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विज्ञान मानव इतिहासक सबसँ शक्तिशाली ज्ञान-पद्धतिसभमे एक अछि। आधुनिक चिकित्सा, संचार, कृषि,
ऊर्जा, परिवहन, पदार्थ-विज्ञान आ ब्रह्माण्ड-बोध विज्ञानसँ गहराइत बदलल। मुदा वैज्ञानिक ज्ञानक शक्ति स्वत:
नैतिक दिशा नहि दैत। “की सम्भव अछि?” आ “की करबाक चाही?” अलग प्रश्न छथि।
59.1 विज्ञानक ज्ञानात्मक शक्ति
विज्ञानक शक्ति केवल तथ्य-संग्रह नहि; सार्वजनिक परीक्षण, मापन, पुनरावृत्ति, गणितीय प्रतिरूप,
परिकल्पना-संशोधन आ आलोचनात्मक समुदायमे अछि। एहि कारण समानान्तर दर्शन विज्ञानकें “एक मत”
मात्र नहि मानैत। प्रकृतिक अनुभवजन्य प्रश्नमे वैज्ञानिक पद्धति विशेष सार्वजनिक अधिकार रखैत अछि। मुदा
वैज्ञानिक समुदाय सेहो मानवीय संस्था अछि--ज्रुटि, हित-संघर्ष आ पूर्वग्रह सम्भव; तँँ समीक्षा आवश्यक।
59.2 तथ्यसँ मूल्य स्वतः नहि निकलैत
जैविकी बता सकैत अछि जे आनुवंशिक विशेषता कोना संचरित होइत अछि; ई नहि बतबैत जे समाज ककरा
अधिक मूल्यवान मानय। तंत्रिका-विज्ञान निर्णय-प्रक्रिया वर्णित कऽ सकैत अछि; ई स्वतः दण्ड-नीतिक न्याय
तय नहि करेत। विज्ञान नैतिक निर्णयक तथ्यगत आधार मजबूत करैत अछि, मुदा मूल्यक सम्पूर्ण स्रोत नहि।
59.3 द्वि-उपयोगी ज्ञान
परमाणु-विज्ञान ऊर्जा आ चिकित्सा दुनूमे उपयोगी, संगहि विनाशकारी हथियारमे। जैविकी उपचारक साधन,
संगहि भेदभावपूर्ण आनुवंशिक राजनीति लेल दुरुपयोग। कृत्रिम बुद्धि सहायता, शिक्षा आ खोज बढ़ा सकैत
अछि, संगहि निगरानी, भ्रम-सृजन आ श्रम-विस्थापनक साधन। तकनीकी क्षमता नैतिक अनुमति नहि।
59.4 विशेषज्ञता आ लोकतन्त्र
जटिल वैज्ञानिक UA विशेषज्ञता आवश्यक अछि, मुदा सार्वजनिक नीति केवल विशेषज्ञके सौंपि देब
लोकतान्त्रिक समस्या उत्पन्न करैत। विशेषज्ञ “की सम्भावित?” बता सकैत छथि; नागरिक समाज “कतेक
जोखिम स्वीकार्य?”, “लाभ ककरा?”, “हानि ककरा?” जकाँ मूल्य-प्रशन पूछैत अछि। उचित व्यवस्था
विशेषज्ञ ज्ञान आ लोकतान्त्रिक उत्तरदायित्व जोडत अछि।
59.5 वैज्ञानिकतावाद आ विज्ञान-विरोध
वैज्ञानिकतावाद विज्ञानक सफलता देखिकऽ मानि लैत अछि जे सभ सार्थक प्रश्नक उत्तर विज्ञान अकेले देत।
विज्ञान-विरोध उलटा रूपमे वैज्ञानिक प्रमाणके केवल सत्ता-कथा मानि खारिज HS सकैत अछि। समानान्तर
दर्शन दुनूसँ दूरी रखैत अछि: विज्ञानक प्रमाण-अनुशासन स्वीकारू, मुदा ओकर क्षेत्र-सीमा बुझू।
पूर्वपक्षः नैतिकता व्यक्तिपर निर्भर; विज्ञान मात्र वस्तुनिष्ठ, तेँ नीति विज्ञानकें तय करबाक चाही।
उत्तरपक्षः विज्ञान वस्तुगत तथ्यक अनुशासित ज्ञान दैत अछि, मुदा “ककर हित?”, “कतेक जोखिम?”,
“कोन अधिकार?” जकाँ प्रश्न नैतिक-राजनीतिक औचित्य माँगैत अछि।
59.11 पुनरुत्पादनक संकट
एक अध्ययनक परिणाम स्वतंत्र दल द्वारा फेर नहि भेटला पर कारण धोखा ही हो--एहन नहि। छोट नमूना,
चयन-पक्षपात, अस्पष्ट विधि वा सांख्यिक आकस्मिकता कारण हो सकैत अछि।
पुनरुत्पादन मूल शोधक अपमान नहि; सामूहिक त्रुटि-सुधारक भाग। नकारात्मक परिणाम प्रकाशित हो, विधि
आ डेटा सम्भव सीमा धरि खुलल रहय।
सभ क्षेत्र एकहि प्रकारसँ पुनरुत्पादित नहि। ऐतिहासिक घटना पुनः घटाओल नहि जा सकैत, मुदा स्रोत-पद्धति
आ विश्लेषण स्वतंत्र STS जाँचल जा सकैत अछि।
59.12 मापन आ मानवीय अवधारणा
बुद्धि, गरीबी, स्वास्थ्य वा सुख मापब लेल सूचक चुनल जाइत अछि। सूचक वस्तु स्वयं नहि; कोन पक्ष गिनल
आ कोन छुटल से परिणाम बदलैत अछि।
मापन बिना नीति अन्ध हो सकैत, मुदा संख्या मात्र पूर्ण सत्य नहि। अवधारणात्मक परिभाषा, मापनक
विश्वसनीयता आ प्रभावित अनुभव जोड़ल जाए।
एक सूचक लक्ष्य बनला पर संस्था ओकरा सुधारि वास्तविक उद्देश्य उपेक्षित करि सकैत अछि। अनेक माप
आ स्वतंत्र समीक्षा चाही।
59.13 विज्ञानक वित्तपोषण आ प्रश्न-चयन
कुन रोग, तकनीक वा क्षेत्रपर शोध हो--ई केवल सत्यक अमूर्त क्रम नहि; धन, बाजार, राज्य आ जनदबाव
प्रभावित करैत अछि। जे समस्या गरीब समुदायक अछि ओकर आर्थिक आकर्षण कम भऽ सकैत।
वित्तदाता परिणाम आदेश देत तँ विश्वसनीयता नष्ट; मुदा प्रश्न-चयनमे सामाजिक प्राथमिकता वैध। हित-संघर्ष
घोषित हो, शोधक स्वतन्त्रता आ परिणाम-प्रकाशन सुरक्षित रहय।
सार्वजनिक धनक उपयोगमे नागरिकक आवाज हो, मुदा लोकप्रियता कठिन मूल अनुसन्धान समाप्त नहि
करय। अल्पकालीन उपयोग आ दीर्घकालीन ज्ञान संतुलित हो।
59.14 पूर्वपक्षः विज्ञान स्वयं नैतिक दिशा देत
यदि मनुष्यक व्यवहार आ सुख वैज्ञानिक STS बुझल जाए, तेँ नैतिकता सेहो तथ्यसँँ निकालल जा सकैत--
एहन दावा होइत अछि। विज्ञान हानिक परिणाम आ मानवीय आवश्यकता सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण प्रमाण दैत
अछि।
मुदा 'लोक ई चाहैत अछि'सँ “ई उचित अछि” स्वतः नहि। इच्छा गलत सूचना, भय वा प्रभुत्वसँ बनल हो
सकैत। मूल्य-संघर्षमे समानता, स्वतंत्रता आ वितरणक तर्क चाही।
नेतिक दर्शन विज्ञानविरोधी नहि; ओ तथ्यक आधारपर लक्ष्यक औचित्य Ysa अछि। विज्ञान साधन बतबैत,
नागरिक समाज मूल्य तय करेत-दुनू संवादरत रहय।
59.6 विज्ञानक संस्थागत नैतिकता
विज्ञान व्यक्तिक प्रतिभा मात्र नहि; प्रयोगशाला, वित्त, पत्रिका, समीक्षा आ सार्वजनिक विश्वासक संस्था
अछि। हित-संघर्ष, चयनात्मक प्रकाशन वा डेटा छिपेबा सँ पद्धति कमजोर होइत अछि।
ज्रुटि स्वीकारब विज्ञानक कमजोरी नहि। सुधार, पुनर्परीक्षण आ डेटा-पारदर्शिता विश्वसनीयता बढ़बैत अछि।
संस्थागत प्रोत्साहन सत्य-खोजक अनुरुप होयत।
59.7 अनुसंधानमे मानव प्रतिभागी
ज्ञानक लाभ लेल व्यक्तिक देह वा डेटा साधन मात्र नहि बनि सकैत। सूचित सहमति, जोखिमक न्यूनता,
वापसीक अधिकार आ कमजोर समूहक सुरक्षा आवश्यक।
सहमति पत्र पर्याप्त नहि जँ भाषा अबुझ, उपचारक विकल्प अस्पष्ट वा आर्थिक दबाव प्रबल हो। नैतिक समीक्षा
निरन्तर प्रक्रिया हो, एक बेरक अनुमति नहि।
59.8 विज्ञान-संचार
विशेषज्ञ निष्कर्ष जनभाषामे पहुँचबैत समय तकनीकी सीमा गायब भऽ सकैत अछि। सनसनीपूर्ण शीर्षक
सम्भाव्यता केँ निश्चित तथ्य बना दैत अछि।
उचित संचार मुख्य निष्कर्ष, पद्धति, नमूना, अनिश्चितता आ व्यावहारिक अर्थ अलग बतबैत अछि। मैथिलीमे
विज्ञान-लेखन ज्ञान-अधिकारक अंग अछि; अनुवाद सटीक आ पठनीय दुनू हो।
59.9 नागरिक विज्ञान आ स्थानीय ज्ञान
स्थानीय लोक दीर्घ अनुभवसँ नदी, मौसम, बीज वा रोगक संकेत जानि सकैत छथि। ई ज्ञान अनुसन्धानक
प्रश्न आ अवलोकन समृद्ध करैत अछि।
स्थानीयता सत्यक स्वतः प्रमाण नहि। व्यवस्थित अभिलेखन, तुलना आ वैज्ञानिक परीक्षण आवश्यक।
विशेषज्ञता आ स्थानीय अनुभव प्रतिस्पर्धी नहि, अलग प्रमाणीय शक्ति रखैत अछि।
59.10 विज्ञान आ मूल्यक संयुक्त निर्णय
विज्ञान बतबैत अछि कोन साधनसँ सम्भावित परिणाम की; समाज तय करेत अछि कोन परिणाम उचित आ
जोखिम कतेक स्वीकार्य। मुदा मूल्य निर्णय तथ्य सँ स्वतंत्र मनमानी नहि। गलत तथ्यपर न्यायपूर्ण नीति बनि
नहि सकैत।
विशेषज्ञ विकल्प स्पष्ट करथि, नागरिक प्राथमिकता आ वितरणपर विचार करथि। निर्णयक कारण सार्वजनिक
हो, असहमति दर्ज हो, आ नूतन प्रमाणपर संशोधन सम्भव रहय।
अध्याय-निष्कर्ष