कर्म, पुनर्जन्म आ मोक्ष भारतीय दर्शनक अनेक परम्परामे परस्पर सम्बद्ध, मुदा समानार्थी नहि, अवधारणा छथि। हिन्दू, बौद्ध आ जैन परम्परासभ कर्मक स्वरूप, कर्ता, पुनर्जन्मक निरन्तरता आ मुक्तिक अर्थपर गम्भीर ead भिन्न छथि। तँ “भारतीय कर्म-सिद्धान्त” कहि एकहि रुप प्रस्तुत करब उचित नहि। 54.1 कर्मः नैतिक कारणता सामान्य रूपमे कर्मक विचार कहैत अछि जे चेतन कर्मक नैतिक परिणाम होइत अछि। मुदा परम्परा अनुसार ई परिणामक तत्त्वमीमांसीय व्याख्या बदलैत अछि। मीमांसा अपूर्व-जकाँ अवधारणा विकसित करेत अछि; जैन दर्शन कर्मके विशिष्ट सूक्ष्म द्रव्यात्मक सिद्धान्तसँ जोड़ेत अछि; बौद्ध दर्शन चेतना-सम्बद्ध कर्म आ कारण- शृंखलापर बल दैत अछि; वेदान्तक धारासभ कर्म, ज्ञान, भक्ति आ मोक्षक सम्बन्ध अलग प्रकारें व्याख्यायित करैत अछि। 54.2 कर्म भाग्यवाद नहि “जे भेल से पूर्वकर्म, तेँ किछु नहि बदलि सकैत छी”--ई कर्म-सिद्धान्तक अनिवार्य निष्कर्ष नहि। यदि वर्तमान कर्म भविष्य प्रभावित करैत अछि, तँ कर्म-सिद्धान्तमे क्रियाशीलताक स्थान स्वयं निहित अछि। भाग्यवाद वर्तमान प्रयत्नकेँ निरर्थक मानैत अछि; कर्मक अनेक रूप वर्तमान नैतिक कृत्यकेँ महत्त्वपूर्ण मानैत अछि। 54.3 पीड़ित-दोषारोपण कर्म-विचारक सबसँ खतरनाक सामाजिक विकृतिसभमे एक अछि पीड़ितक वर्तमान स्थिति कें ओकर अज्ञात पूर्वकर्मक निश्चित दण्ड घोषित Heal गरीब, रोगी, विकलांग, उत्पीड़ित अथवा सामाजिक रूपसँ हाशियाक व्यक्ति सम्बन्धी एहन दावा सामान्यतः सत्यापनातीत अछि आ करुणा कम HS सकैत अछि। समानान्तर atta नियम स्पष्ट अछि--कोनो तत्त्वमीमांसीय सिद्धान्त वर्तमान पीड़ितक प्रति हमर नैतिक उत्तरदायित्व कम नहि करैत अछि। जँ अन्याय रोकल जा सकैत अछि, तखन ओकरा “कर्म” कहि छोड़ब स्वयं वर्तमान नैतिक कर्म अछि, जकर जिम्मेवारी हमर अछि। 54.4 पुनर्जन्मक दार्शनिक प्रश्‍न पुनर्जन्म मानल जाए तेँ प्रश्‍न उठैत अछि--पुनर्जन्म लैत के? स्थायी आत्मा? चेतन-प्रवाह? कर्म-सन्तति? जैन, न्याय-वेदान्त आ बौद्ध उत्तर अलग। बौद्ध अनात्मवाद विशेष चुनौती प्रस्तुत करेत अछि: स्थायी आत्मा बिना नैतिक निरन्तरता कोना? बौद उत्तर कारणात्मक सन्ततिक विभिन्न मॉडल विकसित करैत अछि। समानान्तर दर्शन एतय “एकहि शब्द = एकहि सिद्धान्त” मानि नहि चलैत अछि। 54.5 स्मृति आ प्रमाण पुनर्जन्मक पक्षमे कखनो पूर्वजन्म-स्मृति, परम्परा वा आध्यात्मिक अनुभवक साक्ष्य प्रस्तुत होइत अछि। एहन दाबी जाँचैत समय सामान्य प्रमाण-अनुशासन लागू हो: स्रोतक स्वतंत्रता, वैकल्पिक व्याख्या, सूचना-प्रवेश, स्मृति-त्रुटि, पुष्टिकरण-पक्षपात आ पुनरावृत्ति। धार्मिक महत्त्व प्रमाण-परीक्षणक विकल्प नहि। 54.6 मोक्ष की? मोक्ष सेहो एकरूप नहि। सांख्यमे youn प्रकृतिसँ विवेकपूर्ण कैवल्य; योगमे चित्त-वृत्ति आ क्लेशक अतिक्रमणसँ कैवल्य; AGT आत्म-ब्रह्म अभेदक ज्ञान; विशिष्टाद्वैत आ द्वेतमे ईश्वर-सम्बन्धक अलग मुक्ति- धारणा; बौद्ध परम्परामे निर्वाण; जैन दर्शनमे कर्म-बन्धनसँ मुक्त सिद्ध अवस्था। एहि भिन्नतासँ स्पष्ट अछि जे “मोक्ष = मृत्यु बाद स्वर्ग” कहब अधिकांश भारतीय दार्शनिक परम्पराक अनुचित सरलीकरण होयत। 54.7 मुक्ति आ सामाजिक न्याय एकटा गम्भीर आधुनिक प्रश्‍न अछि--व्यक्तिगत आध्यात्मिक मुक्ति आ सामाजिक मुक्ति बीच सम्बन्ध की? यदि व्यक्ति ध्यानमे शान्त अछि मुदा समाज अन्यायपूर्ण, तखन दर्शनक काम पूर्ण भेल की? उलट रूपें, सामाजिक सुधार भेला परो व्यक्तिक भय, लोभ, द्वेष आ अस्तित्वगत दुःख समाप्त होयत की? समानान्तर दर्शन दुनू स्तरकें जोड़ेत अछि। आन्तरिक बन्धन आ बाह्य दमन भिन्न, मुदा परस्पर प्रभावी। वयक्तिक मुक्ति आ समाजक न्याय एक-दोसरक विरोधी नहि। पूर्वपक्षः कर्म नैतिक न्यायक पूर्ण व्याख्या दैत अछि उत्तरपक्षः कर्म सिद्धान्त नेतिक कारणता समझबाक गम्भीर रूप हो सकैत अछि, मुदा विशिष्ट दुःखक कारण बिना प्रमाण निश्चित करब अनुचित। प्राकृतिक, सामाजिक, जैविक आ ऐतिहासिक कारणसभक स्वतंत्र अध्ययन आवश्यक अछि। 54.13 कर्म आ नियतिवाद जँ वर्तमान सभ अवस्था पूर्वकर्मसँ निश्चित, तँ नूतन कर्म आ नैतिक प्रयासक अर्थ की? अधिकांश कर्म-दृष्टि पूर्ण नियतिवाद नहि; पूर्व कारण परिस्थिति बनबैत, वर्तमान क्रिया नूतन दिशा दऽ सकैत अछि। “ई त अहाँक कर्म? कहि अन्याय स्वीकारब कर्मक नैतिक सक्रियता विकृत करैत अछि। दोसरक सहायता सेहो कर्ताक कर्म आ सामाजिक धर्मक प्रश्‍न हो सकैत अछि। दार्शनिक विश्लेषण कारण, नैतिक पात्रता आ भविष्यवाणी अलग करय। कारणगत सम्बन्ध स्वतः दण्डक औचित्य नहि। 54.14 मुक्तिक ज्ञानमीमांसा मुक्ति-ज्ञान साधारण तथ्य-ज्ञानसँ भिन्न कहल जाइत अछि: जानकारी मात्र नहि, आत्मपहिचान वा अनुभवक रुपान्तरण। मुदा रूपान्तरण सत्यताक अचूक प्रमाण नहि; भिन्न परम्पराक साधक विरोधी व्याख्या दे सकैत छथि। व्यक्तिगत अनुभव, गुरु-गवाही, पाठ आ आचरणक फल संयुक्त जाँचल जाए। सार्वजनिक इतिहासक दाबी लेल अलग प्रमाण चाही। मुक्तिक अनुभूति अहंकार, हिंसा आ लोभ घटबैत अछि की नहि नैतिक संकेत दे सकैत, यद्यपि तत्त्वमीमांसात्मक निष्कर्ष पूरा सिद्ध नहि। 54.15 जीवनमुक्ति आ व्यवहार जीवित अवस्थामे मुक्त व्यक्तिक धारणा प्रश्‍न उठबैत अछि: शरीरक पीड़ा, सामाजिक भूमिका आ नैतिक कर्तव्य जारी रहला पर मुक्ति कोन अर्थमे? उत्तर आसक्तिविहीनता, आत्मज्ञान वा कर्मफलसँ आन्तरिक स्वतंत्रतामे खोजल जाइत। मुकत घोषित व्यक्तिक व्यवहार आलोचनासँ ऊपर नहि। शिष्यक श्रद्धा, आर्थिक शक्ति वा यौन अधिकारक दुरुपयोग मुक्तिक दाबी कमजोर करैत अछि। आध्यात्मिक उपलब्धिक सार्वजनिक प्रमाण सीमित, मुदा हानि जाँच योग्य। संस्था व्यक्तिपूजा नहि, उत्तरदायित्व बनाय। 54.16 पूर्वपक्ष: मोक्ष जीवन-विरोधी अछि संसारसँ मुक्ति लक्ष्य हो तखन कला, प्रेम, राजनीति आ सुधार गौण लगि सकैत अछि। आलोचक एहि TAR ch पलायनवादी कहि सकैत अछि। मुदा बन्धनसँ मुक्ति संसारक नकार हरदम नहि। आसक्ति घटला सँ अधिक करुणामय कर्म सम्भव--एहन अनेक व्याख्या अछि। परम्पराविशेषक पाठ आ व्यवहार देखल जाए। समानान्तर कसौटी ई जे मुक्तिक आदर्श पीड़ासँ उदासीनता उत्पन्न करैत अछि वा अहंकार घटाकऽ जिम्मेदारी बढ़बैत। फल एकमात्र सत्य-परीक्षा नहि, नैतिक परीक्षा अवश्य। 54.8 कर्मः क्रिया, फल आ नैतिक क्रम कर्म शब्दक अर्थ परम्परानुसार बदलैत अछि-_अनुष्ठानिक क्रिया, नैतिक कार्य, संस्कार वा कारणगत फल। एक सार्वभौम 'कर्म-सिद्धान्त” मानि सभ भारतीय दर्शनपर समान रूप थोपब गलत। फल तुरन्त आ सरल समानुपातमे भेटत--एहन लोकप्रिय धारणा दार्शनिक STS कमजोर। सामूहिक कारण, आकस्मिकता आ सामाजिक संरचना जीवन प्रभावित करैत अछि। प्रत्येक दुःखकें पूर्वकर्म कहब पीड़ित- दोषारोपण बनि सकैत अछि। 54.9 पुनर्जन्मक प्रमाण-प्रश्‍न पुनर्जन्म अनेक परम्परामे नैतिक निरन्तरता आ मुक्तिक दीर्घ परिप्रेक्ष्य देत अछि। मुदा आत्मा, संस्कार वा चेतना कोन रूपमे जन्मान्तर धरि रहैत--एहि पर बौद्ध, जैन, वेदान्त आ अन्य मत भिन्न छथि। स्मृतिक कथा वा धार्मिक गवाहीक परीक्षण स्रोत, वैकल्पिक व्याख्या आ स्वतंत्र पुष्टिसँ होयत। निर्णायक प्रमाणक सीमा स्पष्ट लिखल जाए। आस्था सम्भव, वैज्ञानिक निष्कर्षक दावा अलग मानक माँगैत। 54.10 आत्मा बिना कर्म-निरन्तरता बौद्ध दर्शन स्थिर आत्मा नकारितो कारणगत प्रवाह, संस्कार आ कर्मफल बुझबाक प्रयास करैत अछि। एक क्षणक प्रक्रिया अगिला क्षणकें शर्त दैत, जकाँ दीपसँ दीप जरैत अछि--न पूर्ण अभिन्न, न पूर्ण असम्बद्ध। ई रुपक समस्या सुलझल घोषित नहि करैत। नैतिक उत्तरदायित्व लेल कर्मकर्ता’ आ "फलभोगी'क सम्बन्ध पर्याप्त कतेक, ई आपत्ति रहैत अछि। मतके ओकर अपन अनात्म-प्रतिज्ञा भीतर जाँचल जाए। 54.11 मोक्षक अनेक अर्थ मोक्ष कखनो आत्मब्रह्मज्ञान, कखनो ईश्वर-सान्निध्य, कखनो कर्मबन्धसँ मुक्ति, कखनो दुःखनिरोध वा कैवल्य। सभ परम्पराक मुक्तिकें “एकहि अनुभव” कहब मतभेद नष्ट करैत अछि। मुक्ति शरीर छोड़लाक बाद, जीवित अवस्था, ज्ञान, भक्ति वा आचरणसँ सम्बन्धित--एहि प्रश्‍नपर भिन्न उत्तर अछि। तुलनात्मक अध्ययन समस्या-साम्य देखय, निष्कर्ष-समानता नहि गढ़य। 54.12 व्यक्तिगत मुक्ति आ सामाजिक बन्धन आन्तरिक आसक्ति घटलासँ व्यक्ति अधिक करुणामय भऽ सकैत, मुदा जाति, गरीबी वा हिंसाक संस्था केवल ध्यानसँ समाप्त नहि। सामाजिक बन्धनक कानून, संसाधन आ संगठनगत कारण अछि। व्यक्तिगत परिवर्तन आ सामाजिक न्याय परस्पर पूरक हो सकैत अछि। क्रोधक दास नहि होइतहुँ अन्यायक विरोध सम्भव। मुक्ति जँ दोसरक पीड़ासँ उदासीन करय, तँ ओकर नैतिक अर्थ पुनः जाँचल जाए। अध्याय-निष्कर्ष