एहि ग्रन्थमे प्रस्तावित समानान्तर दर्शनक पहिल मूल सिद्धान्त अछि--बहुप्रमाणीय विवेकवाद। एकर अर्थ ई नहि जे सभ प्रमाण समान अछि वा सभ विश्वास सत्य हो सकैत अछि। एकर अर्थ अछि--सत्य अछि, ज्ञान सम्भव अछि, मुदा ज्ञान एकमात्र प्रकारक प्रमाणपर निर्भर नहि। प्रत्यक्ष, अनुमान, विश्वसनीय कथन, दस्तावेज, ऐतिहासिक स्रोत, वैज्ञानिक परीक्षण, आत्मानुभव, सांख्यिकीय आँकड़ा, संस्थागत अभिलेख--सभक अपन- अपन उचित क्षेत्र अछि। प्रमाणक बहुलता स्वीकारु, प्रमाणक अराजकता नहि। 65.1 'बहुप्रमाणीय' किएक? मानवीय प्रश्‍न एकरूप नहि। औषधिक प्रभाव जानबाक तरीका व्यक्तिगत धार्मिक अनुभूतिसँ अलग; प्राचीन राजवंशक तिथि जानबाक तरीका प्रयोगशाला-परीक्षणसँ अलग; व्यक्तिगत पीड़ाक अनुभव जानबाक तरीका जनगणना-सारणीसँ अलग। जे प्रमाण एक क्षेत्रमे उचित, दोसरमे अपर्याप्त भऽ सकैत अछि। बहुप्रमाणीयता एहि क्षेत्रभेदकैँ स्वीकारैत अछि। 65.2 "विवेकवाद' किएक? प्रमाण अनेक छथि, मुदा निर्णयक कसौटी चाही। विवेकवादक अर्थ अछि-_दाबी स्पष्ट हो, प्रमाण दाबीसँ सम्बद्ध हो, विरोधी प्रमाण सुना जाए, स्रोतक विश्वसनीयता जाँचल जाए, निष्कर्ष प्रमाणक बलानुसार सीमित हो, आ नव प्रमाण आएलापर संशोधन सम्भव हो। ई अचूकतावाद नहि, अनुशासित त्रुटिसंशोध्यवाद अछि। 65.3 प्रमाणक क्षेत्र प्रत्यक्ष तत्काल अनुभवक मजबूत स्रोत अछि, मुदा भ्रम सम्भव। अनुमान ज्ञातसँ अज्ञात धरि पहुँचैत अछि, मुदा व्याप्ति वा कारण-संरचना चाही। शब्द वा testimony विशाल सामाजिक ज्ञानक आधार अछि, मुदा वक्ता, संस्था आ स्रोतक विश्वसनीयता जाँचल जाए। दस्तावेज इतिहासक साक्ष्य अछि, मुदा निर्माण-उद्देश्य आ मौन देखल जाए। वैज्ञानिक परीक्षण प्रकृतिक अनुभवजन्य प्रश्नमे सर्वोत्तम सार्वजनिक पद्धतिसभमे एक अछि, मुदा नैतिक मूल्य स्वयं प्रयोगशालासँ नहि निकलैत। आत्मानुभव निजी जीवनक अर्थपूर्ण प्रमाण भऽ सकैत अछि, मुदा सार्वभौम सार्वजनिक दाबीक स्वत: पर्याप्त आधार नहि। 65.4 निजी कारण आ सार्वजनिक कारण व्यक्तिगत धार्मिक अनुभूति व्यक्ति लेल विश्वासक गहिर आधार भऽ सकैत अछि। मुदा आन नागरिकपर कानून थोपबाक लेल “हम अनुभव कएलहुँ पर्याप्त सार्वजनिक कारण नहि। एहि प्रकार निजी प्रमाणक अपमान नहि होइत; ओकर क्षेत्र स्पष्ट होइत अछि। समान सिद्धान्त अन्य क्षेत्रमे सेहो लागू: व्यक्तिगत सफलता आर्थिक नीति सिद्ध नहि करैत; एक रोगीक अनुभव औषधिक सार्वभौमिक प्रभाव सिद्ध नहि करेत; एक अभिलेख पूरा इतिहास सिद्ध नहि करैत। 65.5 प्रमाणक श्रेणीकरण नहि, संदर्भीकरण बहुप्रमाणीय विवेकवाद स्थायी सीढ़ी नहि बनबैत जे “विज्ञान सदा ऊपर, लोकस्मृति सदा नीचे” वा उलटा। प्रश्‍न दाबीक प्रकृति अछि। मौसमक तापमान लेल उपकरणीय आँकड़ा लोकगीतसँ अधिक उचित; समुदाय ककरा पवित्र मानैत अछि तकर अध्ययन लेल लोकगीत महत्त्वपूर्ण; प्राचीन घटना लेल समकालीन शिलालेख बादक किंवदन्तीसँ अधिक प्रत्यक्ष ऐतिहासिक स्रोत भऽ सकैत अछि। प्रमाणक मूल्य संदर्भ-सापेक्ष, सत्य मनमाना नहि। 65.6 भारतीय प्रमाणमीमांसा संग संवाद न्याय, मीमांसा, बौद्ध आ अन्य भारतीय परम्परासभ प्रमाणक संख्या, स्वरूप आ प्रामाण्यपर दीर्घ बहस करैत छथि। बहुप्रमाणीय विवेकवाद एहि परम्परासभसँ प्रेरणा लैत अछि-विशेषतः ज्ञान-स्रोतकें विश्लेषणक विषय बनाबय सँ-मुदा स्वयं कोनो एक शास्त्रीय विद्यालयक पुनरावृत्ति नहि। आधुनिक विज्ञान, इतिहासलेखन, सामाजिक ज्ञान आ डिजिटल स्रोत-समीक्षाकें सेहो एहि रूपरेखामे स्थान देल गेल अछि। 65.7 पाश्चात्य ज्ञानमीमांसा संग संवाद अनुभववाद अनुभवक महत्त्व, बुद्धिवाद तर्कक संरचना, व्यवहारवाद जाँचक परिणाम, सामाजिक ज्ञानमीमांसा testimony आ संस्थाक भूमिका, तथा आधुनिक fallibilism संशोधनशीलताक महत्त्व देखबैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि अन्तर्दृष्टिसभकें एक बन्द मिश्रण नहि बनबैत; समस्या अनुसार संवाद करेत अछि। 65.8 प्रमाण-अराजकता किएक अस्वीकार्य जँ प्रत्येक व्यक्ति कहय--*हमर प्रमाण हमर लेल”, आ कोनो साझा कसौटी नहि, तँ सार्वजनिक ज्ञान विघटित भऽ जाएत। चिकित्सक परीक्षण आ अफवाह, अभिलेख आ कल्पना, विशेषज्ञ आँकडा आ मनगढ़न्त संख्या समान स्तरपर नहि। बहुलता समानता नहि। प्रमाणक प्रकार अनेक, मुदा दाबी-प्रमाण सम्बन्ध सार्वजनिक आलोचनाक योग्य रहत। 65.9 चारि-स्तरीय निष्कर्ष-भाषा बहुप्रमाणीय विवेकवाद निष्कर्षकेँ चारि स्तरमे व्यक्त करबाक प्रस्ताव करेत अछि: मजबूत रूपसँ समर्थित; सम्भावित; विवादित; अज्ञात। एहि भाषा सँ झूठी निश्चितता आ झूठी समानता दुनू घटैत अछि। जहाँ प्रमाण मजबूत, ओतय साहसपूर्वक कहू; जहाँ सीमित, ओतय सीमा स्पष्ट करु; जहाँ स्रोत विरोधी, विवाद स्वीकारु; जहाँ प्रमाण नहि, अज्ञात कहू। 65.10 सत्ता आ प्रमाण सत्ता प्रमाणक उपलब्धता प्रभावित करैत अछि--ककर अभिलेख सुरक्षित, ककर भाषा प्रकाशित, ककर अनुभव “Ser बनैत अछि। तेँ बहुप्रमाणीय विवेकवाद स्रोत-विस्तारक पक्षमे अछि। मुदा सत्ता-विमर्श सत्यक विकल्प नहि। उपेक्षित स्रोतकें स्थान देल जाए, तकरा आलोचनासँ मुक्त नहि कएल जाए। 65.11 नैतिक सीमा ज्ञानक पद्धति केवल afer नहि, नैतिक सेहो अछि। जानि-बुझि कऽ कमजोर स्रोतकें मजबूत बतायब, विरोधी प्रमाण छिपायब, अनिश्चितताकें निश्चित बतायब--ई ज्ञानात्मक बेईमानी अछि। समानान्तर दर्शन सत्य- अन्वेषणकेँ गरिमा आ जिम्मेवारीसँ जोडत अछि। पूर्वपक्षः बहुप्रमाणीयता अन्ततः सापेक्षतावाद नहि बनत? उत्तरपक्षः नहि, कारण प्रमाणक प्रकार अनेक मानल गेल अछि, सत्यक मापदण्ड समाप्त नहि। प्रत्येक दाबीकेँ उचित क्षेत्रक प्रमाण, तर्कसंगति, प्रतिपक्ष आ संशोधन सहन करय पड़त। सूत्र अछि--प्रमाणक बहुलता स्वीकारू, प्रमाणक अराजकता AS? 65.17 झूठा संतुलन दू विरोधी मत अछि कहि ich समान समय देब निष्पक्षता लगि सकैत, मुदा प्रमाण अत्यन्त असमान हो तखन झूठा संतुलन उत्पन्न होइत। अल्पमत मतक अस्तित्व ओकर वैज्ञानिक वजन नहि। तथापि बहुमत मत आलोचनासँ मुक्त नहि। प्रस्तुति सहमतिक विस्तार, प्रमाणक प्रकार आ वास्तविक अनिश्चितता बताबय। माध्यम 'दूनू पक्ष'क बदला दाबीक प्रमाणीय वजन देखय। नैतिक विवादमे मूल्यभेद स्पष्ट करय; तथ्यगत प्रश्‍नमे स्रोत। 65.18 प्रमाण-संकलनक क्रम पहिने मनपसन्द निष्कर्ष चुनि समर्थन खोजब पुष्टि-पक्षपात अछि। अनुसन्धान प्रश्‍न, समावेशन-कसौटी आ निष्कर्ष बदलयवला प्रमाण पहिनेसँ लिखि सकैत अछि। इतिहास वा दर्शनमे पूर्ण पूर्व-पंजीकरण सम्भव नहि, मुदा स्रोत-चयन पारदर्शी हो। विरोधी ग्रन्थ आ असंगत उदाहरण जानि-बूझि शामिल कएल जाए। निष्कर्ष लिखलाक बाद स्रोत जोड़ब citation Aa, grounding नहि। तर्कक प्रत्येक तथ्यगत चरण स्रोतसँ मेल खाय। 65.19 आप्तक आधुनिक रूप विश्वसनीय वक्ता केवल ईमानदार व्यक्ति नहि; विषयक क्षमता, प्रत्यक्ष पहुँच, सही संप्रेषण आ हित-संघर्षक अभाव चाही। आधुनिक संस्था सामूहिक आप्त जकाँ काम करि सकैत अछि जँ समीक्षा आ सुधार हो। प्रतिष्ठा उपयोगी संकेत, सत्यक प्रमाण नहि। संस्था पुरान सफलता कारण विश्वसनीय, मुदा विशिष्ट दाबी एखनहुँ जाँच योग्य। अनाम विशेषज्ञक अपील कमजोर। नाम गोपनीय रहय तखन विधि, डेटा आ स्वतंत्र समीक्षा अधिक स्पष्ट हो। 65.20 पूर्वपक्ष: बहुप्रमाणीयता सापेक्षतावाद अछि अनेक प्रमाण मानलासँ लोक अपन मनपसन्द स्रोत चुनत--एहन भय उचित। जे क्षेत्र-सीमा नहि, अनुभव विज्ञानक स्थान आ शास्त्र इतिहासक स्थान AS सकैत। उत्तर ई जे बहुप्रमाणीयता समान वजन नहि। दाबी अनुसार प्राथमिक प्रमाण तय, सहायक प्रमाण जोड़ल, दोष जाँचल आ विरोधक नियम स्पष्ट। एकाधिकारविरोधी होयब कसौटीविरोधी नहि। उलटे अनेक स्वतंत्र मार्गक संगति वस्तुगतता मजबूत करेत अछि। 65.12 प्रमाणक क्षेत्र-सीमा प्रत्यक्ष वर्तमान दृश्य गुण बतबैत, अनुमान अदृश्य सम्बन्ध, शब्द दूरस्थ ज्ञान, स्मृति अतीत अनुभव। कोनो प्रमाण सभ प्रश्‍नक एकाधिकार नहि। क्षेत्रक भेद श्रेणीक्रम नहि। जहाँ अनेक प्रमाण लागू हो, ओतय संगति, स्वतंत्रता आ स्रोत-दोष जाँचल जाए। विरोध भेला पर जल्दी औसत नहि; प्रत्येक प्रमाण की वास्तवमे एकहि दाबीपर बोलैत अछि से देखल जाए। 65.13 विश्वासक स्तर निष्कर्षकें सत्य/झूठक दू घरमे मात्र नहि राखल जाए। प्रमाणित, अत्यन्त सम्भावित, सम्भावित, विवादित आ अज्ञात-जकाँ स्तर निर्णयक ईमानदारी बढ़बैत अछि। स्तर शब्द मात्र नहि; ककर प्रमाणसँ बदलत से लिखल जाए। नूतन स्रोत भेटला पर वर्ग बदलि सकैत अछि। अनिश्चितता प्रतिष्ठा-हानि नहि। 65.14 विशेषज्ञ असहमति विशेषज्ञसभ असहमत होथि तँ साधारण नागरिक सभ मत समान मानि नहि सकैत। योग्यता, प्रासंगिक क्षेत्र, प्रमाणक गुणवत्ता, सहमतिक विस्तार आ हित-संघर्ष जाँचल जाए। अल्पमत मत केवल अल्पमत कारण गलत नहि, मुदा स्थापित निष्कर्ष बदलयवला सबल प्रमाण देबाक भार अधिक हो सकैत अछि। संस्था आलोचना लेल खुलल रहय। 65.15 अनुभवक प्रमाणीय दर्जा व्यक्तिगत अनुभव पीड़ा, अपमान वा अर्थक प्रत्यक्ष स्रोत अछि। बाहरी पर्यवेक्षक ओकरा पूर्ण प्रतिस्थापित नहि कऽ सकैत। मुदा अनुभवक कारण सम्बन्धी व्याख्या त्रुटिपूर्ण भऽ सकैत अछि। “हम अनुभव कएल” आ 'एकर कारण ई अछि” अलग दाबी। पहिलकें सम्मानपूर्वक सुनल जाए, दोसरकें वैकल्पिक कारण आ व्यापक प्रमाणसँ जाँचल जाए। 65.16 प्रमाण आ निर्णय समान प्रमाणपर लोक जोखिम-मूल्य अलग होयबा कारण भिन्न नीति चुनि सकैत अछि। प्रमाण निर्णयक परिणाम बतबैत, मूल्य प्राथमिकता तय करैत अछि। ई भेद तथ्यकेँ राजनीति सँ अलग टापू नहि बनबैत। प्रमाण-चयनमे मूल्य प्रवेश करि सकैत, मुदा खुलल पद्धति सुधार सम्भव बनबैत अछि। सार्वजनिक निर्णय तथ्य, मूल्य आ वितरण अलग स्पष्ट करय। अध्याय-निष्कर्ष बहुप्रमाणीय विवेकवाद समानान्तर दर्शनक ज्ञानमीमांसात्मक आधार अछि। ई एक तरफ एकमात्र प्रमाण- पद्धतिक साम्राज्यवाद अस्वीकारैत अछि, दोसर तरफ A बराबर'क अराजकता। सत्यक खोज क्षेत्रानुकूल प्रमाण, साझा आलोचना, स्रोत-समीक्षा, ज्ञानात्मक विनम्रता आ संशोधनशीलतासँ होयत। अध्याय-ग्रन्थसूचौ गौतम — Nyaya-sitra. गङ्गेश उपाध्याय — Tattvacintamani. Bimal Krishna Matilal — Perception; Logic, Language and Reality. Stephen H. Phillips — Epistemology in Classical India. David Hume — An Enquiry Concerning Human Understanding. John Dewey — Logic: The Theory of Inquiry. Miranda Fricker — Epistemic Injustice.