समस्या दार्शनिक इतिहास सीधा रेखामे नहि बढ़ैत अछि। कोनो युगमे जगतक मूल स्वरूप प्रधान प्रश्न बनैत अछि; दोसर युगमे ज्ञानक सम्भावना; फेर ज्ञाताक चेतना, आत्मबोध आ अनुभूति; आ बीसम शताब्दीक अनेक प्रभावशाली धारामे भाषा, अर्थ, संकेत, प्रयोग, तार्किक रूप, नियम आ संप्रेषण दार्शनिक जाँचक केन्द्र बनि जाइत अछि। एहि परिवर्तनकेँ प्रायः “भाषिक मोड़” कहल जाइत अछि। मुदा भाषिक मोड़क अर्थ ई नहि जे दर्शन जगत, मन, नैतिकता, इतिहास वा समाज छोड़ि केवल शब्दक अर्थ देखए लगल। मूल समस्या अधिक गम्भीर अछि: मनुष्य जगतकेँ भाषा, अवधारणा, वर्गीकरण, वाक्य, तर्क आ साझा नियमक माध्यमसँ बुझैत अछि; तेँ ज्ञान आ वास्तविकताक प्रश्न भाषा सँ पूर्णतः अलग कोना रहि सकैत अछि? यूरोपीय आधुनिक दर्शनक एक प्रभावशाली रेखा ज्ञाताक चेतनासँ आरम्भ करैत अछि। देकार्तक पद्धतिगत संशय बाह्य जगत, इन्द्रिय, परम्परा आ विश्वासक आधारक परीक्षण करैत ज्ञाताक निश्चितताक खोज करैत अछि। लॉक अनुभवक स्रोत, बर्कली अनुभूति आ वस्तु-अस्तित्वक सम्बन्ध, ह्यूम आत्म, कारणता आ आगमन, आ कान्ट अनुभूतिक सम्भावनात्मक शर्तक परीक्षण करैत छथि। एहि परम्परामे प्रश्न केवल “जगत की अछि?” नहि रहैत, बल्कि “जगत हमर अनुभवमे कोना उपस्थित होइत अछि?” बनैत अछि। एहि उपलब्धिक संग एक सीमा सेहो स्पष्ट होइत अछि: यदि ज्ञाताकेँ एकाकी चेतना मानि लेल जाए, तँ भाषा, सामाजिक प्रशिक्षण, साझा नियम, सार्वजनिक अर्थ आ प्रतिवादक भूमिका अस्पष्ट भऽ जाइत अछि। एहि ठाम अध्यायक मूल समस्या अछि: चेतनाकेन्द्रित आधुनिक दर्शनसँ भाषा-केन्द्रित बीसम शताब्दीक दर्शन धरि संक्रमण कोना बुझल जाए, बिना एहि भ्रान्तिक जे भाषा वास्तविकताकेँ पूर्णतः प्रतिस्थापित करि दैत अछि? संगहि, भारतीय दर्शन—विशेषतः न्याय, मीमांसा, व्याकरण, बौद्ध प्रमाणमीमांसा—आ मिथिलाक नव्य-न्यायकेँ एहि विमर्शमे कोना राखल जाए, बिना विजयवादी दाबीक जे “भारतीय परम्परा पहिनहि सभ आधुनिक सिद्धान्त कहि चुकल छल”? समस्या दोसर स्तरपर सेहो अछि। भाषा केवल वस्तुक नामकरण नहि। “यदि”, “किन्तु”, “सम्भव”, “कर्तव्य”, “अभाव”, “कारण”, “राष्ट्र”, “न्याय”, “स्वतंत्रता” जकाँ पद कोनो सरल वस्तुक नाम नहि। वाक्य निषेध, सम्भावना, काल, सम्बन्ध, प्रश्न, आदेश, प्रतिज्ञा, नियम आ मूल्य व्यक्त करैत अछि। तेँ भाषा-दर्शनक प्रश्न केवल “शब्द ककर नाम?” नहि, बल्कि “अर्थ कोना बनैत अछि?”, “कथन कोन तार्किक संरचना रखैत अछि?”, “सही प्रयोगक कसौटी की?”, “भाषा सामाजिक सत्ता सँ कोना जुड़ैत अछि?” आ “भाषा वास्तविकताकेँ कतेक बनबैत अछि आ कतेक केवल व्यक्त करैत अछि?” मूल प्रतिपादन एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे बीसम शताब्दीक भाषिक मोड़ चेतनाकेन्द्रित दर्शनक नकार नहि, ओकर विस्तार अछि। ज्ञाता केवल निजी मन नहि; ओ भाषिक, सामाजिक, ऐतिहासिक आ नियम-संचालित प्राणी सेहो अछि। मनुष्य अर्थ साझा करैत अछि, परिभाषा सीखैत अछि, संकेतक प्रयोग सुधारैत अछि, तर्क प्रस्तुत करैत अछि, विरोध स्वीकार करैत अछि आ संस्थागत भाषामे निर्णय करैत अछि। तेँ ज्ञान, सत्य, तत्त्वमीमांसा, नैतिकता, राजनीति आ इतिहास—सभ भाषा सँ प्रभावित छथि। मुदा एहि प्रतिपादनक दोसर आधा समान रूपेँ आवश्यक अछि: भाषा सर्वशक्तिमान नहि। भूकम्पक भौतिक घटना “भूकम्प” शब्द पर निर्भर नहि; रोगक जैविक प्रक्रिया निदानक नामसँ समाप्त नहि; नदी कागजपर श्रेणी बदललासँ अपन जल-प्रवाह नहि बदलैत; ऐतिहासिक घटना अभिलेखमे दबा देल गेलासँ अनघटित नहि भऽ जाइत। तेँ भाषा सामाजिक वास्तविकताक निर्माणमे सहभागी होइतहुँ वस्तुगत प्रतिरोधसँ टकराइत अछि। समानान्तर दर्शन एहि कारण दू अतिवाद अस्वीकार करैत अछि। पहिल—भाषा केवल पारदर्शी शीशा अछि, जकर ज्ञानपर कोनो सक्रिय प्रभाव नहि। दोसर—सभ वास्तविकता भाषा द्वारा निर्मित अछि, तेँ भाषा बाहर सत्यक प्रश्न निरर्थक। एहि दुनूक बीच प्रतिपादन अछि: भाषा वास्तविकताक मानव-अनुभव, वर्गीकरण, संप्रेषण आ व्याख्याक सक्रिय माध्यम अछि; मुदा सत्यक कसौटी भाषा मात्र नहि। प्रमाण, तर्क, वस्तुगत प्रतिरोध, प्रतिपक्ष आ पुनर्परीक्षण आवश्यक छथि। एहि अध्यायक तुलनात्मक प्रतिपादन सेहो स्पष्ट अछि। फ्रेगे, रसेल, विट्गेन्स्टाइन, ऑस्टिन, सस्यूर अथवा बादक भाषिक दर्शनक अवधारणासभकेँ न्याय, मीमांसा, भर्तृहरि, अपोह वा नव्य-न्यायक “पूर्वरूप” नहि मानल जाए। ऐतिहासिक समानता सिद्ध करबाक प्रयासक बदला प्रश्न-संरचनात्मक संवाद हो: अर्थ, सन्दर्भ, वाक्य, निषेध, अनुमान, प्रमाण, नियम, प्रयोग, अभाव आ व्याख्याक प्रश्नपर अलग परम्परा कोन समाधान प्रस्तावित करैत अछि? प्रमुख तर्क पहिल तर्क—निजी मानसिक अर्थ सार्वजनिक ज्ञानक पर्याप्त आधार नहि। यदि अर्थ केवल मनक भीतरक निजी अनुभूति हो, तँ दू व्यक्ति एकहि शब्द समान ढंगसँ उपयोग करैत छथि की नहि, ई जाँचब कठिन होयत। नियमक अर्थ केवल “हमरा एखन सही लगैत अछि” नहि हो सकैत; सही आ गलत प्रयोगक भेद लेल किछु सार्वजनिक मानक, प्रशिक्षण वा व्यवहार आवश्यक होइत अछि। एहि बिन्दुपर भाषा चेतना सँ सामाजिकता दिस दर्शनकेँ खोलैत अछि। दोसर तर्क—तार्किक अर्थ मनोवैज्ञानिक अनुभवसँ स्वतंत्र आयाम रखैत अछि। फ्रेगे तर्क आ गणितकेँ व्यक्तिक मानसिक अवस्थासँ अलग करबाक प्रयास करैत छथि। “2 + 2 = 4” क सत्य हमर व्यक्तिगत मनोदशापर निर्भर नहि। अर्थक विश्लेषणमे sense आ reference केर भेद ई देखबैत अछि जे दू अभिव्यक्ति एकहि वस्तु दिस संकेत करैतहुँ अलग संज्ञानात्मक मूल्य रखि सकैत अछि। “प्रभात तारा” आ “साँझ तारा” एकहि खगोलीय वस्तु दिस संकेत करैत हो, तथापि हुनकर प्रस्तुतिकरणक ढंग अलग ज्ञान दे सकैत अछि। फलतः अर्थ केवल वस्तु-सन्दर्भ नहि; अभिव्यक्तिक ज्ञानात्मक रूप सेहो प्रासंगिक अछि। तेसर तर्क—व्याकरणिक रूप आ तार्किक रूप एक नहि। रसेलक वर्णन-सिद्धान्त देखबैत अछि जे साधारण भाषा एहन वाक्य बनबैत अछि जे सतही व्याकरणमे कोनो वस्तुक नाम-जकाँ लगैत अछि, जबकि तार्किक विश्लेषण ओकर संरचना भिन्न देखबैत अछि। काल्पनिक वा अनुपस्थित वस्तु, निषेध, परिमाण आ अस्तित्वगत प्रतिबद्धता सम्बन्धी प्रश्न एतय महत्त्वपूर्ण होइत अछि। फलतः दार्शनिक समस्या कखनो भाषिक रूपक अस्पष्टतासँ उत्पन्न भऽ सकैत अछि, आ तार्किक पुनर्विश्लेषण ओकर भ्रम घटा सकैत अछि। चारिम तर्क—भाषा आ जगतक सम्बन्धक एकरूप मॉडल पर्याप्त नहि। आरम्भिक विट्गेन्स्टाइन भाषा, विचार आ जगतक तार्किक संरचनात्मक सम्बन्धक सीमा निर्धारित करबाक प्रयास करैत छथि। अर्थपूर्ण कथन तथ्यक सम्भावित अवस्थाकेँ व्यक्त करैत अछि। ई पद्धति दार्शनिक कथनक सीमा स्पष्ट करबाक शक्तिशाली उपकरण दैत अछि। मुदा नैतिकता, सौन्दर्य, धर्म, आत्मानुभव, इतिहास आ सामान्य भाषिक क्रियासभकेँ तथ्य-वर्णनक एकहि साँचा मे राखब कठिन अछि। पाँचम तर्क—अर्थ अनेक प्रसंगमे प्रयोगसँ स्पष्ट होइत अछि। उत्तरकालीन विट्गेन्स्टाइन भाषा लेल एकहि सार खोजबाक बदला विविध language-games आ जीवन-रूप देखैत छथि। आदेश, प्रश्न, धन्यवाद, माफी, गणना, कथा, नियम, मजाक—ई सभ भाषिक क्रिया एकहि तार्किक ढाँचा पर नहि चलैत अछि। अर्थ प्रयोगसँ जुड़ैत अछि, मुदा प्रयोग मनमाना नहि; नियम, प्रशिक्षण, सामाजिक प्रत्याशा आ साझा व्यवहार ओकर पृष्ठभूमि बनैत अछि। छठम तर्क—भाषा केवल तथ्य वर्णन नहि, क्रिया सेहो करैत अछि। ऑस्टिनक भाषिक क्रिया-विमर्श देखबैत अछि जे “हम प्रतिज्ञा करैत छी”, “हम आदेश दैत छी”, “हम घोषणा करैत छी” जकाँ कथन केवल स्थिति वर्णन नहि, सामाजिक क्रिया सम्पन्न करैत अछि। एहि दृष्टिसँ भाषा संस्था, अधिकार, शपथ, विवाह, न्यायालय, प्रशासन आ सार्वजनिक जीवनसँ प्रत्यक्ष जुड़ि जाइत अछि। पूर्वपक्ष पूर्वपक्ष ई कहि सकैत अछि जे भाषिक मोड़ दर्शनकेँ वास्तविक प्रश्नसँ दूर लऽ जाइत अछि। दर्शनक मूल प्रश्न ईश्वर, आत्मा, जगत, स्वतंत्रता, न्याय, मृत्यु, समाज आ दुःख छथि; शब्द, वाक्य आ प्रयोगक विश्लेषण एहि समस्याक स्थान नहि लऽ सकैत अछि। यदि समाजमे भूख अछि, तँ “भूख” शब्दक व्याकरण देखला सँ भोजन नहि भेटत; यदि अन्याय अछि, तँ language-game कहला सँ संस्था नहि बदलत। अतः भाषिक दर्शन दार्शनिक समस्याकेँ अकादमिक शब्द-खेलमे बदलि देबाक खतरा रखैत अछि। पूर्वपक्षक दोसर रूप ई अछि जे सार्वजनिक प्रयोगक महत्त्व बढ़ेलासँ सत्य बहुमत वा प्रचलन पर निर्भर भऽ जाएत। यदि अर्थ प्रयोगमे अछि, तँ जे समाज कहैत अछि से सत्य मानल जाए की? सामाजिक नियम गलत, भेदभावपूर्ण अथवा दमनकारी हो सकैत अछि। भाषा स्वयं पूर्वग्रह ढो सकैत अछि। तेँ सार्वजनिकता सत्यक पर्याप्त कसौटी नहि। तेसर पूर्वपक्ष तुलनात्मक दर्शन पर लागू होइत अछि। भारतीय परम्परामे शब्द, वाक्य, प्रमाण आ अर्थक चर्चा बहुपूर्वसँ अछि; एहन स्थिति मे आधुनिक भाषिक मोड़केँ विशेष नूतनता देब पश्चिम-केन्द्रित इतिहास हो सकैत अछि। उलटा पक्षक अतिशयोक्ति ई कहि सकैत अछि जे जे किछु फ्रेगे, रसेल वा विट्गेन्स्टाइन कहलनि, से न्याय, मीमांसा, भर्तृहरि वा नव्य-न्याय पहिनहि कहि चुकल छल। उत्तरपक्ष पहिल पूर्वपक्षक उत्तर ई अछि जे भाषा दर्शनक अन्तिम मंजिल नहि, प्रवेश-द्वार अछि। अन्याय दूर करबाक लेल नीति, संस्था, संसाधन आ शक्ति बदलय पड़त; मुदा “अधिकार”, “समानता”, “हानि”, “व्यक्ति”, “समुदाय”, “जाति”, “धर्म”, “स्वतंत्रता” जकाँ अवधारणाक अर्थ अस्पष्ट रहला पर नीति-विवाद स्वयं भ्रमित हो सकैत अछि। कानून भाषामे बनैत अछि, साक्ष्य भाषामे प्रस्तुत होइत अछि, आदेश भाषामे जारी होइत अछि, शपथ आ प्रतिज्ञा भाषिक क्रिया छथि। तेँ भाषा वास्तविक जीवनक बाहरी सजावट नहि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर ई अछि जे प्रयोग अर्थक एक स्रोत अछि, सत्यक अन्तिम प्रमाण नहि। समाज गलत नियम बनबैत अछि; बहुमत गलत वर्गीकरण स्वीकारि सकैत अछि; संस्थागत भाषा दमनकारी हो सकैत अछि। तेँ अर्थक सामाजिकता स्वीकारैतहुँ प्रमाण, तर्क, नैतिक आलोचना आ वस्तुगत प्रतिरोध आवश्यक रहैत अछि। “जे चलनमे अछि” आ “जे सत्य वा उचित अछि” एक वस्तु नहि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर तुलनात्मक पद्धतिमे अछि। भारतीय परम्पराक भाषा-विमर्शक प्राचीनता स्वीकारब आवश्यक अछि, मुदा ऐतिहासिक स्वतन्त्रता सेहो। नव्य-न्याय = analytical philosophy नहि; भर्तृहरि = structuralist नहि; अपोह = deconstruction नहि; अनेकान्तवाद = postmodern relativism नहि। समान प्रश्नक उपस्थिति ऐतिहासिक पहचान सिद्ध नहि करैत अछि। वास्तविक बौद्धिक लाभ तखन होयत जखन अलग परम्पराक तर्क एक-दोसराक सामने राखि जाँचल जाए। समानान्तर उत्तरपक्षक सामान्य सूत्र अछि: कथन स्पष्ट करू; ओकर भाषिक संरचना बुझू; फेर पूछू—ओ कोन वास्तविकताक दाबी करैत अछि, ओकर प्रमाण की, सामाजिक परिणाम की, नैतिक औचित्य की, प्रतिपक्ष की, आ नव प्रमाण आए तखन निष्कर्ष बदलत की नहि। भाषा द्वार अछि; जगत, अनुभव, संस्था, सत्ता आ नैतिकता यात्रा केर अगिला क्षेत्र छथि। भारतीय संवाद भारतीय दर्शनमे भाषा दार्शनिक समस्या आधुनिक पश्चिमी “linguistic turn” केर प्रतिलिपि रूपमे नहि, अपन स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रश्नक भीतर विकसित भेल। मीमांसा वेदवाक्यक प्रामाण्यक प्रसंगमे शब्द, वाक्य आ अर्थक सूक्ष्म सिद्धान्त बनबैत अछि। शब्द नित्य की उत्पादित, वाक्यार्थ शब्दार्थक जोड़ की एक समग्र बोध, वाक्य-बोध लेल आकांक्षा, योग्यता, सन्निधि आ तात्पर्यक भूमिका—ई प्रश्न भाषिक अर्थक संरचनात्मक विश्लेषण करैत अछि। न्याय शब्दकेँ ज्ञानक साधनक रूपमे जाँचैत अछि। विश्वसनीय वक्ता, वाक्यबोध, पदशक्ति, लक्षणा, स्मृति, सन्दर्भ आ ज्ञानोत्पत्तिक शर्त महत्त्वपूर्ण बनैत अछि। शब्द-प्रमाणक प्रश्न आधुनिक testimony epistemology सँ संवाद करि सकैत अछि, मुदा दुनूकेँ एक समान मानब गलत। न्यायीय प्रश्न ज्ञानोत्पत्ति, प्रमाण्यता आ शास्त्रार्थक विशेष संरचना भीतर विकसित भेल। व्याकरण परम्परामे भर्तृहरि भाषा, वाक्य, अर्थ आ ज्ञानक सम्बन्धपर व्यापक चिन्तन करैत छथि। वाक्यक एकता, शब्द-विभाजनक स्थिति, भाषिक अनुभूतिक स्वरूप आ अर्थबोधक प्रश्न एतय उपस्थित छथि। बौद्ध दार्शनिक अपोह-विमर्श शब्दक वर्गात्मक अर्थक विशिष्ट व्याख्या दैत छथि। शब्द वस्तुमे उपस्थित सार्वभौमक प्रत्यक्ष नाम नहि, बल्कि अन्यक अपवर्जनक माध्यमसँ अर्थगत भेद स्थापित करैत अछि—एहि विमर्शक आन्तरिक तर्क स्वतन्त्र अछि। एहि भारतीय परम्परासभकेँ “एक भारतीय linguistic philosophy” नामक एकरूप स्कूल बनायब उचित नहि। न्याय, मीमांसा, व्याकरण, बौद्ध प्रमाणमीमांसा परस्पर असहमत छथि। ई असहमति कमजोरी नहि, दार्शनिक समृद्धि अछि। तुलनात्मक अध्ययन लेल तीन स्तर उपयोगी छथि: विषयगत तुलना—दुनू परम्परा भाषा पर विचार करैत अछि; समस्या-संरचनात्मक तुलना—दुनू ambiguity, reference, sentence-meaning, negation, testimony, inference जकाँ प्रश्नक अलग रूप जाँचैत अछि; तेसर वास्तविक तर्क-संवाद—एक परम्पराक विश्लेषण दोसराक आपत्तिकेँ स्पष्ट करैत अछि की नहि। भारतीय संवाद एहि अध्यायक मूल प्रतिपादनकेँ मजबूत करैत अछि: भाषिक प्रश्न बीसम शताब्दीक आविष्कार मात्र नहि, मुदा बीसम शताब्दीमे ओकर नूतन रूप विकसित भेल। अतः इतिहासकेँ “पहिने के कहलनि” प्रतियोगितामे बदलबाक बदला विभिन्न बौद्धिक परम्पराक विशिष्टता बचौने तुलनात्मक दर्शन करब आवश्यक अछि। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि मिथिलाक बौद्धिक परम्परामे न्याय आ विशेषतः नव्य-न्याय भाषिक एवं तार्किक अनुशासनक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र खोलैत अछि। गङ्गेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि प्रमाण-विमर्शक इतिहासमे निर्णायक ग्रन्थ अछि। ओकर बाद विकसित नव्य-न्याय भाषा सामान्य दार्शनिक भाषाक अस्पष्ट सम्बन्धकेँ तकनीकी पदावली द्वारा विभाजित करैत, दाबीक सीमा निश्चित करैत, विरोधी उदाहरणक सम्भावना जाँचैत आ अनुमानक शर्त स्पष्ट करैत अछि। मिथिलाक समानान्तर दृष्टिक उद्देश्य नव्य-न्यायकेँ आधुनिक symbolic logic अथवा analytic philosophy केर “अधूरा आरम्भ” सिद्ध करब नहि। ई दुनू परम्पराक ऐतिहासिक समस्या, संस्थागत पृष्ठभूमि, तकनीकी भाषा आ लक्ष्य भिन्न मानैत अछि। समानान्तर प्रश्न ई अछि: सामान्य भाषा दार्शनिक भ्रम उत्पन्न करैत समय तकनीकी भाषा कतेक उपयोगी? अत्यधिक तकनीकी पदावली कखन स्पष्टता बढ़बैत अछि आ कखन विशेषज्ञीय दुर्गमता? सम्बन्ध, विशेषणता, विषयता, अभाव, व्याप्ति आ अवच्छेदकता-जकाँ उपकरण आधुनिक भाषिक विश्लेषणक किछु समस्याक संग कोन स्तरपर संवाद करि सकैत अछि? मिथिलाक पद्धतिगत योगदान “हमर परम्परा पहिने” प्रकारक प्रतिस्पर्धा नहि। एकर शक्ति प्रश्न, पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष, प्रमाण, परिभाषा, सम्बन्धक सूक्ष्म विश्लेषण, प्रतिवाद आ पुनर्परीक्षणक अनुशासनमे अछि। एहि दृष्टिसँ भाषिक मोड़ नव्य-न्यायकेँ आधुनिक रूपमे प्रमाणित नहि करैत; उलटे नव्य-न्याय आधुनिक भाषिक दर्शनकेँ एक स्वतंत्र तुलनात्मक प्रतिपक्ष दैत अछि। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि एहि कारण तीन स्तर पर कार्य करैत अछि। पहिल—आधुनिक दाबीकेँ ओकर ऐतिहासिक सन्दर्भमे पढ़ब। दोसर—मिथिलाक शास्त्रीय परम्पराकेँ गौरवगान बिना अपन तकनीकी स्वरूपमे पढ़ब। तेसर—दुनूकेँ एकहि प्रश्नपर राखि देखब जे कोन तर्क कहाँ सबल, कहाँ सीमित, आ कहाँ नूतन समस्या उत्पन्न करैत अछि। एहि पद्धतिमे स्थानीय परम्परा विश्व-दर्शनक उपशाखा नहि, बराबरीक संवादक पक्ष बनैत अछि। समकालीन प्रयोग भाषिक मोड़क समकालीन उपयोग केवल दर्शन विभाग धरि सीमित नहि। कानूनमे एक शब्दक परिभाषा नागरिक अधिकार बदलि सकैत अछि। “व्यक्ति”, “अल्पसंख्यक”, “सहमति”, “हानि”, “भेदभाव”, “सार्वजनिक हित” जकाँ पदक अर्थ न्यायिक निर्णयपर प्रभाव डालैत अछि। एतय भाषिक स्पष्टता सीधा संस्थागत परिणाम रखैत अछि। राजनीतिमे “सुरक्षा”, “राष्ट्र”, “विकास”, “आतंक”, “कल्याण”, “आरक्षण”, “प्रतिनिधित्व” जकाँ शब्द केवल वर्णनात्मक नहि; ओ सार्वजनिक ध्यान, भय, समर्थन आ नीति-विकल्प संरचित करैत अछि। तेँ नागरिक विवेक लेल आवश्यक अछि जे शब्दक भावनात्मक प्रभाव आ तर्कगत अर्थ अलग कएल जाए। सामाजिक जीवनमे “शुद्ध भाषा”, “मानक भाषा”, “बोली”, “लोकभाषा”, “सभ्य”, “पिछड़ा”, “सामान्य” जकाँ वर्गीकरण सामाजिक पदानुक्रम बना सकैत अछि। मिथिलाक सन्दर्भमे मैथिली, संस्कृत, लोक-रूप, आधुनिक शिक्षा आ प्रशासनिक भाषासभक सम्बन्ध एहि प्रश्नकेँ ठोस बनबैत अछि। समानान्तर दर्शनक दायित्व कोनो एक रूपक महिमामण्डन नहि, बल्कि ज्ञान, पहुँच, गरिमा आ ऐतिहासिक स्रोतक दृष्टिसँ भाषिक सत्ता जाँचब अछि। डिजिटल माध्यममे भाषिक समस्या आरो जटिल होइत अछि। खोज-इंजन, सामाजिक माध्यम, स्वचालित वर्गीकरण आ कृत्रिम बुद्धि शब्दक प्रयोग, प्रचलन आ अर्थ-विन्यासक विशाल मात्रा सँ पैटर्न बनबैत अछि। एतय लोकप्रियता सत्यक प्रमाण नहि; आवृत्ति नैतिक औचित्य नहि; मशीन द्वारा उत्पन्न सुगठित वाक्य ज्ञानक स्वतः प्रमाण नहि। भाषिक विश्लेषणक संग स्रोत-जाँच, प्रमाण, संदर्भ आ उत्तरदायित्व जोड़ब आवश्यक अछि। शिक्षामे सेहो ई पद्धति उपयोगी अछि। विद्यार्थी जँ दार्शनिक पाठकेँ केवल “दार्शनिक X ई कहलनि” रूपमे पढ़ैत अछि, तँ विचारक इतिहास भेटैत अछि, दर्शन नहि। समस्या, अवधारणा, तर्क, प्रतिपक्ष, भाषा आ प्रमाण अलग कऽ पढ़ला सँ ओ सक्रिय दार्शनिक विवेक विकसित करैत अछि। एहि कारण एहि पुस्तकक संरचना philosopher-by-philosopher encyclopedia बनबाक बदला समस्या-केन्द्रित संवादक रूप ग्रहण करैत अछि। अध्याय-निष्कर्ष बीसम शताब्दीक भाषिक मोड़ आधुनिक दर्शनक चेतनाकेन्द्रित प्रश्नकेँ समाप्त नहि करैत; ओकर सामाजिक, तार्किक आ भाषिक आयाम खोलैत अछि। ज्ञाता निर्वाक् चेतना नहि। ओ भाषा सीखैत अछि, नियम मानैत अछि, अभिव्यक्ति सुधारैत अछि, प्रतिपक्ष सुनैत अछि, सामाजिक संसारमे अर्थ साझा करैत अछि। एहि कारण सत्य, ज्ञान, तत्त्वमीमांसा, नैतिकता, राजनीति आ इतिहास भाषासँ पूर्णतः अलग नहि रहि सकैत अछि। मुदा भाषा पर केन्द्रित होयब जगतकेँ भाषामे विलीन करब नहि। समानान्तर दर्शनक सूत्र अछि: भाषा वास्तविकताक मानव-अनुभवक सक्रिय माध्यम अछि; सत्यक एकमात्र निर्माता नहि। भाषा सामाजिक वास्तविकताकेँ वर्गीकृत आ आकार दऽ सकैत अछि, मुदा शरीर, पदार्थ, पीड़ा, प्रकृति, इतिहास आ प्रमाण ओकर सीमाक प्रतिरोध करैत अछि। भारतीय न्याय, मीमांसा, व्याकरण आ बौद्ध भाषा-विमर्श आधुनिक भाषिक दर्शनक ऐतिहासिक पूर्वरूप नहि, स्वतंत्र परम्परा छथि। मिथिलाक नव्य-न्याय सेहो analytic philosophy नहि; मुदा भाषिक स्पष्टता, सम्बन्धक सूक्ष्मता, प्रमाण, अभाव, inference आ प्रतिपक्षक अनुशासन आधुनिक प्रश्नसभक संग फलदायी संवाद खोलैत अछि। एहि अध्यायसँ पाँच सूत्र निकलैत अछि। पहिल—चेतना दार्शनिक प्रश्नक महत्त्वपूर्ण केन्द्र अछि, मुदा अकेला केन्द्र नहि। दोसर—भाषा विचारक बाहरी आवरण मात्र नहि; अवधारणात्मक ज्ञानक सक्रिय माध्यम अछि। तेसर—अर्थ निजी अनुभूति मात्र नहि; प्रयोग, नियम, प्रसंग आ साझा व्यवहारसँ जुड़ल अछि। चारिम—भाषा सामाजिक वास्तविकताकेँ आकार दऽ सकैत अछि, मुदा वास्तविकता भाषा मात्र नहि। पाँचम—भारतीय आ आधुनिक पाश्चात्य भाषिक परम्पराक तुलना ऐतिहासिक समानता सिद्ध करबाक लेल नहि, समस्या-संवादक लेल होयबाक चाही। अगिला अध्याय एहि दार्शनिक मोड़क ऐतिहासिक कारण—विज्ञान, गणित, तर्क, मनोविश्लेषण, भाषा-विज्ञान, युद्ध, औपनिवेशिकता आ आधुनिक राज्य—क परीक्षण करत। अध्याय-ग्रन्थसूची Gottlob Frege — “On Sense and Reference”; The Foundations of Arithmetic. Bertrand Russell — “On Denoting”; The Problems of Philosophy. Ludwig Wittgenstein — Tractatus Logico-Philosophicus; Philosophical Investigations. J. L. Austin — How to Do Things with Words. Ferdinand de Saussure — Course in General Linguistics. गौतम — न्यायसूत्र। वात्स्यायन — न्यायभाष्य। कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। भर्तृहरि — वाक्यपदीय। गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। Bimal Krishna Matilal — The Word and the World; Logic, Language and Reality. Jonardon Ganeri — Semantic Powers; Philosophy in Classical India.