“आधुनिकता” केवल कालसूचक शब्द नहि। विज्ञान, उद्योग, पूँजीवाद, राष्ट्र-राज्य, व्यक्तिवाद, नौकरशाही, लोकतन्त्र, जनशिक्षा, औपनिवेशिकता, बाजार, मुद्रण, नगरीकरण आ नूतन संचार-व्यवस्थासभ एकर अलग- अलग ऐतिहासिक आयाम छथि। आधुनिकताकें एकहि स्रोत वा एकहि मूल्यक कथा बनायब कठिन अछि। 58.1 मुक्ति आ नियन्त्रणक द्वैधता आधुनिक संस्थासभ व्यक्तिक कानूनी दर्जा, शिक्षा, संचार, चिकित्सा, लोकतान्त्रिक भागीदारी आ वैज्ञानिक ज्ञानक अभूतपूर्व विस्तार कएलक। संगहि जनगणना, अभिलेख, सीमा, कारागार, सैन्य नौकरशाही, औद्योगिक अनुशासन, निगरानी आ औपनिवेशिक प्रशासनक नूतन रूप सेहो बनल। तेँ आधुनिकता न शुद्ध मुक्ति, न शुद्ध दमन। 58.2 परम्परा बनाम आधुनिकता परम्पराके स्थिर अतीत मानब भूल अछि। परम्परा स्वयं बदलैत, पुनर्व्याख्यायित आ आविष्कृत होइत रहैत अछि। आधुनिकता सेहो एकरूप नहि। व्यक्ति वैज्ञानिक अस्पताल उपयोग करैत पारिवारिक अनुष्ठान निभा सकैत अछि; लोकतान्त्रिक अधिकार माँगैत क्षेत्रीय भाषा बचा सकैत अछि। वास्तविक जीवन मिश्रित अछि। 58.3 औपनिवेशिक आधुनिकता दक्षिण एशियामे आधुनिक प्रशासन, रेलवे, मुद्रण, आधुनिक शिक्षा, नूतन विधि आ विज्ञान औपनिवेशिक प्रभुत्वक संरचनासँ जुड़ल रूपमे आयल। एहि कारण आधुनिक संस्थाक मूल्यांकनमे द्वैधता आवश्यक अछि: कोन ज्ञान सार्वभौम उपयोगी? कोन व्यवस्था साम्राज्यवादी हितसँ बनल? कोन संस्था उपनिवेशोत्तर समाज पुनः अपन अर्थमे ढालि सकैत अछि? 58.4 व्यक्ति, समुदाय आ बाजार आधुनिकता व्यक्तिक स्वायत्तताकें बल दैत अछि, मुदा बाजार व्यक्ति के उपभोक्ता आ श्रमिकक रूपमे सीमित सेहो HS सकैत अछि। समुदाय दमनकारी हो सकैत अछि, मुदा समुदाय-विघटन अकेलापन आ असुरक्षा उत्पन्न कऽ सकैत अछि। समानान्तर दर्शन स्वतंत्र व्यक्ति आ सहायक समुदाय दुनूक आवश्यकता मानेत अछि। 58.5 मिथिला, क्षेत्र आ आधुनिकता क्षेत्रीय भाषा, प्रवास, शिक्षा, डिजिटल माध्यम, रोजगार आ राज्यीय नीतिक बीच मिथिलाक आधुनिक अनुभव देखबैत अछि जे आधुनिकता केन्द्रसँ हाशिया धारि एके रुपमे नहि पहुँचैत। भाषिक समुदाय आधुनिक तकनीक उपयोग HS परम्परा पुनर्जीवित क5 सकैत अछि। अतः “स्थानीय = अतीत” आ “वैश्विक = आधुनिक” भेद टिकैत नहि। पूर्वपक्षः आधुनिकता परम्परागत बन्धन तोड़ि मनुष्यकें मुक्त करैत अछि, तँ ओकर आलोचना प्रतिक्रियावाद अछि। उत्तरपक्षः आधुनिक स्वतंत्रताक उपलब्धि महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा आधुनिक संस्थाक सत्ता-संरचना आलोचनासँ मुक्त नहि। समानान्तर दर्शन Ftd अछि--परम्पराक ज्ञान, बिना परम्पराक अन्याय; आधुनिकताक स्वतंत्रता, बिना आधुनिकताक अमानवीकरण। 58.11 सार्वजनिक क्षेत्रक निर्माण मुद्रण, सभा, पत्रिका आ आधुनिक संचार निजी व्यक्तिकें सार्वजनिक प्रश्‍नपर तर्क करबाक मंच दैत अछि। मुदा पहुँच शिक्षा, भाषा, सम्पत्ति आ लिंगसँ सीमित हो सकैत; तथाकथित सार्वजनिक मत वास्तवमे संकीर्ण समूहक मत भऽ सकैत अछि। डिजिटल माध्यम प्रवेश लागत घटबैत, संगहि मंच-स्वामित्व आ ध्यान-व्यापार नूतन द्वारपाल बनबैत अछि। सार्वजनिकता स्वतः मुक्त नहि। समावेशी क्षेत्र लेल स्थानीय भाषा, सुरक्षित असहमति, स्रोत-पारदर्शिता आ विविध संस्थागत मंच चाही। राज्य आ बाजार दुनूक अत्यधिक नियन्त्रणसँ दूरी रहय। 58.12 व्यक्तिवादक दू रूप नेतिक व्यक्तिवाद प्रत्येक मनुष्यक समान अधिकार मानैत अछि; स्वार्थपरक व्यक्तिवाद सामाजिक दायित्व नकारि सकैत अछि। Sch एक कहला पर अधिकारक आलोचना गलत होइत अछि। परम्परागत समुदाय व्यक्तिक सहारा दैत, मुदा जन्मगत भूमिका थोपि सकैत अछि। आधुनिक अधिकार निकास देत, मुदा बाजार-एकान्त बढ़ा सकैत अछि। समानान्तर दृष्टि अधिकारसहित सम्बन्ध चाहैत अछि। व्यक्ति समुदाय चुनि, आलोचना करि आ छोड़ि सकय; समाज देखभालक बोझ न्यायपूर्ण बाँटय। 58.13 परम्पराक आविष्कार आ पुनर॑चना आधुनिक परिवर्तनक समय समुदाय किछु अभ्यासकें प्राचीन अखण्ड परम्परा रूपमे प्रस्तुत करि सकैत, यद्यपि ओकर वर्तमान रूप नव हो। ई हरदम छल नहि; पहचान स्थिर करबाक सामाजिक प्रक्रिया भऽ सकैत अछि। इतिहासकार उद्गम, परिवर्तन आ चयन जाँचय। “आविष्कृत” कहला सँ प्रथाक वर्तमान अर्थ शून्य नहि, मुदा प्राचीनताक दाबी सीमित होइत अछि। नूतन परम्परा नैतिक परीक्षा सँ मुक्त नहि। समुदायिक एकता ककर बहिष्कारपर बनल से देखल जाए। 58.14 पूर्वपक्षः आधुनिकता पश्चिमीकरण मात्र अछि आधुनिक विज्ञान, राष्ट्र-राज्य, पूँजीवाद आ नौकरशाहीक इतिहास यूरोपीय विस्तारसँ गहराईसँ जुड़ल; तेँ आधुनिकता स्वीकारब सांस्कृतिक अधीनता कहल जाइत अछि। मुदा संस्था स्थानान्तरित भेला पर स्थानीय GATS बदलैत अछि। लोकतन्त्र वा वैज्ञानिक विधि कोनो सभ्यताक निजी सम्पत्ति नहि; ओकर औचित्य सार्वजनिक कारण आ परिणामसँ जाँचल जाए। उपनिवेशी सत्ता आलोचना संग स्वदेशी पदानुक्रमक आलोचना सेहो Stl बाहरी उद्गम मात्र दोष आ स्थानीय उद्गम मात्र गुण नहि। 58.6 तर्कीकरण आ नौकरशाही आधुनिक संस्था नियम, गणना आ विशेषज्ञतासँ व्यापक काम सम्भव बनबैत अछि। व्यक्तिगत कृपाक बदला नियमित प्रक्रिया नागरिककें सुरक्षा दे सकैत अछि। मुदा नियम साध्यसँ कटि जाए तेँ मनुष्य फाइल आ संख्या बनि जाइत अछि। नौकरशाहीक आलोचना नियमहीनता माँगब नहि। सरल प्रक्रिया, कारण-लेखन, समय-सीमा, स्थानीय भाषा आ अपील व्यवस्था तर्कीकरणकें मानवीय बना सकैत अछि। दक्षता गरिमाक विरोधी नहि, जँ लक्ष्य स्पष्ट हो। 58.7 बाजार आ जीवनक क्षेत्र बाजार विनिमय, विकल्प आ नवोन्मेष बढ़बैत अछि, मुदा सभ वस्तु बाजार योग्य नहि। मत, न्याय, शरीर वा सार्वजनिक पद खरीद योग्य बनला पर समान नागरिकता नष्ट होइत अछि। कहाँ मूल्य तय करब उपयोगी आ कहाँ नैतिक सीमा चाही--ई प्रसंगगत प्रश्‍न। स्वास्थ्य, शिक्षा आ जलक पहुँच केवल भुगतान-क्षमतापर छोड़ला सँ मूल क्षमता असमान हो सकैत अछि। 58.8 औपनिवेशिक ज्ञान-वर्गीकरण औपनिवेशिक शासन जनगणना, मानचित्र, कानून आ भाषिक वर्गीकरणसँ समाजकेँ जानैत आ नियंत्रित करैत छल। ई अभिलेख महत्त्वपूर्ण स्रोत, मुदा शासनक उद्देश्य आ श्रेणी सँ मुक्त नहि। औपनिवेशिक स्रोत नकारल नहि जाए; स्थानीय अभिलेख, मौखिक स्मृति आ बादक शोधसँ तुलना कएल जाए। “आधुनिक” संस्था केवल बाहरी आरोपण वा शुद्ध प्रगति-दुनू एकरेख कथा अपर्याप्त। 58.9 समय, गति आ विस्थापन आधुनिक जीवन गति बढ़बैत अछि--यातायात, संचार, उत्पादन। गति अवसर दैत, मुदा पुरान कौशल, सम्बन्ध आ परिवेश तेजी सँ अप्रासंगिक कारि सकैत अछि। सभ समूह परिवर्तनक लागत समान नहि वहैत। प्रगतिक माप समय बचत मात्र नहि। बचल समय ककरा भेटल, श्रमक तीव्रता बढ़ल की नहि, आ देखभाल लेल समय बचल की नहि--ई प्रश्‍न आवश्यक। 58.10 बहु-आधुनिकता आधुनिकता एक यूरोपीय नमूना सभ समाजमे प्रतिलिपि होयब नहि। स्थानीय इतिहास, धर्म, भाषा आ राजनीतिक संघर्ष आधुनिक tench भिन्न रूप दैत अछि। विज्ञान वा लोकतन्त्र ग्रहण करब सांस्कृतिक आत्मसमर्पण आवश्यक नहि। बहु-आधुनिकता नामपर अधिकार-विरोधी प्रथा बचाओल सेहो नहि जाए। स्थानीय रुपक सम्मान आ सार्वभौम गरिमाक परीक्षा एक संग सम्भव अछि। अध्याय-निष्कर्ष आधुनिकता एकटा अपूर्ण परियोजना, संघर्षशील इतिहास आ बहुवचन अनुभव अछि। ओकर आलोचना आधुनिक उपलब्धिक निषेध नहि; ओकर मुक्ति-दाबीक नैतिक परीक्षण अछि। अध्याय-ग्रन्थसूचौ Max Weber — Economy and Society. Jurgen Habermas — The Philosophical Discourse of Modernity. Michel Foucault — Discipline and Punish. Charles Taylor — Sources of the Self. Dipesh Chakrabarty — Provincializing Europe. M. K. Gandhi — Hind Swaraj.