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समस्या
मानवीय अनुभवक किछु क्षेत्र अत्यन्त निजी बुझाइत अछि—दर्द, खुजली, भय, रंगक अनुभूति, स्मृति, आन्तरिक छवि, इच्छा। हमर दर्द हमरा होइत अछि; दोसर व्यक्ति ओकरा ठीक हमर जकाँ प्रत्यक्ष नहि अनुभव करैत। एहि तथ्यसँ सहज प्रश्न उठैत अछि: की एहन पूर्णतः निजी भाषा सम्भव अछि जाहिमे शब्दक अर्थ केवल वक्ताक निजी अनुभव पर निर्भर हो, आ जकर सही अथवा गलत प्रयोगक कसौटी केवल वही व्यक्ति जानय? उत्तरकालीन विट्गेन्स्टाइन एहि प्रश्नकेँ निजी भाषा-विवादक रूपमे उठबैत छथि। हुनकर लक्ष्य ई सिद्ध करब नहि जे निजी अनुभव अस्तित्वहीन अछि। प्रश्न अनुभवक निजता नहि, भाषिक अर्थक सार्वजनिकता अछि। यदि हम अपन निजी संवेदन लेल “स” चिह्न रखी, आ एहि चिह्नक सही प्रयोग जाँचबाक लेल केवल अगिला निजी संवेदनकेँ याद करी, तखन सही आ “सही लगब” बीच भेद कोना रहत? विट्गेन्स्टाइनक प्रसिद्ध डिब्बा–भृंग उदाहरण एहि समस्या पर प्रकाश दैत अछि। कल्पना करू प्रत्येक व्यक्तिक पास एक डिब्बा अछि, भीतर जे किछु अछि केवल ओहि व्यक्ति देखैत अछि, आ सभ ओकरा “भृंग” कहैत अछि। जँ सार्वजनिक भाषिक प्रयोग डिब्बाक भीतर वस्तुक तुलना पर निर्भर नहि, तखन निजी वस्तु शब्दक अर्थ निर्धारणमे निर्णायक भूमिका नहि निभबैत। एहि विवादक संग नियम-अनुसरणक प्रश्न जुड़ल अछि। भाषा केवल निजी संकेत-सूची नहि; अर्थक स्थिरता सुधार, गलती, प्रशिक्षण, पुनरावृत्ति आ सार्वजनिक कसौटीक सम्भावना माँगैत अछि। “हमरा एहि शब्दक सही प्रयोग एहेन लगैत अछि” आ “ई प्रयोग सही अछि” बीच भेद भाषाक जीवन लेल आवश्यक अछि। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—निजी अनुभव स्वीकारैतहुँ पूर्णतः निजी भाषा किएक कठिन? सार्वजनिक कसौटी निजी अनुभूतिक अस्तित्व नकारैत अछि की नहि? दर्द-जकाँ शब्द शरीर, व्यवहार आ जीवन-रूपसँ कोना जुड़ैत अछि? आ न्याय, बौद्ध, मीमांसा तथा मिथिलाक समानान्तर परम्परासँ एहि प्रश्नक संवाद कोना कएल जाए बिना भारतीय आत्मा–अनात्मा वा प्रत्यक्ष-विचारकेँ विट्गेन्स्टाइनक निजी भाषा-विवादक समान घोषित कएने?
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे निजी अनुभव सम्भव आ वास्तविक हो सकैत अछि, मुदा भाषिक अर्थक पूर्णतः निजी नियम-व्यवस्था आत्मनिर्भर रूपेँ टिकब कठिन अछि। अर्थ एहन अभ्यास माँगैत अछि जाहिमे सही–गलत प्रयोगक भेद सम्भव हो, आ ई भेद केवल क्षणिक निजी अनुभूति अथवा स्मृतिक भरोसापर नहि रहि सकैत। “दर्द” शब्दक अर्थ दर्द नामक निजी वस्तुक साथ गुप्त नामकरण मात्र नहि। बच्चा दर्दक भाषिक प्रयोग रोना, चोट, सांत्वना, उपचार, प्रश्न, स्मृति, तुलना आ सामाजिक प्रशिक्षणक बीच सीखैत अछि। निजी अनुभूति भाषा-खेलक हिस्सा अछि, सार्वजनिक कसौटी ओकर प्रतिस्थापन नहि। विट्गेन्स्टाइनक आपत्ति “आन्तरिक जगत नहि अछि” एहन व्यवहारवादी नकार नहि। ओ भाषिक व्याकरणक प्रश्न उठबैत छथि—आन्तरिक अनुभवक बारेमे शब्द सार्वजनिक रूपेँ अर्थपूर्ण कोना बनैत अछि? समानान्तर दर्शन एहि दृष्टिसँ निजता आ सार्वजनिकता दुनू बचबैत अछि: अनुभव व्यक्तिक हो सकैत अछि; ओकर भाषिक दावा सामाजिक नियममे व्यक्त होइत अछि; आ तथ्यात्मक अथवा चिकित्सकीय निष्कर्ष लेल अतिरिक्त प्रमाण सेहो आवश्यक हो सकैत अछि। रंगीन रूपरेखा — निजी अनुभव आ सार्वजनिक भाषा
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—पूर्णतः निजी नामकरणमे सही–गलत प्रयोगक कसौटी कठिन भऽ जाइत अछि। जँ “स” केवल एक निजी संवेदन लेल अछि, आ बादमे हम स्मृतिसँ जाँचैत छी जे ई वही संवेदन की नहि, तखन स्मृति गलत भेल कि नहि—एहि लेल स्वतंत्र कसौटी नहि बचैत। दोसर तर्क—“सही बुझाइत अछि” आ “सही अछि” बीच भेद नियम-अनुसरणक मूल शर्त अछि। यदि दुनू एकहि भऽ जाए, तखन नियमक अवधारणा निष्प्रभावी होइत अछि। तेसर तर्क—भाषा प्रशिक्षणसँ जुड़ल अछि। बच्चा दर्दक शब्द तब सीखैत अछि जखन प्राकृतिक अभिव्यक्ति—रोना, चोटसँ हटब, शरीर बचाबय—सामाजिक शब्दावलीसँ जुड़ैत अछि। भाषा निजी अनुभूतिक स्थान नहि लैत; ओकर सार्वजनिक अभिव्यक्ति बनबैत अछि। चारिम तर्क—डिब्बा–भृंग उदाहरण देखबैत अछि जे सार्वजनिक शब्दक अर्थ अनिवार्य रूपेँ कोनो गुप्त निजी वस्तुक समानता पर निर्भर नहि। जँ प्रत्येक डिब्बाक भीतर अलग चीज हो, तखन सेहो सार्वजनिक “भृंग” शब्दक प्रयोग चलि सकैत अछि, बशर्तेँ भाषिक नियम साझा हो। पाँचम तर्क—एहि उदाहरणक अर्थ ई नहि जे निजी वस्तु अस्तित्वहीन अछि। मुद्दा ई जे भाषिक अर्थक कार्यमे निजी वस्तु कतेक भूमिका निभबैत अछि। निजी अनुभव हो सकैत अछि, मुदा ओकरा शब्दक अर्थक एकमात्र गुप्त आधार मानब दार्शनिक भ्रम हो सकैत अछि। छठम तर्क—दर्दक कथन तीसरा-व्यक्ति वर्णनक समान नहि। “हमरा दर्द अछि” प्रायः अपन अनुभूतिक प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति होइत अछि; “ओकरा दर्द अछि” व्यवहार, वचन, परिस्थिति आ चिकित्सकीय प्रमाणपर निर्भर हो सकैत अछि। व्याकरणिक रूप समान देखाइतहुँ ज्ञानमीमांसक भूमिका अलग। सातम तर्क—सार्वजनिक कसौटी अनुभवक सार्वजनिक उपलब्धता नहि माँगैत। डॉक्टर हमर दर्द “देखैत” नहि, मुदा भाषा, शरीर, परीक्षण, इतिहास आ व्यवहार द्वारा दर्द सम्बन्धी दाबी समझैत अछि। आठम तर्क—निजी भाषा-विवाद आत्मक दार्शनिक सिद्धान्तक प्रत्यक्ष निषेध नहि। विट्गेन्स्टाइन “आत्मा अछि/नहि” प्रश्नक तत्त्वमीमांसक उत्तर नहि दैत छथि; ओ मानसिक शब्दक प्रयोगक व्याकरण स्पष्ट करैत छथि। नवम तर्क—नियम-अनुसरणक सार्वजनिकता सामाजिक बहुमतवाद नहि। पूरा समाज गलत तथ्य मानि सकैत अछि, मुदा भाषा प्रयोगक सही–गलत कसौटी साझा अभ्यासमे बनैत अछि। तथ्यात्मक सत्य फेर अलग प्रमाण माँगैत अछि। दसम तर्क—भाषिक निजता आ गोपनीयता अलग बात छथि। कोड, व्यक्तिगत डायरी वा स्वयं-निर्मित संकेत अत्यन्त निजी हो सकैत अछि, मुदा यदि ओकर नियम व्यक्ति स्वयं स्थिर रूपेँ पालन करैत अछि, तखन नियम सार्वजनिक भाषाक प्रशिक्षण वा पुनरावृत्त कसौटीसँ पोषित होइत अछि।
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे हमरा अपन दर्द पर प्रत्यक्ष अधिकार अछि; दोसर व्यक्ति हमर अनुभव जानि नहि सकैत। तखन निजी अनुभव लेल निजी शब्दावली किएक असम्भव मानल जाए? दोसर पूर्वपक्ष कहैत अछि जे निजी डायरी, गुप्त कोड वा व्यक्तिगत प्रतीक वस्तुतः निजी भाषा अछि। व्यक्ति अपने नियम बनबैत अछि आ अपने समझैत अछि। तेसर पूर्वपक्ष व्यवहारवादक आरोप अछि। यदि मानसिक शब्दक अर्थ सार्वजनिक व्यवहारसँ जुड़ल, तँ की दर्शन आन्तरिक अनुभवकेँ व्यवहारमे घटा देैत अछि? चारिम पूर्वपक्ष भारतीय दृष्टिसँ अछि। न्याय आत्मा आ आन्तरिक अनुभूति, बौद्ध दर्शन चित्त-क्षण आ अनात्मा, योग आ अन्य परम्परा अन्तर्दृष्टि सम्बन्धी अलग दाबी करैत छथि। तखन निजी भाषा-विवाद द्वारा एहि सभ परम्पराकेँ भाषिक भ्रम कहि देब अनुचित होयत।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—प्रत्यक्ष अनुभूतिक निजता स्वीकारल जाइत अछि। विवाद एहि तथ्यपर नहि, बल्कि एहि दाबीपर अछि जे निजी अनुभूति अकेला भाषिक अर्थक स्थिर नियम दे सकैत अछि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—गुप्त कोड पूर्णतः निजी भाषा नहि हो सकैत जँ ओकर संकेत, पुनरावृत्ति, स्मृति, क्रम आ नियम पहिनेसँ सीखन भाषा-अभ्यासपर निर्भर अछि। गोपनीयता सार्वजनिक नियम-संरचनाक अनुपस्थिति नहि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—विट्गेन्स्टाइन व्यवहारकेँ अनुभवक तत्त्वमीमांसक प्रतिस्थापन नहि बनबैत। शरीर, प्रतिक्रिया आ प्रसंग मानसिक शब्दक व्याकरणक हिस्सा छथि; निजी अनुभूति वास्तविक रहैत अछि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय आत्मा–अनात्मा अथवा प्रत्यक्ष-विवाद अलग दार्शनिक परियोजना छथि। समानान्तर दर्शन निजी भाषा-विवादकेँ केवल भाषिक कसौटीक प्रश्न रूपमे उपयोग करत, भारतीय सिद्धान्तक निर्णायक न्यायाधीश रूपमे नहि।
भारतीय संवाद
न्याय दर्शन आन्तरिक अवस्थाक ज्ञान, आत्मा, मनस, सुख–दुःख, इच्छा–द्वेष जकाँ गुणक विश्लेषण करैत अछि। एतय निजी अनुभवक दार्शनिक वास्तविकता स्पष्ट रूपेँ स्वीकारल जाइत अछि। विट्गेन्स्टाइनक निजी भाषा-विवाद एहि तत्त्वमीमांसाकेँ नकारैत नहि; प्रश्न केवल ई जे एहि अनुभवक भाषा सार्वजनिक अर्थ कोना पबैत अछि। बौद्ध दर्शन स्थायी आत्मा पर प्रश्न उठबैत अछि, मुदा वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान जकाँ अनुभव-घटकक विश्लेषण करैत अछि। एहि ठाम “अनुभव निजी अछि” आ “स्थायी आत्मा अछि” समान दावा नहि—ई भेद आधुनिक निजी भाषा-विवादक संग सावधान संवादक आधार बनि सकैत अछि। मीमांसा भाषा-प्रयोगक सामाजिक–शास्त्रीय नियम, वाक्यार्थ, तात्पर्य आ परम्परागत प्रशिक्षणपर बल दैत अछि। अर्थक सार्वजनिक नियमक प्रश्न एतय संवादयोग्य अछि, मुदा मीमांसाक विधि-केन्द्रित लक्ष्य अलग। योगिक प्रत्यक्ष अथवा विशिष्ट अन्तर्दृष्टि सम्बन्धी भारतीय दाबी यदि स्वीकारल जाए तखनो हुनकर भाषिक प्रस्तुति सार्वजनिक दार्शनिक विमर्शमे प्रमाण, परिभाषा आ प्रतिपक्षक कसौटी माँगत। निजी अनुभव स्वयं सार्वजनिक सिद्धान्तक स्वतः प्रमाण नहि। भारतीय संवादक निष्कर्ष—आन्तरिक अनुभूति, आत्मा, अनात्मा, मनस, वेदना आ भाषा अलग प्रश्न-स्तर छथि। समानान्तर पद्धति हुनका एक-दोसरामे जबरन नहि घटबैत।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक नव्य-न्याय परम्परा ज्ञान-दाबीक विषय, प्रकार, कारण आ सीमा स्पष्ट करबाक अनुशासन दैत अछि। “हमरा दर्द अछि” जकाँ प्रथम-व्यक्ति कथन आ “ओकरा दर्द अछि” जकाँ तृतीय-व्यक्ति कथनक प्रमाण-रचना अलग हो सकैत अछि—एहि भेदकेँ समानान्तर दर्शन विशेष महत्त्व दैत अछि। मिथिलाक सामाजिक जीवनमे रोग, प्रसव, श्रम, शोक, भय, स्त्री-अनुभव, जातिगत अपमान वा प्रवासी अकेलापन जकाँ अनुभव बहुत बेर निजी अथवा कम-सुनल रहैत अछि। सार्वजनिक भाषा-विवेकक अर्थ ई नहि जे जे अनुभव बहुमत भाषा मे नहि, से अवास्तविक। उलटे भाषिक व्यवस्था हाशियाक अनुभव व्यक्त करबाक पर्याप्त शब्द देइत अछि की नहि—ई नैतिक प्रश्न अछि। गरिमा-आधारित नैतिकता निजी अनुभूतिक साक्ष्यकेँ सम्मान दैत अछि। ककरो पीड़ा “हम देखैत नहि छी” कहि नकारल नहि जाए; मुदा सार्वजनिक नीति, न्याय अथवा चिकित्सा लेल व्यक्तिगत साक्ष्यक संग अन्य प्रमाण सेहो आवश्यक हो सकैत अछि। समानान्तर इतिहास-दृष्टि सेहो एहि शिक्षाकेँ ग्रहण करैत अछि। मौखिक स्मृति वा निजी डायरी महत्त्वपूर्ण स्रोत हो सकैत अछि, मुदा ओकर अर्थ भाषा, काल, प्रसंग आ अन्य स्रोतक संग जाँचल जाए। निजी साक्ष्य मूल्यवान अछि; आलोचनासँ मुक्त नहि। मैथिली दार्शनिक भाषा लेल ई अध्याय एक महत्त्वपूर्ण कार्य सुझबैत अछि—आन्तरिक अनुभव लेल सूक्ष्म शब्दावली विकसित करू, मुदा शब्दक अर्थ केवल लेखकक निजी अनुभूति पर नहि छोड़ू। परिभाषा, उदाहरण, प्रयोग आ सार्वजनिक संवाद द्वारा अर्थ स्थिर करू। समानान्तर सूत्र—अनुभवक निजता स्वीकारू; अर्थक सामाजिकता बुझू; साक्ष्य सुनू; प्रमाण जाँचू; आ सार्वजनिक कसौटीकेँ बहुमतक अत्याचार नहि बनाउ। रंगीन प्रक्रिया-चित्र — निजी अनुभूतिसँ सार्वजनिक अर्थ धरि
समकालीन प्रयोग
चिकित्सामे दर्दक मापन निजी अनुभव आ सार्वजनिक कसौटीक प्रत्यक्ष उदाहरण अछि। रोगी कहैत अछि “दर्द 8/10”; डॉक्टर एहिकेँ शरीर, रोग-इतिहास, परीक्षण आ उपचार-प्रतिक्रिया संग पढ़ैत अछि। स्केल निजी अनुभूतिक प्रतिस्थापन नहि, संवादक उपकरण अछि। मानसिक स्वास्थ्यक भाषामे उदासी, भय, घबराहट, आघात जकाँ अनुभव बाहरी निरीक्षणसँ पूर्णतः उपलब्ध नहि। तथापि साझा प्रश्नावली, नैदानिक भाषा, आत्म-वर्णन आ व्यवहार द्वारा सार्वजनिक संवाद सम्भव होइत अछि। कृत्रिम बुद्धिमे मशीन “हम दुखी छी” अथवा “हम दर्द अनुभव करैत छी” कहि सकैत अछि। निजी भाषा-विवाद पूछैत अछि—एहि शब्दक मानवीय प्रयोगक कसौटी की, आ मशीन वास्तवमे कोन व्यवहारिक–कार्यात्मक नियम पूरा करैत अछि? भाषिक नकलसँ आन्तरिक अनुभव स्वतः सिद्ध नहि। AI भाव-पहिचान प्रणाली चेहरा वा आवाजसँ “दुखी”, “क्रोधित”, “भयभीत” लेबल दैत अछि। निजी अनुभूति सार्वजनिक व्यवहारसँ सरलतासँ समतुल्य नहि; अतः एहन प्रणालीक निष्कर्ष सम्भावित अनुमान रूपमे राखल जाए, अन्तिम सत्य रूपमे नहि। कानूनमे पीड़ा, भय, सहमति, मानसिक अवस्था जकाँ निजी अनुभव साक्ष्यक रूपमे अबैत अछि। न्यायिक प्रणाली व्यक्तिगत कथनक सम्मान करैतहुँ परिस्थितिजन्य, चिकित्सकीय, दस्तावेजी वा अन्य प्रमाणसँ परीक्षण करैत अछि। सामाजिक न्यायमे हाशियाक समूहक अनुभव “हमरा तऽ एहन किछु नहि देखाइत” कहि नकारल नहि जाए। निजी/समूहगत अनुभव सार्वजनिक ज्ञानक महत्त्वपूर्ण स्रोत हो सकैत अछि; तथापि प्रतिनिधित्व, विविधता आ प्रमाणक प्रश्न खुलल रहत। डिजिटल गोपनीयतामे निजी भाषा-विवादक अलग अनुप्रयोग अछि: निजी डेटा, निजी अनुभव आ निजी भाषा एकहि वस्तु नहि। गोपनीयता अधिकार सार्वजनिक नियम द्वारा संरक्षित होइत अछि; निजता सामाजिक नियमक विरोधी नहि।
अध्याय-निष्कर्ष
निजी भाषा-विवाद निजी अनुभवक अस्तित्वक निषेध नहि। विट्गेन्स्टाइनक प्रश्न भाषिक अर्थक कसौटी पर अछि—पूर्णतः निजी नियममे सही आ “सही लगब” बीच भेद कोना सम्भव? दर्द-जकाँ मानसिक शब्द सार्वजनिक प्रशिक्षण, प्राकृतिक अभिव्यक्ति, सामाजिक व्यवहार आ जीवन-रूपक भीतर अर्थ पबैत अछि। निजी अनुभूति एहि भाषिक जालक विषय अछि, ओकर प्रतिस्थापन नहि। डिब्बा–भृंग उदाहरण देखबैत अछि जे सार्वजनिक शब्दक अर्थ अनिवार्य रूपेँ गुप्त निजी वस्तुक समानता पर निर्भर नहि। न्याय, बौद्ध, मीमांसा आ अन्य भारतीय परम्परासँ संवाद आन्तरिक अनुभव, आत्मा, मनस, वेदना आ शब्दप्रमाणक अलग प्रश्न खोलैत अछि; ऐतिहासिक समानता नहि। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि निजी साक्ष्यकेँ गरिमा दैत अछि, सार्वजनिक भाषा विकसित करैत अछि, आ सार्वजनिक निर्णय लेल प्रमाणक बहुलता माँगैत अछि। अध्यायक अन्तिम सूत्र—“निजी अनुभव मौन होयबाक बाध्यता नहि; सार्वजनिक भाषा निजी अनुभवक शत्रु नहि। अर्थ साझा नियममे बनैत अछि, अनुभव व्यक्तिक भीतर घटि सकैत अछि।”
अध्याय-ग्रन्थसूची
• लुडविग विट्गेन्स्टाइन — ‘दार्शनिक अन्वेषण’ (Philosophical Investigations), विशेषतः निजी भाषा आ मानसिक शब्द सम्बन्धी अनुच्छेद। • लुडविग विट्गेन्स्टाइन — ‘नीली आ भूरी पुस्तिका’ (The Blue and Brown Books)। • लुडविग विट्गेन्स्टाइन — ‘निश्चितता पर’ (On Certainty)। • सॉल क्रिप्के — ‘विट्गेन्स्टाइन: नियम आ निजी भाषा’ (Wittgenstein on Rules and Private Language)। • गॉर्डन बेकर आ पी. एम. एस. हैकर — ‘विट्गेन्स्टाइन: नियम, व्याकरण आ आवश्यकता’ सम्बन्धी टीकात्मक अध्ययन। • पी. एम. एस. हैकर — विट्गेन्स्टाइन, मन आ निजी भाषा सम्बन्धी अध्ययन। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • वसुबन्धु — अभिधर्मकोशभाष्य। • बी. के. मतिलाल — ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality); मन, ज्ञान आ भाषा सम्बन्धी चयनित निबन्ध। • जोनार्डन गणेरी — ‘आत्मक छिपायल कला’ (The Concealed Art of the Soul); ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)।