Full chapter text
समस्या
आधुनिक अनुभववादक एक मूल आधार ई भेद छल जे किछु कथन ‘विश्लेषणात्मक’ होइत अछि—अर्थात् केवल शब्दार्थ, परिभाषा अथवा तर्कीय नियमक कारण सत्य—आ किछु ‘संश्लेषणात्मक’ होइत अछि—अर्थात् जगत सम्बन्धी तथ्यक कारण सत्य अथवा असत्य। उदाहरणार्थ ‘सभ कुंवारा अविवाहित छथि’ विश्लेषणात्मक जकाँ बुझाइत अछि; ‘एहि कोठरीमे चारि कुर्सी अछि’ अनुभवजन्य संश्लेषणात्मक कथन। डब्ल्यू. वी. ओ. क्वाइन एहि सहज भेदकेँ गम्भीर संकटमे डालैत छथि। हुनकर प्रसिद्ध आलोचना पूछैत अछि—‘विश्लेषणात्मक’ कथन वास्तवमे ककरा आधारपर पहिचानल जाए? यदि कहल जाए ‘समानार्थकता’क कारण, तँ समानार्थकता स्वयं कोना परिभाषित हो? यदि ‘परिभाषा’क कारण, तँ परिभाषा ककरा आधारपर समानार्थक शब्द जोड़ैत अछि? यदि ‘आवश्यक सत्य’क कारण, तँ आवश्यकता स्वयं विश्लेषणात्मकतासँ कोना अलग बुझाओल जाए? क्वाइनक दोसर लक्ष्य ‘घटाववाद’ (reductionism) अछि—ई विचार जे प्रत्येक अर्थपूर्ण कथनकेँ अन्ततः प्रत्यक्ष अनुभवक पृथक् समूहसँ जोड़ा जा सकैत अछि। हुनकर मतमे ज्ञान अलग-अलग वाक्य रूपमे नहि, बल्कि परस्पर जुड़ल विश्वास-जाल रूपमे अनुभवक सामना करैत अछि। एहि कारण प्रश्न केवल एक तकनीकी भेदक नहि रहि जाइत। यदि विश्लेषणात्मक–संश्लेषणात्मक सीमा कठोर नहि, तँ तर्क, गणित, विज्ञान, भाषा, परिभाषा, अनुभव आ सिद्धान्तक सम्बन्ध फेर सँ सोचना पड़त। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—क्वाइनक ‘अनुभववादक दू सिद्धान्त’ पर आक्रमण कतेक सफल अछि? की विश्लेषणात्मकता पूर्णतः ध्वस्त होइत अछि, कि केवल ओकर कठोर दार्शनिक आधार? आ भारतीय प्रमाणमीमांसा तथा मिथिलाक समानान्तर दृष्टि एहि संकटसँ कोन शिक्षा ग्रहण करैत अछि?
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे क्वाइन आधुनिक अनुभववादकेँ भीतरसँ पुनर्गठित करैत छथि। ओ अनुभवक महत्त्व अस्वीकार नहि करैत; उलटे ई कहैत छथि जे अनुभवक संग भाषा आ सिद्धान्तक सम्बन्ध एक वाक्य–एक अनुभव रूपमे सरल नहि। विश्लेषणात्मक–संश्लेषणात्मक भेदक आलोचना एहि दाबीपर आधारित अछि जे समानार्थकता, परिभाषा, आवश्यकता आ भाषिक नियमक परस्पर निर्भर अवधारणा बिना स्वतंत्र व्याख्याक एक वृत्त बना सकैत अछि। क्वाइनक पुष्टि-समग्रता (confirmation holism) कहैत अछि जे अनुभवक परीक्षणसमक्ष पूरा विश्वास-जाल अबैत अछि। कोनो एक निरीक्षण-विरोध पर हम सहायक मान्यता, गणना, उपकरण, परिभाषा अथवा केन्द्रीय सिद्धान्त—ककरो संशोधित करि सकैत छी। समानान्तर दर्शन एहि समग्रतासँ ई शिक्षा लैत अछि जे प्रमाणक परीक्षण संदर्भहीन नहि। मुदा ओ ‘सभ किछु समान रूपेँ संशोध्य’क अतिरेक स्वीकार नहि करैत। प्रमाणक स्तर, दाबीक केन्द्रीयता, तर्कीय संगति आ सार्वजनिक परीक्षणक आधारपर संशोधनक भार अलग-अलग होयत। रंगीन रूपरेखा — विश्लेषणात्मक भेद सँ विश्वास-जाल धरि
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—‘विश्लेषणात्मक सत्य’क परिभाषा समानार्थकता पर निर्भर अछि। ‘सभ कुंवारा अविवाहित छथि’ तखन विश्लेषणात्मक कहल जाएत जखन ‘कुंवारा’ आ ‘अविवाहित पुरुष’ समानार्थक मानल जाए। मुदा समानार्थकता स्वयं कोन स्वतंत्र कसौटीसँ सिद्ध होयत? दोसर तर्क—शब्दकोशीय परिभाषा दार्शनिक आधार नहि। शब्दकोश व्यवहारमे स्थापित भाषिक समानता दर्ज करैत अछि; ओ समानार्थकताक मूल स्रोत नहि। अतः ‘परिभाषा अछि, तेँ समानार्थक’ कहब पर्याप्त नहि। तेसर तर्क—‘आवश्यकता’ द्वारा विश्लेषणात्मकता बचाबय चाहब पुनः वृत्त बना सकैत अछि। यदि ‘आवश्यक रूपेँ सत्य’क अर्थ ‘विश्लेषणात्मक रूपेँ सत्य’क निकट अछि, तँ एक अस्पष्ट अवधारणाकेँ दोसरसँ समझाओल जा रहल अछि। चारिम तर्क—औपचारिक भाषा किछु स्थानीय स्पष्टता दे सकैत अछि। विशेष कृत्रिम भाषा मे नियम द्वारा विश्लेषणात्मक वाक्य परिभाषित कएल जा सकैत अछि, मुदा क्वाइनक प्रश्न ई कि प्राकृतिक भाषा आ व्यापक ज्ञानमीमांसा लेल एहि नियमक दार्शनिक विशेषाधिकार कहाँसँ आएत? पाँचम तर्क—दूसर ‘सिद्धान्त’ घटाववाद अछि। प्रारम्भिक अनुभववादी आशा छल जे प्रत्येक तथ्यात्मक कथनकेँ प्रत्यक्ष अनुभवक विशिष्ट शर्तमे अनुवाद कएल जा सकैत अछि। वैज्ञानिक सिद्धान्तक वास्तविक संरचना एहि अपेक्षासँ अधिक जटिल अछि। छठम तर्क—क्वाइन अनुसार हमारे कथन अनुभवक न्यायाधिकरणक सामने अलग-अलग नहि, समूहमे अबैत अछि। एक भविष्यवाणी असफल भेल तखन दोष केवल मुख्य सिद्धान्तमे नहि; उपकरण, गणना, प्रारम्भिक स्थिति, सहायक अनुमान अथवा अवलोकन-वर्णनमे सेहो हो सकैत अछि। सातम तर्क—विश्वास-जालक केन्द्र आ परिधि अलग हो सकैत अछि। प्रत्यक्ष अवलोकन-समीप विश्वास अपेक्षाकृत जल्दी बदलि सकैत अछि; तर्क, गणित अथवा अत्यन्त केन्द्रीय सिद्धान्त बदललासँ पूरा जालमे भारी संशोधन पड़ि सकैत अछि। क्वाइन कठोर अछूता केन्द्र स्वीकार नहि करैत, मुदा व्यावहारिक संशोधन-मूल्य अलग होइत अछि। आठम तर्क—एहि दृष्टिसँ ज्ञानमीमांसा प्रकृत विज्ञानसँ निरन्तरता प्राप्त करैत अछि। ‘प्राकृतिकीकृत ज्ञानमीमांसा’क बादक परियोजना मे मानव वास्तवमे कोना प्रमाण ग्रहण करैत अछि, भाषा सीखैत अछि आ सिद्धान्त बनबैत अछि—ई अनुभवजन्य विज्ञानक विषय सेहो बनैत अछि। नवम तर्क—क्वाइन तत्त्वमीमांसाकेँ समाप्त नहि करैत; उलटे ‘हम कोन वस्तु मानबाक लेल प्रतिबद्ध छी?’ प्रश्न औपचारिक भाषा आ परिमाणक माध्यमेँ उठबैत छथि। तत्त्वमीमांसक प्रतिबद्धता (ontological commitment) एहि बातसँ जुड़ल अछि जे हमर सर्वोत्तम सिद्धान्तक चरसभ ककरा ऊपर परिमाणित होइत अछि। दसम तर्क—क्वाइनक आलोचनाक स्थायी प्रभाव ई नहि जे ‘विश्लेषणात्मक सत्य किछु नहि’। बादक दर्शनमे अवधारणात्मक सत्य, नियम, आवश्यकता आ अर्थपर नूतन रक्षा विकसित भेल। स्थायी प्रभाव ई जे विश्लेषणात्मकता सरल, स्वतःस्पष्ट नींव नहि मानल जा सकैत।
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे ‘सभ कुंवारा अविवाहित छथि’ आ ‘सभ कुंवारा छह फीट ऊँच छथि’ बीच स्पष्ट अन्तर अछि। यदि क्वाइन एहि अन्तरकेँ पर्याप्त दार्शनिक रूप नहि दे सकैत, तखन हुनकर आलोचना सामान्य भाषिक तथ्यक विरुद्ध बुझाइत अछि। दोसर पूर्वपक्ष कहैत अछि जे भाषिक नियम स्वयं विश्लेषणात्मक सत्यक आधार हो सकैत अछि। कोनो भाषा सीखब माने किछु प्रयोग-नियम स्वीकारब; एहि नियमक कारण किछु वाक्य सत्य होइत अछि। तेसर पूर्वपक्ष समग्रतापर अछि। यदि कोनो अनुभवक सामने सिद्धान्तक कोनो भाग बचाओल जा सकैत अछि, तँ विज्ञान मनमाना हो सकैत अछि। वैज्ञानिक खण्डनक वास्तविक शक्ति कहाँ बचल? चारिम पूर्वपक्ष भारतीय दृष्टिसँ अछि। न्याय, मीमांसा आ व्याकरण परम्परासभ शब्दार्थ, परिभाषा, वाक्यार्थ आ प्रमाणक भेद सूक्ष्म रूपेँ करैत छथि। ‘सभ अर्थ सम्बन्ध जालमे अछि’ एहन व्यापक समग्रता एहि परम्पराक स्थानीय भेदसभकेँ धुँधला करि सकैत अछि।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—क्वाइन भाषिक अन्तरक अस्तित्व अस्वीकार नहि करैत; ओ पूछैत छथि जे एहि अन्तरकेँ दार्शनिक रूपेँ एहन कठोर सीमा मानबाक आधार की जे किछु वाक्य पूर्णतः अनुभवसँ स्वतंत्र हो जाए। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—भाषिक नियम उपयोगी व्याख्या दे सकैत अछि, मुदा नियम स्वयं ऐतिहासिक भाषा-व्यवहार, संस्थागत परम्परा आ वैज्ञानिक उद्देश्यसँ बदलि सकैत अछि। अतः ‘नियम’ पूर्णतः जगत-विमुख नींव नहि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—समग्रता मनमानापन नहि। वैज्ञानिक समुदाय सरलता, भविष्यवाणी, व्यापकता, पूर्वज्ञानसंग संगति, प्रयोगक पुनरावृत्ति आ स्वतंत्र प्रमाण जकाँ कसौटी द्वारा संशोधन चुनैत अछि। जालक सभ भाग समान लागत पर बदलनयोग्य नहि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय परम्पराक सूक्ष्म भेद समग्रता लेल चुनौती नहि, सुधार अछि। समानान्तर दर्शन बहुस्तरीय जाल मानैत अछि जाहिमे प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, परिभाषा, व्यवहार, स्मृति आ सामाजिक प्रमाण अलग कार्य करैत छथि।
भारतीय संवाद
न्याय दर्शन ज्ञानकेँ पृथक् प्रमाण-प्रकार द्वारा विश्लेषित करैत अछि—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द। क्वाइनक समग्रता एहि वर्गीकरणक समान नहि, मुदा प्रश्न खोलैत अछि: वास्तविक ज्ञान-दाबीमे ई प्रमाणसभ परस्पर कोना सहायक होइत छथि? मीमांसा शब्दार्थ आ वाक्यार्थक नियमबद्धता पर बल दैत अछि। किछु कथनक अर्थ भाषिक परम्परा, आकांक्षा, योग्यता, सन्निधि आ तात्पर्यद्वारा निर्धारित होइत अछि। एहि दृष्टिसँ ‘अर्थ केवल अनुभवजन्य संकेत नहि’ बिन्दुपर क्वाइन-पश्चात् भाषा-विमर्श संग संवाद सम्भव अछि। भर्तृहरिक वाक्य-दर्शन अर्थक समग्रता सम्बन्धी शक्तिशाली भारतीय प्रतिपादन प्रस्तुत करैत अछि। मुदा ‘भर्तृहरि पहिने क्वाइन छलाह’ कहब इतिहास-विरोधी होयत। समस्या-साम्य केवल एतए अछि जे पृथक् शब्द वा वाक्यांशकेँ व्यापक भाषिक एकतासँ काटि बुझब कठिन हो सकैत अछि। बौद्ध अपोह-विचार वर्गीय अर्थकेँ अन्यक अपवर्जनसँ बुझैत अछि। एतय अर्थक सम्बन्धात्मकता अछि, मुदा क्वाइनक पुष्टि-समग्रता वैज्ञानिक विश्वास-जाल सम्बन्धी अलग परियोजना अछि। भारतीय संवादक निष्कर्ष—अर्थ, प्रमाण आ ज्ञान परस्पर निर्भर हो सकैत अछि, मुदा एहि निर्भरताकेँ विशिष्ट प्रमाण-भेद, भाषा-व्यवहार आ दार्शनिक लक्ष्यक संग पढ़ल जाए।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक नव्य-न्याय परम्परा दाबीक सूक्ष्म सीमा निर्धारित करैत अछि। क्वाइनक समग्रता एहि सूक्ष्मताक विरोधी नहि; समानान्तर दृष्टि दुनूकेँ जोड़ि कहैत अछि—दाबी स्थानीय रूपेँ विश्लेषित करू, मुदा ओकर प्रमाण-जाल व्यापक रूपेँ देखू। उदाहरणार्थ कोनो ऐतिहासिक कथन एक शिलालेख पर निर्भर हो सकैत अछि, मुदा शिलालेखक तिथि, लिपि-पठन, स्थान, अन्य अभिलेख, भाषिक इतिहास आ पुरातात्त्विक सन्दर्भ सभ मिलि विश्वास-जाल बनबैत अछि। एक प्रमाण संशोधित भेलासँ पूरा निष्कर्षक भार बदलि सकैत अछि। समानान्तर दर्शन क्वाइनसँ ‘त्रुटिसंशोध्यता’क गहिर शिक्षा लैत अछि। कोनो सिद्धान्त, परम्परा अथवा प्रिय ऐतिहासिक निष्कर्ष आलोचनासँ पूर्णतः अछूता नहि। मुदा संशोधन प्रमाण-अनुशासनसँ हो, मनमाना नहि। मिथिलाक पद्धतिमे पूर्वपक्ष–उत्तरपक्ष विश्वास-जालक सामाजिक रूप जकाँ देखल जा सकैत अछि। एक आपत्ति केवल एक वाक्य नहि बदलैत; कखनो परिभाषा, उदाहरण, प्रमाण-भार अथवा मूल प्रतिपादन पुनर्गठित करैत अछि। तथापि नव्य-न्याय आ क्वाइनकेँ एकरूप मानब अनुचित। नव्य-न्याय प्रमाणमीमांसक–तार्किक विश्लेषणक भारतीय परियोजना अछि; क्वाइन बीसम शताब्दीक अनुभववाद, भाषा-दर्शन आ विज्ञान-दर्शनक आलोचक। समानान्तरता संवादक अछि, पहचानक नहि। रंगीन प्रक्रिया-चित्र — विश्वास-जालक पुनरीक्षण
समकालीन प्रयोग
कृत्रिम बुद्धिमे एक उत्तर केवल एक स्रोतसँ नहि बनैत; प्रशिक्षण-आँकड़ा, मॉडल-रचना, निर्देश, प्रसंग, पुनर्प्राप्त सामग्री आ उपयोगकर्ताक प्रश्न मिलि जटिल विश्वास-जाल बनबैत अछि। गलती भेटलासँ ‘एक वाक्य सुधारू’ पर्याप्त नहि हो सकैत; स्रोत वा प्रणालीगत पूर्वाग्रह जाँचबाक पड़त। वैज्ञानिक मॉडलमे अवलोकन-विरोधक बाद तुरन्त मूल सिद्धान्त त्यागल नहि जाइत। पहिले उपकरण, आँकड़ा-प्रक्रिया, नमूना, गणना, सहायक मान्यता जाँचल जाइत अछि। क्वाइनक समग्रता एहि वास्तविक वैज्ञानिक प्रक्रियाकेँ दार्शनिक रूप दैत अछि। इतिहासमे एक नूतन पाण्डुलिपि पुरान निष्कर्ष बदलि सकैत अछि, मुदा ओकर प्रामाणिकता, तिथि, पाठ-परम्परा आ अन्य स्रोत जाँचने बिना पूरा इतिहास फेर लिखब उचित नहि। विश्वास-जालक पुनरीक्षण नियंत्रित होयबाक चाही। कानूनमे नूतन न्यायिक निर्णय एक पदक अर्थ बदलि सकैत अछि आ अनेक पुरान मिसाल, प्रशासनिक नियम आ सामाजिक अपेक्षा प्रभावित करि सकैत अछि। भाषिक नियम आ तथ्य पूर्णतः अलग नहि रहैत। सामाजिक पहचानक श्रेणी समयक संग बदलैत अछि। आधुनिक श्रेणीकेँ अतीतपर स्थिर मानि थोपनाइ क्वाइन-पश्चात् भाषिक इतिहासक दृष्टिसँ सेहो संदिग्ध अछि; शब्दार्थ पूरा सांस्कृतिक जालसँ जुड़ल होइत अछि। शिक्षामे विश्लेषणात्मक–संश्लेषणात्मक भेद उपयोगी प्रारम्भिक उपकरण रहि सकैत अछि, मुदा विद्यार्थीकें ई सेहो सिखाओल जाए जे वास्तविक विज्ञान आ भाषा एहि साफ द्वैतसँ अधिक जटिल अछि।
अध्याय-निष्कर्ष
क्वाइनक ‘अनुभववादक दू सिद्धान्त’ विश्लेषणात्मक–संश्लेषणात्मक भेद आ कठोर घटाववादक नींवपर गम्भीर प्रश्न उठबैत अछि। हुनकर मुख्य शिक्षा ई नहि जे भाषा, तर्क आ अनुभवमे कोनो भेद नहि; बल्कि ई जे एहि भेदसभकेँ स्वतःस्पष्ट, पूर्णतः स्वतंत्र नींव मानब कठिन अछि। विश्वास-जालक समग्रता ज्ञानकेँ संदर्भ, सहायक मान्यता आ सिद्धान्तक परस्पर सम्बन्धमे देखैत अछि। अनुभव जालपर दबाव दैत अछि, मुदा संशोधन कोन भागमे होयत—ई व्यापक विवेकक प्रश्न अछि। भारतीय प्रमाणमीमांसा आ मिथिलाक नव्य-न्याय स्थानीय सूक्ष्म विश्लेषण दैत छथि; क्वाइन व्यापक जालक चेतना। समानान्तर दर्शन दुनूकेँ मिलाकऽ बहुस्तरीय, त्रुटिसंशोध्य प्रमाण-विवेक विकसित करैत अछि। अध्यायक अन्तिम सूत्र—कोनो कथन अकेला नहि; मुदा जालक नामपर कोनो कथन आलोचनासँ मुक्त सेहो नहि। प्रमाण बदलत तँ निष्कर्ष बदलि सकैत अछि; बदलाबक भार तर्क आ प्रमाण तय करत।
अध्याय-ग्रन्थसूची
• डब्ल्यू. वी. ओ. क्वाइन — ‘अनुभववादक दू सिद्धान्त’ (Two Dogmas of Empiricism)। • डब्ल्यू. वी. ओ. क्वाइन — ‘शब्द आ वस्तु’ (Word and Object)। • डब्ल्यू. वी. ओ. क्वाइन — ‘तार्किक दृष्टिकोणसँ’ (From a Logical Point of View)। • डब्ल्यू. वी. ओ. क्वाइन — ‘ज्ञानमीमांसा प्राकृतिकीकृत’ (Epistemology Naturalized)। • रुडोल्फ कार्नाप — ‘अर्थ आ आवश्यकता’ (Meaning and Necessity)। • एच. पी. ग्राइस आ पी. एफ. स्ट्रॉसन — ‘एक सिद्धान्तक प्रतिरक्षा मे’ (In Defense of a Dogma)। • हिलरी पटनम — अर्थ, यथार्थवाद आ अवधारणात्मक रूपरेखा सम्बन्धी चयनित अध्ययन। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • भर्तृहरि — वाक्यपदीय। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • बी. के. मतिलाल — ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)।