समानान्तर दर्शनक नैतिक केन्द्र गरिमा अछि। गरिमाक अर्थ ई जे प्रत्येक मनुष्यक मूल नैतिक मूल्य जन्म, जाति, लिंग, धन, भाषा, धर्म, क्षमता, पद, उपयोगिता वा बहुमतक स्वीकृतिसँ पहिने अछि। मनुष्यकें केवल साधन, संख्या, श्रमशक्ति, मतदाता, उपभोक्ता वा समुदायिक प्रतिष्ठाक वाहक बनाकऽ नहि देखल जा सकैत अछि। 67.1 गरिमा आ मूल्य गरिमा समान मानवीय दर्जाक दावा अछि। ई दावा ई नहि कहैत अछि जे सभ व्यक्तिक गुण, आवश्यकता, उपलब्धि वा जिम्मेवारी समान अछि। ई कहैत अछि जे ककरो मूल मानवीय दर्जा कम नहि। अपराधी सेहो विधिसम्मत प्रक्रिया पाबय; गरीब सेहो सम्मान; अल्पसंख्यक सेहो समान नागरिकता; असहमत व्यक्ति सेहो अपमानरहित व्यवहार। 67.2 जन्म नैतिक योग्यता नहि जाति, वंश, लिंग वा परिवारक आधारपर नैतिक उच्चता मानब एहि सिद्धान्तसँ असंगत अछि। जन्म संयोग अछि, उपलब्धि नहि। जन्माधारित विशेषाधिकार तखन सार्वजनिक औचित्य माँगत जखन ओकरा राज्य, शिक्षा, सम्पत्ति, प्रतिनिधित्व वा सामाजिक अवसरमे रूपान्तरित कएल जाए। 67.3 स्वायत्तता, पीड़ा आ न्याय गरिमा-आधारित नैतिकता चारि मुख्य कसौटी प्रस्तावित Hed अछि: कोनो कर्म अनावश्यक पीड़ा बढ़बैत अछि की? ककरो स्वायत्तताकें अनुचित STS नष्ट Hed अछि की? ककरो समान मानव-दर्जाकें नकारैत अछि की? लाभ आ भार न्यायपूर्ण Sus बाँटल अछि की? एहि ale usta नीति, पारिवारिक व्यवहार, चिकित्सा, तकनीक, दण्ड आ सामाजिक प्रथा जाँचल जा सकैत अछि। 67.4 स्वायत्तता अकेले पर्याप्त नहि व्यक्ति “स्वतंत्र निर्णय” तखन अर्थपूर्ण रूपसँ करेत अछि जखन ओकरा जानकारी, विकल्प, न्यूनतम संसाधन आ दबावसँ रक्षा उपलब्ध हो। भूख, जातिगत भय, आर्थिक निर्भरता वा घरेलू हिंसाक बीच कएल “चयन” कें पूर्ण स्वतंत्रता मानब गलत हो सकैत अछि। गरिमा तँ औपचारिक स्वीकृतिक संग वास्तविक परिस्थितिक परीक्षण माँगैत अछि। 67.5 करुणा आ अधिकार केवल अधिकारक भाषा कखनो सम्बन्धक नैतिकता कम करैत अछि; केवल करुणा कखनो पितृसत्तात्मक संरक्षण बनि सकैत अछि। समानान्तर दर्शन अधिकारक समानता आ करुणाक मानवीयता जोड़ैत अछि। करुणा व्यक्ति पर नियन्त्रणक अनुमति नहि; अधिकार संवेदनहीनता नहि। 67.6 कान्ट, बौद्ध-जैन परम्परा आ आम्बेडकरसँ संवाद arch मनुष्यके साधन मात्र नहि मानबाक सिद्धान्त, बौद्ध करुणा, जैन अहिंसा आ आम्बेडकरक समानता- स्वतंत्रता-बन्धुत्वक आग्रह एहि ढाँचासँ संवाद करैत अछि। मुदा गरिमा-आधारित नैतिकता एहि ग्रन्थमे अपन स्वतन्त्र संरचना रखैत अछि: समान दर्जा, स्वायत्तता, पीड़ा-न्यूनता आ न्यायपूर्ण भार-वितरण। 67.7 पूर्वपक्ष: गरिमा बहुत अमूर्त शब्द अछि आपत्ति ई जे “गरिमा” सभ पक्ष अपन सुविधानुसार उपयोग HS सकैत अछि। उत्तरपक्षः गरिमाकेँ परीक्षणीय नैतिक प्रश्‍नमे बदलू गरिमा केवल भावुक शब्द नहि रहय, तेँ एहि अध्यायमे ओकर परिचालन चारि कसौटीसँ कएल गेल अछि पीड़ा, स्वायत्तता, समान दर्जा, न्यायपूर्ण वितरण। जँ कोनो प्रथा एहि चारिमे निरन्तर विफल होइत अछि, ओकर नैतिक औचित्य गंभीर रूपसँ कमजोर अछि। 67.13 गरिमा आ मृत्यु गंभीर रोगमे गरिमा जीवनक जैविक अवधि मात्र नहि, पीड़ा-नियन्त्रण, जानकारी, सम्बन्ध आ व्यक्तिक मूल्यसँ Usd अछि। उपचारक प्रत्येक सम्भावना अपनाओल ही सम्मान--एहन जरुरी नहि। जीवन समाप्त करबाक निर्णय अत्यन्त जटिल; क्षमता, दबाव, उपचारक विकल्प आ कानूनक सुरक्षा चाही। आर्थिक बोझ कारण कमजोर व्यक्ति स्वयंकॅ भार मानि निर्णय नहि लय। अन्तिम देखभालमे सत्य कहब करुणाविहीन नहि; भाषा, समय आ आशाक यथार्थ रूप महत्त्वपूर्ण। परिवार आ रोगीक इच्छा टकराला पर रोगीक अधिकार केन्द्रमे रहय। 67.14 दण्ड आ गरिमा दोष सिद्ध भेला पर स्वतंत्रता सीमित हो सकैत, मुदा यातना, अपमानजनक स्थिति वा मूल उपचार-वंचना उचित नहि। दण्ड कृत्यपर, मनुष्यत्वपर नहि। कारागारक स्थिति न्यायिक दण्डक अघोषित विस्तार नहि बनय। निगरानी, शिकायत आ पुनर्वास आवश्यक। पीड़ितक गरिमा सेहो केन्द्रमे। अपराधीक अधिकारक चर्चा पीड़ितिक आवाज मिटाबय नहि; प्रतिकार, सुरक्षा आ सत्य-स्वीकृति संयुक्त हो। 67.15 गरिमाक संस्थागत परीक्षण नीति गरिमा मानेत अछि की नहि से चारि प्रश्‍न पूछल जा सकैत: व्यक्ति कॅ सुना गेल? कारण बुझाओल गेल? अपील सम्भव? न्यूनतम जीवन-शर्त सुरक्षित? सम्मानजनक भाषा रहितो निर्णय मनमाना हो सकैत; अच्छा परिणाम रहितो अपमानजनक प्रक्रिया हानि दैत। प्रक्रिया आ परिणाम दुनू जाँचल जाए। गरिमा-मूल्यांकनमे प्रभावित व्यक्तिक साक्ष्य आवश्यक, मुदा तुलनात्मक आँकड़ा Gell एक चमकदार उदाहरण संस्थागत नमूना छिपा सकैत अछि। 67.16 पूर्वपक्षः गरिमा धार्मिक अवधारणा मात्र किछु परम्परा गरिमाकेँ ईश्वर-प्रदत्त मानैत; तँ धर्मनिरपेक्ष समाजमे आधार कमजोर कहल जाइत अछि। मुदा समान दर्जा, पीड़ा, स्वायत्तता आ पारस्परिक मान्यतासँ सार्वजनिक तर्क विकसित भऽ सकैत। धार्मिक आधार विश्वासीक लेल अतिरिक्त गहराई दे सकैत, राज्यक साझा औचित्य एक स्रोतपर निर्भर नहि हो। बहु-आधार TAT कमजोर नहि, व्यापक समर्थन दैत अछि--जँ व्यावहारिक अधिकारपर सहमति हो। अन्तिम तत्त्वमीमांसात्मक मतभेद सहअस्तित्वमे रहि सकैत। 67.8 गरिमाक अविभाज्य न्यूनतम गरिमा उपलब्धि, उपयोगिता वा सामाजिक सम्मानसँ पूर्ण निर्भर हो तँ कमजोर व्यक्ति अधिकार गमा देत। गरिमाक न्यूनतम प्रत्येक मनुष्यक समान नैतिक दर्जा अछि। एहि न्यूनतमक अर्थ सभ व्यवहार समान नहि। जिम्मेदारी अनुसार आलोचना आ दण्ड सम्भव, मुदा अपमान, यातना वा मनुष्यत्व-नकार उचित नहि। दोषी व्यक्ति सेहो अधिकारविहीन वस्तु नहि। 67.9 स्वायत्तता आ सहायता निर्णय-क्षमता अस्थायी वा आंशिक भऽ सकैत अछि। सहायता देबाक अर्थ व्यक्ति दिससँ निर्णय छीनब नहि; बुझब योग्य सूचना, समय आ विश्वसनीय सहायक देब हो। जहाँ प्रतिनिधिक निर्णय आवश्यक, ओ व्यक्तिक ज्ञात इच्छा, हित आ न्यूनतम प्रतिबन्ध अनुसार हो। सुविधा लेल स्थायी अयोग्यता घोषित करब गरिमाविरोधी। 67.10 अपमान आ मान्यता भौतिक हानि बिना सेहो सार्वजनिक अपमान व्यक्तिक समान दर्जा घायल करैत अछि। नाम, बैठबाक स्थान, स्पर्श वा भाषिक सम्बोधन सत्ता व्यक्त करि सकैत अछि। कानून सभ अपमान रोकि नहि सकैत, मुदा संस्थागत भेदभाव रोकि सकैत अछि। शिक्षा आ सार्वजनिक संस्कृति समान सम्बोधन बनाबय। आलोचना विचारपर हो, जन्मगत पहिचानक मनुष्यत्वपर नहि। 67.11 गरिमा आ भौतिक शर्त भूख, असुरक्षित आवास वा उपचारक अभाव व्यक्तिक विकल्प आ सामाजिक दर्जा नष्ट करैत अछि। गरिमा केवल सम्मानजनक शब्द नहि; न्यूनतम भौतिक क्षमता ALTA अछि। कतेक न्यूनतम आ कोन माध्यम--ई सार्वजनिक विवादक विषय। नीति दया नहि, अधिकार रूपमे सेवा दे; प्रक्रिया अपमानरहित आ सुलभ हो। 67.12 गरिमाक संघर्षशील दाबी दू पक्ष अपन गरिमा दाबी करि सकैत अछि। धार्मिक आलोचनासँ ककरो भावना घायल, मुदा आलोचक अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता माँगय। समाधान 'गरिमा” शब्द दोहराओलासँ नहि। प्रत्यक्ष हानि, अधिकार, शक्ति, विकल्प आ उपाय जाँचल जाए। गरिमा आलोचनासँँ मुक्ति नहि; व्यक्ति केँ साधन मात्र, निम्न मनुष्य वा मौन वस्तु न बनायबक सीमा अछि। अध्याय-निष्कर्ष समानान्तर दर्शन कहैत अछि--हम अपन गरिमाक दावा तखन सुसंगत STS HS सकैत छी जखन दोसराक समान गरिमा मानैत छी। नैतिकता अपन सम्मानक रक्षा मात्र नहि, परस्पर सम्मानक नियम अछि। अध्याय-ग्रन्थसूचौ Immanuel Kant — Groundwork of the Metaphysics of Morals. John Stuart Mill — On Liberty.