समस्या आरम्भिक विट्गेन्स्टाइन भाषा आ जगतक सम्बन्धकेँ तथ्यक चित्रण, तार्किक रूप आ कथनीयताक सीमा द्वारा बुझबाक प्रयास कएलनि। मुदा उत्तरकालीन दर्शनमे हुनकर दृष्टि निर्णायक रूपेँ बदलैत अछि। आब प्रश्न ई नहि रहैत जे सभ सार्थक वाक्यक एक सामान्य तार्किक रूप की, बल्कि ई जे अलग-अलग जीवन-परिस्थितिमे शब्द वास्तवमे की करैत अछि। साधारण भाषामे ‘अर्थ’ एक वस्तु अथवा मानसिक छवि जकाँ शब्दक पीछे लुकायल रहैत अछि—एहन कल्पना अनेक दार्शनिक भ्रम पैदा करैत अछि। ‘खेल’ शब्दक एक आवश्यक, सभ उदाहरणमे समान सार की? ‘जानब’, ‘विश्वास’, ‘दर्द’, ‘नियम’, ‘समझ’, ‘वचन’, ‘आदेश’—एहि सभ शब्दक अर्थ कोनो एक स्थिर वस्तु वा मानसिक घटना द्वारा निर्धारित होइत अछि की प्रयोगक विविध पद्धतिद्वारा? उत्तरकालीन विट्गेन्स्टाइनक प्रसिद्ध सूत्र—अनेक प्रसंगमे शब्दक अर्थ ओकर प्रयोगमे देखू—दार्शनिक ध्यानकेँ प्रतिनिधित्वसँ व्यवहार दिस मोड़ैत अछि। भाषा आब केवल जगतक चित्र नहि; आदेश, प्रश्न, मजाक, प्रार्थना, हिसाब, कथन, वचन, नामकरण, शोक, शिक्षण, कानून, खेल, विज्ञान आ दैनिक कामक अनेक क्रियामे बुन्नल गतिविधि अछि। एहि परिवर्तनसँ ‘भाषा-खेल’ (language-game), ‘जीवन-रूप’ (form of life), ‘पारिवारिक समानता’ (family resemblance), ‘नियम-अनुसरण’ (rule-following) आ निजी भाषाक सम्भावना जकाँ प्रश्न उठैत अछि। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—अर्थकेँ प्रयोगमे देखबाक अर्थ की? की ई ‘अर्थ जेकरा जे मन हो’ प्रकारक सापेक्षतावाद अछि? भाषा-खेलक नियम कतेक सार्वजनिक छथि? आ भारतीय शब्दमीमांसा तथा मिथिलाक शास्त्रार्थ परम्परासँ एहि विचारक संवाद कोना कएल जाए बिना भर्तृहरि वा मीमांसाकेँ ‘पहिल विट्गेन्स्टाइन’ बनौने? मूल प्रतिपादन एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे उत्तरकालीन विट्गेन्स्टाइन अर्थक प्रश्नकेँ वस्तु-सन्दर्भक एकरूप सिद्धान्तसँ हटाकऽ नियमबद्ध सामाजिक प्रयोगक विविधतामे रखैत छथि। ‘अर्थ = प्रयोग’ पूर्ण परिभाषा नहि, दार्शनिक पद्धतिगत निर्देश अछि—शब्दक कार्य वास्तविक भाषिक व्यवहारमे देखू। भाषा-खेलक विचार देखबैत अछि जे भाषिक अभिव्यक्ति सामाजिक क्रियासँ अलग नहि। ‘ईंटा!’ निर्माण-स्थलपर आदेश हो सकैत अछि; कक्षा मे उदाहरण; शब्दकोशमे प्रविष्टि; इतिहासमे वस्तु-वर्णन। शब्दरूप समान, भाषिक कार्य अलग। जीवन-रूप एहि व्यवहारक व्यापक साझा पृष्ठभूमि अछि—मानवीय क्रिया, प्रशिक्षण, सहमति, संस्था, प्रकृतिक संग व्यवहार, शरीर, अपेक्षा आ सामाजिक नियमक जाल। समानान्तर दर्शन एहि दृष्टिसँ भाषा-दर्शनकेँ सामाजिक, ऐतिहासिक आ व्यावहारिक बनबैत अछि; मुदा सार्वजनिक प्रयोगकेँ सत्यक एकमात्र कसौटी नहि मानैत। प्रयोग अर्थ निर्धारित करि सकैत अछि, पर तथ्यात्मक दाबी सत्य की नहि—एहि लेल जगत आ प्रमाणक जाँच आवश्यक अछि। रंगीन रूपरेखा — अर्थ वस्तुमे नहि, प्रयोगक जालमे प्रमुख तर्क पहिल तर्क—भाषा एकहि कार्य नहि करैत। नामकरण, आदेश, प्रश्न, सूचना, गणना, कथा, मजाक, प्रार्थना, वचन, विधिक घोषणा, खेलक नियम, वैज्ञानिक प्रतिवेदन—ई सभ भाषिक क्रिया अलग नियम रखैत छथि। दोसर तर्क—‘अर्थ प्रयोगमे’ कहबाक अर्थ शब्दक वास्तविक भूमिका देखब हो। उदाहरणार्थ ‘जानैत छी’ शब्द कखनो निश्चितता व्यक्त करैत अछि, कखनो दावा, कखनो क्षमता, कखनो सामाजिक उत्तरदायित्व। एक गुप्त मानसिक वस्तु सभ प्रयोगकेँ एकरूप नहि करैत। तेसर तर्क—‘पारिवारिक समानता’ श्रेणी-विचारक एक वैकल्पिक मॉडल दैत अछि। ‘खेल’क सभ उदाहरणमे एक आवश्यक समान गुण खोजब कठिन; मुदा प्रतिस्पर्धा, नियम, आनन्द, कौशल, मनोरंजन, विजय, सहयोग जकाँ गुण विभिन्न प्रकारेँ ओवरलैप करैत अछि। परिवारक चेहरा जकाँ अनेक साम्य जुड़ैत अछि, एक सार अनिवार्य नहि। चारिम तर्क—नियम-अनुसरण केवल मनमे लिखल सूत्रक यांत्रिक अनुप्रयोग नहि। नियमक अर्थ ओकर नियमित सार्वजनिक प्रयोग, प्रशिक्षण, सुधार, गलती आ सामूहिक अभ्यासमे देखाइत अछि। पाँचम तर्क—किसी नियमक प्रत्येक भविष्यक प्रयोग स्वयं नियममे ‘पहिनेसँ लिखल’ मानि लेब समस्या पैदा करैत अछि। एक सूत्रकेँ अनन्त प्रकारेँ व्याख्या कएल जा सकैत अछि; व्यवहारिक अभ्यास तय करैत अछि जे हम नियम कोना लागू करैत छी। छठम तर्क—निजी मानसिक अनुभव वास्तविक हो सकैत अछि, मुदा भाषिक अर्थ पूर्णतः निजी संकेतपर निर्भर नहि भऽ सकैत। ‘दर्द’ शब्द सीखब सार्वजनिक व्यवहार, शरीर, प्रशिक्षण आ अभिव्यक्तिक जालमे होइत अछि। निजी भाषा-विवाद अध्याय 18 मे विस्तारसँ आएत। सातम तर्क—दार्शनिक समस्या अनेक बेर भाषा ‘छुट्टीपर’ गेलासँ उत्पन्न होइत अछि—अर्थात् शब्दकेँ ओकर सामान्य प्रयोगसँ काटि अमूर्त तत्त्वमीमांसक संदर्भमे चला देल जाए। उपचार शब्दकेँ ओकर रोजमर्रा भाषिक घरमे वापस आनब अछि। आठम तर्क—उत्तरकालीन विट्गेन्स्टाइन ‘सामान्य भाषा सदैव सही’ नहि कहैत। साधारण प्रयोग स्वयं भ्रमपूर्ण, बदलैत अथवा सामाजिक रूपेँ पक्षपाती हो सकैत अछि। हुनकर पद्धति शब्दक व्यवहारिक व्याकरण स्पष्ट करैत अछि; नैतिक वा तथ्यात्मक सत्य स्वतः तय नहि करैत। नवम तर्क—भाषिक नियम सामाजिक सहमतिसँ जुड़ल छथि, मुदा ‘सहमति = सत्य’ नहि। लोकसभ समान नियमपर सहमत भऽ ‘पृथ्वी स्थिर अछि’ कहि सकैत छथि; अर्थ स्पष्ट रहत, तथ्य गलत हो सकैत अछि। दसम तर्क—दर्शनक कार्य आब अंतिम सिद्धान्त बनायब नहि, भाषिक गाँठ खोलब बनैत अछि। अवधारणा कतेक तरह उपयोग होइत, कहाँ भ्रम होइत, कोन तुलना हमरा भटकबैत—एहि सभ पर सूक्ष्म वर्णन दार्शनिक चिकित्सा जकाँ कार्य करैत अछि। पूर्वपक्ष पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे ‘अर्थ प्रयोगमे’ सिद्धान्त सापेक्षतावाद दिस लऽ जाइत अछि। यदि अर्थ सामाजिक प्रयोग तय करैत अछि, तँ सत्य आ गलत प्रयोगक बाहरी कसौटी कहाँ बचल? दोसर पूर्वपक्ष कहैत अछि जे पारिवारिक समानता आवश्यक परिभाषाकेँ अनावश्यक रूपेँ कमजोर करैत अछि। विज्ञान, कानून, गणित वा तकनीकमे स्पष्ट सीमा बिना श्रेणी कार्य नहि करि सकैत। तेसर पूर्वपक्ष नियम-अनुसरणपर अछि। यदि नियमक सही प्रयोग सामूहिक अभ्यासद्वारा निर्धारित, तँ नवाचार, असहमति अथवा एकाकी सही व्यक्ति कतेक सम्भव? समुदाय गलत हो सकैत अछि की नहि? चारिम पूर्वपक्ष भारतीय दृष्टिसँ अछि। भर्तृहरि, मीमांसा आ न्याय पहिनेसँ शब्द, वाक्य, प्रसंग, तात्पर्य आ व्यवहारक जटिल चर्चा करैत छथि। तखन उत्तरकालीन विट्गेन्स्टाइनकेँ ‘अर्थ प्रयोगमे’ विचारक सार्वभौम खोजकर्ता मानब यूरोप-केन्द्रित इतिहास होयत। उत्तरपक्ष पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—प्रयोग अर्थक व्याकरण स्पष्ट करैत अछि, सत्यक बाहरी जगत मेटबैत नहि। ‘जल 100°C पर उबलैत अछि’क अर्थ सामाजिक भाषा-प्रयोगसँ समझल जाएत; ओकर तथ्यात्मक सत्य विशिष्ट दाब, मापन आ परिस्थिति पर निर्भर रहत। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—पारिवारिक समानता सभ श्रेणीपर लागू सार्वभौम नियम नहि। जतए स्पष्ट परिभाषा उपयोगी—जैँ गणितीय बहुभुज अथवा कानूनी आयु—ओतए आवश्यक शर्त सम्भव। मुद्दा ई जे सभ दैनिक अवधारणाकेँ एकहि सार-मॉडलमे जबरन नहि ढालल जाए। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—समुदाय गलत हो सकैत अछि। नियम-अनुसरणक सार्वजनिकता अर्थक सम्भावना स्पष्ट करैत अछि; तथ्यात्मक, नैतिक वा वैज्ञानिक सत्यक अन्तिम निर्णय नहि। असहमति सेहो साझा नियम-क्षेत्रमे सम्भव होइत अछि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय भाषा-दर्शन स्वतंत्र ऐतिहासिक परम्परा अछि। उचित तुलना समस्या-साम्यक आधारपर होयत: प्रसंग, प्रयोग, वाक्यबोध, तात्पर्य, सामाजिक प्रशिक्षण। भर्तृहरि वा मीमांसाकेँ ‘विट्गेन्स्टाइन पहिने’ कहब समानान्तर पद्धति अस्वीकारैत अछि। भारतीय संवाद मीमांसा अर्थबोधक आकांक्षा, योग्यता, सन्निधि आ तात्पर्य जकाँ शर्तपर बल दैत अछि। एहि दृष्टिसँ शब्दक अर्थ वाक्य, प्रसंग आ प्रयोजनसँ जुड़ल अछि। उत्तरकालीन विट्गेन्स्टाइनक प्रयोग-केन्द्रितता संग एतय समस्या-संवाद सम्भव अछि, मुदा मीमांसाक शास्त्रीय-विधिपरक लक्ष्य अलग। भर्तृहरिक वाक्यपदीय भाषिक बोधक एकता, शब्द-विभाजनक सीमा आ भाषिक व्यवहारक व्यापक दर्शन प्रस्तुत करैत अछि। पारिवारिक समानता वा भाषा-खेलक समानता घोषित करब अनुचित; तथापि भाषा केवल शब्द–वस्तु मिलान नहि—ई साझा प्रश्न महत्वपूर्ण अछि। न्याय शब्द-प्रमाण, वक्ताक विश्वसनीयता, पद–पदार्थ सम्बन्ध, लक्षणा आ वाक्यबोधक शर्त जाँचैत अछि। उत्तरकालीन विट्गेन्स्टाइन सामाजिक प्रयोगक भूमिका बढ़बैत छथि; न्याय अधिक स्पष्ट रूपेँ ज्ञानोत्पत्तिक प्रमाण-मूल्य प्रश्नमे लैत अछि। बौद्ध अपोह-विचार वर्गक अर्थ अन्यक अपवर्जनसँ व्याख्या करैत अछि। उत्तरकालीन विट्गेन्स्टाइन परिवार-समानता द्वारा आवश्यक सारपर प्रश्न उठबैत छथि। दुनू सारवादी वर्गीकरणक विरुद्ध संवादयोग्य लगि सकैत अछि, मुदा दार्शनिक आधार भिन्न अछि। भारतीय संवादक मुख्य शिक्षा—अर्थ शब्दकोशीय एकक नहि; वाक्य, प्रसंग, उद्देश्य, सामाजिक व्यवहार, निषेध, परम्परा आ ज्ञानक विश्वसनीयता सब मिलि भाषिक जीवन बनबैत अछि। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि मिथिलाक शास्त्रार्थ परम्परामे शब्दक अर्थ केवल कोशसँ तय नहि होइत; परिभाषा, उदाहरण, प्रतिपक्ष, प्रसंग आ व्यवहार द्वारा बारम्बार स्पष्ट कएल जाइत अछि। एहि कारण उत्तरकालीन विट्गेन्स्टाइनक प्रयोग-विवेक संग एक फलदायी पद्धतिगत संवाद सम्भव अछि। नव्य-न्यायीय तकनीकी भाषा सामान्य प्रयोगक भ्रम घटाबयक प्रयास करैत अछि; उत्तरकालीन विट्गेन्स्टाइन उलटा चेतावनी दैत छथि जे तकनीकी अमूर्तन शब्दकेँ ओकर वास्तविक जीवनसँ काटि सेहो सकैत अछि। समानान्तर दर्शन दुनू चेतावनी एक साथि राखैत अछि—अस्पष्टता घटाउ, मुदा जीवित प्रयोग नहि मिटाउ। मैथिली दार्शनिक लेखन लेल एहि अध्यायसँ एक व्यावहारिक नियम निकलैत अछि: अंग्रेजी तकनीकी पद ज्यों-का-त्यों राखि देब अर्थपूर्ण अनुवाद नहि। पदक मैथिली प्रयोग-क्षेत्र स्पष्ट करब आवश्यक अछि; अंग्रेजी मूल केवल सहायक संकेत हो। दोसर नियम—स्थानीय भाषिक प्रयोगकेँ ‘अशुद्ध’ कहि तुरन्त अस्वीकार नहि करू। भाषा-मानक, बोली, क्षेत्रीय रूप, जातीय वा पेशागत शब्दावली—ई सभ अलग भाषा-खेलक अंग हो सकैत अछि। मुदा वर्णनात्मक स्वीकार नैतिक अनुमोदन नहि; अपमानजनक वा दमनकारी प्रयोगक आलोचना गरिमा-आधारित नैतिकता करैत अछि। तेसर नियम—‘जीवन-रूप’केँ स्थिर सांस्कृतिक सार नहि बनाउ। मिथिला एकरूप जीवन-रूप नहि; ग्रामीण–शहरी, स्त्री–पुरुष, जाति, पेशा, नेपाल–भारत, प्रवास, डिजिटल पीढ़ी आ भाषिक समुदायक अनुभव अनेक रूपमे ओवरलैप करैत अछि। समानान्तर दर्शन एही ठाम पारिवारिक समानताक पद्धतिगत उपयोग करैत अछि: ‘मिथिलाक संस्कृति’ अथवा ‘मैथिली भाषा’क विविध रूपमे साझा लक्षण खोजू, मुदा एक कठोर सार द्वारा सभ भिन्नता दबाउ नहि। रंगीन प्रक्रिया-चित्र — शब्दक अर्थ कोना जाँचू? समकालीन प्रयोग कृत्रिम बुद्धिमे ‘समझ’, ‘बुद्धि’, ‘स्मृति’, ‘सीखब’, ‘निर्णय’ जकाँ शब्द मशीनपर लगैत अछि। उत्तरकालीन विट्गेन्स्टाइनक पद्धति पूछैत अछि—मानवीय प्रयोगमे एहि शब्दक नियम की? मशीनक व्यवहार ओ नियमक कतेक हिस्सा पूरा करैत अछि? केवल शब्द समान होने अवधारणा समान नहि। डिजिटल सामाजिक माध्यममे शब्दक अर्थ समुदाय-दर-समुदाय बदलि सकैत अछि। व्यंग्य, मीम, संक्षिप्त संकेत, हैशटैग वा समूह-विशेष शब्द बाहरी पाठक लेल शब्दकोशसँ नबुझायल रहि सकैत अछि; भाषा-खेलक प्रसंग आवश्यक अछि। कानूनमे सामान्य शब्दकेँ विशेष संस्थागत भाषा-खेल भेटैत अछि। ‘सहमति’, ‘हानि’, ‘व्यक्ति’, ‘सार्वजनिक’, ‘स्वामित्व’ दैनिक भाषा आ विधिक भाषा मे अलग नियम धारण करि सकैत अछि। चिकित्सामे ‘दर्द’ निजी अनुभव अछि, मुदा सार्वजनिक भाषा बिना उपचार, इतिहास, निदान आ सहानुभूति सम्भव नहि। निजी अनुभूति आ सार्वजनिक भाषिक कसौटीक जटिल सम्बन्ध अध्याय 18 क निजी भाषा-विवादक आधार बनत। भाषा-नीतिमे ‘भाषा’ आ ‘बोली’क अर्थ केवल भाषाशास्त्रीय गुणसँ नहि, प्रशासनिक प्रयोग, शिक्षा, साहित्य, पहचान आ शक्ति-संरचनासँ सेहो बनैत अछि। अतः श्रेणी केवल शब्दकोशीय नहि, संस्थागत भाषा-खेलक हिस्सा अछि। इतिहासलेखनमे प्राचीन पदक आधुनिक अर्थ मानि लेब खतरनाक अछि। शब्दक अर्थ ओकर ऐतिहासिक प्रयोगमे देखल जाए—कौन ग्रन्थ, कौन काल, कौन संस्था, कौन सामाजिक सम्बन्ध। आधुनिक अनुवाद मूल प्रयोगक विकल्प नहि। अध्याय-निष्कर्ष उत्तरकालीन विट्गेन्स्टाइन भाषा-दर्शनकेँ एकरूप प्रतिनिधित्व-सिद्धान्तसँ हटाकऽ जीवित प्रयोग, भाषा-खेल, नियम-अनुसरण आ जीवन-रूपक बहुविधतामे स्थापित करैत छथि। ‘अर्थ प्रयोगमे’ पूर्ण अर्थ-परिभाषा नहि, दार्शनिक दिशा अछि—शब्दक वास्तविक कार्य देखू, ओकरा अमूर्त वस्तु-जकाँ नहि खोजू। पारिवारिक समानता एहन श्रेणीसभ बुझबाक साधन अछि जाहिमे एक आवश्यक सारक बदला ओवरलैपिंग लक्षण होइत अछि। नियम-अनुसरण अर्थक सार्वजनिक, प्रशिक्षित आ व्यवहारिक आयाम स्पष्ट करैत अछि। मुदा प्रयोग सत्यक स्थान नहि लैत। सामाजिक भाषा-खेल तथ्यात्मक रूपेँ गलत, नैतिक रूपेँ अन्यायपूर्ण वा राजनीतिक रूपेँ दमनकारी हो सकैत अछि। समानान्तर दर्शन भाषा-विवेककेँ प्रमाण आ गरिमाक कसौटीसँ जोड़ैत अछि। भारतीय मीमांसा, भर्तृहरि, न्याय आ बौद्ध भाषा-विचार संग संवाद फलदायी अछि, मुदा ऐतिहासिक समानता अथवा पूर्वगामिता-दाबी अनुचित। अध्यायक अन्तिम सूत्र—अर्थ खोजू तँ शब्दक पीछे नहि, शब्दक जीवनमे देखू; मुदा भाषिक जीवनकेँ सत्य, न्याय आ प्रमाणक अन्तिम न्यायाधीश नहि बनाउ। अध्याय-ग्रन्थसूची • लुडविग विट्गेन्स्टाइन — ‘दार्शनिक अन्वेषण’ (Philosophical Investigations)। • लुडविग विट्गेन्स्टाइन — ‘निश्चितता पर’ (On Certainty)। • लुडविग विट्गेन्स्टाइन — ‘नीली आ भूरी पुस्तिका’ (The Blue and Brown Books)। • लुडविग विट्गेन्स्टाइन — ‘गणितक आधार पर टिप्पणी’ (Remarks on the Foundations of Mathematics)। • पी. एम. एस. हैकर — उत्तरकालीन विट्गेन्स्टाइन, भाषा-खेल आ नियम-अनुसरण सम्बन्धी अध्ययन। • गॉर्डन बेकर आ पी. एम. एस. हैकर — ‘विट्गेन्स्टाइन: समझ आ अर्थ’ सम्बन्धी टीकात्मक अध्ययन। • सॉल क्रिप्के — ‘विट्गेन्स्टाइन: नियम आ निजी भाषा’ (Wittgenstein on Rules and Private Language)। • भर्तृहरि — वाक्यपदीय। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • बी. के. मतिलाल — ‘शब्द आ जगत’ (The Word and the World); ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)।