जँ ईश्वर सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ आ पूर्ण शुभ छथि तेँ निरपराध दुःख किएक? ई धर्म-दर्शनक सबसँ कठिन प्रश्‍नसभमे एक अछि। मुदा अशुभक समस्या केवल बौद्धिक पहेली नहि। रोग, अकाल, हिंसा, बाल-मृत्यु, युद्ध, प्रकृतिक आपदा आ अपमान वास्तविक पीड़ा अछि। एहि कारण दार्शनिक उत्तरक नैतिक शैली सेहो महत्त्वपूर्ण अछि। 53.1 तार्किक आ प्रमाणात्मक समस्या तार्किक रुप प्रश्‍न अछि--सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, पूर्ण शुभ ईश्वर आ अशुभक अस्तित्व परस्पर विरोधी छथि की? आधुनिक विमर्शमे अनेक दार्शनिक मानैत छथि जे केवल तार्किक विरोध सिद्ध करब कठिन, कारण सम्भव अछि ईश्वरक किछु नैतिक Soe पर्याप्त कारण हो। प्रमाणात्मक रूप अधिक सूक्ष्म अछि: जगतमे दुःखक मात्रा, तीव्रता आ वितरण देखैत पूर्ण शुभ ईश्चरक अस्तित्व कम सम्भाव्य बुझाइत अछि की नहि? एतय विशेषतः एहन पीड़ा प्रश्‍न उठबैत अछि जकर कोनो स्पष्ट नैतिक फल देखाइत नहि। 53.2 स्वतंत्र इच्छा रक्षा एक प्रमुख उत्तर कहैत अछि जे नैतिक रूपसँ सार्थक स्वतंत्रता सम्भव हो तँ गलत चुनावक सम्भावना सेहो रहत। हत्या, धोखा, युद्ध, उत्पीड़न-जकाँ नैतिक अशुभ स्वतंत्र एजेन्टक दुरुपयोगसँ उत्पन्न भऽ सकैत अछि। मुदा ई उत्तर प्राकृतिक अशुभ--भूकम्प, रोग, जन्मजात पीड़ा-कें सीधा नहि बुझबैत। संगहि प्रश्‍न अछि: सर्वशक्तिमान ईश्वर एहन संसार किएक नहि बना सकैत छलाह जतय स्वतंत्रता रहय मुदा चरम पीड़ाक सीमा कम हो? 53.3 आत्म-विकासक उत्तर दोसर उत्तर अनुसार कठिनाई साहस, करुणा, धैर्य, नैतिक विकास आ जिम्मेवारी सम्भव करैत अछि। किछु गुण केवल चुनौतीपूर्ण संसारमे विकसित हो सकैत अछि। एहि तर्कक सीमा स्पष्ट अछि। प्रत्येक दुःख विकास नहि करैत; अनेक दुःख व्यक्ति & तोड़ि दैत अछि। पीड़ित व्यक्तिक सामने “ई तोहर विकास लेल अछि” कहब क्रूर भऽ सकैत अछि। दार्शनिक सम्भावना आ pastoral नैतिकता अलग राखब आवश्यक अछि। 53.4 कर्म-आधारित उत्तरक सावधानी भारतीय धार्मिक परम्परासभमे कखनो कर्मक सिद्धान्त दुःखक व्याख्या लेल उपयोग होइत अछि। मुदा उपलब्ध जीवनक विशिष्ट पीड़ाकें निश्चित पूर्वकर्मक फल घोषित करब सामान्यतः प्रत्यक्ष प्रमाणसँ बाहर अछि। एहि उपयोगसँ पीड़ित-दोषारोपणक खतरा अछि। अध्याय 54 एहि प्रश्‍नकें विस्तार देत। 53.5 बौद प्रश्नः सृष्टिकर्ता बिना दुःख बौद दर्शन दुःखे सृष्टिकर्ता ईश्वरक नैतिक समस्या रूपमे नहि, अस्तित्वगत तथ्य आ कारण-सम्बन्धक प्रश्‍न रूपमे ग्रहण करैत अछि। तृष्णा, अविद्या, अनित्यत्व आ प्रतीत्यसमुत्पादक विश्लेषण ई प्रश्‍न बदलि दैत अछि “इश्वर दु:ख किएक देलनि?” सँ “दुःख कोन add उत्पन्न आ कोना निरोधित होइत अछि?” ई तुलना देखबैत अछि जे समस्या-रचना तत्त्वमीमांसा पर निर्भर होइत अछि। 53.6 विरोध, विलाप आ मौन धार्मिक परम्परासभमे पीड़ाक उत्तर केवल सिद्धान्त नहि; विलाप, प्रार्थना, करुणा, सेवा आ प्रतिरोध सेहो अछि। दर्शन जँ पीड़ितक अनुभवकें केवल syllogism बना दे, तँ नैतिक दूरी उत्पन्न होइत अछि। कखनो पीड़ितक सामने मौन, उपस्थिति आ सहायता दार्शनिक व्याख्यासँ अधिक उचित होइत अछि। 53.7 सामाजिक अशुभ जाति-आधारित अपमान, दासता, स्त्री-विरोध, साम्प्रदायिक हिंसा, आर्थिक शोषण--ई “भाग्य” नहि, मानवीय संस्था आ कर्मद्वारा निर्मित अशुभ छथि। धार्मिक भाषा जँ एहि संरचनाकें अपरिवर्तनीय व्यवस्था कहि पवित्र करैत अछि, तखन धर्म-दर्शनक आलोचनात्मक दायित्व आरम्भ होइत अछि। समानान्तर दर्शनक आग्रह अछि: तत्त्वमीमांसीय उत्तर सामाजिक जिम्मेवारीकें कम नहि करय। दुःखक कारण जँ मनुष्य बदलि सकैत अछि, तँ “अंतिम रहस्य”क चर्चा सुधारक विकल्प नहि। पूर्वपक्षः दुःख ईश्वरक विरुद्ध निर्णायक प्रमाण अछि उत्तरपक्षः दुःख ईश्वरवादक गम्भीरतम चुनौतीसभमे एक अछि, मुदा “निर्णयक” निष्कर्षक लेल ईश्चरक सम्भावित कारण, स्वतंत्रता, प्राकृतिक नियम आ मानव ज्ञानक सीमा सम्बन्धी तर्क जाँचल आवश्यक अछि। उलट SU, केवल “SUCH योजना अछि” कहि समस्या समाप्त कएल नहि जा सकैत अछि। 53.13 पीड़ाक मात्रा आ वितरण अशुभक समस्या केवल पीड़ा अछि की नहि एतबे नहि; कतेक, ककरा, कतेक समय आ कतेक अर्थहीन रूपमे--ई सभ प्रासंगिक। अल्प कठिनाई चरित्र बनाबि सकैत, मुदा बालक वा पशुक चरम पीड़ाके समान उत्तरसँ उचित ठहरायब कठिन। “बड़ योजना'क अपील सम्भावना बतबैत, योजना प्रमाणित नहि करैत। जे कारण मनुष्यकें अज्ञात कहल जाए ओकरा सँ कोनो विशिष्ट घटना औचित्यपूर्ण सिद्ध नहि। धार्मिक विनम्रता ई स्वीकारि सकैत अछि जे पूर्ण उत्तर उपलब्ध नहि। पीड़ितक सामने सिद्धान्तक विजय सँ अधिक करुणा आ सहायता आवश्यक। 53.14 कर्म-सिद्धान्त आ अशुभ कर्मक माध्यमसँ वर्तमान पीड़ाकें पूर्व क्रियाक फल मानल जाए, तँ विश्वक नैतिक क्रम बचैत जकाँ लगैत अछि। मुदा स्मरणहीन पूर्वजन्मक दण्ड न्यायसंगत कोना, आ सहायता कर्मफलमे हस्तक्षेप किएक नहि--प्रश्‍न उठैत अछि। Ulsan स्थितिकें पात्रता कहब सामाजिक उदासीनता बढ़ा सकैत अछि। अनेक कर्म-परम्परा करुणा आ सहायता पर बल दैत; तें लोकप्रिय दोषारोपणकें पूरा सिद्धान्तक प्रतिनिधि नहि मानल जाए। प्रमाणक स्तर स्पष्ट हो। कर्म धार्मिक-तत्त्वमीमांसात्मक व्याख्या अछि; विशिष्ट व्यक्तिक दुःखक कारण घोषित करबाक सार्वजनिक प्रमाण दुर्लभ। 53.15 क्षमा आ स्मृति अशुभक बाद क्षमा पीड़ितकें क्रोधक बोझसँ मुक्त करि सकैत, मुदा क्षमा माँगब ओकर कर्तव्य नहि। सत्य, जिम्मेदारी आ प्रतिकार बिना क्षमा-दबाव अन्याय छिपा सकैत अछि। भूलि जाएब क्षमा नहि। समुदाय अत्याचार स्मरण करि पुनरावृत्ति रोकि सकैत, संगहि दोघीक मानवता नकारि नहि। स्मृति बदला आ उत्तरदायित्व बीच भेद रखय। संस्थागत क्षमा सार्वजनिक स्वीकार, दस्तावेज, प्रतिकार आ सुधार माँगैत अछि। शब्द मात्र नेतिक ऋण पूरा नहि करेत। 53.16 पूर्वपक्षः अशुभ बिना अच्छाइक अर्थ नहि कहल जाइत अछि जे साहस लेल भय, करुणा लेल पीड़ा आ क्षमा लेल अपराध चाही; अत: अशुभ अच्छाइक सम्भावना बनबैत अछि। किछु मूल्य वास्तवमे कठिन परिस्थितिमे प्रकट होइत। मुदा एहि सँ प्रत्येक पीड़ा आवश्यक नहि। बहुत अशुभ क्षमता नष्ट Hed अछि, AKU अवसर नहि देत। साधन रूपमे पीड़ितक उपयोग ओकर गरिमाक समस्या उत्पन्न करैत अछि। उत्तर अधिकतम एतेक देखबैत अछि जे किछु जोखिमवला संसार मूल्यवान स्वतंत्रता दे सकैत; देखल अशुभक मात्रा आ वितरणक पूर्ण औचित्य एखनहुँ बाकी। 53.8 तार्किक आ प्रमाणीय अशुभ-समस्या तार्किक रूप पूछैत अछि सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, पूर्ण करुणामय ईश्वर आ अशुभक अस्तित्व परस्पर असंगत छथि की नहि। प्रमाणीय रूप कहैत अछि देखल पीड़ाक मात्रा आ प्रकार एहन ईश्वरक सम्भावना घटबैत अछि। दुनूक प्रमाण-भार अलग अछि। स्वतंत्र इच्छा तार्किक संगति बचा सकैत, मुदा प्राकृतिक आपदा वा पशु-पीड़ा पूर्ण नहि बुझबैत। चरित्र-विकास किछु कठिनाईक अर्थ दे सकैत, मुदा अत्यधिक पीड़ाकें साधन बना देबाक नैतिक समस्या रहैत अछि। 53.9 स्वतंत्र इच्छा-प्रतिरक्षा नैतिक स्वतंत्रता वास्तविक हो तखन गलत चयन सम्भव। एहन संसार जतय व्यक्ति स्वतंत्र देखाइत, मुदा प्रत्येक गलत क्रिया दैवी रूपसँ रोकल जाए, स्वतंत्रताक अर्थ प्रश्‍नास्पद भऽ सकैत अछि। तथापि मनुष्यक स्वतंत्रता असमान शक्ति भीतर काम करेत अछि। पीड़ितक रक्षा लेल हस्तक्षेप करब स्वयं स्वतंत्रताक विरोध नहि। ई प्रतिरक्षा ईश्वरक सम्भावित कारण बतबैत अछि, प्रत्येक विशिष्ट हानिक नैतिक औचित्य नहि। 53.10 प्राकृतिक अशुभ रोग, भूकम्प, बाढ़ आ आन प्राकृतिक घटना मानवीय दुष्ट इच्छासँ उत्पन्न नहि। नियमित प्राकृतिक नियम जीवन आ ज्ञान सम्भव बनबैत अछि, मुदा ओहि नियमक परिणाम हानिकारक सेहो हो सकैत। प्राकृतिक घटना नैतिक अशुभ नहि हो सकैत, मुदा ओकर सामाजिक परिणाम अन्यायपूर्ण वितरणसँ Ie अछि। कमजोर आवास, स्वास्थ्यक अभाव आ चेतावनीक असमान पहुँच आपदाकें सामाजिक अशुभमे बदलैत अछि। 53.11 विरोध, शोक आ मौन पीड़ाक सामने प्रत्येक दार्शनिक व्याख्या तुरन्त देब असंवेदनशील हो सकैत अछि। शोकमे उपस्थित रहब, हानि स्वीकारब आ पीड़ितक आवाज सुनब तर्कक पूर्व नैतिक कर्तव्य भऽ सकैत अछि। मौन प्रश्‍न समाप्त नहि Heal बादमे कारण, जिम्मेदारी आ रोकथाम जाँचल जाए। अर्थ थोपबाक बदला पीड़ितकें अपन अर्थ चुनबाक स्थान देल जाए। दर्शन सान्त्वनाक अधिकारवादी भाषा नहि बने। 53.12 अशुभक विरुद्ध संयुक्त क्रिया SUH औचित्य पर बहस जरूरी भऽ सकैत, मुदा पीड़ा घटेबाक मानवीय जिम्मेदारी स्थगित नहि। आस्तिक करुणा आ नास्तिक मानवतावाद व्यावहारिक सहायता, न्याय आ रोकथाममे सहकार्य HS सकैत छथि। साझा क्रिया लेल अन्तिम तत्त्वमीमांसात्मक सहमति आवश्यक नहि। हानि, गरिमा आ प्रमाणित उपायपर सार्वजनिक कारण पर्याप्त आधार दऽ सकैत अछि। असहमति सहअस्तित्वक बाधा नहि बनय। अध्याय-निष्कर्ष अशुभक समस्या बौद्धिक, अस्तित्वगत आ नैतिक तीनू स्तरपर अछि। समानान्तर दर्शन तैयार सांत्वना नहि दैत; ओ तर्क जाँचैत अछि, पीड़ितक गरिमा केन्द्रमे रखैत अछि आ सामाजिक रूपसँ परिवर्तनीय दुःखक विरुद्ध जिम्मेवारीपर बल दैत अछि।