समस्या बीसम शताब्दीक दर्शनकेँ बुझबाक लेल केवल दार्शनिकसभक नाम आ ग्रन्थक क्रम पर्याप्त नहि। प्रश्न ई अछि जे एहन की बदलल जाहिसँ उन्नैसम शताब्दीक अन्त धरि प्रचलित अनेक दार्शनिक मान्यतासभ बीसम शताब्दीमे पुनः परीक्षणक विषय बनि गेल? विज्ञान स्वतन्त्र संस्थागत अनुशासनक रूपमे अधिक सुदृढ़ भेल; गणितमे नूतन ज्यामिति आ समुच्चय-सिद्धान्तक प्रश्न उठल; प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र पुरान तर्क-पद्धतिक सीमा बदललक; भौतिकीमे सापेक्षताक सिद्धान्त स्थान, काल आ मापक साधारण धारणाकेँ पुनर्विचार लेल बाध्य कएलक; मनोविश्लेषण आत्मबोधक पारदर्शितापर प्रश्न उठौलक; भाषाविज्ञान भाषाकेँ नामक सूची नहि, सम्बन्धक तन्त्रक रूपमे देखबाक दिशा खोललक; विश्वयुद्ध आधुनिक प्रगति आ विवेकक आत्मविश्वासकेँ आघात देलक; औपनिवेशिक शासन आ प्रतिरोध सार्वभौमिकता, सभ्यता, राष्ट्र, अधिकार आ इतिहासक भाषा पुनः जाँचबाक स्थिति उत्पन्न कएलक; आ आधुनिक राज्य प्रशासन, जनगणना, कानून, शिक्षा, अभिलेख, पुलिस, सेना, स्वास्थ्य आ सांख्यिकी द्वारा मनुष्यक जीवनकेँ अभूतपूर्व रूपेँ वर्गीकृत करए लागल। ई सभ परिवर्तन एकहि कारणसँ नहि भेल, न सभ दार्शनिक एकर एकहि उत्तर देलनि। बीसम शताब्दीक दर्शनक इतिहास एकटा सरल सूत्रमे समेटल नहि जा सकैत अछि। तथापि एक साझा स्थिति देखाइत अछि: दर्शनकेँ अपन विषय, पद्धति आ औचित्य फेरसँ स्पष्ट करय पड़ल। जखन भौतिकी, जीवविज्ञान, मनोविज्ञान, समाजविज्ञान आ गणित अपन-अपन विशिष्ट विधि आ संस्थागत क्षेत्र बनबैत गेल, तखन प्रश्न उठल—दर्शनक अपना काम की अछि? दर्शन अनुभवसँ ऊपर कोनो विशेष ज्ञान दैत अछि, विज्ञानक अवधारणाक विश्लेषण करैत अछि, भाषिक भ्रम साफ करैत अछि, मानव-अस्तित्वक अर्थ खोजैत अछि, सत्ता आ समाजक आलोचना करैत अछि, अथवा एहि सभ कार्यक भिन्न संयोजन? एहि अध्यायक समस्या एहि परिवर्तनक कारण-सूत्र खोजब नहि, बल्कि समस्या-क्षेत्रक रूपान्तरण बुझब अछि। इतिहासक एक घटना दर्शनक एक सिद्धान्त “उत्पन्न” कएलक—एहन यान्त्रिक कारणवाद अस्वीकार्य अछि। अधिक उचित ई कहब अछि जे विज्ञान, गणित, भाषा, मनोविज्ञान, युद्ध, औपनिवेशिकता आ राज्यक नूतन रूपसभ दार्शनिक प्रश्नकेँ नूतन दबाव, नूतन प्रमाण, नूतन भाषा आ नूतन संकट प्रदान कएलक। भारतीय आ मिथिलाक दृष्टिसँ एकटा दोसर समस्या सेहो अछि। बीसम शताब्दीक दर्शनक इतिहास प्रायः यूरोप-अमेरिका केन्द्रित लिखल गेल, जाहिमे भारतीय दर्शनकेँ प्राचीन अथवा धार्मिक परम्पराक पृथक् पेटीमे राखि देल जाइत अछि। मुदा औपनिवेशिक शासन, आधुनिक विश्वविद्यालय, मुद्रण, विधि, राष्ट्रवाद, भाषिक मानकीकरण आ सामाजिक आन्दोलन भारतक दार्शनिक प्रश्नसभकेँ सेहो गम्भीर रूपेँ प्रभावित कएलक। तेँ “बीसम शताब्दीमे दर्शन किएक बदलल?” प्रश्नक उत्तर विश्व-दर्शनक बहुकेन्द्रिक इतिहासक भीतर देब आवश्यक अछि। मूल प्रतिपादन एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे बीसम शताब्दीक दर्शनक परिवर्तन सात-आठ अलग धाराक संयोग मात्र नहि, बल्कि ज्ञानक अधिकार, तर्कक स्वरूप, आत्मक पारदर्शिता, भाषाक भूमिका, इतिहासक दिशा, राज्यक शक्ति आ सार्वभौमिकताक दाबीक एक साथ पुनर्परीक्षण छल। पुरान प्रश्न गायब नहि भेल; ओकर शर्त बदलल। ईश्वर, आत्मा, सत्य, कारणता, स्वतंत्रता, न्याय, ज्ञान, भाषा आ समाजक प्रश्न पहिनहियो छल, मुदा बीसम शताब्दीमे नूतन विज्ञान, नूतन तर्क, नूतन संस्था आ नूतन राजनीतिक अनुभवक कारण हुनकर पूछबाक ढंग बदलल। विज्ञान दर्शनकेँ दू दिशासँ चुनौती देलक। पहिल, विज्ञान अपन प्रमाण आ विधि द्वारा एहन प्रश्नक उत्तर देब लागल जे पहिने प्राकृतिक दर्शनक अन्तर्गत छल। दोसर, विज्ञानक भीतरक क्रान्ति स्वयं दार्शनिक मान्यताकेँ चुनौती देलक। गैर-यूक्लिडीय ज्यामिति आ सापेक्षता सिद्धान्त स्थानक एहन चित्र प्रस्तुत कएलक जे साधारण अनुभव आ किछु दार्शनिक पूर्वधारणासँ भिन्न छल। फलतः “अनिवार्य”, “पूर्वानुभविक”, “प्राकृतिक”, “स्वयंसिद्ध” जकाँ पदक अर्थ पुनः जाँचल गेल। गणितीय तर्कशास्त्र दार्शनिक तर्कक भाषा बदललक। फ्रेगे, रसेल, व्हाइटहेड आ बादक तर्कविदसभक कार्य देखौलक जे सामान्य व्याकरण आ तार्किक संरचना एक वस्तु नहि। परिमाण, सम्बन्ध, निषेध, अस्तित्व, फलन आ अनुमानकेँ अधिक औपचारिक रूपमे व्यक्त कएल जा सकैत अछि। एहि परिवर्तनसँ दर्शनमे स्पष्टता, औपचारिकता आ विश्लेषणक नूतन आदर्श उत्पन्न भेल, यद्यपि बादमे एहि आदर्शक सीमा पर सेहो कठोर आलोचना भेल। मनोविश्लेषण आत्मकेँ पूर्णतः पारदर्शी मानबाक भरोसा कमजोर कएलक। यदि इच्छा, स्मृति, भय, दमन आ अवचेतन प्रक्रिया व्यक्तिक अपन आत्म-वर्णनसँ बाहर सेहो सक्रिय छथि, तँ “हम अपने केँ पूर्णतः जानैत छी” दाबी स्वतः सुरक्षित नहि रहैत अछि। भाषाविज्ञान सेहो भाषा सम्बन्धी सरल नामकरण-दृष्टिकेँ चुनौती देलक। भाषा केवल पहिने सँ तैयार वस्तुपर नाम चिपकबैत साधन नहि; अर्थ भेद, संरचना, नियम आ प्रयोगक तन्त्रमे बनैत अछि। विश्वयुद्ध आ औपनिवेशिक अनुभव आधुनिक विवेकक नैतिक प्रतिष्ठाकेँ प्रश्नांकित कएलक। वैज्ञानिक प्रगति स्वयं नैतिक प्रगति सुनिश्चित नहि करैत अछि; उच्च शिक्षित राज्य हिंसा, नस्लवाद, साम्राज्य, जनसंहार, कारागार, प्रचार आ युद्धक तकनीक विकसित करि सकैत अछि। एहि अनुभवसँ विवेकक अस्वीकार आवश्यक नहि, बल्कि विवेकक आत्मसमीक्षा आवश्यक बनैत अछि। अतः समानान्तर प्रतिपादन ई अछि: बीसम शताब्दी दर्शनक “एकटा नूतन स्कूल”क कथा नहि, बल्कि प्रमाण, तर्क, भाषा, मन, इतिहास, सत्ता आ मनुष्यक गरिमाक बहु-दिशात्मक पुनर्गठनक कथा अछि। प्रमुख तर्क पहिल तर्क—विज्ञानक स्वायत्तता दर्शनकेँ अपन कार्य स्पष्ट करबाक दबाव देलक। उन्नैसम आ बीसम शताब्दीक आरम्भ धरि भौतिकी, रसायन, जीवविज्ञान, मनोविज्ञान आ समाजविज्ञान क्रमशः विशिष्ट अनुशासन बनैत गेल। जँ अनुभवजन्य तथ्यक अध्ययन विज्ञान करैत अछि, तँ दर्शन कोन प्रकारक ज्ञान दैत अछि? तार्किक प्रत्यक्षवादीसभ एहि प्रश्नक उत्तर विज्ञानक भाषा, विधि आ अवधारणाक विश्लेषणमे खोजलनि; प्रघटनावादी परम्परा अनुभवक संरचना दिस गेल; अस्तित्ववादी चिन्तन मानव-स्थितिक अर्थ दिस; आलोचनात्मक सिद्धान्त विज्ञान, समाज आ सत्ता बीच सम्बन्ध दिस। अलग-अलग उत्तर स्वयं एहि दबावक प्रमाण छथि। दोसर तर्क—गणित आ भौतिकीक परिवर्तन “स्वयंसिद्ध” ज्ञानक सीमा पुनः निर्धारित कएलक। गैर-यूक्लिडीय ज्यामितिक विकास देखौलक जे यूक्लिडीय संरचना मात्र तार्किक सम्भावना नहि। आइन्स्टाइनक सापेक्षता सिद्धान्त भौतिक स्थान-कालक वर्णनमे एहन गणितीय संरचनाक उपयोग कएलक जे पारम्परिक सहज-बोधसँ भिन्न छल। एहि कारण गणित, अनुभव, मापन आ वास्तविकता बीच सम्बन्ध दार्शनिक विमर्शक केन्द्र बनल। ई परिवर्तन कान्टक सम्पूर्ण दर्शनक सरल “खंडन” नहि, मुदा स्थान-ज्यामिति सम्बन्धी किछु पूर्वधारणाक कठोर पुनर्विचार निश्चित रूपेँ आवश्यक कएलक। तेसर तर्क—आधुनिक प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र विचारक रूपक नूतन विश्लेषण सम्भव कएलक। अरस्तूवादी पद-तर्क दर्शनक दीर्घ इतिहासमे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण छल, मुदा सम्बन्ध, बहु-स्थानिक विधेय, परिमाणक जटिलता आ गणितीय प्रमाणक औपचारिकता लेल नूतन साधन आवश्यक भेल। फ्रेगेक परिमाणक तर्क, रसेलक तार्किक विश्लेषण आ ‘प्रिन्सिपिया मैथेमैटिका’ जकाँ परियोजना दर्शनकेँ ई आशा देलक जे अनेक भ्रम भाषिक अथवा तार्किक संरचना स्पष्ट कएलासँ घटि सकैत अछि। बादमे गोडेलक अपूर्णता-परिणाम औपचारिक प्रणालीक सीमा सम्बन्धी नूतन प्रश्न उठौलक; एहि सँ औपचारिकता नष्ट नहि भेल, मुदा ओकर सर्वशक्तिमत्ता पर अंकुश लगल। चारिम तर्क—मनोविश्लेषण आत्मबोधक सरल प्रतिमानकेँ अस्थिर कएलक। फ्रायडक कार्य चिकित्सकीय, मनोवैज्ञानिक आ सांस्कृतिक विवादक विषय रहल, आ ओकर अनेक विशिष्ट दाबी बादक विज्ञानमे कठोर विवादक अधीन अछि। तथापि दार्शनिक प्रभावक स्तरपर एक गम्भीर प्रश्न बचैत अछि: मनुष्यक इच्छा आ निर्णयक सभ कारण ओकर चेतन आत्म-वर्णनमे उपस्थित होइत अछि की नहि? यदि नहि, तँ नैतिक उत्तरदायित्व, स्वतंत्रता, स्मृति, इच्छाशक्ति आ आत्म-व्याख्याक सिद्धान्तकेँ अधिक जटिल बनय पड़ैत अछि। पाँचम तर्क—भाषाविज्ञान भाषा-दर्शनक समस्या बदललक। सस्यूर भाषाकेँ संकेतसभक पारस्परिक सम्बन्ध आ भेदक तन्त्रक रूपमे देखबाक दिशा देलनि। एहि दृष्टिसँ शब्दक अर्थ केवल बाह्य वस्तुसँ प्रत्यक्ष जोड़ नहि; भाषिक प्रणाली भीतर ओकर स्थान सेहो महत्त्वपूर्ण अछि। एहि बिन्दुसँ संरचनावाद लेल पद्धतिगत आधार बनल, आ बादमे उत्तर-संरचनावाद ई पूछलक जे संरचना स्वयं कतेक स्थिर अछि। दार्शनिक निष्कर्ष ई नहि जे “सभ किछु भाषा अछि”, बल्कि ई जे अर्थक प्रश्न सामाजिक रूपेँ संगठित संकेत-व्यवस्था सँ अलग नहि। पूर्वपक्ष पहिल पूर्वपक्ष कहि सकैत अछि जे “बीसम शताब्दीमे दर्शन बदलल” स्वयं अतिरंजित वाक्य अछि। दर्शन सदैव बदलैत रहल; प्लेटोसँ अरस्तू, बौद्धसँ नव्य-न्याय, मध्ययुगसँ आधुनिकता—सभ ठाम गम्भीर परिवर्तन भेल। तेँ बीसम शताब्दीकेँ विशेष मोड़ मानब यूरोपीय आधुनिकताक आत्म-महिमामण्डन हो सकैत अछि। दोसर पूर्वपक्ष ई अछि जे विज्ञानक परिवर्तनसँ दर्शनक निष्कर्ष निकालब वैज्ञानिकतावादक संकट रखैत अछि। आइन्स्टाइनक सिद्धान्त सफल भौतिकी अछि, मुदा एहि सँ नैतिकता, धर्म अथवा अर्थक प्रश्न अपने-आप हल नहि होइत अछि। गोडेलक प्रमेय औपचारिक गणितक विशिष्ट परिणाम अछि; ओकरा “मानव मन सदैव मशीनसँ ऊपर” जकाँ सामान्य नारा बनायब अनुचित। फ्रायडक ऐतिहासिक प्रभावक कारण ओकर सभ मनोवैज्ञानिक दाबी सत्य नहि मानल जा सकैत। तेसर पूर्वपक्ष राजनीतिक इतिहास पर लागू होइत अछि। युद्ध, औपनिवेशिकता अथवा राज्य-सत्ताक संकट दार्शनिक विचारकेँ प्रभावित करैत अछि, मुदा विचारकेँ केवल सामाजिक परिस्थिति द्वारा “निर्धारित” मानल जाए तँ तर्कक स्वतन्त्र मूल्य नष्ट भऽ सकैत अछि। कोनो दर्शन युद्धकालमे लिखल गेल—एहि कारण ओ सत्य अथवा असत्य नहि होइत अछि। चारिम पूर्वपक्ष भारतीय दृष्टिसँ अछि। यदि बीसम शताब्दीक परिवर्तनक आधार विज्ञान, फ्रेगे, फ्रायड, सस्यूर, विश्वयुद्ध आ यूरोपीय साम्राज्यवाद बनाओल जाए, तँ फेर भारतीय परम्परा यूरोपक प्रतिक्रियामात्र बनि जाएत। भारतीय दर्शनक अपन प्रमाणमीमांसा, तर्क, भाषा, आत्मा, शून्यता, कर्म, धर्म, समाज आ मुक्ति सम्बन्धी दीर्घ बहस एहि नक्शामे हाशियापर पड़ि सकैत अछि। पाँचम पूर्वपक्ष मिथिलाक सन्दर्भमे अछि। नव्य-न्याय जकाँ अत्यन्त विकसित तार्किक परम्पराकेँ आधुनिक प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र क मापदण्डसँ मापल जाए तँ इतिहासक अन्याय होयत। तत्त्वचिन्तामणि आ ओकर टीका-परम्पराक प्रश्न आधुनिक गणितीय तर्कक प्रश्नसँ भिन्न छथि। अतः “आधुनिकता आयल, पुरान दर्शन अप्रासंगिक भेल” निष्कर्ष अस्वीकार्य अछि। उत्तरपक्ष पहिल पूर्वपक्षक उत्तर ई अछि जे बीसम शताब्दीकेँ “अद्वितीय” अथवा “सभसँ महान” मोड़ नहि, विशिष्ट समस्या-संयोजनक काल कहल जा रहल अछि। दर्शन पूर्वोत्तर कालमे बदलैत रहल; बीसम शताब्दीक विशेषता ई जे विज्ञानक संस्थागत स्वायत्तता, गणितीय तर्क, औद्योगिक युद्ध, जनराज्य, औपनिवेशिक संकट, जनसंचार, मनोविज्ञान आ भाषाविज्ञान एक ऐतिहासिक क्षितिजमे संग-संग दार्शनिक दबाव उत्पन्न करैत छथि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—समानान्तर दर्शन वैज्ञानिकतावाद अस्वीकार करैत अछि। विज्ञानक परिणाम ओहि क्षेत्रमे उच्च प्रमाण-मूल्य रखैत अछि जतय वैज्ञानिक विधि लागू अछि; मुदा नैतिक औचित्य, राजनीतिक वैधता, अर्थ, गरिमा अथवा धार्मिक दाबी अलग प्रकारक तर्क आ प्रमाण माँगैत अछि। विज्ञानक सम्मान विज्ञानक सीमा बुझबाक संग होयबाक चाही। एहि कारण “विज्ञान सिद्ध कएलक, तेँ दर्शन समाप्त” आ “दर्शन स्वतंत्र अछि, तेँ विज्ञान अप्रासंगिक”—दुनू अतिवाद अस्वीकार्य छथि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—ऐतिहासिक सन्दर्भ दार्शनिक तर्कक स्थान नहि लैत, ओकर प्रश्न-स्थिति स्पष्ट करैत अछि। युद्धक अनुभव “विवेक खराब अछि” सिद्ध नहि करैत; ओ पूछबाक कारण दैत अछि जे साधनात्मक दक्षता आ नैतिक विवेक एकहि वस्तु किएक नहि। औपनिवेशिकता “सार्वभौमिकता झूठ” सिद्ध नहि करैत; ओ देखबैत अछि जे सार्वभौमिक दाबी व्यवहारमे चयनात्मक लागू भऽ सकैत अछि, तेँ कसौटी अधिक कठोर होयबाक चाही। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय दर्शनकेँ आधुनिक यूरोपीय घटनाक प्रतिक्रिया मानब गलत। भारतीय परम्पराक प्रश्नसभ ऐतिहासिक रूपेँ स्वतन्त्र छथि। मुदा बीसम शताब्दीक औपनिवेशिक आ उत्तर-औपनिवेशिक परिस्थिति एहि परम्परासभक अध्ययन, शिक्षण, अनुवाद, वर्गीकरण आ सार्वजनिक अर्थ बदललक। स्वतंत्र परम्परा आधुनिक सन्दर्भसँ संवाद करैत अछि; संवादक अर्थ उत्पत्ति नहि। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—मिथिलाक नव्य-न्यायकेँ आधुनिक तर्कक बराबर वा पूर्वरूप सिद्ध करबाक आवश्यकता नहि। असली प्रश्न ई अछि जे एक अत्यन्त सूक्ष्म प्रमाण-तर्क परम्परा आधुनिक विज्ञान, भाषाविज्ञान, औपचारिक तर्क आ विश्वविद्यालयीय दर्शनक सामने कोन प्रश्न उठबैत अछि। ऐतिहासिक भिन्नता सुरक्षित राखि तुलना कएलासँ दुनू परम्पराक सीमा अधिक स्पष्ट होइत अछि। उत्तरपक्षक सामान्य सूत्र ई अछि: ऐतिहासिक परिवर्तन प्रश्नक क्षेत्र बदलैत अछि; सत्यक कसौटी नहि। कोनो विचारक उत्पत्तिक सामाजिक कारण जानब आ ओकर तर्कक वैधता जाँचब दू अलग, मुदा परस्पर पूरक कार्य छथि। भारतीय संवाद भारतीय बीसम शताब्दीक दार्शनिक परिस्थिति औपनिवेशिक शासन, आधुनिक शिक्षा, राष्ट्रवाद, सामाजिक सुधार, जाति-विरोध, धार्मिक पुनर्व्याख्या, औद्योगीकरण आ आधुनिक विधि-राज्यक प्रश्नसँ गहरे जुड़ल रहल। एहि सन्दर्भमे दर्शन केवल प्राचीन ग्रन्थक व्याख्या नहि रहल; “आधुनिक” कहबाक अर्थ की, परम्परा केहन रूपेँ जीवित रहय, राष्ट्र व्यक्तिक स्वतंत्रतासँ कोना जुड़य, जाति आ धर्मक संस्थागत रूप न्यायसंगत अछि की नहि, आ पाश्चात्य विज्ञानक संग भारतीय ज्ञान-परम्पराक सम्बन्ध की—एहन प्रश्न तीव्र भेल। गांधीक ‘हिन्द स्वराज’ आधुनिक सभ्यता, मशीन, राज्य आ हिंसाक आलोचना करैत अछि। एहि आलोचनाकेँ विज्ञान-विरोधक साधारण नारा बनायब गलत; मूल प्रश्न साधन, जीवन-रूप, स्वराज, नैतिक आत्मसंयम आ राजनीतिक आधुनिकताक स्वरूपक अछि। रवीन्द्रनाथ ठाकुर राष्ट्रवादक यान्त्रिक सामूहिकता आ मानवतावादी संस्कृति बीच तनाव देखबैत छथि। भीमराव आम्बेडकर आधुनिक विधि, समान नागरिकता, प्रतिनिधित्व, सामाजिक लोकतन्त्र आ जाति-विनाशक प्रश्नकेँ भारतीय दर्शनक केन्द्रमे अनैत छथि। एहि भिन्न विचारधारासभमे सहमति नहि, मुदा आधुनिक राज्य, समाज आ व्यक्ति सम्बन्धी नूतन प्रश्न स्पष्ट छथि। भारतीय दार्शनिक परम्पराक शास्त्रीय स्रोत एहि आधुनिक प्रश्नक सामने निष्क्रिय नहि। न्याय प्रमाण आ अनुमानक कसौटी दैत अछि; मीमांसा वाक्य, कर्तव्य आ व्याख्याक जटिलता खोलैत अछि; बौद्ध परम्परा आत्म, क्षणिकता, कारणता आ दुःख पर कठोर प्रश्न उठबैत अछि; जैन अनेकान्तवाद दृष्टिकोणक सीमा सम्बन्धी अनुशासन दैत अछि; वेदान्त चेतना, आत्मा आ जगतक सम्बन्ध पर भिन्न प्रतिपादन प्रस्तुत करैत अछि। मुदा आधुनिक प्रश्नक उत्तर सीधे पुरान सूत्र उद्धृत कऽ नहि भेटैत; पुनर्व्याख्या, प्रतिपक्ष आ नूतन प्रमाण आवश्यक अछि। औपनिवेशिक ज्ञान-व्यवस्था स्वयं “भारतीय दर्शन” नामक क्षेत्रकेँ वर्गीकृत करैत समय दर्शन/धर्म, आस्तिक/नास्तिक, शास्त्रीय/लोक, संस्कृत/जनभाषा जकाँ श्रेणी उपयोग कएलक। किछु श्रेणी विश्लेषण लेल उपयोगी, किछु अत्यधिक सरलीकृत। समानान्तर दर्शनक दायित्व ई अछि जे भारतीय परम्पराकेँ न तऽ औपनिवेशिक सूचीमे बन्द करय, न गौरववादी प्रतिकथामे। ग्रन्थ, तर्क, संस्था, भाषा, सामाजिक प्रसंग आ प्रतिपक्ष सभकेँ प्रमाण सहित पढ़ल जाए। भारतीय संवादक निष्कर्ष ई नहि जे बीसम शताब्दीक दर्शन भारतमे यूरोपसँ आयल। अधिक उचित ई अछि: बीसम शताब्दीक वैश्विक परिवर्तन विभिन्न ज्ञान-परम्पराकेँ नूतन साझा प्रश्नक क्षेत्रमे अनलक, मुदा प्रत्येक परम्परा अपन ऐतिहासिक अवधारणा आ तर्क संग एहि क्षेत्रमे प्रवेश कएलक। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि मिथिलाक समानान्तर दृष्टिसँ बीसम शताब्दीक परिवर्तनक केन्द्रमे एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न अछि—शास्त्रार्थक अत्यन्त सूक्ष्म परम्परा आधुनिक ज्ञान-संस्थाक संग कोना संवाद करय? मिथिलाक न्याय-नव्य-न्याय परम्परा प्रमाण, अनुमान, अभाव, सम्बन्ध, परिभाषा, व्याप्ति, पक्षता आ तर्कदोष जकाँ प्रश्नक विश्लेषण लेल अत्यन्त परिष्कृत भाषा विकसित कएने छल। आधुनिक प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र एहि परम्पराक स्थानापन्न नहि, न नव्य-न्याय आधुनिक तर्कक पूर्वरूप। दुनूक समस्या-संरचना भिन्न अछि। मुदा दुनू स्पष्टता, तर्कक वैधता आ दाबीक सीमा पर गम्भीर अनुशासन माँगैत अछि—एतय वास्तविक संवाद सम्भव अछि। विज्ञानक स्वायत्तता मिथिलाक परम्पराक सामने प्रश्न राखैत अछि: प्रमाणक पारम्परिक वर्गीकरण आधुनिक प्रयोगशाला, सांख्यिकी, उपकरण-आधारित अवलोकन, ऐतिहासिक अभिलेख आ वैज्ञानिक मॉडलकेँ कोना ग्रहण करय? उत्तर ई नहि जे पुरान प्रमाण-सूची यथावत् सभ आधुनिक ज्ञान समेटि लैत अछि। समानान्तर पद्धति प्रमाणक मूल दार्शनिक प्रश्न—ज्ञानक स्रोत, विश्वसनीयता, त्रुटि, प्रतिपक्ष, पुनर्परीक्षण—केँ आधुनिक विधिक संग संवादमे राखैत अछि। भाषाविज्ञान आ आधुनिक भाषिक दर्शन मिथिलाक बहुभाषिक बौद्धिक संस्कारक सामने दोसर प्रश्न राखैत अछि। संस्कृतक तकनीकी शास्त्रीय भाषा, मैथिलीक साहित्यिक आ लोक रूप, प्रशासनिक भाषासभ आ आधुनिक शिक्षा-व्यवस्थाक भाषा—ई सभ केवल माध्यम नहि, ज्ञानक पहुँच आ प्रतिष्ठासँ जुड़ल संरचना छथि। ककर भाषा शास्त्र मानल जाए, ककर भाषा लोक? ककर पदावली विश्वविद्यालयमे प्रवेश पाबय, ककर अनुभव अनूदित भऽ कऽ अर्थ बदलय? समानान्तर दर्शन एहि प्रश्नकेँ भाषिक गरिमा आ ज्ञानात्मक न्याय दुनू रूपमे देखैत अछि। औपनिवेशिकता आ आधुनिक राज्यक सन्दर्भमे मिथिलाक इतिहास पढ़ैत समय सेहो सावधानी आवश्यक अछि। प्रशासनिक अभिलेख, जनगणना, जातीय वर्गीकरण, भू-राजस्व, शिक्षा आ भाषिक सर्वेक्षण महत्त्वपूर्ण स्रोत छथि, मुदा ओ तटस्थ दर्पण नहि। संगहि लोकस्मृति, पंजी, पाण्डुलिपि, साहित्य, मौखिक परम्परा अथवा क्षेत्रीय दाबी स्वयं स्वतः सत्य नहि। समानान्तर इतिहास-दृष्टि केन्द्र + हाशिया + अभिलेख + मौन सभकेँ पढ़ैत अछि, मुदा सभ दाबीक प्रमाण अलग-अलग जाँचैत अछि। मिथिलाक समानान्तर दृष्टिक विशेषता एतय अछि जे आधुनिकता आ परम्पराकेँ युद्धरत दू शिविर नहि मानल जाए। आधुनिक विज्ञानक प्रमाणक कठोरता ग्रहण कएल जा सकैत अछि, बिना शास्त्रीय तर्कक ऐतिहासिक मूल्य नष्ट कएने; नव्य-न्यायक विश्लेषणात्मक अनुशासन अपनाओल जा सकैत अछि, बिना ओकरा आधुनिक प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र घोषित कएने; मैथिली आ स्थानीय ज्ञान-स्रोतक गरिमा स्वीकारल जा सकैत अछि, बिना स्थानीय दाबीकेँ आलोचनासँ मुक्त कएने। एहि पद्धतिमे मिथिला केवल क्षेत्रीय उदाहरण नहि; ई बहुकेन्द्रिक दार्शनिक अभ्यासक परीक्षा-क्षेत्र अछि। प्रश्न ई नहि—“मिथिला पहिने की खोजलक?” प्रश्न अछि—“मिथिलाक बौद्धिक परम्परा आधुनिक विश्व-दर्शनक प्रश्नक सामने कोन स्वतंत्र तर्क, प्रमाण-पद्धति आ आलोचनात्मक अनुशासन प्रस्तुत करैत अछि?” समकालीन प्रयोग बीसम शताब्दीक परिवर्तन आजुक डिजिटल युग बुझबाक लेल प्रत्यक्ष उपयोगी अछि। विज्ञानक स्वायत्तता हमरा सिखबैत अछि जे विशेषज्ञ ज्ञानक क्षेत्रीय अधिकार मानल जाए, मुदा विशेषज्ञताकेँ नैतिक अथवा राजनीतिक सर्वाधिकार नहि देल जाए। महामारी, जलवायु परिवर्तन, जैव-प्रौद्योगिकी अथवा कृत्रिम बुद्धि सम्बन्धी नीति वैज्ञानिक प्रमाण बिना नहि बनि सकैत अछि; तथापि “की सम्भव अछि?” आ “की उचित अछि?” अलग प्रश्न छथि। गणितीय तर्कक विरासत डिजिटल प्रणाली आ कृत्रिम बुद्धिमे स्पष्ट अछि। औपचारिक नियम, अल्गोरिदम, संगणना आ मॉडल अत्यन्त शक्तिशाली छथि, मुदा औपचारिकता स्वतः सत्य, न्याय वा निष्पक्षता सुनिश्चित नहि करैत। गलत आँकड़ा, पक्षपाती वर्गीकरण, अधूरा उद्देश्य अथवा अस्पष्ट सामाजिक मानक एक तार्किक रूपेँ सुसंगत प्रणालीकेँ सेहो अन्यायपूर्ण बना सकैत अछि। अतः तर्कक शुद्धता + प्रमाणक गुणवत्ता + नैतिक उत्तरदायित्व आवश्यक अछि। मनोविश्लेषणक ऐतिहासिक विरासत आज एहि व्यापक प्रश्नमे उपयोगी अछि जे व्यक्ति अपन सभ प्रेरणा स्वयं स्पष्ट रूपेँ जानैत अछि की नहि। आधुनिक मनोविज्ञान फ्रायडक प्रत्येक सिद्धान्त स्वीकार नहि करैत, मुदा अचेतन प्रक्रिया, पूर्वाग्रह, स्मृति-विकृति, भावनात्मक प्रतिक्रिया आ आत्म-वर्णनक सीमा सम्बन्धी शोध आत्मबोधक सरल चित्रकेँ चुनौती दैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि क्षेत्रमे वैज्ञानिक प्रमाण आ दार्शनिक आत्मसमीक्षा दुनू माँगैत अछि। भाषाविज्ञानक विरासत डिजिटल माध्यममे आरो महत्त्वपूर्ण अछि। सामाजिक माध्यमक शब्दावली, खोज-इंजनक श्रेणी, स्वचालित अनुवाद, भाषिक मॉडल आ सामग्री-संशोधन केवल सूचना वहन नहि करैत; ओ दृश्यता, अर्थ, प्रतिष्ठा आ पहुँच बदलैत अछि। अल्पसंसाधित भाषा, स्थानीय शब्दावली आ क्षेत्रीय ज्ञान यदि डिजिटल संरचनामे अनुपस्थित छथि तँ ज्ञानात्मक असमानता उत्पन्न भऽ सकैत अछि। एहि कारण भाषिक बहुलता तकनीकी प्रश्न मात्र नहि, लोकतान्त्रिक प्रश्न सेहो अछि। औपनिवेशिकता सम्बन्धी आलोचना आज पाठ्यक्रम, संग्रहालय, अभिलेख, नक्शा, जातीय श्रेणी, भाषा-नीति आ ज्ञानक वैश्विक पदानुक्रम जाँचबाक उपकरण दैत अछि। मुदा उपनिवेश-विरोधक नाम पर प्रत्येक स्थानीय दाबी सत्य मानि लेब समान रूपेँ गलत। उपनिवेशी स्रोतक आलोचना करैतहुँ पुरातत्त्व, अभिलेख, पाठ, भाषाविज्ञान, मौखिक इतिहास आ तुलनात्मक प्रमाणक अनुशासन आवश्यक रहैत अछि। आधुनिक राज्यक वर्गीकरणक प्रश्न आज डिजिटल शासनमे नूतन रूप लैत अछि। जैवमितीय पहचान, आँकड़ा-संग्रह, जोखिम-मूल्यांकन, सामाजिक लाभक पात्रता, निगरानी, स्वचालित निर्णय—ई सभ “व्यक्ति”केँ आँकड़ा-प्रतिरूपमे रूपान्तरित करि सकैत अछि। प्रशासनिक दक्षता आवश्यक हो सकैत अछि, मुदा गरिमा, निजता, अपील, पारदर्शिता आ त्रुटि-संशोधनक अधिकार बिना दक्षता न्याय नहि। अध्याय-निष्कर्ष बीसम शताब्दीमे दर्शन एहन कारणसँ नहि बदलल जे कोनो एक दार्शनिक नूतन पद्धति खोजि लेलनि। परिवर्तन गम्भीर छल, किएक तँ ज्ञानक पूरा परिवेश बदलल। विज्ञान दर्शनसँ अलग संस्थागत शक्ति बनल; विज्ञानक भीतरक क्रान्ति पुरान निश्चितताकेँ चुनौती देलक; गणितीय तर्क विचारक औपचारिक रूप बदललक; मनोविश्लेषण आत्मक पारदर्शितापर प्रश्न उठौलक; भाषाविज्ञान अर्थकेँ संरचना आ भेदक तन्त्रमे देखलक; विश्वयुद्ध प्रगतिक नैतिक आश्वासन तोड़लक; औपनिवेशिकता सार्वभौमिकताक चयनात्मक प्रयोग उजागर कएलक; आधुनिक राज्य वर्गीकरण, अभिलेख आ प्रशासन द्वारा ज्ञान-सत्ता सम्बन्धकेँ तीव्र बनौलक। एहि सभकेँ एक सिद्धान्तमे गलायब उचित नहि। तार्किक प्रत्यक्षवाद, प्रघटनावाद, अस्तित्ववाद, संरचनावाद, आलोचनात्मक सिद्धान्त, उत्तर-औपनिवेशिक विचार आ बादक उत्तर-संरचनावाद अलग प्रश्न, पद्धति आ उत्तर रखैत छथि। बीसम शताब्दीक दार्शनिक विशेषता सहमति नहि, समस्या-क्षेत्रक विस्तार अछि। भारतीय दृष्टिसँ एहि परिवर्तनक अर्थ न तऽ पश्चिमी अनुकरण, न प्राचीन गौरवक पुनरावृत्ति। न्याय, मीमांसा, व्याकरण, बौद्ध, जैन, वेदान्त आ अन्य परम्परासभ स्वतंत्र बौद्धिक इतिहास रखैत छथि; आधुनिक विज्ञान, औपनिवेशिकता, राष्ट्र, जाति-विरोध, आधुनिक विधि आ लोकतन्त्र नूतन प्रश्न अनैत छथि। वास्तविक कार्य एहि स्वतंत्र परम्परासभकेँ बराबरीक तर्क-संवादमे राखब अछि। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि एहि अध्यायसँ चारि मूल शिक्षा ग्रहण करैत अछि। पहिल—नूतन ज्ञान-स्रोत आयलापर प्रमाण-पद्धति आत्मसमीक्षा करय। दोसर—परम्पराक तकनीकी अनुशासनकेँ आधुनिक नाम दऽ कऽ आत्मसात् नहि कएल जाए। तेसर—आधुनिक संस्थाक दाबीकेँ प्रमाण आ गरिमाक कसौटी पर जाँचल जाए। चारिम—स्थानीय ज्ञानक सम्मान आलोचनासँ मुक्त विशेषाधिकार नहि। अन्तिम सूत्र: बीसम शताब्दी दर्शनक केन्द्र बदललक, किएक तँ मनुष्य अपन जगतकेँ नूतन उपकरण, नूतन तर्क, नूतन भाषा, नूतन राज्य आ नूतन हिंसाक बीच फेरसँ देखए लागल। अगिला अध्याय विश्लेषणात्मक आ महाद्वीपीय दर्शनक विभाजनक प्रश्न जाँचत—ई वास्तविक दार्शनिक अन्तर कतेक, आ बादक विश्वविद्यालयीय वर्गीकरण कतेक। अध्याय-ग्रन्थसूची Gottlob Frege — Begriffsschrift; The Foundations of Arithmetic. Bertrand Russell and Alfred North Whitehead — Principia Mathematica. Albert Einstein — Relativity: The Special and the General Theory. Rudolf Carnap — The Logical Structure of the World; The Logical Syntax of Language. Otto Neurath, Hans Hahn and Rudolf Carnap — The Scientific Conception of the World: The Vienna Circle. Ludwig Wittgenstein — Tractatus Logico-Philosophicus; Philosophical Investigations. Sigmund Freud — The Interpretation of Dreams; Introductory Lectures on Psychoanalysis. Ferdinand de Saussure — Course in General Linguistics. Edmund Husserl — The Crisis of European Sciences and Transcendental Phenomenology. Max Weber — Economy and Society. M. K. Gandhi — Hind Swaraj. Rabindranath Tagore — Nationalism. B. R. Ambedkar — Annihilation of Caste; States and Minorities. Frantz Fanon — Black Skin, White Masks; The Wretched of the Earth. Bimal Krishna Matilal — Logic, Language and Reality; The Word and the World. Jonardon Ganeri — Philosophy in Classical India; The Lost Age of Reason. Thomas Uebel — Empiricism at the Crossroads: The Vienna Circle’s Protocol-Sentence Debate. Alan Richardson — Carnap’s Construction of the World.