ach एक परिभाषामे बाँधब कठिन अछि। विश्वास? अनुष्ठान? नैतिकता? समुदाय? मुक्तिक मार्ग? पवित्र अनुभव? जीवन-पद्धति? प्रत्येक परम्परा एहि तत्त्वसभकेँ अलग अनुपातमे रखैत अछि। तेँ धर्म-दर्शनक पहिल काम “धर्म” शब्दक बहुवचनता स्वीकारब अछि। 50.1 परिभाषाक कठिनाई पाश्चात्य आधुनिक “religion” शब्दक इतिहास आ भारतीय “धर्म”क अर्थक्षेत्र पूर्णतः समान नहि। धर्म कर्तव्य, नैतिक व्यवस्था, जीवन-पथ, गुण, धार्मिक परम्परा वा सामाजिक नियमक अर्थ लऽ सकैत अछि। बौद्ध धम्म, जैन धर्म, वैदिक धर्म, भक्ति-परम्परा आ आधुनिक संस्थागत धर्मक संरचना एक नहि। अनुवाद एतय दार्शनिक निर्णय अछि। 50.2 विश्वास केन्द्रित परिभाषाक सीमा किछु धर्ममे ईश्वर-विश्वास केंद्रीय, मुदा बौद्ध वा जैन परम्पराकें ईश्वर-विश्वासक कसौटीसँ परिभाषित करब असंगत। तेँ धर्म = ईश्वर-विश्वास पर्याप्त परिभाषा नहि। 50.3 अनुष्ठान आ समुदाय धर्म सामूहिक अनुष्ठान, Ud, भोजन, शोक, विवाह, तीर्थ, संगीत, कथा आ संस्थासँ व्यक्त होइत अछि। एतय धर्म केवल सिद्धान्त नहि; सामाजिक अभ्यास अछि। मुदा सामाजिक अभ्यास प्राचीन अछि ताहि कारण स्वतः नैतिक नहि। प्रत्येक प्रथा गरिमा आ न्यायक कसौटी पर जाँचल जा सकैत अछि। 50.4 अनुभव धार्मिक अनुभव व्यक्ति लेल गम्भीर, रूपान्तरणकारी आ अर्थपूर्ण भऽ सकैत अछि। दर्शन ओकर अनुभवात्मक सत्यताकें सम्मान दऽ सकैत अछि, मुदा अनुभवसँ सार्वभौम तत्त्वमीमांसक निष्कर्ष स्वतः नहि निकलैत। अलग परम्पराक अनुभव परस्पर भिन्न दाबी करैत हो तँ अतिरिक्त तर्क आवश्यक। 50.5 धर्म आ नैतिकता धर्म नैतिक प्रेरणा दऽ सकैत अछि--करुणा, सेवा, सत्य, संयम। मुदा “धर्म कहैत अछि” मात्र सार्वजनिक नेतिक औचित्यक अन्तिम उत्तर नहि, विशेषतः बहुल समाजमे। यदि धार्मिक नियम ककरो समान गरिमा नकारैत अछि तँ आलोचनाक अधिकार रहत। 50.6 धर्म आ पहिचान धार्मिक पहिचान व्यक्ति आ समुदाय लेल भाषा, स्मृति आ सम्बन्धक स्रोत हो सकैत अछि। मुदा व्यक्ति अपन परम्पराक भीतर असहमत, सुधारवादी, धर्म-परिवर्तित वा अधार्मिक हो सकैत अछि। तें धार्मिक समुदायक अधिकार व्यक्तिक अन्तःकरणक स्वतंत्रताके समाप्त नहि करय। 50.7 धर्मक तीन स्तर समानान्तर दर्शन धर्म-विमर्शमे तीन स्तर अलग करबाक प्रस्ताव करैत अछि: व्यक्तिगत आस्था; सामुदायिक धार्मिक जीवन; राज्यक सार्वजनिक विधि। व्यक्तिगत आस्था व्यापक स्वतंत्रता पाबय, सामुदायिक जीवन समान अधिकारक अधीन रहय, राज्य कोनो एक धार्मिक Geach नागरिकताक शर्त नहि बनाबय। पूर्वपक्षः धर्म पर तर्क लगायब आस्थाक अपमान अछि। उत्तरपक्षः आस्थाक स्वतंत्रता सम्माननीय अछि; मुदा जखन धार्मिक दावा सार्वजनिक बाध्यता, शिक्षा, कानून, सम्पत्ति वा दोसर व्यक्तिक अधिकार प्रभावित करैत अछि, तखन सार्वजनिक कारण आवश्यक। प्रश्‍न अपमान नहि, सहअस्तित्वक शर्त अछि। समानान्तर दर्शनक संवाद धर्म न पूर्णतः निजी, न पूर्णतः राज्यीय। एकर नैतिक शक्ति आ दमनकारी सम्भावना दुनू इतिहासमे देखाइत अछि। विवेकपूर्ण बहुलता धर्मक स्वतंत्रता आ मानव-गरिमा दुनू सुरक्षित करबाक प्रयास अछि। 50.13 धर्म, जादू आ विज्ञानक सीमा धर्म, जादू आ विज्ञानकें एक सरल विकासक्रममे "निम्नसँ उच्च? रखब इतिहासक विविधता घटबैत अछि। एकहि समाजमे अनुष्ठानिक अर्थ, तकनीकी ज्ञान आ कारण सम्बन्धी विश्वास सहअस्तित्वमे रहि सकैत अछि। अनुभवजन्य दाबी-औषधि रोग घटबैत अछि की नहि-वैज्ञानिक परीक्षण माँगैत। जीवनक शोक-अर्थ वा समुदायिक स्मृति प्रयोगशाला प्रश्‍न नहि। क्षेत्र अलग करब अपमान नहि, उपयुक्त प्रमाण चुनब अछि। जादुई कारणक नामपर हानि, ठगी वा उपचार-विलम्ब हो तखन आलोचना आवश्यक। धार्मिक स्वतंत्रता दोसरक जीवनपर प्रमाणविहीन अधिकार नहि। 50.14 मिथक आ सत्यक प्रकार मिथक समुदायक उत्पत्ति, मूल्य आ विश्व-स्थानक कथा दैत अछि। ओकर अर्थ इतिहासक तिथि-सूची नहि हो सकैत। प्रतीकात्मक सत्य मानवीय अनुभव खोलि सकैत अछि, यद्यपि शाब्दिक घटना प्रमाणित नहि। मिथककें पूर्ण झूठ Hed साहित्यिक-धार्मिक कार्य नहि बुझब; ओकरा इतिहास कहब प्रमाण-वर्ग भ्रम। पाठक स्पष्ट करय जे ओ कथाक सांस्कृतिक अर्थ विवेचित करेत अछि वा घटना-दाबी। मिथक सत्ता सेहो वैध ठहरा सकैत अछि। ककर उत्पत्ति गौरवशाली, ककर सेवा प्राकृतिक-एहन कथाक नैतिक परीक्षा चाही। 50.15 धर्मक अर्थशास्त्र मन्दिर, मठ, तीर्थ, दान आ उत्सव संसाधन, श्रम आ प्रतिष्ठा वितरण करैत अछि। धार्मिक संस्था केवल विचारक समूह नहि, आर्थिक अभिकर्ता सेहो हो सकैत अछि। दान स्वैच्छिक करुणा भऽ सकैत, मुदा सामाजिक दबाव वा अपारदर्शी उपयोग शोषण बनि सकैत। लेखा, संपत्ति-प्रबन्ध आ सेवा-वितरणक सार्वजनिक मानक संस्था अनुसार बनाओल जाए। आर्थिक विश्लेषण आस्था केँ लाभ-गणना मे घटबैत नहि। ओ केवल देखबैत अछि जे पवित्र उद्देश्य व्यवहारिक संसाधन-सत्ता सँ जुल अछि। 50.16 पूर्वपक्षः धर्म निजी मामला मात्र अछि विश्वास अन्तःकरणक विषय अछि; तेँ धर्मकें पूर्ण निजी रखबाक प्रस्ताव संघर्ष घटाबय जकाँ लगैत अछि। मुदा पर्व, संस्था, विवाह, शिक्षा आ सेवा सार्वजनिक प्रभाव रखैत अछि। राज्य अन्तःकरण नियंत्रित नहि करय, मुदा अधिकार प्रभावित करनिहार आचरणपर समान कानून लागू करय। धार्मिक नागरिक सार्वजनिक बहसमे भाग लेथि; बाध्यकारी कारण साझा भाषा मे सेहो प्रस्तुत हो। निजी-सार्वजनिक सीमा स्थिर नहि, मुदा अस्पष्टता असीम हस्तक्षेपक अनुमति सेहो नहि। स्पष्ट हानि आ अधिकार कसौटी हो। 50.8 धर्मक परिभाषाक कठिनाई ईश्वर-विश्वासकें धर्मक अनिवार्य लक्षण मानलासँ अनीश्वरवादी वा भिन्न केन्द्रवला परम्परा छुटि जाइत। अनुष्ठान, समुदाय, कथा, नैतिकता, मुक्ति, पवित्रता आ जीवन-रूप-धर्मक विभिन्न आयाम छथि। एकटा लक्षण सभ उदाहरण पकड़ि नहि सकैत। बहुआयामी परिभाषा अस्पष्ट सूची नहि हो; प्रसंग अनुसार बताओल जाए जे कानून, इतिहास वा दर्शनमे कोन आयाम प्रासंगिक अछि। आत्मपहिचान महत्त्वपूर्ण, मुदा संस्था ककर अधिकार प्रभावित करेत अछि से सार्वजनिक जाँच योग्य। 50.9 पवित्र आ सामान्य समुदाय किछु स्थान, समय, वस्तु वा कथा कें विशेष आदर दैत अछि। पवित्रताक अनुभव अर्थ, अनुशासन आ सामूहिक स्मृति बनबैत अछि। एकरा केवल अज्ञान कहब अनुभवक सामाजिक शक्ति नहि बुझब। मुदा पवित्र दाबी सार्वजनिक आलोचनासँ पूर्ण मुक्त नहि, विशेषतः जखन प्रवेश, भूमि वा नागरिक अधिकार प्रभावित हो। सम्मानक अर्थ प्रश्न निषिद्ध करब नहि; संवादक भाषा अपमानरहित हो। 50.10 अनुष्ठानक दार्शनिक अर्थ अनुष्ठान विश्वासक बाहरी अभिनय मात्र नहि। दोहराओल क्रिया स्मृति, देह, समय आ समुदायक सम्बन्ध बनबैत अछि। सहभागी एकहि अनुष्ठानकें भिन्न ALS जीबि सकैत छथि। प्रथाक अस्तित्व ओकर सत्य-दाबी वा नैतिक औचित्य स्वतः सिद्ध नहि। अनुष्ठान ककरा सम्मिलित, ककरा बहिष्कृत, कोन श्रम Alita, आ परिवर्तनक अनुमति दैत की नहि--ई प्रश्‍न समाज-दर्शनक विषय छथि। 50.11 धर्म आ अर्थक संकट मृत्यु, दुःख, आकस्मिक हानि आ जीवनक उद्देश्यक प्रश्‍नमे धर्म कथा, समुदाय आ अभ्यास दैत अछि। एहि अस्तित्वगत कार्यकें तथ्यगत प्रमाणसँ पूर्ण मापल नहि जा सकैत। सान्त्वना दाबीकें सत्य सिद्ध नहि करैत, मुदा मानवीय मूल्य शून्य सेहो नहि। दर्शन तथ्य, अस्तित्वगत अर्थ आ नेतिक परिणाम अलग करि फेर सम्बन्धित करत। झूठा आश्वासन आ करुणामय साथ बीच भेद आवश्यक। 50.12 धर्मक भीतर आलोचना धार्मिक परम्परा केवल बाहरी आलोचनासँ नहि बदलैत; भक्त, संत, दार्शनिक आ सामाजिक आन्दोलन भीतरसँ शास्त्र, संस्था आ आचरणक पुनर्व्याख्या करैत छथि। आन्तरिक भाषा परिवर्तनक वैधता बढ़ा सकैत अछि। मुदा “भीतरक मामला” कहि पीड़ितक अधिकार रोकल नहि जाए। आन्तरिक सुधार आ सार्वभौम गरिमा-दृष्टि संवाद करय। ककर आवाज परम्पराक प्रतिनिधि मानल जाइत अछि से सेहो सत्ता-प्रश्‍न अछि। अध्याय-निष्कर्ष धर्म एक बहुस्तरीय मानवीय घटना अछि--विश्वास, अभ्यास, समुदाय, अनुभव, नैतिकता आ मुक्तिक कल्पना। कोनो एक परिभाषा सभ परम्पराकें पूरा नहि समेटैत। आगाँक अध्याय ईश्वर, आस्था, दुःख, कर्म, बहुलता आ धर्म-राज्य सम्बन्धक विशिष्ट प्रश्‍न खोलत।