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अध्याय ३१ - राज्यक औचित्य
राज्य आदेश दैत अछि, कर लैत अछि, कानून बनबैत अछि, दण्ड दैत अछि, सम्पत्ति-व्यवस्था नियंत्रित करेत
अछि, सीमा बनबैत अछि आ कखनो बल प्रयोग करेत अछि। एहि कारण राज्यक मूल दार्शनिक प्रश्न अछि
एहन बाध्यकारी सत्ता उचित किएक? “राज्य अछि, तैँ मानू” औचित्य नहि। शक्ति आ वैधता अलग वस्तु
अछि।
39.1 सुरक्षा: हॉन्सक प्रश्न
हॉब्स असुरक्षित अवस्थाक भय देखबैत मजबूत सार्वभौम सत्ताक औचित्य खोजैत छथि। सुरक्षा निश्चय
राजनीतिक जीवनक आधारभूत आवश्यकता अछि। मुदा केवल सुरक्षा पर्याप्त नहि। जेल सेहो अत्यन्त सुरक्षित
भऽ सकैत अछि, मुदा स्वतंत्र समाज नहि। राज्य जँ सुरक्षाक नामपर अनियन्त्रित सत्ता ग्रहण करय, तँ सुरक्षा
स्वयं नागरिकक भयक स्रोत बनि सकैत अछि।
39.2 अधिकार: लॉकक दिशा
लॉक जीवन, स्वतंत्रता आ सम्पत्तिक संरक्षण दिस राजनीतिक सत्ता उचित ठहरबैत छथि। सरकारक वैधता
शासितक सहमति आ अधिकार-संरक्षणसँ जुड़ैत अछि। एहि परम्पराक गम्भीर योगदान ई अछि जे राज्य
नागरिकक मालिक नहि; सरकारक शक्ति उद्देश्य-बद्ध आ सीमित अछि।
39.3 रूसो आ स्वशासन
रूसोक प्रश्न केवल “कतेक कम राज्य?” नहि, “कानून वास्तवमे ककर इच्छा Aad करेत अछि?” यदि
नागरिक स्वयं समान सदस्य रूपमे कानून-निर्माणमे भाग लैत छथि, राजनीतिक आज्ञापालनक अर्थ बदलैत
अछि। मुदा “सामान्य इच्छा”क नामपर बहुमत अथवा शासक समूह अपन मत थोपय, तखन सामूहिकता दमन
बनि सकैत अछि।
39.4 वैधानिकता आ नैतिक वैधता
कोनो कानून विधिसम्मत प्रक्रिया सँ पारित भऽ सकैत अछि, तथापि अन्यायी हो सकैत अछि। दासता, जातिगत
बहिष्कार, स्त्रीक अधिकार-वंचना, औपनिवेशिक कानून--इतिहास देखबैत अछि जे विधिक वैधता आ नैतिक
न्याय एक नहि। तँ नागरिक आज्ञापालनक कर्तव्य पूर्णतः असीम नहि।
39.5 सार्वजनिक औचित्य
समानान्तर दर्शन राज्यसँ सार्वजनिक कारण माँगैत अछि। स्वतंत्रता सीमित किएक? कर किएक? निगरानी
किएक? भूमि अधिग्रहण किएक? भाषा-नीति किएक? नागरिकक जीवन प्रभावित करैत निर्णयक कारण
सार्वजनिक, जाँचयोग्य आ समान कसौटीपर उचित होयबाक चाही। “राज्यक हित” स्वयं अन्तिम उत्तर नहि।
39.6 न्यूनतम राज्य कि कल्याणकारी राज्य?
एक मत कहैत अछि राज्य मुख्यतः सुरक्षा, अनुबन्ध आ अधिकार-सुरक्षा धरि सीमित रहय। दोसर मत कहैत
अछि वास्तविक स्वतंत्रता लेल शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा आ न्यूनतम आर्थिक अवसर आवश्यक, तेँ
राज्यक सकारात्मक भूमिका चाही। समानान्तर दर्शन एहि विवादमे प्रभाव, संसाधन, क्षमता आ गरिमाकें
जाँचैत अछि। राज्य अधिक करय अथवा कम--मूल प्रश्न अछि ओकर शक्ति उत्तरदायी, पारदर्शी आ समान
गरिमा-संगत अछि की नहि।
39.7 संघवाद, स्थानीयता आ बहुकेन्द्रिक सत्ता
सत्ता अत्यधिक केन्द्रीकृत भेला पर स्थानीय ज्ञान, भाषा आ आवश्यकता दबि सकैत अछि। मुदा स्थानीय सत्ता
सेहो जाति, लिंग वा समुदायगत दमन करि सकैत अछि। तेँ बहुकेन्द्रिक लोकतन्त्रक अर्थ केवल विकेन्द्रीकरण
नहि; स्थानीय स्वायत्तता + मौलिक अधिकार + उत्तरदायित्व + न्यायिक सुरक्षा।
पूर्वपक्षः बिना मजबूत राज्य व्यवस्था टूटि जाएत।
उत्तरपक्षः मजबूत संस्थाक आवश्यकता अछि, अनियन्त्रित राज्यक नहि। शक्ति जतेक अधिक, औचित्य,
समीक्षा आ उत्तरदायित्व ततेक अधिक चाही।
39.13 राज्यक ज्ञानात्मक सीमा
राज्य व्यापक आँकड़ा, विशेषज्ञता आ समन्वय रखैत अछि, मुदा स्थानीय जीवनक सूक्ष्म ज्ञान ओकरा नहि रहि
सकैत। केन्द्रक नीति औसत व्यक्तिक कल्पनापर बनि विविध भूगोल आ भाषा मे विफल हो सकैत अछि।
राज्यक क्षमता आ अज्ञान एकहि समय स्वीकारब चाही।
स्थानीय परामर्श केवल निर्णय बादक औपचारिक सभा नहि। समस्या परिभाषित करबा, विकल्प चुनबा आ
परिणाम जाँचबामे प्रभावित लोक भाग लेथि। तथापि स्थानीय मत स्वयं तथ्यगत अचूक नहि; स्वतंत्र मापन
आ अधिकारक सीमा रहत।
ज्ञानात्मक विनम्र राज्य कारण प्रकाशित करैत, परीक्षणात्मक नीति बनबैत, त्रुटि मानेत आ सुधारक मार्ग रखैत
अछि। प्रतिष्ठा बचेबाक लेल असफल नीति जारी रखब सार्वजनिक विश्वास नष्ट करैत अछि।
39.14 कर आ पारस्परिक दायित्व
कर व्यक्तिक सम्पत्तिमे केवल जबरन कटौती नहि; कानून, मुद्रा, सड़क, शिक्षा आ सुरक्षा-जकाँ सामाजिक
शर्तक वित्तपोषण अछि। मुदा राज्यक अधिकार असीम नहि। करक बोझ, उपयोग आ प्रक्रिया सार्वजनिक
औचित्य माँगैत अछि।
समान दर कखनो असमान बोझ दैत अछि, कारण न्यून आयक व्यक्ति लेल एकहि राशि जीवनोपयोगी संसाधन
घटबैत अछि। प्रगतिशीलता, उपभोग कर, सम्पत्ति कर आ सेवा शुल्क अलग वितरणात्मक परिणाम दैत अछि।
न्याय दाबी वास्तविक आँकड़ा आ प्रशासनिक क्षमता पर जाँचल जाए।
कर अनुपालन विश्वाससँ जुड़ल अछि। भ्रष्टाचार, अपारदर्शी खर्च वा विशेष पक्षक छूट नागरिक कर्तव्य कमजोर
करैत अछि। उत्तरदायित्व नागरिकक कर-कर्तव्यक विरोधी नहि, ओकर नैतिक आधार अछि।
39.15 सीमा, प्रवासन आ राज्यक अधिकार
राज्य सीमा नियंत्रित करैत अछि, मुदा सीमा पार करनिहार व्यक्ति अधिकारविहीन नहि। सुरक्षा, श्रम, शरण
आ परिवारक प्रश्न राज्यक आत्मनिर्णय तथा सार्वभौम गरिमा बीच तनाव उत्पन्न करैत अछि।
“नागरिक नहि? कहि मनमाना हिरासत, शोषण वा मूल सेवा सँ वंचना उचित नहि। दोसर दिस संसाधन आ
संस्थागत क्षमताक वास्तविक सीमा नकारल सेहो नहि जाए। नीति जोखिम, मानवीय आवश्यकता, कानून आ
बोझ-वितरण स्पष्ट करय।
प्रवासनक कारण एकल नहि--रोजगार, विवाह, हिंसा, पर्यावरण आ शिक्षा as सकैत अछि। श्रेणीकरण
व्यक्तिक कथा सुनबा बिना कएल जाए तेँ न्यायिक भूलक सम्भावना बढ़त अछि।
39.16 पूर्वपक्षः सुरक्षा लेल असीम सत्ता चाही
संकटमे त्वरित निर्णयक आवश्यकता देखाकऽ कहल जाइत अछि जे कार्यपालिका केँ व्यापक, लगभग असीम
शक्ति देल जाए। विलम्ब हानि बढ़ा सकैत अछि; सामान्य प्रक्रिया हर स्थिति लेल पर्याप्त नहि।
मुदा असीम शक्ति सूचना छिपा, आलोचना दबा आ संकट लम्बा घोषित करि सकैत अछि। त्वरित अधिकारक
स्पष्ट विषय, अवधि, भौगोलिक सीमा आ विधायी-न्यायिक समीक्षा हो। जे उपाय आवश्यक छल से प्रमाणित
करबाक दायित्व राज्यपर रहय।
सुरक्षा आ स्वतंत्रता स्थिर विनिमय नहि। पारदर्शी, लक्षित आ समयबद्ध उपाय दुनू बचा सकैत अछि; मनमाना
शक्ति अन्ततः सुरक्षा सेहो कमजोर करैत अछि।
39.8 राज्य आ वैध बल
राज्य कानून लागू करबाक लेल बलक संगठित क्षमता रखैत अछि। प्रश्न केवल बल अछि की नहि, बल्कि
कखन, ककर अधिकारसँ, कोन अनुपातमे आ कोन समीक्षा भीतर प्रयोग होइत अछि। कानूनसम्मत कहला
मात्रसँ बल न्यायपूर्ण नहि भऽ जाइत, कारण अन्यायपूर्ण कानून सेहो सम्भव अछि।
वैधता लेल सार्वजनिक नियम, उचित प्रक्रिया, अनुपातिकता, अपील आ समान संरक्षण आवश्यक।
आपातकालमे त्वरित शक्ति चाही भऽ सकैत, मुदा समय-सीमा आ स्वतंत्र समीक्षा बिना अपवाद स्थायी
शासन बनि सकैत अछि।
39.9 सहमति, निवास आ नागरिकता
सामाजिक अनुबंध वास्तविक ऐतिहासिक हस्ताक्षर नहि, राजनीतिक औचित्यक विचार-प्रयोग अछि। जन्म वा
निवासकें मौन सहमति मानब कमजोर अछि, विशेषतः जखन बाहर जाएब व्यावहारिक Sue असम्भव। वैध
शासन निरन्तर अधिकार-सुरक्षा आ भागीदारीसँ सहमति नवीकृत करैत अछि।
नागरिकता अधिकार संग कर्तव्य दैत अछि, मुदा राज्य कर्तव्य माँगिते व्यक्तिक मूल गरिमा शर्ताधीन नहि कऽ
सकैत। गैर-नागरिक, प्रवासी वा अल्पमत व्यक्तिक न्यूनतम अधिकार बहुमतक इच्छा पर निर्भर नहि।
39.10 कल्याण आ पितृसत्तात्मक राज्य
राज्य शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा आ न्यूनतम जीवन-शर्त सुनिश्चित करैत स्वतंत्रता सक्षम बना सकैत अछि। मुदा
“नागरिकक भलाई? नामपर ओकर निर्णय छीनब पितृसत्तात्मक शासन बनि सकैत अछि। सहायता आ
नियन्त्रणक सीमा स्पष्ट होयत।
हानि रोकब, निर्भर व्यक्तिक रक्षा आ सार्वजनिक संसाधनक न्यायोचित उपयोग हस्तक्षेपक कारण भऽ सकैत
अछि। साधन न्यूनतम प्रतिबन्धकारी, प्रमाण-आधारित आ अपीलयोग्य हो। व्यक्तिक असहमति केवल अज्ञान
मानि खारिज नहि कएल जाए।
39.11 कानूनक शासन
कानूनक शासनक अर्थ केवल बहुत कानून नहि। नियम सार्वजनिक, अपेक्षाकृत स्थिर, भविष्याभिमुख, बुझब
योग्य आ समान रुपसँ लागू होयत। अधिकारी सेहो कानूनक अधीन रहत। मनमाना विवेक नागरिककें अनिश्चित
निर्भरतामे राखैत अछि।
मुदा औपचारिक समानता अन्यायपूर्ण सामग्री बचा सकैत अछि। सभपर समान नियम of ऐतिहासिक रूपसँ
असमान बोझ दैत अछि ते परिणामक परीक्षा चाही। कानूनक शासन आ सामाजिक न्याय परस्पर सुधारक
कसौटी छथि।
39.12 प्रतिरोधक औचित्य
जँ राज्य मूल अधिकार निरन्तर नष्ट करय आ सुधारक वैधानिक मार्ग बन्द करय, तेँ प्रतिरोधक प्रश्न उठैत
अछि। प्रत्येक असहमति विद्रोहक औचित्य नहि। हानिक गम्भीरता, प्रमाण, लक्ष्य, साधन, नागरिकपर जोखिम
आ विकल्प जाँचल जाएत।