जाति केवल व्यक्तिगत पूर्वग्रह नहि; ऐतिहासिक सामाजिक संरचना अछि। विवाह, श्रम, शिक्षा, प्रतिष्ठा, निवास, धार्मिक अधिकार आ सामाजिक सम्पर्कअनेक क्षेत्रमे जाति दीर्घकाल धरि अवसर निर्धारित करैत रहल। जाति-दर्शनक प्रश्‍न एहि कारण केवल “लोक एक-दोसराकैँ पसिन्न करैत अछि वा नहि” नहि, बल्कि जन्म आ नैतिक दर्जाक सम्बन्धक प्रशन अछि। 43.1 जन्म आ नैतिक योग्यता समानान्तर दर्शनक उत्तर स्पष्ट अछि-जन्म नैतिक योग्यता नहि। कोनो परम्परा मनुष्यक समान WAT नकारैत हो तँ परम्पराक आलोचना नैतिक Sos उचित अछि। परम्परा पुरान होयब ओकर ऐतिहासिक महत्त्व सिद्ध करैत अछि; नैतिक उचितता नहि। 43.2 जातिः श्रम-विभाजन वा श्रमिकक विभाजन? जातिक पक्षमे कखनो कार्य-विभाजनक तर्क देल जाइत अछि। मुदा प्रश्‍न उठैत अछि-कार्य aera किएक तय हो? पेशा बदलबाक स्वतंत्रता किएक सीमित? विवाह, भोजन, शिक्षा, निवास आ सम्मानक पदानुक्रम किएक जुड़ल? एहि कारण जातिक समस्या केवल आर्थिक भूमिका नहि; सामाजिक बन्दिश आ वंशानुगत दर्जा अछि। 43.3 अस्पृश्यता आ देहक राजनीति अस्पृश्यता मनुष्यक देहके अपवित्र घोषित कऽ सामाजिक दूरी बनबैत अछि। ई केवल धार्मिक विचार नहि; जल, रास्ता, विद्यालय, मन्दिर, घर, भोजन, विवाह आ श्रमक वास्तविक पहुँच निर्धारित कऽ सकैत अछि। एहि स्तरपर गरिमा अमूर्त शब्द नहि, शरीरक सार्वजनिक उपस्थिति अछि। 43.4 अम्बेडकरक मूल चुनौती अम्बेडकर जातिक आलोचना केवल सद्भावक अपीलसँ नहि करैत छथि; ओ सामाजिक संरचना, धार्मिक औचित्य, अन्तर्विवाह आ राजनीतिक प्रतिनिधित्वक प्रश्‍न उठबैत छथि। जाति-विनाशक अर्थ केवल अपमानजनक व्यवहार घटेनाइ नहि, बल्कि जन्म-आधारित बन्द संरचनाकेँ तोड़ब अछि। 43.5 कानून आ सामाजिक परिवर्तन कानून आवश्यक अछि--भेदभाव निषिद्ध करब, अधिकार देब, प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करब। मुदा सामाजिक आदत, विवाह-नेटवर्क, आर्थिक निर्भरता, भाषिक अपमान आ सांस्कृतिक प्रतिष्ठा केवल कानूनसँ तुरन्त नहि बदलैत। तेँ समानान्तर दर्शन कानूनी समानता, सामाजिक सुधार, शिक्षा, प्रतिनिधित्व आ आर्थिक अवसरक संयुक्त कार्यक्रम देखैत अछि। पूर्वपक्षः जाति केवल सांस्कृतिक पहचान अछि उत्तरपक्ष: जहाँ पहचान स्वैच्छिक आ समान गरिमायुक्त हो, समस्या कम; मुदा जन्मगत बन्दिश, अपमान, बहिष्कार आ अवसर-वंचना हो तँ “संस्कृति” नैतिक आलोचनासँ मुक्त नहि। 43.11 शुद्धि-अशुद्धिक नैतिक परीक्षा स्वच्छता, अनुष्ठानिक शुद्धि आ सामाजिक अस्पृश्यता अलग अवधारणा छथि। रोग-निवारणक स्वच्छता अनुभवजन्य कारण माँगैत; अनुष्ठानिक शुद्धि समुदायिक अर्थ; मनुष्यक जन्माधारित अशुद्धता समान गरिमाक प्रत्यक्ष विरोध। एहि तीनूकें एक कहला सँ भेदभाव स्वास्थ्य वा धर्मक भाषा मे बचि जाइत अछि। कोनो पेशा गन्दा परिस्थिति सँ जुड़ल हो सकैत, मुदा कार्यकर्ता गन्दा मनुष्य नहि। सुरक्षित उपकरण, उचित वेतन आ कामक विभाजन चाही; जन्मसँ पेशा बाँधब दोहरा अन्याय अछि। परम्पराक आन्तरिक पुनर्व्याख्या उपयोगी, मुदा पीड़ितकें सुधारक प्रतीक्षा करबाक बाध्यता नहि। कानून, सार्वजनिक सेवा आ सामाजिक शिक्षा एक संग चलय। 43.12 जाति आ स्थान आवासक अलगाव विद्यालय, जल, सड़क, बाजार आ सामाजिक नेटवर्कक पहुँच प्रभावित करैत अछि। नक्शापर दूरी छोट होइतहुँ सामाजिक सीमा कठोर भऽ सकैत अछि। स्थान पदानुक्रमक भौतिक रूप बनैत अछि। केवल आय बढ़ला पर अलगाव समाप्त होयत जरूरी नहि। भूमि-अधिकार, किराया-भेदभाव, सार्वजनिक निवेश आ हिंसाक भय जाँचल जाए। गाम आ नगरमे संरचना भिन्न हो सकैत अछि। स्थानिक अध्ययन नक्शा, जनसाक्ष्य आ सेवा-आँकड़ा जोड़य। निजी घरक गोपनीयता बनौने रखितो सार्वजनिक सुविधामे समान पहुँच सुनिश्चित हो। 43.13 प्रतिदिनक भेदभावक प्रमाण सूक्ष्म अपमान अलग-अलग देखला पर मामूली लगि सकैत, मुदा लगातार दोहराव शिक्षा, स्वास्थ्य आ आत्मविश्वासपर संचयी प्रभाव दैत अछि। प्रमाण एक घटना मात्र नहि; व्यवहारक नमूना, संस्थाक प्रतिक्रिया आ परिणाम देखय। प्रत्येक अप्रिय व्यवहार जातिगत कारणसँ भेल--एहन अनुमान सेहो सावधानी माँगैत अछि। तुलनात्मक स्थिति, कथित शब्द, नियमक असमान लागूकरण आ अन्य साक्षी जाँचल जाए। पीड़ितक कथन आरम्भिक प्रमुख प्रमाण अछि, अन्तिम एकमात्र प्रमाण नहि। शिकायत-प्रणाली प्रमाण नष्ट होयब सँ पहिने सुरक्षित अभिलेखन दे, प्रतिशोध रोके, आ निर्णयक कारण बताबय। मौन शिकायतक अभावक प्रमाण नहि, जँ शिकायत महेँगी हो। 43.14 पूर्वपक्ष: आधुनिकतामे जाति स्वतः समाप्त होयत शहरीकरण, शिक्षा आ बाजार पुरान पेशागत सीमा ढीली करि सकैत अछि; तँ कहल जाइत अछि जे विशेष सुधारक आवश्यकता नहि, समय अपने समाधान देत। मुदा विवाह, नेटवर्क, राजनीति आ आवासमे जाति नूतन रूप AS सकैत अछि। बाजार स्वयं भेदभाव नकारैत नहि; परिचय-आधारित भर्ती ओकरा दोहरा सकैत अछि। परिवर्तनक दिशा क्षेत्र आ वर्ग अनुसार अलग होयत। नीति अनुमानपर नहि, परिणामपर आधारित Stl जहाँ बाधा घटल अछि ओहि प्रक्रियासँ सीखल जाए; जहाँ टिकि रहल, लक्षित अधिकार आ प्रतिनिधित्व जारी रहय। 43.6 जातिक परिभाषामे सावधानी जातिकें केवल पेशा, केवल वर्ण, केवल विवाह-समूह वा केवल धार्मिक धारणा Hes अधूरा अछि। स्थानीय समुदाय, अन्तर्विवाह, श्रम-विभाजन, शुद्धि-अशुद्धि, दर्जा, भूमि आ राजनीतिक शक्ति भिन्न प्रसंगमे अलग भूमिका रखैत अछि। एक क्षेत्रक नमूना सम्पूर्ण उपमहाद्वीपपर आरोपित नहि कएल जाए। तुलनात्मक अध्ययन समान संरचना खोजय, मुदा स्थानीय नाम, इतिहास आ परिवर्तन सुरक्षित राखय। परिभाषाक बहुआयामिता अस्पष्टता नहि, प्रमाणक अनुरूपता अछि। 43.7 अन्तर्विवाह आ पुनरुत्पादन सामाजिक पदानुक्रम केवल विचारसँ नहि टिकैत; विवाह, उत्तराधिकार, भोजन, आवास आ नेटवर्कक नियम ओकरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी पुनरुत्पादित Hed अछि। अन्तर्विवाह सम्पत्ति, सम्बन्ध आ दर्जाके समूह भीतर राखबाक साधन बनि सकैत अछि। व्यक्तिगत विवाह निर्णयक स्वतंत्रता वास्तविक सामाजिक दण्डसँ सीमित हो सकैत अछि। कानून आवश्यक सुरक्षा दैत, मुदा परिवार, रोजगार आ निवासक दबाव सेहो जाँचल जाए। परिवर्तनक माप औपचारिक अनुमति मात्र नहि। 43.8 ज्ञान आ जातिगत सत्ता कोन समूह पढ़त, लिखत, व्याख्या करत आ प्रमाणित ज्ञानक रक्षक बनत--ई प्रश्‍न जातिगत सत्ता सँ जुड़ि सकैत अछि। ज्ञानपर पहुँच सीमित भेला सँ बहिष्कार केवल रोजगार नहि, आत्मवर्णनक अधिकार सेहो छीनैत अछि। हाशियाक अनुभव महत्त्वपूर्ण प्रमाण अछि, मुदा अनुभव मात्रसँ सभ सामान्य निष्कर्ष सिद्ध नहि। व्यक्तिगत साक्ष्य, संस्थागत आँकड़ा, इतिहास आ तुलनात्मक अध्ययन जोड़ल जाए। ज्ञानात्मक न्याय अनुभवे सुनैत अछि आ जाँचसँ मुक्त नहि करैत। 43.9 सुधार, प्रतिनिधित्व आ सत्ता ऊपरसँ सुधार कानून बदलि सकैत, मुदा प्रभावित समुदायक संगठन बिना व्यवहार धीरे बदलैत अछि। प्रतिनिधित्व आवाज दैत अछि, तथापि एक व्यक्ति पूरा समूहक अनुभवक एकमात्र प्रवक्ता नहि। भीतरक वर्ग, लिंग आ क्षेत्रीय अन्तर बने रहैत अछि। उचित सुधार अधिकार, सुरक्षा, शिक्षा, आर्थिक साधन आ सार्वजनिक सम्मान संयुक्त करय। प्रतीकात्मक मान्यता उपयोगी, मुदा संसाधन-वितरणक स्थान नहि लय। परिणामक स्वतंत्र समीक्षा आवश्यक अछि। 43.10 गरिमा आ बन्धुत्व कानूनी समानता बिना सामाजिक बन्धुत्व कमजोर, कारण प्रतिदिनक अपमान नागरिककें समान समुदायसँ बाहर राखैत अछि। बन्धुत्व भावुक एकरूपता नहि; सार्वजनिक संस्थामे परस्पर समान दर्जा स्वीकारब अछि। गरिमा जन्म, पेशा वा शुद्धिक मान्यतासँ पूर्ववर्ती अछि। जे प्रथा मनुष्यकें स्पर्श, भोजन, निवास वा विवाहक आधारपर निम्न दर्जा दैत अछि, ओकर औचित्य परम्परा मात्रसँ नहि बचि सकैत। अध्याय-निष्कर्ष जाति-विमर्श समानताक निर्णायक परीक्षा अछि। जे समाज जन्मकेँ दर्जा बनबैत अछि, ओ गरिमा-सिद्धान्तक विरोधमे अछि। समानान्तर दर्शन जन्म-आधारित पदानुक्रमक नैतिक अस्वीकृति करैत अछि। अध्याय-ग्रन्थसूचौ B. R. Ambedkar — Annihilation of Caste; Who Were the Shudras?; The Untouchables. Jyotirao Phule — Gulamgiri. Gail Omvedt — Dalits and the Democratic Revolution. Eleanor Zelliot — From Untouchable to Dalit.