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ईश्वरक प्रश्न धर्म-दर्शनक सबसँ पुरान आ Gag जीवित प्रश्नसभमे एक अछि। मुदा “ईश्वर अछि की नहि?”
एकटा मात्र प्रश्न नहि। पहिने स्पष्ट करब आवश्यक अछि--ईश्वरसँ की अभिप्राय? सृष्टिकर्ता? सर्वज्ञ आ
सर्वशक्तिमान नैतिक सत्ता? जगतक निमित्त कारण? ब्रह्म-जकाँ निरुपाधिक परम वास्तविकता? व्यक्तिगत
आराध्य? अथवा धार्मिक अनुभवक प्रतीकात्मक केन्द्र? अलग परम्परा “ईश्वर” शब्दक भिन्न अर्थ ग्रहण करैत
अछि; तेँ तर्क सेहो अर्थानुसार बदलैत अछि।
51.1 ईश्वर-धारणाक बहुलता
भारतीय दर्शनमे ईश्वर-विषयक मत एकरूप नहि। न्याय-वैशेषिक परम्पराक उत्तरवर्ती आचार्य, विशेषतः उदयन,
ईश्वरक अस्तित्वक पक्षमे अनुमानात्मक तर्क विकसित करेत छथि। सांख्यक शास्त्रीय रूप प्रकृति आ पुरुषक
तत्त्वद्वारा जगत-व्याख्या Hea अछि आ सृष्टिकर्ता Such अनिवार्य नहि मानैत। पूर्वमीमांसा वेदक प्रामाण्यक
रक्षा ईश्वर-लेखकक आवश्यकता बिना करबाक प्रयास करैत अछि। बौद दर्शनक प्रमुख धारासभ सृष्टिकर्ता
ईश्वरक आवश्यकता स्वीकार नहि करैत अछि। वेदान्तक भीतर सेहो ब्रह्म, ईश्वर, जगत आ जीवक सम्बन्धपर
गम्भीर मतभेद अछि।
एहि विविधतासँ पहिल शिक्षा ई भेटैत अछि जे “भारतीय दर्शन ईश्चरवादी अछि” अथवा “भारतीय दर्शन
नास्तिक अछि”-दुनू अतिसरलीकरण अछि। सही पद्धति परम्परा-विशिष्ट प्रश्न पूछब अछि।
51.2 कारणस ईश्वर धरि
ईश्वरक पक्षमे एक सामान्य तर्क कारणता पर आधारित अछि: जगत परिवर्तनशील, संयोजित अथवा आश्रित
अछि; तँ ओकर कोनो पर्याप्त कारण होयबाक Tet! न्यायीय परम्परामे जगतकें कार्य मानि कऽ बुद्धिमान
कर्ताक अनुमानक विभिन्न रूप विकसित भेल। पाश्चात्य दर्शनमे ब्रह्माण्डीय तर्कक कई रूप भेटैत अछि
प्रथम कारण, आवश्यक सत्ता, पर्याप्त कारण आदि।
मुदा आपत्ति तुरन्त उठैत अछि: यदि सभ वस्तुक कारण चाही, तँ ईश्वरक कारण की? उत्तरमे ईश्वरवादी प्रायः
कहैत छथि जे तर्क “सभ वस्तुक कारण” नहि, बल्कि “जे उत्पन्न, आश्रित अथवा सम्भाव्य अछि ओकर
कारण” पर आधारित अछि। एहि उत्तरसँ समस्या समाप्त नहि होइत; प्रश्न रहैत अछि--जगत स्वयं आवश्यक
किएक नहि हो सकैत? कारण-श्रृंखला अनन्त किएक नहि? कारणताक सिद्धान्तकें सम्पूर्ण ब्रह्माण्डपर लागू
करब उचित अछि की नहि?
समानान्तर दर्शन एहि तर्कके न उपहाससँ हटबैत अछि, न तुरन्त निणयक मानेत अछि। तर्कक प्रत्येक कड़ी
अलग जाँचल जएबाक चाही।
51.3 व्यवस्था, उद्देश्य आ बुद्धिमत्ता
जगतमे क्रम, गणितीय संरचना, जैविक जटिलता अथवा जीवन-अनुकूल परिस्थिति देखि बुद्धिमान नियोजकक
अनुमान कएल जाइत रहल अछि। एहि तर्कक शक्ति एतय अछि जे ओ जगतक बोधगम्यता आ संरचनाकें
प्रशन बनबैत अछि। मुदा प्राकृतिक चयन, स्व-संगठन, भौतिक नियम आ विशाल ब्रह्माण्डीय परिमाण जटिलता-
विषयक अनेक घटनाक प्राकृतिक व्याख्या दैत अछि।
दार्शनिक प्रश्न तेँ “जटिलता = ईश्वर” जकाँ सरल नहि। प्रश्न अछि--प्राकृतिक व्याख्या उपलब्ध भेला परो
अंतिम नियमक अस्तित्व वा बोधगम्यता अतिरिक्त व्याख्या माँगैत अछि की नहि? ईश्चरवादी आ नैसर्गिकवादी
एहि बिन्दुपर अलग होइत छथि।
51.4 नैतिक तर्क
किछु विचारक वस्तुगत नेतिक मूल्य वा कर्तव्यें ईश्वरक अस्तित्वसँ जोडत छथि। यदि वास्तवमे किछु कर्म
केवल पसन्दक प्रश्न नहि बल्कि वस्तुगत SUS अनुचित अछि, तँ ओकर अंतिम आधार की? ईश्वरवादी उत्तर
दऽ सकैत छथि-पूर्ण शुभ दिव्य प्रकृति।
आपत्तिः यदि कोनो कर्म केवल इश्वर आज्ञा दैत छथि तँ उचित अछि, तँ नैतिकता मनमाना भऽ सकैत अछि;
यदि ईश्वर उचित वस्तुकें कारण ओ स्वतन्त्र STS उचित अछि Ff आज्ञा दैत छथि, तेँ नेतिकताक आधार ईश्वरसँ
पृथक बुझाइत अछि। ई प्राचीन द्विविधा धार्मिक नैतिकताक गम्भीर समस्या अछि।
समानान्तर दर्शन एतय मनुष्यक समान गरिमाकें सार्वजनिक नैतिक कसौटी मानैत अछि। धार्मिक नैतिकता
प्रेरणा दऽ सकैत अछि, मुदा नागरिकक अधिकारक औचित्य केवल सम्प्रदाय-विशिष्ट आज्ञापर निर्भर नहि रहि
सकैत अछि।
51.5 धार्मिक अनुभव
प्रार्थना, ध्यान, भक्ति, रहस्यमय एकत्व, पवित्रताक अनुभूति--अनेक व्यक्ति एहि अनुभवे ईश्वरक प्रमाण
मानेत छथि। अनुभवकें सीधा भ्रम कहि देब अनुचित, कारण अनुभव वास्तविक मानवीय घटना अछि। मुदा
अनुभवक व्याख्या विवादित अछि। अलग धर्मक साधक भिन्न परम सत्ता वा सत्यक अनुभूति बतबैत छथि।
मनोवैज्ञानिक, सामाजिक आ तन्त्रिका-विज्ञानात्मक व्याख्या सेहो सम्भव अछि।
तँ अनुभव “व्यक्तिक लेल कारण” आ “सभक लेल सार्वजनिक प्रमाण” बीच भेद माँगैत अछि। जे अनुभव
जीवन बदलि दे, से व्यक्ति लेल अत्यन्त शक्तिशाली हो सकैत अछि; मुदा सार्वभौम निष्कर्ष लेल अतिरिक्त
तर्क आवश्यक अछि।
51.6 ईश्वरक विरुद्ध तर्क
ईश्वर-विरोधी पक्षक प्रमुख आधारसभमे अशुभक समस्या, दिव्य गुप्तता, धार्मिक असहमति, प्राकृतिक
पर्याप्तता आ अवधारणात्मक कठिनाई शामिल अछि। जें पूर्ण प्रेममय ईश्वर छथि, तँ ईमानदार खोजी किएक
गम्भीर अनिश्चिततामे रहैत छथि? जँ ईश्वर सर्वज्ञ छथि, मानव स्वतंत्रता कोना? जँ सर्वशक्तिमान छथि,
सर्वशक्तिमत्ताक अर्थ की?
एहि आपत्तिसभक अलग-अलग उत्तर देल गेल अछि; कोनो एक उत्तर सभ परम्परापर लागू नहि। धर्म-दर्शनक
जिम्मेवारी एहि विवादकै ओकर सबलतम रूपमे प्रस्तुत करब अछि।
पूर्वपक्षः ईश्वरक प्रश्न विज्ञानसँ समाप्त भऽ गेल
एहि मतक अनुसार प्राकृतिक घटनाक वैज्ञानिक व्याख्या बढ़ला सँ इश्वःक आवश्यकता समाप्त भऽ जाइत
अछि।
उत्तरपक्षः प्रश््नक स्तर अलग अछि
किछु “रिक्त स्थानक ईश्वर” तर्क विज्ञानक प्रगतिक संग कमजोर पड़ैत अछि। मुदा ईश्वरक दार्शनिक प्रश्न
केवल कोन भौतिक प्रक्रिया घटना उत्पन्न करैत अछि, एतबे नहि; अस्तित्व, कारणता, मूल्य, चेतना आ अंतिम
व्याख्याक प्रश्न सेहो छुबैत अछि। एहिना, दार्शनिक प्रश्न रहला मात्रसँ ईश्वर सिद्ध सेहो नहि होइत छथि। विज्ञान
आ तत्त्वमीमांसा अलग स्तरपर संवाद करैत अछि।
समानान्तर दर्शनक स्थिति
ईश्वरक प्रश्नकें न AS उपहाससँ समाप्त कएल जा सकैत अछि, न भय सँ। आस्तिक, नास्तिक आ अज्ञेय-
तीनू स्थितिक दार्शनिक सम्मान तखन अछि जखन ओ अपन कारण स्पष्ट करय, प्रतिपक्ष सुनय आ
अनिश्चितताके ईमानदारीसँ स्वीकार करय।
51.12 ईश्वरक गुणसभक परस्पर संगति
सर्वशक्तिमत्ता, सर्वज्ञता, पूर्ण करुणा, कालातीतता आ व्यक्तिपरक सम्बन्ध-ई गुण अलग-अलग आकर्षक,
मुदा संयुक्त रूपमे प्रश्न उठबैत अछि। जँ भविष्य पूर्ण ज्ञात, मानवीय स्वतंत्रता कोना? जँ ईश्वर कालातीत,
प्रार्थनाक उत्तर समयमे कोना?
परम्परासभ शक्ति ch तार्किक सम्भाव्य काज धरि सीमित, ज्ञानक कालातीत बोध वा सम्बन्धकें रूपक रूपमे
बुझा सकैत अछि। प्रत्येक समाधान मूल अवधारणा बदलैत अछि की स्पष्ट करैत--ई जाँचल जाए।
विरोध देखाबयवला आलोचक गुणक सबल दार्शनिक व्याख्या ग्रहण करय। आस्तिक व्याख्याकार समाधानक
लागत स्वीकारय।
51.13 प्रार्थना आ कारण
प्रार्थना निवेदन, कृतज्ञता, ध्यान, सामूहिक स्मृति वा आत्मपरिवर्तन भऽ सकैत अछि। सभ प्रार्थनाक मूल्य
बाहरी चमत्कारिक परिणामपर निर्भर नहि।
विशिष्ट रोग वा घटनापर प्रभावक अनुभवजन्य दाबी परीक्षण माँगैत अछि। सफलता याद आ विफलता
विसरबाक पक्षपात सम्भव। प्रार्थना उपचारक स्थान नहि लय।
दार्शनिक रूपसँ प्रश्न अछि: अपरिवर्तनशील ईश्वर निवेदनसँ निर्णय बदलैत छथि की प्रार्थना मनुष्यकें दैवी
इच्छासँ जोड़ैत? भिन्न धर्मशास्त्रीय उत्तर अलग प्रतिज्ञा रखैत अछि।
51.14 नास्तिकताक अनेक रूप
नास्तिकता कखनो इश्वर-अस्तित्वक नकार, कखनो पर्याप्त प्रमाणक अभाव, कखनो विशिष्ट sae
अवधारणाक अस्वीकार। सभ नास्तिक समान तत्त्वमीमांसा वा नैतिकता नहि मानैत।
आस्तिकताक आलोचना स्वतः भौतिकवाद सिद्ध नहि Hea तत्त्वमीमांसात्मक विकल्पक स्वतंत्र तर्क चाही।
तहिना धार्मिक संस्थाक दोष ईश्वर-अस्तित्वक सीधा खण्डन नहि, यद्यपि नैतिक विश्वसनीयता प्रभावित करि
सकैत।
संवादमे “अविश्वासी' वा 'अन्धविश्वासी”क लेबल तर्कक स्थान नहि लय। दाबी विशिष्ट कएल जाए।
51.15 पूर्वपक्ष: इश्वरक प्रश्न निर्णयातीत अछि
कहल जाइत अछि जे ईश्वर अनुभवक पार छथि, अतः समर्थन वा खण्डन दुनू असम्भव; बहस निरर्थक। किछु
अवधारणाक लेल ई आपत्ति बलवान, विशेषतः जँ कोनो सम्भावित प्रमाण दाबी बदलि नहि सकैत।
मुदा धार्मिक दाबी जगत, नैतिकता वा अनुभव सम्बन्धी परिणाम रखैत हो तँ आंशिक परीक्षा सम्भव।
अवधारणात्मक संगति सेहो अनुभव बिना जाँचल जा सकैत अछि।
अन्तिम निर्णय सीमित रहि सकैत अछि। "निर्णायक प्रमाण नहि’ आ "सभ मत समान” एक बात नहि।
विश्वासक स्तर कारण अनुसार हो।
51.7 अवधारणा स्पष्ट किए बिना प्रमाण नहि
ईश्वर अछि” दाबी जाँचबाक पहिने ईश्वरक अर्थ स्पष्ट हो: व्यक्तिपरक स्रष्टा, आवश्यक सत्ता, विश्वक आधार,
नेतिक विधाता, सर्वव्यापी चेतना, अथवा उपास्य देवता? भिन्न अवधारणापर एकहि तर्क लागू नहि होइत।
कियो कारण-तर्कसँ प्रथम आधार धरि पहुँचि सकैत अछि, मुदा ओहि आधारसँ सर्वज्ञ, करुणामय आ विशिष्ट
धार्मिक गुण धरि अतिरिक्त तर्क चाही। निष्कर्षक सीमा मानब प्रमाण-विवेचनक ईमानदारी अछि।
51.8 ब्रह्माण्डीय तर्कक रूप
ब्रह्माण्डीय तर्क परिवर्तन, कारण, सम्भाव्यता वा निर्भर अस्तित्वसँ एहन आधार दिस बढ़त अछि जे स्वयं
परनिर्भर नहि। सभ रूप एक नहि; “सभ वस्तुक कारण अछि” कहि तुरन्त ईश्वर कारणविहीन? कहब तर्कक
सबल रूप नहि।
मुख्य प्रश्न ई जे निर्भर वस्तुसभक सम्पूर्णता स्वतंत्र व्याख्या Alta अछि की नहि, अनन्त श्रृंखला पर्याप्त हो
सकैत अछि की नहि, आ आवश्यक सत्ता अवधारणात्मक SUS संगत अछि की नहि। प्रतिपक्षके सरल उपहास
नहि, प्रतिज्ञा-दर-प्रतिज्ञा उत्तर चाही।
51.9 व्यवस्था आ सूक्ष्म-सामंजस्य
प्रकृतिक नियमबद्धता आ जीवन-अनुकूल शर्तसँ उद्देश्यपूर्ण व्यवस्था अनुमानित कएल जाइत अछि। आलोचना
प्राकृतिक चयन, बहु-ब्रह्माण्डक सम्भावना, चयन-प्रभाव वा अज्ञात भौतिक व्याख्या प्रस्तुत करि सकैत अछि।
एतय विज्ञानक अपूर्णता ईश्वरक सीधा प्रमाण नहि। "एखन नहि जानैत SPS कोनो विशिष्ट उत्तर नहि निकलैत।
तथापि जगतक व्याख्येयता तत्त्वमीमांसात्मक विस्मयक वैध विषय रहैत अछि, जँ वैज्ञानिक रिक्तिस्थान
भरबाक दावा नहि कएल जाए।
51.10 धार्मिक अनुभव
रहस्यात्मक एकता, प्रार्थनाक प्रत्युत्तर, उपस्थिति वा रूपान्तरणक अनुभव विश्वासक शक्तिशाली आधार भऽ
सकैत अछि। अनुभव व्यक्तिक जीवन बदलैत अछि, मुदा व्याख्या भाषा, परम्परा आ अपेक्षासँ प्रभावित होइत
अछि।
भिन्न धर्मक विरोधी व्याख्या सार्वजनिक निष्कर्ष कठिन बनबैत अछि। अनुभवे झूठ कहि खारिज नहि, न
स्वतः सार्वभौम प्रमाण। स्थायित्व, नैतिक फल, मानसिक अवस्था आ वैकल्पिक कारण सावधानीसँ जाँचल
जाए।
51.11 ईश्वरक मौन
जँ करुणामय ईश्वर मनुष्यसँ सम्बन्ध चाहैत छथि, तँ ईमानदार खोजकतकिं पर्याप्त संकेत किएक नहि भेटैत?
दैवी छिपावक समस्या अशुभसँ अलग अछि; एतय पीड़ा नहि, सम्बन्धक अस्पष्टता केन्द्रमे अछि।
उत्तर स्वतंत्रता, आध्यात्मिक विकास वा अप्रत्यक्ष उपस्थितिपर बल दऽ सकैत अछि। आलोचना पूछत जे ई
उत्तर अनिच्छित अविश्वासक वास्तविकता पर्याप्त बुझबैत अछि की नहि। सीमा स्वीकारब आस्तिक आ
नास्तिक दुनू लेल उचित अछि।
अध्याय-निष्कर्ष
ईश्वर-विमर्श एकटा हाँ/नहि मतदान नहि, बल्कि कारणता, नैतिकता, अनुभव, दुःख, स्वतंत्रता आ व्याख्याक
बहुस्तरीय दार्शनिक क्षेत्र अछि। समानान्तर दर्शन ईश्वरवादकें विशेषाधिकार नहि दैत, न नास्तिकताकें स्वतः
बुद्धिवादी विजय मानैत अछि। समान प्रमाण-कसौटी, सबल प्रतिपक्ष आ गरिमापूर्ण संवाद एहि अध्यायक मूल
पद्धति अछि।
अध्याय-ग्रन्थसूचौ
उदयनाचार्य — Nyayakusumafijali.
गौतम — Nyaya-sitra.
कुमारिल भट — Slokavarttika.
David Hume — Dialogues Concerning Natural Religion.
Immanuel Kant — Critique of Pure Reason.
Alvin Plantinga — God, Freedom, and Evil.