समानान्तर रहबाक अर्थ मुख्यधाराक विरोध मात्र नहि। “समानान्तर” एहि ग्रन्थमे स्थानक नामसँ अधिक पद्धतिक नाम अछि। ई ओहि बौद्धिक स्थिति के कहल गेल अछि जतय स्थापित ज्ञानकें सम्मानपूर्वक जाँचल जाइत अछि, उपेक्षित lich खोजल जाइत अछि, दुनू पर समान आलोचनात्मक कसौटी लागू होइत अछि, आ निष्कर्ष स्वयं संशोधन लेल खुला रहैत अछि। 72.1 प्रश्‍नसँ आरम्भ, प्रश्‍नपर समाप्ति नहि एहि ग्रन्थक पहिल अध्याय दर्शनकेँ उत्तरक संग्रह नहि, कारण माँगबाक आत्मसचेत क्रिया मानैत छल। अन्तिम अध्यायमे सेहो ई बात बदलैत नहि। अन्तर एतेक अछि जे आब प्रश्‍नक विस्तृत भूगोल देखल जा चुकल अछि- ज्ञान, वास्तविकता, भारतीय दर्शन, मिथिला, पाश्चात्य दर्शन, समाज, राज्य, धर्म, आधुनिकता, डिजिटल संसार, कृत्रिम बुद्धि, पर्यावरण आ इतिहास। एहि यात्रा सँ एकटा निष्कर्ष निकलैत अछि: प्रश्‍न केवल संशय नहि; उत्तरदायित्व सेहो अछि। जँ हम सत्ता पर प्रश्‍न Hed छी तँ अपन पक्षक सत्ता पर सेहो करब। जँ परम्पराक प्रमाण माँगैत छी तँ आधुनिकताक दाबी पर Gell जँ आधिकारिक इतिहासमे मौन खोजैत छी तँ हाशियाक कथामे तथ्य-परीक्षण सेहो। समानान्तरता सममित आलोचनाक अनुशासन अछि। 72.2 मिथिला: केन्द्र नहि, पद्धतिगत आधार एहि ग्रन्थमे मिथिला के विश्व-दर्शनक नव “एकमात्र केन्द्र” बनायब उद्देश्य नहि रहल। एहन दाबी समानान्तर दर्शनक बहुकेन्द्रिक भावक विरुद्ध होयत। मिथिला एतय पद्धतिगत स्मृति अछि--विदेहक उपनिषदिक प्रश्न, न्याय-मीमांसा-नव्यन्यायक तर्क-अनुशासन, शब्द आ प्रमाणक सूक्ष्मता, शास्त्रार्थक परम्परा, लोकजीवनक अनुभव आ आधुनिक सामाजिक प्रश्‍नसभक संग एकटा संवादक्षेत्र। मिथिलाक योगदान गौरवक विषय भऽ सकैत अछि, मुदा गौरव प्रमाणक विकल्प नहि। एहि कारण ऐतिहासिक दाबीमे अनिश्चितताके अनिश्चितता रूपे स्वीकारब, परम्परागत Hach ऐतिहासिक तथ्य रूपे नहि लिखब, आ आधुनिक अवधारणाकें अतीतपर जबरन नहि थोपब--ई ग्रन्थक पद्धतिक हिस्सा रहल अछि। 72.3 भारतीय दर्शनक बहुवचन भारतीय दर्शनक अध्ययन देखबैत अछि जे “भारतीय विचार” एकमत परम्परा नहि। सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, वेदान्त, बौद्ध, जैन, लोकायत--ज्ञान, आत्मा, ईश्वर, पदार्थ, भाषा, कर्म, मोक्ष आ प्रमाण पर गम्भीर असहमति रखैत छथि। एहि असहमतिमे भारतीय दर्शनक कमजोरी नहि, बौद्भिक जीवन अछि। उपनिषद प्रश्‍न सिखबैत अछि; न्याय प्रमाणक अनुशासन; मीमांसा भाषा आ विधिक सूक्ष्मता; बौद्ध दर्शन दुःख, अनित्यता आ आत्म-कल्पनाक आलोचना; जैन दर्शन दुष्टिकोणक अनुशासन; लोकायत संशयक चुनौती। समानान्तर दर्शन एहि Ach एकटा कृत्रिम “भारतीय मत”मे गलाबैत नहि। 72.4 पाश्चात्य दर्शनः संवाद, अनुकरण नहि यूनानी प्रश्‍न, मध्ययुगीन तर्क, आधुनिक बुद्धिवाद- अनुभववाद, कान्टक आलोचना, हेगेलक इतिहास-दृ्टि, मार्क्सक संरचना-विश्लेषण, अस्तित्ववादक व्यक्तिगत जिम्मेवारी, विश्लेषणात्मक दर्शनक स्पष्टता, व्यवहारवादक अन्वेषण आ विज्ञान-दर्शनक पद्धति--ई सभ समानान्तर विमर्शमे स्वतंत्र आवाज छथि। तुलनाक उद्देश्य ई सिद्ध करब नहि जे कोनो भारतीय दार्शनिक “पहिने सँ” आधुनिक पाश्चात्य सिद्धान्त कहि देने छलाह, अथवा पश्चिमक सभ विचार भारतीय स्रोतक पुनरावृत्ति अछि। एहन विजयवादी तुलना दुनू परम्पराक ऐतिहासिक विशिष्टता नष्ट करैत अछि। सार्थक तुलना समस्या, तर्क आ आपत्तिक स्तरपर होइत अछि। 72.5 समाजक प्रश्न दर्शनक बाहरी विषय नहि जाति, वर्ग, लिंग, भाषा, क्षेत्र, राज्य, स्वतंत्रता, समानता, न्याय आ लोकतन्त्र-ई सभ केवल समाजशास्त्रक विषय नहि। एहि प्रश्‍नसभक भीतर मनुष्यक मूल्य, अधिकार, वैधता, उत्तरदायित्व, पहचान आ संस्थागत औचित्यक मूल दार्शनिक प्रश्‍न अछि। गांधी साधन-साध्य सम्बन्ध, अहिंसा आ स्वराजक नैतिक प्रशन उठबैत छथि। आम्बेडकर जाति, गरिमा, प्रतिनिधित्व, संवैधानिकता तथा स्वतंत्रता-समानता-बन्धुत्वक अविभाज्य सम्बन्ध सामने AM छथि। समानान्तर दर्शन एहि दुनूक मतभेदकें मिटबैत नहि; सबल रूपमे राखि नैतिक परीक्षण करैत अछि। 72.6 धर्मः सम्मान आ आलोचना दुनू धर्म-दर्शनक खण्ड ई स्वीकारेत अछि जे आस्था मनुष्यक अर्थ, समुदाय, आशा, अनुशासन आ आत्मबोधक गहन स्रोत भऽ सकैत अछि। संगहि ई सेहो मानैत अछि जे धार्मिक दाबी आलोचनासँ मुक्त नहि। ईश्वरक प्रश्न, अशुभक समस्या, कर्म, पुनर्जन्म, मोक्ष, धर्मबहुलता आ धर्म-राज्य सम्बन्ध-सभमे प्रमाण आ औचित्यक अलग स्तर अछि। विवेकपूर्ण बहुलताक निष्कर्ष अछि: व्यक्ति अपन धर्म मानि सकय, बदलि सकय, नहि मानि सकय; समुदाय अपन परम्परा चलाबय, मुदा सदस्यक गरिमा आ अधिकार नष्ट नहि करय; राज्य कोनो एक धर्मक आध्यात्मिक सत्यक निर्णायक नहि बनय, बल्कि समान नागरिक स्वतंत्रता संरक्षित करय। 72.7 आधुनिकता, विज्ञान आ तकनीकक द्वैधता आधुनिकता स्वतंत्रता, विज्ञान, संचार, लोकतन्त्र आ अधिकारक नूतन सम्भावना खोललक; संगहि औपनिवेशिकता, नौकरशाही, बाजार-संकेन्द्रण, औद्योगिक अमानवीकरण आ निगरानीक नूतन रूप सेहो उत्पन्न कएलक। तैँ परम्परा बनाम आधुनिकता सरल नैतिक द्वैत नहि। विज्ञानक महान शक्ति ओकर सार्वजनिक परीक्षणीयता, संशोधनशीलता आ प्रमाण-अनुशासनमे अछि। मुदा विज्ञान नेतिक उद्देश्य स्वतः तय नहि करैत। कृत्रिम बुद्धि आ अन्य नूतन तकनीक एहि Nach तीक्ष्ण करैत अछि: मशीन निर्णय-सहायता दे सकैत अछि, मुदा उत्तरदायित्वक प्रश्‍न मनुष्य, संस्था, डिजाइन, डेटा आ शासनसँ जुड़ल रहैत अछि। तकनीकी क्षमता नैतिक अनुमति नहि। 72.8 पर्यावरण आ समयक विस्तृत नैतिकता पर्यावरणीय प्रश्‍न नैतिक समुदायकें वर्तमान मनुष्यसँ आगाँ बढ़बैत अछि। भावी पीढ़ी, नदी, जंगल, प्रजाति, पारिस्थितिकी तन्त्र आ दीर्घकालीन जोखिम--ई सभ निर्णयमे प्रवेश करेत अछि। सहअऱस्तित्वात्मक यथार्थवाद एतय विशेष महत्त्व पबैत अछि, कारण मनुष्य स्वतंत्र परमाणु नहि; जैविक, सामाजिक, ऐतिहासिक आ पारिस्थितिक सम्बन्धक जालमे स्थित अछि। 72.9 समानान्तर दर्शनक स्वतंत्र पहचान एहि ग्रन्थमे प्रस्तावित समानान्तर दर्शनक स्वतंत्र पहचान किछु मूल प्रतिपादनमे देखल जा सकैत अछि। बहुप्रमाणीय विवेकवाद कहैत अछि--उचित प्रमाण अनेक, मनमाना प्रमाण नहि। सहअस्तित्वात्मक यथार्थवाद कहैत अछि--जगत HAS स्वतंत्र प्रतिरोध रखैत अछि, मुदा अनुभव सम्बन्धात्मक अछि। गरिमा-आधारित नेतिकता प्रत्येक व्यक्तिक समान मूल मूल्यकें केन्द्र बनबैत अछि। बहुकेन्द्रिक लोकतन्त्र सत्ता, ज्ञान आ संस्कृतिक अतिसंकेन्द्रणक प्रतिरोध करैत अछि। धर्मक विवेकपूर्ण बहुलता आस्था आ अनास्थाक समान विवेक-स्वतंत्रता चाहैत अछि। समानान्तर इतिहास-दृष्टि केन्द्र आ उपेक्षित स्रोत Sch आलोचनात्मक प्रमाण- कसौटीपर रखैत अछि। एहि सभक संग एकटा अनिवार्य सिद्धान्त अछि--आत्मसमीक्षा। आत्मसमीक्षा बिना बहुप्रमाणीयता अराजकता, यथार्थवाद कठोरता, गरिमा भावुकता, लोकतन्त्र संस्थागत आत्मसन्तोष, धर्मबहुलता उदासीन सापेक्षतावाद, आ समानान्तर इतिहास नूतन पक्षपात बनि सकैत अछि। 72.10 मुख्यधारा आ हाशियाक पार कखनो मुख्यधारा सत्यक निकट होइत अछि। कखनो हाशिया। कखनो दुनू अधूरा। दार्शनिकक निष्ठा कोनो “धारा”सँँ पहिने सत्य, न्याय आ मानवीय गरिमाक प्रति होयबाक चाही। एहि कारण समानान्तर दर्शन मुख्यधाराक स्थायी विपक्ष नहि। जँ स्थापित सिद्धान्त प्रमाणसँ सबल अछि तेँ ओकरा स्वीकारब। जँ उपेक्षित स्रोत नूतन तथ्य खोलैत अछि तँ ओकरा जोड़ब। जे A त्रुटि अछि तँ तेसर मार्ग खोजब। समानान्तरता पहचानक स्थिर शिविर नहि; आलोचनात्मक गतिक अवस्था अछि। 72.11 दर्शनक जीवनगत आचरण एहि ग्रन्थक अन्तिम प्रतिज्ञा कोनो बन्द सिद्धान्त-सूची नहि, एकटा बौद्धिक आचरण अछि प्रश्‍न करब। प्रमाण खोजब। दूसर पक्ष सुनब। अपन भूल सुधारब। सत्तासँ कारण माँगब। पीड़ितक स्वर सुनब। आ सत्यकें कोनो एक केन्द्रक निजी सम्पत्ति नहि मानब। एहि आचरणमे तर्क आ करुणा दुनू चाही। केवल करुणा भ्रमित भऽ सकैत अछि; केवल तर्क निर्दय। केवल परम्परा जड़; केवल नवीनता अहंकारी। केवल व्यक्ति अलगाव; केवल समाज दमन। केवल केन्द्र अधूरा; केवल हाशिया सेहो। समानान्तर दर्शन एहि द्वैतसभक बीच औसत नहि खोजैत, बल्कि प्रत्येक पक्षक उचित सत्य आ सीमा स्पष्ट करबाक प्रयास करैत अछि। पूर्वपक्षः की एहन खुलल दर्शन निर्णयहीन नहि भऽ जाएत? आत्मसमीक्षा आ बहुलता देखैत आपत्ति उठि सकैत अछि जे समानान्तर दर्शन प्रत्येक प्रश्‍न खुला छोड़ि दैत अछि। जँ सभ संशोध्य अछि तेँ दृढ़ नेतिक निर्णय कोना? उत्तरपक्ष: खुलापन आ नैतिक सीमा साथ-साथ सम्भव संशोध्यता प्रत्येक बात अनिश्चित करब नहि। किछु नैतिक सीमासभ पर्याप्त स्पष्ट भऽ सकैत अछि--जन्म नैतिक योग्यता नहि; व्यक्ति साधन मात्र नहि; अनावश्यक पीड़ा उचित नहि; राज्य नागरिकक मालिक नहि; धार्मिक स्वतंत्रता अनास्थाक स्वतंत्रता सेहो; बहुमत सत्यक प्रमाण नहि; तकनीकी क्षमता नैतिक अनुमति नहि। एहि सीमासभक अनुप्रयोग विवादित भऽ सकैत अछि, मुदा ई विवाद नैतिक दिशाहीनता नहि। अन्तिम निष्कर्ष समानान्तर दर्शन समाप्त नहि होइत अछि। जँ ई ग्रन्थ अपन अन्तिम पृष्ठपर स्वयंकेँ पूर्ण घोषित करि दैत तँ अपन अंतिम सूत्रक उल्लंघन करत। दर्शनक भविष्य बन्द व्यवस्थामे नहि, बेहतर प्रश्‍न, नूतन प्रमाण, अधिक समावेशी संवाद आ अधिक न्यायपूर्ण जीवनमे अछि। एहि अर्थमे समानान्तर रहब हाशियापर रहब नहि; सत्यक खोजमे कोनो एक केन्द्रक दास नहि रहब अछि। प्रश्‍नक स्वतंत्रता, प्रमाणक अनुशासन, गरिमाक नैतिकता, सत्ताक आलोचना, बहुलताक विवेक आ आत्मसमीक्षाक साहस--एहि सभक संयुक्त अभ्यासे समानान्तर दर्शनक जीवित रुप अछि। अध्याय-ग्रन्थसूचौ Bimal Krishna Matilal — Logic, Language and Reality; The Character of Logic in India. Jonardon Ganeri — Philosophy in Classical India; The Lost Age of Reason. Amartya Sen — The Idea of Justice. B. R. Ambedkar — Annihilation of Caste; Dr. Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches. John Dewey — Experience and Nature; Logic: The Theory of Inquiry. John Rawls — A Theory of Justice; Political Liberalism. Miranda Fricker — Epistemic Injustice. पारिभाषिक राब्दावली अस्तित्वमीमांसा — की-की वस्तु वास्तविक रूपसँ अस्तित्वमान अछि, तकर दार्शनिक अध्ययन। तत्त्वमीमांसा — वास्तविकताक मूल स्वरूपक अध्ययन। ज्ञानमीमांसा — ज्ञान, प्रमाण, विश्वास, सत्य आ औचित्यक अध्ययन। प्रमाण — यथार्थ ज्ञान उत्पन्न करबाक मान्य साधन अथवा प्रक्रिया। प्रत्यक्ष -- प्रत्यक्ष अनुभूति अथवा इन्द्रिय-सम्बद्ध ज्ञान। अनुमान — ज्ञात आधारसँ अन्य तथ्यक ज्ञान। शब्द-प्रमाण — विश्वसनीय भाषिक कथनसँ प्राप्त ज्ञान। उपमान — समानताक आधारपर ज्ञान। व्याप्ति — अनुमानमे हेतु आ साध्यक नियमित सम्बन्ध। नैतिकता — उचित-अनुचित कर्म आ चरित्रक अध्ययन। राजनीतिक दर्शन — सत्ता, राज्य, अधिकार, न्याय आ स्वतंत्रताक अध्ययन। धर्म-दर्शन आस्था, ईश्वर, धर्म, धार्मिक अनुभव आ तर्कक अध्ययन। बहुप्रमाणीय विवेकवाद — विभिन्न उचित प्रमाणक AAA आलोचनात्मक ज्ञान प्राप्त करबाक समानान्तर सिद्धान्त। सहअ—स्तित्वात्मक यथार्थवाद — मनुष्यमनसँ स्वतंत्र वास्तविकता स्वीकारैत हुए सम्बन्धात्मक अनुभवक बहुलताकें मान्यता देनिहार सिद्धान्त। गरिमा-आधारित नैतिकता -- प्रत्येक व्यक्तिक समान मूल मानव-मूल्यकें नेतिक निर्णयक केन्द्र माननिहार सिद्धान्त। बहुकेन्द्रिक लोकतन्त्र — सत्ता आ निर्णयकें विभिन्न वैध सामाजिक-राजनीतिक स्तरपर बाँटि HS राखनिहार लोकतान्त्रिक दृष्टि। समानान्तर इतिहास-दृष्टि — स्थापित स्रोतसभक संग उपेक्षित स्रोत आ स्वरसभकेँ समान आलोचनात्मक कसौटीपर रखि इतिहासक पुनर्पाठ करबाक पद्धति। धर्मक विवेकपूर्ण बहुलता — आस्था, अनास्था आ धर्म-परिवर्तनक समान स्वतंत्रता स्वीकारैत, सार्वजनिक बाध्यता लेल साझा कारण आ समान नागरिकताक कसौटी रखनिहार सिद्धान्त। आत्मसमीक्षा — अपन दाबी, प्रमाण, चयन, मौन आ निष्कर्षकें सेहो ओहि आलोचनात्मक कसौटीपर रखबाक अनुशासन जे दोसर विचारपर लागू कएल जाए। चयनित मूल ग्रन्थसूची भारतीय दर्शन ऋग्वेद। बृहदारण्यक उपनिषद। छान्दोग्य उपनिषद। गौतम — न्यायसूत्र। कणाद — वैशेषिकसूत्र। ईश्वरकृष्ण — सांख्यकारिका। पतञ्जलि — योगसूत्र। जैमिनि — मीमांसासूत्र। बादरायण — ब्रह्मसूत्र। कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। उदयनाचार्य — न्यायकुसुमाञ्जलि; आत्मतत्त्वविवेक। वाचस्पति मिश्र — न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका; तत्त्वबिन्दु। गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। नागार्जुन — मूलमध्यमककारिका; विग्रहव्यावर्तनी। दिङ्नाग — प्रमाणसमुच्चय। धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। उमास्वाति — तत्त्वार्थसूत्र। पाश्चात्य दर्शन Plato — Republic! Aristotle — Nicomachean Ethics; Politics; Metaphysics| René Descartes — Meditations on First Philosophy Baruch Spinoza — Ethics! G. W. Leibniz — Monadology| John Locke — An Essay Concerning Human Understanding; Two Treatises of Government! George Berkeley — A Treatise Concerning the Principles of Human Knowledge! David Hume — A Treatise of Human Nature; An Enquiry Concerning Human Understanding! Immanuel Kant — Critique of Pure Reason; Groundwork of the Metaphysics of Morals! G. W. F. Hegel — Phenomenology of Spirit! Karl Marx — Capital; Marx and Engels — The German Ideology! Soren Kierkegaard — Fear and Trembling | Friedrich Nietzsche — On the Genealogy of Morality! Edmund Husserl — Ideas! Martin Heidegger — Being and Time! Jean-Paul Sartre — Being and Nothingness| Ludwig Wittgenstein — Tractatus Logico-Philosophicus; Philosophical Investigations | John Dewey — Experience and Nature! John Rawls — A Theory of Justice! भारतीय आधुनिक सामाजिक-राजनीतिक चिन्तन मोहनदास करमचन्द गांधी — हिन्द स्वराज; सत्याग्रह इन साउथ अफ्रीका; Constructive Programme: Its Meaning and Place! भीमराव रामजी आम्बेडकर — Annihilation of Caste; States and Minorities; The Buddha and His Dhamma; Dr. Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches| चयनित अध्ययन-ग्रन्थ Surendranath Dasgupta — A History of Indian Philosophy! M. Hiriyanna — Outlines of Indian Philosophy S. Radhakrishnan — Indian Philosophy | Bimal Krishna Matilal — Perception; Logic, Language and Reality; The Character of Logic in Indial Jonardon Ganeri— Philosophy in Classical India; The Lost Age of Reason! Stephen H. Phillips — Classical Indian Metaphysics; गङ्गेश आ भारतीय ज्ञानमीमांसा सम्बन्धी अध्ययन। Karl H. Potter — Encyclopedia of Indian Philosophies शृंखला। Dinesh Chandra Bhattacharya — History of Navya-Nyaya in Mithilal Ganganatha Jha — न्याय, मीमांसा आ भारतीय दर्शनक अनेक मूल ग्रन्थक अनुवाद आ अध्ययन। अन्तिम प्रतिपादन गजेन्द्र ठाकुरक समानान्तर दर्शन कोनो “पूर्व आ पश्चिमक मिश्रण” नहि। एकर स्वतन्त्र पहचान छह मूल सिद्धान्तमे अछि बहुप्रमाणीय विवेकवाद — सत्य लेल उचित प्रमाणक बहुलता। सहअस्तित्वात्मक यथार्थवाद — वस्तुगत जगत आ सम्बन्धात्मक अनुभव दुनूक स्वीकृति। गरिमा-आधारित नैतिकता -- प्रत्येक मनुष्यक समान मूल मूल्य। बहुकेन्द्रिक लोकतन्त्र — सत्ता, ज्ञान आ संस्कृतिक अतिसंकेन्द्रणक प्रतिरोध। धर्मक विवेकपूर्ण बहुलता — आस्था, अनास्था आ धर्म-परिवर्तनक समान विवेक-स्वतंत्रता; सार्वजनिक बाध्यता लेल साझा औचित्य। समानान्तर इतिहास-दृष्टि — केन्द्र आ उपेक्षित दुनू स्रोतके समान आलोचनात्मक प्रमाण-कसौटीपर राखब। एहि छह मूल सिद्धान्तक संग सातम, अनिवार्य नियामक सिद्धान्त asa अछि-_आत्मसमीक्षा। किएक तँ जे दर्शन अपनहि आलोचना स्वीकार नहि करय, ओ दर्शनसँ सिद्धान्तवाद दिस बढ़ि जाइत अछि। समानान्तर दर्शनक भविष्य एहि कारणें ओकर बन्द व्यवस्थामे नहि, ओकर खुलल प्रश्‍नमे अछि। . समानान्तर दर्शन ° k गजेन्द्र ठाकुरक ई कृति मिथिलाक अपन ° F दार्शनिक परम्पराकें केन्द्रमे राखि ° E भारतीय, पाश्चात्य आ आधुनिक ° ° चिन्तनकें एकटा नव - “समानान्तर” - ° ° दृष्टिसँ पढ़ेत अछि। न्याय, वेदान्त A L आ पाश्चात्य ज्ञानमीमांसाक बीच - i संवाद स्थापित करैत, ई बहुप्रमाणीय ~ i आत्मसमीक्षाकें अपन आधार बनबैत अछि। , F बहुप्रमाणीय विवेकवाद : सहअस्तित्वात्मक यथार्थवाद ' गरिमा-आधारित नैतिकता `. F बहुकेन्द्रिक लोकतन्त्र : धर्मक विवेकपूर्ण बहुलता : समानान्तर इतिहास-दृष्टि = [ अधिक सामग्री आ पूर्ण अंकसभ लेल स्क्यान करू | | oe [=] poe [a] ब Be [+ F www.videha.co.in videha-ejournal | . .github.io/videha fa विदेह - प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ° F ISSN 2229-547» C Fi , fs i~ 19 २ | | | A PHILOSOPHICAL WORK GAJENDRA THAKUR'S | | PARALLEL | || } | ke PHILOSOPHY | £] A Re-reading of Indian, Western, Socio-Political, Religious, and Modern | | j Philosophy through Mithila ‘s Parallel Tradition | | , ; | \ || Ne GAJENDRA THAKUR | || V ( ( NN ks Z LA | | | t ven र j | ह FO A j G e T “1 t P P ° ajendra Thakur's Parallel Philosophy A Re-reading of Indian, Western, Socio-Political, Religious, and Modern Philosophy through Mithila’s Parallel Tradition Gajendra Thakur Editor, Videha — The First Fortnightly Maithili E-Journal ISSN 2229-547X Preface Philosophy does not begin with answers but with questions. When man asks what the world is, what truth is, how knowledge is possible, whether there is a God to judge, what is the relation between religion and morality, to what extent are the rights of the state, where is the freedom of the individual, how can society be just, then philosophy is born. However, the history of philosophy itself has not been unbiased. Ideas that could reach the heart of universities, monarchies, religious institutions, linguistic hegemony or publishing houses were often said to be mainstream philosophies; ideas that remained outside the confines of folk life, regional languages and oral traditions, defeated communities, frontier geographies or institutional centres were often left on the margins of history. This is where the basic premise of the text begins. Parallel philosophy is not a taboo to the mainstream. It is a method of bringing questions that have been suppressed, displaced or deliberately left out of the mainstream back into the focus of philosophical discussion. For this reason, parallel philosophies are neither exclusively Indian, nor exclusively Western, nor exclusively spiritual, nor exclusively materialistic, nor exclusively traditionalist, nor exclusively modernist. Its basic premise is the demand for Where there is a claim to the truth, ask for proof. Where there is evidence, ask about its extent. Where there is power, ask for its legitimacy. Where there are traditions, ask about their history. Where there is rebellion, ask for its moral basis. And where there is a man, never forget his dignity. The text does not contain any decorative regional chapters on the philosophy of Mithila. Mithila is the systematic center of this text. From the question tradition of Videha 's Upanishads to the language of Nyaya, Mimamsa, Navya-Nyaya, Artha, Lokadharma and modern social struggles, there appears to be a long intellectual tradition: first understand the question properly, give evidence, answer objections, and then draw conclusions. Ganges Upadhyaya was the pre-eminent judge of Mithila in the fourteenth century, and his Tattvacintamani proved to be a highly influential text in the history of Indian empiricism and logic. The principal aim of the book is to apply this intellectual discipline to questions of current society, politics, religion, history and science. Contents Part I — Foundations of Philosophy 1. What Is Philosophy? 2. Questions, Doubt, and Pramana 3. Truth and Perspective 4. The Limits of Knowledge 5. The Method of Parallel Philosophy Part II — Indian Philosophy 6. Vedic Thought and Upanishadic Questions 7. Samkhya 8. Yoga 9. Nyaya 10. Vaisesika 11. Purvamimamsa 12. Vedanta 13. Buddhist Philosophy 14. Jain Philosophy 15. Lokayata and Materialist Questions 16. Language, Word, and Meaning Part III — Mithila’s Parallel Philosophical Tradition 17. Videha: A Geography of Questioning 18. Yajnavalkya, Gargi, and Maitreyi 19. Nyaya—Vaisesika and Mithila’s Logical Tradition 20. Udayanacarya 21. Vacaspati Misra 22. Gangesa Upadhyaya 23. Navya-Nyaya: The Subtle Discipline of Language 24. Folk Tradition, Sastra, and Parallel Mithila Part IV — Western Philosophy 25. Greek Questions 26. Socrates, Plato, and Aristotle 27. Medieval Philosophy 28. Descartes, Spinoza, and Leibniz 29. Locke, Berkeley, and Hume 30. Kant 31. Hegel and Dialectic 32. Marx 33. Kierkegaard and Nietzsche 34. Phenomenology and Existentialism 35. Analytic Philosophy 36. Pragmatism 37. Philosophy of Science Part V — Social and Political Philosophy 38. The Individual and Society 39. The Justification of the State 40. Freedom 41. Equality 42. Justice 43. Caste and Social Hierarchy 44. Class and Economic Power 45. Women, Gender, and Power 46. Language, Region, and Identity 47. Democracy 48. Gandhi 49. Ambedkar Part VI — Philosophy of Religion 50. What Is Religion? 51. The Question of God 52. Faith and Reason 53. The Problem of Suffering and Evil 54. Karma, Rebirth, and Moksa 55. Religious Plurality 56. Religion and the State 57. Folk Religion and Institutional Religion Part VII — Modern and Contemporary Philosophy 58. Modernity 59. Science and the Human Being 60. Language and Power 61. History and Memory 62. Knowledge and the Digital World 63. Artificial Intelligence and Human Responsibility 64. The Environment and Future Generations Part VIII — Gajendra Thakur’s Parallel Philosophy 65. Multi-Pramana Rationalism 66. Coexistential Realism 67. Dignity-Based Ethics 68. Polycentric Democracy 69. The Rational Plurality of Religion 70. A Parallel View of History 71. The Aphorisms of Parallel Philosophy 72. Epilogue Part I — Foundations of Philosophy