एकहि संसारमे अनेक धार्मिक परम्परा, अनेक ईश्वर-धारणा, अनेक मुक्ति-पथ आ अनेक नास्तिक परम्परा उपस्थित अछि। धर्मबहुलता केवल सामाजिक तथ्य नहि; ई ज्ञानमीमांसीय आ नैतिक प्रश्‍न सेहो अछि। जँ बुद्धिमान, ईमानदार आ साधनाशील व्यक्ति परस्पर विरोधी धार्मिक निष्कर्षपर पहुँचैत छथि, तँ अपन विश्वासक निश्चितता पर एकर की प्रभाव पड़ैत अछि? 55.1 बहुलताक तथ्य मानव समाजमे धर्म जन्मस्थान, परिवार, भाषा आ इतिहाससँ गहराईसँ जुड़ल रहैत अछि। ई तथ्य स्वत: कोनो धर्मके असत्य सिद्ध नहि करैत, मुदा आत्मसमीक्षा प्रेरित करेत अछि: यदि हम दोसर संस्कृतिमे जन्मल रहितहुँ तँ सम्भवतः हमर धार्मिक विश्वास भिन्न होइत। एहि सम्भावनाकेँ गंभीरता सँ लेब ज्ञानात्मक विनम्रताक भाग अछि। 55.2 विशिष्टतावाद एक दृष्टि कहैत अछि--एकहि परम्परा अंतिम सत्यक पूर्ण वा विशिष्ट अधिकारी अछि। ई मत तार्किक रूपसँ सम्भव अछि; बहुलता मात्रसँ सभ मत सत्य नहि भऽ जाइत। मुदा विशिष्टतावादी पर अतिरिक्त प्रश्‍न उठैत अछि: अपन विशिष्ट दाबीक सार्वजनिक आधार की? आन परम्पराक अनुभव, नेतिक उपलब्धि आ तर्कक व्याख्या कोना? 55.3 समावेशवाद समावेशवादी दृष्टि अपन परम्पराकें अंतिम केन्द्र मानैत, मुदा आन धर्मे आंशिक सत्य वा मुक्ति सम्भावना स्वीकार करैत अछि। ई विशिष्टतावादसँ अधिक उदार हो सकैत अछि, मुदा आन परम्पराकै ओकर अपन आत्मबोधक बदला अपन ढाँचामे समाहित करबाक खतरा रहैत अछि। 55.4 बहुलतावाद बहुलतावाद कहैत अछि जे भिन्न धार्मिक परम्परा परम वास्तविकताक विविध मानवीय प्रत्युत्तर भऽ सकैत अछि। एकर शक्ति सहिष्णुता आ विनम्रतामे अछि। मुदा कठिनाई अछि--परस्पर विरोधी दाबीसभ कोना एक साथ मान्य? यदि एक परम्परा व्यक्तिगत ईश्वर Hea, दोसर निरात्मवाद, तेसर अद्वैत--की ई केवल अलग भाषा अछि, अथवा वास्तविक मतभेद? समानान्तर दर्शन बहुलताकें “सभ दाबी समान रुपसँ सत्य” नहि Ata ओ सहअस्तित्वक नैतिक बहुलता आ सत्य-दाबीक आलोचनात्मक परीक्षा अलग राखैत अछि। 55.5 धार्मिक स्वतंत्रताक तीन अधिकार समानान्तर दर्शन धर्मबहुलताकें तीन अविभाज्य अधिकारपर रखैत अछि: अपन आस्थाक अधिकार; दोसराक भिन्न आस्थाक समान अधिकार; आस्था बदलबाक अथवा कोनो आस्था नहि रखबाक अधिकार। एहि तीनमे सँ कोनो एक हटत तेँ धार्मिक स्वतंत्रता अधूरी भऽ जाएत। धर्म-परिवर्तनक स्वतंत्रता बिना जन्मजात धार्मिक सदस्यता कारागार बनि सकैत अछि। अनास्थाक स्वतंत्रता बिना धार्मिक स्वतंत्रता केवल धर्मसभक बीच विकल्प बनि रहत। 55.6 सहिष्णुता सँ सम्मान धरि “हम तोरा Ged छी” न्यूनतम नागरिक स्थिति अछि। लोकतान्त्रिक बहुलता अधिक माँगैत अछि--समान कानूनी दर्जा, सुरक्षा, सार्वजनिक अवसर, उपासना वा अनास्थाक स्वतंत्रता, आ अपमानविहीन नागरिकता। सम्मानक अर्थ सहमति नहि; असहमति राखि कऽ समान अधिकार स्वीकारब अछि। 55.7 धर्मक भीतर बहुलता कोनो धर्म एकरूप नहि। ग्रन्थ, सम्प्रदाय, क्षेत्र, जाति, लिंग, वर्ग, भाषा, सुधार-आन्दोलन आ लोकपरम्परा धर्मक भीतर अनेक आवाज उत्पन्न करैत अछि। “हिन्दू धर्म कहैत अछि”, “इस्लाम कहैत अछि”, “ईसाई धर्म कहैत अछि”, “बौद्ध धर्म कहैत अछि”--एहन वाक्य अक्सर अत्यधिक व्यापक होइत अछि। ala, सम्प्रदाय, काल आ व्याख्या स्पष्ट करब चाही। 55.8 बहुलता आ आलोचना बहुलताक सम्मानक अर्थ आलोचना बन्द करब नहि। कोनो धार्मिक व्यवहार मनुष्यक समान गरिमा, शारीरिक सुरक्षा वा मूल अधिकारक उल्लंघन करैत हो तँ ओकर आलोचना उचित अछि। मुदा आलोचना सिद्धान्त वा व्यवहारपर केन्द्रित हो, सम्पूर्ण समुदायके अमानवीय बनाबय पर नहि। 55.9 संवादक शर्त सार्थक अन्तरधार्मिक संवाद लेल तीन शर्त आवश्यकः अपन मत स्पष्ट; प्रतिपक्षक आत्मवर्णन ईमानदारीसँ सुनब; आ एहन सम्भावना स्वीकारब जे संवादक बाद अपन मत किछु संशोधित हो सकैत अछि। केवल धर्म- प्रचार अथवा औपचारिक सद्भाव-सम्मेलन दार्शनिक संवाद नहि। पूर्वपक्षः धार्मिक बहुलता सत्यक प्रश्‍नकें कमजोर करैत अछि उत्तरपक्षः बहुलता सत्यकें निरर्थक नहि बनबैत; ओ सत्य-दाबीक प्रमाण-भार बढ़बैत अछि। जतेक गम्भीर असहमति, ade अधिक स्पष्ट कारण, विनम्रता आ प्रतिपक्ष-परीक्षण आवश्यक। 55.15 धर्मान्तर संवादमे अनुवाद इश्वर’, “धर्मः, “मोक्ष”, “पाप”, “निर्वाण” वा “pura सरल समतुल्यता भ्रम दे सकैत अछि। संवादक पहिल काम पदक परम्परागत कार्य स्पष्ट करब। समान शब्दक पाछाँ भिन्न प्रश्‍न आ भिन्न शब्दक पाछाँ साझा समस्या हो सकैत। अनुवाद सुविधाक लेल हो, अधिग्रहण लेल नहि। प्रतिपक्ष अपन अवधारणा सुधारि सकय; बाहरी व्यक्ति ओकर अन्तिम परिभाषा थोपि नहि दे। जहाँ समतुल्य नहि, मूल पद राखि व्याख्या देल जाए। “अनुवाद असम्भव” कहि संवाद रोकब सेहो अतिवाद। 55.16 बहुलता आ मिशन अपन विश्वास साझा करब अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता, मुदा शक्ति, धन वा सेवा मार्फत दबाव अनुचित। विपन्न व्यक्ति लेल सहायता धर्म-स्वीकारक शर्त बनला पर सहमति कमजोर होइत अछि। खुलल संवाद प्रश्‍न, अस्वीकार आ प्रत्युत्तरक समान अधिकार दैत अछि। राज्य विचारक प्रचार नहि रोकय, बल, छल आ धमकी रोकय। संख्या-वृद्धि सत्यक प्रमाण नहि; समुदायिक स्थिरता सेहो नहि। दार्शनिक दाबी तर्क आ प्रमाणपर जाँचल जाए। 55.17 मिश्रित धार्मिक पहचान लोक व्यवहारमे एक परम्पराक सदस्य होइतहुँ दोसर परम्पराक स्थल, कथा वा अभ्याससँ सम्बन्ध रखि सकैत अछि। कठोर जनगणना-श्रेणी एहि मिश्रणकेँ अदृश्य करेत अछि। मिश्रणकें “अशुद्ध? वा आदर्श “सामंजस्य? Hed दुनू जल्दबाजी। सहभागी ककर अर्थ दैत, कखन संघर्ष होइत, आ संस्था कोना प्रतिक्रिया दैत-क्षेत्रीय अध्ययन चाही। बहुलता केवल मतक सहअस्तित्व नहि, व्यक्तिक भीतरक अनेक सम्बन्ध सेहो। कानून आत्मपहिचान सरल करबाक दबाव नहि दे। 55.18 पूर्वपक्ष: बहुलतावाद सभ मतकें कमजोर Hed अछि कहल जाइत अछि जे दोसर मार्गकें वैध मानलासँ अपन सत्य-दाबी खोखला होइत अछि। प्रतिबद्धता लेल विशिष्टता जरूरी। उत्तर ई जे नागरिक वैधता आ तत्त्वमीमांसात्मक सत्य अलग। व्यक्ति अपन मत सत्य मानितो दोसरक समान अधिकार स्वीकारि सकैत अछि। विनम्रता आत्मसमर्पण नहि। बहुलतावादक कठिन कार्य मतभेद स्पष्ट राखि हिंसा रोकब अछि। कृत्रिम सभ एक” वास्तविक संवादे कमजोर करैत, कारण प्रतिपक्ष सुनल नहि जाइत। 55.10 बहुलताक वर्णन आ मूल्यांकन अनेक धर्मक अस्तित्व एक तथ्य; सभ समान सत्य वा समान नैतिक--ई अलग दाबी। वर्णनात्मक बहुलता सँ दार्शनिक बहुलतावाद स्वतः नहि निकलैत। तर्क, अनुभव आ नैतिक परिणामक परीक्षा आवश्यक रहैत अछि। तथापि बहुलताक तथ्य आत्मविश्वासक सीमा देखबैत अछि। जन्मस्थान, भाषा आ समुदाय विश्वास गठन करेत अछि। ई प्रभाव सत्य नकारैत नहि, विनम्रता आ तुलनात्मक अध्ययन माँगैत अछि। 55.11 विशिष्टतावादक शक्ति आ जोखिम विशिष्टतावादी मत अपन परम्पराकें पूर्ण सत्य वा मुक्तिक एकमात्र मार्ग मानि सकैत अछि। एकर शक्ति स्पष्ट प्रतिबद्धता; जोखिम दोसरक अनुभवे आरम्भे अमान्य मानब आ नागरिक समानता कमजोर करब। निजी विशिष्ट विश्वास राखब स्वतंत्रता अछि। सार्वजनिक क्षेत्रमे दोसरक अधिकार समान रहत, आ बाध्यकारी नीति साझा कारण माँगत। सत्य-दाबी हिंसा वा भेदभावक अनुमति नहि। 55.12 समावेशवादक द्वैधता समावेशवाद दोसर परम्परामे सत्यक अंश स्वीकारैत, मुदा ओकर पूर्ण अर्थ अपन ढाँचा भीतर रखैत अछि। ई कठोर बहिष्कारसँ उदार, तथापि दोसरकँ ओकर आत्मबोधक बदला बाहरी भ्रेणीमे समेटि सकैत अछि। संवादमे प्रतिपक्षकै अपन शब्दमे बोलबाक अधिकार देल जाए। समानता खोजब उपयोगी, मुदा अस्वीकार्य भिन्नता स्पष्ट रखब सेहो सम्मान अछि। समावेश अधिकार-हरण नहि बनय। 55.13 धार्मिक सत्य-दाबीक प्रकार ऐतिहासिक घटना, तत्त्वमीमांसात्मक सत्ता, नैतिक नियम, अनुष्ठानिक प्रभाव आ अस्तित्वगत अर्थ-सभ धार्मिक दाबी एकहि प्रमाण नहि माँगैत। इतिहास अभिलेख, तत्त्वमीमांसा तर्क, नैतिकता गरिमा आ परिणाम, अनुभव आत्मसाक्ष्य तथा तुलनाक कसौटी लैत अछि। SAYA तखन होइत अछि जखन काव्यात्मक कथन वैज्ञानिक प्रतिवेदन, अथवा निजी अनुभव सार्वजनिक इतिहासक निर्णायक प्रमाण मानल जाए। दाबी पहिने वर्गीकृत करब संवाद सहज बनबैत अछि। 55.14 साझा नागरिकता धार्मिक मतभेद रहितो नागरिक समानता सम्भव, जँ राज्य धर्म स्वीकारब, बदलय आ नहि मानयक स्वतंत्रता सुरक्षित करय। कर, शिक्षा, न्याय आ सार्वजनिक सेवा सम्प्रदायगत दर्जापर निर्भर नहि हो। साझा नागरिकता सांस्कृतिक समानरूपता नहि। धार्मिक पोशाक, पर्व आ संस्था लेल उचित स्थान रहि सकैत, जँ दोसरक अधिकार आ समान नियमक सीमा मानल जाए। विवादक समाधान कारण आ प्रक्रिया सँ हो। अध्याय-निष्कर्ष धर्मबहुलता समान सत्यक घोषणा नहि, समान गरिमाक राजनीतिक-नैतिक सिद्धान्त आ परस्पर विरोधी सत्य- दाबीक ज्ञानमीमांसीय चुनौती दुनू अछि। समानान्तर दर्शन धार्मिक स्वतंत्रताकें आस्था, परिवर्तन आ अनास्थाक त्रयीपर रखैत अछि, आ संवादक आलोचना तथा सम्मान दुनूसँ जोड़ेत अछि। अध्याय-ग्रन्थसूची John Hick — An Interpretation of Religion. Wilfred Cantwell Smith — The Meaning and End of Religion. John Rawls — Political Liberalism. Martha C. Nussbaum — Liberty of Conscience. B. R. Ambedkar — The Buddha and His Dhamma. Stanford Encyclopedia of Philosophy — “Religious Diversity”; “Religious Toleration”.