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समस्या
बीसम शताब्दीक पहिल अर्धमे किछु दार्शनिक आ वैज्ञानिक विचारकक सामने एक तीव्र प्रश्न छल—दार्शनिक कथनक अर्थक कसौटी की? विज्ञानक कथन प्रयोग, अवलोकन, गणना आ सार्वजनिक जाँचक संग जुड़ल रहैत अछि; मुदा अनेक तत्त्वमीमांसक वाक्य एहन लगैत छल जे न ओकर सत्यापन सम्भव, न खण्डन, तकर बावजूद ओ गम्भीर ज्ञानक दावा करैत छल। वियना-वृत्तसँ जुड़ल मोरित्स श्लिक, रुडोल्फ कार्नाप, ओट्टो न्यूराथ, हान्स हान आदि विचारक एहि संकटकेँ तर्क, आधुनिक विज्ञान आ अनुभवक संयुक्त कसौटी द्वारा हल करबाक प्रयास कएलनि। एहि व्यापक प्रवृत्तिकेँ प्रायः ‘तार्किक प्रत्यक्षवाद’ अथवा ‘तार्किक अनुभववाद’ कहल जाइत अछि। मूल आग्रह ई छल जे अर्थपूर्ण कथनसभक दू प्रमुख प्रकार पहिचानल जा सकैत अछि: एक, तर्क आ गणितक विश्लेषणात्मक कथन; दोसर, अनुभव द्वारा जाँचल जा सकयवला तथ्यात्मक कथन। एहि कसौटीक बाहर पड़यवला अनेक तत्त्वमीमांसक कथनकेँ ज्ञान-दाबी रूपमे संदिग्ध मानल गेल। मुदा शीघ्र स्पष्ट भेल जे ‘सत्यापन’ स्वयं सरल कसौटी नहि। सार्वभौमिक वैज्ञानिक नियम पूर्णतः सत्यापित कोना होयत? इतिहासक कथन, परोक्ष वस्तु, सूक्ष्म कण, भविष्यवाणी, सम्भावना, नैतिक मूल्य, अन्य मनुष्यक अनुभव—ई सभ सीधे अवलोकनमे नहि अबैत। एहि अध्यायक समस्या तेँ केवल ‘तत्त्वमीमांसा सही कि गलत’ नहि। प्रश्न अछि—अर्थ, प्रमाण, जाँच, विज्ञान, अवलोकन आ दार्शनिक विनम्रताक उचित सम्बन्ध की? आ एतय भारतीय प्रमाण-परम्परा तथा मिथिलाक बहुप्रमाणीय विवेकवाद तार्किक प्रत्यक्षवादक शक्ति आ सीमा दुनूकेँ कोना पढ़ैत अछि?
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे तार्किक प्रत्यक्षवाद आधुनिक दर्शनमे एक आवश्यक बौद्धिक शुद्धिकरणक प्रयास छल। ओ दार्शनिक भाषाकेँ प्रमाण, तर्क, विज्ञान आ सार्वजनिक जाँचक प्रति उत्तरदायी बनबय चाहैत छल। मुदा तार्किक प्रत्यक्षवाद एक कठोर, एकरूप सिद्धान्त नहि रहल। सत्यापनक मजबूत रूप शीघ्र कठिनाईमे पड़ल; बादमे पुष्टि, परीक्षणयोग्यता, अवलोकन-वाक्य, सिद्धान्त-भाषा आ विज्ञानक एकता सम्बन्धी दृष्टि बदलैत रहल। समानान्तर दर्शन एहि परम्परासँ तीन शिक्षा ग्रहण करैत अछि—अप्रमाणित विशाल दाबीपर संशय; भाषिक स्पष्टता; आ सार्वजनिक जाँच। मुदा ओ एकल ‘अनुभवजन्य सत्यापन’केँ सभ ज्ञान-क्षेत्रक एकमात्र कसौटी नहि मानैत। इतिहास, नैतिकता, कानून, भाषा, धर्म, समाज, गणित, विज्ञान आ निजी अनुभवलोक अलग-अलग प्रमाण-रूप माँगि सकैत अछि। एही कारण बहुप्रमाणीय विवेकवाद तार्किक प्रत्यक्षवादक अनुशासन स्वीकारैत अछि, ओकर प्रमाण-एकाधिकार नहि। रंगीन रूपरेखा — अर्थपूर्ण कथनक प्रारम्भिक प्रत्यक्षवादी वर्गीकरण
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—अर्थक प्रश्नकेँ प्रमाणक संग जोड़ल गेल। यदि कोनो तथ्यात्मक कथनक सत्य अथवा असत्य होयबाक स्थिति कल्पनीय नहि, तँ ओ ज्ञान-दाबी कतेक अर्थपूर्ण अछि—ई प्रश्न तार्किक प्रत्यक्षवाद तीक्ष्ण रूपमे उठबैत अछि। दोसर तर्क—तर्क आ गणितक कथन अनुभवजन्य तथ्य जकाँ सत्य नहि। ‘क वा नहि-क’ जकाँ तार्किक संरचना जगतक विशेष घटना नहि बतबैत, बल्कि प्रतीक-व्यवस्थाक नियम अथवा तार्किक सम्बन्ध स्पष्ट करैत अछि। तेसर तर्क—तत्त्वमीमांसा-विरोधक उद्देश्य केवल धर्म वा पारम्परिक दर्शनक आलोचना नहि छल। कार्नाप जकाँ विचारक एहन दार्शनिक वाक्यक आलोचना करैत छथि जकर व्याकरण सामान्य लगैत अछि, मुदा तार्किक विश्लेषणमे परीक्षणयोग्य दावा स्पष्ट नहि करैत। चारिम तर्क—विज्ञानक एकताक आदर्श महत्त्वपूर्ण छल। प्राकृतिक आ सामाजिक विज्ञानक भाषा, प्रमाण आ व्याख्याकेँ अधिक सार्वजनिक, पारस्परिक रूपेँ अनुवादयोग्य आ आलोचनासक्षम बनाबयक प्रयत्न भेल। मुदा ‘एकता’क अर्थ एकहि पद्धति सभपर थोपब आवश्यक नहि। पाँचम तर्क—प्रोटोकॉल-वाक्य सम्बन्धी विवाद देखबैत अछि जे ‘शुद्ध अवलोकन’ सरल धारणा नहि। अवलोकन भाषा, उपकरण, सिद्धान्त, प्रशिक्षित दृष्टि आ सार्वजनिक रिपोर्टक माध्यमेँ व्यक्त होइत अछि। श्लिक, कार्नाप आ न्यूराथ एहि प्रश्नपर एक मत नहि छलाह। छठम तर्क—मजबूत सत्यापन-सिद्धान्त विज्ञानक अपने सार्वभौमिक नियमकेँ संकटमे डालि सकैत अछि। ‘सभ धातु तापेँ प्रसारित होइत अछि’ जकाँ सार्वभौमिक वाक्यक अनन्त उदाहरण पूर्णतः जाँचल नहि जा सकैत। एहि कारण ‘पुष्टि’ आ परीक्षणक कमजोर रूप दिस विकास भेल। सातम तर्क—अर्थक सत्यापन-कसौटी स्वयं कोन प्रकारक कथन अछि? यदि ओ न तर्कगत अनिवार्य सत्य अछि, न प्रत्यक्ष अनुभवजन्य कथन, तँ सिद्धान्त अपन कसौटीमे कोना टिकत? ई आत्मसन्दर्भीय आपत्ति प्रत्यक्षवादक कठोर रूपपर गंभीर दबाव दैत अछि। आठम तर्क—विज्ञानक सिद्धान्तमे एहन सैद्धान्तिक वस्तु होइत अछि जे सीधे देखाइ नहि पड़ैत। इलेक्ट्रॉन, क्षेत्र, जीन, वक्र स्थान-काल अथवा सांख्यिकीय संरचना प्रत्यक्ष आँखिक अवलोकन नहि, तथापि परीक्षणयोग्य सिद्धान्तमे अर्थपूर्ण भूमिका रखैत अछि। नवम तर्क—नैतिक वाक्यकेँ केवल तथ्यात्मक सत्यापनक कसौटीपर रखल जाए तँ ‘अन्याय गलत अछि’ प्रकारक कथन समस्या बनैत अछि। ए. जे. आयर नैतिक वाक्यकेँ भाव-अभिव्यक्तिसँ जोड़ैत छथि; मुदा बादक नैतिक दर्शन देखबैत अछि जे नैतिक तर्क कारण, परिणाम, अधिकार, गरिमा आ संगतिसँ सार्वजनिक रूपेँ विवेचित भऽ सकैत अछि। दसम तर्क—तार्किक प्रत्यक्षवादक स्थायी योगदान ओकर कठोर सिद्धान्त नहि, ओकर प्रश्नात्मक अनुशासन अछि: ‘अहाँक कथनक अर्थ की? कोन परिस्थिति ओकरा समर्थन करैत? कोन प्रमाण विरोध करैत? ई तथ्यात्मक दावा अछि कि केवल भाषिक/मूल्यात्मक अभिव्यक्ति?’
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे सत्यापन-सिद्धान्त अत्यधिक संकीर्ण अछि। मानवीय जीवनक अनेक अर्थपूर्ण वाक्य—नैतिकता, सौन्दर्य, इतिहास, कानून, प्रेम, स्मृति, धार्मिक अनुभव—प्रयोगशाला-जकाँ सत्यापित नहि होइत। दोसर पूर्वपक्ष विज्ञान-दर्शनसँ अछि। अवलोकन स्वयं सिद्धान्तमुक्त नहि; की देखल गेल, कोन उपकरण विश्वसनीय, कोन आँकड़ा महत्त्वपूर्ण—ई सभ पूर्वज्ञान आ सिद्धान्तसँ प्रभावित होइत अछि। तेसर पूर्वपक्ष कहैत अछि जे तत्त्वमीमांसा बिना विज्ञान स्वयं किछु मान्यता ग्रहण करैत अछि—यथार्थक स्थिरता, कारणता, बाह्य जगत, गणितीय संरचना, नियमिता। अतः सभ तत्त्वमीमांसा ‘निरर्थक’ कहब आत्मविरोधी हो सकैत अछि। चारिम पूर्वपक्ष भारतीय दृष्टिसँ अछि। न्याय, मीमांसा, बौद्ध आ जैन दर्शन प्रमाणक जटिल वर्गीकरण दैत छथि; प्रत्यक्ष मात्र ज्ञानक एकमात्र स्रोत नहि। शब्द, अनुमान, उपमान, स्मृति, अभाव आदि अलग प्रश्न उठबैत छथि। तखन प्रत्यक्षवादी कसौटी ऐतिहासिक रूपेँ अत्यधिक एकरेखीय बुझाइत अछि।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—तार्किक प्रत्यक्षवादक सर्वोत्तम शिक्षा एहि रूपमे नहि जे ‘जतए प्रयोगशाला नहि, ओतए अर्थ नहि’। उचित शिक्षा ई कि प्रत्येक ज्ञान-दाबी अपन औचित्य-पद्धति स्पष्ट करय। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—अवलोकन सिद्धान्त-सापेक्ष हो सकैत अछि, मुदा एहि सँ तथ्य पूर्णतः मनमाना नहि होइत। उपकरण, पुनरावृत्ति, स्वतंत्र परीक्षण, अन्तर-विषयी समीक्षा आ सार्वजनिक आँकड़ा द्वारा त्रुटि घटाओल जा सकैत अछि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—तत्त्वमीमांसाक सभ प्रश्न समान नहि। किछु दाबी वास्तविक वैज्ञानिक वा तर्कीय प्रश्नक अग्रदूत हो सकैत अछि; किछु अवधारणात्मक स्पष्टिकरण; किछु वास्तवमे परीक्षणसँ बचयवला भाषा हो सकैत अछि। समानान्तर दर्शन तत्त्वमीमांसाकेँ एकहि झटकामे अस्वीकार नहि करैत, दाबी-दर-दाबी जाँचैत अछि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय प्रमाणपरम्पराक बहुलता प्रत्यक्षवादक आलोचना मात्र नहि, एक रचनात्मक विस्तार दैत अछि। अलग क्षेत्र लेल अलग प्रमाणक प्रकार मानल जा सकैत अछि, मुदा प्रत्येक प्रमाणक विश्वसनीयता, सीमा आ त्रुटि-शर्त स्पष्ट होयबाक चाही।
भारतीय संवाद
न्याय दर्शन प्रत्यक्षकेँ महत्त्वपूर्ण प्रमाण मानैत अछि, मुदा ओकरा अकेला नहि छोड़ैत। अनुमान, उपमान आ शब्द सेहो ज्ञानोत्पादक साधन छथि। एहि कारण न्याय तार्किक प्रत्यक्षवादक ‘सार्वजनिक प्रमाण’ आग्रहसँ संवाद करैत अछि, मुदा प्रमाणक क्षेत्र अधिक व्यापक रखैत अछि। बौद्ध प्रमाणमीमांसा प्रत्यक्ष आ अनुमानक कठोर विवेचन करैत अछि। अवधारणात्मक निर्माण, प्रत्यक्षक सीमा आ अनुमानक वैधता सम्बन्धी प्रश्न आधुनिक विज्ञान-दर्शनक संग समस्या-स्तरपर संवादयोग्य छथि। मीमांसा शब्द-प्रमाण आ वाक्यबोधक स्वायत्तता पर बल दैत अछि। एहि परम्परासँ प्रश्न उठैत अछि—सभ ज्ञानकेँ प्रत्यक्ष अनुभवमे घटायल जा सकैत अछि की नहि? भाषा, परम्परा आ साक्ष्यक विश्वसनीयता स्वतंत्र परीक्षण माँगैत अछि। चार्वाक परम्पराकेँ बहुत बेर ‘भारतीय प्रत्यक्षवाद’ कहि सरल बना देल जाइत अछि। ई तुलना सावधानी माँगैत अछि। प्रत्यक्षक महत्त्व एक साम्य हो सकैत अछि, मुदा आधुनिक तार्किक प्रत्यक्षवादक गणितीय तर्क, विज्ञान-भाषा आ सत्यापन-परियोजना चार्वाकक ऐतिहासिक संदर्भसँ भिन्न अछि। भारतीय संवादक निष्कर्ष—प्रमाणक बहुलता अराजकता नहि। प्रत्येक प्रमाण-प्रकारक अपन क्षेत्र, वैधता-शर्त, त्रुटि-स्रोत आ प्रतिपरीक्षण होयबाक चाही।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक नव्य-न्याय परम्परा तार्किक प्रत्यक्षवादक संग एक महत्त्वपूर्ण बिन्दुपर संवाद करैत अछि—अस्पष्ट दार्शनिक कथनक विश्लेषण। दाबीक विषय, विशेषण, सम्बन्ध, प्रमाण आ निषेध स्पष्ट कएल जाए, ताकि शब्दक आभा ज्ञानक स्थान नहि लय। मुदा मिथिलाक समानान्तर दृष्टि प्रत्यक्षवादक प्रमाण-संकुचन स्वीकार नहि करैत। बहुप्रमाणीय विवेकवाद कहैत अछि—प्रमाण अनेक हो सकैत अछि; कसौटी मनमाना नहि। प्रयोग, प्रत्यक्ष, अनुमान, अभिलेख, साक्ष्य, भाषिक व्यवहार, सांख्यिकी, देहगत अनुभव, सामाजिक स्थान—सभ अलग क्षेत्रमे महत्त्वपूर्ण हो सकैत अछि। एहि दृष्टिसँ तत्त्वमीमांसाक प्रश्न सेहो तीन श्रेणीमे जाँचल जाएत: तथ्यात्मक दाबी—प्रमाण माँगत; अवधारणात्मक दाबी—तर्क आ स्पष्टता माँगत; अस्तित्वगत/मूल्यात्मक प्रश्न—अनुभव, तर्क, नैतिक औचित्य आ आत्मसमीक्षा माँगत। मिथिलाक समानान्तर पद्धति ‘सत्यापन’केँ ‘पुनर्परीक्षण’मे विस्तृत करैत अछि। प्रत्येक दाबीकेँ पूछल जाए—ई कहाँसँ आयल? कोन प्रकारक प्रमाण एहि पर लागू? विरोधी प्रमाण की? भाषा अस्पष्ट की? निष्कर्ष बदलबाक शर्त की? एहि कारण तार्किक प्रत्यक्षवाद समानान्तर दर्शनक शत्रु नहि, अनुशासनदाता पूर्वपक्ष अछि। ओ प्रमाण-विहीन भाषा पर प्रहार करैत अछि; समानान्तर दर्शन ओकरा उत्तर दैत अछि जे प्रमाणक अर्थ अनुभवजन्य अवलोकनसँ व्यापक, मुदा परीक्षणसँ मुक्त नहि। रंगीन प्रक्रिया-चित्र — समानान्तर सत्यापन
समकालीन प्रयोग
कृत्रिम बुद्धिक युगमे तार्किक प्रत्यक्षवादक प्रश्न फेर प्रासंगिक अछि। AI द्वारा उत्पन्न कोनो तथ्यात्मक कथन लेल पूछू—स्रोत की? स्वतंत्र पुष्टि अछि? उद्धरण वास्तविक अछि? आँकड़ा उपलब्ध अछि? केवल सुगठित भाषा सत्यापन नहि। स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था वा सार्वजनिक नीतिमे आँकड़ा-आधारित दावा परीक्षणयोग्य होयबाक चाही। मुदा आँकड़ा स्वयं परिभाषा, नमूना, मापन आ संस्थागत चयनसँ बनैत अछि; तेँ केवल ‘डेटा अछि’ पर्याप्त नहि। सामाजिक माध्यममे षड्यन्त्र-दाबी प्रायः एहन बनैत अछि जे प्रत्येक विरोधी प्रमाणकेँ षड्यन्त्रक भाग घोषित करि देत। एहन आत्मरक्षी दाबी परीक्षणसँ बाँचैत अछि; प्रत्यक्षवादी आलोचना एतय अत्यन्त उपयोगी अछि। इतिहासमे सत्यापनक अर्थ प्रयोगशाला नहि, स्रोत-समीक्षा अछि। अभिलेख, शिलालेख, पाण्डुलिपि, पुरातत्त्व, समकालीन साक्ष्य, कालक्रम आ परस्पर पुष्टि—ई ऐतिहासिक सत्यापनक उपकरण छथि। नैतिकतामे ‘सत्यापन’क जगह औचित्य अधिक उपयुक्त अछि। ‘भेदभाव गलत अछि’केँ प्रयोगशाला सत्यापित नहि करैत, मुदा समान गरिमा, असमान हानि, अधिकार, संगति आ सार्वजनिक कारण द्वारा मजबूत दार्शनिक औचित्य देल जा सकैत अछि। धर्म सम्बन्धी निजी विश्वास आ सार्वजनिक तथ्य-दाबी अलग राखल जाए। व्यक्ति विश्वास रखबाक स्वतंत्रता रखैत अछि; मुदा जखन दावा सार्वजनिक इतिहास, चिकित्सा, कानून वा विज्ञानपर प्रभाव डालैत अछि, सार्वजनिक प्रमाणक माँग उचित अछि।
अध्याय-निष्कर्ष
तार्किक प्रत्यक्षवाद आधुनिक दर्शनक इतिहासमे प्रमाण, तर्क, विज्ञान आ भाषिक स्पष्टताक शक्तिशाली आन्दोलन छल। ओकर लक्ष्य दर्शनकेँ अस्पष्ट तत्त्वमीमांसक दाबीसँ मुक्त करि सार्वजनिक जाँचक प्रति उत्तरदायी बनायब छल। मुदा कठोर सत्यापन-सिद्धान्त स्वयं वैज्ञानिक नियम, सैद्धान्तिक वस्तु, इतिहास, नैतिकता आ अपन अर्थ-कसौटी सम्बन्धी कठिनाईमे पड़ल। एहि कारण तार्किक अनुभववाद समयक संग अधिक सूक्ष्म भेल। भारतीय प्रमाणपरम्परा देखबैत अछि जे ज्ञानक स्रोत बहुविध हो सकैत अछि। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि एहि बहुलताकेँ आधुनिक परीक्षण, सार्वजनिक कारण आ आत्मसमीक्षासँ जोड़ैत अछि। अतः समानान्तर दर्शनक सूत्र अछि—प्रमाण माँगू, मुदा प्रमाणकेँ एक प्रकारमे बन्द नहि करू; तत्त्वमीमांसा जाँचू, मुदा नाम मात्रसँ निरर्थक नहि कहू; विज्ञानक सम्मान करू, मुदा वैज्ञानिकतावाद नहि अपनाउ। अध्यायक अन्तिम सूत्र—‘जाँचल जा सकैत अछि?’ महत्त्वपूर्ण प्रश्न अछि; मुदा ओकर पहिले ई पूछू—‘ई कोन प्रकारक दावा अछि, आ एहि प्रकारक दाबी लेल उचित जाँच की?’
अध्याय-ग्रन्थसूची
• रुडोल्फ कार्नाप — ‘जगतक तार्किक संरचना’ (The Logical Structure of the World)। • रुडोल्फ कार्नाप — ‘भाषाक तार्किक वाक्यरचना’ (The Logical Syntax of Language)। • रुडोल्फ कार्नाप — ‘भाषाक तार्किक विश्लेषण द्वारा तत्त्वमीमांसाक उन्मूलन’ (The Elimination of Metaphysics Through Logical Analysis of Language)। • मोरित्स श्लिक — ‘ज्ञानक सामान्य सिद्धान्त’ (General Theory of Knowledge)। • ओट्टो न्यूराथ, हान्स हान आ रुडोल्फ कार्नाप — ‘वैज्ञानिक विश्व-दृष्टि: वियना-वृत्त’ (The Scientific Conception of the World: The Vienna Circle)। • ए. जे. आयर — ‘भाषा, सत्य आ तर्क’ (Language, Truth and Logic)। • कार्ल जी. हेम्पेल — ‘अर्थक अनुभववादी कसौटीक समस्या आ परिवर्तन’ (Problems and Changes in the Empiricist Criterion of Meaning)। • थॉमस उएबेल — वियना-वृत्त आ प्रोटोकॉल-वाक्य-विवाद सम्बन्धी अध्ययन। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • बी. के. मतिलाल — ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)।