Full chapter text
समस्या
तुलनात्मक दर्शनक आकर्षण स्पष्ट अछि। जखन दू भिन्न दार्शनिक परम्परामे एकहि प्रकारक प्रश्न, शब्द, तर्क वा अनुभूति देखाइत अछि, तखन पाठक तुरन्त सम्बन्ध बनाबय चाहैत अछि। नव्य-न्याय आ आधुनिक विश्लेषणात्मक दर्शन दुनूमे भाषिक सूक्ष्मता अछि; बौद्ध अपोह आ आधुनिक अर्थ-विचार दुनूमे वर्गीकरणक प्रश्न अछि; जैन अनेकान्तवाद आ उत्तर-आधुनिक बहुदृष्टिता दुनूमे एकमात्र दृष्टिक सीमाक चेतना अछि; अद्वैत आ किछु आधुनिक तत्त्वमीमांसा दुनूमे अनुभव आ यथार्थक सम्बन्धक जाँच करैत अछि। मुदा एही ठाम तुलनाक सभसँ पैघ खतरा शुरू होइत अछि। समान प्रश्नक उपस्थिति समान सिद्धान्त सिद्ध नहि करैत। समान शब्द समान अवधारणा सिद्ध नहि करैत। समान निष्कर्ष समान तर्क-पथ सिद्ध नहि करैत। आ समान समस्या पर विचार करब ऐतिहासिक प्रभाव सिद्ध नहि करैत। जँ ई भेदसभ नहि राखल जाए तँ तुलनात्मक दर्शन इतिहासक अनुसन्धानक स्थानपर सांस्कृतिक गौरवक प्रतियोगिता बनि जाइत अछि। दोसर खतरा पश्चिम-केन्द्रित तुलना अछि। जखन भारतीय दार्शनिक अवधारणाकेँ आधुनिक यूरोपीय अथवा अमेरिकी श्रेणीमे अनुवाद कऽ मात्र समझल जाए—जैँ नव्य-न्यायकेँ ‘भारतीय विश्लेषणात्मक दर्शन’, शून्यताकेँ ‘भारतीय विखण्डन’, अनेकान्तवादकेँ ‘भारतीय उत्तर-आधुनिकता’—तखन भारतीय परम्परा अपन स्वतंत्र प्रश्न, भाषा, मोक्षशास्त्रीय संदर्भ, शास्त्रार्थीय इतिहास आ अवधारणात्मक संरचना गमा सकैत अछि। तेसर खतरा उलटा गौरववाद अछि—‘पश्चिम जे कहलक, भारत पहिनहि कहि चुकल छल।’ एहन दाबी दार्शनिक संवाद नहि, ऐतिहासिक प्रतिस्पर्धा बनबैत अछि। समानान्तर दर्शनक उद्देश्य कोनो परम्पराकेँ विजेता घोषित करब नहि, बल्कि अलग-अलग बौद्धिक परम्पराकेँ अपन शक्ति, सीमा आ असहमतिक संग आमने-सामने राखब अछि।
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे तुलनात्मक दर्शन तभी विश्वसनीय अछि जखन तुलना पाँच स्तर अलग राखय: ऐतिहासिक प्रभाव; समस्या-साम्य; अवधारणात्मक साम्य; कार्यगत साम्य; आ मूलभूत भिन्नता। एहि पाँच स्तरकेँ मिला देलासँ भ्रम उत्पन्न होइत अछि। ऐतिहासिक प्रभाव कहबाक लेल सम्पर्क, पाठ, अनुवाद, उद्धरण, यात्रा, संस्थागत सम्बन्ध अथवा अन्य ठोस प्रमाण चाही। समस्या-साम्य लेल केवल एतेक पर्याप्त जे दू परम्परा एक प्रकारक प्रश्न उठबैत अछि। अवधारणात्मक साम्य लेल परिभाषा, तर्क, दाबीक सीमा आ परिणाम तुलना करए पड़त। कार्यगत साम्य कहैत अछि जे दू भिन्न अवधारणा अलग इतिहास रखितहुँ समान दार्शनिक काम कऽ सकैत अछि। मूलभूत भिन्नता स्वीकारब तुलनात्मक अध्ययनक विफलता नहि, ओकर परिपक्वता अछि। समानान्तर दर्शनक नियम अछि—‘साम्य जतए, ततेक मात्र; भिन्नता जतए, ओतए स्पष्ट; प्रभाव केवल प्रमाणसँ।’ एहि नियम बिना तुलना आत्मप्रशंसा वा आत्महीन अनुकरण दुनूमे बदलि सकैत अछि। रंगीन रूपरेखा — तुलनाक पाँच स्तर
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—ऐतिहासिक प्रभावक दाबी सभसँ कठोर प्रमाण माँगैत अछि। यदि कहल जाए जे कोनो भारतीय दार्शनिक विचारक प्रभाव आधुनिक यूरोपीय चिन्तकपर पड़ल, तँ केवल विचार-साम्य पर्याप्त नहि। पाठ-प्रसार, अनुवाद, उद्धरण, ज्ञात सम्पर्क, अध्ययन वा बौद्धिक माध्यमक प्रमाण चाही। अन्यथा उचित भाषा ‘साम्य’ वा ‘संवादयोग्यता’ होयत, ‘प्रभाव’ नहि। दोसर तर्क—समान प्रश्न अलग बौद्धिक संसारमे अलग अर्थ रखि सकैत अछि। ‘आत्म की अछि?’ न्याय, बौद्ध, वेदान्त, आधुनिक मन-दर्शन आ अस्तित्ववादमे एकहि प्रश्न जकाँ देखाइत अछि, मुदा प्रत्येक ठाम आत्मक परिभाषा, प्रमाण, नैतिक परिणाम आ मुक्तिक संदर्भ अलग अछि। तेसर तर्क—अनुवाद स्वयं दार्शनिक निर्णय अछि। ‘प्रमाण’केँ केवल ‘साक्ष्य’, ‘धर्म’केँ केवल ‘रिलीजन’, ‘आत्मा’केँ केवल ‘सेल्फ’, ‘शून्यता’केँ केवल ‘नथिंगनेस’, ‘माया’केँ केवल ‘इल्यूजन’, ‘लक्षणा’केँ केवल ‘मेटाफर’ कहि देलासँ मूल अवधारणा विकृत भऽ सकैत अछि। उचित अनुवादक संग संक्षिप्त व्याख्या आवश्यक अछि। चारिम तर्क—पश्चाद्दृष्टि-दोष अत्यन्त सामान्य अछि। आधुनिक अवधारणा तैयार भेला बाद प्राचीन ग्रन्थमे ओकर पूर्वरूप खोजब सहज अछि। मुदा प्राचीन लेखकक प्रश्न, उपलब्ध शब्दावली, तर्क-विरोधी आ संस्थागत संदर्भ आधुनिक सिद्धान्तसँ भिन्न हो सकैत अछि। इतिहासकेँ भविष्यक शब्दावली सँ लिखब सावधानी माँगैत अछि। पाँचम तर्क—‘पहिनहि छल’ प्रकारक गौरववाद दार्शनिक उपलब्धिक मूल्य घटबैत अछि। जँ गङ्गेशकेँ केवल ‘रसेल सँ पहिने रसेल’ बनाओल जाए, तँ गङ्गेशक वास्तविक मौलिकता—प्रमाणमीमांसा, अनुभूति, अनुमान, शब्द आ तत्त्वचिन्तामणिक विशिष्ट प्रश्न—गौण भऽ जाइत अछि। स्वतंत्र परम्पराकेँ आधुनिक पाश्चात्य नामक प्रमाणपत्रक आवश्यकता नहि। छठम तर्क—उलटा पश्चिम-केन्द्रित मापन सेहो दोषपूर्ण अछि। भारतीय दर्शनकेँ केवल आधुनिक विज्ञान, प्रतीकात्मक तर्क अथवा यूरोपीय तत्त्वमीमांसाक कसौटीपर मापल जाए तँ ओकर मोक्ष, साधना, भाष्य, शास्त्रार्थ, धर्म, ज्ञानोत्पत्ति आ जीवन-रूपक विशिष्टता छूटि सकैत अछि। सातम तर्क—समानता कखनो उपयोगी रूपक हो सकैत अछि, मुदा रूपककेँ ऐतिहासिक दावा नहि बनाओल जाए। ‘नव्य-न्याय आधुनिक विश्लेषणात्मक दर्शनसँ संवाद करैत अछि’ उचित वाक्य अछि; ‘नव्य-न्याय आधुनिक विश्लेषणात्मक दर्शन छल’ अत्यधिक दाबी अछि। आठम तर्क—विरोधाभास सेहो तुलनात्मक ज्ञानक स्रोत अछि। जँ न्याय आत्मा स्वीकारैत अछि आ बौद्ध अनात्मा, तखन तुलना ‘दुनू आत्मपर विचार करैत अछि’ पर समाप्त नहि होयत; वास्तविक दार्शनिक लाभ एही असहमतिक कारण, प्रमाण आ परिणाम जाँचलासँ होयत। नवम तर्क—समकालीन राजनीति तुलनात्मक दर्शनकेँ दू दिशासँ दबाव दे सकैत अछि: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद अपन परम्पराकेँ सर्वज्ञ सिद्ध करय चाहैत अछि; औपनिवेशिक मानसिकता स्थानीय परम्पराकेँ अपरिपक्व मानि सकैत अछि। समानान्तर दर्शन दुनू दबावसँ दूरी राखैत अछि।
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे इतिहासपर एतेक जोर देलासँ दर्शनक सार्वभौमिकता कम भऽ जाएत। यदि दू विचार तर्कगत रूपसँ समान छथि तँ हुनकर बीच ऐतिहासिक सम्पर्क सिद्ध करब किएक आवश्यक? दार्शनिक तुलना प्रभाव-इतिहास नहि, तर्क-विमर्श अछि। दोसर पूर्वपक्ष कहैत अछि जे अत्यधिक सावधानी तुलना निष्फल बना देत। जँ प्रत्येक वाक्यक संग ‘ई बिल्कुल समान नहि’, ‘ई केवल आंशिक साम्य अछि’ जोड़ल जाए तँ पाठक स्पष्ट बौद्धिक सम्बन्ध देखिये नहि सकत। तेसर पूर्वपक्ष गौरववादी रूपमे कहैत अछि जे उपनिवेशित समाजक आत्मसम्मान पुनर्स्थापित करबाक लेल प्राचीन उपलब्धि उजागर करब आवश्यक अछि। पश्चिमी इतिहासलेखन बहुत दिन भारतीय योगदान घटेलक; तेँ ‘पहिने छल’ दाबी प्रतिपक्षीय सुधार अछि। चारिम पूर्वपक्ष कहैत अछि जे आधुनिक दार्शनिक भाषा बिना प्राचीन विचार बुझेनाइ कठिन अछि। पाठक ‘अवच्छेदकता’ वा ‘अपोह’ नहि बुझैत, मुदा ‘विश्लेषण’ वा ‘विखण्डन’ बुझि सकैत अछि; तेँ आधुनिक तुलना शिक्षणक उपयोगी उपाय अछि।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—दार्शनिक तुलना लेल ऐतिहासिक प्रभाव सिद्ध करब अनिवार्य नहि; मुदा जँ प्रभावक दावा कएल जाए तँ प्रमाण अनिवार्य अछि। तर्कगत साम्य स्वतंत्र रूपेँ मूल्यवान अछि। समस्या ओतए अछि जतए तर्कगत साम्यकेँ इतिहासक सम्बन्ध मानि लेल जाए। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—सावधानीक अर्थ अस्पष्टता नहि। उलटे पाँच-स्तरीय पद्धति पाठककेँ अधिक स्पष्ट भाषा दैत अछि: ‘समस्या-साम्य मजबूत’, ‘अवधारणात्मक साम्य सीमित’, ‘ऐतिहासिक प्रभावक प्रमाण नहि’, ‘कार्यगत साम्य उल्लेखनीय’। ई भाषा ‘समान’/‘असमान’क साधारण द्वैतसँ अधिक उपयोगी अछि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—ऐतिहासिक अन्यायक सुधार नूतन ऐतिहासिक अतिशयोक्तिसँ नहि होयत। आत्मसम्मानक सर्वोत्तम आधार प्रमाणित उपलब्धि अछि। मिथिला, भारत वा कोनो अन्य परम्पराक वास्तविक उपलब्धि एतेक समृद्ध अछि जे काल्पनिक पूर्वगामिता जोड़बाक आवश्यकता नहि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—आधुनिक तुलना शिक्षणक सहायक हो सकैत अछि, मुदा सहायक उपमा स्पष्ट रूपेँ ‘उपमा’ कहल जाए। मूल पद, मूल प्रश्न आ ऐतिहासिक संदर्भ धीरे-धीरे पाठककेँ सिखाओल जाए; सुविधाक नामपर अवधारणाक अर्थ नहि बदलल जाए।
भारतीय संवाद
भारतीय दार्शनिक परम्पराक आन्तरिक इतिहास स्वयं तुलनात्मक सावधानी सिखबैत अछि। न्याय आ बौद्ध दुनू प्रमाणपर लिखैत छथि, मुदा प्रमाणक संख्या, प्रत्यक्षक स्वरूप, सार्वभौमक स्थिति, शब्दार्थ आ आत्मक प्रश्नपर गहिर असहमति अछि। केवल ‘दुनू ज्ञानमीमांसा करैत छथि’ कहब आरम्भ अछि, निष्कर्ष नहि। मीमांसा आ व्याकरण दुनू भाषा आ वाक्यार्थपर विचार करैत छथि, मुदा वाक्यक एकता, शब्दार्थक स्वायत्तता, शास्त्रीय वाक्यक अधिकार आ अर्थबोधक प्रक्रिया पर अलग दृष्टि रखैत छथि। ई आन्तरिक भिन्नता आधुनिक तुलनात्मक दर्शन लेल नमूना अछि। बौद्ध शून्यता आ जैन अनेकान्त दुनू एकरेखीय तत्त्वमीमांसा पर प्रश्न उठबैत छथि, मुदा हुनकर दार्शनिक प्रयोजन, तर्कपद्धति, नैतिक पृष्ठभूमि आ मुक्ति-सिद्धान्त अलग अछि। एकरा उत्तर-आधुनिक सापेक्षतावादक एकहि रूप मानब दू परम्पराक भिन्नता नष्ट करैत अछि। वेदान्तक भीतर अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत आ अन्य प्रवृत्तिक मतभेद सेहो चेतावनी दैत अछि जे एक शब्द—‘वेदान्त’—भीतर अनेक स्वतंत्र दार्शनिक परियोजना रहि सकैत अछि। तदनुसार ‘भारतीय दर्शन’ स्वयं एकवचन सरल श्रेणी नहि।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि तुलनात्मक दर्शन लेल पहिल कसौटी रूपमे ‘पूर्वपक्ष’ अपनबैत अछि। जे परम्परासँ तुलना कएल जा रहल अछि, पहिने ओकर मत ओहि परम्पराक अपन पद, स्रोत आ सर्वोत्तम तर्कक आधारपर प्रस्तुत हो। प्रतिपक्षकेँ अपन सुविधानुसार छोट करब निषिद्ध अछि। दोसर कसौटी ‘अवच्छेदन’ अर्थात् दाबीक सीमा स्पष्ट करब अछि। ‘नव्य-न्याय आ विश्लेषणात्मक दर्शनमे तकनीकी भाषिक सूक्ष्मताक साम्य अछि’—ई सीमित दाबी अछि। ‘नव्य-न्याय विश्लेषणात्मक दर्शन अछि’—ई अनावश्यक व्यापक दाबी अछि। तेसर कसौटी ‘प्रमाण-भार’ अछि। साधारण साम्य लेल कम प्रमाण चलि सकैत अछि; ऐतिहासिक प्रभाव, कालक्रम वा प्रत्यक्ष बौद्धिक सम्पर्क लेल अधिक मजबूत प्रमाण चाही। दाबी जतेक पैघ, प्रमाणक भार ओतेक पैघ। चारिम कसौटी भाषा-विवेक अछि। मैथिलीमे आधुनिक दार्शनिक पद गढ़ैत समय मूल अंग्रेजी पद जहाँ आवश्यक हो कोष्ठकमे देल जा सकैत अछि, मुदा मुख्य अर्थ मैथिलीमे स्पष्ट कएल जाए। भारतीय तकनीकी पदक संग सेहो एही नियम—मूल पद बचाउ, अर्थ खोलू, सरल आधुनिक समानार्थक घोषित नहि करू। पाँचम कसौटी आत्मसमीक्षा अछि। मिथिलाक परम्पराकेँ आधुनिक विचारक सामने राखैत समय उद्देश्य ओकर विजय नहि, परीक्षण अछि। कखनो आधुनिक सिद्धान्त नव्य-न्यायक सीमा देखाबय; कखनो नव्य-न्याय आधुनिक अस्पष्टता पकड़य; कखनो दुनू अलग प्रश्न पूछैत भेटय। तीनू परिणाम स्वीकार्य छथि। छठम कसौटी ई अछि जे ‘स्थानीय’ शब्दकेँ ‘सत्य’क समानार्थी नहि बनाओल जाए। स्थानीय स्मृति, लोकपरम्परा, मौखिक इतिहास आ क्षेत्रीय ज्ञान महत्त्वपूर्ण स्रोत छथि, मुदा हुनको प्रमाण, काल, प्रसंग आ वैकल्पिक व्याख्याक परीक्षण आवश्यक अछि। रंगीन प्रक्रिया-चित्र — सुरक्षित तुलनाक क्रम
समकालीन प्रयोग
कृत्रिम बुद्धि सम्बन्धी विमर्शमे तुलनात्मक अतिशयोक्ति बहुत सहज अछि। ‘नव्य-न्याय पहिल कृत्रिम बुद्धि सिद्धान्त छल’ कहब अनुचित; मुदा नव्य-न्यायक परिभाषा, अनुमान, सम्बन्ध आ प्रमाण-विवेक आधुनिक स्वचालित तर्क, व्याख्येयता आ ज्ञान-दाबीक परीक्षणमे तुलनात्मक साधन बनि सकैत अछि। स्त्रीवादी दर्शन आ गार्गी–मैत्रेयीक चर्चा करते समय सेहो सावधानी चाही। उपनिषदिक स्त्री-वक्ताक उपस्थितिक ऐतिहासिक महत्त्व अछि, मुदा हुनका आधुनिक स्त्रीवादी सिद्धान्तकार घोषित करब काल-विस्थापन होयत। उचित प्रश्न ई अछि जे स्त्रीक बौद्धिक उपस्थिति, अधिकार, प्रश्नाधिकार आ परम्परागत स्मृति आधुनिक लिंग-विमर्शक संग कोना संवाद करैत अछि। जाति-विमर्शमे आधुनिक श्रेणीकेँ प्राचीन वा मध्ययुगीन स्रोतपर यथावत् आरोपित करब विशेष जोखिमपूर्ण अछि। कोनो जाति, उपजाति वा सामाजिक श्रेणीक वर्तमान अर्थकेँ अतीतमे प्रक्षेपित करबाक बदला प्रत्येक कालक स्रोत, पद, सामाजिक कार्य आ संस्थागत परिस्थिति जाँचल जाए। धर्म-दर्शनमे ‘धर्म = रिलीजन’क सीधा समानता कानून, इतिहास आ दर्शन तीनूमे भ्रम पैदा करि सकैत अछि। धर्म कर्तव्य, व्यवस्था, आचार, साधना, सम्प्रदाय, नैतिकता आ संस्थागत विश्वासक अलग-अलग अर्थ धारण करि सकैत अछि। आधुनिक ‘धर्म’ आ ‘धर्मनिरपेक्षता’ विमर्शमे एही बहुस्तरक सावधानी आवश्यक अछि। भाषा-विमर्शमे ‘भाषा’ आ ‘बोली’ जकाँ पद प्रशासनिक शक्ति, सांस्कृतिक प्रतिष्ठा आ ऐतिहासिक आत्मपहिचानसँ जुड़ल छथि। पश्चिमी भाषावैज्ञानिक श्रेणी उपयोगी हो सकैत अछि, मुदा क्षेत्रीय भाषिक इतिहासकेँ बिना जाँच अपनब उपयुक्त नहि। शिक्षामे सुरक्षित तुलना विद्यार्थीकेँ दोहरा लाभ दैत अछि। ओ आधुनिक सिद्धान्त जल्दी बुझैत अछि, संगहि मूल परम्पराक भिन्नता पहिचानैत अछि। एहि कारण पाठ्यक्रममे ‘समानता’क संग ‘भिन्नता’क पृथक् स्तम्भ राखब उपयोगी होयत। सार्वजनिक इतिहासमे ई पद्धति मिथ्या गौरव आ मिथ्या हीनता दुनूसँ रक्षा करैत अछि। वास्तविक उपलब्धि जतेक प्रमाणित अछि, ओकरा पूरे आत्मविश्वाससँ लिखू; जे सम्भावित अछि, सम्भावित कहू; जे विवादित अछि, विवादित कहू; जे अज्ञात अछि, ओकरा अज्ञात रहए दिअ।
अध्याय-निष्कर्ष
तुलनात्मक दर्शनक उद्देश्य समानता खोजब मात्र नहि; उचित भिन्नता देखब सेहो अछि। दू परम्परा एक प्रश्न साझा करि सकैत अछि, मुदा अलग अवधारणा, अलग प्रमाण आ अलग लक्ष्य रखि सकैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि कारण पाँच स्तर अलग राखैत अछि—ऐतिहासिक प्रभाव, समस्या-साम्य, अवधारणात्मक साम्य, कार्यगत साम्य, मूलभूत भिन्नता। एहि भेदसँ तुलना अधिक सत्यनिष्ठ बनैत अछि। मिथिलाक परम्पराक सम्मान ओकरा आधुनिक पाश्चात्य विचारक पूर्वरूप सिद्ध कएने नहि, बल्कि ओकर अपन तर्क, प्रमाण, भाषा, पूर्वपक्ष–उत्तरपक्ष आ शास्त्रार्थक सूक्ष्मता पढ़लासँ होइत अछि। अध्यायक अन्तिम सूत्र अछि—तुलना करू, मुदा इतिहास नहि गढ़ू; साम्य देखू, मुदा भिन्नता नहि मेटाउ; संवाद बनाउ, मुदा कोनो परम्पराकेँ दोसरक प्रतिलिपि नहि बनाउ।
अध्याय-ग्रन्थसूची
• बी. के. मतिलाल — ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality); ‘शब्द आ जगत’ (The Word and the World)। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India); ‘विवेकक हरायल युग’ (The Lost Age of Reason)। • दया कृष्ण — ‘भारतीय दर्शन: प्रतिपक्षी दृष्टि’ (Indian Philosophy: A Counter Perspective)। • जे. एन. मोहन्ती — ‘भारतीय दर्शनक विवेक आ परम्परा’ (Reason and Tradition in Indian Thought)। • विल्हेल्म हाल्बफास — ‘भारत आ यूरोप: बुझाइ पर एक निबन्ध’ (India and Europe: An Essay in Understanding)। • जे. एल. गारफील्ड — ‘रिक्त शब्द: बौद्ध दर्शन आ अन्तर-सांस्कृतिक व्याख्या’ (Empty Words: Buddhist Philosophy and Cross-Cultural Interpretation)। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • भर्तृहरि — वाक्यपदीय। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • नागार्जुन — मूलमध्यमककारिका। • उमास्वाति — तत्त्वार्थसूत्र।