नियम, आँकड़ा आ ऐतिहासिक परिवर्तन जाँचल जाए। समूह-स्तरक आँकड़ा सँ प्रत्येक वयक्तिक गुण निकालब सेहो भूल अछि। 38.13 सामाजिक अनुकरण आ आलोचनात्मक दूरी मनुष्य आचरण केवल स्पष्ट आदेशसँ नहि सीखैत; देखादेखी, प्रशंसा, लज्जा आ पुनरावृत्तिसँ मानक भीतर बसैत अछि। एहि कारण अन्यायपूर्ण व्यवहार कानून निषिद्ध भेलाक बादो सामान्य आदत रूपमे जीवित रहि सकैत अछि। सामाजिक परिवर्तनक लेल दण्डसँ अधिक नूतन उदाहरण, भाषा आ संस्थागत प्रोत्साहन आवश्यक। अनुकरण सभ समय दमन नहि। बच्चा भाषा, सहयोग आ कौशल एहि मार्गसँ सीखैत अछि। प्रश्‍न ई जे मानक प्रश्‍न लेल खुलल अछि की जन्मगत दर्जा रूपमे थोपल। आलोचनात्मक दूरी अपन परम्पराकें बाहरी वस्तु बना कऽ नकारब नहि, ओकर कारण आ परिणाम देखबाक क्षमता अछि। विद्यालय आ सार्वजनिक माध्यमक नेतिक भूमिका एतय अबैत अछि। ओ एक 'आदर्श नागरिक'क संकीर्ण छवि नहि थोपय, बल्कि अलग जीवन-रूपक समान गरिमा, प्रमाण माँगबाक अभ्यास आ असहमतिक भाषा विकसित करय। 38.14 एकान्त, समुदाय आ मानसिक अवकाश समुदाय अर्थ आ सहारा दैत अछि, मुदा निरन्तर सामाजिक दृष्टि व्यक्तिक आत्मचिन्तन रोकि सकैत अछि। एकान्तक अधिकार व्यक्ति कें भूमिका सँ थोड़े दूरी AS अपन मूल्य जाँचबाक अवसर दैत अछि। ई सामाजिक पलायन नहि, अधिक उत्तरदायी सहभागिताक तैयारी भऽ सकैत अछि। दोसर दिस मजबूर अलगाव--बहिष्कार, प्रवासन, वृद्धावस्था वा डिजिटल वंचना-स्वतंत्र एकान्त नहि। समान शब्दक पाछाँ अनुभव उलटा भऽ सकैत अछि। नीति चुनावसहित निजी अवकाश आ अनिच्छित अकेलापनक सहायता अलग करय। दार्शनिक रूपसँ व्यक्ति न पूर्ण आत्मनिर्भर, न समुदायमे विलीन। ओकरा सम्बन्ध चाही आ सम्बन्धपर विचार करबाक दूरी सेहो। सहअस्तित्व एहि लयक नाम अछि। 38.15 पूर्वपक्ष: सामाजिक व्याख्या व्यक्तिक दोष मिटा दैत अछि आपत्ति अछि जे संरचना, भूमिका आ सामाजिक प्रशिक्षणपर बल देलासँ प्रत्येक गलत काजक जिम्मेदारी समाजपर चलि जायत। व्यक्ति कहि सकत जे ओ परम्परा अनुसार कएलक, अतः दोषी नहि। एहन निष्कर्ष नैतिक अभिकर्तृत्व नष्ट करैत अछि। उत्तर ई जे कारण बतब औचित्य देब नहि। सामाजिक दबाव विकल्प कठिन बना सकैत, मुदा पूर्णतः असम्भव हरदम नहि। जिम्मेदारी मापैत समय जानकारी, शक्ति, प्रतिरोधक जोखिम आ लाभ देखल जाए; सभपर समान दोष नहि, ककरो पर शून्य दोष सेहो नहि। संरचनात्मक सुधार भविष्यक हानि रोकैत अछि, व्यक्तिगत उत्तरदायित्व विशिष्ट कृत्यक न्याय करैत अछि। ol बिना एक-दोसर अधूरा छथि। 38.7 सामाजिक व्यक्तिक निर्माण व्यक्ति जन्मसँ तैयार आत्मनिर्भर एकक नहि। भाषा, देखभाल, परिवार, विद्यालय, श्रम आ सार्वजनिक मान्यता ओकर क्षमता बनबैत अछि। एहि सामाजिक निर्माणक अर्थ व्यक्ति भ्रम अछि नहि; बल्कि व्यक्तित्व सम्बन्धक माध्यमसँ वास्तविक बनेत अछि। समुदाय व्यक्तिक स्रोत होइतहुँ ओकर मालिक नहि। जे परम्परा प्रश्न, प्रस्थान वा जीवन-विकल्प रोकैत अछि, ओ अपन पोषणकारी भूमिकाक सीमा पार करैत अछि। व्यक्ति आ समाजक उचित सम्बन्ध पारस्परिक निर्माण संग आलोचना आ निकासक स्वतंत्रता स्वीकारत। 38.8 भूमिका आ आत्मपहिचान मनुष्य अनेक भूमिका निभबैत अछि--परिजन, पेशाकर्मी, नागरिक, भाषिक समुदाय सदस्य। भूमिका अपेक्षा आ अर्थ दैत अछि, मुदा व्यक्ति कोनो एक भूमिकामे पूर्ण समाप्त नहि। संघर्ष तखन होइत अछि जखन दू भूमिका विरोधी कर्तव्य देत, अथवा समाज जन्मसँ भूमिका स्थिर करि देत। आत्मपहिचान केवल निजी घोषणा नहि, आ केवल बाहरी आरोप सेहो नहि। देह, इतिहास, सम्बन्ध, अनुभव आ आत्मनिर्णय मिलि पहचान बनबैत अछि। नीति बनबैत समय व्यक्तिक अपन आवाज महत्त्वपूर्ण, मुदा दाबीक सामाजिक परिणाम आ दोसरक अधिकार सेहो जाँचल जाएत। 38.9 सामूहिक उत्तरदायित्व संस्था द्वारा भेल हानिक जिम्मेदारी केवल अन्तिम आदेश देनिहार व्यक्तिपर राखलासंँ प्रक्रिया अदृश्य भऽ सकैत अछि। नियम बनौनिहार, लागू करनिहार, लाभ लेनिहार आ विरोध रोकनिहारक भूमिका भिन्न होइत अछि। सामूहिक उत्तरदायित्व एहि भूमिकाक वितरण जाँचैत अछि। मुदा समूहक नामपर प्रत्येक सदस्य समान दोषी नहि। जानकारी, शक्ति, लाभ आ प्रतिरोधक सम्भावना अनुसार जिम्मेदारी बदलैत अछि। न्याय लेल व्यक्तिगत दोष, संस्थागत सुधार आ पीड़ितक प्रतिकार अलग साधन चाही। 38.10 विश्वास आ सामाजिक पूँजी सहयोग लेल किछु विश्वास आवश्यक अछि। प्रत्येक कथन स्वयं जाँचब असम्भव; संस्था, पड़ोसी आ विशेषज्ञपर निर्भरता सामाजिक जीवनक शर्त अछि। विश्वास टूटला पर लेनदेन, ज्ञान आ लोकतान्त्रिक संवादक लागत Ted अछि। अन्ध विश्वास पूँजी नहि, जोखिम अछि। विश्वसनीयता पारदर्शिता, उत्तरदायित्व, समान नियम आ त्रुटि-सुधारसँ ad अछि। हाशियाक समुदाय जँ ऐतिहासिक अनुभवक कारण संस्थापर अविश्वास करैत अछि, तेँ उपदेश नहि, संस्थागत प्रमाण चाही। 38.11 निजता आ सार्वजनिकता वयक्तिक निजी क्षेत्र स्वतंत्रता आ आत्मविकास लेल आवश्यक, मुदा “निजी? नाम दऽ घरेलू हिंसा वा असमानता अदृश्य कएल जा सकैत अछि। दोसर दिस राज्य वा समाजक अत्यधिक हस्तक्षेप आत्मनिर्णय नष्ट करेत अछि। सीमा हानि, सहमति, निर्भरता आ शक्ति अनुसार तय होयत। डिजिटल जीवनमे निजी व्यवहार डेटा बनि सार्वजनिक प्रभाव उत्पन्न करैत अछि। सहमति केवल लम्बा शर्तपत्र स्वीकारब नहि; जानकारी, वास्तविक विकल्प आ वापसीक अधिकार चाही। व्यक्ति-समाज सम्बन्धक नूतन क्षेत्र डेटा-सत्ता अछि। अध्याय-निष्कर्ष समाज बिना व्यक्ति अधूरा; व्यक्तिगत गरिमा बिना समाज अत्याचारी। समानान्तर दर्शन सामाजिक स्थितिक वास्तविक प्रभाव स्वीकारैत अछि, संगहि व्यक्तिक आलोचनात्मक स्वायत्तता आ समान मूल गरिमाकें केन्द्रमे रखैत अछि। अध्याय-ग्रन्थसूचौ John Stuart Mill — On Liberty. G. W. F. Hegel — Philosophy of Right. Charles Taylor — Sources of the Self. Axel Honneth — The Struggle for Recognition.